नास्तिकता का प्रसार करके क्या हम दुनिया को बेहतर जगह बना सकते हैं? 4 अगस्त 2015

कल मैंने बताया था कि नास्तिकता और आस्था का प्रश्न भारत में क्यों पश्चिम के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए कि यहाँ लोग ईश्वर और धर्म की परवाह ज़्यादा करते हैं! मैंने ज़िक्र किया था कि मेरे मुताबिक़, जब अधिक से अधिक लोग धर्म का त्याग कर देंगे और नास्तिक बन जाएँगे तब यह संसार अधिक बेहतर जगह हो जाएगी। आज मैं इस कथन की कुछ विस्तार से व्याख्या करते हुए स्पष्ट करना चाहता हूँ कि क्यों ईश्वर पर आपकी आस्था या अविश्वास से कोई फर्क नहीं पड़ता!

मैं इस बात को एक बार और स्पष्ट करना चाहता हूँ: वास्तव में मैं इस बात की ज़्यादा परवाह नहीं करता कि आप ईश्वर पर आस्था रखते हैं या नहीं। दोनों ही स्थितियों में मैं आपका दोस्त बन सकता हूँ-और दोनों ही स्थितियों में मैं आपका मित्र नहीं भी हो सकता। अगर बीस, सौ या एक हज़ार लोग कह दें कि वे ईश्वर पर आस्था नहीं रखते तो यह तथ्य भी इस संसार को बेहतर स्थान नहीं बना सकता। वास्तव में आस्था के खिलाफ मैं नहीं हूँ बल्कि लोगों की आस्था का लाभ उठाकर उनका शोषण करने, उनके साथ धोखेबाज़ी करने, उनके मस्तिष्क को बरगलाने की घिनौनी हरकतों के खिलाफ हूँ!

इसलिए मैं अपने विचारों और शब्दों को सिर्फ हिन्दू धर्म या भारत के संदर्भ में सीमाबद्ध नहीं करता! मुझे लगता है कि वे दूसरे धर्मों और आस्थाओं के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं क्योंकि आस्था का सवाल आने पर लोगों का शोषण और भी कई तरीकों से किया जा रहा है! मैं यहाँ रहस्यवादी रीति-रिवाजों और ‘आध्यात्मिकता’ को भी साफ तौर पर इसमें शामिल करना चाहता हूँ!

ये सब एक ही हैं: कुछ लोगों का समूह एक किताब लिखता है और वह धर्मग्रंथ बन जाता है और फिर दूसरों के लिए उसका अनुसरण करना आवश्यक बना दिया जाता है। किसी धर्म का मुखिया कोई किताब छपवाता है और फिर दूसरों को उन नियमों में बंधकर रहना लाज़िमी है। ऐसे गुरु, जो अपने अनुयायियों को बताते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। संप्रदायों के नेता, जो अपने भक्तों को भेड़ों की तरह हाँकते हैं। अतीन्द्रियदर्शी, जो यह देखने का दावा करते हैं कि भविष्य में क्या होने वाला है। अलौकिक ज्ञान का दावा करने वाले छद्म मनोविज्ञानी, जो उनका अनुसरण करने वालों को बताते हैं कि उनके मृत पूर्वज उनसे किन कार्यों की अपेक्षा कर रहे हैं।

जब मैं कहता हूँ कि मैं नास्तिक हूँ तो मैं इस संसार का निर्देशन करने वाले किसी "ब्रह्माण्ड" या किसी काल्पनिक आसमानी शक्ति पर भी विश्वास नहीं करता। संभव है, दूसरे लोग कुछ दूसरा सोचते हों। सिर्फ इस तथ्य से कि एक व्यक्ति ईश्वर या ऐसी ही किसी सत्ता पर विश्वास नहीं करता, दुनिया बेहतर नहीं हो जाने वाली है।

लेकिन, जब मैं कहता हूँ कि मैं अपनी मर्ज़ी से चलूँगा, जो काम मुझे अच्छा लगता है और जिससे दूसरों का भला होता है, वही करूँगा; दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाले, दुःख देने वाले काम नहीं करूँगा, उन्हें धोखा नहीं दूँगा, उनके साथ छल नहीं करूँगा- और कोई दूसरा भी मेरे पास आकर यही कहता है कि वह भी इसी नतीजे पर पहुँचा है- तब, मुझे लगता है कि दुनिया वाकई बेहतर जगह हो जाएगी!

लेकिन, क्योंकि धर्म में और आध्यात्मिकता में भी इतना अधिक छल-कपट है, ऐसा होने की अधिक संभावना तभी है जब कि आप धर्म और ईश्वर का त्याग कर देंगे । और मैं अपने इस विचार को अधिक से अधिक लोगों को बताता हूँ, और उसके बारे में लिखता रहता हूँ तो इसलिए कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस नतीजे पर पहुँचें और आगे किसी के झाँसे में न आएँ, दूसरों को अपना शोषण करने की इजाज़त न दें!

यह स्पष्ट करने के लिए कि आप नीरस या असंवेदनशील नहीं हैं, अपनी नास्तिकता को सबके सामने स्वीकार कीजिए – 28 जुलाई 2015

मैंने कल उल्लेख किया था कि मैं खुशी-खुशी लोगों को बताता हूँ कि मैं नास्तिक हूँ। मैं इसका प्रसार करना चाहूँगा और अधिक से अधिक लोगों के मन में धर्म के प्रति शंका पैदा कर उन्हें उससे विलग करने की कोशिश करूँगा। लेकिन हर नास्तिक इस तरह नहीं सोचता! नहीं, ऐसे बहुत से लोग हैं, जो धर्म के प्रति अपने अविश्वास को खुले आम स्वीकार करने में संकोच करते हैं। यहाँ तक कि वे समझते हैं जैसे धर्म पर विश्वास न करके वे कोई अपराध कर रहे हैं। यदि आप भी उनमें से एक हैं तो आपको इसे बदलना चाहिए!

