हाँ, मुझे सेक्स, पैसा, भौतिक पदार्थ और मेरी पत्नी पसंद हैं और मुझे कोई अपराधबोध भी नहीं है! 19 नवंबर 2015

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक ऐसा मेहमान आया, दुनिया के बारे में जिसका बहुत कट्टर नज़रिया था। कल मैंने आपको बताया था कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो, आप कुछ भी कहें या करें, आपको नीचा दिखाने की चाह रखते हैं। यह व्यक्ति उसी तरह का व्यक्ति था- और आज मैं उसी व्यक्ति को ऐसे व्यवहार का उदाहरण बनाना चाहता हूँ।

यह व्यक्ति अपने आप को कम्युनिस्ट विचारधारा का नास्तिक कहता था। वह हमेशा बातचीत के लिए सन्नद्ध रहता था-जो अक्सर दूसरों को नीचा दिखाने की कवायत में बदल जाती थी। इसी तरह जब एक बार हम आश्रम में टहल रहे थे तो उसने मेरे कपड़ों के बारे में पूछा। निश्चय ही, यह पहला मौका नहीं था जब किसी ने मुझसे मेरे कपड़ों के बारे में पूछा था। दरअसल यह अक्सर होता है लेकिन इस बार प्रश्न के स्वर में एक प्रकार का आरोप नज़र आता था: अगर मैं खुद को नास्तिक कहता हूँ तो ऐसे कपड़े क्यों पहनता हूँ जिससे कोई अन्य धारणा बनती है?

अपने ब्लॉगों में पहले ही मैं स्पष्ट कर चुका हूँ कि अपने कपड़ों से मैं कोई सन्देश नहीं दे रहा हूँ। जैसे भी हों, मुझे यही कपड़े पसंद हैं और दूसरी तरह के कपड़े मैं नहीं पहनना चाहता।

अपने प्रश्न के इस उत्तर पर उसने दूसरा प्रश्न दाग दिया: आपको अपने कपड़े पसंद हैं? यानी आपको भौतिक वस्तुएँ पसंद हैं?

जी हाँ, पसंद हैं! मुझे बहुत से साज़ो-सामान पसंद हैं और पैसा कमाना भी पसंद है। मुझे अपने काम से प्यार है और मैं अपनी पत्नी और बेटी से भी प्यार करता हूँ! मैं किसी तरह की धार्मिक जड़ता से या ऐसे किसी अन्य दर्शन से बंधा हुआ नहीं हूँ, जो मुझे सलाह दे कि यह पहनो और वह न पहनो! मैं किसी दूसरे व्यक्ति के विचारों को इजाज़त नहीं देता कि वे मेरी भावनाओं को निर्देशित करने लगें!

बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि भौतिक वस्तुओं से अलिप्तता ही सही रास्ता है। बहुत से लोग ब्रह्मचर्य पर विश्वास करते हैं और भावनाओं के प्रति अलिप्तता को भी उचित मानते हैं। भारत में ऐसे लोग अधिकतर धार्मिक साधू होते हैं। पश्चिम में भी ऐसे लोग अध्यात्मवादियों में पाए जाते हैं। वे अधार्मिक हो सकते हैं लेकिन फिर भी उनकी कोई न कोई विचारधारा होती है और साथ ही यह विचार कि आपको क्या प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

ये सारे लोग मानते हैं कि हमें अपने कपड़ों से लगाव नहीं होना चाहिए, पैसे से प्यार नहीं होना चाहिए और हमें अपने करीबी लोगों से अलिप्त रहना चाहिए। उन्हें जो मानना है, मानते रहें लेकिन मैं अपने जीवन का पूरा मज़ा लेना चाहता हूँ! मैं मानता हूँ कि जीवन का आनंद न लेना गलत है इसलिए मुझे अपने वस्त्र पसंद हैं और मैं अपने काम से प्रेम करता हूँ। जैसे मुझे गरीब बच्चों की मदद करना अच्छा लगता है, उसी तरह पैसे कमाना भी बहुत अच्छा लगता है। मैं अपनी बेटी से और पत्नी से प्यार करता हूँ, मुझे सेक्स बहुत पसंद है और मुझे हर तरह की आरामदेह सुविधाओं का उपभोग भी बहुत पसंद है। मैं छुट्टियाँ मनाना पसंद करता हूँ-जैसा कि मैं इस समय जर्मनी में अपने परिवार और बहुत सारे दोस्तों के साथ कर रहा हूँ!

