आजकल हम एक साथ बहुत से कार्यक्रमों की तैयारी में व्यस्त हैं! 8 नवंबर 2015

मैं जानता हूँ कि मैं आपको कई बार बता चुका हूँ कि इस समय हम लोग कितने व्यस्त हैं-और यह व्यस्तता कल अचानक और बढ़ गई! जर्मनी से आठ बड़े खूबसूरत लोगों का एक दल हमारे यहाँ दो हफ्ते होने वाले समारोह का आनंद लेने आ पहुँचा है! हम इस समय पूरी तरह व्यस्त हैं-और हमें यह अच्छा लग रहा है!

पिछले कुछ दिनों से हम अपने सामान्य कामों में और इस दल के स्वागत-सत्कार की तैयारियों में गले-गले तक व्यस्त रहे। इस दल में कई महिलाएँ और पुरुष शामिल हैं, जिनमें से दो लोग आश्रम में पहले भी दो बार आ चुके हैं। वे अब हमारे मित्र बन चुके हैं और हमें शुरू से पता था कि उन लोगों के साथ और उनके साथ आए दूसरे मेहमानों के साथ हमारा समय शानदार गुज़रेगा।

उनके आने के बाद शाम को फ़्रांस से आई मित्र मेलनी द्वारा प्रस्तुत फायर शो से उनका स्वागत किया गया। मेलनी हमारे साथ ही है और अभी काफी समय हमारे साथ रहेगी। आज प्रातः उन्होंने योग कक्षा का आनंद लिया और इस समय बाजार में खरीदारी करने और वृंदावन का थोड़ा-बहुत जायज़ा लेने गए हैं!

अगले कुछ दिनों में वे आयुर्वेदिक पाकशाला में हिस्सा लेंगे, वृंदावन, मथुरा और आगरा की सैर करेंगे और उसके पश्चात्, स्वाभाविक ही, दीपावली समारोह में भी शामिल होंगे, जो सिर्फ तीन दिन बाद यहाँ आयोजित किया गया है!

लेकिन सिर्फ जर्मनी से आए दल की अगवानी और दीपावली समारोह की तैयारियों में ही हम व्यस्त नहीं हैं! दीवाली के तुरंत बाद, 13 नवंबर को अपरा, रमोना और मैं जर्मनी जाने के लिए कार द्वारा आश्रम से दिल्ली विमानतल की ओर रवाना हो जाएँगे!

लगभग डेढ़ साल हो चुके हैं और अपरा ने अपनी माँ के देश को नहीं देखा है और हम उस समय का और अधिक इंतज़ार नहीं कर सकते जब वह वहाँ का अनुभव प्राप्त करे, वहाँ के शानदार दोस्तों और परिवार के सदस्यों से मिले-जुले और वहाँ के जीवन का आनंद ले! गर्मियों में हम अपने रेस्तराँ को रंग-रूप देने में व्यस्त थे इसलिए वहाँ नहीं जा पाए लेकिन हम पूरा साल वहाँ जाए बगैर नहीं रह सकते लिहाजा दो माह पहले हमने अपने कार्यक्रमों का कैलेंडर चेक किया तो पता चला कि इन दो समूहों के बीच हमारे पास सिर्फ तीन हफ़्तों का समय है, जिन्हें हम जर्मनी में गुज़ार सकते हैं!

दिल्ली में ख़ास तौर पर एक दिन हमने गर्म कपड़ों की खरीदारी के किए नियत किया, जिससे जर्मनी जाने के बाद वहाँ की ठंड से बच सकें। जर्मनी में अपरा को इस बार हम स्नो फॉल दिखाने वाले हैं, जिसे वह अपने जीवन में पहली बार देखेगी। हम क्रिसमस मार्केट भी जाएँगे और वहाँ हॉट चॉकलेट और स्ट्राबेरी आईस्क्रीम भी खाएँगे।

अपनी इस रोमांचकारी यात्रा का विवरण मैं आपको नियमित रूप से देता रहूँगा!

साल गिनना भूल कर, जीवन से प्यार करते हुए जन्मदिन मनाना! 14 अक्टूबर 2015

आज फिर वह दिन आ गया है जब मैं अपनी उम्र के सालों की गिनती बदलता हूँ। आज मेरा जन्मदिन है-14 अक्टूबर। और आपके पूछने से पहले ही बता दूँ कि मैं कल से एक दिन भी अधिक बड़ा महसूस नहीं कर रहा हूँ!

मैं जानता हूँ कि मैं पहले भी इस बात का ज़िक्र कर चुका हूँ, और शायद किसी जन्मदिन के दिन ही, कि यह संख्या, जो आप किसी को अपनी उम्र की जानकारी देते हुए बताते हैं, मेरे लिए विशेष महत्व की नहीं है। कुछ दिन पहले रमोना ने हमारे किसी मेहमान को हँसते हुए बताया, ‘आप उनसे उनकी उम्र पूछेंगे तो वे कम से कम 2 मिनट सोचेंगे कि वे वास्तव में कितने साल के हैं!’

वास्तव में, जितना व्यस्त मैं रहता हूँ, उतना व्यस्त रहने लायक युवा मैं आज भी महसूस करता हूँ और अपने अनुभवों के अनुरूप पर्याप्त उम्रदराज भी महसूस करता हूँ। मैं उम्र की इस संख्या को मुझे निर्देश देने की आज़ादी क्यों दूँ कि मुझे कैसा महसूस करना चाहिए या कैसा व्यवहार करना चाहिए? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उम्र के हिसाब से मैं दूसरों से अपनी तुलना भी नहीं करता। अगर मैं यह करने लगूँ तो यह बड़ा पेचीदा मामला हो जाएगा: मेरे कुछ पुराने सहपाठी आज दादा-दादी या नाना-नानी बन चुके हैं जब कि मेरे कुछ मित्र हैं जो अभी भी पढ़ाई कर रहे हैं, अभी किसी संबंध में मुब्तिला ही हो रहे हैं या समय के ऐसे ही किसी पड़ाव पर हैं जिसे मैं पहले ही पार कर चुका हूँ! इसलिए तुलना करना ही बेमानी हो जाता है?

नहीं, जीवन के इस पड़ाव पर मैं बहुत खुश हूँ। मैं अक्सर रहता ही हूँ। मेरे पास मेरा परिवार है, शानदार दोस्त हैं, मैं अपने काम में पर्याप्त व्यस्त भी रहता हूँ, मेरा काम भी अच्छी तरह तरक्की कर रहा है और मैं अपने अच्छे स्वास्थ्य का पूरा आनंद भी ले रहा हूँ। फिलहाल, जब कि रमोना और मैं यह लिख रहे हैं, मुझे हँसी आ रही है क्योंकि मेरी बच्ची मेरे पीछे खड़ी अपने चाचा के साथ ठिठोली करते हुए हँस रही है। अब जीवन की इस सुनहरी धूप में मैं अपने आपको बूढ़ा महसूस करने की सोच भी नहीं सकता!