आप यदि इस समस्या की गहराई में जाकर उसकी गंभीरता को समझना चाहते हैं तो सबसे पहले यह जान लीजिए कि भारत में नास्तिक शब्द को, जिसे अंग्रेज़ी में एथीस्ट कहते हैं, बहुत ही नकारात्मक अर्थ में लिया जाता है। अधिकांश लोग धार्मिक हैं और उनका विश्वास होता है कि ईश्वर में आस्था रखने पर ही आप दयालु, परोपकारी, प्रेममय और प्रफुल्ल होते हैं और तभी आप जीवन का आनंद ले सकते हैं! वे सच में यह सोचते हैं कि जो ईश्वर को नहीं मानता वह एक अच्छा और नैतिक व्यक्ति नहीं हो सकता। वह दूसरों का भला नहीं कर सकता और न तो हँस-बोल सकता है और न ही अपने जीवन में किसी प्रकार से भी खुश रह सकता है! उसकी छवि एक बुरे व्यक्ति जैसी बना दी गई है।

वास्तव में इसीलिए लोग अपने आपको अधार्मिक या नास्तिक घोषित करने से कतराते हैं। वे अपने आपको प्रगतिवादी, तर्कशील, संदेहवादी, विवेकपूर्ण और इसी तरह के समानार्थी शब्दों से संबोधित करते हैं, जिनसे सिर्फ इतना पता चलता है कि वे दक़ियानूसी प्रथाओं और परंपराओं को नहीं मानते। पर इनमें से कोई भी शब्द, मेरी नज़र में, पर्याप्त स्पष्ट नहीं है और आपकी वास्तविक मंशा ज़ाहिर नहीं करता कि आप किसी भी धर्म का अनुपालन नहीं करते, कि आप ईश्वर पर विश्वास नहीं रखते, कि आप नास्तिक हैं।

समाज में “नास्तिक” शब्द को नकारात्मक अर्थ में लिया जाता है और आप नहीं चाहते कि लोगों के बीच आप एक नकारात्मक व्यक्ति के रूप में जाने जाएँ। लेकिन वास्तव में बदलाव लाने के लिए आपको शब्द नहीं बदलना है। यदि आप ऐसा करते हैं तो वास्तव में आप इस नकारात्मक सोच का समर्थन ही कर रहे हैं, आप यह साबित कर रहे हैं कि वास्तव में नास्तिक खुश नहीं रह सकते, आनंदित नहीं हो सकते। आप एक सकारात्मक व्यक्ति दिखाई देना चाहते हैं इसलिए मान रहे हैं कि आप नास्तिक नहीं हैं-क्योंकि नास्तिक तो सकारात्मक हो ही नहीं सकते! यह सही तरीका नहीं है।

इसमें खतरा यह है कि बहुत से दूसरे लोग अपने आपको आधुनिक अथवा अलग साबित करने के प्रयास में पाखण्ड पूर्वक ठीक इन्हीं शब्दों का उपयोग करते हैं, जबकि वास्तव में वे पूर्ण रूप से आस्तिक और धार्मिक होते हैं! आप कह सकते हैं कि वे तार्किक नहीं हैं किन्तु उनके अपने विचार से वे हैं! इस तरह गलती से आपको भी एक ऐसा आस्थावान और धार्मिक व्यक्ति समझ लिया जाएगा, जो थोड़ा खुले विचारों वाला है, इतना ही। अगर आप कहते हैं कि आप 'प्रगतिशील' हैं तो उसका अर्थ, अपनी पूजा-अर्चना दिए की जगह बिजली का बल्ब जलाकर करने वाले व्यक्ति से लेकर ईश्वर पर विश्वास न करने वाले किसी नास्तिक व्यक्ति तक, कुछ भी लगाया जा सकता है!

जो बात कहनी है, बिना लाग लपेट के, साफ-साफ कहिए। सिर्फ यही स्पष्टता गलतफहमियाँ और भ्रांतियाँ दूर कर सकती है।

हमें ‘नास्तिक’ शब्द के इस नकारात्मक अर्थ के चलन को तोड़ना है किन्तु यह तभी संभव है जब हम स्वयं को नास्तिक कहें और यह दिखा सकें कि नास्तिक होने के बाद भी हम जीवन का उतना ही, बल्कि सामान्य से ज्यादा ही, आनंद लेते हैं। आप क्या हैं और क्या सोचते हैं, स्पष्ट रखें। अगर वह आपके लिए सहज, स्वाभाविक और उचित है तभी आप दूसरों को भी उसके बारे में बता सकते हैं। समय के साथ यह छवि भी बदलेगी। ईमानदार और सत्यनिष्ठा रहें- बदलाव अवश्य आएगा!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

जब परिवर्तन मित्रों के बीच नज़दीकियाँ कम कर देते हैं – 8 जून 2015

निश्चय ही प्रेम और मित्रता के बारे में, दिलों की गहरी नजदीकी के बारे में और भौतिक अंतरंगता के बारे में मैं पहले कई बार विस्तार से लिख चुका हूँ। और निश्चित रूप से, जब भी मैंने ऐसे विषयों पर लिखा है, हर बार इस बात का ज़िक्र अवश्य किया है कि भौतिक नजदीकी के मुक़ाबले दिलों की नजदीकी हर हाल में अधिक महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से हाल ही में मैंने एक बार फिर नोटिस किया कि यह तथ्य वास्तव में कितना महत्वपूर्ण है!

मेरा एक दोस्त है, जिसके साथ मैं हमेशा से बहुत घनिष्ठ रहा हूँ। हम एक-दूसरे को लंबे समय से जानते हैं और अपनी मित्रता के दौरान हम जीवन के विभिन्न चरणों से गुजरे हैं, कभी काफी नजदीक रहते हुए तो कभी लगातार बहुत समय तक एक-दूसरे से दूर रहते हुए।

जब हम एक साथ नहीं भी रहते थे और न सिर्फ मिलते नहीं थे बल्कि फोन पर भी महीनों हमारी बातचीत भी बंद रहती थी, तब भी हम आपस में करीबी महसूस करते थे। कभी कभी सालों गुज़र जाते और हम बारह-बारह महीनों में भूले-भटके ही मिल पाते थे! इस दौरान पूरे समय मुझे महसूस होता था कि जब भी हम मिलते हैं, हम आपस में काफी मजबूती के साथ, बहुत घनिष्ठता के साथ जुड़े हुए हैं।