मुझे जीवन का आनंद लेना पसंद है। मुझे जीवन से प्यार है और मानता हूँ कि हम सब को जीवन का हरसंभव अधिक से अधिक आनंद प्राप्त करना चाहिए। यदि आप कोई इतर विचार रखते हैं, तो बेशक अपने विचार के साथ खुश रहें और उसी के अनुसार जीवन बिताएँ-मुझे अपने विचारों के लिए नीचा दिखाने की कोशिश न करें। इसमें आपको सफलता नहीं मिलेगी और आप बेकार ही मेरा और खुद अपना समय बरबाद करेंगे। मैं आपको सहमत करने की कभी कोशिश नहीं करूँगा। मैं सिर्फ एक सलाह दूँगा: सिर्फ एक बार मेरी तरह जीवन का आनंद लेने और उससे प्यार करने की कोशिश करके देखिए। आप पछताएँगे नहीं!

माता-पिता के प्रेम में अपने जीवन से खिलवाड़ – 23 अप्रैल 2015

कल मैंने अपने ब्लॉग में बच्चों के लालन-पालन संबंधी प्रश्नों पर अपने विचार रखे थे, जिसमें बहुत छोटे बच्चों और किशोरों के संदर्भ में ही चर्चा की थी। आज मैं उन बच्चों के विषय में चर्चा करना चाहता हूँ, जो जल्द ही वयस्क होने वाले हैं या हो गए हैं। यह मैंने कई बार खुद देखा है और मेरे सलाह-सत्रों में कई लोगों ने इस समस्या पर मुझसे चर्चा भी की है: जब अभिभावक, खासकर यदि अभिभावक एक ही हो अपने बेटे या बेटी पर इतना अधिक आश्रित हो जाते हैं कि वे उन्हें हाथ से निकलने ही नहीं देना चाहते-और इस तरह बच्चों को अपनी राह खुद चुनने की स्वतंत्रता में बाधक बनते हैं!

यह कुछ अमूर्त और जटिल सा लग रहा है लेकिन मैं एक उदाहरण की विस्तृत चर्चा से यह बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ कि मेरे कहने का अर्थ क्या है।

एक दिन बीस साल की एक महिला मेरे पास सलाह लेने आई। उसने बताया कि वह मेरी राय इसलिए चाहती है कि उसके आसपास के लोगों के मुक़ाबले मैं उसकी समस्या को पूरी तरह अलग नजरिए से देख सकूँगा। उसका मानसिक द्वंद्व इस प्रकार था:

वह अपनी माँ के साथ रहती थी। जब वह नौ बरस की थी, उसके माता-पिता ने तलाक ले लिया था और उसके बाद कुछ अप्रिय घटनाओं और आपसी विवादों के चलते उसने और उसकी माँ ने उसके पिता से कोई संपर्क नहीं रखा था। उसकी माँ ने अकेले ही उसका लालन-पालन किया था और पूरे दिलोदिमाग से सारा जीवन इसी काम में न्योछावर कर दिया था। अब वे आपस में बहुत नजदीक आ गए थे और सिर्फ और सिर्फ माँ पर ही बेटी का भरोसा था और उसे ही वह दुनिया में सबसे अधिक प्यार करती थी।

दो साल पहले इस युवा लड़की ने अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की और आगे की पढ़ाई हेतु देश भर के कई विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए आवेदन किया। कुछ विश्वविद्यालयों ने उसके आवेदन को स्वीकार करते हुए पत्र लिखे, जिनमें से एक उनके शहर के पास ही था और दूसरा, जिसमें वह दाखिला लेना चाहती थी, अधिक दूर था।

उसकी लालसा बाद वाले विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की थी, घर में माँ की छत्रछाया से दूर, बाहर निकलकर दुनिया को अपनी नज़रों से देखने की। अब वह जीवन के आगत रोमांच की कल्पना करने लगी और थोड़े अपराधबोध के साथ उसे लगता कि आज तक वह उससे पूरी तरह महरूम रही है-क्योंकि जिस तरह माँ उसकी देखभाल करती थी, उसी तरह वह भी तो उसकी देखभाल करती रही है! लेकिन फिर उसने तुरंत स्पष्ट किया कि वह अपनी माँ से बहुत प्यार करती है और उनसे बढ़कर उसके लिए कुछ भी नहीं है। यह भी कि, इसी तरह माँ भी उससे उतना ही प्यार करती है। कुल मिलाकर यह कि वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती थी, जिससे यह लगे कि वह एहसान फरामोश है, कृतघ्न है। माँ ने उसके लिए सब कुछ किया है, प्यार दिया है, श्रम किया है, तकलीफ़ उठाई हैं। अंततः वह घर पर ही रही। उसने उसी विश्वविद्यालय को चुना, जो घर के करीब था।

