सोनू क्यों हमारी साईट पर काम नहीं कर सकता – 16 अगस्त 2015

जैसा कि आप जानते हैं, हमारे आयुर्वेदिक रेस्तराँ के इंटीरियर डेकोरेशन का काम जारी है और दीवारों के बहुत बड़े हिस्से में और छत आदि पर हम बाँस का काम करवा रहे हैं। न सिर्फ उसे प्राकृतिक दिखाई देना चाहिए बल्कि उसमें प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल भी होना चाहिए। और निश्चित ही, हम हर परिस्थिति में अपने नैतिक मूल्यों का पालन करते हैं और जब भी उन पर अमल का मौका आता है, पीछे नहीं हटते!

जो ठेकेदार मजदूरों को लेकर आता है, वह परसों एक नई टीम लेकर आया, जिसमें एक बहुत छोटा लड़का भी था। जब मैंने उसे देखा तो मैंने समझा किसी मजदूर का लड़का या कोई रिश्तेदार होगा-क्योंकि मजदूर अक्सर अपने बच्चों को भी निर्माण-स्थलों पर साथ लिए आते हैं-उनके साथ रहा आएगा, सोचकर ले आए होंगे।

ऐसे ही काम की प्रगति देखने जब मैं एक बार आया तो उस लड़के से उसका नाम पूछा। उसका नाम सोनू था। मैंने फिर पूछा कि किस कक्षा में पढ़ते हो तो उसने कहा, ‘स्कूल नहीं जाता, काम करता हूँ।’ मेरा माथा ठनका और मैंने फिर पूछा, ‘क्या काम करते हो?’

प्रतिक्रिया में वह मेरी तरफ अचरज से देखने लगा। मेरे प्रश्न पर वह चकरा सा गया लेकिन जब उसने बताया कि ‘मैं बाँस का काम करता हूँ और यहाँ काम करने आया हूँ!’ तो चकराने की बारी मेरी थी। वास्तव में मैं बुरी तरह चौंक उठा। ‘कितने समय से यह काम कर रहे हो?’ मैंने पूछा।

जब मुझे पता चला कि वह पिछले दो साल से काम करके पैसे कमा रहा है तो अचम्भे से मेरी आँखें फ़टी की फ़टी रह गईं! वह ज़्यादा से ज़्यादा बारह साल का नज़र आता था! फिर उसने बताया कि वह मूलतः दिल्ली के उस पार का रहने वाला है और उसका घर देश की राजधानी से 80 किलोमीटर दूर है। लेकिन अब उसका परिवार दिल्ली में रहने लगा है और जब वह बाहर नहीं गया होता तब वह भी दिल्ली में अपने माता-पिता के साथ रहता है। जब काम पर होता है तो 300 रुपए प्रतिदिन कमाता है।

हमारी बातचीत के बाद मैंने ठेकेदार को फोन किया और साफ़ शब्दों में कहा कि यह बालक हमारी साइट पर काम नहीं कर सकता। यही बात मैंने दूसरे मजदूरों से भी कही कि बाल-मजदूरी अपराध है और हम अपने यहाँ इसकी अनुमति नहीं दे सकते। उसे स्कूल जाना चाहिए न कि मजदूरी करने।

सोनू जीवन में कभी स्कूल नहीं गया। उसके माता-पिता खुद भी मजदूर हैं और उसे भी मजदूरी करने भेजते हैं, जिससे वह भी घर की आमदनी में अपना योगदान दे सके। उनके लिए यह थोड़ी सी रकम उसकी पढ़ाई से अधिक मूल्यवान है। और भारत में यह स्थिति बहुत आम है और हमारे स्कूल के बहुत से बच्चे भी ऐसे ही परिवारों से आते हैं।

