जब मुझे अछूत के पास बैठने पर आगाह किया गया – 4 अक्टूबर 2015

आज मैं अपने साथ हाल ही में हुए एक वाकए के बारे में लिखना चाहता हूँ, जो दर्शाता है कि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था की जड़ें कितनी मजबूत हैं। दुर्भाग्य से आज भी यह व्यवस्था हर जगह व्याप्त है और अभी भी बहुत से लोगों के मन से यह खयाल बाहर नहीं निकला है कि कुछ लोग ‘अछूत’ हो सकते हैं।

अभी कुछ सप्ताह पहले की बात है, जब मैं बाहर, हाल में सोफ़े पर बैठा हमारे सफाई कर्मचारी से बात कर रहा था, जो रोज़ सबेरे स्कूल के संडास-बाथरूम साफ करने आता है। उसने हाल ही में अपनी भतीजी को हमारे स्कूल में भर्ती करवाया था और मैं उस लड़की के बारे में उससे बातचीत कर रहा था।

अभी हम बात ही कर रहे थे कि एक और व्यक्ति ने आश्रम के मुख्य हाल में प्रवेश किया। वह हमारे शहर का ही व्यापारी था और कोई सामान पहुँचाने आया था। मेरे साथ बात कर रहा व्यक्ति उठकर खड़ा हो गया और तुरंत बाहर निकल गया और मैं नए आगंतुक से बात करने लगा। मैंने उससे बैठने के लिए कहा और उठकर यशेंदु को बुलाने जाने लगा, जो काम के बारे में आगंतुक से बात करता। मैं निकल ही रहा था कि वह मेरे पास आकर फुसफुसाते हुए कुछ कहने लगा, जैसे कोई बहुत ज़रूरी और दूसरों से छिपाने वाली रहस्यपूर्ण बात हो: ‘शायद आप नहीं जानते, ‘वह’ नीच जाति का आदमी है!’ उसने अभी-अभी बाहर गए व्यक्ति के बारे में कहा।

मैं जानता था कि यह व्यक्ति अपेक्षा कर रहा होगा कि मैं चौंक उठूँगा। बल्कि शायद अरुचि और ग्लानि से मुँह बनाऊँगा क्योंकि अभी-अभी ‘वह’ व्यक्ति मेरे साथ उसी तरह सोफ़े पर बैठा था, जिस तरह मैं इस नए आगंतुक के साथ बैठता। निश्चय ही, मेरी प्रतिक्रिया उसकी अपेक्षानुरूप नहीं रही! मैं अच्छी तरह जानता था कि मैं किससे साथ बात कर रहा था और उसकी जाति से निश्चित ही मेरा कोई सरोकार नहीं था!

‘अरे वह?’ मैंने जवाब दिया। ‘वह यहाँ कई सालों से काम कर रहा है और बहुत अच्छा आदमी है!’ और इतना कहकर मैं वहाँ से यशेंदु को बुलाने निकल गया।

अब चौंकने की बारी उस आगंतुक की थी! मैं देख पा रहा था कि यह जानकारी उसके गले से नीचे नहीं उतर रही थी कि मैं ‘उसके’ बारे में अच्छी तरह जानते-बूझते भी कि वह एक ‘अछूत’ है, मज़े में उसकी बगल में बैठा हुआ था।

दुर्भाग्य से, भारतीय समाज में यह प्रतिक्रिया असामान्य नहीं है। अफ़सोस कि आज भी यह जानने के बाद कि यह व्यक्ति किस परिवार का है और क्या काम करता है, अधिकांश लोग उसके पास नहीं बैठते, वह भी एक ही सोफ़े पर! दुर्भाग्य से, यह व्यक्ति भी किसी दूसरे परिवार में होता और संडास-बाथरूम साफ करने का काम कर रहा होता तो उनके साथ या उनके सोफ़े पर बैठने की हिम्मत भी नहीं करता। अर्थात, बैठने के लिए उससे कहा भी नहीं जाता और उसका ऐसा करना वहाँ कोई पसंद भी नहीं करता।

