ईमानदारी से जवाब दें, चाहे किसी को बुरा लगे या भला – 23 मार्च 13

पिछले दो दिनों में मैंने किसी प्रश्न का उत्तर देने लिए दो विकल्पों का विश्लेषण किया। आज मैं अपने मनपसंद विकल्प के बारे में बात करूंगाः

तीसरा विकल्पः ईमानदारी से जवाब दें

निश्चय ही लोग इस विकल्प के बारे में इतना असहज महसूस करते हैं कि वे इस बारे में सोचना भी पसंद नहीं करते। लेकिन मैं आपको गारंटी देता हूं कि इस विकल्प को आजमाने के बाद आपको बहुत अच्छा लगेगा।

अपनी राय ज़ाहिर करने के मामले में मैं थोड़ा मुंहफट हूं क्योंकि मैं मानता हूं कि हमारी राय स्पष्ट होनी चाहिए। यदि आप अपने बारे में लोगों को साफ – साफ बता दें तो उन्हें आपके बारे में पूरी जानकारी रहेगी और भविष्य में आपको असहज स्थितियों का सामना कम करना पड़ेगा। यदि लोगों के बीच आपकी छवि स्पष्ट नहीं होगी तो लोग जानकारी के अभाव में यह नहीं समझ पाएंगें कि किसी विशेष मुद्दे पर आपकी राय क्या होगी।

इसी वजह से मैं हमेशा हर प्रश्न का ईमानदारी से जवाब देता हूं यह पता होते हुए भी कि मेरा उत्तर प्रश्नकर्ता को पसंद नहीं आएगा। सामने वाला चाहे तो इसे स्वीकार करे या न करे। वह मेरे जवाब को पसंद करता है या नहीं, इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम सबको अपनी अलग राय रखने का अधिकार है तो फिर दूसरों को खुश करने के लिए इसे क्यों छिपाएं?

इस विकल्प का सबसे अहम पहलू है इसका प्रस्तुतिकरण। मैं जब किसी के साथ बात करता हूं तो सामान्यतया इस बात का ध्यान रखता हूं कि मेरी बात स्पष्ट हो लेकिन तीखी नहीं। आप अपनी बात स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त करें ताकि किसी प्रकार के संदेह की कोई गुंजाइश न रहे। इस बात को सुनिश्चित कर लें आपकी बात सामने वाले को अच्छी तरह समझ आ गई है ताकि इस तरह की स्थिति भविष्य में पैदा न हो। अग़र आप किसी को कोई ऐसी वस्तु देने जा रहे हैं जो उसे पसंद नहीं है तो आप इसे सुंदर से कवर में लपेटकर दें।

अपनी बात को सुंदरता से रखने के लिए आपको एक से ज्यादा वाक्यों का प्रयोग करना पड़ेगा। मान लीजिए कि कोई ऐसा व्यक्ति आपसे किसी दार्शनिक विषय पर सलाह मांगता है जिसकी जीवनशैली, धार्मिक विश्वास और दर्शन से आप बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं तो ऐसे में आपको पहले से पता है कि आपका ईमानदार जवाब उसे रास नहीं आएगा। "देखो भई, मेरे विचार में तुम्हारा धर्म और दर्शन बक़वास है" ऐसा कहना के बजाए आप उसे अपने धार्मिक विश्वास के बारे में बताने से शुरु करें, मतभेदों और उनके कारणों के बारे में बताएं।

आप सीधे यह भी कह सकते हैः "मैं जानता हूं कि इस विषय में मेरे विचार आपके विचारों से कतई मेल नहीं खाते हैं" या फिर इसी प्रकार की अन्य कोई बात जो शुरु में ही सामने वाले को आगाह कर दे ताकि वह यह उम्मीद न रक्खे कि आप उसकी बात से सहमत हो जाएंगें। इससे सबसे बड़ा फायदा होगा कि आपके शब्दों का आघात सहनीय होगा और प्रभाव कम नकारात्मक।

और आखिर में यदि आपको लगे कि सामने वाला आपके जवाब से नाखुश है या बुरा मान रहा है, तो चिंता न करें। प्रश्नकर्ता को भी यह समझ में आना चाहिए कि अलग अलग लोगों के अलग अलग विचार होते हैं। थोड़ा समय अवश्य लगेगा लेकिन अंत में लोगों को आपकी बात समझ में आ जाएगी।

मेरे विचार से तीनों विकल्पों में से ईमानदार जवाब ही सर्वोत्तम विकल्प है।

उल्टा – सीधा जवाब देने के बजाए जवाब ही न दें तो बेहतर होगा – 21 मार्च 13

कल से मैंने एक श्रृंखला शुरु की है जिसमे मैं यह बताने का प्रयत्न करूंगा कि ऐसी स्थिति में आप क्या करें जब कोई आपसे सवाल पूछे और आपको पहले से यह पता हो कि यदि आपने ईमानदारी से उत्तर दिया तो प्रश्नकर्ता नाराज़ हो जाएगा । आज दूसरे विकल्प पर बात करते है।

