धर्म की सूक्ष्म चालबाज़ियाँ आपको पागलपन की सरहद पर ला पटकती हैं! 11 सितंबर 2012

आश्रम में हमारे घर से गेट तक सुंदर रास्ता बना हुआ है और हर रोज़ हम लोग थोड़ी देर इस रास्ते पर टहलते हैं। अपरा को गोद में लिए हम वहाँ तक आकर कभी-कभी थोड़ी देर के लिए गेट पर ही रुक जाते हैं और बाहर का नज़ारा देखते हैं। दौड़ती हुई कारें, साइकिलें और मोटर साइकिलें देखने में अपरा को बड़ा लुत्फ आता है। इसके अलावा सड़क पर घर लौटते हुए कर्मचारियों या कस्बे के परिक्रमा-मार्ग पर परिक्रमा करते तीर्थयात्रियों की चहल-पहल भी होती है। तीर्थयात्री और कई स्थानीय लोग भी नंगे पाँव और अक्सर कोई मंत्र-पाठ करते हुए प्रतिदिन यह परिक्रमा करते हैं। कुछ अधिक श्रद्धालु जन अपने आपको इससे ज़्यादा कष्ट देते हैं: वे लेट जाते हैं और खड़े होकर तीन कदम चलते हैं और फिर लेट जाते हैं। यही क्रम दोहराते हुए वे लगभग दस किलोमीटर लंबी यह परिक्रमा पूरी करते हैं, इसे डंडौती परिक्रमा कहा जाता है।

कुछ दिन पहले हम लोग गेट पर खड़े यातायात का अवलोकन कर रहे थे कि हमने देखा कि एक तीर्थयात्री सड़क पर लेट गया और फिर खड़ा होकर नृत्य करते हुए कुछ कदम आगे बढ़ा और फिर लेट गया। स्वाभाविक ही वह अपने समर्पण में बेपनाह खुश दिखाई दे रहा था। रमोना मेरी तरफ मुड़ी और कहा: "यह सब करते-करते लोग पागल हो जाते होंगे, है न?" पल भर बाद मैंने जवाब दिया: "नहीं, यह सब करने के लिए पहले से आपका पागल होना ज़रूरी है!"

इससे पहले कि हिन्दू कट्टरपंथी इस प्रथा के पक्ष में अपनी बकबक शुरू करें और मेरे मित्र मुझे पाखंडी समझते हुए आरोप लगाएँ कि "लेकिन, तुम खुद यह सब किया करते थे!", मैं यह स्वीकार कर लेना चाहता हूँ कि जी हाँ, मैंने भी इसी तरह परिक्रमा की है और यह भी कि मेरी पत्नी भी यह जानती है।

मैं जानता हूँ कि उस वक़्त मेरे मन की क्या दशा थी, गुफा में प्रवेश से पहले। अगर वह व्यक्ति, जो कि उस वक़्त का मैं खुद था, आज मिल जाए तो मैं उसे निश्चित ही पागल कहूँगा।

धार्मिक विश्वास और आस्तिकता लोगों के दिमाग की जो गत बनाते हैं, उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इन बातों पर उनकी इतनी अधिक श्रद्धा, इतना दृढ़ विश्वास हो जाता है कि जो वे कर रहे हैं वह उनके लिए ही नहीं, विश्व भर के लिए भी अच्छा और शुभ है, कि वे उनके बारे में तर्कपूर्ण ढंग से सोचना ही बंद कर देते हैं। आपका दो या तीन दिन तक सड़क पर लेटना, फिर उठना और तीन कदम चलते हुए थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ना आपके ईश्वर का और आपका क्या भला कर सकता है, समझ से बाहर है। वे इस बात को अपनी भक्ति कहते हैं लेकिन मैं इसे उनके दिमाग के साथ धर्म का छल कहता हूँ। जब समर्पण इस सीमा तक बढ़ जाता है तब वह आपको अंधा बना देता है। आप दर्द महसूस नहीं करते, सोच-समझ नहीं पाते और देखते-देखते पागलपन की हद पार कर जाते हैं।