रमोना अक्सर स्कूल देखने आने वालों और आश्रम आने वाले मेहमानों से इस विषय में बताती रहती है। हर कोई यह जानकार स्तब्ध रह जाता है कि यहाँ, भारत में आज भी एक इंसान दूसरे को ‘अस्पृश्य’ समझता है। लेकिन यह घटना एक बार फिर इस बात को उजागर करती है कि हमारे स्कूल और हमारे आश्रम जैसे और भी कई स्थान होने चाहिए जहाँ हर कोई, चाहे जिस जाति का हो, एक साथ बैठ सकें, एक साथ भोजन कर सकें, पढ़-लिख सकें और जहाँ यही सिखाया जाता हो कि हर इंसान दूसरे के बराबर है!

हमारे स्कूल में व्यावहारिक उदाहरणों की सहायता से समानता का सिद्धान्त की शिक्षा – 24 अगस्त 2015

जो भी यहाँ एक बार भी आया है, हमारे स्कूल के बारे में जानने का उसे मौका अवश्य मिलता है। इन आगंतुकों में से अधिकांश लोग हममें से किसी एक के साथ चलकर स्कूल परिसर का दौरा अवश्य करते हैं और हमारे स्कूल के सिद्धांतों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं: अहिंसा और समानता।

जी हाँ, हमारा स्कूल बराबरी की नींव पर खड़ा है और यह इस विचार से उद्भूत है कि सभी बच्चों को एक समान होना चाहिए, चाहे वे कितने भी गरीब क्यों न हों। लेकिन यह विचार और आगे निकल गया: हमारे यहाँ जाति को लेकर कतई कोई भेदभाव नहीं किया जाता, जिसका चलन भारत भर के अधिकांश स्कूलों में आज भी मौजूद है! और यही बात धर्म को लेकर भी सही है कि हम किसी प्रकार का धार्मिक भेदभाव भी नहीं करते।

बिल्कुल, हमारे स्कूल में उच्च जाति के ब्राह्मणों, पुरोहितों-पंडितों के बच्चे भी पढ़ते हैं और बहुत से तथाकथित ‘अछूत जातियों’ के बच्चे भी। और हमारे यहाँ हिन्दू बच्चे भी पढ़ते हैं और मुसलमान बच्चे भी।

गरीबी धर्म और जातियों में कोई भेद नहीं करती! हम धार्मिक परिवारों के बच्चों को, सिर्फ इसलिए कि हम उनके विचारों और नज़रिए से सहमत नहीं हैं, भर्ती करने से इंकार नहीं करते! हम ऐसे बच्चों को भी शिक्षा प्रदान करते हैं, जो पूरी तरह धार्मिक परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। वे धार्मिक पाखंड में रचे-बसे माहौल में बड़े होकर यहाँ आते हैं और स्वाभाविक ही, वही विचार अपने साथ लेकर स्कूल आते हैं। घर में उनकी आस्थाएँ जो भी हों, अभिभावक उन्हें स्कूल भेजने में आर्थिक कठिनाई महसूस करते हैं और यही हमारे लिए भर्ती का एकमात्र मानदंड होता है।

और वे यहाँ सबसे प्रमुख बात यह सीखते हैं कि वे सब बराबर हैं। वे सब एक साथ अगल-बगल बैठते हैं, चाहे उनका परिवार किसी भी जाति या धर्म से संबंध रखता हो, एक साथ कतार में बैठकर भोजन करते हैं। वे सब हिल-मिलकर एक-दूसरे के साथ खेलते हैं और छुट्टी के बाद सब एक साथ अपने घर जाते हैं। अगर उनके अंदर बराबरी के विचार का यह बीज स्कूल में ही रोप दिया जाए तो भविष्य में कभी न कभी उनका मन घर में बचपन से सीखी गई बातों से अलग तरह से सोचने को तैयार होगा।

