नास्तिक दूसरों की सहायता करने के लिए अच्छे काम करते हैं, पुण्य कमाने के लिए नहीं – 29 जुलाई 2015

कल मैंने बताया था कि बहुत से लोग यह मानते हैं कि नास्तिक न सिर्फ नीरस होते हैं और आनंदरहित जीवन बिताते हैं बल्कि वे संवेदनशील और परोपकारी भी नहीं होते। उनके विचार से नास्तिकों में करुणा का अभाव होता है और वे मतलबी होते हैं। आज मैं अपने ब्लॉग के ज़रिए इस पूर्वाग्रह का खंडन करना चाहता हूँ।

सबसे पहले यह देखते हैं कि ये विचार कहाँ से आते हैं। नास्तिक और आस्तिक में क्या भिन्नता है? एक समूह ईश्वर को मानता है और दूसरा नहीं। तो, जो ईश्वर को मानते हैं, वे सोचते हैं कि वे ही दूसरों की सहायता करते हैं, जबकि नास्तिक नहीं करते। अर्थात, वे मानते हैं कि ईश्वर ही उन्हें लोगों की मदद करने के लिए प्रेरित करता है। यह रोचक है, क्योंकि इसका आशय यह है कि आप इसलिए परोपकार करते हैं क्योंकि ईश्वर ने धर्मग्रथों में ऐसा करने को कहा है- ठीक? अगर आप स्वयं अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते, बीच में ईश्वर नहीं होता तो आपके अनुसार, आप कोई भी भला काम नहीं करते, जो आप अभी कर रहे हैं?

यदि यह सत्य है, तो यह नास्तिक बेहतर इंसान हैं, क्योंकि वे अच्छे कार्य केवल इसलिए करते हैं कि उन्हें वह उचित लगता है। इसलिए नहीं कि पिता जैसी छवि रखने वाला कोई काल्पनिक चरित्र उन्हें ऐसा करने का आदेश देता है। इसलिए नहीं कि वे किसी काल्पनिक बहीखाते में पुण्य जमा कर रहे हैं!

मैं आपको नास्तिकों में मौजूद दयाभाव और परोपकार का एक उदाहरण देता हूँ, जो हमारे इस आयोजन के तुरंत बाद हाल ही में सामने आया है। युवा नास्तिकों का एक समूह हमारे कार्यक्रम के बाद टेम्पो ट्रेवलर से आगरा के लिए निकला। हमने एक स्थानीय टॅक्सी ऑपरेटर से कह कर टेम्पो ट्रेवलर की व्यवस्था कराई थी। आगरा के रास्ते में उनके सामने एक दुर्घटना घटित हुई और उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। मुझे नहीं पता, वास्तव में वहाँ क्या हुआ परन्तु दुर्घटना में कई लोग घायल हुए थे और उन्हें तत्काल चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता थी। उस छोटे से समूह ने जोकि ताजमहल देखने जा रहे थे, तुरंत निश्चय किया कि वे पहले उन घायलों को अस्पताल पहुँचाएँगे!

दुर्भाग्य से गाड़ी के वाहन चालक ने, जो एक स्थानीय व्यक्ति ही था, मना कर दिया। वह पुलिस से साथ कोई मुसीबत न हो, इस डर से या किसी और कारण से या अकारण घबरा गया। वह जीप से दूर, अलग जाकर खड़ा हो गया, यह दिखाने के लिए कि यदि वे लोग किसी घायल को साथ लेकर जाना चाहते हैं तो वह गाड़ी नहीं चलाएगा।

असमंजस की स्थिति में कि क्या करें, वे सड़क के किनारे खड़े होकर दूसरी गाड़ियों को इशारों से और हाथ हिला-हिलाकर रोकने की कोशिश करने लगे। अंततः एक कार रुकी और चालक उन घायलों को साथ लेकर अस्पताल चलने के लिए तैयार हो गया।

तो, एक ऐसा ईश्वरभक्त व्यक्ति, जिसने अपनी गाड़ी के दोनों तरफ बड़े-बड़े अक्षरों में राधे-राधे लिखवा रखा है, और तो और स्वयं भी एक धार्मिक पहनावे में है और जिसने बाकायदा धार्मिक शृंगार किया हुआ है, एक खून से लथपथ घायल व्यक्ति को अपने साथ ले जाने के लिए मना कर देता है जबकि बाहर से आया एक नास्तिकों का दल, अपने कार्यक्रम की परवाह किए बगैर उस घायल व्यक्ति की जान बचाने के लिए एक अनजान जगह में वह सब कुछ करने के लिए राज़ी है, जो वह कर सकता है।

हालांकि मेरे लिए यह कोई बड़ा आश्चर्य नहीं है–क्योंकि एक अधार्मिक व्यक्ति अपनी सहज प्रवृत्ति पर, अपने तर्कपूर्ण विचारों पर भरोसा करते हुए स्वयं अपनी मर्ज़ी से निर्णय लेता है जबकि धर्म अपने अनुयायियों को भय का अनुसरण करना सिखाता है। इसलिए जबकि यह धार्मिक व्यक्ति सोच ही रहा था कि क्या-क्या बुरा हो सकता है, ये नास्तिक अपना काम कर चुके थे, अपने सामने घायल पड़े हुए व्यक्ति की सहायता करने की एकमात्र इच्छा के वशीभूत!

अपने स्कूल के बच्चों के लिए किए जा रहे हमारे कार्य आपको सहमत नहीं करते तो शायद यह घटना आपके लिए एक प्रमाण है कि नास्तिक लोग वास्तव में अच्छे कार्य करते हैं, दूसरों की सहायता हेतु सदा तत्पर रहते हैं- जबकि धार्मिक लोग भयभीत होकर पीछे हटने के बहाने ढूँढ़ते रहते हैं!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

कर्म सिद्धान्त के अनुसार नेपाल के भूकंप पीड़ित सहायता के पात्र नहीं हैं – 29 अप्रैल 2015

कल मैंने आपको एक टिप्पणीकर्ता के बारे में बताया था, जिसका भरोसा है कि ईश्वर जो भी करता है, अच्छा करता है। अगर आपको लगता है कि कुछ बुरा हुआ है तो आपको समझना होगा कि यह उस व्यक्ति के कर्मों का फल है! भले ही वह नेपाल में आया भूकंप ही क्यों न हो! इस दृष्टिकोण से सोचने पर अंततः इस बात पर पहुँचकर भ्रमित रह जाएँगे: जब आप कोई काम करते हैं, तब आपको कैसे पता चले कि आप वह काम ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध नहीं कर रहे हैं?

अगर आप यह मानते हैं कि किसी व्यक्ति के साथ जो भी बुरा होता है, उसके पिछले कर्मों के नतीजे में होता है तो फिर जो भी होता है, वही होना भी चाहिए। बल्कि वह ईश्वर की इच्छा भी है क्योंकि वह जो भी करता है, सबके भले के लिए ही करता है। तब आप ऐसे पीड़ितों की मदद करते हैं तो वास्तव में ऐसा काम कर रहे होते हैं, जो ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है!