आज सबेरे वह बड़ी खुश और उल्लसित थी, उसने मुझे जगाकर कहा कि आज मेरा जन्मदिन है। उसने रमोना को बताया कि वह बहुत सारा केक खाएगी-लेकिन फिर रमोना से उसने सुना कि पार्टी का आयोजन थॉमस और आइरिस के आने के बाद, सप्ताहांत में किया जाएगा! बाप रे! यह सुनकर अपरा बहुत गुस्सा हो गई और शिकायती स्वर में तुरंत उसने कहा कि नहीं, पार्टी आज ही होनी चाहिए, शनिवार को नहीं। रमोना ने समझाने की बहुत कोशिश की कि पार्टी का मज़ा लेने हमारे दोस्त भी आ रहे हैं लेकिन अपरा का तर्क था कि वे उसकी बर्थडे-पार्टी में आ सकते हैं!

रमोना ने हाथ डाल दिए: ‘ओके ओके, हम आज भी एक छोटी सी पार्टी रख लेते हैं और…शनिवार को बड़ी वाली रख लेंगे!’ यह गलत रणनीति सिद्ध हुई! इसका बड़ा तगड़ा विरोध हुआ: ‘नहीं! बड़ी पार्टी आज ही होगी, बड़ा केक भी आज ही आएगा क्योंकि बर्थ डे भी आज है!’ खैर, तो हम आज भी एक पार्टी रख रहे हैं और एक शनिवार को भी रख लेंगे!

पार्टी के लिए हम वैसे भी कभी मना नहीं करते! और मैं अभी से बहुत सारी पार्टियों का इंतज़ार करने लगा हूँ!

दिन भर के कामकाज और मेहनत के बाद क्या आप सेक्स के लिए बेहद थक जाते हैं? 10 अगस्त 2015

कुछ समय पहले मुझसे किसी ने अपनी एक व्यक्तिगत समस्या पर सलाह मांगी: दिन भर कामकाज में व्यस्त रहता था। जब घर लौटता था तो अपने काम के तनाव और श्रम के कारण मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यंत शिथिल पड़ जाता था। या तो उसके पास समय नहीं होता था या समय होता था तो इतनी शक्ति नहीं होती थी कि पत्नी के साथ सम्भोग कर सके! इसके चलते स्वाभाविक ही पत्नी असंतुष्ट रह जाती थी और दुखी रहने लगी थी। उसे क्या करना चाहिए?

सर्वप्रथम तो यह कि यह बड़ी अच्छी बात है कि आप किसी दूसरे से सलाह मांगने की ओर उद्यत हुए हैं क्योंकि समय आ गया है कि आप इस विषय में गंभीर हो जाएँ! जब आपके संबंध उस स्तर तक पहुँच जाते हैं, जहाँ शिकायतों का स्वर तीक्ष्ण होने लगता है और दोनों एक-दूसरे से अप्रसन्न रहते हैं तब आपके लिए अपनी जीवन-चर्या पर गंभीरता पूर्वक विचार करना ज़रूरी हो जाता है! अच्छा हो अगर आप उसमें कुछ बड़े परिवर्तन भी कर सकें!

दूसरे, मैं आशा करता हूँ कि सहवास-सुख की कमी सिर्फ आपकी पत्नी नहीं, बल्कि आप भी महसूस कर रहे होंगे!

जब एक बार आप विवाह कर लेते हैं तो आपके साथ हाड़ मांस का एक और प्राणी भी साथ रहने लगता है, जिसकी आपसे कुछ जायज़ अपेक्षाएँ होती हैं। यहाँ मैं आर्थिक अपेक्षाओं की बात नहीं कर रहा हूँ! और स्पष्ट कहूँ तो मैं सिर्फ भौतिक अपेक्षाओं की बात भी नहीं कर रहा हूँ! असल में यह समस्या सेक्स से संबंधित है ही नहीं। वह भावनाओं और प्रेम से संबंधित है। परस्पर प्रेम के साझेदार के रूप में आपकी पत्नी का आपके हृदय और आपके समय पर कुछ अधिकार तो है ही!

आप खुद निर्णय करें: आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है? क्या आप अपने काम के लिए जी रहे हैं या सिर्फ आजीविका के लिए काम कर रहे हैं? आपको अपना काम ज़्यादा प्रिय है या पत्नी के साथ समय बिताना?

मुझे गलत न समझें- अपने काम में भी आपको मज़ा आना चाहिए। लेकिन ज़्यादा आनंद आपको अपने परिवार या साथी के साथ समय बिताने में आना चाहिए। अगर इस तरह आप अपना दिल पत्नी के सामने नहीं खोल सकते तो आपको जीवन जीने का कोई और तरीका अख्तियार करना चाहिए था!

बहुत से लोग कहेंगे: 'मैं यह सब, इतनी कड़ी मेहनत उन्हीं के लिए कर रहा हूँ, अपने परिवार के लिए, उनके भविष्य के लिए और बच्चों के लिए!' विशेष रूप से, जब आपके बच्चे भी हैं तो आपको यह समझना चाहिए कि आप ऐसे आनंद में अपना समय नहीं गुज़ार सकते। मेरा दावा है कि अगर आप कुछ कम काम करते हैं, थोड़ा कम पैसा कमाते हैं लेकिन कुछ अधिक समय परिवार और पत्नी के साथ गुज़ारते हैं तो आपका जीवन वास्तव में बेहतर हो जाएगा!

अगर आप इसी तरह चलते रहे, अपना रवैया नहीं बदला तो आप और आपका साथी एक-दूसरे से और दूर होते चले जाएँगे। अब आपको तय करना होगा कि आप साथ रहने में और एक-दूसरे से प्रेम करने में ज़्यादा रुचि रखते हैं या अपने काम में ही रमे रहना चाहते हैं। अगर आप अपने काम को चुनते हैं और पत्नी भी किसी दूसरी बात में मन लगा लेती है, कोई ऐसी रुचि पैदा कर लेती है, जहाँ वह अपना समय बिताना चाहती है तो फिर आपके पास शिकायत का कोई कारण नहीं होना चाहिए!

