हर साल घर में पानी घुस जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 18 दिसंबर 2015

हर साल घर में पानी घुस जाता है

आज फिर शुक्रवार है और मैं आपका परिचय अपने स्कूल के दो बच्चों से करवाना चाहता हूँ। इस साल शिक्षा-सत्र की शुरुआत से यानी जुलाई से ही वे हमारे स्कूल में पढ़ रहे हैं- लेकिन उनका परिवार मूलतः सिर्फ एक बच्चे का दाखिला करवाने हमारे यहाँ आया था!

वास्तव में इस परिवार को हम कई सालों से जानते हैं। उनके सबसे बड़े लड़के, संजू ने हमारे स्कूल की शुरुआत के साथ ही हमारे यहाँ पढ़ाई शुरू की थी और अभी पिछले साल ही पाँचवी कक्षा पास की है। अब वह 15 साल का है। जब 2013 में हम उनके घर गए थे, तभी उन्होंने वादा किया था कि अपने दोनों छोटे बच्चों को भी वे हमारे स्कूल में पढ़ने भेजेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने ऐसा नहीं किया। इस साल भर्तियाँ शुरू होने पर संजू अपने छोटे भाई, सात साल के सुमित को लेकर हमारे पास आया था। लेकिन वह अपनी बहन, दस वर्षीय अंजू को लेकर नहीं आया, जबकि अब तक उसने पहले कभी स्कूल का मुँह तक देखा नहीं था।

यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अभिभावकों के लिए लड़की को स्कूल भेजना उतना महत्वपूर्ण नहीं था। लेकिन हमें याद था कि उनकी एक बहन भी है और हमने उनसे कहा कि उसे भी स्कूल भेजें। और इस तरह दोनों छोटे सहोदर अब हमारे स्कूल आ रहे हैं और दोनों ही हमारे स्कूल की सबसे निचली कक्षा में एक साथ पढ़ने का आनंद प्राप्त कर रहे हैं।

इन बच्चों का परिवार हमारे स्कूली बच्चों के कुछ सबसे गरीब परिवारों में से एक है। पिता रिक्शा चलाता है और जब उसे एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने हेतु पर्याप्त सवारियाँ नहीं मिलतीं, वह रद्दी और कबाड़ इकठ्ठा करके बेचता है। सबेरे उसकी पत्नी एक आश्रम की सफाई करने जाती है और इस तरह खुद भी थोड़ा-बहुत कमाकर लाती है। वे अपने खुद के घर में निवास करते हैं मगर वास्तव में पिछले कुछ सालों से वहाँ रहना भी खतरनाक हो चला है:हर साल मानसूनी बारिश में यमुना नदी में बाढ़ आ जाती है बाढ़ का पानी उनके घर में प्रवेश कर जाता है। सन 2010 की बाढ़ में उन्हें अपना घर खाली करना पड़ा था। उस समय हमने उनकी मदद की थी और तब से हम अक्सर उनकी मदद करते रहे हैं।

उनके घर के इस बार के दौरे में हम सचमुच आश्चर्यचकित रह गए: परिवार इतनी रकम जमा करने में सफल रहा है कि घर के पीछे के हिस्से को थोड़ा ऊपर उठाकर एक कमरा बनवा लिया है, जहाँ अब हर साल बारिश का पानी नहीं आ पाएगा! सिर्फ अतिवृष्टि होने पर और अप्रत्याशित रूप से भयंकर बाढ़ आने पर ही उनके बेडरूम में पानी आने की संभावना हो सकती है।

उनकी सकारात्मक आर्थिक प्रगति से हम बहुत खुश हैं कि परिवार अपने रहन-सहन का स्तर किंचित सुधार सका है और अब उन्हें हर साल अपने पूरे घर की चिंता नहीं करनी होगी। अगर सामने की क्षतिग्रस्त दीवार किसी दिन गिर भी जाए तो भी उनके पास पीछे की तरफ मजबूत छत होगी और कुछ दिन गुजारने के लिए एक नया सुरक्षित कमरा!

और, वे आगे भी बचत करते रह सकें और सामने वाली क्षतिग्रस्त दीवार की जगह नई, मजबूत दीवार बनवा सकें, हम उनकी मदद जारी रखे हुए हैं और भविष्य में भी जारी रखेंगे: उनके बच्चों को लगातार मुफ्त शिक्षा प्रदान करके!