लेकिन अब परिस्थिति कुछ बदल गई है। मुझमें और मेरे जीवन में बहुत सारे परिवर्तन आ गए हैं और मज़ेदार बात यह कि हम लोग अब परस्पर काफी नजदीक भी रहने लगे हैं, एक-दूसरे से माह में कम से कम दो बार अवश्य मिल लेते हैं लेकिन दुर्भाग्य से अब मैं उससे उतनी नजदीकी महसूस नहीं करता।

बहुत से परिवर्तनों का मैंने ज़िक्र किया और निश्चित ही उनमें से एक है मेरे विचारों में आए परिवर्तन। जो विषय मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, उन पर हमारे विचारों में बहुत अंतर है। इतना अधिक कि हम एक-दूसरे के साथ कभी सहमत नहीं हो पाते और इसलिए उन विषयों को चर्चा में ही नहीं लाते या कभी उस पर चर्चा होने लगी तो उसे बीच में ही छोड़ देते हैं। कुछ समय तक यह निभ गया।

लेकिन समय बीतने के साथ यह महसूस होने लगता है कि कैसे जीवन के प्रति आपका बुनियादी नज़रिया और विचार बातचीत के हर दूसरे विषय को प्रभावित करने लगता है। और अंत में, वह मुलाक़ात और आपसी बातचीत भी महज रस्म अदायगी और औपचारिक वार्तालाप में तब्दील हो जाती है।

एक ऐसी रस्म, जिसे मैं अपनी पुरानी मित्रता की खातिर जारी रखने की औपचारिकता निभाता रहूँगा।

मैं अपनी भावनाएँ खुलकर व्यक्त करने में विश्वास रखता हूँ और इसलिए अपने मित्र से मैंने कहा कि अब हमारे बीच उतनी नजदीकी नहीं रह गई है। उसके जवाब ने मेरी भावनाओं की सत्यता की पुष्टि कर दी: उसने कहा, नहीं, सब कुछ ठीक है।

इसका आशय यह था कि उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे बीच अब उतनी नजदीकी नहीं रह गई है- या इससे भी कि मैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ। यह अपने आप में सिद्ध करता है कि वास्तव में अब हमारे बीच कोई घनिष्ठता नहीं रह गई है। और इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता-लेकिन यह एहसास भी समय के साथ समाप्त हो जाएगा!

पुराने दोस्तों से दूरी पर दुखी न हों, आप इस विषय में कुछ नहीं कर सकते! 3 मई 2015

मैं जानता हूँ कि पहले भी कभी-कभी मैं खुद अपने ब्लॉगों में मित्रों के बारे में लिखते हुए इसी तरह खयालों में डूब जाता रहा हूँ लेकिन मुझे लगता है कि आज मैं पुनः उसी दौर से गुज़र रहा हूँ, लिहाज़ा अपने विचार पुनः साझा करना चाहता हूँ। हम सभी जानते हैं कि घनिष्ट मित्रता कैसी होती है और यह भी कि कुछ ऐसी मित्रताएँ भी होती हैं, जहाँ आप सोच में पड़ जाते हैं कि आखिर हम इतने दिनों बाद आज भी इतने जुड़े हुए क्यों हैं। मैं आज इसी दूसरी तरह के मित्रों के बारे में लिखना चाहता हूँ।

अक्सर ऐसे मित्र वे लोग होते हैं जिन्हें आप बचपन से जानते हैं। आप बचपन में उनके साथ खेले होते हैं, कुछ साल एक साथ बड़े होते हैं लेकिन फिर दोनों की राहें जुदा हो जाती हैं। हो सकता है वे आपके पड़ोसी रहे हों, संभव है, प्राथमिक शाला के सहपाठी हों। यहाँ तक कि, हो सकता है कि आप बाद में मिले हों और कुछ समय के लिए ही सही, करीबी दोस्त बन गए हों। मुख्य बात यह कि अब आप उनके करीब नहीं हैं। दरअसल वास्तविकता यह है कि अब आप उनसे किसी तरह की नजदीकी महसूस नहीं करते।

ऐसे व्यक्ति से आप एक ख़ास तरह का भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं क्योंकि आपने उसके साथ बचपन के सुनहरे दिन गुज़ारे होते हैं। लेकिन इस समय आप अच्छी तरह से जान रहे होते हैं कि आप दोनों के विचार नहीं मिलते। आप उससे बिल्कुल अलग तरह से सोचते हैं! आपकी विचारसरणी इधर जा रही है तो उसकी बिल्कुल विपरीत दिशा में। आप कोई बात कहने से पहले ही जानते होते हैं कि वह उसका समर्थन नहीं करेगा। इसी तरह वह आपसे कुछ कहेगा और आप उससे सहमत नहीं हो पाएँगे!

ऐसी स्थिति में, आप एक-दूसरे के साथ वैसे सहज-स्वाभाविक, शांत और स्वच्छंद नहीं रह सकते जैसे किसी समय रहा करते थे। शायद आप उन दिनों को मिस करेंगे या उन दिनों के बारे में सोचते हुए अजीब उदासी और अवसाद से भर जाएँगे- क्योंकि आप जानते हैं कि आप उन दिनों को वापस नहीं ला सकते! जिन परिवर्तनों ने आपको यहाँ इस बिंदु तक पहुँचाया है, वैसा बनाया है जैसे आप हैं, उन्हें आप वापस लाना नहीं चाहेंगे। जैसे आप कभी थे, अब वैसा बनना नहीं चाहेंगे।

वास्तव में मैं अपने पुराने समय में नहीं जाना चाहता। जब मैं अपने पुराने दोस्तों के साथ बिताए गए सुखद समय की याद करता हूँ तो खुश होता हूँ, दुखी नहीं। मैं जानता हूँ कि मेरा वर्तमान भी उतना ही सुखद, शानदार है और उम्मीद करता हूँ कि भविष्य भी वैसा ही शानदार होगा!