अपनी पत्नी से यह अपेक्षा न करें कि वह ताजिंदगी घर की सफाई करती रहेगी, बच्चों की देखभाल करती रहेगी और आपका इंतज़ार करती रहेगी कि जब आपको समय मिलेगा तो आप आएँगे और उसके साथ समय बिताएँगे। या उसके साथ बिस्तर साझा करेंगे- हालांकि इस मामले में सेक्स सिर्फ एक निशानी है कि आप लोग आपस में कितना करीब हैं। वह सिर्फ परस्पर प्रेम का भौतिक इज़हार है! और फिलहाल आपका काम उसे धीरे-धीरे खत्म कर रहा है!

आपके लिए आवश्यक है कि दैनिक जीवन में आप अपने प्रेमीजनों के लिए समय निकालें और फिर सप्ताहांत को वास्तविक सप्ताहांत बनाएँ- परिवार के साथ कहीं छुट्टियों पर निकल जाएँ या दो दिन का समय उनके साथ कुछ अलग तरह से बिताने की कोशिश करें। सिर्फ समय न गुजारें- ज़िंदगी का लुत्फ उठाएँ!

पुराने दोस्तों से दूरी पर दुखी न हों, आप इस विषय में कुछ नहीं कर सकते! 3 मई 2015

मैं जानता हूँ कि पहले भी कभी-कभी मैं खुद अपने ब्लॉगों में मित्रों के बारे में लिखते हुए इसी तरह खयालों में डूब जाता रहा हूँ लेकिन मुझे लगता है कि आज मैं पुनः उसी दौर से गुज़र रहा हूँ, लिहाज़ा अपने विचार पुनः साझा करना चाहता हूँ। हम सभी जानते हैं कि घनिष्ट मित्रता कैसी होती है और यह भी कि कुछ ऐसी मित्रताएँ भी होती हैं, जहाँ आप सोच में पड़ जाते हैं कि आखिर हम इतने दिनों बाद आज भी इतने जुड़े हुए क्यों हैं। मैं आज इसी दूसरी तरह के मित्रों के बारे में लिखना चाहता हूँ।

अक्सर ऐसे मित्र वे लोग होते हैं जिन्हें आप बचपन से जानते हैं। आप बचपन में उनके साथ खेले होते हैं, कुछ साल एक साथ बड़े होते हैं लेकिन फिर दोनों की राहें जुदा हो जाती हैं। हो सकता है वे आपके पड़ोसी रहे हों, संभव है, प्राथमिक शाला के सहपाठी हों। यहाँ तक कि, हो सकता है कि आप बाद में मिले हों और कुछ समय के लिए ही सही, करीबी दोस्त बन गए हों। मुख्य बात यह कि अब आप उनके करीब नहीं हैं। दरअसल वास्तविकता यह है कि अब आप उनसे किसी तरह की नजदीकी महसूस नहीं करते।

ऐसे व्यक्ति से आप एक ख़ास तरह का भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं क्योंकि आपने उसके साथ बचपन के सुनहरे दिन गुज़ारे होते हैं। लेकिन इस समय आप अच्छी तरह से जान रहे होते हैं कि आप दोनों के विचार नहीं मिलते। आप उससे बिल्कुल अलग तरह से सोचते हैं! आपकी विचारसरणी इधर जा रही है तो उसकी बिल्कुल विपरीत दिशा में। आप कोई बात कहने से पहले ही जानते होते हैं कि वह उसका समर्थन नहीं करेगा। इसी तरह वह आपसे कुछ कहेगा और आप उससे सहमत नहीं हो पाएँगे!

ऐसी स्थिति में, आप एक-दूसरे के साथ वैसे सहज-स्वाभाविक, शांत और स्वच्छंद नहीं रह सकते जैसे किसी समय रहा करते थे। शायद आप उन दिनों को मिस करेंगे या उन दिनों के बारे में सोचते हुए अजीब उदासी और अवसाद से भर जाएँगे- क्योंकि आप जानते हैं कि आप उन दिनों को वापस नहीं ला सकते! जिन परिवर्तनों ने आपको यहाँ इस बिंदु तक पहुँचाया है, वैसा बनाया है जैसे आप हैं, उन्हें आप वापस लाना नहीं चाहेंगे। जैसे आप कभी थे, अब वैसा बनना नहीं चाहेंगे।

वास्तव में मैं अपने पुराने समय में नहीं जाना चाहता। जब मैं अपने पुराने दोस्तों के साथ बिताए गए सुखद समय की याद करता हूँ तो खुश होता हूँ, दुखी नहीं। मैं जानता हूँ कि मेरा वर्तमान भी उतना ही सुखद, शानदार है और उम्मीद करता हूँ कि भविष्य भी वैसा ही शानदार होगा!

लेकिन मेरे जीवन में ऐसे मित्र भी हैं और कई बार मुझे उनके साथ फोन पर होने वाली औपचारिकतापूर्ण मासिक या साप्ताहिक बातों पर आश्चर्य होता है। कभी कभार एकाध मुलाक़ात-साल में एक बार, माह में दो बार या नियमित रूप से। और, निश्चित ही, जन्मदिन पर नियमित रूप से व्यक्त की जाने वाली शुभकामनाएँ। यह सब उसके लिए, जिसके साथ अब मैं कोई नज़दीकी महसूस नहीं करता, विशेष रूप से, विचारों के स्तर पर!

जी हाँ, क्योंकि इतना करने के लिए मुझे कोई खर्च नहीं करना पड़ता। इससे मुझे कुछ होगा तो लाभ ही होगा। फोन उठाने में कोई ताकत ज़ाया नहीं होती, उसके घर चले जाने में या उसके मेरे यहाँ आने पर मुझे ख़ास कुछ नहीं करना पड़ता। इससे ताल्लुक बना रहता है, भले ही वह औपचारिकताओं पर आधारित हो लेकिन फिर भी मैं उस व्यक्ति को अपना मित्र कह सकता हूँ। अपना पुराना यार, पुराना पड़ोसी, मेरी किसी पिछली यात्रा का साथी।

हम कभी बहुत घनिष्ट थे, अब नहीं हैं लेकिन फिर से घनिष्ट मित्र बन सकते हैं। या नहीं भी बन सकते-लेकिन इसमें हमारा क्या बनता-बिगड़ता है? कुछ पाएँगे तो आप सिर्फ प्यार मुहब्बत पाएँगे और उस सम्भावना को बरकरार रखने के लिए इतना प्रयास मामूली सौदा है!

अपने बच्चों को व्यस्त और टीवी से दूर रखें लेकिन इसलिए नहीं कि वे आप पर बोझ हैं! 20 अप्रैल 2015

आज मैं एक विज्ञापन के बारे में संक्षेप में लिखना चाहता हूँ, जिसने मुझे एक बार फिर यह बताया कि बच्चों के प्रति लोगों का रवैया कितना विकृत है। कई बार लगता है जैसे उनके बच्चे उन पर बोझ हों!