हमने आजकल एक नया काम शुरू किया है। हर शनिवार हमारे यहाँ कुछ बड़ी कक्षाओं के बच्चों आते हैं और विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हैं- निश्चित ही, नास्तिकता पर भी और जाति-प्रथा, अंधविश्वास, लैंगिक भूमिकाओं पर, सुंदरता के कथित आदर्श और दूसरे बहुत से विषयों पर।

पिछले सप्ताह हमने जाति-प्रथा पर चर्चा की थी और बच्चों ने बताया कि कैसे उनके घरों में उनके अभिभावक निचली जातियों के बच्चों के साथ खेलने से मना करते हैं। और कैसे वे उनसे छिपकर उनके साथ खेलने निकल जाते हैं- क्योंकि उन्हें ऐसे किसी अंतर का पता ही नहीं होता।

जाति-प्रथा को लेकर बच्चों की समझ बहुत सीमित होती है क्योंकि वैसे भी यह प्रथा पूरी तरह अतार्किक भेदभाव पर आधारित है और अगल-अलग समूहों में इस तरह लोगों को बाँटना पूरी तरह अर्थहीन है। लेकिन बचपन से उनके मन में लगातार यही विचार भरा जाता है जिससे वे भी अपने अभिभावकों जैसा व्यवहार करने लगते हैं और स्वाभाविक ही आपस में भी एक-दूसरे के साथ भेदभाव करते हैं। हम आशा करते हैं कि हम उनके भविष्य में बदलाव ला सकेंगे।

नहीं! हम सिर्फ आशा नहीं करते बल्कि हमें पूरा विश्वास है कि अवश्य ला सकेंगे। एक न एक दिन ये बच्चे आपस में मिलेंगे और अपने स्कूली दिनों की याद करेंगे। वे पुनः एक टेबल पर बैठकर हँसते-गाते, खुशी और संतोष के साथ याद करेंगे कि बचपन में भी वे इसी तरह साथ बैठकर भोजन किया करते थे!

हो सकता है कि वे एक दिन इस अन्याय के खिलाफ उठ खड़े हों। संभव है वे अपने बच्चों के साथ अलग तरह का व्यवहार करें। कुछ भी हो, वे इस समय यहाँ बराबरी का व्यवहार पा रहे हैं और निश्चित ही यह उनके जीवन में बदलाव लेकर आएगा।

जब परिवार वाले अस्पृश्यता पर अमल करें तब उनके प्रति आप सहिष्णु नहीं रह सकते – 24 दिसंबर 2014

कल मैंने एक ऐसी स्थिति का वर्णन किया था, जिससे बहुत से भारतीय नौजवानों को दो-चार होना पड़ता है: वे स्वयं प्रगतिशील हैं और आधुनिक विचार रखते हैं जबकि उनके परिवार वाले अभी भी उन्हीं दकियानूसी परंपराओं और आडम्बरों का पालन करते हैं, जिन्हें वे नौजवान अब बिलकुल पसंद नहीं करते। वे इस परिस्थिति पर शर्मिंदा होते हैं और मित्रों और अपने परिवार वालों के बीच किसी भी संपर्क को टालने की कोशिश करते हैं। कल मैंने यह भी कहा था कि आपको इतना संवेदनशील और सहिष्णु होना चाहिए कि दोनों के बीच शांति और सद्भावपूर्ण मिलाप का कोई रास्ता निकल सके। लेकिन कुछ ऐसी स्थितियाँ हो सकती हैं जहाँ मैं भी समझता हूँ कि यह संभव नहीं है। परिस्थितियाँ, जहाँ मैं कतई सहिष्णु नहीं हो सकता और दूसरों से भी यही कहूँगा कि इन मामलों में अपने विचारों पर ज़रा सा भी डगमगाए बगैर, दृढ़ता के साथ अड़े रहें!