ऐसी स्थिति में सवाल पैदा होता है कि फिर आप किसी पीड़ित की मदद करें ही क्यों? अपने कर्म की सज़ा भुगत रहे किसी व्यक्ति के लिए आप अपनी सहायता का हाथ क्यों बढ़ाएँ? अगर आप मदद नहीं करेंगे तो और उसका और भी बुरा हाल हो सकता है। सोचने वाली बात यह है कि कर्म-सिद्धान्त के अनुसार उस अतिरिक्त दंड का पात्र भी वह व्यक्ति होगा! क्या नहीं होगा? और अगर आप उसकी सहायता करते हैं तो आप उस संयोग में व्यवधान उपस्थित कर रहे होते हैं!

आप कैसे जानेंगे कि ईश्वर की इच्छा क्या है? हर एक को अच्छे और बुरे कर्म प्राप्त होते हैं और अगर आप किसी की मदद भी करते हैं तो सिद्धांततः आपको कुछ अच्छे कर्म प्राप्त होते हैं। लेकिन अगर आप ईश्वर की तयशुदा योजना के साथ छेड़खानी करते हैं और उस व्यक्ति को, उसके बुरे कर्मों का पूरा परिणाम भुगतने नहीं देते तो हो सकता है कि आप उतने भाग्यशाली न हों और अच्छे कर्मों की आपकी पोटली में कोई इज़ाफ़ा न हो! बल्कि आप ईश्वर के इरादों में रोड़े अटका रहे हैं और इस तरह तो निश्चय ही आपको बुरे कर्म ही प्राप्त हो रहे होंगे!

जी हाँ, मेरी नज़र में यह हास्यास्पद है। धार्मिक लोग अपने ही नियम और सिद्धांतों को तोड़ते-मरोड़ते रहते हैं और जिस बात के पक्ष में वे होते हैं, उसके समर्थन में उनका रुख मोड़ देते हैं। जादू के कमाल से अमीरों के लिए हवा में से सोना और गरीबों के लिए राख निकालने वाले सत्य साईं बाबा जैसे नकली गुरुओं पर मैंने एक बार लिखा था: कि जो सोना वे निकालते हैं, उससे उन्हें गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था करनी चाहिए। मुझे बताया गया कि गरीब अपने कर्मों के कारण गरीब हैं। और इसलिए उनके गुरु भी उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते!

तो आप अपने सिद्धांत को अपनी मर्ज़ी से जिधर चाहें, मोड़ दें मगर मेरे लिए वह तर्क से परे ही होगा। और मेरी नज़र में तर्क तो यही कहता है कि आपका ईश्वर बड़ा ही क्रूर है। बेहद क्रूर! अच्छे कर्म से उसकी क्रूरता में कोई कमी नहीं आती। और हाँ, मुझे मेरे कर्मों के लिए आगाह करने की जगह आपको इस बात की चिंता करनी चाहिए कि किसी की मदद करके कहीं आप ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध तो कोई काम नहीं कर रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि दूसरों के लिए प्रार्थना करते-करते आप अपने लिए बुरे कर्मों का ज़खीरा न इकठ्ठा कर रहे हों-क्योंकि दूसरों की सहायता करना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है!

"’ईश्वर महज अपना काम कर रहा है" – धार्मिक आस्थावानों का नेपाल के भूकंप पर स्पष्टीकरण – 28 अप्रैल 2015

अपने ब्लॉग में प्रस्तुत विचारों पर कल मुझे इतना रोचक फीडबॅक प्राप्त हुआ है कि उसे मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ, जिससे आप जान सकें कि लोगों के मन में कैसे-कैसे खयाल आ सकते हैं। और संभव है कि उस टिप्पणी पर मेरा जवाब, जिसे मैं टिप्पणीकार के लिए लिख रहा हूँ, शायद आपको भी रुचिकर लगे। बल्कि सभी दूसरे पाठक उसे पढ़कर आनंदित होंगे क्योंकि टिप्पणीकर्ता को यह जवाब पाने की कतई उम्मीद नहीं होगी!। तो चलिए, स्वयं देखिए, मामला क्या है!

टिप्पणी की शुरुआत उन्हीं शब्दों से हुई थी, जिनके बारे में शुरू से मुझे पता था कि लोग इसी बात से शुरू करेंगे: कि प्रार्थनाएँ काम करती हैं क्योंकि हम सब एक-दूसरे के साथ एक उच्चतर परा-शक्ति के ज़रिए जुड़े हुए हैं, जिसके हम सभी अलग-अलग, सूक्ष्म हिस्से हैं। चलिए मान लेते हैं-क्योंकि मैं इस आपसी संपर्क पर विश्वास नहीं करता इसलिए मुझे विश्वास नहीं है कि इस अर्थ में प्रार्थनाएँ किसी तरह का लाभ पहुँचा सकती हैं।

लेकिन आगे वह व्यक्ति किसी दूसरी ही दिशा में चल पड़ा:

"…ईश्वर अपना काम कर रहा है। हम सब अपने कर्मों का फल पाते हैं और यह बात हम भूले रहते हैं जब कि हमें अच्छे कर्म करना चाहिए। ईश्वर हमारे हृदय, नाड़ी को चलायमान रखता है, हमारी नसों में रक्त प्रवाहित करता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उसी की कृपा से हम साँस लेते और छोड़ते हैं। उसने हमें देखने, सुनने, बोलने, सूंघने और छूने आदि की शक्ति देकर अपना काम कर दिया है। वह सर्वव्यापी है। वह हमारा कुछ भी बुरा नहीं कर सकता बल्कि वह हमसे प्रेम करता है, भले ही आप उस पर विश्वास करें या न करें। कृपा करके दूसरों को बहकाने की कोशिश न करें।"

तो आपके अनुसार ईश्वर अपना काम कर रहा है? अच्छा, तो इसीलिए उसने इतने लोगों की जान ले ली…

लेकिन आप तो यह कह रहे हैं कि जो भी होता है हमें स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि सब कुछ ईश्वर ने ही किया है। अगर आप किसी बात को बुरा महसूस करते हैं तो वह तो उस व्यक्ति के कर्म का परिणाम होता है, जो कि वास्तव में लोगों की भलाई के लिए ही है। इसका मतलब तो यह हुआ कि बुरी बातें भी अच्छी ही हैं- और कल मैंने ठीक यही लिखा था! कि अगर आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं तो आपको इन पंक्तियों पर भी विश्वास करना चाहिए

करते रहिए, लेकिन अगर आप इस तरह से सोचते हैं तो मैं आपके लिए दुखी हुए बगैर नहीं रह सकता! क्या यह बहुत अच्छी बात नहीं है कि ईश्वर सिर्फ अच्छा करता है! तदनुसार, जब किसी बच्ची के साथ बलात्कार होता है तो वह भी ईश्वर की इच्छा से होता है, उस लड़की के कर्मों के फल का नतीजा होता है! जब बच्चे बिना भोजन के या इसलिए कि चिकित्सा सेवाओं तक उनकी पहुँच नहीं है, मारे जाते हैं तो वह भी उनके कर्मों का फल ही होता है और वह सब भी उसी तरह होता है, जैसा ईश्वर चाहता है। निश्चित ही नेपाल में आया भूकंप भी सिर्फ ईश्वर की मर्ज़ी से ही आया था! स्वाभाविक रूप से वह ईश्वर के प्रेम का इज़हार था-क्या यह बात आपको समझ नहीं आ रही है?