दरअसल ये विचार मेरे दिमाग में तब आए जब मेरी पत्नी ने मुझे एक विज्ञापन दिखाया। उसने अपने फेसबुक न्यूज़फीड पर यह विज्ञापन कई बार देखा था लेकिन उसका शीर्षक ही उसे पसंद नहीं आया था लिहाजा बहुत दिनों तक उसने उस पर क्लिक नहीं किया था। शीर्षक था: कभी सोचा- “अपने बच्चे द्वारा टीवी के सामने बिताए जा रहे समय को कैसे कम किया जाए?” क्योंकि अपरा टीवी नहीं देखती और यू ट्यूब पर वही वीडियो देखती है जिन्हें हम उसके लिए चुनकर दिखाते हैं, इसलिए हमारे लिए उस विज्ञापन का कोई खास महत्व नहीं था। लेकिन एक दिन यूँ ही उत्सुकतावश उसने उस प्रचार-वीडियो को देखा।

अपने आप में विचार अच्छा था: एक कंपनी है, जो हर माह कुछ शिल्प कला के उपकरण, पेंट और कुछ किताबों से भरा डिब्बा आपके घर भेजती है। एक अनोखा व्यावसायिक विचार, जो बच्चों के साथ उनके अभिभावकों को भी कुछ रचनात्मक करने की प्रेरणा दे सकता है। यह उत्पाद मेरी नज़र में कतई बुरा नहीं था। लेकिन समस्या थी तो उसके विज्ञापन के साथ!

वह एक कार्टून वीडियो था और उसमें एक माँ और पिता टीवी पर टकटकी लगाए अपने बच्चे की ओर परेशान से देख रहे हैं और नीचे लिखा है- ‘आप हमेशा से चाहते थे कि आपका बच्चा टीवी से दूर हो जाए…..’ और जब माँ कहती है- ‘तुम उसे टीवी के सामने से हटाओ और उसके साथ खेलो?’ तो पिता बहाना करके भागने की कोशिश करता है- ‘मैं व्यस्त हूँ, उसके साथ खेलने का मेरे पास समय नहीं है!’ और माँ परेशान सी गंभीर सोच में डूबी हुई कहती है- ‘व्यस्त तो मैं भी हूँ।’ उसके बाद कुछ वैज्ञानिक आंकड़े देते हुए प्रमाणित किया गया है कि टीवी देखना बच्चों के लिए क्यों बुरा है और अंत में इस समस्या का समाधान है: वही डिब्बा- और फिर आप देखते हैं कि पिता खर्राटे लेता हुआ सो रहा है और संतुष्ट माँ आनंद विभोर सी खेल में व्यस्त बच्चे को देख रही है।

तो उनकी समस्या यह नहीं है कि बच्चे टीवी देख रहे हैं बल्कि यह है कि माता-पिता अपने लिए समय कैसे निकालें! वे जानते हैं कि टीवी बच्चे के लिए ठीक नहीं है पर हाय, उनके पास बच्चे के साथ खेलने का समय नहीं है! और यह रहा समस्या के इलाज का अचूक नुस्खा: खिलौनों से भरा यह डिब्बा खरीदिए, जो बच्चे को व्यस्त रखेगा और फिर आपके पास समय ही समय है!

जी नहीं, परवरिश का यह तरीका ठीक नहीं है! अगर आपका कोई बच्चा है तो उसके प्रति आपकी कुछ ज़िम्मेदारी भी है! यह आप अच्छी तरह जानते हैं-अन्यथा यह पढ़कर या वीडियो क्लिप देखकर आप परेशानी महसूस नहीं करते कि 3 से 7 साल तक की उम्र बच्चे के मानसिक विकास के लिए निर्णायक होती है, कि मस्तिष्क का 80% विकास 5 साल की उम्र तक हो जाता है-और वह उसके सक्रिय व्यवहार से ही संभव होता है, कि जो बच्चे बहुत ज़्यादा टीवी देखते हैं, उनमें मोटापे की संभावना अधिक होती है! यह सब आप अच्छी तरह जानते हैं और आपको बुरा लगता है जब आप अपने बच्चे के दैनिक क्रियाकलापों पर गौर करते हैं, उसकी दिनचर्या पर नज़र दौड़ाते हैं। इसलिए अपने आप में बदलाव लाएँ!

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आपको भी अपने काम के लिए या सोचने-विचारने के लिए समय नहीं मिलना चाहिए! यह नहीं कह रहा हूँ कि दिन का हर पल आप अपने बच्चे के साथ ही बिताएँ! लेकिन अगर आप हर माह वह वह शिल्प सिखाने वाला डिब्बा खरीदने का मन बना चुके हैं तो कृपा करके कुछ समय निकालिए, बच्चे के साथ बैठिए और उन उपकरणों का बच्चे के साथ मिलकर इस्तेमाल कीजिए। उसके ज़रिए न सिर्फ उसके समय का सदुपयोग हो सके या उसके मस्तिष्क का बेहतर विकास हो सके बल्कि वह आपके परस्पर सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने का जरिया भी बने! अगर उसके साथ कोई प्यार करने वाला व्यक्ति हो, कोई अपना व्यक्ति सशरीर मौजूद हो तो आपका बच्चा बहुत कुछ अतिरिक्त भी सीख सकता है!

यह दुख की बात है कि ऐसे विज्ञापन तैयार किए जा रहे हैं और यह भी कि वास्तव में वे लोगों के घरों तक भी पहुँच रहे हैं! मैं जानता हूँ कि आप अपने बच्चों से प्रेम करते हैं-तो फिर आलसी मत बनिए-उठिए और उनके साथ खेलिए! यह मत कहिए कि आप बहुत व्यस्त रहते हैं और बच्चे के साथ खेलने का नंबर बाद में कभी आएगा-उसके सबसे सुनहरे वर्ष इतनी तेज़ी के साथ बीत जाएँगे कि आपको पता भी नहीं चलेगा!

अपने जीवन का समय बरबाद न हो इसलिए अपने काम से प्रेम करें – 21 जनवरी 2015

कल चिकित्सा व्यवसाय पर लिखने के पश्चात आज मैं सामान्य रूप से सभी पेशों में काम करने वाले लोगों से यह कहना चाहता हूँ कि जिस काम को आपने अपने जीवन का ध्येय बनाया है उससे प्यार करें। मेरे विचार में जिस काम को आप करें उससे आपको प्यार भी करना चाहिए!