जब हमारी मुलाक़ात हुई थी, वह इसी परिस्थिति में जी रही थी। और अब माँ के कई व्यवहार उसे नागवार गुजरने लगे थे। जब भी माँ से वह कोई प्रतिवाद करती, तुरंत अपराधबोध से परेशान हो उठती और इस गुस्से को भी मन से निकाल न पाती कि माँ ने उसे वास्तविक जीवन जीने के अधिकार से वंचित कर रखा है। इस उलझन के साथ वह मेरे पास आई थी।

मैंने उससे कहा कि उसका गुस्सा साफ बताता है कि वह अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहती है। मैंने उसे ठीक वही करने के लिए प्रोत्साहित किया और वह भी बिना किसी अपराधबोध के। मैंने कहा, अगर वह ऐसा नहीं करेगी तो क्या हो सकता है, सामने आ चुका है, साफ दिखाई दे रहा है-जीवन भर की कटुता और विद्वेष! ऐसी भावनाएँ, जो आसानी से उसके और माँ के बीच के प्रेम को नष्ट कर देंगी।

उसकी बहुत सी महत्वाकांक्षाएँ थीं, बहुत से लक्ष्य, बहुत से सपने थे, इसलिए विशेष रूप से इस उम्र में उन्हें साकार करने की उसे कोशिश करनी चाहिए थी और जीवन के रोमांच में कूद पड़ना चाहिए था! इसका यह मतलब कतई नहीं था कि वह अपनी माँ को 'त्याग' देती, उनके साथ 'एहसान फरामोशी' करती! वह अब भी उनका ख्याल रख सकती थी-बस, कुछ अधिक दूरी से! और कुछ समय गुज़रने के बाद, जीवन में कुछ और स्थिरता और आज़ादी प्राप्त करने के बाद, आज के मुकाबले जीवन थोड़ा और संवर जाने के बाद हो सकता है कि वे भविष्य में पुनः एक साथ रहने का कोई रास्ता निकाल सकें! ऐसी परिस्थिति भी निर्मित हो सकती है कि वह माँ के और करीब रहकर उसकी सेवा कर सके। और यही सब मैंने उससे कहा।

मेरी नज़र में यही तरीका था जो बेटी को अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से जीने की स्वतन्त्रता प्रदान करते हुए उनके आपसी प्रेम की रक्षा कर सकता था-और मुझे विश्वास है, उसकी माँ ने भी इस बात को समझा होगा!

साथ समय गुज़ारना प्यार की गारंटी नहीं है – 19 अगस्त 2014

अभी-अभी भारत लौटा हूँ तो स्वाभाविक ही मुझे जर्मनी और यहाँ, भारत के बीच मौजूद सांस्कृतिक भिन्नता का एहसास बड़ी शिद्दत के साथ हो रहा है। लेकिन साथ ही कई समानताएँ भी दोनों के बीच हैं, भले ही वे आसानी से नज़र नहीं आतीं। यह कहना युक्तियुक्त होगा कि हम सब मनुष्य हैं और हमारी भावनाएँ और संवेदनाएँ एक दूसरे से बहुत अलग नहीं हैं। आज अपने ब्लॉग में मैं एक बार फिर प्रेम पर ही चर्चा करना चाहता हूँ।

शायद आप जानते होंगे कि भारत में अधिकाँश विवाह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) ही होते हैं, जिन्हें अधिकतर उनके अभिभावक तय करते हैं। अक्सर दूल्हा और दुल्हन पहली बार एक-दूसरे को विवाह के दिन ही देख पाते हैं हालाँकि आजकल विवाह से पहले कम से कम एक बार दोनों का मिलना आधुनिकता की श्रेणी में आता है और ख़ुशी की बात है कि यह चलन तेज़ी के साथ बढ़ रहा है।

इसके पीछे एक विचार यह भी है कि अगर दोनों एक साथ कुछ समय गुज़ार लेंगे तो दोनों के बीच प्रेम सम्बन्ध पनपने लगेगा।

