एक से अधिक सेक्स पार्टनर के साथ आपसी संबंधों में रोमांच, थ्रिल, उत्तेजना और असफलता – 1 दिसंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे बहुत से खुले संबंध टूटने लगते हैं क्योंकि संबंधित लोग वास्तव में खुला और स्वतंत्र होने के स्थान पर मुख्य पार्टनर के साथ अपने संबंध में लिप्त रहे आते हैं। एक और परिस्थिति है, जिसका सामना होने पर भी अक्सर संबंध टूटते हैं: जब पार्टनरों में से कोई एक अपने साथी में रुचि खो देता है, क्योंकि एक के साथ अधिक समय बिताने के बाद वह उससे बोर होने लगता है!

आप भी जानते हैं कि शुरू में सब कुछ बड़ा उत्तेजक और रोमांचक लगता है लेकिन कुछ हिचकिचाहट भी होती है: इन संबंधों को समाज उचित नहीं मानता अर्थात समाज में यह एक टैबू ही है। इसलिए वे डरते हैं कि लोगों को पता चलने पर वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? या भविष्य में किसी दिन मुझे पता चलेगा कि मैं ज़िन्दगी भर वैश्यागीरी करता रहा? सबसे प्रमुख संबंध यानी जिसके साथ सबसे पहले संबंधों की शुरुआत हुई थी, एक तरह की सुरक्षा जैसा होता है, एक सुरक्षित सहारा-समाज के दूसरे लोगों के सन्दर्भ में भी और खुद अपनी भावनाओं और विचारों के सन्दर्भ में भी। यह एक सुविधाजनक ढाँचा होता है, जिसकी कार्यविधि और व्यवस्था के बारे में आपको पता होता है कि वह कैसे काम करता है और दूसरे सेक्स संबंधों के रोमांच से तुष्ट होकर या ऊबकर आप पुनः जिसके पास निःसंकोच वापस जा सकते है।

लेकिन कुछ समय बाद वे इस रोमांच से आश्वस्त होते जाते हैं। बार-बार पार्टनर बदलने की उन्हें आदत पड़ जाती है बल्कि इस जीवन-शैली को अपनाने वाले ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है। आप तुरंत अनुमान लगा सकते हैं कि उसके बाद क्या होता होगा: उन्हें किसी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती!

नियमित रूप से किसी एक व्यक्ति के साथ रहना बहुत उबाऊ हो जाता है, बहुत से उत्तेजक, विविधतापूर्ण, नए से नए और तैयार विकल्प मौजूद होते हुए किसी एक के साथ रहना! सीधी सी बात है, खुले संबंध में भी सुदीर्घ संबंधों के कारण होने वाली दिक्कतों को क्यों भुगता जाए?

पहला मुख्य पार्टनर जो दे सकता है, वह अब इतना आकर्षक नहीं रह गया है कि उसी के साथ रहने की कोई मजबूरी हो। अगर दोनों एक जैसा महसूस कर रहे हों तो ये संबंध आपसी समझौते के तहत बिना किसी बड़ी मुसीबत के समाप्त हो जाते हैं और दोनों अपने-अपने अलग रास्तों पर निकल पड़ते हैं। अगर दोनों की जीवन शैली यही है तो भविष्य में वे एक रात के साथियों की तरह मिल भी सकते हैं लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

लेकिन अगर दोनों में से सिर्फ एक की जीवन शैली ऐसी है तो दूसरे का दुखी होना अपरिहार्य है और पता चलते ही वह इन खुले संबंधों को कोसना शुरू कर देगा और उसका अहं यह सोचकर चोट खा सकता है कि सामने वाले को कभी भी उससे अधिक प्रिय व्यक्ति नहीं मिल सकेगा! पूरी संभावना होती है कि ऐसा व्यक्ति स्थिर संबंध की ओर वापस लौट आए, जिसमें इतना अनुशासन होगा कि अपने मुख्य संबंध के बाहर किसी और से सम्भोग का त्याग कर दे। जब आप इस दर्द का अनुभव कर लेते हैं तो उसके बाद उन्हीं खुले संबंधों के अनुभव को आप दोहराना नहीं चाहेंगे!