दूसरा विकल्पः जवाब ही न दें

किसी प्रश्न के उत्तर में झूठ बोलने के विकल्प को मैं सिरे से नकारता हूं। परंतु किन्हीं विशेष परिस्थितियों में जवाब न देने के विकल्प को आजमाने का सुझाव देता हूं। उस स्थिति में इस विकल्प को आजमाएं जब आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ डिप्लोमैटिक होना चाहते हैं जो भविष्य में कभी भी आपकी ज़िंदगी में कोई महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाला नहीं है। किसी व्यक्ति से आप जीवन में एक ही बार मिलते हैं और उसे अपनी पूरी सोच से अवगत नहीं कराना चाहते हैं क्योंकि आपके अनुसार यह भैंस के आगे बीन बजाने जैसा होगा। वह आपकी बात से सहमत नहीं होगा, आपकी बात पर ध्यान भी नहीं देगा। यही एकमात्र ऐसी स्थिति है जहां आप इस विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं। मग़र ध्यान रहे कि यह इतना आसान नहीं है, काफी सावधानी की आवश्यकता है।

आप मौनव्रत धारण करके बच नहीं सकते। यह तो झूठ बोलने से भी बदतर होगा और एक प्रकार की अशिष्टता होगी। किसी भी असहज स्थिति से बाहर आने का यह तरीका उचित नहीं होगा। बेहतर होगा कि आप कोई और तरक़ीब लगाएं।

मैं आपको अपना एक उदाहरण देता हूं जहां मैंने वास्तव में यह तरीका अपनाया । मैंने न केवल अपनी भावनाओं को आहत होने से बचाया बल्कि प्रश्नकर्ता के दिमाग की शांति को भी सुरक्षित रखा। कुछ महीने पहले यहां आश्रम में कुछ लोग आए जो मुझे उस ज़माने से जानते थे जब मैं एक गुरु हुआ करता था। वह एक वृद्ध महिला थी जो अकसर मेरे कार्यक्रमों में आया करती थी। वह अपने बेटे, बहू और पोते – पोतियों को भी साथ लाई थी। वृद्धा ने उनसे मेरा परिचय अपने गुरु के रूप में कराया। इधर – उधर की बातचीत के बाद उसने पूछा कि मैं उसके शहर में प्रवचन देने के लिए दोबारा कब पधार रहा हूं।

तीन जोड़ी आंखें मेरी ओर उत्सुकता और इस उम्मीद के साथ देख रही थीं कि मैं जल्दी ही उनके शहर में आ रहा हूं। मैंने अपनी सभी संभावनाओं पर विचार किया और वृद्धा की आंखों में झांकते हुए उसके प्रश्न का उत्तर देने का विकल्प चुना। अग़र मैं उस वक़्त उन्हें यह बताता कि मैं अब धर्म में विश्वास नहीं करता और न ही भगवान को मानता हूं, तो इससे वृद्धा बेवजह उलझन में पड़ जाती। "ओह, अब मैं पिता हूं" मैंने हंसकर जवाब देते हुए कहा और पास बैठी अपरा को उठाने के लिए झुका। बच्ची को गोद में लेते हुए मैंने कहा, "अब मेरा सारा ध्यान इस नन्हे सितारे पर लगा रहता है।" अपरा को गुदगुदी करते हुए मैंने बताया, "पिछले हफ्ते ही इसने चलना सीखा है।" अब सबका ध्यान अपरा के विकास पर चला गया। मूल प्रश्न अनुत्तरित रहा और वे लोग उसे भूल भी गए। न तो किसी की भावनाओं को चोट पहुंची और न ही कोई निराश हुआ।

जिस विषय पर प्रश्न किया गया है, उसका जवाब दिए बिना चतुराई से विषयांतर कर देना चाहिए। लेकिन यह दूसरा विषय इतना रोचक होना चाहिए कि प्रश्नकर्ता का ध्यान अपने मूल प्रश्न से हट जाए। आप कोई मजेदार चटकला सुना सकते हैं अथवा कोई विवादास्पद चर्चा छेड़ सकते हैं। आप सामने वाले से उसकी रुचि के किसी खास विषय पर कोई प्रश्न पूछ सकते हैं। आपका मकसद उसका ध्यान बदलना होना चाहिए। यह तकनीक जरा कठिन है और मैं आपको सचेत करना चाहूंगा कि यह हमेशा कारगर होगी इस बात की कोई गारंटी नहीं है। यदि किसी व्यक्ति ने आपसे एक प्रश्न पूछा है तो वह प्रश्न उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। वह आपको ऐसे नहीं छोड़ेगा। वह अपना प्रश्न दोबारा पूछेगा और यह बड़ा हास्यास्पद लगेगा कि आप दोबारा उसका ध्यान पलटने की कोशिश कर रहे हैं।

मुख्य बात यह है कि सामने वाले की बात का जवाब नहीं देना है। लेकिन यह निर्णय लेने से पहले आपको यह सुनिश्चित कर लेना है कि प्रश्नकर्ता उत्सुकतावश प्रश्न कर रहा है या वाकई प्रश्न को लेकर गंभीर है। यदि वह वास्तव में गंभीर है तो इस विकल्प को भूल जाएं – इससे समस्या नहीं सुलझेगी।