इस तरह की समस्याएँ सिर्फ युवकों तक ही सीमित नहीं है, हर उम्र के लोग इस तरह की मुश्किलों में पड़ सकते हैं। अगर आपका परिवार और आपके प्रियकर बहुत परंपरावादी हैं जबकि आप उन दक़ियानूसी और मूर्खतापूर्ण परम्पराओं के सख्त विरोधी हैं तब किसी भी उम्र में ऐसी समस्याओं का सामना हो सकता है: जैसे जातिप्रथा के अंतर्गत आज भी जारी छूआछूत।

अगर आपके मित्र निचली जातियों से आते हैं और आपका परिवार आज भी उन्हें अछूत मानता है तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपस में मिलने पर उनके बीच भारी समस्याएँ पेश आएँगी। परिवार वाले अपने उन दोस्तों को घर लाने का समर्थन नहीं करेगे। वे उन्हें अलग गिलासों में पानी देंगे और जब आपके दोस्त चले जाएँगे तब उन सभी वस्तुओं को अग्नि में पवित्र करेंगे जिन्हें उन्होंने छुआ होगा। उनसे मिलने पर वे उनसे हाथ नहीं मिलाएँगे- वैसे यह ठीक ही होगा क्योंकि यह अभिवादन या स्वागत का भारतीय तरीका नहीं है- लेकिन वे भूल से भी उन्हें छूने से बचेंगे।

इससे आपको कितना बुरा लगेगा! इससे बुरी बात यह कि आपके मित्र को कितना बुरा लगेगा!

या अगर आपके परिवार के लोग सोचते हैं कि जो लड़कियाँ जींस या-उससे बढ़कर, स्कर्ट-पहनती हैं वे अश्लील या चरित्रहीन होती हैं जबकि ऐसी कई लड़कियाँ आपकी मित्र हैं तो आपको अपने परिवार वालों से नैतिकता के पाठ पढ़ने पड़ सकते हैं। हो सकता है कि आपकी माता-पिता आपसे कहें कि ‘ऐसे लोगों’ के साथ मत रहा करो! वे मानते हैं कि ऐसे लोगों का साथ आपके लिए नुकसानदेह है-लेकिन आप क्या सोचते हैं?

या हो सकता है, आपके माता-पिता अपनी जाति में आपका विवाह करना चाहते हों और इसके लिए दहेज़ लेना या देना चाहते हों, जिसके आप सख्त खिलाफ हों! क्या आप इसे भी अपने साथ की जा रही ज़्यादती नहीं मानेंगे?

ये ऐसे ही मामले हैं और ऐसे बहुत से दूसरे उदाहरण भी दिए जा सकते हैं। जब आप जानते हैं कि आपका परिवार ऐसी दकियानूसी परंपराओं में यकीन रखता है और उनके संस्कारों में पुरानी घृणित आदतों का बोलबाला है जो आपके जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं तो आपको दृढ़ता के साथ अपने विचारों पर अडिग रहना चाहिए। आप क्या स्वीकार कर सकते हैं इसकी एक सीमा है और उसके भीतर ही आप बिना पाखंड और दोगलेपन के जीवन गुज़ार सकते हैं!

मैं जानता हूँ कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं: या तो वे आपकी बात मान लेंगे या फिर आपके और आपके परिवार के बीच दूरियाँ पैदा हो जाएँगी। इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है-क्योंकि हमें संवेदनशील और सहिष्णु तो होना चाहिए मगर साथ ही हमें अपने जीवन की लगाम ऐसे व्यक्तियों के हाथ में नहीं सौंपनी चाहिए, जिनके जीवन मूल्य आपके विचारों से मेल नहीं खाते या जो दक़ियानूसी और हानिकारक परम्पराओं का अनुपालन करते हैं!