मैं मानता हूँ कि यह थोड़ा पागलपन तो है ही, मगर धर्म इससे भी ज़्यादा पागलपन करने के लिए लोगों को मजबूर कर देता है। भावना वही होती है, धर्म का छल उसी तरह काम कर रहा होता है, जब लोग सोचते हैं कि अपनी आखिरी दमड़ी धर्म पर खर्च करना एक अच्छी बात होगी, पता नहीं कब विश्व का अंत हो जाए! या दूसरे सहविश्वासु लोगों के साथ जानलेवा जहर खा लिया जाए। धर्म की यही धोखाधड़ी तब भी काम कर रही होती है जब एक व्यक्ति अपनी कमर पर बम लगाकर खुद को एक भीड़ भरे स्थान पर उड़ा देता है, जिसमें सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो जाती है। या प्लेन हाईजैक करके बहु-मंज़िला इमारत पर दे मारता है और हजारों निर्दोष लोगों की मौत का और उनके परिवार के लिए भयंकर दुख का कारण बनता है।

यह पागलपन है। यह धर्म है। कुछ नतीजे कम हानिकारक होते हैं और कुछ ज़्यादा। आप बर्दाश्त भी कर लें अगर वह दूसरों को और खुद को भी किसी तरह का नुकसान न पहुंचाए। उसे आप मूर्ख कह सकते हैं। लेकिन अंततः धर्म ही है, जिसने उसके दिमाग को छल-कपट से यह भक्तिपूर्ण कार्य करने के लिए मजबूर किया है।

मंदिरों का धंधा – जितना ज़्यादा धन दो उतना ज़्यादा ईश्वर लो! 28 मार्च 2012

पिछले दिनों मैं आंध्र प्रदेश के तिरुपति में स्थित तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर के बारे में एक ऑनलाइन रिपोर्ट पढ़ रहा था, जिसमें मंदिर की गतिविधियों का, वहाँ पहुँचने वाले श्रद्धालुओं का और वहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया गया है। मेरे विचार में वहां चल रही गतिविधियाँ आम जनता को नाराज़ करने के लिए काफी होनी चाहिए मगर विडम्बना यह है कि शायद यह मंदिर देश का सबसे लोकप्रिय और धनी मंदिर है।

रोज़ लगभग 65000 श्रद्धालु इस मंदिर में प्रवेश करना और वहाँ ‘ईश्वर’ का दर्शन करना चाहते हैं। यह एक औसत आंकड़ा है जबकि सप्ताहांत में वहाँ दर्शन करने वालों की संख्या 80000 और धार्मिक त्योहारों के समय 100000 तक पहुँच जाती है। ये आंकड़े अविश्वसनीय लगते हैं और आप सोच सकते हैं कि जिस मंदिर में इतनी बड़ी संख्या में लोग पूजा-पाठ करते हैं वहाँ ईश्वर के दर्शन करना अवश्य ही एक अनोखा आध्यात्मिक अनुभव होता होगा। ईमानदारी से कहूँ तो मैं ऐसा कतई नहीं समझता।

वहाँ की यात्रा में सबसे पहले तो हर तरफ मौजूद विशाल भीड़ से आपको निपटना पड़ता है। जब भी आप वहां जाते हैं वहाँ असंख्य लोग होते हैं और जब आप दरवाजे से मंदिर के भीतर प्रवेश करना चाहते हैं तब समझ लीजिये कि आप एक लगातार आगे बढ़ती विशाल भीड़ से घिरे होंगे। इसलिए आपको भी लगातार आगे बढ़ते रहना है अन्यथा भीड़ आपको रौंदती हुई निकल जाएगी। मंदिर के कर्मचारी लगातार लोगों को आगे बढ़ते रहने की हिदायत देते रहते हैं, यहाँ तक कि फटकारते हैं, ठेलते रहते हैं, जिससे एक ही दिन में ज़्यादा से ज़्यादा दर्शनार्थी देवता का दर्शन कर सकें।

आप कल्पना कर सकते हैं कि इतने लोगों की ठेलती हुई भीड़ के बीच आप भी लगातार आगे बढ़ते हुए किस तरह शांतिपूर्वक बैठकर, अपने देवता की, जिसे आप ईश्वर मानते हैं, पूजा-अर्चना कर पाते होंगे! जी नहीं-अनुमानतः कोई भी श्रद्धालु देवता के सामने डेढ़ सेकंड से ज़्यादा टिका नहीं रह सकता, यानी उसे अपने ईश्वर को देखने का सिर्फ इतना समय ही मिल पाता है! क्या आप अब भी समझते हैं कि यह कोई विशिष्ट अनुभव हो सकता है? देवता का डेढ़ सेकंड का दर्शन क्या इतना बहुमूल्य हो सकता है कि उसके सामने पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को इतना कष्ट उठाना पड़े?