बहुसंख्यक लोगों के लिए उनका काम उनके दिन का बड़ा हिस्सा ले लेता है। सामान्य रूप से अधिकतर लोग दिन में आठ घंटे काम करते हैं और कुछ लोग इससे भी ज़्यादा। अगर यह माना जाए कि आप आठ घंटे सोते हैं, व्यक्तिगत कामों और बाथरूम में एक घंटा लगता है-कुछ लोगों को इससे भी अधिक समय लगता है-और अपने काम की जगह जाने और वापस लौटने में भी आपका एक घंटा चला जाता है तो आपके पास दिन भर में सिर्फ छह घंटे बचते हैं। इन छह घंटों में आपको घर का सामान आदि लाना होता है या कोई और ख़रीदारी करनी होती है, घर के कुछ काम निपटाने होते हैं और खाना-पीना होता है। अंत में आपके पास बहुत कम समय बचता है कि आप अपने मनबहलाव के लिए भी कुछ कर सकें या दोस्तों या रिश्तेदारों के साथ समय गुज़ार सकें, बच्चों के साथ खेल सकें या आपसी सम्बन्धों के लिए कुछ समय निकाल सकें।

ज़्यादा नहीं बचता, है न?

जबकि कई देशों में अधिकांश लोगों के लिए हफ्ते में काम के पाँच दिन ही होते हैं, कुछ दूसरों के लिए छह दिन और कुछ लोगों के लिए सात दिन काम के होते हैं, जिसमें से एक दिन आधे दिन तक ही काम होता है।

तो अपने काम में आप इतना अधिक समय व्यतीत करते हैं कि जो आप कर रहे हैं उसमें आपकी रुचि होना अत्यंत आवश्यक है! क्या आप यह नहीं देख पा रहे हैं कि अगर ऐसा नहीं है तो आप अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हैं? हर दिन, हर सप्ताह, हर माह और हर साल आप ऐसे काम में अपना समय खर्च कर रहे हैं जिसे आप पसंद नहीं करते, बल्कि उससे घृणा करते हैं!

यह आपको सुखी नहीं रख सकता, यह आपको संतुष्टि प्रदान नहीं कर सकता। उल्टे यह आपको बीमार कर देगा।

हाँ हाँ मैं जानता हूँ कि लोग कहेंगे: ‘लेकिन मुझे गुज़ारा करने के लिए कोई न कोई काम तो करना ही होगा!’ वे तर्क देंगे कि आप इसका चुनाव नहीं कर सकते कि नौकरी के लिए आपको किस जगह स्वीकार किया जाता है। लेकिन अगर आप ठीक तरह से सोचें तो आपको पता चलेगा कि अधिकतर मामलों में आपके पास विकल्प होता है! आप बहुत सा समय अपने समय के साथ सुलह-समझौते में ही लगे रहकर ऐसी नौकरी या ऐसे व्यवसाय में बने रहते हैं जिसे आप पसंद नहीं करते। नौकरी या व्यवसाय में रुचि या अरुचि के अलावा इसके और भी कई कारण होते हैं मगर सबसे मुख्य कारण पैसा होता है।

अगर वे इस बात को मंजूर कर लें कि यदि उनके काम या व्यवसाय से उन्हें कम आमदनी होती है तो भी कोई बात नहीं मतलब कि अगर वे कम पैसे में भी संतुष्ट हो जाएँ तो कई लोगों के लिए यह संभव हो सकता है कि वे ऐसे काम या व्यवसाय का चुनाव कर पाएँ जो उन्हें प्रसन्न भी रखे और उससे उन्हें संतुष्टि भी प्राप्त हो। वे भूखों नहीं मरेंगे और न ही उन्हें कोई ज़्यादा आर्थिक परेशानी होगी-होगी भी उतनी नहीं कि उसे बरदाश्त न किया जा सके।

और इसीलिए मैं सभी को प्रोत्साहित करता हूँ कि प्रसन्न रहने का तरीका खोजें। अपने काम को पसंद करने का, उससे प्रेम करने का तरीका सीखें या फिर उस काम को छोड़कर किसी दूसरे काम का चुनाव करें। यह भी संभव है कि आप अपने वर्तमान काम या व्यवसाय में काम करने के घंटे कम कर दें और बचे हुए समय में कोई दूसरा काम शुरू करें जो आपके लिए अधिक आनंददायक और संतुष्टि प्रदान करने वाला हो। यह भी संभव है कि सिर्फ अपने खर्चे कम करके आप पूरी तरह से कोई नया काम या व्यवसाय शुरू कर सकें। हो सकता है कि आप अपना कोई व्यापार शुरू कर दें, उसमें ज़्यादा समय दें, अधिक मेहनत करें लेकिन उसी काम ले लिए जिसे आप शिद्दत के साथ पसंद करते हैं।

मेहरबानी करके ऐसा काम करते हुए अपनी ज़िंदगी का बहुमूल्य समय बर्बाद न करें जिसे आप पसंद नहीं करते।

आपका समय अमूल्य है, उसे टीवी सीरियल देखकर बरबाद न करें! 17 सितंबर 2014

हम लोग इस वक़्त जर्मनी में एक सुखद और भावुक कर देने वाला सप्ताह गुज़ारकर भारत की ओर उड़ान भरने वाले हैं। दुर्भाग्य से अपरा को सर्दी और खाँसी हो गई है और बहुत छींकें आ रही हैं, बल्कि मामूली बुखार भी है। वैसे कोई ख़ास बात नहीं है और हमें विश्वास है कि हम बगैर किसी परेशानी के भारत पहुँच जाएँगे। पिछली बार लगभग पूरे सफ़र में वह सोती रही थी-और मैं भी उसके साथ सोता रहा था। और इस बीच रमोना कोशिश करती रही कि समय गुज़ारने के लिए कोई टीवी कार्यक्रम देखे मगर आखिर उसका मन नहीं हुआ। जब मेरी नींद खुली तो हम टीवी पर चर्चा करते रहे कि किस तरह वह एक व्यसन की तरह चिपक जाता है और यह भी कि क्यों मैं टीवी सीरियलों पर समय बरबाद करने को बहुत बुरा समझता हूँ। तो, ये रहे वे कारण, जिनके चलते मैं समझता हूँ कि आपको टीवी नहीं देखना चाहिए:

1) टीवी देखना समय की बरबादी है!

