क्या करें जब असुरक्षा की भावना से पीड़ित लोग आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें? 18 नवंबर 2015

आज मैं एक ऐसे रवैए के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिसे एक प्रकार की नकारात्मकता कहा जा सकता है। कुछ लोग होते हैं जो दूसरों को नीचा दिखाकर बहुत खुश होते हैं। वैसे वे नकारात्मक नहीं होते-लेकिन वे आपको नकारात्मक स्थितियों में लाकर बहुत खुश होते हैं, ऐसी स्थिति जिसमें अपने आपको पाकर आप कतई खुश नहीं होते!

मुझे पक्का विश्वास है कि आप भी ऐसे लोगों से अवश्य मिले होंगे! आप कुछ भी कहेंगे या आप कुछ भी कर लें वे आपकी आलोचना करने का कोई न कोई बहाना ढूँढ़ ही लेंगे, आपका व्यवहार कैसा रहा या आपके सोचने का तरीका किस तरह गलत था। जानबूझकर वे आपको उत्तेजित और नाराज़ करने के लिए कोई न कोई ऐसी बात कहेंगे कि आपको लगेगा, आप उस चर्चा के लायक नहीं हैं या चल रहे वार्तालाप में आपका स्वागत नहीं किया जा रहा है या आप पूरी तरह गलत हैं।

मुझे लगता है, यह एक मनोवैज्ञानिक समस्या है और काफी हद तक अहंकार से जुड़ी है। ऐसे व्यक्ति पढ़े-लिखे हो सकते हैं और उनके पास बहुत सी डिग्रियाँ भी हो सकती हैं लेकिन वे खुद अपने बारे में अच्छे विचार नहीं रखते। वे भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करते और दूसरों से अपने आपको बेहतर दिखाकर अपने अहं को संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं।

और इस तरह वे दूसरों को नीचा दिखाकर आनंद प्राप्त करते हैं। वे सोचते हैं कि जिस तरह वे किसी काम को अंजाम देते हैं, वही सबसे अच्छा तरीका है। और कोई भी, जो अलग तरह से व्यवहार करता है, वह वास्तव में मूर्ख है और इसलिए उनसे कमतर है-जिससे वे अपने बारे में बेहतर महसूस कर सकें। इसके लिए वे दूसरों को दुखी करने में भी संकोच नहीं करते। यह समझ या संज्ञान कि वे अपने आप से, आसपास की दुनिया और इस जीवन से ही बेहद नाखुश हैं, इन परिस्थितियों में ही उनके व्यवहार का मूल कारण होता है।

जैसे ही पता चले कि ये लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं, आप उनके संबंध में अपनी सीमाएँ तय कर लीजिए। अगर उनके साथ आप भी परेशान नहीं होना चाहते और नहीं चाहते कि कोई आपको खराब मनःस्थिति में घसीट ले जाए-जिसे वास्तव में वे ही आपके लिए निर्मित करना चाहते हैं तो आपके लिए इस कोशिश को विफल करना आवश्यक है। सबसे अच्छी बात यह होगी कि जितनी जल्दी हो, आप उनसे पीछा छुड़ा लें। उनके साथ आपका सामान्य वार्तालाप संभव नहीं है। आप उन्हें नहीं सुधार सकते क्योंकि वैसे भी वे समझते हैं कि हर चीज़ वे सबसे बेहतर जानते हैं! जब तक आप परेशान और दुखी नहीं हो जाते, वे रुक नहीं सकते।

इसलिए याद रखिए कि वास्तव में वे खुद ही भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और अपने अहं और आत्मसम्मान को लेकर परेशान हैं। उन्हें आपकी भावनाओं को छूने न दें या अपनी भावनाओं को उनसे बचाकर रखें। उनकी बातों को गंभीरता से न लें और सबसे अच्छी बात, उनके साथ अपनी चर्चा को संक्षिप्त और हल्का-फुल्का बनाए रखें। इस तरह आप अपनी प्रसन्नचित्तता और भावनाओं को उन लोगों द्वारा क्षतिग्रस्त किए जाने से बचा सकेंगे जो सिर्फ दूसरों का मूड खराब करके ही खुश रह सकते हैं!