लेकिन मेरे जीवन में ऐसे मित्र भी हैं और कई बार मुझे उनके साथ फोन पर होने वाली औपचारिकतापूर्ण मासिक या साप्ताहिक बातों पर आश्चर्य होता है। कभी कभार एकाध मुलाक़ात-साल में एक बार, माह में दो बार या नियमित रूप से। और, निश्चित ही, जन्मदिन पर नियमित रूप से व्यक्त की जाने वाली शुभकामनाएँ। यह सब उसके लिए, जिसके साथ अब मैं कोई नज़दीकी महसूस नहीं करता, विशेष रूप से, विचारों के स्तर पर!

जी हाँ, क्योंकि इतना करने के लिए मुझे कोई खर्च नहीं करना पड़ता। इससे मुझे कुछ होगा तो लाभ ही होगा। फोन उठाने में कोई ताकत ज़ाया नहीं होती, उसके घर चले जाने में या उसके मेरे यहाँ आने पर मुझे ख़ास कुछ नहीं करना पड़ता। इससे ताल्लुक बना रहता है, भले ही वह औपचारिकताओं पर आधारित हो लेकिन फिर भी मैं उस व्यक्ति को अपना मित्र कह सकता हूँ। अपना पुराना यार, पुराना पड़ोसी, मेरी किसी पिछली यात्रा का साथी।

हम कभी बहुत घनिष्ट थे, अब नहीं हैं लेकिन फिर से घनिष्ट मित्र बन सकते हैं। या नहीं भी बन सकते-लेकिन इसमें हमारा क्या बनता-बिगड़ता है? कुछ पाएँगे तो आप सिर्फ प्यार मुहब्बत पाएँगे और उस सम्भावना को बरकरार रखने के लिए इतना प्रयास मामूली सौदा है!

अगर मामूली से मामूली काम भी आपको कठिन लगता है तो कृपया इसे अवश्य पढ़ें – 15 अप्रैल 2015

कल मैंने उन लोगों के बारे में लिखा था जो हर काम को इस तरह बढ़ा-चढ़कर पेश करते हैं जैसे वह बेहद कठिन काम हो जब कि वे जानते हैं कि काम बहुत आसान है या समस्या आसानी से हल की जा सकती है। आज मैं ऐसे लोगों के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिनके पास जब आप कोई समस्या या अपनी किसी योजना को लेकर जाते हैं तो वे प्रतिक्रिया तो वैसी ही देते हैं-मगर बिल्कुल अलग कारणों से!

कल मैंने आपको ऐसे लोगों के बारे में बताया था, जिनसे आप कुछ भी कहें, उसमें तरह-तरह की समस्याएँ और परेशानियाँ अवश्य निकालेंगे क्योंकि वे खुद उस मामले का निपटारा करके सारा श्रेय लेना चाहते हैं, जिससे उनका अहं तुष्ट हो। आज मैं आपको कुछ दूसरे प्रकार के लोगों से मिलवाना चाहता हूँ-ये लोग वास्तव में ईमानदारी के साथ समझते हैं कि सब कुछ बहुत मुश्किल ही होता है!

इस समस्या के मूल में उनकी परवरिश है, उनकी शिक्षा-दीक्षा है और वह माहौल है, जिसमें वे रहते हैं। उनके जीवन का एक दायरा है, जो एक सीधी कतार में आगे बढ़ता है, एक ख़ास व्यवस्था में व्यवहार करता है। वे जानते हैं कि क्या होगा, कैसे उसे होना चाहिए, और सिवा कुछ मामूली, अस्थिर और परिवर्तनीय बातों के, उनके सामने पहले से सब कुछ पूरी तरह स्पष्ट रूप से तय होता है। उनके सामने रास्ता ठीक नाक की सीध में होता है, किसी गफलत की गुंजाइश नहीं होती।

और तब आप उनके सामने अपनी कोई बिल्कुल अलग योजना लेकर आते हैं! आप कुछ अलग करने की सलाह देते हैं, जो उनके सोच के दायरे में नहीं है! वैसा करना उनकी कल्पना से परे की बात है और तब उनके मन में हजारों तरह की कठिनाइयाँ पैदा हो जाती हैं! वे परेशान हो जाते हैं बल्कि वास्तव में, बड़े अशांत और व्याकुल हो उठते हैं, लगभग भयभीत। किसी भी परिवर्तन से पार पाना उनके लिए मुश्किल होता है क्योंकि उनमें लचीलापन बिल्कुल नहीं होता।

वे ईमानदारी से सोचते हैं कि जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ है। कि हर तरफ दिक्कत ही दिक्कत है।

तो जब आप अपनी योजना लेकर उनके पास जाते हैं तो आपको पहले से पता होता है कि शुरू में उनका जवाब नकारात्मक ही होगा। ऐसे लोगों को सोचने और स्थिर होने के लिए कुछ समय दीजिए। उन्हें बताइए कि आप क्यों समझते हैं कि आपका सुझाव बढ़िया है और उन्हें उस सुझाव पर विचार करने का मौका दीजिए, उस परिवर्तन के भले-बुरे के बारे में, पक्ष-विपक्ष के बारे में सोचने-विचारने का मौका दीजिए। एक तरफ वे आपको कुछ वास्तविक समस्याओं के बारे में बताएँगे जो आपकी नज़रों से ओझल रह गई होंगी और इस तरह आपकी मदद ही करेंगे! दूसरी तरफ उनके सामने रखने से पहले आपको अपनी योजना को इतना पुख्ता बनाना होगा कि उसमें कोई खामी न रहे-अन्यथा उनके द्वारा निकाली गई खामियों के चलते आप बहुत जल्दी हतोत्साहित हो जाएँगे!

तो, इस बारे में समझदारी से काम लें कि कब आपको अपनी योजना उनके सामने रखनी है-कि जब आप उसे अंतिम रूप दें तो कोई कुछ भी कहे, सिवा कुछ ठोस बिंदुओं के उसमें कोई कमियाँ न रहें!

अपने वास्तविक मित्रों के साथ मिलकर बदलावों को अनुभव करने का सुखद एहसास – 29 मार्च 2015

कल थॉमस और आयरिस आश्रम आ गए! उनका आना हमेशा ही बड़ा सुखद होता है और इस बार भी उनके आने से सिर्फ अपरा ही खुश नहीं हुई!