यह बड़ी सहज, स्वाभाविक तर्कपूर्ण बात है: इस दृश्य-यंत्र के सामने बिताए जाने वाले समय का उपयोग आप बहुत से दूसरे कामों को निपटाने, जैसे, घर की सफाई और उसे व्यवस्थित करने में कर सकते हैं। अगर इन कामों को निपटाने के बाद ही आप टीवी देखने बैठे हैं तो उसकी जगह आप मित्रों से मेल-मुलाक़ात कर सकते हैं, कुछ रचनात्मक कर सकते हैं, चित्रकारी सीख या कर सकते हैं, खेल सकते हैं, तैरने जा सकते हैं या किसी बेहतर काम में अपनी ऊर्जा खपा सकते हैं। टीवी के सामने बैठना आपको कुछ भी प्रदान नहीं करता। वह सिर्फ आपका समय गुज़ारने का काम करता है। अगर आप टीवी पर चल रहे कार्यक्रम में दिमागी तौर पर शामिल हो जाते हैं, उसमें डूब जाते हैं तो दो-तीन घंटे इस तरह गुज़ारना कोई बड़ी बात नहीं है! अगर आपके पास बहुत सारा फालतू समय है तो उसके सामने अवश्य बैठिए लेकिन अगर नहीं है तो इस चीज़ से दूर ही रहें!

2) आप इस समय का उपयोग कुछ नया सीखने में कर सकते हैं मगर करते नहीं!

लेकिन इस पर ईमानदारी के साथ सोचा जाए: जी हाँ, दुनिया को देखने-समझने के लिए टीवी से बढ़कर कुछ नहीं है। वह आपको डॉक्यूमेंटरीज़ देखने की सुविधा प्रदान करता है, दुनिया के बारे में अधिक से अधिक जानने का अवसर। दूसरी संस्कृतियों को गहराई से समझने के लिए, महत्वपूर्ण विषयों पर हो रही चर्चाओं से अपनी ज्ञान-वृद्धि के लिए या रोज़मर्रा जीवन में काम आने वाली वस्तुएँ कैसे काम करती हैं, जानने के लिए आप उनसे सम्बंधित टीवी कार्यक्रम देख सकते हैं। आप ऐसा कर तो सकते हैं मगर अक्सर 90% मामलों में आप ऐसा नहीं कर रहे होते।

आप टीवी का उपयोग निरर्थक मनोरंजन के लिए करते हैं। जी हाँ, ईमानदारी की बात यही है। इसलिए जब आप कोई ताज़ा सीरियल (soap opera) या रियलिटी शो देखते हैं तो यह मत कहिए कि आप अपने सोच-विचार की सीमाओं का विस्तार कर रहे हैं! आप सिर्फ यह चाहते हैं कि मस्तिष्क को कुछ सोचना न पड़े, टीवी आपका शुद्ध मनोरंजन करे और आपके मन को हल्का सा स्पर्श करता हुआ निकल जाए!

3) वह आपको-और आपके बच्चों को और ज़्यादा- आक्रामक बनाता है!

यह कोई नयी बात नहीं है और मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग यह बात नहीं मानते। लेकिन मैं मानता हूँ! ख़ासकर आपके बच्चों के सम्बन्ध में! वे आपको टीवी के सामने बैठा हुआ देखते हैं तो वे भी देखने लगते हैं। और आजकल के टीवी कार्यक्रम, ख़ास बच्चों के लिए तैयार कार्यक्रम भी, इस कदर हिंसा से भरे होते हैं कि मैं कभी नहीं चाहूँगा कि मेरी बेटी ये कार्यक्रम देखे! जो वे देखते हैं उस पर सहज ही विश्वास कर लेते हैं, सोचने लगते हैं कि जो टीवी पर दिखाया जा रहा है वही उचित है, वैसा ही होना चाहिए भले ही उसमें लोगों को आपस में लड़ता-झगड़ता, मार-काट करता दिखाया जा रहा हो या निरुद्देश्य अति-हिंसा दिखाई जा रही हो! इसमें टीवी के कारण शारीरिक गतिविधियों में स्वाभाविक ही आ जाने वाली कमी को जोड़ लें, व्यायाम हेतु समयाभाव को जोड़ लें तो ये सब मिलकर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करते हैं जिसमें स्वाभाविक रूप से बच्चों के कोमल मस्तिष्क में हिंसा प्रवेश कर जाती है-और आप भी इससे अछूते नहीं रहते!

इस बारे में अपने कुछ और विचार मैं कल के ब्लॉग में लिखूँगा!

जब एक डॉक्टर कहे कि आप अपने बच्चे के साथ ज़्यादा समय गुज़ारें! 8 जुलाई 2014

ग्रान कनारिया में जिनसे भी हम मिले, स्वाभाविक ही सबके बीच अपरा बहुत लोकप्रिय हो गई थी। बातें करने में वह बहुत तेज़ है और वहाँ अधिकतर लोग हिन्दी या जर्मन नहीं जानते थे फिर भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। थोड़े बहुत अंग्रेज़ी के शब्दों के बल पर, जिन्हें वह जानती थी, और वहाँ के कुछ नए स्पैनिश शब्द लेकर, जिन्हें उसने बहुत शीघ्र सीख लिया था, वह सबसे बातचीत करने की कोशिश करती थी। उसकी इस करामात से जो लोग मंत्रमुग्ध रह गए थे उनमें एक महिला भी थी, जिसका एक दो साल का भतीजा भी था। वह बिल्कुल बोल नहीं पाता था। इसका जो कारण उसने बताया वह बड़ा दिलचस्प था!

यह बच्चा सिर्फ कुछ आवाज़ें ही निकाल पाता था और अभी हाल ही में माँ और पिता के लिए उपयोग में आने वाले शब्द और ‘हाँ’ और ‘ना’ बोलना सीख पाया था। और इतना भी तब, जब उसके अभिभावक उसे एक डॉक्टर को दिखाने ले गए और फिर उस डॉक्टर की सलाह पर चले! स्वाभाविक ही, अगर किसी का बच्चा दो साल की उम्र तक एक शब्द न बोल पाए तो माँ तो चिंतित होगी ही। उसने डॉक्टर से हर तरह की जाँच कारवाई। परिणाम: बच्चे में कोई खराबी नहीं पाई गई, न तो उसके कानों में, न उसकी अक्ल में और न ही उसके वोकल कोर्ड्स (वाकतंतुओं) में। उससे जो कुछ भी कहा जाता था, वह अच्छी तरह समझ रहा था। प्रतीत होता था कि बोलने के लिए जो कुछ भी आवश्यक था, उसके पास मौजूद था। तो फिर डॉक्टर ने उन्हें क्या सलाह दी?