मैं जानता हूँ कि इस तरह सोचने वालों के साथ वाद-विवाद करना समय और ऊर्जा की बरबादी के सिवा कुछ भी नहीं है। आप उन्हें कभी भी, किसी भी हालत में सहमत नहीं कर सकते। लेकिन कभी-कभी यह बात बहुत खलती है कि लोग ऐसी क्रूरता को भी अपने सर्वशक्तिमान ईश्वर की इच्छा मानते हैं और यहाँ तक कि, उसके प्रेम की निशानी भी!

मुझे नेक सलाह भी प्राप्त हुई है कि मैं इस तरह बात करना बंद करूँ और अपने कर्मों की चिंता करूँ। लेकिन मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि आप मेरी चिंता न करें, वास्तव में मैं कर्म-सिद्धान्त पर विश्वास ही नहीं करता और इसलिए इस बात पर भी मेरी कोई आस्था नहीं है कि कोई परा-शक्ति इन निर्भीक शब्दों के लिए मुझे कोई सज़ा दे सकेगी। परेशानी आपकी है, मेरी नहीं।

इन बेकार के विचारों से परेशान होने की जगह मैं बच्चों को भोजन कराऊँगा और शिक्षा प्रदान करके उनकी मदद करूँगा, अच्छे कामों में आर्थिक सहयोग प्रदान करूँगा और इस विषय पर लगातार लिखता रहूँगा कि कभी कोई भूला-भटका व्यक्ति इसे पढ़ेगा और शायद उससे प्रभावित होकर सही रास्ते पर आएगा और इस ओर सक्रिय होगा।

अच्छे काम करते हुए, सिर्फ प्रार्थना करके नहीं!

अपनी जिम्मेदारियों से बचने का गुरु प्रदत्त सम्मोहक प्रस्ताव – 3 अप्रैल 2013

कल मैंने उन जिम्मेदारियों के बारे में लिखा था जो एक लेखक और पाठक, दोनों पर, आयद होती हैं और यह भी कि अपने जीवन और अपने कर्मों की सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी उन्हें उठानी ही चाहिए। हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए और उन्हें अपने कंधों पर उठाने का साहस होना चाहिए। इस बात पर सभी सहमत होंगे कि ऐसा ही होना चाहिए मगर हिन्दू धर्म और प्रचलित गुरुवाद, दुर्भाग्य से, कुछ दूसरी ही बात सिखाते हैं: आप अपनी सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने गुरु पर डाल सकते हैं और आपको ऐसा करना भी चाहिए।

जी हाँ, यही सब बड़े से बड़े धर्मग्रंथों में लिखा हुआ है और यही सब कुछ सैकड़ों सालों से गुरुओं का उपदेश रहा है जिसे उनके शिष्य निष्पादित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसके पीछे का विचार यह है कि आप अपने आपको पूरी तरह गुरु के चरणों में निछावर कर दें। अपने साथ आप अपने बुरे कर्मों को और अपने अच्छे कर्मों को भी गुरु को समर्पित कर दें और अपने लिए बिना किसी अपेक्षा के जैसा गुरु कहता है वैसा करते चले जाएँ। फिर आप उस स्थिति को प्राप्त हो जाएंगे जहां आपके सारे कर्म आपके नहीं रह जाएंगे और इस तरह मृत्यु के बाद आपको स्वर्ग प्राप्त हो जाएगा।

यही वह आधार है जिस पर सारे गुरुवाद की इमारत खड़ी है। गुरु लोगों का आह्वान करते हैं: आओ, अपने सारे कर्म मुझे सौंप दो, वही करो जिसके लिए मैं तुम्हें प्रेरित कर रहा हूँ और फिर तुम्हें इस जीवन की, यहाँ तक कि उसके बाद की भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अपने आप को समर्पित कर दो, निछावर कर दो, तुम्हारे इस जन्म की और अगले जन्मों की भी चिंता मैं करूंगा।

कितना आकर्षक विचार है! किसी भोले-भाले, साधारण धर्मभीरु व्यक्ति के लिए यह एक ललचाने वाला प्रस्ताव है! हर हिन्दू जो ऐसे धार्मिक वातावरण में बड़ा हुआ है यह विश्वास कर सकता है कि यही एकमात्र उचित राह है। कोई भी इसके मोहक स्वरों को समझ सकता है: मेरी नौका में सवार हो जाओ, मैं तुम्हें उस पार पहुंचा दूँगा! तुम्हें सोचने की, चिंता करने की ज़रूरत नहीं, तुम वहाँ सुरक्षित पहुँच जाओगे। तुम नौका को हिला नहीं सकते, लहरों के तेज़ थपेड़े तुम्हें डिगा नहीं सकेंगे, डूबने की तो कोई संभावना ही नहीं- यहाँ तक कि तुम गीले तक नहीं होगे!

वे समर्पण कर देते हैं। यह बहुत आसान है और यह समाज में अच्छा भी माना जाता है! यह घोषणा करते हुए वे गर्व से भर उठते हैं: "मैंने सर्वस्व परित्याग किया है, मैं उपासना में लीन हो गया हूँ, मैं भक्त हूँ और सिर्फ वही करता हूँ जो मेरे गुरु की वाणी मुझसे करवाती है। मैं कुछ भी नहीं हूँ।" यह विनम्रता ही उनसे अपेक्षित है। उनसे कहा गया है कि ‘अपने अहं को खत्म करो’ अन्यथा गुरु आपकी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। आपके कर्मों कि ज़िम्मेदारी वह तभी लेगा जब आपके कर्मों पर उसका अधिकार होगा।

लेकिन गुरु की इस सेवा के बदले आपको एक निश्चित फीस भी अदा करनी होगी। कुछ गुरु सीधे यह फीस वसूल नहीं करते। कुछ बैंक की तरह होते हैं जहां कुछ विशिष्ट सेवाओं के लिए आपका एक तरह का बीमा किया जाता है। लेकिन आपको भुगतान करना अवश्य पड़ता है, सीधे सीधे या फिर किसी और माध्यम से।

ये गुरु आपकी इस मनोवृत्ति का लाभ सिर्फ मोटी रकम वसूल करके ही नहीं उठाते। उनके कई शिष्य इतने समर्पित होते हैं कि वे उनकी ज़बान खुलते ही उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं। उनके शिष्यों द्वारा प्रदत्त यह शक्ति उनके लिए यौन शोषण की राह भी खोल देती है। पहले शिष्य रहीं कुछ महिलाओं ने मुझे बताया कि वे तो अपने गुरु को भगवान ही समझती थीं। उन्होंने अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था, इस विश्वास के साथ कि गुरु के आदेश का पालन करने पर वे उनके माध्यम से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी। जब उनसे कहा गया कि गुरु की सेवा हेतु उनके बेडरूम में जाओ, उनके जननांगों का मर्दन करो और यहाँ तक कि उनके साथ संभोग करो तो उनमें से बहुत सी इंकार नहीं कर सकीं। ऐसे कई प्रकरण हैं जहां गुरुओं ने अपनी शिष्याओं का इस तरह शोषण किया क्योंकि वे अपने भोलेपन में यह सोचती थीं कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

