चिंता, अवसाद और निष्क्रियता के लिए एक नास्तिक और भूतपूर्व गुरु के द्वारा बताई ध्यान की इस विधि का प्रयोग करें – 15 अक्टूबर 2015

आजकल बहुत से लोगों के साथ अवसाद, थकान और निष्क्रियता तथा चिंताग्रस्त होने की समस्या जुड़ी होती है। दैनिक जीवन में पेश आने वाले तनावों और श्रम के चलते वे शिथिल और थके हुए लगते हैं। मैं ऐसे बहुत से लोगों से मिल चुका हूँ, कई लोगों के साथ समय गुज़ारा है और अपने सलाह-सत्रों में बातचीत की है। मैंने उनके साथ ध्यान किया है और आज मैं उन लोगों के लिए, जो ऐसी परिस्थितियों से दो-चार होते रहते हैं, एक संक्षिप्त सलाह-सूची प्रस्तुत करना चाहता हूँ। सम्भव है, आपको आज का मेरा ब्लॉग थोड़ा सा अजीब लगे और आम तौर पर यहाँ मैं जैसा लिखता हूँ, उसके विपरीत नज़र आए। मैं खुद यह जानता हूँ कि कुछ ही समय पहले मैंने लिखा था कि ध्यान और योग के लिए किसी सहायता की ज़रूरत नहीं है-लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि इससे बहुत से लोगों को काफी लाभ प्राप्त हुआ है! और यह पाठकों को भी लाभ पहुँचाएगा!

अगर आपको लग रहा है कि आसमान फट पड़ा है और अब कुछ नहीं हो सकता तो ये चंद पंक्तियाँ आपके ही लिए हैं: अगर आपको लग रहा है कि आप अकेले हैं, अगर आपको लग रहा है कि जीवन में अब कुछ भी अच्छा नहीं होगा।

सर्वप्रथम तसल्ली रखें। सबसे पहले शरीर को विश्रांति प्रदान करें-उसके पीछे-पीछे मस्तिष्क भी शांत हो जाएगा। अच्छी, आरामदेह कुर्सी पर बैठें या दीवार से पीठ लगाकर ज़मीन पर आराम से बैठ जाएँ और गहरी साँस लें। अगर आपको ठीक लगता हो तो आँखें बंद करें अन्यथा अपने आसपास की किसी छोटी वस्तु पर मन को एकाग्र करें-कोई बटन, फूल या पर्दे पर बनी कोई आकृति आदि पर। अपनी साँस पर मन को एकाग्र करते हुए गिनती गिनें-साँस भीतर लेते हुए तीन और बाहर छोड़ते हुए पाँच तक गिनें। दिल की धड़कन को धीमा होने दें।

अब हम एक के बाद दूसरी मांसपेशी को विश्रांति देंगे, मतलब कि अपना ध्यान वहां ले जाकर उसे तनाव रहित करके उसे शिथिल करेंगे। शुरुआत पैर की उँगलियों से करें। उन मज्जा-तंत्रिकाओं के विषय में सोचें, जो पैर के पंजों के अंतिम सिरे तक पहुँचती हैं। उसके बाद धीरे-धीरे, पूरा समय लेते हुए क्रमशः पैर के पंजे, टखने, फिर पैरों के ऊपरी हिस्से तक आइए। पूरी तरह चैतन्य रहते हुए हर अवयव को महसूस कीजिए। जब भी किसी विशेष स्थिति में आप दर्द महसूस करें तो उसे याद रखिए लेकिन विचारों को आगे बढ़ने दीजिए, वहीं स्थिर मत होइए। ऊपर बढ़ते हुए कूल्हों तक आइए, उसके बाद पेट और पीठ से होते हुए कंधों तक पहुँचिए। यहाँ आकर अपनी मांसपेशियों को आराम देने की प्रक्रिया शुरू कीजिए-पूरी गरदन से होते हुए बाँहों पर आइए और आगे बढ़ते हुए उँगलियों तक जाने दीजिए। यहाँ हर ऊँगली पर हल्के से रुककर सोचिए और महसूस कीजिए कि कैसे तनाव आपका शरीर छोड़कर बाहर निकल रहा है।

एक बार यहाँ पहुँचने के बाद समझिए कि आप काफी दूर आ गए हैं और तब आप नोटिस भी करेंगे कि आप अब काफी शांत और तनावमुक्त महसूस कर रहे हैं। अब मन में पूरी चैतन्यता में सोचते हुए इन बातों को समझने का प्रयास कीजिए:

कुछ भी हो जाए, जीवन इसी तरह चलता रहेगा। मैं साँस ले रहा हूँ, मैं ज़िंदा हूँ।

आप अकेले नहीं हैं। भले ही आपके बहुत से साथियों-रिश्तेदारों ने आपका साथ छोड़ दिया हो, दुनिया में बहुत से ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो आपकी मदद कर सकते हैं। और ऐसे लोग भी हैं, जो आपकी परवाह करते हैं!

आपमें शक्ति है। आप यहाँ तक पहुँच गए हैं तो और भी आगे बढ़ेंगे।

अंधियारे में आपको अपने चारों तरफ रोशनी नज़र आ रही है। जब आप खुद को शक्तिशाली महसूस करने लगें तो उठ खड़े हों और उसे पाने की कोशिश करें। क्या अब भी आप अकेलापन महसूस कर रहे हैं? किसी को बुलाइए, जो आपकी मदद कर सके-कोई दोस्त, कोई रिश्तेदार, कोई चिकित्सक या कोई हॉटलाइन भी! अगर किसी की मदद की ज़रूरत महसूस करें तो उसे प्राप्त करने में संकोच न करें!

सबसे मुख्य बात यह कि कभी पीछे मुड़कर न देखें और अपने आपको अपराधी न समझे और न खुद पर शर्म करें। जीवन में ऐसे क्षण या ऐसी कालावधि का आना कोई अनहोनी बात नहीं है। हम उनके साथ विकास करते रह सकते हैं। हम पहले से और अधिक मज़बूत होकर निकलेंगे!

अपने अत्यल्प साधनों से भी योगदान करें क्योंकि छोटी चीज़ का भी असर होता है – 6 अक्टूबर 2015

कल मैंने आपको हमारी एक मेहमान के बारे में बताया था जो इस कारण खुद को अपराधी महसूस कर रही थी कि अपने खाली समय में वह स्वैच्छिक रूप से सेवा करने की जगह समुद्री बीच पर जाकर विश्रांति प्राप्त करना चाहती थी। ऐसे नरमदिल, संवेदनशील लोगों की, जो वास्तव में दूसरों की मदद करना चाहते हैं, अक्सर एक दूसरी समस्या होती है: उन्हें इस संसार की बुरी हालत देखकर बड़ा दुःख होता है।

जो थोड़ा भी संवेदनशील होगा वह इस एहसास को एक हद तक समझ सकता है: कोई भी अखबार उठाकर देखें, हर तरफ मारा-मारी की खबरें-दुनिया भर में मानव जाति एक-दूसरे का गला काटने पर आमादा, इस धरती को नष्ट करने को आतुर, दूसरे सभी प्राणियों के कष्टों का अंत नहीं! टीवी और रेडियो की खबरें देखकर ऐसा लगता है, जैसे प्रलय बस आने ही वाला है!