क्या दो अजनबियों का एक बार मिल लेना इस बात को संभव बना सकता है? मैं नहीं समझता।

सभी अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत करते हुए प्रेम का अनुभव करना चाहते हैं। चाहते हैं वे प्रेम दें और बदले में उन्हें प्रेम प्राप्त हो। लेकिन दुर्भाग्य से प्रेम हर विवाह का हिस्सा नहीं बन पाता, कई बार बहुत समय बीत जाने के बाद भी। फिर भी मैंने आयोजित विवाहों में भी समय के साथ प्रेम को उपजते देखा है और कई प्रकरणों में समय के साथ उसे प्रगाढ़ होते भी देखा है। मेरे लिए मेरे माता-पिता आपसी प्रेम के सबसे बड़े उदाहरण हैं और हमेशा बने रहेंगे क्योंकि 50 साल के लम्बे अन्तराल के बाद भी वे सदा एक दूसरे के साथ प्रगाढ़ प्रेम के सूत्र में बंधे रहे। लेकिन मेरे सामने ऐसे भी कई उदाहरण हैं, जहाँ ऐसा संभव नहीं हो पाया। जहाँ कभी भी प्रेम नहीं उपज पाया, हालाँकि जीवन भर वे आसपास के लोगों से सुनते रहे कि समय के साथ जीवन में प्रेम की उत्पत्ति अवश्य होगी।

जहाँ तक भारत और पश्चिम के बीच समानता दर्शाने की बात है, मैंने इसे पश्चिम में भी होते देखा है हालाँकि वहाँ अक्सर नहीं देखा। एक उदाहरण लें: दो व्यक्तियों के बीच सेक्स सम्बन्ध स्थापित हो गए। वह एक रात का सम्बन्ध होता है या हो सकता है कि दोस्तों ने साथ बैठकर कुछ ज़्यादा शराब पी ली और बस किसी कमज़ोर पल में यह हो गया। और नतीजा लड़की के गर्भधारण के रूप में सामने आया। उन्होंने निर्णय किया कि साथ रहा जाए और बच्चे को जन्म दिया जाए। बच्चे की खातिर, नैतिकता की वजह से या असुरक्षा की वजह से कि पता नहीं उन्हें इससे बेहतर कोई दूसरा जीवन साथी मिल पाएगा या नहीं। कोई भी कारण रहा हो लेकिन वह प्रेम नहीं था क्योंकि उन्होंने बाद में कभी उस दिन वाली अंतरंगता को दोहराने की योजना नहीं बनाई!

वे आशा करते रहे कि समय के साथ प्रेम विकसित होगा। होता, अगर वे कुछ ज़्यादा वक़्त साथ गुजारते। तीस साल या उससे भी अधिक समय बीत गया लेकिन उन्हें लगता है कि उन्होंने वास्तव में कभी भी प्यार का अनुभव नहीं किया। ऐसी कहानियाँ सुनकर दुःख होता है मगर वे सच्ची कहानियाँ हैं। ऐसा ही भारत में भी होता है: उनका विवाह आयोजित किया गया, उन्होंने सोचा उनका पति या उनकी पत्नी सिर्फ प्यार की खातिर ही उनके जीवन में आए हैं और समय के साथ उनका प्यार परवान चढ़ेगा लेकिन बीस साल का समय गुजरने के बाद भी उनके जीवन में प्यार का अंकुरण तक नहीं हो पाया। वे लड़ते-झगड़ते हैं, वे एक दूसरे के सान्निध्य में चिंतित और विचलित रहते हैं और उनके बीच ज़रा भी तालमेल नहीं है, प्यार की तो बात ही छोड़िए।

तो, यह आवश्यक नहीं कि समय गुजरने के साथ अनिवार्य रूप से प्रेम का विकास हो ही जाए।

लगाव? हाँ, वह हो जाता है। दोनों को एक-दूसरे की आदत पड़ जाती है, आपस में व्यवहार ठीक होता है लेकिन दोनों सिर्फ यह सोचते हैं कि दूसरे के बगैर रहना असुविधाजनक होगा। लेकिन यह आपके दिल को चोट नहीं पहुँचाता। और प्रेम भी पैदा नहीं हो पाता, तीस साल का लंबा अर्सा गुज़र जाने के बाद भी।

या तीस सेकंड में प्रेम का बीज अंकुरित हो जाता है!

प्रेम बड़ा रहस्यमय है-उसकी भविष्यवाणी करना असंभव है!