इस तरह आप देखते हैं कि अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं न उठाकर उन्हें किसी और को सौंपने का आसान रास्ता अख्तियार करके आप कहाँ पहुँच सकते हैं। यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं उठाओ, अपने कर्मों और उनसे उपजे परिणामों की पूरी ज़िम्मेदारी आपकी है। समझिए कि जीवन का आनंद उठाने के लिए किसी गुरु की आपको कोई आवश्यकता नहीं है।

मंगलवार को भगवान आपकी रक्षा करते हैं – बेवकूफाना अंधविश्वास! – 5 मार्च 13

कल मैंने आपको बताया था कि पिछले एक हफ्ते से मैं रोज आगरा जा रहा हूं अपने मित्र गोविंद से मिलने के लिए। पिछले मंगलवार को हुई एक सड़क दुर्घटना में पैर की हड्डी टूटने के बाद से वह आगरा के एक अस्पताल में दाखिल है। मेरी तरह और भी बहुत लोग गोविंद से मिलने आते हैं। आनेवालों की बातचीत का एक हिस्सा मैंने सुना तो मैं भी बीच में बोल पड़ा क्योंकि बातचीत मेरे प्रिय विषय पर हो रही थीः धार्मिक अंधविश्वास!

यह चर्चा तब छिड़ी जब आगंतुकों में से एक ने गोविंद से पूछा कि यह दुर्घटना किस दिन हुई थी। वह मंगलवार का दिन था और साथ ही गोविंद ने यह भी जोड़ा, "जबकि मंगलवार तो बड़ा शुभ दिन होता है" अधिकांश हिंदू इस बात में विश्वास करते हैं कि मंगलवार एक पवित्र दिन होता है, यह भगवान का दिन होता है और वे इस दिन विशेष प्रार्थनाएं करते हैं। आम तौर पर वे ऐसा मानते हैं कि इस दिन सब कुछ शुभ ही होता है।

बड़ा प्रश्न यह थाः तो फिर यह दुर्घटना मंगलवार को क्यों घटी? मुझे उम्मीद थी कि धर्मभीरू लोग अपने अंधविश्वास की पुष्टि करने के लिए कोई न कोई उत्तर ढूंढ ही लेंगें – और मुझे निराशा नहीं हुई। ईश्वर की कृपा से, जो मंगलवार को विशेष रूप से कृपालु हो जाता है, बहुत ज्यादा बुरा नहीं हुआ। केवल टांग की हड्डी टूटी। अग़र यह दुर्घटना मंगलवार को न होती तो न जाने और क्या बुरा होता!

अब मैं स्वयं को रोक नहीं पाया और उन लोगों से पूछा,"भगवान ने उसे इस आफत में डाला ही क्यों?"

जवाब मिला कि भगवान तो हमेशा हमारा भला ही करते हैं और जो कुछ भी बुरा हमारे साथ होता है वह हमारे कर्मों का फल होता है। वाह! धार्मिक विश्वासों का यह लचीलापन बड़ा दिलचस्प लगता है मुझे! आप अनापशनाप बोलते रहिए और अपनी बक़वास की पुष्टि के लिए आपको कोई न कोई धार्मिक तर्क अवश्य मिल जाएगा। मेरे विचार से भाग्य और भगवान एक साथ नहीं चल सकते। यदिं अच्छी बातों का श्रेय आप भगवान को देते हैं तो बुरी बातों का ठीकरा कर्मों के ऊपर क्यों फोड़ते हैं? क्या आपके अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कर्मों के लिए भगवान को जिम्मेदार नहीं होना चाहिए? जब मैं पूछता हूं कि दुनियाभर में बच्चे भूख से क्यों मर रहे हैं तो यही कर्मों का लचर सा तर्क दिया जाता है। ये लोग कहते हैं कि ये उन बच्चों के कर्मों का फल है कि भगवान उन्हें नहीं बचाता। उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना ही होगा। भगवान यह पक्षपात क्यों करता है कि कुछ लोगों को तो उनके दुर्भाग्य से बचा लेता है और कुछ को नहीं?

आप मानते हैं कि आपने पाप किया है इसलिए आपका भाग्य बुरा है। आपके दुर्भाग्य आपके साथ दुर्घटना घटी लेकिन ईश्वर ने आपका जीवन बचा लिया। उसने आपका जीवन तो बचा लिया लेकिन आपकी टांग नहीं बचा पाया वह। यदि भगवान आपका सिर जमीन से टकराने से बचा सकता है, यदि टेंपो से उछलकर बाहर गिरने पर वह आपको ऐसे स्थान पर गिरने से बचा लेता जहां कांच या ऐसी ही कोई खतरनाक वस्तु पड़ी हुई होती, यदि उसने सड़क पर दौड़ती हुई अन्य कारों के नीचे आने से आपको बचा लिया तो क्यों नहीं वह आपकी हड्डियों को टूटने से बचा पाया? उसने उस कार को टेंपो से टकराने ही क्यों दिया? उसने आपको टेंपो से बाहर गिरने ही क्यों दिया?

क्या उस वक़्त भगवान किसी और काम में व्यस्त था और आपका ख्याल उसे तब आया जब आपकी टांग टूट चुकी थी? कहीं वह ऐसा तो नहीं सोचता कि आप नीचे गिरें मग़र आपकी हड्डियां सही सलामत रहें, तो क्या यह कुछ अटपटा नहीं लगेगा? या फिर वाकई भगवान ने सोचा हो 'सुन रे गोविंद, उस वक़्त तेरा नसीब खराब था। लेकिन इतना भी खराब नहीं था तेरे दिमाग़ में कोई गंभीर चोट आती। खैर मना कि बात हड्डी पर टल गई।'

न तो वे लोग मुझे समझा पाए और न ही मैंने उन्हे अपनी बात समझाने की कोशिश की। वे तो बस इस बात में विश्वास करना चाहते थे कि भगवान ने उसे बचा लिया। वे आज फिर भगवान से प्रार्थना कर रहे होंगें कि उसकी सर्जरी सकुशल हो जाए, आखिरकार आज मंगलवार जो है! लेकिन आज मैं भी अस्पताल जाऊंगा और कामना करूंगा कि डॉक्टर के हाथ से उसकी सर्जरी अच्छी तरह संपन्न हो जाए। सर्जरी खत्म होने के बाद मैं अस्पताल में उसके साथ रहूंगा। यह बात कतई मायने नहीं रखती कि आप ईश्वर में विश्वास करते हैं या नहीं। मायने रखता है आपका स्नेह और सहयोग जो एक मित्र को उसके संकट की घड़ी से उबरने में मदद करता है।

कर्म का सिद्धांत लोगों को अपनी जिम्मेदारियों से भागने की सुविधा प्रदान करता है – 05 फरवरी 2013