सीरिया और मध्य-पूर्व के युद्धों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि लोग भूखों मर रहे हैं, उनके साथ हर तरह की ज्यादती हो रही है, उनकी सरे आम हत्याएँ की जा रही हैं, लोग अपने देशों से भागने को मजबूर हैं, शरणार्थियों की समस्या भीषण रूप ले चुकी है और उसके कारण दक्षिणपंथी ताक़तें मजबूत हो रही हैं। दुनिया भर में सभी धर्म एक-दूसरे के खिलाफ युद्धरत हैं, मंदिरों-मस्जिदों में या आतंकवादियों के बमों से रोजाना निरपराध लोग मारे जा रहे हैं। आतंकवादी समूह शक्तिशाली हो रहे हैं, कहीं से भी लड़कियों का अपहरण कर लेना या नवयुवकों को बहला-फुसलाकर उनके दिमाग में फितूर पैदा करना आम बात हो गई है। निरपराध लोगों को, जिनमें डॉक्टर, नर्सें और सेवा करने वाले कर्मचारी शामिल हैं, मौत के घाट उतारा जा रहा है। हजारों एकड़ जंगलों को आग के हवाले कर दिया जाता है, किशोर बंदूकें लेकर स्कूल जाते हैं और अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरू कर देते हैं, नशीले पदार्थों का व्यवसाय करने वाले गुंडों ने शहरों को खतरनाक बना दिया है। और उस पर बड़े-बड़े व्यावसायिक कार्पोरेशन्स और निश्चित ही सरकारें हैं जो सिर्फ अपने स्वार्थ और आर्थिक लाभ को ध्यान में रखती हैं।

रोज़ सबेरे उठते ही आपको यह सब देखना-सुनना पड़ता है-इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ लोग जब दुनिया की इस हालत पर विचार करते हैं तो अवसादग्रस्त हो जाते हैं! इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं कि आप सोचते हैं कि दुनिया में क्लेश बढ़ता ही जा रहा है और आपके प्रयास उसके सामने कुछ भी नहीं हैं, उनका कोई असर नहीं होने वाला है।

लेकिन आपका अवसादग्रस्त हो जाना किस तरह इस मामले में सहायक होगा? यदि आप बिस्तर पर लेटकर आँसू बहाएँ तो क्या किसी को कोई लाभ हो सकता है? अगर आप बाहर निकलना बंद कर दें कि दुनिया बहुत बुरी है, तब कुछ होगा? उत्तर है, नहीं होगा! बल्कि अपने मित्रों और रिश्तेदारों को अपने लिए चिंतित करके आप दुनिया का दुःख और बढ़ा देंगे!

उठिए, उन भावनाओं को निकाल बाहर कीजिए और अपनी छोटी सी दुनिया को खुशनुमा बनाइए। अपने से शुरू कीजिए और सबसे पहले सुनिश्चित कीजिए कि आप खुश रहेंगे। फिर दूसरों की मदद कीजिए। जो समस्याएँ आपको सबसे ज़्यादा मथती हैं, उन्हें दूर करने में लोगों की मदद कीजिए। अगर आपको लगता है कि आप बेघर लोगों की या शरणार्थियों की मदद करना चाहते हैं तो आपके शहर में ही कोई न कोई रैनबसेरा या कोई स्वयंसेवी संगठन होगा, जहाँ जाकर आप स्वैच्छिक रूप से उनका हाथ बँटा सकते हैं। अगर आपका मन चीनी फैक्ट्रियों में जारी अमानवीय कार्य-प्रणालियों का विरोध करना चाहता है तो सुनिश्चित करें कि आप उनका सामान न खरीदकर किसी ज़िम्मेदार कंपनी का सामान ही खरीद रहे हैं, जो ऐसी अनुचित और गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त नहीं हैं! जब भी आपको लगे कि आप अपना समय और पैसा इन सत्कार्यों में लगा सकते हैं तो जहाँ ज़रूरत हो, ऐसा अवश्य करें। सोशल मीडिया के ज़रिए, पिटीशन भेजकर और आसपास के लोगों को उसकी जानकारी देकर ऐसे कार्यों के प्रति अपना समर्थन अवश्य व्यक्त करें।

आप सारे युद्धों को रोक नहीं सकते। इस ग्रह की सारी समस्याओं का निपटारा आप अकेले नहीं कर सकते! हाँ, आप अपनी दुनिया में परिवर्तन ला सकते हैं। दुनिया के विशाल परिदृश्य में वह बहुत छोटा सा प्रयास होगा, गहरे अँधेरे में प्रकाश की हल्की सी किरण जैसा! लेकिन आप ऐसी इकलौती किरण नहीं हैं और इसलिए हम सब साथ मिलकर एक विशाल प्रकाश-पुंज बन सकते हैं, सब मिलकर दुनिया के बेहतर भविष्य के लिए काम कर सकते हैं।

अपनी सतह पर कुछ न कुछ अवश्य कीजिए- फर्क अवश्य पड़ेगा!

क्या आपके ‘जीवन का सबसे खराब समय’ चल रहा है? उससे बाहर निकलिए! 9 सितंबर 2015

कल मैंने आपको एक आस्ट्रियन मित्र के बारे बताया था, जिसने मुझे फोन पर अपनी एक समस्या के बारे में बताया, जिस पर वह अपने करीबी मित्रों के साथ चर्चा नहीं कर सकता था। चर्चा के दौरान किसी बिन्दु पर उसने कहा कि जिन परिस्थितियों से वह अभी गुज़र रहा है, वह उसके जीवन का सबसे अशुभ समय है। अपने जीवन में न जाने कितनी बार मैं ये शब्द सुन चुका हूँ। मेरे सलाह-सत्रों में अक्सर लोग इस ‘अशुभ समय’ की चर्चा करते हैं और इसलिए मैंने सोचा, आज के ब्लॉग में कुछ पंक्तियाँ इसी विषय पर लिखी जाएँ- इन परिस्थितियों पर और उनसे उपजी अनुभूतियों पर।

जब भी आपको लगे कि आप ऐसी किसी परिस्थिति से गुज़र रहे हैं तो सबसे पहले उसे ठीक-ठीक जान-समझ लें। जब आपको पूरी तरह विश्वास हो जाए कि आप ‘जीवन के सबसे खराब समय’ से गुज़र रहे हैं, तभी आप शांतिपूर्वक चीजों को तब्दील करने का उपाय कर सकते हैं।