लेकिन इस प्रकरण के सन्दर्भ में मूल समस्या दूसरी है: जब लोग सेक्स को प्यार से नहीं जोड़ते। लेकिन उस विषय पर विस्तार से कल…

किसी अकेली विदेशी महिला का भारत में सुरक्षित रूप से सफर करना! 20 अक्टूबर 2014

वे लोग, जिन्होंने हमारे न्यूज़लैटर को सब्सक्राइब किया है, जानते होंगे कि हमने अपनी वेबसाइट पर एक नया पृष्ठ शुरू किया है: अकेली महिलाओं के लिए भारत भ्रमण

अगर आप उस पेज पर जाएँ तो पाएँगे कि वहाँ किसी नए पर्यटन का या किसी नई यात्रा का प्रस्ताव नहीं किया गया है। हम वहाँ अपनी सामान्य और नियमित यात्राओं का ही उल्लेख कर रहे हैं और विशेष रूप से महिलाओं से कह रहे हैं कि अगर वे चाहें तो हम अपने आश्रम के किसी गाइड के साथ भारत भर में कहीं भी उनके सुव्यवस्थित और सुरक्षित पर्यटन का इंतज़ाम कर सकते हैं। आश्रम में आने वाले मेहमानों की मांग पर हम पहले से ही किसी गाइड के साथ अकेले यात्राओं की व्यवस्था करते ही रहे हैं। फिर हमने यह अतिरिक्त पृष्ठ क्यों शुरू किया और उसे सिर्फ महिलाओं पर क्यों केन्द्रित किया?

उन महिलाओं की सुविधा के लिए, जिनके साथ यहाँ आने वाला कोई नहीं है, भारत भ्रमण का उनका सपना पूरा करने के उद्देश्य से! आजकल भारत से इतने ज़्यादा नकारात्मक समाचार आ रहे हैं कि लोग यहाँ आने में घबराते हैं, खासकर महिलाएँ, यहाँ उनके विरुद्ध होने वाले भयंकर अपराधो की खबरों से हर वक़्त दहशतज़दा रहती हैं! वे यहाँ आने में हिचकिचाती हैं क्योंकि वे अपने परिवार वालों और मित्रों से सुनती रहती हैं: 'तुम भारत क्यों जाना चाहती हो? वह भी अकेले!'

इसलिए वे महिला पर्यटक भी, जिन्होंने हमसे सारी जानकारियाँ हासिल कर ली होती हैं और अंतिम रूप से यहाँ आने का निश्चय कर चुकी होती हैं, वे भी हमसे बार-बार पूछती रहती हैं: 'क्या भारत में अकेले घूमना सुरक्षित होगा?' क्या अपने करीबी लोगों के डर की अनदेखी करनी चाहिए या कहीं और जैसे मयोरका (स्पेन), इटली, फ्लोरिडा या कैलिफ़ोर्निया चले जाना चाहिए।

इन प्रश्नों पर मैंने पूरे चार ब्लॉग लिखे हैं, जिनमें मैंने कुछ सुरक्षात्मक उपाय सुझाए हैं और कुछ टिप्स दिए हैं कि आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। हम हमेशा कहते आए हैं कि आइए, अवश्य आइए, डरिए नहीं, यहाँ यात्रा करना पूरी तरह सुरक्षित है-हालांकि यह बहुत आसन भी नहीं है!

जी हाँ, आप ऐसा कर सकती हैं। आप भारत आ सकती हैं और अगर आपके पास पर्याप्त जानकारी है, अगर आपको ठीक-ठीक पता है कि आप किधर जा रही हैं और ऐसा करते हुए आपको किन बातों का ख़याल रखना चाहिए, तो पूरी संभावना है कि वास्तव में आपका सफर आनंददायक सिद्ध हो। हम लोगों से हमेशा कहते हैं कि पेरिस में भी आप कुछ अंधेरी जगहों में यूँ ही निरुद्देश्य भटकते नहीं रह सकते! आप पहले से पता कर लेते हैं कि वहाँ घूमना-फिरना सुरक्षित होगा या नहीं और यह भी कि वहाँ से वापस घर किस तरह लौटना है।

लेकिन बहुत सी महिलाएँ असुरक्षा के साए में यात्रा नहीं करना चाहेंगी। मैं समझ सकता हूँ- अगर आप सुरक्षित महसूस नहीं करतीं तो आपको बाहर निकलना अच्छा नहीं लगेगा! खुद को आप सबसे बेहतर तरीके से जानती हैं और समझ सकती हैं कि रिक्शा या टॅक्सी लेने जैसे छोटे-मोटे काम अंजाम देते वक़्त भी आपको बहुत सतर्क रहना पड़े तो आपकी यात्रा का मज़ा किरकिरा हो सकता है।

भारत में निडर होकर यात्रा कर पाएँ, इस उद्देश्य से हम ऐसी महिलाओं की मदद करना चाहते हैं, जिससे वे भारत भ्रमण का अपना सपना पूरा कर सकें और यहाँ की यात्राओं का आनंद उठा सकें। आपका ईमेल प्राप्त होते ही हम आपके साथ होंगे और फिर आपके कार्यक्रमों की विस्तृत रूपरेखा तैयार करते हुए आगे की यात्राओं में और उस दिन तक साथ रहेंगे, जब हम आपको घर-वापसी के लिए विमानतल पर बिदा नहीं कर देते!