दूसरों को खुश करने के लिए झूठ न बोलें – 20 मार्च 13

मेरे जीवन में ऐसा कई बार हुआ है कि किसी ने मुझसे एक सवाल पूछा और मुझे यह पहले से ही पता था कि यदि मैंने पूरी ईमानदारी से उत्तर दिया तो प्रश्नकर्ता नाराज़ हो जाएगा। मैं जानता हूं कि आप सबों के साथ भी कभी न कभी ऐसा होता होगा। यह एक ऐसी स्थिति होती है जो कई लोगों को असहज कर देती है। आइए, आज और आने वाले कुछ दिनों में इस बात की पड़ताल करते हैं कि हमारे पास और क्या विकल्प हो सकते हैं जिससे सामने वाले को बुरा न लगेः

पहला विकल्पः झूठ बोल दीजिए

शायद यह एक ऐसा विकल्प है जो हर व्यक्ति के दिमाग़ में सबसे पहले आता हैः वही बोलो जो सामने वाले को पसंद आए। आप बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि यह झूठ है लेकिन फिर भी आपको उस समय यही विकल्प सबसे अधिक निरापद लगता है।

अग़र आप हमेशा सबको खुश करने की कोशिश करने वालों की जमात में शामिल हैं तो शायद आप कई बार ऐसी स्थिति का सामना कर चुके होंगें। कल्पना करेः आपकी मित्र और आप साथ सिनेमा जाने की सोच रहे हैं और मित्र कहती है "मेरी बहन भी यह फिल्म देखना चाहती है। आप बुरा तो नहीं मानोगे अग़र वह भी हमारे साथ चले?" आपको दोस्त की बहन के साथ फिल्म देखना कतई पसंद नहीं है। लेकिन आप अपनी दोस्त को नाराज़ भी नहीं करना चाहते और यह भी जाहिर नहीं होने देना चाहते कि आपको उसकी बहन बिल्कुल पसंद नहीं है। तो आपका जवाब होगा "हां, क्यों नहीं। तुम्हारी बहन भी साथ चलेगी तो अच्छा लगेगा।"

आप हर किसी को खुश रखना चाहते हैं और चाहते हैं कि हर कीमत पर समरसता बनी रहे। तो इस बात में आपको कोई नुकसान नज़र नहीं आता कि आप बस इस बार ईमानदारी से जवाब नहीं दे सके! आप दोस्त के साथ काफी वक़्त गुजारते हैं, यदि थोड़ा वक़्त उसकी बहन के साथ भी गुजार लेंगें तो कुछ घट नहीं जाएगा आपका। क्या आपको दोस्त के रिश्तेदारों के साथ भी थोड़ा वक़्त नहीं बिताना चाहिए?

आपको अपनी इस ग़लती का अहसास तब होगा जब आपकी शाम खराब हो जाएगी। आपने दोस्त को थोड़ी देर के लिए खुश भले ही कर लिया हो लेकिन कभी न कभी उसे असलियत का पता चल ही जाएगा । झूठ बहुत ज्यादा दिन नहीं चलता।

झूठ बोलकर दूसरे के लिए समस्याएं खड़ी करने के अतिरिक्त आपने स्वयं को भी नाखुश कर लिया है। चाहे आपकी आत्मा ने एक झूठ बोलने की गवाही दे दी हो परंतु आप उसके अनुसार व्यवहार नहीं कर पाएंगें क्योंकि आपके भीतर की सच्चाई तो कुछ और है। आप कहते है, "मुझे नीला रंग पसंद है।" लेकिन खरीदते हमेशा लाल रंग हैं तो क्या दूसरा व्यक्ति इस विसंगति पर ध्यान नहीं देगा। या फिर लाल रंग खरीदने का मन होते हुए भी आपको जबरन नीला रंग ही खरीदना पड़ेगा। नतीजाः आप नाखुश और दूसरा भी नाखुश। अर्थात यह विकल्प कामयाब नहीं रहा।

मैंने ऊपर जो उदाहरण दिया था, आइए, जरा उसे चित्रांकित करके देखें। आप सिनेमा हॉल में बैठे हैं और वे दोनों बहनें जमकर लुत्फ उठा रही हैं और आपको उनकी बातें जरा नहीं सुहा रही हैं। दोस्त की बहन आपसे कुछ पूछती है और आप, जो पहले से ही भरे बैठे थे, अभद्रता से जवाब देते हैं या उतनी सह्रदयता से जवाब नहीं देते जिसकी आदत आपकी दोस्त को है – तो अवश्य उसे बुरा लगेगा। वह आप पर नाराज़ भी हो सकती है। आखिरकार अपनी बहन को साथ लाने से पहले उसने आपसे इज़ाजत ली थी, तो अब क्या परेशानी है? आपकी शाम नाखुशग़वार गुजरी सो अलग।