धोखेबाज़ी का नियम: आप दूसरों को धोखा दे सकते हैं, दूसरे आपको नहीं! 07 जुलाई 2014

हाल ही में आयोजित अपने व्यक्तिगत-सलाह-सत्रों के बारे में मैं आपको बताता रहा हूँ क्योंकि मेरे खयाल से उनमें आपकी भी दिलचस्पी हो सकती है कि खुदा न खास्ता आप भी वैसी ही किसी उलझन में पड़ जाएँ और तब ये कहानियाँ आपके किसी काम आ सकें। आशा करता हूँ कि आज मैं जिस समस्या का ज़िक्र कर रहा हूँ उसमें आप नहीं फँसेंगे और अगर फँस भी गए तो उस महिला की तरह परेशान नहीं होंगे जो मेरे एक ऐसे ही सत्र में आई थी। विशेष रूप से इसलिए कि मैं आपको सलाह दुँगा कि अपने साथी से धोखेबाज़ी कभी न करें! लेकिन मैं शुरुआत से बताता हूँ कि क्या हुआ।

अपने रिश्ते में आई खटास की समस्या लेकर एक महिला मेरे पास आई। आते ही सबसे पहले उसने मुझे आगाह किया कि उसकी समस्या कुछ जटिल है और पूरी बात समझाने में कुछ वक़्त लगेगा। अतीत में उसके बहुत से पुरुषों के साथ सम्बन्ध रहे हैं और ऐसे एक लम्बे चले रिश्ते से उसका बच्चा भी है। गनीमत यह कि वर्तमान साथी के साथ पिछले चार साल से उसके सम्बन्ध स्थिर और पर्याप्त कामयाब हैं-लेकिन समस्या यह है कि वह शादीशुदा है! अर्थात यह भी उसका कोई स्थाई सम्बन्ध नहीं है-सिर्फ कामचलाऊ सम्बन्ध ही है।

उसके प्रेमी ने-क्योंकि आप उसे ‘साथी’ तो कह नहीं सकते- उससे शुरू में ही कह दिया था कि वह अपनी पत्नी को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ेगा। उसकी तरफ से यह स्पष्ट सन्देश था कि: हम हमबिस्तर होकर मज़े तो लूटेंगे, मैं अपनी पत्नी के साथ धोखा करते हुए तुम्हारे साथ अलग से भी सम्बन्ध रखता रहूँगा लेकिन तुम मुझसे यह अपेक्षा मत करना कि अपनी पत्नी को छोड़कर और दूसरी चीज़ें छोड़कर मैं तुम्हारे साथ रहने चला आऊँगा! यह मैं नहीं चाहता और न ही ऐसा करूँगा! और वह इस बात पर सहमत भी हो गई थी।

मैंने अपने ब्लॉगों में कई बार कहा है कि आप बहुत समय तक किसी के बहुत करीब रहें, उसके साथ कई बार हमबिस्तर हों, प्यार करें (‘मेक लव’, जैसा कि अंग्रेजी में सुन्दर शब्दों में कहा जाता है) और उसके बाद कहें कि अपने प्रेमी के साथ आपका कोई लगाव नहीं है तो यह संभव ही नहीं है। तो उस महिला ने कहा कि उसके अन्दर प्रेम जैसा कुछ पैदा हो गया था और जिस तरह समय गुज़र रहा था, उससे वह खुश भी थी। मगर फिर जो उसे पता चला उसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया: उसके प्रेमी ने किसी दूसरी औरत से सम्बन्ध स्थापित कर लिए!

यह अजीबोगरीब लगता है मगर स्पष्ट ही अब उसके मन में यह भावना घर कर गई है कि उसके साथ धोखा हुआ है! जी हाँ! यह आदमी उसके साथ सम्बन्ध रखकर अपनी पत्नी के साथ धोखा कर रहा था, वह खुद उसके साथ मिलकर उसकी पत्नी के साथ धोखा कर रही थी लेकिन वह नहीं चाहती कि किसी दूसरी महिला के साथ मिलकर वह अपनी पत्नी और उसके साथ धोखा करे! उसे ईर्ष्या हो रही थी, वह उस दूसरी महिला से नाराज़ थी, जल-भुन रही थी और सबसे बड़ी बात, दुखी थी, जैसे अब उसका यह सम्बन्ध टूट चुका हो। वास्तव में था भी ऐसा ही, हालाँकि इस सम्बन्ध का, वैसे भी कोई भविष्य नही था।