तो, अगर आप भारत आना चाहती हैं लेकिन भारत भ्रमण पर अकेले नहीं निकलना चाहतीं, अगर आपके मन में कोई हिचकिचाहट है और मन में डर की भावना लिए यात्रा नहीं करना चाहतीं तो हमें सिर्फ एक ईमेल कीजिए। हमें बताइए कि भारत आकर आप क्या करना चाहती हैं, क्या-क्या देखना चाहती हैं, कहाँ-कहाँ घूमना चाहती हैं और हम उसी वक़्त से आपकी यात्रा की प्लानिंग करना शुरू कर देंगे! इससे आपकी बहुत सी चिंताएँ और परेशानियाँ दूर हो जाएँगी। सबसे महत्वपूर्ण यह होगी कि स्थानीय पुरुष के साथ होने के कारण आप सुरक्षित महसूस करेंगी।

लेकिन, अगर आप एक पुरुष भी हैं और चाहते हैं कि हम आपके साथ चलें तो आपका भी स्वागत है, आप भी ईमेल भेज सकते हैं।

मैं पुनः कभी दक्षिण अफ्रीका क्यों नहीं जाऊँगा? 19 अक्टूबर 2014

सन 2006 में अपनी बहन के विछोह और दुःख के साए में हमारा समय कटता रहा। एक सीमा के बाद लगने लगा कि हमारे सारे आँसू बहकर निकल चुके हैं। मैं और यशेंदु उसके बाद एक माह या शायद उससे कुछ अधिक भारत में ही रहे और उसके बाद अपनी-अपनी हवाई यात्राओं पर निकल पड़े। वह जर्मनी चला गया और मैं वापस दक्षिण अफ्रीका की ओर निकल पड़ा।

बहन के अपघात से पहले दक्षिण अफ्रीका में मैं सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही रहा था। वह दक्षिण अफ्रीका का बल्कि अफ्रीका का ही मेरा पहला दौरा था-और आज तक का वह पहला दौरा ही बना हुआ है। मैं नहीं कह सकता कि मैंने उसे ज़्यादा पसंद किया था।

जोहंसबर्ग में मैं अपने व्यक्तिगत-सत्र आयोजित करता रहा, व्याख्यान भी दिए और कुछ कार्यशालाएँ भी आयोजित कीं। इस कारण मैं भारतीयों के यहाँ तो रहता ही रहा लेकिन कुछ गैर भारतीय दक्षिण अफ्रीकियों से भी मेरा संपर्क हुआ। स्वाभाविक ही मेरे बाकी के कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए थे लेकिन मेरे आरक्षित टिकिटों के कारण, जो दक्षिण अफ्रीका से भारत और भारत से वापसी के टिकिट थे, मुझे उस देश में दो दिन और रुकना था।

मुझे बहुत अच्छा कतई नहीं लग रहा था। मैं अशांत और असुरक्षित महसूस कर रहा था। हर जगह, जहाँ मैं रुका हुआ था और जहाँ भी मैं गया, बिना किसी अपवाद के सभी मकानों में तारों की बड़ी-बड़ी बाड़ें या दीवारें खड़ी की गई थीं और उनके ऊपर सुरक्षा हेतु काँटेदार तार बिछाए गए थे और मुझे बताया गया कि अधिकतर इन तारों में बिजली का करंट भी प्रवाहित कर दिया जाता था, जिससे अनधिकृत प्रवेश करने वालों को बिजली का झटका लगे।

मैंने अपने प्रायोजकों से पूछा कि क्या वहाँ बहुत अधिक अपराध होते हैं तो उन्होंने बताया- और जिसकी बहुत से दूसरे लोगों ने भी ताईद की- कि वहाँ अपराधों की संख्या खतरनाक रूप से बहुत ज़्यादा है! एक परिवार ने, जिसने मुझे भोजन के लिए आमंत्रित किया था, बताया कि सिर्फ दो-तीन माह पहले ही सारे सुरक्षा इंतजामों के बाद भी अपराधियों ने उनका ऑफिस लूट लिया था।