उसने उस महिला से सिर्फ इतना कहा कि वह बच्चे के साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय व्यतीत करे।

जी हाँ, उसका कहना था कि यही कारण है कि उसका बच्चा बोलने में बहुत धीमी प्रगति कर पा रहा है। दोनों अभिभावक रोज़ काम पर चले जाते थे, बच्चा एक क्रेच में चला जाता था और उसकी दादी या उसकी चाची उसे वहाँ से ले आती थी और उसके साथ बाकी का दिन समय बिताती थी। सिर्फ शाम को और सप्ताहांत में सारा परिवार इकट्ठा हो पाता था। धंधे की यात्राओं के कारण अक्सर यह अवसर भी नहीं मिल पाता था, कोई एक होता था और कुछ रिश्तेदार।

डॉक्टर ने कहा कि दादी या चाची दोनों से और क्रेच में दूसरे लड़कों से बात करना और बोलने के लिए वहाँ के शिक्षकों से मिलने वाला प्रोत्साहन भी बच्चे के विकास के लिए विशेष मानी नहीं रखता। बच्चे के लिए अपने माता-पिता के साथ समय बिताना बेहद आवश्यक है! उनसे बेहतर शिक्षक कोई नहीं हो सकता, उसके विकास में माता-पिता की भूमिका का कोई विकल्प या पर्याय नहीं है! अपने बच्चे के लिए समय निकालिए, उसके साथ अधिक से अधिक सक्रिय रहिए, उसे नई नई चीज़ें दिखाइए और प्रोत्साहित कीजिए कि वह उनके बारे में कुछ कहे, बात करे और ढाढ़स बंधाइए कि आप सिखाने के लिए उसके पास मौजूद हैं!

उस महिला पर मुझे दया आ रही है कि एक डॉक्टर को यह सब बताना पड़ा! शायद उसे बहुत बुरा लगा होगा, अपराध बोध भी हुआ होगा-कोई बच्चे के लालन-पालन के बारे में आपकी आलोचना करे यह अच्छा नहीं लगता लेकिन यह सुनना कि आप अपने बच्चे के प्रति लापरवाह हैं, उसकी उपेक्षा कर रही हैं, जबकि आप समझ रही हैं कि आप उसके लिए हर संभव अच्छा से अच्छा कर रही हैं, आपके लिए निश्चय ही बहुत असुविधाजनक और दुखद होगा! लेकिन आखिर उसका डॉक्टर के पास जाना ठीक ही रहा और यह भी कि डॉक्टर ने भी उससे सब कुछ साफ-साफ समझाकर कह दिया। यही उस बच्चे के लिए बहुत अच्छी बात थी!

अब यह महिला अपने काम पर कम समय बिताती है और बच्चे की हालत में सुधार दिखाई दे रहा है। दूसरे सभी अभिभावकों को इस कहानी से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि उनके लिए बच्चों के साथ ज़्यादा और उपयोगी, सकारात्मक, सार्थक, अच्छा समय बिताना कितना आवश्यक है! अधिक से अधिक, जितना संभव हो उनके साथ रहें! दूसरी कोई भी बात इससे अधिक महत्वपूर्ण नहीं है!

अपने संबंधों को विकसित होने का अधिकाधिक मौका दीजिए – 12 जून 2014

कल मैंने पूछा था कि नाखुश और असंतुष्ट रहने के बावजूद लोग अपने संबंधों में क्यों बने रहते हैं। अधिकतर प्रकरणों में इसका कारण कोई दूसरा साथी प्राप्त न कर सकने का डर होता है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है: कुछ लोग सोचते हैं कि उन्हें उचित साथी नहीं मिल पाया और इसलिए बार-बार नया साथी चुनते रहते हैं। दरअसल वे अपने आप को और अपने साथी को पर्याप्त समय ही नहीं देते कि एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बिठा पाएं, स्थिरचित्त हो सकें और खुश रह सकें।

इस बात का ज़्यादा एहसास मुझे पश्चिमी देशों में हुआ है- और यह स्वाभाविक ही है क्योंकि भारत के विपरीत, जहाँ अधिकांश विवाह अभिभावकों द्वारा आयोजित (अरेंज्ड) होते हैं, यहाँ लोग अपना जीवन साथी खुद चुनते हैं! लोग अपने लिए "मेरे एकमात्र अपने" जीवन साथी की खोज में रहते हैं लेकिन, दुर्भाग्य से, उस साथी के चेहरे पर "सिर्फ आपके लिए" का कहीं कोई निशान नहीं होता! कोई निश्चत और भरोसेमंद संकेत नहीं मिलता कि जिसे आपने अपने लिए चुना है वह आपके लिए पूरी तरह उपयुक्त है ही और यही असुरक्षा का भाव ही इस समस्या की जड़ है: यह सोचकर कि इससे बेहतर साथी वे ढूँढ़ लेंगे, वे लोग बार-बार सम्बन्ध तोड़ लेते हैं! इस तरह वे दशकों तक नए-नए सम्बन्ध जोड़ते और तोड़ते रहते हैं और दुर्भाग्य से उन्हें कभी भी वास्तविक ख़ुशी नहीं मिल पाती।

प्रेम को विकसित होने के लिए आपको कुछ समय देना चाहिए। मैं सहमत हूँ कि पहली नज़र में भी प्रेम हो सकता है लेकिन संबंधों को सुदृढ़ होने में थोड़ा ज़्यादा समय लगता है। एक दूसरे को अच्छी तरह जानने में और आपसी विश्वास पैदा हो इसके लिए आपका साथ रहना और एक-दूसरे के साथ विभिन्न परिस्थितियों से गुज़रना आवश्यक है। तभी आप जान-समझ पाते हैं कि दूसरा किसी खास परिस्थिति में कैसा व्यवहार करता है, कैसे आप दोनों मिलकर किसी मामले पर सामंजस्यपूर्ण रास्ता निकाल सकते हैं और जान सकते हैं कि दूसरे में क्या-क्या विशेषताएँ हैं और क्या-क्या कमियाँ हैं।

लेकिन इस बात के लिए कुछ समय देने के बजाए लोग पहली समस्या का सामना होते ही भाग खड़े होते हैं। अगर आपके बॉयफ्रेंड की कुछ बुरी और परेशान करने वाली आदतें हैं तो सिर्फ इसीलिए एकदम उत्तेजित होकर उसे त्यागने का निर्णय मत कीजिए बल्कि उससे इस विषय में बात कीजिए, हो सकता है इस विषय में वह कुछ बातें न जानता हो, देखिए कि वह किस हद तक बदल सकता है और दूसरी ओर, देखिए कि आप खुद उसकी किन आदतों से तालमेल बिठा सकती हैं, किन बातों को आप स्वीकार कर सकती हैं। अगर आपकी गर्लफ्रेंड बार-बार आपको टोकती है (ठीक करने की कोशिश करती है) और यह या वह करने या न करने के लिए कहती है तो भागिए मत, उससे दूरी बनाने की कोशिश मत कीजिए बल्कि उससे बात कीजिए: कहिए कि आप खुद वह काम करने में सक्षम हैं और अगर वह बात-बात पर आपकी गलतियाँ न निकाले तो बेहतर होगा।