झूठ बोलना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उल्टे इससे नई – नई समस्याएं खड़ी हो जाएंगीं। इसीलिए मेरा मानना है कि आपकी और आपके नज़दीक वालों की भलाई इसी में है कि इस विकल्प का चुनाव न करें।

सत्य क्या है और क्या है, महज आस्था और अंधविश्वास? 21 जून 2012

आज मैं आस्था और अंधविश्वास, और साथ-साथ सत्य और तथ्य पर संक्षेप में कुछ कहना चाहता हूँ। विज्ञान हमें उन तथ्यों से अवगत कराता है, जिन्हें सिद्ध किया जा सकता है। इसके विपरीत आस्था को सही सिद्ध नहीं कर सकते और न ही अंधविश्वास को सिद्ध कर सकते हैं। विश्वास या आस्था समय, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। आप देखते ही हैं कि दो अलग-अलग जगहों में अलग-अलग आस्थाएँ या अलग-अलग अंधविश्वास पाए जाते हैं और वे एक-दूसरे के बिलकुल विपरीत आस्थाएँ और विपरीत अंधविश्वास भी हो सकते हैं। इसका कारण यही होता है कि उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता और इसीलिए वे तथ्य नहीं होते, महज विश्वास होते हैं।

लोग अंधविश्वास पर आस्था रखते हैं क्योंकि वह उनके मस्तिष्क को शांति और ढाढ़स पहुंचाता है। यह मानव स्वभाव है कि आप उन्हीं बातों पर भरोसा करना चाहते हैं जो आपके अनुकूल और दिल को सुकून पहुँचाने वाली हों, भले ही उनमें कोई सचाई न हो। तथ्य, निश्चय ही सच होता है मगर वह विक्षोभकारी और विचलित करने वाला भी हो सकता है। इसीलिए लोग अक्सर झूठ पर भरोसा कर लेते हैं और सिर्फ यही कारण है कि झूठ का अस्तित्व बना हुआ है। और, झूठ पर विश्वास करने के लिए हमेशा आपको आंखे बंद रखनी होती हैं क्योंकि अगर आप आँखें खोलकर देखेंगे तो पछतावा हो सकता है। सत्य पर विश्वास करने की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि वह तो यथार्थ है ही। हकीकत हकीकत है। अगर आप उस पर यकीन करते हैं तो वह सत्य है लेकिन अगर आप उस पर यकीन नहीं भी करते, तो भी वह सत्य है। इसी तरह, जो आपकी आँखों के सामने है उसे प्रमाण की आवश्यकता ही क्या है? जैसे आग को आप अपनी आँखों से देख सकते हैं और आग की सचाई यह है कि वह जलायेगी ही, आप विश्वास करें या न करें।

अंधविश्वासियों को खुद अपने आप पर विश्वास नहीं होता। अक्सर ऐसे लोग कहते सुने जाते हैं: मैंने सुना है; ऐसा लिखा है, मैंने पढ़ा है; किसी ने कहा है; लोग यकीन करते हैं और हम भी मानते है, आदि आदि। वे खुद कुछ नहीं जानते, बस मानते हैं। तथ्य यह है कि आप किसी ऐसी चीज़ को जान ही नहीं सकते, जिसका अस्तित्व ही नहीं है; आप उस पर सिर्फ विश्वास कर सकते हैं, अथवा मान सकते हैं। आँखें बंद करो और विश्वास करो (मान लो), इतना काफी है। आपको कुछ पूछने का अधिकार नहीं है और अगर पूछना ही है तो सिर्फ विश्वास (मान्यता) के बारे में पूछो, संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। धर्म आपसे कहता है कि: जो धर्मग्रंथों में लिखा है उस पर विश्वास करो, मान लो उसे, जानने की कोशिश मत करो और संदेह तो बिलकुल नहीं।

जब भी कोई व्यक्ति आपको किसी बात पर विश्वास करने के लिए कहता है तो तुरंत सावधान और सतर्क हो जाएँ। अपनी आँखों का ध्यान रखें कि मूर्ख बनाने की नीयत से कहीं उन पर विश्वास का काला पर्दा तो नहीं डाला जा रहा हैं। जो लोग धर्म, ईश्वर, धर्मग्रंथों, स्वर्ग, अलौकिक उपचारों और दूसरे अंधविश्वासों पर आस्था रखते हैं, आपसे भी यही कहते हैं कि उन पर विश्वास करो, मान लो उन्हें और आँख मूँदकर उनपर विश्वास करो।

लेकिन विज्ञान आपके दरवाजे पर यह कहने नहीं आएगा कि "आप मुझ पर विश्वास कर लो।" आपको विश्वास करना पड़ेगा, कोई दूसरा चारा नहीं है। धर्म और अंधविश्वास इसी कारण थोड़ी अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए कहते हैं: धार्मिक कर्मकांड और विश्वास तभी कारगर होते हैं जब विश्वास पक्का और अटूट हो, जब काम न हो तो समझिए आपके विश्वास में ही कमी थी। यह ढुलमुल आस्तिकों के लिए नहीं है। क्या शानदार स्पष्टीकरण है! आस्थाएं विश्वास का आग्रह करती हैं और वो भी अंधे विश्वास का, शक न करना और उस पर भी तुर्रा ये कि यदि शक किया तो ये काम नहीं करेंगी! फिर परेशानी क्या है? विश्वास करना बिलकुल छोड़ दीजिए और सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी।