नाई, जिसके पास स्कूल की फीस भरने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं – हमारे स्कूल के बच्चे – 11 दिसंबर-2015

नाई, जिसके पास स्कूल की फीस भरने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं

आज मैं आपका परिचय सोनू और रसिक नामक दो भाइयों से करवाना चाहता हूँ जो क्रमशः दस और सात साल के हैं। वे हमारे स्कूल में पिछले तीन साल से पढ़ रहे हैं और अब पहली और दूसरी कक्षा के विद्यार्थी हैं।

पिछले एक साल से दोनों लड़के और उनके माता-पिता उसी घर में रहने लगे हैं जहाँ इशू रहता है, क्योंकि वे चचेरे भाई हैं। जब मैंने आपका परिचय इशू से करवाया था तब मैंने बताया था कि इस घर में कई ऐसे परिवार रहते हैं, जो आपस में रिश्तेदार हैं। उन सभी ने एक एक कमरा किराए पर लिया और इस तरह एक तरह का संयुक्त परिवार बना लिया है, जिसमें सब एक साथ रहते हैं लेकिन हर परिवार का अपना अलग रोजगार और आमदनी है और वैसे ही अलग-अलग खर्चे भी।

उनके पिता आपस में भाई-भाई हैं और दोनों ही नाई का काम करते हैं। इसके अलावा घर के सामने वाली सड़क पर दोनों के अपने-अपने कटिंग सेलून भी हैं-छोटी-छोटी पटरों की दुकानें, जिनमें सिर्फ एक-एक कुर्सी भर है।

इसके बावजूद कि दोनों में व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा रहती है, दोनों ही पर्याप्त कमाई कर लेते हैं और कमरे का किराया, परिवार के लिए राशन इत्यादि का खर्च उठा पाते हैं। समस्या तब आती है जब कोई अतिरिक्त खर्च सामने खड़ा हो जाता है। सोनू की माँ बताती है कि उन्हें अक्सर आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे वक़्त में उन्हें अपनी माँ से, जो पास ही कहीं रहती है, मदद प्राप्त हो जाती है। कोई भी अतिरिक्त खर्च या कोई भी बड़ा खर्च उनके बूते के बाहर की बात है-जैसे बच्चों की पढ़ाई-स्कूल फीस, वर्दियाँ और नियमित शिक्षण के साथ जुड़े हुए दीगर खर्चे!

इस तरह ये बच्चे तीन साल पहले हमारे पास आए, स्कूल में भर्ती हुए और अब भी हमारे स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

टायर मरम्मत के काम से इतनी कमाई नहीं होती कि स्कूल की फीस भरी जा सके – हमारे स्कूल के बच्चे – 4 दिसंबर 2015

आज शुक्रवार है और हमारे स्कूल के एक या अधिक बच्चों का परिचय आपसे करवाने का दिन। आज सुनीता और कविता की बारी है। वास्तव में ये लड़कियाँ सगी बहनें नही हैं बल्कि चचेरी बहनें हैं लेकिन क्योंकि दोनों साथ रहती हैं, साथ-साथ घूमती-फिरती हैं और यहाँ तककि दोस्त भी साथ-साथ बनाती हैं, मैंने उन्हें एक साथ मिलवाने का निश्चय किया है। वैसे भी, उनके घर का दूसरा कोई विडिओ भी पूरी तरह ऐसा ही लगेगा जैसा यहाँ दिखाया गया है! 🙂

सुनीता और कविता के परिवार उन पहले लोगों में से थे, जिन्होंने अप्रैल माह में स्कूल में भर्ती की तारीखें पता कीं। कैसे? कविता का पिता ठीक आश्रम के मुख्य दरवाज़े के सामने दुकान लगाता है। वह लकड़ी के फट्टों से किसी तरह तैयार की गई झोपड़ी से अधिक कुछ नहीं है, जिस पर एक टूटी-फूटी छत भी है। सामने एक खम्भा है, जिसके चारों ओर टायर रखे हुए हैं: वह खराब टायरों की मरम्मत का काम करता है, साइकिलों के मामूली पंक्चर सुधारता है और कारों, स्कूटरों और साइकिलों में हवा भरता है। स्कूल बस सहित आश्रम के सभी वाहन अपने चकों में वहीं से हवा भरवाते हैं और उसे कोई न कोई मिल ही जाता है, जो बता दे कि हमारे चैरिटी स्कूल में भर्ती कब शुरू होने वाली है।