ऐसी परिस्थिति तब उत्पन्न होती है, जब जीवन में अचानक, अनपेक्षित और अप्रत्याशित परिवर्तन आते हैं; जब ऐसी बातें होती हैं, जिनसे निपटने की तैयारी आपने नहीं की होती, आपके पास सोचने का इतना समय ही नहीं होता कि इस परिस्थिति का मुक़ाबला कैसे किया जाए। कोई अपघात, बीमारी, प्राकृतिक आपदाएँ, अपने किसी प्रियकर की मृत्यु, नौकरी छूटना, जीवनसाथी, रिश्तेदारों या मित्रों से संबंध-विच्छेद या परस्पर संबंधों में छल-कपट का अंदेशा। स्वाभाविक ही, इनमें और भी बहुत सी बातें जोड़ी जा सकती हैं लेकिन मूल बात यह है कि ये बातें आपको निराश करती हैं, आप दुखी और इतने अवसाद-ग्रस्त हो जाते हैं कि आपका मस्तिष्क कोई सकारात्मक बात सोच ही नहीं पाता। अक्सर ऐसा इसलिए होता है कि कई चीज़ें, एक के बाद एक, बहुत तेज़ी से घटित होती हैं और वास्तव में सोचने का समय ही नहीं मिल पाता।

जिस किसी भी घटना के कारण आप उन परिस्थितियों से दो-चार हो रहे हों, उस पर ठहरकर समग्र विचार करें। समझने की कोशिश करें कि इस परिवर्तन का या इस परिस्थिति का ठीक-ठीक कारण क्या है और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करें। थोड़ा सा समय इस दुख को दें क्योंकि जिसके खोने का दुख आपको हो रहा है या जो तकलीफ आपको पहुँची है, उसका बाहर निकलना आवश्यक है। यह पूरी तरह सामान्य बात है और आपको इस भावनात्मक दौर से गुज़रना ही होगा। और उसके बाद आप उससे बाहर निकल आएँ।

सुनने में आसान लगता है न? लेकिन अमल में लाना मुश्किल है! क्योंकि उसके प्रति आपका रवैया गलत है! असल में लोग उसकी छोटी-मोटी बातों के विस्तार को पीछे छोड़ना नहीं चाहते। वे उसके मामूली 'अगर-मगर' में उलझे रह जाते हैं- अगर यह होता तो क्या होता, वैसा होता तो अच्छा होता, आदि आदि- जबकि ये बातें उन्हें कहीं नहीं ले जातीं। वे घटनाओं के मुख्य हिस्सों को मन में दोहराते रहते हैं या किसी तरह उन्हीं पिछली बातों पर आने की कोशिश करते हैं और इस तरह वहीं गोल-गोल घूमते रहते हैं।

और जब अंततः समझ में आ जाता है कि यह संभव ही नहीं है, कितना भी संघर्ष या कोशिश कर लें, पीछे नहीं लौटा जा सकता तो अत्यंत निराश हो जाते हैं, अवसादग्रस्त हो जाते हैं। आप समय को वापस नहीं ला सकते, घटित हो चुकी बातों को अघटित नहीं किया जा सकता और अतीत के अपने कर्मों को आप बदलकर ठीक नहीं कर सकते। लेकिन जो हो चुका है, आपके सामने घटित हो रहा है, उस पर अपना सोचने का तरीका आप बदल सकते हैं, उस पर अपना नजरिया बदल सकते हैं-और इस तरह उस परिस्थिति से और उस पर अपने नकारात्मक सोच से पार पा सकते हैं।

जो हो चुका है, उसका विश्लेषण करने और उसे समझने के लिए आपको समय चाहिए। लेकिन एक समयांतराल के बाद आपको अतीत के बारे में सोचना छोड़ना ही होगा और यह समझना होगा कि आपके सामने, आगे एक नया सबेरा है। ये भावनाएँ और ये एहसासात ताउम्र नहीं रहने वाले हैं! अच्छा समय फिर आएगा और हमेशा से हम रोज़ सबेरे उठकर इसी दिशा में प्रयत्न करते हैं!

अगर आप बहुत व्यस्त होने के कारण मौज-मस्ती नहीं कर पाते तो आपके साथ कहीं न कहीं कोई गड़बड़ ज़रूर है – 2 मार्च 2015

वृन्दावन में होली-समारोह की शुरुआत हो चुकी है! अगर आप होली के बारे में अभी भी नहीं जानते तो यह समझिए कि यह रंगों का मस्ती भरा त्योहार है, जो एक दिन के लिए तो भारत भर में मनाया ही जाता है लेकिन हमारे इलाके, ब्रज में यह पूरे एक सप्ताह चलता है! पुरातन काल में फसल कटाई के बाद धन्यवाद देने के लिए मनाए जाने वाले समारोह के साथ इसकी शुरुआत हुई थी और आज इसे हर तरह के हँसी-मज़ाक और अराजक मौज-मस्ती के साथ मनाया जाता है। एक दूसरे पर रंगीन पानी की बौछार की जाती है और सूखे रंगों का प्रयोग भी किया जाता है। थोड़ा हुड़दंग और बहुत सारी मौज-मस्ती होती है!

बहुत से लोग समझते हैं कि होली सिर्फ बच्चों का त्योहार होता है। स्वाभाविक ही बच्चे सारा साल इस त्योहार का इंतज़ार करते हैं लेकिन इस त्योहार में वयस्कों के लिए भी बहुत से मौज-मस्ती के अवसर उपलब्ध होते हैं! और अगर आप इसमें कोई मज़ा नहीं पाते तो मैं यही कहूँगा कि आप कुछ गलत कर रहे हैं, कुछ खो रहे हैं! मैं कहना चाहता हूँ कि यह बात सिर्फ होली के लिए ही सही नहीं है बल्कि हर तरह के समारोह के लिए, जिसे नीचे दिए गए कारणों से आप छोड़ देते हैं, सही है।

संभव है, आप इतना व्यस्त रहते हैं कि त्योहार मनाने का या समारोहों में सक्रिय भागीदारी का आपके पास समय नहीं होता। मैं जानता हूँ कि आपके पास बहुत काम है। कई परियोजनाएँ हैं, जिनकी ज़िम्मेदारी आप पर है, लोगों को फोन करना है, उनसे मिलना-जुलना है और बहुत सी कागजी कार्यवाहियाँ पूरी की जानी हैं। आपके जीवन का यह सबसे व्यस्त समय है और आप अपने ग्राहकों या अपने कंप्यूटर को छोड़कर कहीं नहीं जा सकते कि त्योहारों का या समारोहों का आनंद ले सकें।

हो सकता है कि आप किसी कारण से उदास हैं और सोचते हैं कि त्योहार मनाने का आपका मूड नहीं हैं। आप कमरे में बैठे हुए पाते हैं कि आप बहुत अवसाद ग्रस्त हैं और इतना दुखी हैं कि खुश होने का आपका मन ही नहीं है। या शायद आप अपने दुख में ही खुश हैं!