हम अक्सर देखते हैं कि धार्मिक लोग ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं और इसके ठीक विपरीत नास्तिक उसके अनस्तित्व को प्रमाणित करने का प्रयास करते देखे जाते हैं। लेकिन वैज्ञानिक ईश्वर के अनस्तित्व को प्रमाणित करने में अपना समय बरबाद नहीं करते। क्या आपने किसी प्रसिद्ध वैज्ञानिक को इस तरह के विवाद या चर्चा में उलझते देखा? निश्चित ही आप अपनी इंद्रियों से ईश्वर को जान नहीं पाएंगे। लेकिन, दुर्भाग्य से बहुत से नास्तिक अपनी पूरी शक्ति और बहुमूल्य समय यह प्रमाणित करने में लगा देते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। कितना अच्छा हो कि वे जमीनी हकीकत को समझें, समाज में घुलें-मिलें और देखें कि लोगों की समस्याएँ क्या हैं। लोग धर्म में आस्था रखते हैं क्योंकि उन्हें कुछ चाहिए, क्योंकि वे मुसीबत में हैं या डरे हुए हैं। बार-बार उन्हें यह बताना कि ईश्वर नहीं है, उन्हें कोई लाभ नहीं पहुंचाता। इस प्रश्न पर कि ईश्वर है या नहीं, लिखकर और चर्चा करके समय बरबाद करने से बेहतर यह होगा कि वे लोगों के बीच जाएँ और उनकी समस्याओं का कोई हल खोजने में अपनी ऊर्जा और समय का इस्तेमाल करें।

कुछ धार्मिक लोग आधुनिक दिखाई देने के चक्कर में इन दोनों का घालमेल करने की कोशिश करते हैं क्योंकि वे जान गए हैं कि धर्म के बगैर तो जीवन संभव है मगर विज्ञान के बगैर नहीं। लेकिन, धर्म और विज्ञान एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत अवधारणाएँ हैं। उनका मेल संभव नहीं है!

हर धर्म एक सत्य को स्थापित करने की कोशिश करता है और उस धर्म को मानने वाले समझते हैं कि सत्य को सिर्फ वही जानते हैं। वे सब अपने-अपने काल्पनिक सत्य की वकालत करने में लगे हुए हैं। लेकिन हकीकत यह है कि सिर्फ असत्य को प्रमाणित करने के लिए वकीलों की जरूरत पड़ती है। सत्य तो सत्य है और वह अपने आपको स्वयं प्रमाणित करता है। आग लगी है तो उससे ज्वालाएँ उठेंगी, आप विश्वास करें या न करें (मानें या न मानें)। आप खुद जान जाएंगे, उस पर विश्वास (मानने) करने की ज़रूरत नहीं है!

भारत में मृत्यु: परलोक गमन के अवसर पर पारिवारिक बिदाई समारोह-23 जुलाई 2009

कल मुझसे पूछा गया था कि क्या भारत में कोई ऐसी व्यवस्था है जिसमें मरते हुए व्यक्ति की सहायता के लिए कोई उपलब्ध हो सके। मैंने उन्हें बताया था कि इस मामले में भी भारत में स्थिति कुछ भिन्न होती है क्योंकि अभी भी लोग परिवार के साथ ही रहते हैं और जब वे वृद्ध हो जाते हैं तो उनके पास उनके बेटे, बहुएँ और लड़कियां उनकी देखभाल के लिए साथ ही होती हैं। इसके अलावा कई संस्थाएं होती हैं जो ऐसे मौकों पर उनकी सहायता के लिए आगे आती हैं जिनका कोई नहीं होता। ये संस्थाएं मृत्यु के बाद उनके क्रियाकर्म और दूसरी धार्मिक आवश्यकताओं और कर्मकांडों का खर्च भी उठाती हैं।

मैंने यह भी बताया कि मरणासन्न व्यक्ति के पास बैठकर लोग धार्मिक मंत्रों का पाठ और भजन इत्यादि करते हैं। यह काफी पहले से ही शुरू हो जाता है और कई बार हफ्तों, महीनों चलता है क्योंकि यह आत्मा के शरीर से मुक्त होने पर निर्भर करता है! लेकिन लोग दिन-रात निरंतर मंत्रों का पाठ करते रहते हैं जिससे वह व्यक्ति चेतन या अचेतन अवस्था में उन्हें सुनता रह सके। जब मृत्यु हो जाती है तो लोग उसके मृत शरीर को श्मशान घाट ले जाते हैं जिसमें दूर-दूर से नाते-रिश्तेदार, दोस्त और पड़ोसी शरीक होते हैं और मंत्रों के उच्चारण के साथ अर्थी को जुलूस की शक्ल में क्रियाकर्म हेतु ले जाया जाता है। इस मंत्र का अर्थ है, ‘ईश्वर का नाम ही सत्य है’।