विपरीत ध्रुव एक दूसरे को आकृष्ट करते हैं! फिर अपनी ही जाति या उपजाति में विवाह पर इतना आग्रह क्यों? 22 अक्टूबर 2013

कल मैंने आपको पूर्णतः अलग पृष्ठभूमि और संस्कृति से आए और यहाँ तक कि अलग भाषा बोलने वाले व्यक्ति के साथ संबंध स्थापित करने पर होने वाले लाभों के बारे में बताया था। हमारे सारे तर्क इस बात की तरफ इंगित करते थे कि वे भिन्नताएँ संबंधों को ज़्यादा मजबूत और स्थायी बना सकते हैं। मज़ेदार बात यह है कि यहाँ, भारत में बच्चों की शादियाँ करते समय लोग इसके ठीक विपरीत रवैया अपनाते हैं: वे अपने युवाओं के विवाह न सिर्फ अपनी जाति में बल्कि अपनी ही उपजाति में तय करते हैं। स्वाभाविक ही, वे मानते हैं कि उनके बच्चे के, होने वाले जीवन-साथी का लालन-पालन भी उनके बच्चे की तरह ही हुआ होगा इसलिए वे एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे और उनके विवाह के सफल होने की संभावना अधिक रहेगी।

इस विचार के पीछे स्थित मूल इच्छा आसानी के साथ समझ में आती है। जब आप अपनी बेटी का विवाह किसी अजनबी के साथ करते हैं तो चाहते हैं कि वह किसी ऐसे घर में जाए, जिसका परिवेश और माहौल आपके घर जैसा हो, जहां पूरा परिवार उसी तरह सोचता-विचारता हो जैसा कि आप सोचते हैं, जहां आपकी संस्कृति और रीति-रिवाजों का पालन होता हो। इसी तरह जब कोई नई लड़की विवाह के बाद आपके घर रहने आती हैं तो आप चाहते हैं कि, जहां तक संभव हो, पहले से उसे आपके घर के रीति-रिवाजों का ज्ञान हो। तो अगर आप अपने बच्चों की अरेंज्ड मैरेज करना चाहते हैं तो निश्चय ही यह एक संतुलित और तर्कसंगत विचार है।

समस्या यह है कि यह तरीका ही अपने आप में एक बीमार व्यवस्था पर आधारित है, जो लोगों को जाति प्रथा में जकड़ती है और उन्हें उच्च और निम्न वर्ग के बीच विभाजित करती है। लोग सिर्फ इस बात पर ही विश्वास नहीं करते कि एक ही जाति के लोगों के घरों में एक जैसा सांस्कृतिक वातावरण होता है-वे यह भी मानते हैं कि नीची जातियों के लोग गंदे (घृणास्पद) होते हैं, उनके सामने उस जाति के लोगों की कोई औकात नहीं है और उस जाति में विवाह संबंध स्थापित करने पर उनका लड़का या लड़की किसी भी हालत में सुखी नहीं हो सकते। तो, यह सिर्फ अपने बच्चे के लिए किसी समझदार जीवन-साथी के साथ सुखमय जीवन की कामना ही नहीं है बल्कि यह कुछ दूसरे मनुष्यों के प्रति आपकी घृणा का खुला प्रदर्शन भी है।

फिर यह बात भी पूरे दावे के साथ नहीं कही जा सकती कि एक ही जाति या उपजाति के लोगों के बीच बेहतर आपसी समझ होती है या उनके घरों में एक जैसी संस्कृति पाई जाती है और इसलिए हर हाल में दोनों एक-दूसरे के अनुरूप होते ही हैं। इसके विपरीत, हर व्यक्ति का एक अलग व्यक्तित्व होता है और हर परिवार में लोगों के अपने-अपने अलग जीवनानुभावों के अनुसार हर एक में अलग दृष्टिकोण का विकास हो सकता है, जो उस परिवार के माहौल को भी प्रभावित और परिवर्तित करता है और घर के बढ़ते बच्चों के चरित्र और नज़रिये पर भी असर डालता है, जिससे ये बच्चे भी अपना अलग व्यक्तित्व विकसित करते हैं।