मैं पहले ही बता चुका हूँ कि कैसे हिन्दू धर्म का कर्म सिद्धांत विवादास्पद हो सकता है, विशेषकर जब यह स्पष्ट न हो कि इस जन्म के कर्म अगले जन्म में ले जाए जा सकते हैं या (स्वर्ग या नर्क में एक निश्चित काल के बाद वे समाप्त हो जाते हैं।) नहीं। इसका एक और पहलू है जो इस सिद्धांत पर सवालिया निशान खड़ा कर देता है: जब आपके साथ कोई बुरी बात होती है तो लोग कह देते हैं कि यह आपके बुरे कर्मों का फल है। अगर यह बुरी बात अपेक्षाकृत बहुत महत्वपूर्ण नहीं है, जैसे मान लीजिये आपका मोबाइल गुम गया हो या छोटी-मोटी चोरी हो गई हो, तो आप उसे आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन ज़्यादा गंभीर बातों के बारे में आप क्या कहेंगे? अगर किसी के साथ बलात्कार हो जाए तो? क्या आप सिर्फ यह कह सकते हैं कि 'यह उसके बुरे कर्मों का नतीजा है'?

यह प्रश्न दिसंबर में दिल्ली में हुए दर्दनाक सामूहिक बलात्कार के बाद उभरकर सामने आया। भारतीय समाज में ऐसे जघन्य अपराध कैसे हो जाते हैं इस बात पर बड़ा वाद-विवाद हुआ। स्वाभाविक ही उसके कारणों को स्पष्ट करने के धार्मिक प्रयासों को भी उचित स्थान प्राप्त हुआ और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उनमें से कुछ तो भयावह और निंदनीय थे लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिनमे धर्म द्वारा अपने ही शब्दों को तोड़-मरोड़कर समयानुसार ढालने की भद्दी कोशिश भर थी, जिससे घटना का धर्म के नियमों के अनुसार विश्लेषण भी हो जाए और पीड़ित का और ज़्यादा अपमान होता हुआ भी प्रतीत न हो।

मुझे लगता है कि उनके बारे में मुझे कुछ भी कहने की आवशयकता नहीं है जो कहते थे कि इसमें पीड़ित का ही दोष था। मैंने उसके बारे में पहले ही काफी कुछ लिखा है जिससे इस विषय में मेरे विचार आप जान सकें। इन लोगों ने साफ-साफ ऐसा न कहा होगा लेकिन ऐसे वक़्त किसी पीड़ित के पिछले कर्मों का ज़िक्र करना ही न सिर्फ पीड़ित पर सारे हादसे का दोष मढ़ने जैसा है बल्कि बेहूदा और अपमानजनक भी है।

मगर कुछ धार्मिक लोग ऐसे भी थे जो पीड़ित पर घटना का दोष न मढ़ते हुए कर्म सिद्धांत के आधार पर घटना को समझाने की कोशिश कर रहे थे। इनमें से एक प्रयास में तर्क दिया गया कि यह 'समाज के या देश के सामूहिक कर्मों' का नतीजा है। कुछ लोग खुद को और दूसरों को इस बात के लिए सहमत करने की कोशिश कर रहे थे कि भारत की जनता और भारत के कर्मों के नतीजे में उस लड़की के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी गयी। हो सकता है कि उस लड़की के कर्म ठीक-ठाक हों मगर वे सारे समाज और देश के कर्मों के सामने कमजोर पड़ गए। मेरे विचार में यह अपने धार्मिक विश्वासों को उचित ठहराने का एक बहुत कमजोर तरीका है। आपका धर्म, हिन्दू धर्म, साफ-साफ कहता है कि जो भी आपके साथ घटित होता है उसका कारण आपके स्वयं के कर्मों में निहित है। लेकिन वक़्त की नज़ाकत को देखते हुए आप सोचते हैं कि ऐसे वक़्त में एक बलात्कार पीड़ित को ही बलात्कार का दोषी कहना निरा पागलपन न भी हो तो बेहद क्रूर और मूर्खतापूर्ण बात तो अवश्य ही होगी, इसलिए आप निराश होकर किसी न किसी तरह उस अकथनीय जुर्म को कर्म से जोड़ने की कोशिश करते हैं जो घटना का कोई स्पष्टीकरण दे सके।

समस्या यह है कि ऐसे लोग भी हैं जो इन स्पष्टीकरणों को मान लेते हैं, जैसे वे धार्मिक लोग, जो नहीं चाहते कि उनके धर्म पर इस बात का दोष मढ़ा जाए कि वह ऐसे जघन्य अपराधों को बढ़ावा देता है। लोग, जिनके लिए वास्तविकता से आँखें मिलाना असंभव बात है; लोग, जो अपनी ज़िम्मेदारी महसूस नहीं करते और परिवर्तन की कोई कोशिश करना नहीं चाहते।

अगर लोग ऐसे स्पष्टीकरणों को मान लेते हैं तो उनके पास ऐसे अपराधों के दूसरे किसी कारण की खोज आवश्यक नहीं रह जाती। ऐसे में समस्या पर जैसा ध्यान दिया जाना चाहिए, नहीं दिया जाता और उसके समाधान की कोई पहलकदमी भी नहीं की जाती या उसे जड़मूल से समाप्त करने का कोई प्रयास भी नहीं किया जाता।

कर्म का सिद्धांत गैरजिम्मेदार लोगों के लिए भयावह से भयावह हादसों को स्वीकार करने का आसान उपाय मुहैया कराता है। ऐसे हादसे न हों इसके लिए अपने आप के और समाज के सोच में किसी बदलाव की कोशिश करने की ज़रूरत भी यह सिद्धांत समाप्त कर देता है।

अगर आप कोई परिवर्तन चाहते हैं तो आप कर्म पर उसका दोष नहीं मढ़ सकते। समस्या के मूल में जाइए और वहाँ से उसे सुलझाने की कोशिश कीजिये।

धर्म में विरोधाभास – पिछले जन्मों के कर्म आपके पास हैं या नहीं? – 4 फरवरी 2013

पिछले सप्ताह मैंने हिन्दू धर्म में पाई जाने वाली विवादास्पद दार्शनिक मान्यताओं के बारे में लिखा था। मैंने कर्म के दर्शन के बारे में लिखते हुए यह प्रश्न उठाया था कि लोग स्वर्ग जाने के लिए गंगा नदी में कुम्भ स्नान करते हैं या मुक्ति पाने के लिए! आज मैं कर्म के दर्शन में पाई जाने वाली एक और विवादास्पद मान्यता के बारे में लिखता हूँ जो आपको हैरान कर देगी।

मैं पहले ही समझा चुका हूँ कि हिन्दू धर्म में स्वर्ग और नर्क ऐसे स्थान हैं जहां आप या तो अपने कर्मों के ऋण की सज़ा पाते हैं या फिर अपने कर्मों की जमा-राशियों के अनुपात में पुरस्कृत होते हैं। अगर आपने अपने बुरे कर्मों का प्रायश्चित्त कर लिया है और पर्याप्त समय नर्क में बिताया है या आपके पास अतिरिक्त अच्छे कामों का खज़ाना था और अब आपने उसे स्वर्ग में पर्याप्त समय बिताकर खर्च कर दिया है तो आपको पुनः जन्म लेना होगा और आपके कर्मों की जमा-राशि होगी शून्य, जैसा एक नए जमा खाते में होता है।