हमारे पिछले कुछ माह न सिर्फ बहुत से मेहमानों की आमद से रोशन रहे बल्कि रेस्तराँ के काम की व्यस्तता के चलते हम सब आम दिनों से ज़्यादा अस्तव्यस्त हो गए थे। पिछले दो माह तो कुछ ज़्यादा ही व्यस्त रहे-और बड़े आनंददायक भी, क्योंकि हेयर ड्रेसर्स का एक दल यहाँ आया हुआ था, जिनमें से कुछ लोग पिछले साल भी यहाँ आ चुके थे। वे कुछ कार्यशालाओं में और व्यक्तिगत सत्रों में सम्मिलित हुए, योग और आयुर्वेद शिविरों में भाग लिया और निश्चित ही बहुत सी मस्ती भी की।

अब हम हिमालय यात्रा की तैयारी कर रहे हैं लेकिन अपने यात्री-समूह को लेकर यशेंदु के रवाना होने से पहले हमारे पास कुछ ही दिन हैं, जिनमें हम सब यार-दोस्त एक साथ होंगे और हमें पता है कि ये थोड़े से दिन कितनी मस्ती भरे और सुखद होंगे!

इस बार एक साल से ज़्यादा समय के बाद थॉमस और आयरिस आश्रम आए हैं। पिछले साल सितंबर में उनके साथ मेरी रूबरू मुलाक़ात हुई थी और जबकि स्काइप और फोन पर हम लोगों का सम्पर्क बना हुआ था फिर भी आमने-सामने बैठकर आपस में गपशप करना, उससे कई गुना सुखद है!

उनके जीवन में परिवर्तन आया है, हमारे जीवनों में भी भारी परिवर्तन हुए हैं और क्योंकि पिछले सप्ताह से, जैसा कि, अगर आप मेरे ब्लॉग पढ़ते हों तो जानते होंगे, मेरे दिमाग में परिवर्तन संबंधी यह विषय लगातार घूम रहा है, और इन परिवर्तनों के बीच से गुज़रते हुए मैं एक बार फिर अपनी मित्रता के महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। परिवर्तन बाहर से हुए हैं, भीतर से हुए हैं और चारों ओर से, हर तरफ से हुए हैं।

और हम सबने परिवर्तन की उस धारा के साथ बहने के लिए अपने आप को खुला छोड़ दिया है। इन परिवर्तनों के बीचोंबीच दोस्तों के साथ शाना-ब-शाना मौजूद होना कितना खुशगवार है। आप बीते दिनों के विषय में बातें करते हैं, अपने कुछ पुराने विचारों पर हँसते हैं, याद करते हैं कि तब आप कैसे दिखते थे, अपने कामों पर मंद-मंद मुस्कुराते हैं और भावुक बातों पर गले लगकर आँखें गीली कर लेते हैं। आप एक-दूसरे को अपने-अपने वर्तमान के बारे में बताते हैं और फिर एक-दूसरे की ख़ुशियों, उल्लास, प्रेम और सुख-शांति और संतोष में खुद भी हर्षोल्लास से भर उठते हैं।

स्वाभाविक ही, भविष्य के बारे में भी सोचा जाता है-और आपस में मिलकर भविष्य की योजनाएँ बनाने से बढ़कर क्या हो सकता है? अपने दिलोदिमाग में भविष्य का खाका खींचना, सपने देखना और उन सपनों को साकार करने का संकल्प लेना! इससे अधिक उज्ज्वल भविष्य नहीं हो सकता और मैं जानता हूँ कि हम सब कदम से कदम मिलाकर उस भविष्य की ओर रवाना होंगे, भले ही हज़ारों किलोमीटर की भौगोलिक दूरी हमारे बीच हो!

अगर आपको मित्रता का ऐसा एहसास हो रहा है तभी आप जान सकते हैं कि आपके पास सच्चे मित्र हैं!

पूरी शिद्दत के साथ प्रेम का आनंद लीजिए!

खुद अपने आप पर भरोसा करें: आप परिवर्तन ला सकते हैं और उनसे लाभ भी उठा सकते हैं – 25 मार्च 2015

कल मैंने बताया था कि अगर आप प्रसन्न रहना चाहते हैं तो आपको परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए जो भी नई परिस्थितियाँ निर्मित हों, उनके अनुसार ही चलना होगा। स्वाभाविक ही कल की चर्चा उन बाहरी परिवर्तनों के बारे में थी, जिनके प्रति आपको लचीला रवैया अपनाना होगा। आज मैं एक और प्रकार के परिवर्तन के बारे में लिखना चाहता हूँ: वह, जिसका कारण आप स्वयं होते हैं; वह, जो आपके भीतर से आता है!

यह और बात है कि आपको बाहर से आने वाले परिवर्तनों के प्रति लचीला रवैया अपनाना चाहिए। इसमें बड़ी सक्रियता की ज़रूरत होती है लेकिन मुझे गलत मत समझिए, एक और परिस्थिति होती है जो इससे भी ज़्यादा कठिन लगती है: अपने भीतर हो रहे परिवर्तनों को स्वीकार करना और अपनी तरफ से ऐसे कदम उठाना, जो आपके जीवन में इन परिवर्तनों को क्रियान्वित कर सकें। आपके भावनात्मक और मानसिक परिवर्तनों को अमली जामा पहना सके। उन रास्तों पर चलने की हिम्मत पैदा कर सके, जिन पर दूसरे नहीं चलते। उन जगहों की यात्रा करने की इच्छा पैदा कर सके, जहाँ जाने के बारे में आपके आसपास के लोग सोच भी नहीं सकते और आपने भी तब तक नहीं सोचा था।

आप ऐसा क्यों नहीं करते? आप डरते हैं। किस बात से डरते हैं? इस बात से कि उस रास्ते को छोड़कर, जिस पर इतने सारे लोग चल रहे हैं, कहीं आप गलत काम तो नहीं कर रहे हैं? आपको शक है, आपमें विश्वास की कमी है।

जी हाँ, इसीलिए मेरा मानना है कि भारत में लोग आसानी के साथ परिवर्तनों को स्वीकार कर पाते हैं और ज़्यादा लचीले हैं: वे विश्वास करते हैं।