ये बेहूदी या निरर्थक बातें हैं! अगर आप हर वक़्त व्यस्त रहते हैं, इतने तनाव में हैं कि जीवन का आनंद ही नहीं ले सकते तो फिर आखिर जीवन किसलिए है? और क्या आप नहीं समझते कि मनमौजी लोगों के साथ घुलमिलकर, मौज-मस्ती करके, खुशमिजाज़ मित्रों के साथ मिलकर थोड़ा हँसी-मज़ाक करके आपका मूड ठीक ही होगा?

अगर आप अभी बाहर नहीं निकलते, अपने बच्चों, अपने साथी या अपने मित्रों के साथ या अपने आप में, खुद ही त्योहार का मज़ा नहीं लेते तो भविष्य में आप अवश्य पछताएंगे। अगर आज आप बाहर निकलकर लोगों के साथ त्योहारों का रस लेते हैं तो आप न सिर्फ आज खुश होंगे बल्कि आने वाले वर्षों में भी आपका बहुत सारा समय इन पलों को याद करके भी इस खुशी में सराबोर रहेगा। इस मौज-मस्ती की यादें आपको सदा गुदगुदाती रहेंगी!

कभी-कभी थोड़ा सा अंदरूनी परिवर्तन, एक सक्रिय कदम, समारोहों और त्योहारों में शामिल होने का निर्णय-खुश होने का, उल्लसित होने का निर्णय आवश्यक होता है!

धन-केन्द्रित समाज में अपने बच्चों को सभ्य इंसान बनाना – 1 अप्रैल 2014

कल मैंने संक्षेप में बताया था कि छोटे बच्चों को स्कूल जैसी कक्षाओं में बैठकर समय बरबाद करने की जगह सिर्फ अपने मन-मुआफिक खेलने के लिए ज़्यादा समय मिलना चाहिए। मेरे विचार में अगर हम अपने लड़के-लड़कियों को छोटी उम्र में स्कूल भेजते हैं तो वास्तव में हम उनके बचपन के एक हिस्से को उनसे छीन लेते हैं। यही हम तब कर रहे होते हैं, जब उनके दिन को व्यस्त समय-सारिणी में जकड़ देते है और उन्हें स्वतन्त्रता पूर्वक खेलने का मौका ही नहीं देते। दुर्भाग्य से यह ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण चलन है, जो कम होने की जगह आजकल बढ़ता ही जा रहा है।

भारत में मैं इसे जर्मनी के मुक़ाबले कुछ ज़्यादा महसूस करता हूँ लेकिन सबसे ज़्यादा यह चलन अमरीका में देखा जाता है। जब हम वहाँ थे हम ऐसी माँओं और बच्चों से मिले जिन्होंने बताया कि बच्चों को पूरे सप्ताह में पल भर का भी मुक्त समय प्राप्त नहीं हुआ। सारा दिन स्कूल होता है, जो सुबह जल्दी शुरू हो जाता है और देर शाम तक चलता रहता है, जब उनके अभिभावक भी काम से लौट रहे होते हैं।

बच्चे अपना नाश्ता और दोपहर का भोजन स्कूल में ही करते हैं, वहीं होमवर्क भी करते हैं और स्वाभाविक ही सारे स्कूल की पढ़ाई भी इसी दौरान होती रहती है। उसके बाद ‘फुर्सत’ की गतिविधियां, जिनमें बच्चों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कि जाती है, भी होती रहती हैं। शिक्षकों और पेशेवर प्रशिक्षकों की निगरानी में बच्चों को खेलों का प्रशिक्षण लेना होता है।

एक या दो दिन, जब स्कूल जल्दी छूट जाता है, अभिभावक सुनिश्चित करते हैं कि बच्चों को बोर होने का मौका ही न मिले: स्पोर्ट्स क्लब, कोई वाद्य-यंत्र सिखाने वाला स्कूल और कुछ नहीं तो अभिभावकों द्वारा आयोजित डेट्स का खेल-वे उन्हें किसी न किसी खेल या अध्यवसाय में लगाए रखते हैं। बच्चे बोर तो नहीं होते मगर उन्हें अपना उन्मुक्त समय भी नहीं मिल पाता। यहाँ तक कि रविवार के दिन भी चर्च स्कूल होता है-एक और सक्रियता से भरा दिन।

उनके पास ऐसा कोई समय नहीं होता जब वे अपने मन की करने की सोच भी सकें। यहाँ तक कि सामाजिक कार्यक्रम भी किसी न किसी के निरीक्षण और निर्देशन में ही होते हैं और बच्चों के पास अपने मन से कुछ करने का बहुत सीमित समय और अवसर होता है। मेरा मानना है कि इस माहौल में दरअसल उनकी स्वतन्त्रता, कल्पनालोक में विचरण करने की उनकी शक्ति और अपना समय अपनी मर्ज़ी के अनुसार व्यतीत करने की क्षमता बाधित होती है।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि इन गतिविधियों को बच्चे पसंद नहीं करते। वे बांसुरी बजाना या बास्केट-बाल खेलना और यहाँ तक कि होमवर्क करना या दूसरी गतिविधियां भी पसंद कर सकते हैं। नाटक शिविर और पुस्तकालयों में समय बिताना भी। लेकिन इन सभी गतिविधियों का आनंद लेने का निर्देश बाहर से, दूसरों द्वारा दिया जा रहा है।

हम बच्चों को इतना अवसर, इतनी आज़ादी क्यों नहीं देते कि वे खुद निर्णय करें कि वे क्या करना चाहते हैं? उनके सामने कोई वाद्य या कोई किताब तभी रखें जब वह खुद चाहे। हम इस बात की ज़िद क्यों करें कि उन्हें खेल भी समय-सारिणी के अनुसार ही खेलना है, जब कि वे उस वक़्त घर में अपने बिस्तर पर लेटे रहना चाहते हैं? क्या हम अपने बच्चों को खेलों और अपनी मर्ज़ी के अनुसार किसी भी दिशा में दुनिया की पड़ताल करने के बारे में जानकारी और उनसे उपजने वाली संभावनाओं से अवगत नहीं करा सकते?

मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों को यह मज़ाक लग रहा होगा लेकिन मैं समझता हूँ कि हम अपने बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं। जिम्मेदारियों से मुक्त वह समय, जिसे वे अपनी मर्ज़ी से मनचाहा काम करने में व्यतीत कर सकते थे, उस पर डाका डाल रहे हैं। अगर आप उन्हें इस उन्मुक्त समय के एहसास का आनंद उठाने का मौका नहीं देंगे तो फिर वे अपने जीवन में सुकून के साथ लेटकर यह विचार कैसे कर पाएंगे कि वे आगे भविष्य में क्या करना चाहते हैं?