अपनी ईमानदारी के साथ समझौता? – 27 अप्रैल 2009

अपनी २३ अप्रैल की डायरी पर मुझे एक कमेंट प्राप्त हुआ। समझौते के संबंध में उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस दुनिया में समझौता करना पड़ता है, अन्यथा आपका मिलन नहीं हो सकता बल्कि आप एक-दूसरे से अलग हो जायेंगे। मैं पूर्णतः समझता हूं कि उनके कथन का अर्थ क्या है और उसका सम्मान करता हूं परन्तु जब मैं कहता हूं कि मैं समझौता नहीं करना चाहता तो उसका मतलब भिन्न है।

जब आप प्रेम में ऐसा करते हैं तो मेरे लिये वह समझौता नहीं है बल्कि प्रेम के प्रति सम्मान है। जब आप प्रेम में हैं आप सभी चीजों का आनंद लेते हैं। बेशक आपको कुछ चीजें करनी पड़ती हैं परन्तु यदि यह सम्मान और प्रेम के लिये है, मेरे लिये यह समझौता नहीं है। निःसंदेह हम इस दुनिया और समाज में रहते हैं और हमें लोगों के साथ – साथ चलना पड़ता है| हमें अन्य लोगों की भावनाओं का सम्मान करना पड़ता है|

जब मैं कहता हूं कि मैं समझौता नहीं करना चाहता, इसका कुछ और ही मतलब होता है। जब आप अपने दिल, अपने सिद्धांतों और मूल्यों जिनके साथ आप जीना चाहते हैं या जब आप स्वयं को और अपने मूल्यों को बेच देते हैं तब आप अपनी ईमानदारी के साथ समझौता करते हैं। अगर आप ऐसा करते हैं, यदि आप समझौता करते हैं, आपका अंतःकरण आपके पूरे जीवन भर दूषित रहेगा।

ईमानदार होने के बारे में मेरे कथन का यही अर्थ है। समझौते के कारण आप हमेशा स्वयं को दोषी महसूस करेंगे। अगर इस तरह से यदि आप समझौता नहीं करते हैं, और ईमानदार हैं, तो आपको भौतिक चीजों की कमी हो सकती है परन्तु आप गर्व के साथ जीयेंगे और जब आपकी मृत्यु होगी, आपको कोई पश्चाताप नहीं रहेगा।

ग्रीटिंग कार्ड में बेईमानी – क्रिसमस का पाखंड – 30 दिसंबर 2008

वास्तव में कभी-कभी मैं बेईमान लोगों को नहीं समझ पाता और उनके बारे में अजीब महसूस करता हूं। बहुत सारे लोग हैं जो मेरे लिये अच्छी भावना नहीं रखते। हो सकता है उन्हें जलन होती हो या वे प्रतिस्पर्धा महसूस करते हो जो यहां नहीं है क्योंकि मैं किसी भी प्रकार की प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं लेता। हो सकता है कि उन्हें यह पसंद न हो कि मैं उनके आध्यात्मिकता के मार्ग का अनुमोदन नहीं करता जो मुझे अकसर बहुत सतही और अव्यावहारिक लगता है। हमारे पास साक्ष्य है कि उनके ह्र्द्य में शुभकामना नहीं है लेकिन नव वर्ष और क्रिसमस के अवसर पर ग्रीटिंग कार्ड प्राप्त होता है जिसमें शुभकामना अंकित रहती हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे शुभकामनायें यात्रा कर सकती हैं डाक के साथ यदि वे आपके ह्र्द्य में नहीं हैं।

ग्रीटिंग कार्ड, आपके ह्र्द्य के अंतर में जो है उसे अभिव्यक्त करने का प्रतीक मात्र है। कार्ड कितना बड़ा या महंगा है इससे फर्क नहीं पड़ता, आप वह कुछ भी नहीं भेज सकते जो आपके पास नहीं है। और यदि आपके ह्र्द्य में शुभकामना है, तो वो तब भी पहुंच जायेगी भले ही आप उन्हें कार्ड के रुप में डाक से न भेजें।

मुझे इस तरह के ग्रीटिंग कार्ड प्राप्त होते हैं जो मुझे लोगों के दोहरे चरित्र को दिखलाते हैं। जो उनके दिल में होता है वह उनकी जुबान से बिल्कुल अलग होता है। मैं ईमानदारी की कद्र करता हूं। यदि अगर आपको कुछ नहीं पसंद है आप ईमानदारी के साथ अभिव्यक्त कर सकते हैंI दिल में कुछ और, जुबान पर कुछ और वाली यह बेईमानी आपके लिये बहुत सारी मनोवैज्ञानिक समस्या पैदा करेंगी और आपके अध्यात्मिक मार्ग पर अनकों बाधायें उत्पन्न करेंगी।

मैं इस नए साल में उनके दिल में अधिक शांति, प्रेम और ईमानदारी लाने के लिए कामना करता हूं|

आज शाम में इरा अपनी बहन मेरवी के साथ आज जिसका आज जन्मदिन था, हमने एक साथ उम्दा रात्रि भोज का आनंद लिया और उन्होंने हमें अगले साल फिनलैंड आने के लिए आमंत्रित किया|

जब क्रोध आये तो क्या करें? – 5 जून 2008

एक उपचार सत्र में किसी ने मुझसे पूछा: "मैं बहुत आक्रामक हूँ और अकसर बिना किसी इच्छा के या दुर्भावना के दूसरों पर चिल्लाने लगता हूँ। मैं अपने इस क्रोध का सामना किस तरह कर सकता हूँ?"