जब आप किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करते हैं कि वह आपके जैसा हो तो आप नव विवाहित दंपति से आपस में दो स्वतंत्र व्यक्तियों के रूप में मधुर संबंध स्थापित करने की स्वतन्त्रता छीन लेते हैं, जो दो अलग-अलग संस्कृतियों से आए दंपति को सहज प्राप्त होती है। आप बदलने के लिए तैयार नहीं हैं, किसी नई बात के प्रति सहिष्णु नहीं हैं, इसके बावजूद कि इसका अर्थ आपके लड़के या लड़की को सुखी और दीर्घजीवी संबंध स्थापित करने की दिशा में ज़्यादा सुविधाएं मुहैया कराना हो सकता है!

तो मेरे प्रिय भारतीय मित्रों, भले ही आप यह बात न मानें कि जाति प्रथा एक अमानवीय परंपरा है और जल्द से जल्द इसका खात्मा किया जाना चाहिए, लेकिन कम से कम इस तथ्य को नज़रअंदाज़ न करें कि एक ही जाति या उपजाति का होना इस बात की कोई जमानत (गारंटी) नहीं हैं कि आपकी लड़की या लड़के का वैवाहिक जीवन सुखी और दीर्घजीवी सिद्ध होगा। अगर वे किसी दूसरी जाति में अपने प्रियकर से विवाह करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा करने से रोकने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर लें। हो सकता है कि उन्होंने किसी ऐसे व्यक्ति को खोज लिया हो, जिसे पहली नज़र में आप पहचान न पा रहे हों मगर जो भविष्य में आपके दिल के भी करीब साबित हो! नए के प्रति खुला रवैया अपनाएं और मुझे विश्वास है कि उस, अलग नज़र आने वाले व्यक्ति में आपको बहुत से नए और आकर्षक गुण नज़र आएँगे!

धर्म में विरोधाभास – पिछले जन्मों के कर्म आपके पास हैं या नहीं? – 4 फरवरी 2013

पिछले सप्ताह मैंने हिन्दू धर्म में पाई जाने वाली विवादास्पद दार्शनिक मान्यताओं के बारे में लिखा था। मैंने कर्म के दर्शन के बारे में लिखते हुए यह प्रश्न उठाया था कि लोग स्वर्ग जाने के लिए गंगा नदी में कुम्भ स्नान करते हैं या मुक्ति पाने के लिए! आज मैं कर्म के दर्शन में पाई जाने वाली एक और विवादास्पद मान्यता के बारे में लिखता हूँ जो आपको हैरान कर देगी।

मैं पहले ही समझा चुका हूँ कि हिन्दू धर्म में स्वर्ग और नर्क ऐसे स्थान हैं जहां आप या तो अपने कर्मों के ऋण की सज़ा पाते हैं या फिर अपने कर्मों की जमा-राशियों के अनुपात में पुरस्कृत होते हैं। अगर आपने अपने बुरे कर्मों का प्रायश्चित्त कर लिया है और पर्याप्त समय नर्क में बिताया है या आपके पास अतिरिक्त अच्छे कामों का खज़ाना था और अब आपने उसे स्वर्ग में पर्याप्त समय बिताकर खर्च कर दिया है तो आपको पुनः जन्म लेना होगा और आपके कर्मों की जमा-राशि होगी शून्य, जैसा एक नए जमा खाते में होता है।

लेकिन मुझे विश्वास है कि आपने ऐसी कहानियाँ भी सुनी होंगी जिसमें पिछले जीवन से सबक लेने की बात कही जाती होगी, पिछले जन्मों के कर्मों के सुधार के लिए कहा जाता होगा और इस जीवन की घटनाओं को पिछले जन्म के कर्मों के फल के रूप में भुगतने की बात की जाती होगी। यह भी एक विचार है जिसका जन्म भारत में हुआ है, हिन्दू धर्म के अंतर्गत।