अपने दिमाग से सोचकर निर्णय लेने की जगह वे आँख मूंदकर समाज के बताए रास्ते पर चलेंगे क्योंकि वे दूसरों द्वारा संचालित और नियंत्रित गतिविधियों के अभ्यस्त होंगे! ऐसे समाज के सुसभ्य सदस्य, जो चाहता है कि लोग कमाएं, खाएं और वही सोचें और करें, जो दूसरे सभी सोचते और करते हैं। वे उन चीजों को खरीदेंगे, जो विज्ञापन उन्हें बताएँगे क्योंकि बचपन से उन्होंने वही किया है, जो दूसरों ने उनसे कहा था। वे अच्छे कर्मचारी बन सकेंगे, जो समय पर दफ्तर आएँगे और समय सारिणी से बंधे घड़ी की सुई के साथ आखिरी मिनट तक काम करते रहेंगे बल्कि उनसे अपेक्षित काम से ज़्यादा ही करने का प्रयास करेंगे। क्योंकि उन्हें इसकी आदत पड़ चुकी है। क्योंकि वे हमेशा से ऐसा ही करते रहे हैं।

तब तक, जब वे पूरी तरह निष्क्रिय न हो जाएँ; थककर, टूटकर बिखर न जाएँ!

जी हाँ, मैं मानता हूँ कि हम स्वयं ही अपने नन्हे बच्चों में अवसाद और अक्रियाशीलता के बीज बोते हैं। इस विषय पर कल मैं और विस्तार से लिखूंगा।

मुख्य रूप से पश्चिमी (विदेशी) मेहमानों वाला एक आश्रम – 11 फरवरी 2014

कल मैंने आपको बताया था कि हाल ही में हमें अपने पहले हनीमून दंपति का स्वागत करने का अवसर मिला था। वे हमारे पहले भारतीय ग्राहक थे। क्यों? सामान्यतः हमें भारतीयों की बुकिंग प्राप्त क्यों नहीं होती? और क्या भविष्य में इस बारे में कोई परिवर्तन हो सकेगा? आज मैं इसी बात पर चर्चा करूंगा।

आज तक हमेशा विदेशी और कुछ एनआरआई ग्राहक ही हमारी सेवाएँ लेते रहे हैं। इनमें से एनआरआई ग्राहक तो विदेशों में पले-बढ़े और अपनी मानसिकता में भारतीय से ज़्यादा गैर-भारतीय ही कहे जाएंगे।

हमने अपने आपसे प्रश्न किया कि ऐसा क्यों है? क्यों हमारे आश्रम में ज़्यादातर सिर्फ पश्चिमी मेहमान ही होते हैं। हमें लगता रहा है कि भारतीय वह खरीदते ही नहीं, जो हम बेचते हैं।

इस बात में कुछ हद तक सच्चाई भी है: योग और आयुर्वेद विश्रांति शिविर सभी भारतीयों के लिए विशेष रुचिकर नहीं होते! वे भी जो इस विषय में रुचि रखते है, स्वास्थ्यकर दिनचर्या के चलते भारत में ही स्थित हमारे आश्रम आकर इन विश्रांति शिविरों में शामिल होना आवश्यक नहीं समझते। योग संबंधी डीवीडी या वीडियो की सहायता से या किसी स्थानीय योग शिविर में जाकर वे योग की मूलभूत जानकारियाँ हासिल कर लेते हैं। उन्हें सम्पूर्ण विश्रांति शिविर में शामिल होकर ज़्यादा कुछ सीखने की इच्छा नहीं होती। वैसे भी इन विश्रांति शिविरों को वे एक तरह की विलासिता ही समझते होंगे और उस पर पैसा खर्च करना उन्हें व्यर्थ लगता होगा।

वैसे यह खर्च का प्रश्न उतना नहीं है जितना कि जीवन-पद्धति का है। यह बात अब हमारे सामने स्पष्ट होने लगी है। हम देख रहे हैं कि भारत में भी हमारे पृष्ठों में रुचि बढ़ रही है और हमें लगता है कि जब व्यस्त और तनावपूर्ण कारपोरेट दुनिया में और उसके चलते उस जीवनचर्या में लोग ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में प्रवेश करेंगे, जिसे पश्चिमी जीवनचर्या कहा जाता है, तब लोगों के लिए हमारे आयुर्वेद और योग विश्रांति शिविर रुचिकर साबित होंगे। वैसे भी यह पश्चिमी जीवनचर्या सारे संसार में तेज़ी के साथ अपने पाँव पसार रही है। जब लोग अपने स्वास्थ्य से ज़्यादा महत्व अपने काम और अपने कैरियर को देते हैं, जब काम, पैसे कमाना और व्यस्त रहना उनकी प्राथमिकता बन जाते हैं और जब एक दिन उन्हें एहसास होता है कि यह सब उनके जीवन में पूर्णता नहीं ला सकता तब योग विश्रांति शिविरों की उन्हें आवश्यकता प्रतीत होती है। जब वे पूरी तरह निचोड़ लिए जाएंगे, जब वे अपना काम गवां देने की चिंता में अवसादग्रस्त हो जाएंगे, जब फोन की घंटी बजते ही उन्हें हर तरह की आशंकाएँ घेर लेंगी क्योंकि उनका शरीर और मस्तिष्क उस तनाव को झेल सकने के काबिल नहीं रह जाएगा।

ऐसी जीवन-शैली में लोगों के पास अपने ही लिए समय नहीं होता। न तो जीवन का वास्तविक आनंद लेने का उनके पास समय होता है और न ही भावनात्मक रूप से वे वास्तविक जीवन से जुड़ पाते हैं। ऐसी हालत में उनके पास अपने परम्परागत ज्ञान जैसे आयुर्वेदिक उपचार पर या रोज़ योग करने के लिए भी समय नहीं होता। उन्हें पुनः सीखना पड़ता है, उन्हें अपनी विश्रांति के लिए अलग से समय निकालना होता है।

कभी-कभी हम यह भी सोचते हैं कि एक टिपिकल भारतीय हमारे आश्रम में किसी पश्चिमी मेहमान की तुलना में उतना सहज नहीं रह पाता होगा क्योंकि हमारे यहाँ रूढ़ियों और परम्पराओं से दूर एक उन्मुक्त और अनौपचारिक जीवन-शैली अपनाई जाती है।

इसलिए हो सकता है कि भविष्य में हमारे यहाँ कुछ भारतीय मेहमानों का आना भी शुरू हो जाए। यह समय ही बताएगा और सामान्य जीवन-शैली, संस्कृति और लोगों की जरूरतों में होने वाले परिवर्तनों पर हमारी पैनी नज़र बनी रहेगी।

गहरे अवसाद और बर्न आउट के बाद वापस सामान्य होने की लम्बी और थका देने वाली प्रक्रिया- 22 अगस्त 2013

कल मैंने इस बारे में लिखा था कि कैसे आजकल बहुत से लोग काम के दबाव और उसके तनावों के कारण शारीरिक और मानसिक क्षय से पीड़ित होकर टूट जाते हैं और अंततः गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। आज मैं संक्षेप में ऐसी क्षरण की स्थितियों से उबरने की प्रक्रिया के बारे में लिखना चाहता हूँ।

अपने व्यक्तिगत परामर्श-सत्रों में और अपने आश्रम में मैं कई क्षयग्रस्त लोगों से मिलता रहा हूँ और मैंने कई मनोचिकित्सकों के साथ भी इस विषय पर काम किया है, इसलिए ऐसी स्थितियों में फंसे व्यक्तियों की मानसिक हालत और उनकी भावनाओं की मुझे काफी हद तक ठीक-ठीक समझ है-और इस बात की भी कि अब उन्हें क्या करना चाहिए, जिससे वे सामान्य जीवन में वापस आ सकें।

कल मैंने यह भी लिखा था कि दरअसल उन्हें ‘वापस उसी अवस्था’ में आने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनकी क्षय से पहले की, तथाकथित सामान्य जीवन-पद्धति, उनका जीने का तरीका, उनकी सोच और व्यवहार ने ही मिलकर उन्हें इस हालत में पहुंचाया था! अब तो उन्हें सब कुछ नए सिरे से और नए तरीके से शुरू करना होगा!