लेकिन मुझे विश्वास है कि आपने ऐसी कहानियाँ भी सुनी होंगी जिसमें पिछले जीवन से सबक लेने की बात कही जाती होगी, पिछले जन्मों के कर्मों के सुधार के लिए कहा जाता होगा और इस जीवन की घटनाओं को पिछले जन्म के कर्मों के फल के रूप में भुगतने की बात की जाती होगी। यह भी एक विचार है जिसका जन्म भारत में हुआ है, हिन्दू धर्म के अंतर्गत।

एक विचार यह है कि आप इस जन्म में बुरे कर्म करते हैं तो अगले जन्म में बुरे कर्मों के फल के रूप में निचली योनि में आपका जन्म होगा, जैसे कुत्ते की योनि में। अगर आपने बहुत से अच्छे कर्म किए हैं तो आप पुरस्कार स्वरूप अगले जन्म में बेहतर जीवन प्राप्त करेंगे। धनी व्यक्तियों के लिए, जो बहुत भाग्यशाली माने जाते हैं, यह समझा जाता है कि उन्होंने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किए होंगे जबकि जो गरीब परिवारों में जन्मे हैं या जो गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, खासकर जन्म से, उनके लिए समझा जाता है कि उनकी ऐसी दयनीय हालत पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों का नतीजा है। निचली जातियों के लोगों के लिए आम तौर पर यह माना जाता है कि पिछले जन्म में उन्होंने अच्छे कर्म नहीं किए थे जबकि उच्च जाति के लोगों के बारे में यह माना जाता है कि उनके पास पिछले जन्म के अच्छे कर्मों का खज़ाना है।

अब इस दर्शन में, सिद्धांत में या इस सोच में दो जन्मों के बीच कोई स्वर्ग या नर्क नहीं है। जो कुछ भी होता है यहीं इसी धरती पर होता है, जीवित अवस्था में होता है। आप अपने कर्मों की गठरी अपने साथ ढोकर अगले जन्म में ले जाते हैं। जब आप ऐसे बिन्दु पर पहुँच जाते हैं जहां आप कोई अच्छे या बुरे कर्म नहीं करते, आप मुक्त हो जाते हैं। तो इस तरह आप देखते हैं कि ये दो सिद्धांत या विचार किस तरह एक-दूसरे के साथ संगति नहीं बना पाते! आप या तो यह विश्वास करें कि आप बिना किसी कर्म के, यानी शून्य कर्मराशि के साथ इस धरती पर जन्म लेते हैं या फिर पिछले जन्म के सम्पूर्ण कर्मों के साथ जन्म लेते हैं। दोनों बातें एक साथ ठीक नहीं हो सकतीं, लेकिन हिन्दू धर्म इतना लचीला है कि वह अपने मानने वालों को अपनी पसंद की किसी भी बात को सच मानने की आज़ादी देता है।

अगर आप समझते हैं कि साधु, जो सभी दुनियावी या भौतिक चीजों से अनासक्त होते हैं, बहुत धर्मपरायण होते हैं जो दूसरों की भलाई के लिए ऐसा कर रहे हैं तो आप बिल्कुल गलत समझ रहे हैं। वे दूसरों की कोई भलाई नहीं करना चाहते, वे कोई अच्छा काम नहीं करना चाहते कि उनके अच्छे कर्म जमा हों। वे सिर्फ मुक्त होना चाहते हैं, इसलिए न तो अच्छे कर्म करते हैं न ही बुरे।

इस सिद्धांत के विपरीत एक और प्रवृत्ति का जन्म हुआ, बहुत से लोगों द्वारा अपनाई गई एक जीवन पद्धति, विशेषकर यहाँ, वृंदावन में: ये लोग प्रेम और समर्पण में जीना चाहते हैं। वे अच्छे कर्म करना चाहते हैं जिससे ज़्यादा से ज़्यादा अच्छे कर्म वे जमा कर सकें और बार-बार जन्म ले सकें। वे मुक्ति नहीं चाहते, वे इस धरती पर बार-बार लौटना चाहते हैं जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा समय प्रेम और समर्पण की अवस्था में रह सकें।

क्या आप नहीं देख रहे हैं कि यह सब इस पर निर्भर करता है कि आप किस तरह शब्दों का हेर-फेर कर पाते हैं? क्या आप यह नहीं देख रहे हैं कि आप अपनी पसंद के अनुसार, अपनी सुविधा के अनुसार चुनाव कर सकते हैं। एक बार आप इसे समझ लें तो आप तुरंत समझ जाएंगे कि धर्म छल-कपट के सिवा कुछ नहीं है!

मुक्ति या स्वर्ग? अपने कर्म के दर्शन से हिन्दू धर्म लोगों को भ्रमित करता है! – 1 फरवरी 2013

मैं कुम्भ मेले के बारे में पिछले दो हफ्ते में बहुत कुछ लिख चुका हूँ और मुझे लगता है मैंने इस त्योहार के बारे में पूरी तस्वीर पेश कर दी है और यह भी कि वह किस लिए मनाया जाता है और लोग वहाँ सारे कर्मकांडों सहित नहाकर क्या पाने की अपेक्षा करते हैं? लेकिन मुझे लगता है कि कुछ लोग कुछ उलझन में पड़ गए हैं: मैंने लिखा था कि हिन्दू गंगा में इसलिए नहाते हैं कि मृत्यु के बाद स्वर्ग जा सकें।

शायद मैं एक या दो बार यह कह चुका हूँ कि धर्म बिल्कुल तार्किक नहीं है। दरअसल वह बहुत भ्रम फैलाने वाला है और उसकी कई बातें अंतर्विरोधी होती हैं। हिन्दू धर्म में इतनी सारी धार्मिक किताबें हैं कि यह संभव ही नहीं है कि सारी किताबें शब्दशः एक ही बात कह सकें। हिन्दू धर्म में तो कई दर्शन भी सन्निहित हैं और सभी को सही माना जाता है। इस तरह हिन्दू धर्म के अनुयायियों को अपनी सुविधानुसार या अपने लाभ के लिए कुछ भी मनाने की सुविधा प्राप्त है।