स्वास्थ्य के मुकाबले अपनी बीमारी से ज्यादा प्यार मत कीजिए! 5 मई 2014

आज मुझे अपने ज़ख्म (घुटने) के टाँके निकलवाने अस्पताल जाना है। मैं अब काफी स्वस्थ हो चुका हूँ मगर मुझे इस बात की विशेष ख़ुशी है कि जर्मनी के लिए उड़ान भरने से पहले मुझे अपने आप को तैयार करने के लिए दस दिन का अवकाश और मिल जाएगा। आज मैं जिस स्थिति में हूँ, उसमें अनायास ही मुझे यह विचार करने का मौका मिला है कि जब आप घायल या बीमार होते हैं तो आपकी दिमागी हालत का उस पर बड़ा प्रभाव पड़ता है: आप चाहें तो उस बीमारी या तकलीफ का मज़ा लेते रह सकते हैं या जितना चाहें स्वस्थ महसूस कर सकते हैं।

अपने सलाह-सत्रों की वजह से मुझे कई ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिलता रहता है, जिन्हें बीमार पड़ना अच्छा लगता है। अपने सलाह सत्र की शुरुआत ही वे अपने बीमार पड़ने की कहानी से करते हैं। कोई बड़ी बीमारी नहीं होती मगर जब वे दूसरों से बार-बार उसका ज़िक्र करते हैं तो वे सहानुभूति व्यक्त करने लगते हैं-जो स्वाभाविक ही, उन्हें बहुत अच्छी लगती है। धीरे-धीरे, अगली बार बीमार पड़ने तक या उनकी तकलीफ कुछ ज़्यादा समय तक बनी रहे तो वे समझ जाते हैं कि बहुत सी चीज़ों के लिए यह बहाना बहुत कारगर सिद्ध होता है। और बिना अशिष्ट दिखाई दिए ‘नहीं’ कहने के मामले में यह सबसे अधिक उपयोगी होता है।

उनमें आत्मविश्वास की कमी होती हैं और साफ मना करने की जगह कि वे उनसे कहा गया काम नहीं करना चाहते, वे कहते हैं कि बीमार हैं इसलिए वे यह काम नहीं कर पाएंगे। यह पूरी तरह सही न भी हो कि उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है तो भी काम टालने का यह आसान तरीका होता है और दूसरों को उनकी बात पर भरोसा करना ही पड़ता है। वह काम वे नहीं करना चाहते, यह सच कहने के लिए उन्हें अपने आत्मविश्वास और शक्ति का प्रदर्शन नहीं करना पड़ता।

तो वे बीमार बने रहते हैं। भले ही वे पूरी तरह स्वस्थ और ठीक-ठाक हों या उन्हें कोई छोटी मोटी, मामूली तकलीफ हो मगर वे जिद पकड़ लेंगे कि वे बीमार हैं। जितनी तकलीफ है, उससे कहीं ज़्यादा गंभीर रूप से बीमार! यह आवश्यक नहीं कि वे जानते हों कि वे क्या कर रहे हैं, क्या कह रहे हैं। उनका अवचेतन इतना शक्तिशाली होता है कि वे सचाई को अपने आपसे छिपा लेते हैं और इस तरह छिपाते हैं कि वह झूठ उन्हें अच्छा लगने लगता है। वे हर तरह से अपने आपको विश्वास दिला देते हैं कि वाकई वे बीमार हैं और परिणाम यह होता है कि वे उसी तरह व्यवहार करने लगते हैं।

एक बार उस राह पर चल पड़े तो फिर वे अपनी बीमारी से इतना प्यार करने लगते हैं कि उनके लिए उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। उन्हें इस बात का ज़रा सा भी गुमान नहीं होता कि लोग उनका नाटक समझ रहे हैं, दूसरे यह जान रहे हैं कि वे ज़रुरत से ज़्यादा बन रहे हैं मगर वे भी इसका मज़ा लेने लगते हैं। मित्र उन्हें दिलासा देने लगते हैं कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन इससे बहुत नुकसान होता है और इसी बिंदु पर लोग मेरे पास सलाह लेने आते हैं।