तो दर्शन का यह विशिष्ट सम्मान आपको अत्यंत कष्ट भुगतने के बाद ही प्राप्त हो पाता है! मंदिर के बाहर इतने ज़्यादा लोग लाइन लगाकर खड़े होते हैं कि अक्सर 15 से 20 घंटे धूप में खड़े-खड़े इंतज़ार करने के बाद ही मंदिर में प्रवेश करने का सौभाग्य मिल पाता है! लेकिन मंदिर प्रवेश की त्वरित सेवा भी वहाँ उपलब्ध होती है- बस, थोड़ा अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है! अक्सर मंदिरों में प्रवेश के लिए विभिन्न मूल्यों के टिकिट होते हैं और जितना ज़्यादा कीमती टिकिट आप खरीदेंगे उतना ही जल्दी आप दर्शन लाभ का सौभाग्य प्राप्त कर सकेंगे! जी हाँ, वहाँ मंदिरों में वे ईश्वर बेच रहे हैं! अगर आपके पास पैसा है तो आप ज़्यादा पैसा देकर ईश्वर तक शीघ्रतापूर्वक पहुँचने वाली कतार का टिकिट खरीद सकते हैं।

और अगर आपके पास कुछ ज़्यादा ही धन है तो आप बायपास से निकलकर और जल्दी ईश्वर के दर्शन का लाभ ले सकते हैं! और अगर आपके पास वीआईपी पास है तो फिर बिना लाइन लगाए आप सीधे अंदर प्रवेश कर सकते हैं! जी हाँ, यह मंदिर वीआईपी पास भी जारी करता है। ये पास गवर्नरों, मंत्रियों और दूसरे महत्वपूर्ण सरकारी मुलाजिमों के लिए जारी किए जाते हैं-और स्वाभाविक ही उनके लिए भी, जो एक करोड़ या ज़्यादा की विशाल रकम, जो लगभग 200000 यू एस डॉलर होती है, दान में देते हैं। सुबह और शाम के कुछ खास घंटे होते हैं, जब ईश्वर सिर्फ इन खास लोगों के लिए ही उपलब्ध होता है। साधारण श्रद्धालुओं को इंतज़ार करना पड़ता है, उस समय मंदिर उनके लिए मंदिर बिल्कुल बंद होता है। इस तरह स्पष्ट है कि ईश्वर उन श्रद्धालुओं पर ज़्यादा प्रसन्न रहता है, जिनके पास ज़्यादा धन है- वह उन्हें तुरत-फुरत दर्शन दे देता है और वह भी ज़्यादा समय के लिए भी। मंदिर और धार्मिक भवन धार्मिक व्यापार के केंद्र हैं और वहाँ के पंडे-पुजारी श्रद्धालुओं और आस्थावान लोगों को गाय समझते हैं, जिन्हें आसानी के साथ धन और दान-दक्षिणा हेतु दुहा जा सकता है, यहाँ तक कि टिकिट लगाकर भी।

श्रद्धालुओं को न सिर्फ घंटों लंबी कतारों में इंतज़ार करना पड़ता है बल्कि उन्हें मंदिरों में मौजूद हर तरह के भ्रष्टाचार का सामना भी करना पड़ता है। अपना प्रवेश-पत्र और रहने की जगह पाने के लिए वहाँ कुछ दफ्तरी कार्यवाहियों से गुज़रना होता है, जिन्हें एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भाग-दौड़ करते हुए आप स्वयं पूरा कर सकते हैं। संभव है आपको घंटों इन कार्यवाहियों में व्यस्त रहना पड़े और सफलता की कोई गारंटी भी नहीं। या फिर आप किसी बिचौलिये (एजेंट) की मदद लें, दुगना खर्च करें और शीघ्र ईश्वर के करीब पहुँच जाएँ! वह भी आपको टिकिट वहीं से लाकर देगा मगर कुछ ज़्यादा कीमत में और अब आपको उसका मेहनताना भी अदा करना होगा। क्या यहाँ मंदिरों में ईश्वर रोजगार पैदा कर रहा है या कि यह सीधी-सीधी श्रद्धालुओं की लूट-खसोट है?

सारांश यह कि: अगर आप औसत आय वाले एक सामान्य व्यक्ति हैं तो पहले तो आपको तपती धूप में भीड़ के साथ कतारबद्ध होकर 20 घंटे इंतजार करना होगा और फिर धक्के खाते हुए ईश्वर की मूर्ति तक पहुँचकर डेढ़ सेकंड उस पर एक नज़र डालकर धक्के खाते हुए ही बाहर निकल जाना होगा। अगर आप कोई वीआईपी, राजनीतिज्ञ या अधिकारी हैं या आपके पास दान देने के लिए बड़ी भारी रकम है तो फिर ईश्वर तुरत-फुरत आपका स्वागत करेगा। है कोई धर्म से बढ़कर आसान और लाभकारी धंधा?