यह किसी फिल्म की कहानी लगती है लेकिन इस फिल्म में जो सबसे अधिक लाभान्वित हुआ वह था वह आदमी जिसने अपनी प्रेमिकाओं को शुरू में ही स्पष्ट कर दिया था कि वह उनसे ज़िन्दगी भर के लिए जुड़े रहने का वादा नहीं कर सकता! इस तरह वह मज़े में उन तीन महिलाओं से सेक्स सम्बन्ध रखे हुए था और इसमें आज तक कोई समस्या भी पेश नहीं आई थी।

मैंने उससे कहा कि उसके लिए उस आदमी के प्रति, जिसके साथ उसने जीवन के चार कीमती साल बर्बाद किए, अपने क्रोध को निकालना बहुत आवश्यक है। यह स्पष्ट था कि वह उससे प्रेम नहीं करता था और वह भी शुरू से यह जानती थी कि इस सम्बन्ध से उसे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। मैंने उससे साफ शब्दों में कहा: अब तुम्हें इस क्रोध के साथ कुछ समय गुज़ारना ही होगा और उसके बाद तुम इस व्यक्ति को अपने जीवन से निकाल बाहर करो और कोई ऐसा व्यक्ति ढूँढ़ो जो तुमसे प्यार करता हो!

दूसरे नजरिए से देखा जाए तो समझ में आता है कि मनुष्य अनजाने में अपने दिमाग का उपयोग किस तरह खुद अपने आप को ठगने में करता है! आप यह कैसे मान सकते हैं कि जब आप दूसरों के साथ धोखा करते हैं तो वह ठीक होता है जबकि कोई दूसरा आपके साथ यही करे तो आपको तकलीफ होती है?

किसी से प्रेम करना आपकी आज़ादी का हनन नहीं है – 3 जुलाई 2014

कल मैंने एक महिला का ज़िक्र किया था, जो अपने रिश्ते में कुछ समय का अवकाश लेने का विचार लेकर मेरे पास व्यक्तिगत-सलाह-सत्र में आई थी। उसी दिन एक पुरुष भी आया था, जो अपनी महिला मित्र से अलग हो जाना चाहता था। लेकिन उसकी परिस्थिति बिल्कुल भिन्न थी और इस बात से मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि व्यक्तिवाद, जो कि पश्चिम में इतना लोकप्रिय है, वास्तव में लोगों के दिलों के प्रति बेहद निष्ठुर सिद्ध हुआ है।

इस व्यक्ति ने मुझे बताया कि वह 20 साल तक विवाहित रहा था और उसकी पत्नी और बच्चे भी थे लेकिन फिर उसने अपनी पत्नी से तलाक ले लिया और अपने परिवार को छोड़ दिया। कारण? "वह मेरे लिए बहुत मुश्किल था!" उसने समझाने की कोशिश की। उसे लगता था कि वह अपने परिवार में इतना लिप्त हो चुका है कि अपनी आज़ादी खो बैठा है। जीवन में वह और भी बहुत कुछ करना चाहता था, यहाँ तक कि दैनिक जीवन में भी, और परिवार के होते हुए, बच्चों के साथ और दूसरी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ वह सब संभव नहीं हो पा रहा था! "मैं अपना आध्यात्मिक जीवन जीना चाहता था, आत्म-साक्षात्कार की शक्तियों को व्यक्त करना चाहता था और ज़्यादा से ज़्यादा योगिक जीवन जीना चाहता था!" इसलिए उसने सब कुछ छोड़ दिया।

अकेले रहते हुए जब कुछ समय व्यतीत हो गया तो उसकी मुलाक़ात एक और महिला से हुई। उसके साथ उसके खुले सम्बन्धों की शुरुआत हो गई। वे दोनों अलग घरों में रहते थे, वह अपना काम करती थी और वह अपना जीवन जीता था लेकिन बावजूद इसके उनके संबंध खुले और प्रगाढ़ थे। खुले, यानी स्पष्ट शब्दों में यह कि वे दोनों ही किसी अन्य व्यक्ति के साथ भी शारीरिक संबंध रखने के लिए आज़ाद थे। इससे तो यही समझ में आता था कि उसे यौन आनंद के साथ अपनी सम्पूर्ण आज़ादी भी उपलब्ध थी। लेकिन नहीं! वह ऐसा नहीं समझता था। उसे लगता था कि यह भी वही सालों पुराने वैवाहिक जीवन जैसा ही है!