अधिकतर मैं उन्हें स्वस्थ जीवन के आनंद को अनुभव करने की सलाह देता हूँ। मैं उनसे यह नहीं कहता कि वे बिल्कुल बीमार नहीं हैं-सत्र कुछ देर का होता है और इतने कम समय में मैं कैसे जान सकता हूँ उन्हें क्या हुआ है? लेकिन मेरा कहना है कि आप वाकई बीमार हों तब भी जितना संभव ही, भले-चंगे होने का नाटक कीजिए। नियमित जीवन बिताइए, बीमारी से पैदा असुविधाओं के साथ जीने के नए तरीके ढूँढ़िए और सामान्य जीवन जीने की कोशिश कीजिए। अपनी बीमारी के पीछे छिपने और उसकी आड़ में ‘न’ कहने की अपेक्षा सीधे ‘नहीं’ कहने की आदत डालिए। जो हैं, वही बने रहिए और जीवन का आनंद लीजिए!

इन दिनों भी मैं सिर्फ बिस्तर पर लेटा नहीं रहता: मैं अपनी फिजियोथेरपी के व्यायाम करता रहा हूँ, अपरा के साथ खेलता रहा हूँ, फोन पर बात करता रहा हूँ और कम्प्यूटर पर काम करता रहा हूँ। मेरे ये दिन भी सामान्य दिनों की तरह ही गुज़र रहे हैं, बस थोड़ी गतिशीलता और गतिविधियाँ कम हो गई है। सामान्य रूप से जो कुछ मैं करता रहा हूँ वह सब बिस्तर पर बैठे-बैठे, अब भी कर रहा हूँ। बिस्तर पर बीमार पड़े रहना मुझे बिल्कुल नहीं सुहाता इसलिए मैं इस बात को बिल्कुल महत्व नहीं देता। जितना काम कर सकता हूँ, करता रहता हूँ- और मुझे लगता है कि इस बात ने भी मुझे तेज़ी के साथ स्वस्थ होने में मदद की है।

अब देखना यह है कि आज डॉक्टर क्या कहते हैं-लेकिन मुझे लगता है कि मैं दस दिन में इतना स्वस्थ हो जाऊंगा कि आराम से जर्मनी के लिए रवाना हो सकता हूँ!

असुरक्षा और आत्मविश्वास की कमी लोगों को गुरु की खोज में लगा देते हैं – 2 जून 2013

पिछले हफ्ते मैंने आपको एक आयरिश महिला के बारे में बताया था जिससे मैं 2005 में मिला था और जिसके जीवन में व्याप्त असुरक्षा के चलते वह आत्मिक शांति की खोज में विभिन्न गुरुओं के चक्कर लगाती रहती थी कि कभी न कभी कोई उपयुक्त व्यक्ति उसे मिल जाएगा। कुछ मुलाकातों के बाद मैंने नोटिस किया कि जो वह चाहती थी वह था: एक गुरु जो उसकी जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर उठा ले।

उसके भीतर आत्मविश्वास की बहुत कमी थी। ऐसे लोग बहुतायत से मिलते हैं, विशेषकर पश्चिम में जहां लोगों को यह समझने में काफी दिक्कत आती है कि आखिर जीवन में वे ठीक-ठीक चाहते क्या हैं। इसलिए वे किसी बात पर पक्का निर्णय नहीं कर पाते और क्या उचित निर्णय लिया जाए, दूसरों से पूछते हैं। इस महिला को भी यह ठीक-ठीक पता नहीं था कि वह क्या चाहती है और आत्मविश्वास भी नहीं था।

ऐसे असुरक्षित व्यक्तियों के पास जो होता है वह है दूसरों पर सहज विश्वास करने का माद्दा और यह उस महिला में भी कूट-कूटकर भरा था। जब ऐसे किसी व्यक्ति को वह पा जाती थी तो उस पर आँख मूंदकर भरोसा करती थी। वह इसी तरह मुझ पर भी भरोसा करने लगी और उसे विश्वास हो गया कि मैं किसी जादुई तरीके से उसके भविष्य के बारे में कोई इशारा कर सकता हूँ या अपने आत्मज्ञान से उसे ऐसी सलाह दे सकता हूँ जिस पर अमल करना उसके लिए उचित होगा। उसके इस विचार को मैं इतना समय गुज़र जाने के बाद उसका अंधविश्वास ही कह सकता हूँ लेकिन उस समय मुझे सिर्फ यह महसूस हुआ कि यह महिला मुझमें किसी गुरु की खोज कर रही है। मगर बहुत पहले, गुफा के एकांत में पर्याप्त वक़्त गुजारने के बाद, यह काम मैं छोड़ चुका था।