जो शारीरिक और मानसिक रूप से क्षयग्रस्त है उसे सबसे पहले किसी पेशेवर की मदद लेनी होगी क्योंकि वह बीमारी की अंतिम अवस्था में पहुँच चुका है। कई लोगों को चिकित्सालय में कुछ दिन रहना भी पड़ सकता है क्योंकि वे अभी यह भी नहीं समझ पाते कि कैसे जिएँ, क्यों जिएँ?-उनके जीवन का मूल उद्देश्य ही अर्थहीन हो चुका होता है! अक्सर अपने अस्तित्व को वे अपनी नौकरी, अपने पद, अपने काम से पूरी तरह जोड़ चुके होते हैं और उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि अपने आप पर उन्होंने असीमित दबाव डाला हुआ है। इस पतन ने उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली है। उनका शरीर अब जवाब दे गया है और कह रहा है कि इसे अब और चलते रहने नहीं दिया जा सकता, कि वे अब अपनी, खुद की जरूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

आम तौर पर डॉक्टर ऐसे क्षयग्रस्त लोगों को दवाइयाँ खिलाते हैं-अवसाद-रोधी, नींद की गोलियां और कुछ अन्य दवाइयाँ। शुरुआत में या आपातकाल में ये दवाइयाँ अच्छा असर दिखाती हैं, लेकिन कुछ समय बाद, और यह समय कुछ महीने हो सकता है, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सीखना होगा और खुद शारीरिक और मानसिक स्थिरता की तलाश करनी होगी। यही वह समय है, जब वे अपनी भीतरी खोज शुरू कर सकते हैं और इसी हालत में हमारे आश्रम में कुछ दिन विश्राम लेना कई लोगों को लाभ पहुंचा चुका है।

जब आप ऐसी हालत में होते हैं तो सबसे मुख्य बात आपको यह करनी होती है कि आप अपने आपको खोजें। पैसे और सफलता की दौड़ में आपने अपने आपको पूरी तरह खो दिया है, आपको खुद अपना कोई एहसास नहीं होता। आप कौन हैं? अपने जीवन में आप क्या करना चाहते हैं? क्या करके आप प्रसन्न होते हैं? ये और ऐसे ही कुछ और प्रश्न हैं, जिनका जवाब आपको देना होगा। उसके बाद ही कोई क्षयग्रस्त मरीज अपने जीवन के टुकड़ों को बटोरकर पुनः स्थिरचित्त हो सकता है। कई लोग अपनी नौकरी या कार्यक्षेत्र बदलने का निर्णय लेते हैं, क्योंकि जो वे इतने दिन करते रहे थे, अब नहीं कर सकते क्योंकि वैसा करने पर वे अपने शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से उबर नहीं पाएंगे।

लेकिन बाहरी चीजों और वातावरण के बदलाव से ही बात नहीं बनेगी, बहुतेरे आंतरिक प्रतिमानों और विचारों से भी आपको मुक्ति पानी होगी! और शुद्धिकरण की इस प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए अपने सामान्य और उबाऊ वातावरण से बाहर निकलकर बिल्कुल नई और अलग जगह पर कुछ दिन बताने से बढ़कर क्या बात होगी! ऐसी परिस्थितियों में हमारे आश्रम आकर आयुर्वेदिक-योग-अवकाश लेने वाले लोगों के साथ हमारा अनुभव बहुत सुखद, प्रेरणास्पद और आशाप्रद रहा है।

उन्होंने हमें बताया है कि रोजाना नियमित आयुर्वेदिक मालिश किस तरह इसमें सहायक रही क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि कोई है, जो पूरे एक घंटे उन पर और उनके शरीर के छोटे-छोटे अंगों पर पूरा ध्यान केन्द्रित किए हुए है। कई सालों से उनका शरीर अपने प्रति उनकी लापरवाही झेल रहा था। वह उनके ध्यान से वंचित था और ठीक यही पाने के लिए वह बेताब था! यह उपचार उन्हें, शारीरिक और मानसिक रूप से विष-मुक्त करने में बहुत सहायक रहा। दैनिक योग-सत्रों में आप शरीर के प्रति अपने प्रेम को पुनर्जीवित करते हैं। खुद से ऊंची से ऊंची अपेक्षाओं के दबाव में, एक नियुक्ति से दूसरी की तरफ भागने-दौड़ने की मजबूरी में आप अपने शरीर के प्रति यह प्रेम-भावना भूल ही चुके थे!

और फिर, और शायद सबसे महत्वपूर्ण भी, आप यहाँ ऐसा वातावरण और परिवेश प्राप्त करते हैं, जहां आप इस खोज को ज़्यादा अच्छी तरह अंजाम दे सकते हैं कि आप कौन हैं और आपके जीवन का उद्देश्य क्या है, आप क्या चाहते हैं? आप अपने आप में मगन रह सकते हैं-स्वतंत्र, बच्चों के साथ, हमारे परिवार और आश्रम के बच्चों के बीच या विश्रांति के लिए आए दूसरे मेहमानों के साथ। आप विश्राम कर सकते हैं या हमारे कामों में हमारे सहभागी हो सकते हैं, आप पढ़-लिख सकते हैं, ध्यान में लीन हो सकते हैं, दिल जो कहे, वह सब कुछ आप करने के लिए स्वतंत्र हैं। और यह बहुत बड़ा मौका है:आप अपने दिल की आवाज़ सुनना शुरू कर सकते हैं। यही तो आपने आज तक नहीं किया था कि अपने दिल की तनावपूर्ण, चीखती आवाज़ को आप कभी सुन लेते और जिसका खामियाजा आप आज भुगत रहे हैं!