हो सकता है यह एक गलत व्यक्ति के साथ समय बरबाद करने का डर हो, संभव है यह डर हो कि संबंध को लेकर ज़्यादा भावुक होने पर बाद में, संबंध टूटने पर दिल टूट जाएगा। कारण कोई भी हो, आपको इस डर से बाहर आना होगा और कम से कम संबंध को परिपक्व होने का थोड़ा और मौका देना होगा। थोड़ी सी भी संभावना लगती हो तो उसे अंजाम तक पहुँचाने की पूरी कोशिश होनी चाहिए।

लेकिन, ऐसे भी लोग होते हैं, जो यह कोशिश कुछ ज़्यादा देर तक करते रहते हैं-लेकिन वह दूसरा पहलू है और उस पर मैं अगले हफ्ते चर्चा करूंगा।

आज के लिए मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि अपने सम्बन्धों की गहराइयों में जाएँ, पहली समस्या आते ही भागे नहीं बल्कि दोनों मिलकर उसका कोई हल ढूँढ़ने की कोशिश करें- और ऐसी जितनी अधिक समस्याओं से आप दो-चार होंगे, उन्हें हल कर लेंगे, उतना ही आप एक-दूसरे को बेहतर तरीके से जान पाएंगे, आपका प्रेम मजबूत होता चला जाएगा और आप अपने इस जीवन साथी के साथ लंबा जीवन गुजारने की दिशा में विश्वास के साथ आगे बढ़ेंगे!

अपने बच्चों के साथ बहुमूल्य समय गुजारने का मौका कभी न छोड़ें – 23 अप्रैल, 2014

आज मैं आपको सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि आजकल मैं अपरा के साथ कितना अच्छा समय व्यतीत कर रहा हूँ! अब मुझे इस बात का पहले से भी ज़्यादा एहसास हो रहा है कि आपका कोई बच्चा हो, यह बात आपको कल्पनातीत सुख पहुंचाती है।

कुछ सप्ताह पहले, एक छोटे से वक्फ़े के लिए-शायद कुछ दिन या एक या दो हफ्ते के लिए, अपने काम में मैं कुछ ज़्यादा ही व्यस्त हो गया था। सामान्य से कुछ ज़्यादा ही और जब आप एक साथ कई काम करते हैं तो ऐसा होना विशेष आश्चर्य की बात भी नहीं है। आप जानते हैं कि हमें एक साथ अपनी वैबसाइट अपटूडेट रखनी पड़ती है, अपने चैरिटी के कामों में व्यस्त रहना होता है, अपनी कंपनी और रिट्रीट्स का काम देखना होता है, स्कूल के बच्चों के काम होते हैं और आश्रम के मेहमान… तो, कुल मिलाकर कुछ दिनों के लिए कुछ ज़्यादा ही काम हो गया था और व्यस्तता में मुझे इसका एहसास भी नहीं हुआ कि मैं आजकल अपरा के साथ बहुत कम समय गुजारता हूँ।

हालांकि मैं हर वक्त वहीं रहता था, पूरे समय वह मेरी नज़रों में बनी रहती थी, उसके साथ ही मैं भोजन करता था लेकिन मेरे पास कोई अतिरिक्त समय उसके साथ खेलने के लिए नहीं होता था। फिर एक दिन मैंने अचानक महसूस किया कि मैं उसके साथ गुज़ार सकने का यह मौका खो रहा हूँ, जब मैं यहीं इधर से उधर घूमता रह सकता हूँ, उसे अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुना सकता हूँ या सिर्फ सोफ़े पर बैठकर उसे दुलार सकता हूँ उसे गले से लगा सकता हूँ। मैंने तुरंत तय किया कि इस स्थिति को बदला जाना चाहिए।

मैं इस बात की शिकायत कर सकता था, दुखी हो सकता था कि मेरे पास इतना ज़्यादा काम है कि अपनी बेटी के साथ खेलने के लिए समय ही नहीं निकाल पाता। लेकिन मैंने वह नहीं किया। उसकी जगह मैंने अपने सारे कामों को पीछे छोड़ दिया और निश्चय किया कि अपरा के साथ मैं अब ज़्यादा समय व्यतीत करूंगा क्योंकि वही मेरी सबसे मुख्य प्राथमिकता है।

मैंने पक्का निर्णय कर लिया और सोचा कि मेरे लिए कोई भी बात मेरी बेटी से ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। एक दिन में करने के लिए इतने सारे काम होते हैं और सभी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं- लेकिन भविष्य में वे इतने ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं होंगे कि अपनी बेटी के साथ व्यतीत किया जाने वाला समय भी उन्हीं कामों में खपा दूँ! सभी चीज़ें कल भी वैसी ही रहेंगी यानी जीवन का यह खेल चलता रहेगा लेकिन आपके बच्चे की जो उम्र आज है, हमेशा नहीं रहेगी।

तब से मैं अपने बेटी के साथ, पहले की तरह, ज़्यादा समय गुज़ार रहा हूँ और जितना ही मैं ऐसा कर रहा हूँ उतना ही मैं खुद को पुरस्कृत महसूस करता हूँ! स्वाभाविक ही, तात्कालिक सुख तो है ही लेकिन यह भी तो है कि प्रतिदान स्वरूप वह मुझे कितना कुछ देती है! जब वह थक जाती है तो मुझे पूछती है और आकर सीधे लिपट जाती है। वह हमारे छोटे-मोटे कामों में शामिल होती है: जब मैं उससे कहता हूँ कि चलो टहलने चलते हैं तो वह कहती है, अपना धूप का चश्मा पहन लीजिए और जैसे ही हम बाहर निकलकर घूमना शुरू करते हैं वह कहती है, कहानी सुनाओ।

यह शुद्ध प्रेम है, जो मुझे हर बार उससे प्राप्त होता है और हर बार मैं उसे शिद्दत के साथ महसूस करता हूँ और मैं खुश हूँ कि मैं कितना भी व्यस्त रहूँ मैं ऐसी परिस्थिति निर्मित कर सका, इतना समय निकाल सका कि रोज़ नियमित रूप से अपनी बेटी के साथ कुछ समय व्यतीत कर सकूँ और यह भी कि हमारे पास हमारी प्यारी अपरा मौजूद है।