यह समझते ही मैंने तुरंत अपनी अगली मुलाक़ात में उससे स्पष्ट कहा कि मैं कोई गुरु-वुरु नहीं हूँ और मेरा उसे अपना शिष्य बनाने का कोई इरादा नहीं है। मैंने इसके बारे में बहुत गंभीरतापूर्वक उससे बात की और उसे उसकी जिम्मेदारियों के बारे में समझाया। मैंने उससे कहा कि एक व्यक्ति के रूप में कभी भी वह मुझसे सलाह ले सकती है। उसकी बात तल्लीनता के साथ सुनने के लिए और उस पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए भी मैं प्रस्तुत हूँ। मगर मैं उसे यह नहीं बता सकता कि उसे ठीक-ठीक क्या करना चाहिए। उसे खुद सोच-समझकर, पूरे एहसास के साथ अपना निर्णय लेना होगा!

हमारी कुछ देर बहुत गंभीर और साफ-साफ बात हुई। उसके बाद मेरे साथ उसका संपर्क धीरे-धीरे कम होता गया, मगर बना रहा। फिर कई वर्षों के अंतराल के बाद उसने मुझे बताया कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को पा लिया है जिसे वह प्रेम करती है और जिसके साथ सारा जीवन व्यतीत करना चाहती है। वह उस व्यक्ति को साथ लेकर मुझसे मिलने जर्मनी भी आई। वे बड़े प्यारे लग रहे थे और दोनों का स्वभाव एक जैसा था। जो भी उनसे मिला, यही कहता था कि अपने हंसमुख स्वभाव के कारण ऐसा लगता है जैसे दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हों!

वे हमारे एक ध्यान-सत्र में शामिल हुए और हमें पुनः यह अनुभूति हुई कि वाकई वे एक दूसरे के लिए ही बने हैं। मेरा बोलना अभी जारी ही था कि तभी कमरे के पिछले हिस्से से दोनों की खर्राटे भरने की आवाज़ आने लगी; दोनों अपने आसन पर गहरी निद्रा में लीन हो गए थे और पूरे सत्र में सोते ही रहे! उन्हें एक दूसरे के करीब सोते हुए देखना बहुत मासूम सा, प्यारा दृश्य था। अंत में दोनों मेरे पास आए और गले लग गए। फिर कहा, “यह बहुत शानदार ध्यान-सत्र था!”

जीवन में असुरक्षा के एहसास के कारण आपको दूसरों से आश्वस्ति की ज़रूरत होती है – 26 मई 2013

एक व्यक्ति, जिससे मैं 2005 में डब्लिन में हुए अपने एक बड़े आयोजन के दौरान मिला था, वहाँ की एक महिला थी। मेरी उससे मुलाकात हुई, उसे वह कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा और उसने मेरे व्यक्तिगत सत्र में भी भाग लिया। बाद के कई सालों तक मैं उसके लिए मददगार साबित होता रहा, मगर सिर्फ एक ही एतबार से: जो कुछ भी वह बताती थी उसे मैं ध्यान से सुनता था!

