धर्म की सूक्ष्म चालबाज़ियाँ आपको पागलपन की सरहद पर ला पटकती हैं! 11 सितंबर 2012

स्वामी बालेंदु धार्मिक समर्पण के विषय में लिख रहे हैं जो लोगों को ऐसे-ऐसे काम करने पर मजबूर कर देता है, जिसे वे स्वयं पागलपन कहेंगे, बशर्ते वे धर्म की चालबाज़ियों को समझ सकें। उदाहरणार्थ प्रस्तुत है उनकी, स्वयं की आपबीती!

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मंदिरों का धंधा – जितना ज़्यादा धन दो उतना ज़्यादा ईश्वर लो! 28 मार्च 2012

स्वामी बालेंदु दक्षिण भारत में स्थित तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर के बारे में लिख रहे हैं और बता रहे हैं कि कैसे वह मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं के कारण ईश्वर के व्यापार में लिप्त है।

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वृन्दावन में ऑफिस में काम करने वाले, जब बेरोजगार हो जाते हैं तो धर्म-प्रचारक बन जाते हैं! 17 अक्टूबर 2011

स्वामी बालेन्दु अपने एक कर्मचारी का किस्सा बयान कर रहे हैं, जिसने बाद में प्रचारक का काम शुरू कर दिया। यह सिर्फ उसका किस्सा नहीं है बल्कि वृन्दावन में बहुत से लोग यही करते हैं।

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