एक विचार यह है कि आप इस जन्म में बुरे कर्म करते हैं तो अगले जन्म में बुरे कर्मों के फल के रूप में निचली योनि में आपका जन्म होगा, जैसे कुत्ते की योनि में। अगर आपने बहुत से अच्छे कर्म किए हैं तो आप पुरस्कार स्वरूप अगले जन्म में बेहतर जीवन प्राप्त करेंगे। धनी व्यक्तियों के लिए, जो बहुत भाग्यशाली माने जाते हैं, यह समझा जाता है कि उन्होंने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किए होंगे जबकि जो गरीब परिवारों में जन्मे हैं या जो गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, खासकर जन्म से, उनके लिए समझा जाता है कि उनकी ऐसी दयनीय हालत पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों का नतीजा है। निचली जातियों के लोगों के लिए आम तौर पर यह माना जाता है कि पिछले जन्म में उन्होंने अच्छे कर्म नहीं किए थे जबकि उच्च जाति के लोगों के बारे में यह माना जाता है कि उनके पास पिछले जन्म के अच्छे कर्मों का खज़ाना है।

अब इस दर्शन में, सिद्धांत में या इस सोच में दो जन्मों के बीच कोई स्वर्ग या नर्क नहीं है। जो कुछ भी होता है यहीं इसी धरती पर होता है, जीवित अवस्था में होता है। आप अपने कर्मों की गठरी अपने साथ ढोकर अगले जन्म में ले जाते हैं। जब आप ऐसे बिन्दु पर पहुँच जाते हैं जहां आप कोई अच्छे या बुरे कर्म नहीं करते, आप मुक्त हो जाते हैं। तो इस तरह आप देखते हैं कि ये दो सिद्धांत या विचार किस तरह एक-दूसरे के साथ संगति नहीं बना पाते! आप या तो यह विश्वास करें कि आप बिना किसी कर्म के, यानी शून्य कर्मराशि के साथ इस धरती पर जन्म लेते हैं या फिर पिछले जन्म के सम्पूर्ण कर्मों के साथ जन्म लेते हैं। दोनों बातें एक साथ ठीक नहीं हो सकतीं, लेकिन हिन्दू धर्म इतना लचीला है कि वह अपने मानने वालों को अपनी पसंद की किसी भी बात को सच मानने की आज़ादी देता है।

अगर आप समझते हैं कि साधु, जो सभी दुनियावी या भौतिक चीजों से अनासक्त होते हैं, बहुत धर्मपरायण होते हैं जो दूसरों की भलाई के लिए ऐसा कर रहे हैं तो आप बिल्कुल गलत समझ रहे हैं। वे दूसरों की कोई भलाई नहीं करना चाहते, वे कोई अच्छा काम नहीं करना चाहते कि उनके अच्छे कर्म जमा हों। वे सिर्फ मुक्त होना चाहते हैं, इसलिए न तो अच्छे कर्म करते हैं न ही बुरे।

इस सिद्धांत के विपरीत एक और प्रवृत्ति का जन्म हुआ, बहुत से लोगों द्वारा अपनाई गई एक जीवन पद्धति, विशेषकर यहाँ, वृंदावन में: ये लोग प्रेम और समर्पण में जीना चाहते हैं। वे अच्छे कर्म करना चाहते हैं जिससे ज़्यादा से ज़्यादा अच्छे कर्म वे जमा कर सकें और बार-बार जन्म ले सकें। वे मुक्ति नहीं चाहते, वे इस धरती पर बार-बार लौटना चाहते हैं जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा समय प्रेम और समर्पण की अवस्था में रह सकें।

क्या आप नहीं देख रहे हैं कि यह सब इस पर निर्भर करता है कि आप किस तरह शब्दों का हेर-फेर कर पाते हैं? क्या आप यह नहीं देख रहे हैं कि आप अपनी पसंद के अनुसार, अपनी सुविधा के अनुसार चुनाव कर सकते हैं। एक बार आप इसे समझ लें तो आप तुरंत समझ जाएंगे कि धर्म छल-कपट के सिवा कुछ नहीं है!