औसत पश्चिमी समाज यह सिखाने पर कोई ज़ोर नहीं देता कि विश्वास कैसे किया जाए! वह आपको दूसरी बहुत सी बातें सिखाता है लेकिन उसका सबसे मुख्य फोकस होता है, सुरक्षा। हर समय आपको मालूम होना चाहिए कि आप कहाँ जा रहे हैं, बाकायदा कोई योजना बनाकर ही कहीं निकालना चाहिए और एक बॅकअप प्लान भी होना चाहिए। और सबसे बड़ी बात, कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहिए।

जीवन एक सुनिश्चित कार्यक्रम की तरह है और स्पष्ट दिशा-निर्देशों (नियमों) द्वारा तय कर दिया गया है कि कौन सा कदम पहले और कौन सा बाद में रखा जाना है। यह स्पष्ट है कि इन पूर्वनिर्धारित राहों पर चलना सुरक्षित होता है। आपको इन नियमों पर विश्वास करना सिखाया जाता है और आगाह किया जाता है कि आपका एक भी कदम दाएँ या बाएँ न बहके। वास्तव में आपको भय होता है कि अगर आप नाक की सीध में नहीं चलेंगे तो यह सारा कार्यक्रम टूटकर बिखर जाएगा! थोड़ा सा भी पैर इधर-उधर हुआ नहीं कि आप बेचैन हो जाते हैं कि कहीं डूब न जाएँ, कि बियाबान में कहीं खो न जाएँ। नए रास्ते पर ज़रा सा चलते ही आपको थकान महसूस होती है, आपमें उत्साह नहीं रह जाता और आप तनावग्रस्त हो जाते हैं, चिंतित रहने लगते हैं!

मेरी बात मानें, आप कहीं नहीं गिरने वाले। मेरा विश्वास करें, यह विश्व टूटकर बिखरने वाला नहीं है कि उसका मलबा आपके आसपास बिखरा पड़ा हो और न ही आप दुनिया को तोड़ने वाले हैं। मेरी बात मानें, आपको कुछ नहीं होने वाला है। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि आपके अलग राह पर चल देने से इस दुनिया का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला। न तो आप दुनिया को कोई नुकसान पहुँचा सकते हैं और न ही आपके किसी काम से आसमान टूटकर गिरने वाला है।

आपको विश्वास करना सीखना पड़ेगा: मुझ पर नहीं बल्कि अपने आप पर। अपने निर्णयों पर पूरा विश्वास कीजिए, अपने जीवन पर भरोसा कीजिए! तभी आप सुखी और प्रसन्न रह सकेंगे!

बदलाव को स्वीकार करें और अपनी खुशी को महत्व दें – 24 मार्च 2015

आज मेरे मन में एक ऐसे विषय पर लिखने का विचार है जो बार-बार मेरे सामने उपस्थित होता रहता है। खुद परिवर्तन के और उसे स्वीकार करने की क्षमता और आवश्यकता के बारे में।

कभी-कभी मैं जीवन की तुलना मौसम से करना पसंद करता हूँ। तीन दिन पहले यहाँ वसंत का मौसम था और ठंडी हवाएँ बह रही थीं-गुलाबी ठंड से लेकर कड़ाके की ठंड वाली रातें। अब दिन गरम हो चुके हैं लेकिन गर्मी को उरुज पर आने में घंटों लगते हैं। लेकिन मौसम बड़ी तेज़ी के साथ बदला, जैसा कि यहाँ आम तौर पर होता है और अब गर्मी का मौसम सामने है। हम सबेरे उठते हैं और जैसे ही सूरज ऊपर आता है गर्मी का एहसास होने लगता है। दोपहर तक बाहर काफी गरम हो जाता है। शामें और रातें भी गरम ही बनी रहती हैं। सिर्फ गर्मी नहीं, आप हवा में ग्रीष्म ऋतु की गंध महसूस करते हैं!

जीवन में परिवर्तन बहुत तेज़ी के साथ आ सकते हैं, जैसे मौसमों में परिवर्तन आते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि आप उनके बारे में कुछ नहीं कर सकते! आपको उन्हें स्वीकारना ही पड़ता है। आप कुछ करना चाहते हैं और मौसम बदलकर बहुत गरम, बहुत ठंडा या बहुत नम हो सकता है लिहाजा अब आप वह मनचाहा काम नहीं कर पा रहे हैं-और आप मौसम में हुए इस परिवर्तन को रोक भी नहीं सकते! आप सिर्फ यह निर्णय कर सकते हैं कि इस परिवर्तन को अपनी प्रसन्नता छीन लेने की इजाज़त दे दें या न दें। मैंने अक्सर लोगों को खराब मौसम की शिकायत करते देखा है, उन्हें बहुत दुखी और उदास होते देखा है-और कभी-कभी ऐसा लगता है कि वास्तव में मौसम कभी भी मन मुआफिक नहीं हो सकता!

यही बात जीवन में आने वाली परिस्थितियों के साथ भी होती है! यह आपकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है कि बाहर से आने वाले परिवर्तनों से निपटने के लिए कौन सा विकल्प चुनते हैं। अगर आप उन पर दुखी होना चाहते हैं तो आप दुखी होने के लिए स्वतंत्र हैं। आप रो सकते हैं, उदास हो सकते हैं, मौसम को कोस सकते हैं लेकिन अक्सर होता यही है कि आप अपनी प्रसन्नता और आनंद खो बैठते हैं। और ईमानदारी की बात यह है कि मेरी प्रसन्नता मेरे लिए इतनी अधिक कीमती है कि मैं उसे परिवर्तन की बलिवेदी पर न्योछावर करना नहीं चाहूँगा।

भारत आने वाले पर्यटक बताते हैं कि यह देखकर वे हैरान रह जाते हैं कि यहाँ लोग इतने गरीब हैं फिर भी इतने खुश कैसे रह लेते हैं!