स्वाभाविक ही, ऐसी बातों का बखान करते वक़्त लोग कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं लेकिन जब भी मैं बाहर निकलता, यह बात मेरे दिमाग में बनी रहती। सिर्फ मोबाइल के लिए कोई आपकी जान भी ले सकता है। या पाँच डॉलर जेब में रखकर बाहर निकलना भी खतरे से खाली नहीं है।

मुझसे कहा गया कि शाम के वक़्त, बाहर अँधेरे में पैदल घूमने न निकलूँ। सिर्फ दिन में और वह भी सिर्फ सुरक्षित इलाकों में ही आप पैदल घूम सकते हैं- और बेहतर हो, अगर कार का उपयोग करें। मुझे याद आया मेरे दो दोस्तों ने बताया था कि वे वहाँ छुट्टियाँ बिताने गए थे और इसी तरह उन्हें लूट लिया गया था। मैं जानता था कि बहुत से लोगों को दक्षिण अफ्रीका बहुत पसंद आता है और वे पर्यटन के लिए यहाँ जाते हैं।

लेकिन मुझे वहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। एक ऐसी जगह, जहाँ हर वक़्त खतरा आपके दिमाग पर हावी हो और आपका बाहर निकलकर पैदल घूमना-फिरना भी मुहाल हो। तो फिर ऐसी जगह दोबारा क्यों जाया जाए, जहाँ आप सुरक्षित महसूस नहीं करते? जहाँ आपको लगे कि अपनी सुरक्षा को लेकर हर वक़्त चौकन्ना रहना होगा?

किसी तरह दो दिन और गुज़ारकर मैंने उस जगह से बिदा ली और जर्मनी के लिए हवाई जहाज़ पकड़ा!

मुझे दक्षिण अफ्रीका आने का निमंत्रण बाद में फिर मिला मगर मैंने इंकार कर दिया। मेरे लिए एक बार का अनुभव ही बहुत था।

अपने बच्चों को डराएँ नहीं! उन्हें बताएँ कि आप हर वक़्त उनके साथ खड़े हैं! 17 अप्रैल 2014

कल मैंने आपको अपरा के अस्पताल दौरे के बारे में बताया था, जहाँ सिर्फ एक वाक्य से एक माँ ने उसे इतना चिढ़ा दिया कि फिर वह उस माँ के नवजात शिशु को देखकर अपने दिल में उमड़े सारे प्रेम और आश्चर्य को भूल गई। भारत में बच्चों के साथ ऐसे मजाक असामान्य नहीं है इसीलिए मैं पहले भी इस विषय पर लिखता रहा हूँ। लेकिन मुझे अत्यंत आश्चर्य होता है कि क्या लोग बच्चों की भावनाएं समझ ही नहीं पाते या क्या कि वे उन भावनाओं की परवाह नहीं करते।

अपरा के साथ हमने इस बात को अनगिनत बार महसूस किया है। जब हम अपने किसी मित्र के यहाँ जाते हैं तो, चाहे एकाध घंटे के लिए ही वहां क्यों न बैठें, इस बात की 100% सम्भावना होती है कि वहां उपस्थित कोई न कोई यह कहेगा: "तुम आज हमारे यहाँ रुक जाओ! जाने दो सबको, घर!"

बधाई हो! एक घंटे के लिए आपके घर क्या आए आपने हमारी बच्ची पर ऐसा प्रभाव छोड़ा कि अब वह आपके घर कभी नहीं आना चाहती। जी हाँ, उसने मुझसे यही कहा है, आपके घर के दरवाजे से बाहर निकलते ही! "चलो, घर चलते है। अब इनके यहाँ मैं कभी नहीं आऊंगी"।

मैं जानता हूँ कि आप यह नहीं चाहते कि वह न आए लेकिन यह बात वह नहीं समझती! मैं यह भी जानता हूँ कि आप उसके भीतर इस तरह की भावना पैदा करना नहीं चाहते मगर क्या आप इतना भी नहीं समझ पाते कि आप ठीक यही कर रहे हैं? मुझे पता है कि यह एक बहुत सामान्य आदत है लेकिन क्या आप यह नहीं सोचते कि यह एक बुरी आदत है?