मैंने एक प्रस्ताव रखा: मैं इस बच्चे को अपनी साइट पर काम करने की इजाज़त नहीं दूँगा मगर यदि वह चाहे तो यहीं रहकर स्कूल जा सकता है। मजदूरों के मुखिया ने मुझसे कहा कि वह अच्छी तरह जानता है कि उसके माता-पिता इसके लिए कतई तैयार नहीं होंगे। वे चाहेंगे कि वह कमाई करता रहे-या फिर उनके पास वापस जाकर कोई और काम-धंधा ढूँढ़े। फिर भी उसने फोन पर बात की और, जैसा उसने घोषणा की थी, ठीक वही जवाब मिला: अगर वह काम नहीं कर पा रहा है तो उसे वापस घर आ जाना चाहिए।

तो इस तरह उस लड़के ने एक दिन यहाँ बिताया, रात को सोया और दूसरे दिन मेरे दिए 300 रुपए जेब में रखकर वापस लौट गया। मैंने उससे एक बात का वादा अवश्य ले लिया है: गुटखा न खाने का वादा, जिसकी लत से इस इलाके में बहुत से लोग पीड़ित हैं। उसके दाँत तम्बाकू मिश्रित गुटखे से पीले पड़ चुके हैं। मैंने उसे तम्बाकू खाने से होने वाले नुकसान के बारे में बताया, यह भी कि इसे खाने से कैंसर भी हो सकता है। जो भी उसके हाथ में उस वक़्त रखा था, उसे उसने तुरंत फेंक दिया। भविष्य में वह क्या करेगा, पता नहीं। अपना वचन निभाएगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता।

इसी तरह मैंने उससे कहा कि उसे स्कूल अवश्य जाना चाहिए और यदि उसे कभी भी, किसी भी तरह की मदद की ज़रूरत पड़े, वह हमसे संपर्क कर सकता है। ज़्यादा संभावना यही है कि वह इसी तरह काम करके पैसे कमाता रहेगा- लेकिन, निश्चित ही, हमारी साइट पर नहीं!

बाल विवाह, बाल मजदूरी और शराबखोरी की समस्या – हमारे स्कूल के बच्चे – 24 जनवरी 2014

आज मैं राजेन्द्र नाम के एक लड़के के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिसे मैं पहले ही आपसे मिलवा चुका हूँ। पहले हम उसके परिवार के बारे में सकारात्मक विचार रखते थे मगर दुर्भाग्य से अब हम ऐसा नहीं सोच सकते और सिर्फ आशा ही कर सकते हैं कि हमें भविष्य में कुछ वर्ष राजेन्द्र को शिक्षित करने का अवसर मिल सकेगा।

जब सन 2010 में मैंने उसके परिवार के विषय में लिखा था तब उनका परिवार कुछ माह पहले ही वृन्दावन आया था और राजेन्द्र का पिता काम की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। न सिर्फ अपने लिए बल्कि अपने ससुर, साली, अपनी बेटी और दो बच्चों के लिए। उन्होंने बच्चों की माँ के देहांत की दिल दहला देने वाली कहानी सुनाई कि कैसे वह किडनी की बीमारी का इलाज न हो पाने के कारण चल बसी, कैसे उसके पिता के भाई ने ख़ुदकुशी कर ली थी और कैसे उन्हें अब किसी न किसी रोजगार की बेतरह आवश्यकता है।

हमने परिवार के तीन वयस्क सदस्यों को काम पर रख लिया और बच्चों को अपने स्कूल में भर्ती कर लिया और कोशिश की कि उनके परिवार की दुखद परिस्थिति में कुछ सकारात्मक परिवर्तन ला सकें। जबकि बच्चों का दादा और चाची बहुत जल्दी आश्रम छोड़ कर गाँव वापस चले गए, उसके पिता, जो रिक्शा चलाने लगा था, स्कूल के बच्चों को रोज़ घर से लेकर और वापस घर छोड़कर आता था। बहुत जल्दी पता चल गया कि जो नियमित भुगतान हम उसे करते थे वह उसके लिए पर्याप्त नहीं था। उसने ज़्यादा वेतन की मांग की और अक्सर हमसे अतिरिक्त रुपये मांगने आया करता था और बहुत जल्द हमें पता चल गया कि रुपयों की उसकी मांग पूरी करना हमारे लिए काफी महंगा पड़ेगा। फिर हमें शक भी हुआ कि वह अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा शराब में उड़ा देता है। फिर भी हम उसके बच्चों की मुफ्त शिक्षा में कोई व्यवधान आने नहीं देना चाहते थे।