जी हाँ, खुशी पैसे की मोहताज नहीं है। पैसे से आप खुशी खरीद नहीं सकते और मैंने कई अमीर लोगों को देखा है, जो बेहद दुखी हैं जब कि कई बेहद गरीब भी देखे हैं, जो उनसे कई गुना खुश रहते हैं! और मेरा मानना है कि परिस्थितियों को स्वीकार करने की उनकी क्षमता ही भारतीयों की खुशी का मुख्य कारण है।

मैं सोचता हूँ कि भारतीय स्वभाव से ही ऐसे होते हैं कि उनके लिए परिवर्तन को स्वीकार करना आसान होता है और स्वीकार करने की इस प्रवृत्ति के चलते ही वे खुश रहते हैं। मेरा यह भी मानना है कि जीवन की राह में हम कोई अच्छी बात देखें तो उससे सीखने की कोशिश करनी चाहिए-और अगर हम गरीब भारतीयों से यह सीख सकें तो हमें अवश्य सीखना चाहिए!

तो मौसमों को आने दीजिए और वे जो भी लेकर आएँ, उसे स्वीकार करते हुए खुश रहिए!

पूरी तरह धर्म रहित अनुभव के लिए हमारे आश्रम में आपका स्वागत है – 10 फरवरी 2015

जैसा कि मैंने पहले ज़िक्र किया था, एक व्यक्ति ने मेरे बारे में शंका ज़ाहिर की थी कि मैं सदा से नास्तिक होते हुए भी एक धार्मिक प्रवचनकार का ढोंग किया करता था और बाद में जब मुझे लगा कि अब अधार्मिक या नास्तिक हो जाना लाभ पहुँचा सकता है तो मैंने अपना ‘वास्तविक चरित्र’ उजागर कर दिया और अधार्मिक और नास्तिक हो गया। मैंने यह भी स्पष्ट किया था कि कैसे यह मूर्खतापूर्ण होता क्योंकि धार्मिक और आस्तिक बने रहना आर्थिक रूप से मेरे लिए अधिक लाभप्रद था। मैं एक बार फिर कहना चाहता हूँ कि वृन्दावन जैसे तीर्थ स्थान में, जहाँ हर साल हजारों धार्मिक तीर्थ यात्री आते हैं, एक धार्मिक आश्रम ही आर्थिक रूप से ज़्यादा लाभप्रद हो सकता था। क्या आप ऐसा नहीं मानते?

इसमें कोई शक नहीं कि जब मैं धर्म से दूर हुआ तो मैंने अपने अच्छे-खासे, जमे-जमाए व्यवसाय का त्याग किया था, जो लोगों को बड़ी संख्या में आश्रम की ओर खींच सकने में समर्थ होता। बड़ी संख्या में मेरे अनुयायी थे, जो नियमित रूप से आश्रम आते और ऐसी पृष्ठभूमि वाला प्रतिष्ठित आश्रम होने के नाते तीर्थयात्रियों और दूसरे श्रद्धालुओं के लिए वह एक आदर्श स्थान बन जाता। जैसा कि वृन्दावन के कई दूसरे आश्रमों के साथ हुआ है, निश्चय ही हमारे आश्रम का भी विकास होता और नियमित समारोहों, धार्मिक कार्यक्रमों आदि के कारण वह व्यावसायिक रूप से अच्छी सफलता प्राप्त करता।

लेकिन खुद में हुए परिवर्तन के साथ मैंने ईमानदार बने रहने का फैसला किया। हम हमेशा घोषित रूप से कहते रहे कि सांप्रदायिक लोगों से हमारी पटरी नहीं बैठ सकती। धर्म और ईश्वर से विमुख होने की घोषणा भी मैंने सार्वजनिक रूप से की थी और इसलिए सभी लोगों को वैसे भी पता था कि हमारा आश्रम दूसरों से अलग है। लेकिन शायद आपको आश्चर्य होगा कि वास्तव में यह अच्छा ही साबित हुआ।

अब लोग यहाँ आकर रहते हैं और धर्मरहित अनुभव का आनंद लेते हैं। उन्हें यहाँ भारतीय संस्कृति में घुलने-मिलने का अवसर मिलता है लेकिन क्योंकि हम कोई धार्मिक संस्कार या कर्मकांड आयोजित नहीं करते इसलिए किसी प्रकार के अवांछित कामों को अंजाम देने की उन्हें ज़रूरत नहीं होती।

हमारे आश्रम में पूजा-पाठ, प्रार्थना या कोई और संस्कार (कर्मकांड) करने के लिए आपको 4 बजे सुबह उठने की ज़रूरत नहीं है। पाबंदी के साथ मौन व्रत रखने का न तो कोई नियम है और न उसका कोई नियत समय। मासिक-धर्म के दौरान इस तथ्य को उजागर करने के लिए कोई विशेष चिन्ह पहनना महिलाओं के लिए आवश्यक नहीं है जिससे भोजन के वक़्त उन्हें अलग बिठाया जा सके। किसी भी तरह के विशेष वस्त्र पहनने का यहाँ कोई नियम नहीं है। हमारे यहाँ कोई गुरु नहीं है कि उसके दैनिक प्रवचन सुनना या उसके चित्र की पूजा-अर्चना करना आपके लिए ज़रूरी हो। फलस्वरूप हमारे यहाँ आने वाला कोई मेहमान भी किसी खास आस्था का प्रचार नहीं करता और न ही अपना मतावलंबी बनाने की कोशिश करता है।

यहाँ आप जैसा चाहें, जिस तरह चाहें, अपनी मर्ज़ी के अनुसार, अपने में मगन रहने के लिए स्वतंत्र हैं। लोग आश्रम आ सकते हैं, शहर घूमने जा सकते हैं, मंदिर देखने जा सकते हैं, गीत-भजन आदि सुन सकते हैं, आसपास होने वाले समारोह या जो मर्ज़ी हो, धूम-फिर के देख सकते हैं-और वापस लौटकर आश्रम में आराम कर सकते हैं, दिन भर में जो कुछ देखा, उसका लेखा-जोखा ले सकते हैं, उस पर चिंतन-मनन कर सकते हैं।

एक ऐसी स्वतंत्र जगह जो आपको किसी ऐसी जगह की याद नहीं दिलाएगी, जहाँ अपने मत आरोपित किए जाते हों। हमारे पास सिर्फ दो चीज़ें हैं: एक संक्रामक रूप से सकारात्मक नज़रिया और जीवन के प्रति प्यार!