मानसिक रूप से पूरी तरह ध्वस्त होने के बाद, धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे लोग अपनी पूर्वावस्था में लौट पाते हैं और अधिकतर लोग यही कहते हैं कि यह बाद की अवस्था उनकी पिछली अवस्था से बहुत बेहतर है! मैं कामना करता हूँ कि उन सभी लोगों को, जो ऐसी स्थिति को प्राप्त हुए हैं, यह शक्ति प्राप्त हो कि वे अपने वास्तविक स्वत्व को प्राप्त कर सकें और उनके लिए, जो अब भी पैसे और सफलता की अंधी दौड़ के चलते शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव से ही जूझ रहे हैं, यह कि वे यह समझ सकें कि जो वे कर रहे हैं वह उन्हें बड़ी गहरी पीड़ा पहुंचा सकता है।

और जब कभी भी आप अपने परिवेश और वातावरण से दूर कहीं जाना चाहें, हमारे आश्रम के दरवाजे आपके लिए सदा खुले हैं।

सफलता और शिखर पर पहुँचने की महत्वाकांक्षा कहीं तनाव, अवसाद और पतन की राह पर न ले जाए! 21 अगस्त 2013

कल मैंने कामकाजी जीवन में लोगों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा के विषय में लिखा था। ये प्रतिस्पर्धाएँ इसलिए आयोजित की जाती हैं कि लोग सफलता के पीछे दौड़ें और थोड़ा बहुत अतिरिक्त आर्थिक लाभ अर्जित कर सकें। इससे लोगों के जीवन में काम का शारीरिक दबाव और मानसिक तनाव बढ़ते जाते हैं और जैसे-जैसे वे ऊपर उठते जाते हैं, यह दबाव और तनाव भी बढ़ता जाता है और अंततः वह आपको क्षीण और जर्जर बना देता है। इसे अंग्रेज़ी में बर्न-आउट कहते हैं। हम इसे शारीरिक और मानसिक क्षय कह सकते हैं, जो आगे चलकर लंबे अवसाद में तब्दील हो जाता है और उसके बाद उससे उबरने के लंबे प्रयास और अंततः व्यक्तिगत लक्ष्य और जीवन का अर्थ खोजने की लंबी प्रक्रिया में उलझकर रह जाता है।

विशेषकर बड़ी कंपनियाँ किसी व्यक्ति की कोई परवाह नहीं करतीं। यह बात हर व्यक्ति जानता है लेकिन एक बार जब आप वहाँ पहुँच जाते हैं, आंकड़ों और पुरस्कारों के उस तंत्र (व्यवस्था) का हिस्सा बन जाते हैं तो यह बात बिल्कुल भूल जाते हैं और अपने सहयोगियों को अपना प्रतिस्पर्धी मानकर व्यवस्था द्वारा प्रायोजित उस दौड़ में शामिल हो जाते हैं। आपकी नज़रें कंपनी के लक्ष्यों पर होती हैं और दाएँ-बाएँ आपको कुछ भी दिखाई नहीं देता। लक्ष्य महज एक आंकड़ा होता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। आपको एक दिन में इतने लोगों से मिलना है, मिले गए इतने लोगों में से इतना प्रतिशत बिक्री में तब्दील हो जाना चाहिए, उतने लोगों से इकरारनामे पर दस्तखत करा लें और अंततः, उतना लाभ, रुपए की शक्ल में कंपनी के खाते में जमा हो जाना चाहिए! आप समझते हैं कि आपने कोई महत्वपूर्ण काम अंजाम दिया है और पूरी कंपनी और उसका नेतृत्व आपसे प्रसन्न हैं और आप पर गर्व करते हैं। जब कि वास्तविकता यह होती है कि कंपनी और उसका नेतृत्व अपनी सफलता पर खुश हैं, आंकड़ों पर खुश हैं, अपने खाते में आई हुई रकम से खुश हैं, आप पर गर्वित नहीं हैं! जब कि आप अपने अस्तित्व को कंपनी के साथ, उसके लिए निष्पादित अपने महत्वपूर्ण काम के साथ और उसके लिए प्राप्त अपनी सफलता के साथ जोड़ लेते हैं जब कि वास्तविकता यह होती है कि कंपनी को लक्ष्य तक पहुँचाने की व्यवस्था के काम में आप महज एक छोटे से पुर्जे होते हैं!

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि जो बड़ी कंपनियों में काम नहीं करते वे इन दबावों और तनावों से बचे रहते हैं। विशेषकर स्वरोजगारी और छोटी कंपनियों के मालिकों को भी उतना ही तनाव झेलना पड़ता है क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी सफलता स्वयं उन पर निर्भर है। पैसा आता रहे, इसके लिए उन्हें अक्सर कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती है लेकिन वे भी ज़्यादा से ज़्यादा धन कमाने, ज़्यादा से ज़्यादा सफलता अर्जित करने के चक्कर में उसके साथ मुफ्त मिलने वाले तनावों और दबावों के मकड़जाल में उलझकर रह जाते हैं। और आसपास के लोग, समाज, विज्ञापन आदि सभी सफलता के लिए जारी इस अंधी दौड़ को प्रोत्साहित करते हैं।

यह कहना कोई नई बात नहीं होगी कि यह समाज धन-केन्द्रित है। यह भी कोई नई बात नहीं है कि व्यापक जनसमुदाय व्यक्ति की कोई परवाह नहीं करता। लेकिन आप खुद क्या सोचते हैं? आप क्यों इस खेल में लगे हुए हैं? आप क्यों इस तरह की जीवन पद्धति अपनाए हुए हैं, प्रोग्राम्ड कंप्यूटर या किसी मशीन जैसी? आप अपने मनोरंजन के लिए कुछ नहीं करते, अपने कार्य में सफलता के अलावा कोई दूसरी बात आपको प्रसन्न नहीं कर पाती, आप खुद अपना स्वार्थ भूल जाते हैं, आपका सामाजिक जीवन मृतप्राय होता जा रहा है और आप स्वयं अपनी और ध्यान नहीं देते। महत्वपूर्ण सिर्फ एक बात होती है: काम और उसमें ज्यादा से ज्यादा सफलता! किसी दूसरी बात के लिए आपके पास समय ही नहीं है।

यही वह घड़ी होती है, जब लोग शारीरिक और मानसिक रूप से क्षयग्रस्त हो जाते हैं। वे टूट जाते हैं और इसका अर्थ यह होता है कि उनकी शारीरिक और मानसिक शक्तियों का पूरी तरह क्षरण हो चुका होता है। कई लोगों को स्मृतिह्रास या स्मृतिभ्रम हो जाता है-वे सारे अंक और नाम, जो उनके लिए पहले बड़े महत्वपूर्ण थे अब उनकी स्मृति से विलुप्त हो जाते हैं। कई लोगों के लिए, उसके बाद, अवसाद के कठिन समय की शुरुआत हो जाती है। प्रतिपल, क्रमशः उनका पूरा जीवन धराशायी होता चला जाता है, अक्सर आसपास के लोगों ने ऐसी अपेक्षा नहीं की होती। उन्हें पेशेवर सलाहकार की आवश्यकता होती है और जब कि वे हर सप्ताह, नियमित रूप से मनोचिकित्सक के पास जाते हैं, सामान्य हालत में वापस लौटने के लिए उन्हें स्वयं भी इस पर अथक प्रयास करना होगा।

दरअसल, ‘लौटना’ नहीं, वापस, वही जीवन नहीं! नए जीवन की शुरुआत कीजिए, अपने लिए एक अलग जीवन की तलाश कीजिए, एक संतुलित और शांत जीवन!