फिर एक दिन अचानक उसकी लड़की, राजबाई ने स्कूल आना बंद कर दिया। हम उसके घर गए और पूछा कि वह स्कूल क्यों नहीं आ रही है और हमें पता चला कि वह अपने गाँव, अपनी चाची से मिलने गई है और एक-दो माह वापस नहीं आएगी। हमने समझाया कि एक-दो माह स्कूल में अनुपस्थित रहना उसकी पढ़ाई के लिए कितना बुरा हो सकता है। उसने कहा कि जितना जल्दी हो सकेगा वह उसे स्कूल भेज देगा। मगर ऐसा नहीं हुआ और बाद में पता चला कि वह वृन्दावन वापस तो आई है मगर किसी घर में नौकरानी का काम कर रही है। फिर एक साल बाद हमने सुना कि उसका विवाह हो गया है। वह 2010 में तेरह साल की थी यानी अपने विवाह के समय वह सिर्फ पंद्रह साल की थी।

जब इस विषय में आप उसके पिता से बात करते हैं तो वह इस बात पर अड़ जाता है कि वह अठारह साल की है और कुछ माह पहले ही उसका विवाह हुआ है। यहाँ तक कि वह हमें समझाने की कोशिश करता है कि उसके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था क्योंकि उसके पास इतना रुपया नहीं होता था कि उसका भरण-पोषण कर सके। जब आप उसके छोटे भाई, राजेन्द्र से पूछते हैं तो वह भी वही रटा-रटाया जवाब दे देता है: ‘विवाह के समय वह अठारह साल की थी!’ उसका जन्म-प्रमाण-पत्र बनवाया ही नहीं गया कि इस झूठ का प्रतिवाद किया जा सके।

पिछले साल जब स्कूल के नए सत्र की शुरुआत हुई, उसके बड़े भाई, नरेंद्र ने भी स्कूल आना बंद कर दिया। तब वह चौदह साल का होगा और उसने एक चाय की दुकान में नौकरी कर ली और चाय बेचने लगा था। हमें बताया गया कि अब पढ़ाई में उसकी कोई रुचि नहीं रह गई है और जब लड़के से पूछते तो उसके मुंह से शब्द नहीं निकलते थे। परिवार में हम किसी को भी शिक्षा का महत्व समझाने में असमर्थ रहे और उन्हें शिक्षित करने के हमारे सारे प्रयास असफल होते चले गए।

इन सर्दियों की छुट्टियों में जब हम उनके घर पहुंचे तो उनके घर की हालत हमें बहुत शोचनीय प्रतीत हुई। राजेन्द्र भागता हुआ अपने पिता को जगाने चला गया-उस वक़्त सबेरे के ग्यारह बज रहे थे। उसका पिता अस्त-व्यस्त सा बाहर आया तो उसके चेहरे पर नशे की खुमारी थी और मुंह से शराब की गंध आ रही थी। वह घर पर सो रहा था और उसका बड़ा बेटा रुपया कमाने काम पर गया हुआ था और छोटा बाहर खेल-कूद में मगन था। राजेन्द्र ने उससे कहा कि जैकेट पहन लो, बेचारा कोशिश कर रहा था कि उसका पिता आगंतुक के सामने ठीक-ठाक लगे, उसे लेकर हमारे मन में कोई बुरी धारणा न पैदा हो।