पहले मैं आपको इस महिला के बारे में कुछ जानकारी दे देता हूँ। वह उम्र की तीसरी दहाई में थी और अकेली थी। उसका रीयल इस्टेट का व्यापार था और जहां तक मुझे याद है उसे हमेशा यह डर बना रहता था कि कहीं उसे धंधे में कोई बड़ा नुकसान न हो जाए। बाद की उसकी बातों से मुझे ऐसा लगा कि आर्थिक मामले ही उसकी बातों का केंद्रीय विषय होते थे और उसकी बातें आर्थिक नुकसान, पूरी तरह आर्थिक बर्बादी या यह सामान्य एहसास कि भविष्य में उसके पास पर्याप्त धन नहीं होगा, इन बातों पर सम्पन्न होती थी। निस्संदेह, जैसा कि कुछ साल बाद आयरिश अर्थव्यवस्था में आई मंदी और बाज़ार में आई तेज़ गिरावट ने ज़ाहिर भी किया, उसका डर निराधार नहीं था। लेकिन उसके डर का मूल कारण यह तर्कसंगत आर्थिक विचार नहीं था; दरअसल उसका डर अकारण था और उसकी भावनाओं से उद्भूत था। मुझे अक्सर यह लगता था कि यह महिला भीतर ही भीतर असुरक्षित महसूस करती है।

यह असुरक्षा सिर्फ धन संबंधी नहीं थी बल्कि उसके जीवन के सभी पहलुओं पर उसकी छाया दिखाई देती थी। जैसा कि हर सामान्य सिंगल स्त्री या पुरुष होता है, वह भी एक जीवन-साथी की तलाश में थी और क्योंकि वह एक खुशमिजाज और खुले दिल वाली महिला थी, मैंने इन सालों में जाना कि उसने विभिन्न देशों के कई पुरुषों के साथ संबंध बनाने का प्रयास किया। अधिकांश मामलों में उसकी यही असुरक्षा की भावना किसी भी संबंध को किसी गंभीर शुरुआत से पहले ही खत्म कर देती थी। किसी बात पर अंतिम निर्णय लेना ही उसके लिए एक मुश्किल काम था।

उसकी असुरक्षा की भावना ही उसे एक के बाद दूसरे गुरु के पास जाने के लिए मजबूर कर देती थी, किसी आध्यात्मिक गुरु की तलाश में, जिसके चरणों में उसे सहारा मिले। जो उसे बताए कि उसे क्या करना चाहिए जिससे उसे यह एहसास हो कि जो कुछ वह कर रही है, सही कर रही है। उसने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा एक आध्यात्मिक गुरु की तलाश में लगाया था और शायद मेरे आयोजन में भी वह इसी खोज के उद्देश्य से आई थी।

मैंने सिर्फ इतना किया कि उसकी समस्याओं को ध्यान से सुनता था। और स्वयं उसके पास अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान उपलब्ध थे। वह बहुत समझदार महिला थी और उसके विचारों में कोई दोष नहीं था इसलिए शायद वह पहले से ही समझ जाती थी कि उसके समाधानों को सुनकर मैं क्या कहूँगा। और मुझे चुपचाप उसकी बात को ध्यान से सुनना होता था और सहमति में ‘हाँ’ कहना होता था। अक्सर यही बात उसे किसी काम में आगे बढ़ने का पर्याप्त ढाढ़स प्रदान करती थी। उसे इसी बात की ज़रूरत थी; कोई उसकी बात सुने और कहे, ‘हाँ, ठीक है, तुम बिल्कुल ठीक कर रही हो!’
फिर भी, कभी कभी ऐसा होता था कि मुझे उसके विचार के विपरीत बात कहनी पड़ती थी। मैं स्पष्टवादी हूँ और ईमानदारी के साथ और साफ-साफ उससे कहता था कि जो वह कह रही है, वह बात पूरी तरह मूर्खतापूर्ण है और मैं किसी भी हालत में ऐसा करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। मेरी बात स्पष्ट होती थी और यही उसके लिए महत्वपूर्ण था। वह मेरी बात को स्वीकार कर लेती थी, भले ही वह उसकी बात से पूरी तरह अलग ही क्यों न हो। वह मेरे विचार की तरफ मुड़ जाती थी और कहती थी, ‘ओह, आप ठीक कह रहे हैं।’

जब मुझे यह समझ में आया मैंने सोचा कि मैं अपने पुराने गुरु के रोल के काफी नजदीक चला आया हूँ और यह मैं अब बिल्कुल नहीं चाहता था। मैं अब किसी भारतीय या आयरिश व्यक्ति का गुरु नहीं बनना चाहता। मैं अपने इस निर्णय के बारे में क्या कर सकता हूँ?