हिन्दू धर्म में भी स्वर्ग की अवधारणा है। यह समझने के लिए कि कौन स्वर्ग को प्राप्त हुआ आपको थोड़ा सा कर्म के दर्शन को समझना होगा। आप अपने इस जनम में जीवन भर अच्छे और बुरे कर्म करते हैं। ये सारे कर्म इकट्ठा होते रहते हैं और जब आपका देहांत हो जाता है तब इन कर्मों की बैलेन्स शीट बनाई जाती है और अच्छे और बुरे कर्मों की तुलना की जाती है। आपके सारे बुरे कर्मों को आपके द्वारा किए गए अच्छे कर्मों में से घटाया जाता है और अगर योग धनात्मक होता है तो आप स्वर्ग जाते हैं और योग ऋणात्मक होता है तो आपको नरक की यात्रा करनी पड़ती है। आप तब तक ही स्वर्ग में रह सकते हैं जब तक आपके बचे हुए अच्छे कर्म पूरी तरह ‘खर्च’ नहीं हो जाते। यानी जितने ज़्यादा अपने अच्छे कर्म लेकर आप स्वर्ग जाते हैं उतनी ही ज़्यादा समय तक आप वहाँ रह सकते हैं। और जितने बुरे कर्मों का ‘कर्ज़’ आप पर होता है उतने समय ही आपको नर्क में रहना पड़ता है। जब आपके सारे कर्म, स्वर्ग या नर्क में खर्च हो जाते हैं या आप अपना कर्ज़ अदा कर देते हैं और इसके बाद भी आपकी इच्छा कुछ अच्छा या बुरा अनुभव करने की बनी ही रहती है तो आप फिर जीवन की यात्रा शुरू कर देते है, इस बार किसी और प्रजाति में, जिसे पुनर्जन्म कहा जाता है।

गंगा में स्नान करने के पीछे यह मूल विचार है। अगर इन दिनों में आप इलाहाबाद में गंगा में स्नान कर लेते हैं तो आपके सारे पाप धुल जाते हैं। यह अपने कर्ज़ से मुक्ति है, एक तरह की ऋण मुक्ति योजना के अंतर्गत कर्ज़ मुक्ति की याचना है जिसमें आपको सिर्फ इतना करना है कि गंगा के पवित्र मगर बेहद गंदे पानी में डुबकी लगाएँ और कर्ज़ मुक्त हो जाएँ। आपके कर्मों का बैंक बैलेंस इस स्नान के बाद निश्चय ही धनात्मक हो जाएगा और आप स्वर्ग जा सकेंगे और ज़्यादा से ज़्यादा समय गुज़ार सकेंगे।

तो आपने देखा कि इस पवित्र गंगा स्नान के पीछे मुक्ति कामना नहीं है। मुक्ति तो आपको तब मिलती है जब किसी तरह के, अच्छे या बुरे अनुभव और अहसास की आपकी सारी इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं। आप कह सकते हैं कि कुम्भ मेले में स्नान करने वाले सभी लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, उनकी मुक्ति की कोई इच्छा नहीं है, जन्म-मृत्यु के चक्र से वे छूटना नहीं चाहते, दो जन्मों के बीच कुछ वक्त स्वर्ग में गुज़ारना चाहते हैं।

लेकिन रुकिए, यह भी पूरी तरह सच नहीं है। कुछ लोग ऐसे हैं जो वाकई गंगा में नहाकर मुक्ति की कामना करते हैं। और हाँ, धर्म-ग्रंथों में भी यह लिखा है! यहाँ तक लिखा है कि गंगा को सिर्फ देखने से भी आप मुक्त हो सकते हैं। या, इससे भी एक कदम आगे जाकर यह भी लिखा है कि अगर आप गंगा से हजारों किलोमीटर दूर कहीं रहते हैं तो सिर्फ गंगा नदी का स्मरण कर लीजिये, आपको मुक्ति प्राप्त हो जाएगी!

आप कुम्भ नहाने के इस सारे विचार को अपनी मरज़ी के अनुसार घुमा-फिरा या तोड़-मरोड़ सकते हैं, जो चाहें पा सकते हैं, स्वर्ग पा सकते हैं या मुक्ति पा सकते हैं। हिन्दू धर्म इतना लचीला है कि आपको सब कुछ प्रदान कर सकता है। लेकिन एक और समस्या है, अगर आप मुक्ति की कामना से भी गंगा में डुबकी लगाते हैं तो भी आखिर आपकी एक कामना, यही मुक्ति की कामना तो बची रह ही जाती है। और यह लिखा हुआ है कि मुक्ति तभी संभव है जब आप, आपकी सभी कामनाओं से दूर हो चुके हों। अब क्या किया जाए?

मैं तो आपको यही सलाह दूँगा कि आप धर्मों को और उन्हें समझने की कोशिश को भी तिलांजलि दे दीजिये। आप उन्हें कभी समझ नहीं पाएंगे, बल्कि और अधिक दिग्भ्रमित होते जाएंगे। कर्म के बारे में और धर्मों की भ्रमित करने वाली शिक्षाओं और दार्शनिक बातों और उनके परिणामों के बारे में अभी और भी बहुत सी बातें हैं जो मैं अगले हफ्ते भर पोस्ट करता रहूँगा।

कर्म के तीन प्रकार-संचित,प्रारब्ध एवं क्रियमाण – 14 May 08

मैं आप को अगले सू त्र के बारे में भी बताना चाहूँगा जिसकी मैंने कल के व्याख्यान में व्याख्या कि थी| तीसरे अध्याय के सूत्र की सहायता से मैं यह स्पष्ट करूँगा कि पूर्व का दर्शन कैसा है और पतंजलि का लेखन किस प्रकार का है| कितने अद्भुत रूप से इस व्यक्ति ने सब कुछ इन सूत्रों से स्पष्ट किया है| यदि आप इसका शब्दशः अनुवाद करेंगे तो यह आप को हास्यप्रद लगेगा और संभवतः आप भ्रमित हो जायेंगे| सूत्र है कि-
“यदि आप अपने कर्मों को जान लें तो आप अपनी मृत्यु का समय जान सकते हैं|”

तो आप को क्या लगता है? हाँ यह आश्चर्यजनक है और इसकी सैकड़ो व्याख्याएं हैं| आइये इसके पीछे छुपे दर्शन को समझते हैं| पूर्व का समस्त दर्शन कर्म पर आधारित है किन्तु पश्चिम में यह अपने सही रूप में नहीं आया| यहाँ बहुत से भ्रम हैं क्यों कि दर्शन के मूल सिद्धांत के स्थान पर किसी व्याख्या को अपना लिया गया|

वास्तव में ऐसा कहा जाता है कि कर्म तीन प्रकार के होते हैं-संचित,प्रारब्ध और क्रियमाण| संचित का अर्थ है-संपूर्ण,कुलयोग| अर्थात मात्र इस जीवन के ही नहीं अपितु पूर्वजन्मों के सभी कर्म जो आपने उन जन्मों में किये हैं| आपने इन कर्मों को एकत्र करके अपने खाते में डाल लिया है|