उसे महसूस हो रहा था कि यह महिला उस पर अधिकाधिक आश्रित होती जा रही है और इस कारण उस पर बहुत ज़िम्मेदारियाँ आ गई हैं, भले ही वे अलग घरों में रहते हों, भले ही बाल-बच्चों का कोई झंझट न हो। वह उसके प्रति अनुरक्त होती जा रही थी और बावजूद इसके कि वे दोनों किसी अन्य के साथ संबंध रखने के लिए आज़ाद थे, वह ऐसे संबंधों से परहेज़ करती थी। उसने कहा "मैं फिर उसी परिस्थिति में जकड़ गया हूँ!" लेकिन उसे सम्बन्ध तोड़ने में संकोच हो रहा था। "अगर अब मैं इस हालत में उसे छोड़ देता हूँ तो वह पूरी तरह टूट जाएगी! वह तहस-नहस हो जाएगी और उसकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है! वह पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी!"

उसने अंत में संक्षेप में कहा: "मैं उसे इस तरह चोट नहीं पहुँचाना चाहता-लेकिन मैं अपनी आज़ादी भी चाहता हूँ!"

मैंने उससे पूछा: "क्या तुम उससे प्यार करते हो?"

दो मिनट खामोशी छाई रही, जिसमें वह मेरे सामने आँखें बंद किए बैठा रहा फिर धीमे और लरज़ते स्वर में बोला: "हाँ, मुझे लगता है, मैं उससे प्यार करता हूँ!"

मैं यह पहले से जानता था। मेरा प्रश्न वास्तव में प्रश्न था ही नहीं, सिर्फ उसे उसके प्रेम का एहसास कराने के लिए एक उत्प्रेरक भर था! मेरा विश्वास है कि जब आप किसी की इतनी चिंता करते हैं तो वह वास्तव में उसके प्रति आपका प्रेम ही होता है और संबंध तोड़ने में उसकी हिचकिचाहट, उसे तकलीफ पहुँचाने का डर, उसके संभावित दर्द को महसूस करने की संवेदना यह ज़ाहिर कर रहे थे कि वह उसके प्रेम में डूबा हुआ है। "तो फिर तुम उसे इतना कष्ट क्यों देना चाहते हो"? मैंने पूछा। ऐसा करने पर न सिर्फ वह दुखी होगी बल्कि तुम खुद भी दुखी होगे! क्योंकि आप कितना भी खुले क्यों न हों, अगर आपके किसी के साथ इतने घनिष्ठ सम्बन्ध हैं, अगर आप दिल से किसी के इतना करीब हैं तो फिर समझिए, वहाँ प्रेम भी मौजूद है। और जब आप ह्रदय के इस बंधन को तोड़ने की कोशिश करते हैं तो कष्ट पहुँचता ही है!

प्रेम दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण नेमत है। किसी के साथ अनुरक्त होने में डर कैसा?-वह आपकी आज़ादी नहीं छीनती! आप प्रेम करते हुए भी आज़ाद रह सकते हैं!

अब आप जो चाहें कर सकते हैं लेकिन अगर मैं आपकी जगह होता तो मैं प्रेम का चुनाव करता, डर का नहीं!

मैं नहीं मानता कि ईश्वर से प्रेम करना तो पवित्र है और अपने परिवार से प्रेम करना आसक्ति-14 फरवरी 2013

कल मैंने गुरु और धर्मोपदेशक से अ-धार्मिक और नास्तिक हो जाने की अपनी परिवर्तन-प्रक्रिया के बारे में कुछ लिखा था। इस दौरान इतना कुछ बदला और मैंने बहुत सारे पृष्ठ विस्तृत रूप से इसका निरूपण करते हुए लिखे। सच तो यह है कि सब कुछ बदल गया, यहाँ तक कि प्रेम के बारे में मेरे विचार भी। जब मैं धर्मग्रंथों पर प्रवचन किया करता था, मैं प्रेम को उन ग्रन्थों के माध्यम से समझता था। उनमें लिखा है कि अपने परिवार, माता-पिता, बच्चों, भाई-बहनों और नाते-रिश्तेदारों से होने वाला आपका प्रेम सिर्फ आसक्ति है और ईश्वर के प्रति आपका प्रेम ही वास्तविक प्रेम है।