अपने पिता को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने की उसकी असफल चेष्टा देखकर हमारा दिल रो उठा। हमने उसके पिता से बातचीत की और हमें पता चला कि रिक्शा चलाकर उसे बहुत कम आमदनी हो पाती है। अपनी कामचोरी के लिए वह मौसम और पता नहीं क्या-क्या बहाने बनाता रहा। घर का किराया, 20 डालर, यानी लगभग 1200 रुपए बेटे के 40 डालर यानी लगभग 2400 रुपए के वेतन से अदा किया जाता है। स्पष्ट ही वह स्वयं अपनी आमदनी बढ़ाने का कोई प्रयास करने की आवश्यकता महसूस नहीं कर रहा है-उसकी शराब का खर्च निकल आए तो उसके लिए वही पर्याप्त है क्योंकि घर के दीगर खर्चों के लिए अब उसका बड़ा लड़का काफी कमा रहा है।

हम पिता से एक बार फिर यह अनुनय-विनय करने के बाद निकल आए कि बच्चों के भविष्य की उसे चिंता करनी चाहिए। हमने उसे अच्छी शिक्षा के लाभों के बारे में समझाते हुए आग्रह किया कि अपने सबसे छोटे बच्चे की पढ़ाई छुड़ाने के बारे में वह सोचे भी नहीं।

यह दुखद है मगर इन्हीं परिस्थितियों के विरुद्ध हम लगातार अपना काम जारी रखे हुए हैं: अभिभावकों का अपने बच्चों को स्कूल से निकालकर काम पर लगा देना, बाल विवाह, बाल मजदूरी, छोटी-मोटी आमदनी को सुनहरे भविष्य पर तरजीह दिया जाना। कुछ भी हो जाए, हम अपना प्रयास जारी रखेंगे और राजबाई और नरेंद्र जैसे बच्चों की नियति से निराश न होते हुए राजेन्द्र जैसे बच्चों की तरक्की पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे और यही हमारी सफलता होगी।

वह एक छोटा बच्चा है और पढ़ने में तेज़ है। वह खुशमिजाज़ और विनीत है। बच्चों का दोष कभी नहीं होता और इसलिए हम उसके बेहतर भविष्य के लिए कुछ भी करने के लिए कटिबद्ध हैं।

अगर आप हमारे इस प्रयास में सहभागी बनाना चाहते हैं तो आप किसी एक बच्चे को प्रायोजित कर सकते हैं या बच्चों के एक दिन के भोजन का प्रबंध कर सकते हैं। शुक्रिया!

तीन बार भोजन – क्या यह बच्चों के लिए विलासिता है? – 11 जून 2013

मैंने कल यूनिसेफ द्वारा अमीर मुल्कों, खासकर यूरोपीय देशों में मौजूद गरीब बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के बारे में चर्चा की थी। अध्ययन में 14 प्रकार के अभावों की एक तालिका दी गई है जिनमें से किन्हीं दो या अधिक की अनुपलब्धता उस बच्चे को गरीब मानने का पर्याप्त कारण हो सकती है। इस सूची को पढ़ते हुए मैं अपने देश, भारत के बच्चों के बारे में सोचे बगैर नहीं रह सका; आश्रम में रह रहे बच्चों के बारे में और उससे ज़्यादा उन बच्चों के बारे में जो आश्रम के स्कूल में पढ़ने आते हैं मगर अपने गरीब परिवार के साथ वहीं आसपास रहते हैं। स्पष्ट ही यूनिसेफ ने यह सूची विकसित देशों के गरीबों को ध्यान में रखकर बनाई है लेकिन उनकी आवश्यकताओं से युक्त इस सूची की तुलना भारत के गरीबों के लिए बनाई गई काल्पनिक सूची से करते हुए यह देखना कि उस सूची में कौन से बिन्दु होंगे और कौन से नहीं होंगे, बहुत रोचक हो सकता है। मैंने सोचा कि क्रमवार एक-एक बिन्दु को ध्यान में रखते हुए अपने विचार आज और कल की डायरियों में दर्ज करूँ।