अभिभावक खुद अपने बच्चों के साथ भी अक्सर यही करते हैं। मैं कहना चाहूँगा कि मुझे उन बच्चों के लिए वाकई बड़ा दुःख होता है, जब वे सपरिवार हमारे यहाँ आए होते हैं और वापस जाते समय बच्चे की माँ या पिता कहेंगे, "मैं घर जा रहा हूँ, रहो तुम यहीं!" रुकिए, न सिर्फ मैं उन बच्चों के लिए दुखी हो रहा हूँ, वास्तव में मैं नहीं चाहता कि आप मेरे साथ भी यह करें! अगर आप मेरे घर में उसे ऐसी धमकियाँ देंगे तो आपका बच्चा मेरे साथ एक मिनट रहना नहीं चाहेगा, न हमारे यहाँ कभी रुकना चाहेगा!

आप अपने बच्चों को क्या दर्शाना चाहते हैं? स्वाभाविक ही, जो मैं अपने बच्चे को सिखाना चाहता हूँ, उसका विपरीत! मैं चाहता हूँ कि मेरी बच्ची को हर वक्त यह पता रहे कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं उसके साथ खड़ा रहूँगा। मैं उन जगहों में उसके साथ रहूँगा, जहाँ वह असुविधा महसूस करती है। मैं उसे सुविधाजनक माहौल दुंगा, मेरी गोद उसकी सुरक्षित जगह होगी और अगर उसे ज़रूरत पड़े तो मेरी बाहें उसकी छिपने की जगह बनेंगी। उसे कभी यह न लगे कि मैं उसके पास नहीं हूँ। जब कुछ गलत करने पर मैं उसे डांटता हूँ, हम गले लिपट जाते हैं। मैं उसे दिखाना चाहता हूँ कि उस पर नाराज़ होने के बावजूद और उसे वह गलती फिर से न करने की कड़ी हिदायत देने के बाद भी मैं उससे प्रेम करता हूँ और मैं हमेशा उसके लिए, उसके पास मौजूद हूँ।

आप कभी नहीं पाएंगे कि जब वह खेल रही है और अच्छे मूड में है, मैं अपनी बेटी को चिढ़ा रहा हूँ, उससे कह रहा हूँ कि मैं उसे छोड़कर चला जाऊँगा। मैं उसे डरा हुआ नहीं देखना चाहता। मैं नहीं चाहता कि वह रोए और दया की भीख मांगे। मैं अपनी बेटी को खुश देखना चाहता हूँ।

और आप क्या चाहते हैं?

भारत भ्रमण पर आई गोरी महिलाओं को क्या नहीं करना चाहिए! भाग दो – 4 फरवरी 2014

अकेले भारत भ्रमण पर आई पश्चिमी महिलाओं को कल मैंने कुछ सुझाव दिये थे, जिसमें मैंने बताया था कि उन्हें क्या-क्या नहीं करना चाहिए। उसी क्रम में मैं कुछ और महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए आज अपनी बात समाप्त करूंगा।

4- पुरुषों के साथ छेड़-छाड़ और हंसी मज़ाक न करें

जी हाँ! आपको यह बात अविश्वसनीय लग सकती है मगर इसे स्पष्ट करना आवश्यक है। आप सोचेंगे कि जब महिलाएं पहले से ही पुरुषों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित न हो इसके लिए परेशान रहती हैं तो फिर उन्हें इसके लिए आगाह करने की क्या ज़रूरत है लेकिन यह अक्सर होता रहता है। वे समझ नहीं पातीं कि उनके शब्दों और चुहल, छेड़-छाड़ का भारत में क्या अर्थ लिया जाता है, भले ही वे ऐसा बेखबरी में कह या कर रही हों।

शब्दों का इस्तेमाल सोच-समझकर करें, कहने के तरीके और हाव-भाव पर ध्यान रखें। यह तो स्पष्ट है कि आप इश्कबाज़ी नहीं कर रही हैं, किसी दूसरी संस्कृति के बीच होने के कारण इसकी कतई संभावना नहीं है। जैसा कि मैंने अपने अमरीकी मेहमानों को अक्सर कहते देखा है, जिस व्यक्ति से आप बात कर रही हैं उसे ‘हनी’ या ‘स्वीटी’ न कहें। भारत में स्नेह के ये बेफिक्र शब्द दैनंदिन व्यवहार में हर किसी के लिए प्रयोग नहीं किए जाते। ये लाड़-भरे शब्द सिर्फ अपने बहुत करीबी लोगों के लिए ही उपयोग में लाए जाते हैं।