मैं इस बात पर विश्वास करता था और यही बातें अपने प्रवचनों में लोगों से कहता था। अगर आपने इस विचार के बारे में नहीं सुना है तो आपको यह बात बहुत अनोखी, बल्कि बहुत कठोर लग सकती है लेकिन वहां (भारत में), यह एक सामान्य रूप से प्रचलित और मान्य विचार है जिसे लोग सच मानते हैं। इसीलिए साधु, जो सभी आसक्तियों से अपने आपको मुक्त करना चाहते हैं, अपने घर-बार और परिवार का परित्याग कर देते हैं। वे सीधे अपना घर छोडकर कहीं चले जाते हैं और अपने बच्चों तक से कोई संबंध नहीं रखते। वे ईश्वर-प्रेम में अपना जीवन गुजारना चाहते हैं और लोग उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हैं। यहाँ तक कि लोग उन्हें बहुत धर्मपरायण और पुण्यात्मा समझते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आखिर उन्होंने ऐसा काम किया होता है जो सामान्यतः लोग नहीं कर पाते- अपने परिवार के साथ विलग होकर उनके प्रति अपने मोह और आसक्ति का परित्याग।

मैं उस वक़्त इस बात पर पूरा विश्वास करता था लेकिन अब बिल्कुल नहीं। अब मैं विश्वास करता हूँ कि अपने माता-पिता, बच्चों, अपने परिवार और मित्रों के प्रति आपका प्रेम ही वास्तविक प्रेम है। ईश्वर से प्रेम मेरी नज़र में पवित्र प्रेम नहीं है।

मैं नहीं समझता कि ईश्वर से आप विशुद्ध प्रेम कर सकते हैं। वहाँ या तो डर इसका कारण होगा या फिर कोई लालच। और हमारे माता-पिता और परिवार ही ईश्वर के बारे में इस भावना को हमारे भीतर प्रतिष्ठापित करते हैं। अगर आप समझते हैं कि लालच कुछ ज़्यादा ही कटु शब्द है तो उसे आप ‘ईश्वर की अनुकंपा की अपेक्षा’ कह सकते हैं। आप ईश्वर के बारे में तभी जानते हैं जब आपके माता-पिता आपको उसके बारे में बताते हैं। अगर तुम कोई बुरा काम करते हो तो ईश्वर सब कुछ देख लेता है! दूसरों से लड़ाई मत करो या झूठ मत बोलो, ईश्वर सब जानता है! अगर जीवन में तुम कुछ बनना चाहते हो तो अच्छे बनो और जैसा ईश्वर ने कहा है वह करो! अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा में ईश्वर का उपयोग करते हैं- धमकी के रूप में या उन्हें भरोसा दिलाकर कि ईश्वर उन्हें पुरस्कृत करेगा। निश्चय ही धार्मिक अभिभावक तर्क कर सकते हैं कि वे इस तरह कभी भी ईश्वर का नाम नहीं घसीटते और सिर्फ ईश्वर के प्रेम के बारे में अपने बच्चों को बताते हैं, कि वह हमेशा आपकी सुरक्षा में आपके पिता की तरह हाथ पकड़कर आपके पीछे खड़ा है, या दोस्त की तरह आपके साथ खेलता हुआ। लेकिन मेरी नज़र में ये बातें आपको तुलनात्मक रूप से, ईश्वर से उतना प्रेम करने के लिए उद्यत नहीं कर सकतीं जितना आप अपने अभिभावकों से करते हैं। उससे अधिक तो कर ही नहीं सकतीं। नहीं, परिवार से अपने प्रेम के लगभग बराबर प्रेम भी आप ईश्वर से नहीं कर सकते! यह कैसे संभव है? वह आपके माता या पिता की तरह कोई प्राणी तो नहीं है जो कठिन वक़्त आने पर आपको अपनी बाहों की सुरक्षा में ले लेते हैं। आपके भाई-बहन आपके साथ खेलते हैं और खुश होते है- क्या कभी ईश्वर यह कर सकता है? जब आप बच्चे होते हैं आपकी माँ आपको दूध पिलाती है। उसकी गंध, उसके स्वर, उसके स्पर्श की अनुभूति आपके दिलोदिमाग में बसी हुई होती है। ईश्वर की गंध, उसके स्वर या उसका स्पर्श नहीं आपको छू भी नहीं सकते! यह असंभव है कि आप ईश्वर से कभी भी उतना उत्कट प्रेम कर सकते हैं जितना अपने परिवार से करते हैं!

तो आप देखते हैं कि मेरा दिमाग पूरी तरह बदल गया, समझिए कि वह बिल्कुल विपरीत दिशा में मुड़ गया और आज मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि मैंने ठीक किया। स्वाभाविक ही, पहले भी मैं यही कहता था, मगर अब मेरा भविष्य कहीं भी मुझे ले जाए, मैं पीछे मुड़कर अपने पुराने विश्वासों की दिशा में कभी नहीं जा सकता!