‘प्रारब्ध’,‘संचित’ का एक भाग है,इस जीवन के कर्म| आप सभी संचित कर्म इस जन्म में नहीं भोग सकते क्यूंकि यह बहुत से पूर्वजन्मों का बहुत बड़ा संग्रह है| इसलिए इस जीवन में आप जो कर्म करते हैं, प्रारब्ध, वो आप के संचित कर्म में से घटा दिया जायेगा| इस प्रकार इस जीवन में आप केवल प्रारब्ध भोगेंगे,जो आप के कुल कर्मों का एक भाग है|
तीसरा कर्म क्रियमाण है,वो कर्म जो आप इस जीवन में प्रतिदिन करते हैं| और क्रियामान कर्म से ही संचित कर्मों का निर्माण होता है| तो यह जोड़ घटाना कैसे चलता है?
हमने पहले ही कर्म के प्रति आसक्ति और अनासक्ति के बारे में बता चुके हैं|
और जो भी कर्म हम पूर्ण चैतन्यता से नहीं करते वो क्रिया नहीं प्रतिक्रिया है|
जिसके प्रति आप चैतन्य नहीं हैं वो क्रिया नहीं हो सकती| और जब हम बिना चैतन्यता के कर्म करते हैं,जैसा प्रायः दैनिक जीवन में होता है तो हमारे संचित कर्म बढ़ जाते हैं| यदि कोई आप का अपमान करे और आप क्रोधित हो जाएँ तो आपके संचित कर्म बढ़ जाते हैं| परन्तु,यदि कोई अपमान करे और आप क्रोध ना करें तो आप के संचित कर्म कम होते हैं|
इसे मैं एक योगी के उदाहरण से और अधिक स्पष्ट करता हूँ| वो एक वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न थे कि तभी एक व्यक्ति वह आया और उनका बहुत अपमान किया| वो शांत रहे| कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी,ना वाह्य रूप से ना अंतर्मन में,उन्हें क्रोध भी नहीं आया| बाद में उनके शिष्यों ने,जो सब कुछ देख सुन रहे थे,पूछा कि आप को क्रोध नहीं आया? तो उन्होंने उत्तर दिया कि संभवतः पूर्वजन्म में मैंने उसका अपमान किया था, वास्तव में मैं प्रतीक्षा में था कि वो आकर मेरा अपमान करे| अब मेरा हिसाब बराबर हो गया| अगर मैं क्रोध करता तो फिर कर्म संचित हो जाते|

यही कर्म का सम्पूर्ण दर्शन है| यदि आप चैतन्य रहें, प्रतिक्रिया ना करें तो अपने संचित को नष्ट कर सकते हैं| और इसके लिए आप के अंतर्मन में शांति होनी चाहिए| क्रोध का शमन नहीं करना है अपितु क्रोध उत्पन्न ही नहीं होना चाहिए| और इस प्रकार चैतन्य रहते हुए जब आप अपने संचित को नष्ट करते रहेंगे तो एक दिन वो शून्य हो जायेगा| जब वो समाप्त हो जायेगा तब आप को इस जीवन मरण के चक्र में फिर पड़ने कि आवश्यकता नहीं होगी| हम जन्म क्यों लेते हैं? हम बार बार शरीर धारण क्यों करते हैं? अपने संचित कर्मों को भोगने के लिए| जब तक हमारा हिसाब पूरा नहीं होता तब तक हमें जन्म लेकर अपने कर्मों को भोगना पड़ता है| और जब इस सब का अंत होता है तब सारी इच्छायें और तृष्णायें मिट जाती हैं और पुनः जन्म लेने कि आवश्यकता नहीं रह जाती| यही वास्तविक अंत है, अन्यथा हम यूँ ही जन्म मरण के चक्र में फंसे रहेंगे|

इसलिए,पतंजलि को समझने का प्रयास करें| वह सामान्य मृत्यु के बारे में बात नहीं कर रहे हैं| यह चक्र चलता जायेगा और आप क्रियमाण के द्वारा संचित कर्म का निर्माण करते रहेंगे| परन्तु जब आप अपने संचित को भोग लेंगे और आपका हिसाब पूरा हो जायेगा, तब वह वास्तविक मृत्यु होगी, वास्तविक अंत| और इस तरह यदि आप को अपने कर्मों का ज्ञान है तो आप अपनी मृत्यु का समय बता सकते हैं|

आज हम मुंस्टर शहर में थे,खिली धूप और सुहाने मौसम का आनंद हमने बाज़ार में खरीदारी और उद्यान में टहल कर उठाया| यह एक सुंदर शहर है और काफी हरियाली है| कल की दैनन्दिनी मैं वुपरटाल में लिखूंगा,जहाँ हम कल सुबह जा रहे हैं|

कर्म अच्छा हो या बुरा बंधन का ही कारण है – 28 अप्रैल 08

हम लोग नोएमी के योग केंद्र में हैं और जैसा कि मैंने बताया यहाँ एक रसोईघर है जहाँ इस समय आयुर्वेदिक भोजन पकाया जा रहा है,जिसने सारे कक्ष को एक अद्भुत सुगंध से भर दिया है| नोएमी इस समय योग प्रशिक्षण दे रही है और जितने भी छात्र आये हैं उनका कहना है कि इस सुंदर सुगंध के कारण उन्हें फिर से भूख लगने लगी है| रात्रि के भोजन से पहले मैं अपने कोलोन के व्याख्यान के बारे में और लिखूंगा| कल और परसों मैं पहले ही लिख चूका हूँ कि कर्मयोग क्या है,जब आप अपने कर्म के फल की आशा नहीं रखते|
अगर आप कर्म के परिणाम की आशा रखते हैं तो आप को फल मिलेगा| अगर आप कर्मयोग का पालन करते हैं तो आप अपने कर्म और उसके फल को भगवान को अर्पित कर देते है| अगर नहीं, तो आप को फल मिलेगा, चाहे वो जैसा भी हो| और फिर इस से अंतर नहीं पड़ता कि फल अच्छा है या बुरा, वो आपको बंधन में डाल देता है| आप फल चाहते थे तो आप को फल मिला, चाहे वो अच्छे कर्म का था या बुरे कर्म का|
ये फल आप को जंजीरों में जकड देता है| बुरे कर्मो का फल लोहे की जंजीरों जैसा है और अच्छे कर्म का सोने की जंजीरों जैसा| लोहे की जंजीरों से मुक्ति पाना फिर भी सहज है| सोने को नष्ट करना अपेक्षाकृत कठिन है और साथ ही जब आप सोने कि जंजीरों को देखेंगे तो उनसे मोह हो जायेगा और आप उनसे मुक्त होना ही नहीं चाहेंगे| वो जंजीर इतनी सुंदर लगने लगेगी कि आप सोचेंगे कि आप ने कौन से अच्छे कर्म किये कि वो आप के भाग्य में आयीं| इस तरह अच्छा और बुरा, दोनों ही फल आप को बंधनों में बांध देता है| कर्म ही आप के सांसारिक बंधन का कारण है, ये आप को मुक्त नहीं होने देता| इसलिए ये आवश्यक है कि आप जो भी करते हैं उसे अर्पित करते चलें| इस प्रकार आप बुरे फल से मिलने वाली निराशा से बचे रहेंगे और कर्ता होने के अहंकार से भी, जो अच्छे फल के साथ बढ़ता जाता है|

मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि आश्रम का भोजन आज फिर किसी के द्वारा प्रायोजित किया गया है| और मैं आप सब का धन्यवाद करना चाहता हूँ जो बिना अपेक्षा के बाल शिक्षा के इस अभियान में सहयोग दे रहे हैं| आप इन बच्चों को कपडे, भोजन और सब से बढ़कर एक अच्छे भविष्य कि आशा दे रहे हैं, यह सराहनीय है और अद्भुत भी|

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