मैंने उसे एक बहुत व्यावहारिक सलाह दी: जब किसी के साथ आपकी कोई चर्चा हो रही हो और लगे कि आपको गुस्सा आने वाला है और आप उस पर चीखने-चिल्लाने वाले हो, आप एक गिलास पानी लेकर उसे पी जाओ। एक गहरी सांस लो और शांत हो जाओ। जब आप गुस्सा होते हैं तब क्या होता है? मैं हमेशा कहता हूँ कि तब आपकी आँखें बंद हो जाती हैं और मुंह खुल जाता है। मेरा कहने का मतलब है कि चेहरे पर स्थित आँख बंद नहीं होती मगर आप महसूस नहीं कर पाते कि वह क्या देख रही है। आप देख नहीं पाते कि आपके सामने कौन खड़ा है, आप क्या कर रहे हैं, आप क्या कह रहे हैं और परिस्थिति कैसी है। तो आप खुली आँखों वाले अंधे होते हैं।

क्रोध आपको दिशा निर्देश दे रहा है और आपके माध्यम से बात कर रहा है। वह आपका सत्य नहीं है जो बात कर रहा है और इसीलिए कई बार आपने देखा होगा कि बाद में अपनी बात पर आपको पछतावा भी होता है। आवश्यक है कि समय रहते ही आप अपनी आँखें खोलें और मुंह बंद कर लें। आँखें खोलने का अर्थ यह है कि आपको यह पता होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं। कोशिश करें कि जब क्रोधित हों तब आप चुप रहें। इससे आपको अपने भीतर देखने और सोचने में मदद मिलेगी। जब आप चिल्ला रहे होते हैं तब दिमाग में सोचने के लिए कोई स्थान नहीं होता। चीखना-चिल्लाना व्यर्थ होता है और यह दूसरों की भावनाओं को चोट पहुंचा सकता है।

क्रोध एक आग है जो आपको जलाती है और दूसरों को भी। जब क्रोध आता हुआ महसूस हो तब इससे पहले कि वह आपके शब्दों के माध्यम से, जिन्हें आप स्वयं कहना नहीं चाहते, दूसरों को चोट पहुंचा सके आप पानी पीना शुरू कर दीजिये और अपने हार्मोन्स को शांत होने का मौका दीजिये। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप अपनी भावनाओं का दमन करें। अपनी भावनाएं व्यक्त करना आवश्यक है। आप अपने गुस्से को बिना दूसरों को चोट पहुंचाए भी व्यक्त कर सकते हैं। आपके गुस्से के कारण दूसरे क्यों कष्ट पाएँ? जब आप महसूस करें कि क्रोध आपको भीतर ही भीतर जला रहा है एक तकिया ले लें और उस पर मुक्के मारना शुरू कर दें। अपने क्रोध को बह जाने दें! अपने आपको गुस्सा होने दें! दमन किसी भी हालत में उचित नहीं है।

चार प्रकार के प्रश्नकर्ता – जिज्ञासु, बुद्धिमान, परीक्षक और आलोचक – 10 मई 2008

कल मैंने एक प्रश्न और उसका जवाब लिखा और प्रत्येक व्याख्यान के बाद यह सामान्य है कि लोगों के पास कुछ समय होता है मुझसे किसी चीज के बारे में पूछने के लिये, व्याख्यान का विषय या अन्य कुछ भी। जब मैं नौ साल का था तब भी व्याख्यान देता था। मुझे इसके ढेर सारे अनुभव हैं और मैं प्रश्न कर्ताओं को चार अलग अलग प्रकार में वर्गीकृत कर सकता हूं:

  1. प्रथम प्रकार में वे व्यक्ति आते हैं जो वास्तव में अपने प्रश्न के उतर जानने के जिज्ञासु हेतु होते हैं वे उत्साहित होते हैं और आप देख सकते हैं कि इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिये वे कितने आतुर होते हैं। वे आपकी बात को बहुत ध्यानपूर्वक सुनते हैं और प्रत्येक शब्द को आत्मसात कर लेते हैं|
  2. दूसरे प्रकार के व्यक्ति वे होते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य जवाब प्राप्त करना नहीं होता बल्कि यह प्रदर्शित करना होता है कि वे कितने बुद्धिमान है और वे कितना ज्यादा वे जानते हैं। वे बहुत लंबे और एक जटिल तरीके से अपनी बात को व्यक्त करते हैं और अकसर अंत में आपको यह पता ही नहीं चलता कि वास्तव में उनका प्रश्न क्या था। ये सवाल केवल अहंकार से संचालित होते हैं और वे अपने ज्ञान से आपको प्रभावित करना चाहते हैं|
  3. तीसरे प्रकार के व्यक्ति आपको और आपकी जानकारी/ ज्ञान को परखना चाहते हैं। वे कुछ ऐसा पुछते है, जिसके बारे में उन्हें पता रहता है, मात्र यह परखने के लिये कि क्या आपको भी यह ज्ञान है । यह एक परीक्षा की तरह है। असल में वे छात्र बनकर कुछ सीखना नहीं चाहते बल्कि शिक्षण करना चाहते हैं।
  4. अंतिम प्रकार के व्यक्ति किसी प्रकार का उत्साह नहीं प्रदर्शित करते हैं और सिर्फ आपकी और आपके कथन की आलोचना करने के लिये ही प्रश्न करते हैं। वे तार्किक बहस नहीं करते बल्कि जो भी जबाव आप देंगे उसमें से कोई मुद्दा निकाल कर दूसरे बहस की शुरुआत कर देंगे। वे एक तय योजना के साथ आते हैं और वे लड़ना चाहते हैं|

अंतिम तीन प्रकार वालों को वास्तव में किसी जवाब की आवश्यकता नहीं होती। दूसरे प्रकार वाले प्रश्न कर्ता सिर्फ अपने ज्ञान को प्रस्तुत करना चाहते है और आपमें उनकी रुची नहीं होती। वे जिन्हें पहले से जवाब पता होता है परन्तु आपकी परीक्षा लेना चाहते हैं और उन लोगों के जवाब देने का कोई मायने नहीं है जो केवल लड़ रहे हैं क्योंकि कि वे प्रत्येक चीज की आलोचना ही करेंगे।

हालांकि प्रथम प्रकार के व्यक्ति का जवाब देना सुखद होता है। उनका प्रश्न उनके ह्रदय से, समर्पण से उत्पन्न होता है। सिर्फ वही वास्तविक जवाब प्राप्त करते है और सिर्फ उन्हीं के लिये यह किसी उपयोग का होता है।

आज हम मायकल और एन्ड्रीया के साथ हैमबर्ग गये और अपने मित्र गैरी बीर्च से मिले जो प्रोफ़ेशनल गोल्फ़ प्लेयर हैं । वह जल्द ही अमेरिका के लिये उड़ान भरेंगे और हमने गुड बाय कहने के लिये एकसाथ सुखद मध्याह्न काल बिताया।

सत्य एक है – अपनी अंतरवाणी को सुनें – 27 मार्च 2008

मैं और रमोना सुबह सत्य के बारे में बातें कर रहे थे। वस्तुतः मैंने थामस के साथ भी गत रात्रि में इसके बारे में चर्चा की थी। केवल एक ही सत्य है। यह बहुत सारे धर्मग्रंथों में कहा गया है, भागवत गीता में और थामस ने मुझे बताया कि आप इससे थोड़ी अलग व्याख्या परन्तु एक जैसे सार बाइबिल में भी पायेंगे। सत्य एक है। यह दो नहीं हो सकता। कोई भी धर्म इससे इंकार नहीं करेगा। हर धर्म इस पर सहमत है कि सत्य एक है।

कभी-कभी मैं यह सुनता हूं कि लोग बहाने के साथ एक द्वंद की व्याख्या करते हैं कि उनका सत्य अलग है और किसी दूसरे का सत्य अलग है। मैंने थामस को फ़ोन पर एक उदाहरण दिया, मैंने सितारों को देखा और कहा: मैं यहां चांद को देख रहा हूं और यदि इसे तुम्हें दिखाता हूं, तुम भी चांद ही देखोगे। तुम सूर्य नहीं देखोगे और तुम मुझसे यह नहीं कहोगे कि यह सूर्य है क्योंकि सत्य यह है कि यह चांद है। और सत्य इसी तरह का है। यह भिन्न नहीं हो सकता।

हमारे अंदर इसके लिये एक संकेतक भी है। यह अंतरवाणी जो कभी कभी आपको बताती है कि कोई झूठ बोल रहा है या धोखा दे रहा है या आपको क्या करना चाहिये। और हमें इस अंतरवाणी के साथ चलना चाहिये। मैंने पहले भी यह कहा है कि आप बहुत ज्यादा न सोचे इस बारे में कि दूसरे आपके बारे में क्या कहते है या क्या सोचते है। तब आप कुछ और होने का दिखावा करेंगे। हो सकता है आप यह साबित करने का प्रयास करें कि यह आपका सत्य है और अजीब व्यवहार करें हालांकि आपके अंतर में यह पता हैं कि सत्य कुछ और है। कि आप वास्तव में कुछ और हैं। इसलिये आप आपने भीतर की आवाज की अनदेखी न करें और दूसरे के लिये न जियें। सत्य से भागना बंद करें। सत्य केवल एक है|