पूर्णकालिक स्कूल – क्या हम अपने बच्चों को रोबोट बना देना चाहते हैं? – 8 जुलाई 2013

जब हम जर्मनी में थे, मैंने कई लोगों से सुना कि वहां अब पूर्णकालिक स्कूल खुल गए हैं जो प्राथमिक कक्षाओं से ही शुरू हो जाएंगे। निश्चय ही ऐसे कदम उठाने वाला जर्मनी पहला देश नहीं है। अमरीका और फ्रांस जैसे कई दूसरे देशों में कई सालों से पूर्णकालिक विद्यालय हैं। जर्मनी के विभिन्न इलाकों में रहने वाले अपने मित्रों से बात करते हुए मेरे भीतर कई तरह के विचार आए, जिन्हें मैं क्रम से, आज और आगे आने वाले दिनों में आपके सामने रखूँगा। सबसे पहले तो मैं यही कहूँगा कि, "यह एक खौफनाक बात है!"

वास्तव में जब मैं सुनता हूँ कि एक सात साल का बच्चा सबेरे 8 बजे स्कूल जाता है और वहां देर शाम तक यानी पांच या छः बजे तक रहता है तो मुझे लगता है कि यह बच्चों के साथ किया जाने वाला भयंकरतम अत्याचार है। अपने बचपन को याद करता हूँ तो पाता हूँ कि हम लोग घंटों घरों की छतों पर खेला करते थे, नदी किनारे हुड़दंग मचाते थे या यूं ही सड़कों पर मटरगश्ती किया करते थे। आजकल के ये बच्चे इनमें से किसी भी बात का मज़ा नहीं ले सकते!

नए-नए खेल रचने में और नयी तरह से समय का उपयोग करने में वे हमारी पीढ़ी जैसी मौलिकता और रचनाशीलता विकसित करने में असमर्थ रहते हैं क्योंकि उनका पूरा वक़्त पूरी तरह व्यवस्थित और बंधा हुआ होता है। मैं जानता हूँ की पूर्णकालिक स्कूल का यह अर्थ नहीं होता कि सारा दिन वे अपनी कुर्सियों से चिपके रहते हैं। यह भी कि शिक्षक इस तरह से प्रशिक्षित होते हैं कि वे बच्चों के साथ रहते हैं; उनके साथ खेलते हैं, गीत-संगीत भी होता है और उन्हें पूरी तरह से मौज-मस्ती के साथ समय बिताने का मौका मिलता है। लेकिन फिर भी, यह एक तरह का ढांचाबद्ध (संरचनाबद्ध) और आयोजित कार्य होता है और सब एक ढर्रे पर चलता रहता है। उन्हें कहा जाता है कि आप अपनी रचनात्मकता का उपयोग करें लेकिन इसके बावजूद वह एक खास दिशा में निर्देशित काम होता है, उन्हें अपने मन से कुछ भी करने की स्वतन्त्रता नहीं होती।

इस तरह बच्चे बहुत जल्दी यह सीख जाते हैं कि कैसे वे इस व्यवस्था का हिस्सा बन जाएँ। कैसे सुचारु रूप से चल रहे मशीनी समाज का एक छोटा सा पुर्जा बन जाएँ और अपना काम व्यवस्था की अपेक्षाओं के अनुरूप करते रहें। सारा सप्ताह नियोजित होता है और सप्ताहांत में ही यह अवसर मिल पाता है जब वे अपने परिवार के साथ घर के वातावरण के साथ एकरूप हो सकें और आपस में संवाद कर सकें। पहले शिक्षा अभिभावकों की ज़िम्मेदारी भी हुआ करती था लेकिन अब बच्चे अपने शिक्षकों के साथ इतना समय गुजारते हैं कि यह पूरी तरह उन्हीं का काम हो जाता है। स्वाभाविक ही, कोई भी शिक्षक इतनी अधिक ज़िम्मेदारी अपने सिर लेने में आनाकानी करते हैं और बच्चों का नुकसान होता है!

मैं यह भी जानता हूँ कि कुछ दूसरे देशों में यह तरीका कई वर्षों से अपनाया जा रहा है। इन देशों के लोग बताते हैं कि यह तरीका अच्छी तरह से काम कर रहा है, बच्चे खुश हैं और वे काफी मौज-मस्ती करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं। लेकिन मैंने यह भी देखा है कि उन देशों में बच्चों को स्कूल में बहुत ज़्यादा दबाव सहन करना पड़ता है। यह हो सकता है कि आधे बच्चे इस व्यवस्था से तालमेल बना पाते होंगे, परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल पाते होंगे। लेकिन मैं कई अभिभावकों से मिला हूँ जो अपने बच्चों के लिए बहुत चिंतित रहते हैं। स्कूल से आने के बाद वे इतनी बुरी तरह से थके हुए होते हैं कि न तो खेलना चाहते हैं न कोई दूसरा काम करना चाहते हैं। सिर्फ टीवी के सामने बैठ जाते हैं। उनमें ऊर्जा नहीं बचती और डॉक्टर के पास जाना एक रोज़मर्रा का काम बन जाता है और इसके लिए भी समय निकाल पाना मुश्किल होता है। इतने तनावों और दबावों से उनकी प्रसन्नता काफ़ूर हो जाती है वे अवसादग्रस्त और चिंताग्रस्त बने रहते है। वे ADHD से ग्रसित हो जाते हैं, जो मतिभ्रम से संबन्धित बीमारी है और जो पहले ही बच्चों में बहुतायत से पायी जाती है।

मेरी नज़र में बच्चे इस उम्र में वैसे भी बहुत दबाव में रहते हैं, उन पर और ज़्यादा दबाव डालना बिल्कुल उचित नहीं है। इस व्यवस्था में कक्षाएँ इतनी बड़ी हो जाती हैं कि हर बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान देना किसी भी शिक्षक के लिए संभव नहीं है। अभिभावकों के सामने भी इन बातों के लिए समय नहीं होता। बचपन, जिसे मौज मस्ती, खेल कूद, दौड़-भाग और दुनिया के आश्चर्यों की खोज के आनंद में व्यतीत होना चाहिए, विकास के कुछ मानदंडों को हासिल करने के चक्कर में, आयोजित, बंधे-बँधाये और बेहद उबाऊ सालों में बदल जाता है। फिर, वे जो इन लक्ष्यों को हासिल करने में कठिनाई महसूस करते हैं, पाते हैं कि वे अपने घनिष्ठ मित्रों के साथ ही एक अजीब सी कटु प्रतिस्पर्धा में उलझ गए हैं।

अब इस आपाधापी में प्रेम के लिए क्या स्थान हो सकता है?

कल और उसके बाद कुछ दिन, मैं इसी विषय पर कुछ और विस्तार के साथ अपने विचार प्रस्तुत करूंगा।