इसी तरह किसी दूसरे व्यक्ति (पुरुष) को स्पर्श करने से बचें। कुछ देशों में बातों-बातों में सामने वाले के कंधे पर हाथ रख देना सामान्य बात है, चाहे वह पुरुष हो या महिला। मगर भारत में ऐसा नहीं होता और पुरुष और महिलाओं के बीच शारीरिक स्पर्श वैसे भी इतना दुर्लभ होता है कि आपके ऐसे स्पर्श से कोई भी पुरुष यह समझ सकता है कि आप उसकी ओर आकृष्ट हैं और उसमें रुचि ले रही हैं।

5- यूं ही किसी सड़क-चलते अनजान पुरुष से दोस्ती न करें।

इस बिन्दु पर कुछ लोग कहेंगे कि मैं हमारी पश्चिमी महिला मेहमानों को स्थानीय लोगों से विमुख कर रहा हूँ, उन्हें खुलकर लोगों से मिलने-जुलने से मना कर रहा हूँ, जबकि अक्सर मैं उनके खुले मन से घुल-मिलकर रहने का समर्थन करता रहा हूँ। लेकिन खुलकर मिलना और किसी के साथ संबंध बना लेना दो अलग-अलग बातें हैं। जी हाँ, आपको खुलेपन के साथ सबसे मिलना-जुलना चाहिए, जिससे आप अपने समय का भरपूर आनंद उठा सकें, लोगों के साथ उन्मुक्त चर्चा कर सकें, अपने क्षितिज का विस्तार कर सकें। लेकिन ऐसा हर किसी राह-चलते के साथ करना उचित नहीं होगा।

वास्तव में अगर आप किसी पुरुष के बारे में कुछ भी नहीं जानतीं, जहां आप रह रही हैं उससे उस पुरुष का कोई संबंध नहीं है या वहाँ उसका कोई दोस्त नहीं है तो मैं यह सुझाव दूंगा कि ऐसे व्यक्ति से अपने मन की सारी बातें न कहें, अपने बारे में अधिक न बताएं, उसके साथ अकेले में न मिलें, खासकर तब, जब कोई नहीं जानता कि आप कैसी जगह पर उपस्थित हैं। आप नहीं जानतीं कि वह कौन है, उसका मकसद क्या है और वह आपसे इतनी बातें क्यों करना चाहता है। ठीक है कि वह एक सामान्य, उत्सुक व्यक्ति हो सकता है, जो एक पश्चिमी व्यक्ति को अपना मित्र बनाना चाहता हो। लेकिन आप यह निश्चित रूप से नहीं जानतीं। कोशिश करें कि पुरुष हों या महिलाएं, उन्हीं नए व्यक्तियों से संबंध बनाएँ, जिनका आपके किसी परिचित के साथ संबंध हो। इस तरह आप निरापद रह सकेंगी।

6- अगर आप पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं तो अकेले बाहर मत निकलिए

इन सबके बावजूद भी अगर आप अपनी सुरक्षा के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं तो फिर अकेले अपनी ज़िम्मेदारी पर विदेश घूमने मत निकलिए। मैं आपसे भारत न आने के लिए नहीं कह रहा हूँ! सिर्फ यह कि अकेले घूमने न निकलिए। किसी मित्र को अपने साथ आने के लिए मनाइए या किसी टूर कार्यक्रम में शामिल हो जाइए। ऐसे टूर कार्यक्रम हम लोग भी पेश करते हैं। किसी सुनियोजित समूह के साथ यात्रा कीजिये या कोई व्यक्तिगत गाइड कर लीजिए। जब आपके साथ कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो इस देश को और यहाँ की संस्कृति को अच्छी तरह जानता है तो फिर आप न सिर्फ सुरक्षित महसूस करेंगी बल्कि इस देश को बेहतर ढंग से जान पाएँगी और आपकी जानकारियाँ और अनुभव ज़्यादा प्रामाणिक होंगे। ऐसा अनुभव आपको अकेले घूमने पर प्राप्त नहीं होगा।

मुख्य बात यह कि अगर आप थोड़ा तैयारी के साथ आएँ तो भारत आते हुए असुरक्षित महसूस नहीं करेंगी। अगर आप चाहें तो अपना टूर कार्यक्रम आयोजित करने के लिए हमसे कह सकती हैं, जिससे आप बहुत से झंझटों से बच जाएंगी और इस देश का बेहतर अनुभव प्राप्त कर सकेंगी। अगर आपकी इच्छा है और आप कई सालों से यहाँ आने का सपना बुन रही हैं तो फिर उसे पूरा करने का अवसर आपके सामने प्रस्तुत है।