और हाँ, पहले कभी इस बात का खयाल नहीं आया था कि लोग इन्हीं बातों को पसंद करते हैं और यही बातें हैं, जिसके चलते वे हमारे पास आना भी पसंद करते हैं। और शायद इसीलिए ईर्ष्यालु लोग हमारे बारे में अजीबोगरीब बातें कहते रहते हैं। जहाँ तक मेरा सवाल है, यह एक और दृष्टांत की तरह मेरे सामने उपस्थित है कि जीवन में कभी भी आपको परिवर्तन से नहीं घबराना चाहिए! ईमानदारी के साथ, प्रयास करते हुए जीवन गुजारें और उद्यम से कभी न कतराएँ!

क्या मैं पैसे कमाने के लिए नास्तिक हो गया – 8 फरवरी 2015

आज रविवार है और मैं आपको एक बार फिर अपने जीवन के विषय में कुछ बताना चाहता हूँ, कुछ ज़्यादा ही व्यक्तिगत और कुछ ऐसा, जिसने आज मुझे अपनी मित्रताओं पर और अपने बीते हुए जीवन पर एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया।

मेरा स्कूल के ज़माने का एक मित्र था। दरअसल वह मुझसे कुछ साल बड़ा था और मुझसे आगे की किसी कक्षा में पढ़ता था लेकिन मैं और मेरा एक और बहुत अच्छा मित्र और वह मित्र बन गए। वह यूरोप चला गया और वहीं स्थायी रूप से बस गया। जब मैं यूरोप गया तो उससे मिलने उसके घर गया था।

हम लोग मित्र तो थे मगर उतने घनिष्ट मित्र नहीं थे। क्योंकि दोनों की ज़्यादातर रुचियाँ एक जैसी नहीं थीं, धीरे-धीरे एक-दूसरे के साथ हमारा संपर्क टूटता गया। बीच-बीच में हमारे बीच संपर्क हो जाता था लेकिन मुझे लगा कि जब मुझे धर्म से विरक्ति होने लगी, तभी से हमारे संबंधों की ऊष्मा भी समाप्त हो गई। बाद में जब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि मेरे विचार उसके विचारों से बिलकुल मेल नहीं खाते और जब मेरा ईश्वर पर विश्वास भी पूरी तरह समाप्त हो गया, हमने जो थोड़ा-बहुत संपर्क था भी, उसे भी पूरी तरह तोड़ लिया।

लेकिन मेरा वह दूसरा घनिष्ठ मित्र उसका मित्र बना रहा और जब वह उससे मिलने के बाद वृन्दावन आता तो उससे उस भूतपूर्व मित्र की खैर-खबर मिल जाती थी।

काफी समय बाद, इसी तरह मैंने सुना कि वह भी मेरे बारे में पूछता रहता है। मुझे यह भी पता चला कि इस व्यक्ति ने, जो पहले मेरा मित्र रह चुका था, मेरे इस मित्र से कहा कि उसके अनुसार मैं हमेशा हर काम व्यापार के नज़रिए से ही करता रहा हूँ। उसकी नज़र में एक धर्मोपदेशक के रूप में मेरा काम, मेरा लंबा गुफा-निवास, सब कुछ सिर्फ पैसा कमाने के उद्देश्य से किए जाने वाले उपक्रम थे। उसने कहा कि वह पहले से जानता था कि मैं धार्मिक नहीं हूँ, कि मैं सदा से एक नास्तिक था और यह भी कि मैंने अपने नास्तिक होने की घोषणा उपयुक्त समय देखकर, बाद में इसलिए की कि मैंने सोचा ऐसा करने से और भी ज़्यादा पैसा कमाया जा सकता है।

उसकी बात पर मुझे विश्वास नहीं हुआ और फिर मैं हँसे बिना नहीं रह सका! एक ऐसे व्यक्ति के मुँह से यह सुनना, जो मुझे अच्छी तरह जानता है! गुफा-गमन तक और उससे पहले मैं बहुत अधिक धार्मिक, आस्थावान और ईश्वर के लिए समर्पित व्यक्ति था! मैं ईमानदारी के साथ इन सब बातों पर विश्वास करता था और इसीलिए गुफा में मंत्रोच्चार करते हुए मैं तीन साल तक एकांतवास कर सका। अगर सिर्फ पैसे के लिए यह कर रहा होता तो कुछ महीनों में ही पागल हो गया होता! सिर्फ अंधश्रद्धा ही आपसे इस तरह के सनकी कार्य करवा सकती है!

और मुझे नास्तिक होकर क्या मिला? ईमानदारी की बात यह है कि आर्थिक दृष्टिकोण से मेरे लिए धर्म का परित्याग करने और ईश्वर पर विश्वास न करने से अधिक मूर्खतापूर्ण कार्य कोई हो ही नहीं सकता था क्योंकि इन्हें छोड़ने का अर्थ था, अपने अच्छे-खासे जमे-जमाए व्यवसाय से और असंख्य भक्तों से हाथ धोना! अगर मैं हर वक़्त पैसे के बारे में ही सोचता रहता हूँ तो अब धर्म और ईश्वर से कोई लेना-देना न होने के बावजूद मैं आज भी गुरु ही बना रह सकता था, जो मैं पहले से था ही।

मुझे लगता है कि इससे यह पता चलता है कि मेरा दोस्त धर्म के बारे में क्या विचार रखता है: कि सिर्फ व्यापार-व्यवसाय की खातिर ही लोग धर्म को अपनाते हैं और उसमें इतनी सक्रियता से हिस्सा लेते हैं और नाटक और ढोंग करके लोगों को मूर्ख बनाते हैं। शायद इससे धर्म के प्रति उसका रवैया भी उजागर हो जाता है-या क्या वह यह कहना चाहता है कि हर कोई इसे गलत तरीके से कर रहा है और वही सिर्फ ठीक तरीके से कर रहा है?

इस धार्मिक अहंमन्यता के बारे में कल मैं और विस्तार से लिखूँगा। आज के लिए इतना कहना ही काफी है कि न तो मेरे धार्मिक होने का पैसा कमाने से कोई संबंध था और न ही मेरे नास्तिक होने का उससे कोई संबंध है!