मैं पहले भी इस मंदिर के विषय में लिख चुका हूँ। तब मैंने उसकी विशाल संपत्ति के बारे में बताया था, उसे दान में मिलने वाली विशाल राशियों का ज़िक्र किया था और यह भी बताया था कि इसी तरह के कई और मंदिर देश भर में फैले हुए हैं, जहां इसी तरह का भ्रष्टाचार और पैसे और ताकत का खेल चल रहा है। वे बड़ी-बड़ी राशियाँ दान में प्राप्त करते हैं, उनके पास टनों सोना-चाँदी तिजोरियों में बंद है और वहाँ के पंडे-पुजारी और कर्मचारी अक्सर बहुत धनवान होते है। लाखों की संख्या में लोग रोज़ वहाँ की यात्रा करते हैं और सोचते हैं कि वे अपना जीवन सफल कर रहे हैं, पुण्य-कार्य कर रहे हैं और उनके इस काम से सारे विश्व का भला होगा। लेकिन उनका यह कर्म दरअसल भ्रष्टाचार और अनाचार को बढ़ावा देने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। क्या आप नहीं समझते कि अगर आप यही समय, पैसा और ऊर्जा गरीबों और दीन-दुखियों की सेवा करने में, उनकी पढ़ाई-लिखाई या स्वास्थ्य-सुधार के काम में व्यय करते तो ईश्वर आप पर ज़्यादा प्रसन्न होता?

इन बातों का पर्दाफ़ाश करने वाली कुछ रिपोर्टों की लिंक्स यहाँ दी जा रही हैं:

21-hour wait for fleeting darshan of the Lord at Tirumala

Is Lord Balaji temple at Tirumala only for VIPs?

Corruption is a way of life in Tirupati Tirumala Devasthanams

वृन्दावन में ऑफिस में काम करने वाले, जब बेरोजगार हो जाते हैं तो धर्म-प्रचारक बन जाते हैं! 17 अक्टूबर 2011

पिछले हफ्ते मैंने समझाया था कि बहुत से पश्चिमी लोग सिद्धि के लिए भारत आते हैं और उन्हें ढूंढते रहते हैं, जिनके पास सिद्धि है और जो उन्हें भी अपने जीवन में सिद्धि प्राप्त करवा सकते हैं। क्योंकि ऐसे लोगों की बड़ी मांग है, बहुत से लोग ऐसी सेवाओं की पेशकश करते हैं और इस तरह गुरुओं की संख्या में रोजाना वृद्धि होती जाती है। सभी लोग तुरंत ही अपने जादुई छल-कपट द्वारा झूठी सिद्धियों का प्रदर्शन नहीं करते। अधिकतर गुरु साधारण प्रचारकों के रूप में अपने व्यवसाय की शुरुआत करते हैं और विशेष रूप से वृन्दावन में ऐसे लोग बड़ी संख्या में मिल जाते हैं।

पहले हमारे यहाँ एक व्यक्ति हमारी वेबसाइट पर काम करता था। यह उस समय से पहले की बात है, जब हमने खुद ही वेबसाइट पर अपलोडिंग करना, विषयवस्तु को अद्यतन रखना और विषयवस्तु को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करना शुरू कर दिया था। इन्हीं सब कामों के लिए उसे रखा गया था मगर कुछ समय बाद हमने देखा कि वह हमारा काम कम करता है और डाउनलोड करके फ़िल्में ज्यादा देखता है और इसलिए अपनी वेबसाइट में हमारे द्वारा चाहे गए परिवर्तन काफी देर से हो पा रहे हैं। तब हमने उसे बाहर का रास्ता दिखाया और सारा काम खुद करना शुरू कर दिया और अब हमें कोई परेशानी नहीं है।

कुछ दिन पहले हमें पता चला कि अब हमारा वह भूतपूर्व कर्मचारी किसी दूसरे की वेबसाइट सुधारने का काम नहीं करता बल्कि उसने अपनी खुद की वेबसाइट बना ली है, सोशल नेटवर्क पर अपनी प्रोफाइल डाल दी है और अपना खुद का धंधा शुरू कर दिया है: यानी वह धर्म-प्रचारक बन बैठा है।