1. तीन बार भोजन

2. कम से कम रोज़ एक वक्त मांस या मछली युक्त भोजन (या समतुल्य निरामिष आहार)

3. रोज़ ताज़ी सब्जियाँ और फल

अगर हम इन पहले तीन बिन्दुओं पर दृष्टिपात करें तो मैं कह सकता हूँ बहुत से भारतीय परिवार पहले बिन्दु पर ही संघर्ष करते नज़र आएंगे। दूसरे बिन्दु को पाना उनके लिए टेढ़ी खीर या लगभग असंभव होगा और तीसरे बिन्दु को तो भारत के संदर्भ में पूरी तरह छोड़ देना ही उपयुक्त है। भारत में ताज़े फल और सब्जियाँ बहुत महंगे होते हैं। आलू सबसे सस्ता होता हैं और अक्सर भोजन में पाया जाता है। भोजन की दूसरी वस्तुएँ कभी-कभार, विशेष आयोजनों पर थाली में दिखाई देती हैं। मौसमी सब्जियाँ और फल, जो सस्ते मिल जाते हैं सिर्फ अपने मौसमों में भोजन का हिस्सा बनते हैं।

फिर भी हर परिवार अपने बच्चों से प्रेम करता है और भरसक कोशिश करता है कि अपने बच्चों को अच्छे से अच्छा खाना खिलाए। हमारे स्कूल में जो बच्चे पढ़ने आते हैं उनके माता पिता भी इस आशा में ही अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि कम से कम यहाँ उन्हें भरपेट अच्छा भोजन प्राप्त होगा, जोकि स्कूल में उन्हें प्राप्त होता ही है। ऐसा होने पर उनकी कम से कम एक समस्या का समाधान हो जाता है। कम से कम उनके बच्चों का पेट भरा हुआ होता है!

4. उम्र के मुताबिक उपयुक्त पुस्तकें और जानकारियाँ (पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त)

गरीब भारतीय अभिभावकों की शिक्षा का स्तर यूरोप के अभिभावकों के मुक़ाबले बहुत नीचा होता है। शायद ही यूरोप में कोई अशिक्षित व्यक्ति होगा जब कि, उदाहरण के लिए, हमारे प्रदेश में हर दूसरा व्यक्ति अनपढ़ है। ऐसे लोग अपने बच्चों के लिए स्कूली किताबों के अलावा दूसरी किताबें क्यों खरीदेंगे? बच्चों को पढ़कर कौन सुनाएगा? वे स्कूली किताबें खरीद पाए यही उनके लिए पर्याप्त संतोष की बात होती है, और इतना भी कर पाना अधिकांश परिवारों के लिए काफी मुश्किल होता है। इसीलिए हमारे स्कूल में स्कूली किताबें मुफ्त मुहैया कराई जाती हैं, और कुछ कहानियों की किताबें भी होती हैं जिससे बच्चे कम से कम यहाँ पढ़ने में आनंद का अनुभव कर सकें।

5. खेलने के मैदान और उपकरण जैसे साइकिल, रोलर स्केट्स आदि

यह बिन्दु ‘विश्रांति’ के बारे है। हर व्यक्ति को विश्रांति की आवश्यकता होती है, अपने मन के मुताबिक खेलने की या थोड़ा-बहुत मौज-मस्ती करने की; लेकिन इसके उपकरण भारत में मूल आवश्यकता की सूची में नहीं आ सकते। इस देश में जहां भूख और बाल-मजदूरी के खिलाफ लड़ाई अभी जारी है आपके रोलर स्केट्स और साइकिलें भारत के संदर्भ में गरीबी का पैमाना नहीं बन सकते।

एक अप्रासंगिक बात और! मैं अभी उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब भारत की सड़कों पर पहला व्यक्ति रोलर स्केटिंग करेगा। गुड लक!