अपने मनपसंद सूट के स्थान पर सम्पूर्ण धार्मिक वस्त्र धारण किए, लम्बे बालों और चेहरे पर आध्यात्मिक गुरु वाला मेकअप चढ़ाए उसकी तस्वीरें हमने ऑनलाइन देखीं हैं। हमारे लिए उसकी यह साधुओं वाली वेशभूषा और उसका विज्ञापन बड़ा मज़ेदार था, जिसमें, स्वाभाविक ही, उसने अपनी वंशावली, अपने गुरु और परंपरा, हिन्दू कर्मकांडों और धर्मग्रंथों के प्रति अपनी श्रद्धा-भक्ति, और कृष्ण-सेवा के लिए अपने समर्पण आदि की सम्पूर्ण जानकारी दी गई थी।

एक बार वह फिर से हमसे मिलने आश्रम आया और तब मैंने उससे बात की थी। मैंने उससे कहा कि मैंने उसके नए धंधे के बारे में सुना है और पूछा कि उसने यह सब कैसे और क्यों शुरू किया। "जीने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है!" उसका दोटूक जवाब था।

तो आप देख सकते हैं, इस शहर में रोज़ दर्जनों धर्म-प्रचारक पैदा हो सकते हैं। जो उन्होंने सीखा है, जो वे जानते हैं उसी के आधार पर वे कोई रोज़गार प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। अगर उनके पास अच्छी योग्यता है तो वे सफल होते हैं। अगर नहीं होते तो वे धर्म-प्रचार के धंधे में लग जाते हैं। क्यों? क्योंकि वृन्दावन हमेशा धार्मिक तीर्थयात्रियों से भरा रहता है। वे भारत भर से और सारी दुनिया से यहाँ तीर्थयात्रा करने आते हैं और वृन्दावन में यमुना नदी के तट पर पूजा करने के लिए रुकते हैं, बांके बिहारी, मदनमोहन के प्राचीन मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और कुछ नहीं तो, इस्कोन टेम्पल जाकर घूमते- फिरते हैं। और कुछ लोग, कुछ अतिरिक्त पैसा खर्च करके किसी पुजारी या धर्म-प्रचारक या कथावाचक को साथ रख लेते हैं, जो उन्हें धार्मिक कथाएँ सुनाता रहता है, उनके कर्मकांड और पूजाएँ संपन्न करा देता है और शहर के सभी धार्मिक और दर्शनीय स्थानों की सैर करा देता है।

जब आप एक तीर्थयात्री के रूप में वृन्दावन आते हैं तो इसका अर्थ है कि आप अपने अच्छे कर्मों के कारण यहाँ आए हैं। यहाँ आकर पूजा-अर्चना और दूसरे कर्मकांड करना, धर्मप्रचारकों और कथावाचकों से ईश्वर-भक्ति की कहानियां और भजन-कीर्तन और मंत्रोच्चार सुनना अच्छे कर्मों का हिस्सा हैं और उन अच्छे कर्मों में वृद्धि करते हैं। जो व्यक्ति यहीं पला-बढ़ा है, सुनाने योग्य अधिकतर मुख्य कहानियां सुन चुका होता है और प्रवचन आदि के बारे में थोड़ी-बहुत अतिरिक्त जानकारियाँ आसानी से सीखी जा सकती हैं। इसलिए हर व्यक्ति धर्मप्रचारक बन सकता है और युवक, जो कोई धंधा करना चाहते हैं, अक्सर यह धंधा शुरू कर देते हैं।

यह रोज़गार चुनने के लिए मैं किसी को दोष नहीं देना चाहता क्योंकि यह उनके जीविकोपार्जन का तरीका है। वे काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं और इसकी प्रशंसा ही करनी चाहिए। वे इस रोज़गार में कैसे आते हैं यह बताते हुए मैं कुछ लोगों के साधू-संत होने के दावे में से अलौकिकता या गूढ़ता जैसी बातों को अलग निकाल बाहर करना चाहता हूँ। दूसरे सभी धंधों की तरह यह भी एक धंधा है। कुछ लोग थोड़ा-बहुत सीख लेते हैं, उसकी मांग है और वे बाज़ार में अपने ज्ञान को बेचने का प्रस्ताव रखते हैं। वे संत-महात्मा नहीं हैं और वे आपसे ज्यादा पहुंचे हुए नहीं हैं। उन्हें धर्मप्रचारक कहने से बेहतर होगा उन्हें मनोरंजन करने वाला कहा जाए। धार्मिक मेकअप और पहनावा किसी व्यक्ति को संत-महात्मा नहीं बना देता। हो सकता है कुछ लोग पहले किसी कार्यालय में साधारण कर्मचारी रहे हों।