इस तरह वे आ गए: कविता को लेकर हमारे गेट के सामने काम करने वाला मेकेनिक पिता और उसका भाई, जो उसी सड़क पर 50 मीटर आगे सड़क के दूसरी ओर वैसी ही एक दुकान लगाता है, अपनी बेटी, सुनीता और बेटे सुमित को लेकर।

कविता छह साल की है और सुनीता सात की। पहले दोनों किसी दूसरे स्कूल में पढ़ते थे, जो उनके लिए बहुत महंगा पड़ता था। हमने उनका टेस्ट लिया और उनके नतीजों के अनुसार उन्हें विभिन्न कक्षाओं में भर्ती किया गया: सुनीता को यू के जी में और कविता को एल के जी में, जो हमारे स्कूल की और औपचारिक शिक्षा की शुरुआत से पहले की सबसे निचली कक्षा है। सुमित को हमने इस वर्ष भर्ती नहीं किया क्योंकि वह सिर्फ चार साल का है और अभी स्कूली पढ़ाई के लिहाज से काफी छोटा है।

जब हम बच्चों से मिलने उनके घर गए तब दोनों माँएँ खाना बनाने में पूरी तरह व्यस्त थीं। हालाँकि वे सब साथ ही रहते हैं, दोनों परिवारों की आमदनी और खर्च अलग-अलग हैं और वे अपना-अपना अलग राशन खरीदते हैं और अलग-अलग भोजन बनाते हैं। बड़े भाई के दो लड़के और दो ही लड़कियाँ हैं, जिनमें सुनीता सबसे बड़ी है। छोटे भाई की तीन लड़कियाँ हैं, जिनमें कविता सबसे बड़ी है।

दादा-दादी को मिलाकर परिवार के 13 सदस्य एक बहुत छोटे से मकान में रहते हैं, जिसमें सिर्फ दो कमरे हैं- दो परिवारों के लिए दो कमरे। दादा-दादी टैरेस पर बनी एक झाफरी में सोते हैं, जिसकी छत भी आधी खुली हुई है। परिवार अपनी इस स्थिति को सुधारना चाहता है लेकिन निश्चित ही टायरों में हवा भरकर कोई व्यक्ति धनवान नहीं बन सकता! सामान्यतया वे किसी तरह अपना खर्च निकाल ही लेते हैं लेकिन मकान बनवाना या कोई निर्माण कार्य करवाना जैसे अतिरिक्त कामों के लिए उसमें कोई गुंजाइश नहीं बन पाती!

इस तरह उनकी बच्चियों, सुनीता और कविता को मुफ़्त शिक्षा प्रदान करके इस परिवार की थोड़ी-बहुत मदद कर रहे हैं।

आप भी मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें!

सिर्फ आधा माह काम करके परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल होता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 27 नवंबर 2015

आज मैं आपका परिचय हमारे स्कूल की एक सबसे छोटी लड़की से करवाना चाहता हूँ, जिसका नाम प्रतिज्ञा है और जो सिर्फ पाँच साल की है। प्रतिज्ञा वृंदावन के एक सबसे गरीब इलाके में रहती है, जहाँ हमारे स्कूल के और भी बहुत से बच्चे रहते हैं। और उसके परिवार की भी वही समस्या है, जो हमारे स्कूली बच्चों के अधिकांश परिवारों की है: पिता को सिर्फ आधे माह ही रोजगार मिल पाता है!

प्रतिज्ञा के माता-पिता पिछले सात साल से शादीशुदा हैं। जैसा कि बहुत से भारतीय परिवारों में चलन है, वे भी एक संयुक्त परिवार में रहते हैं। उनके विवाह के कुछ माह पश्चात ही प्रतिज्ञा की माँ गर्भवती हो गई और उसके कुछ माह बाद प्रतिज्ञा का जन्म हुआ-फिर वही, जो अक्सर भारतीय परिवारों में होता है।

कुछ सालों बाद वही हुआ, जो आजकल विवाह के साल भर बाद ही अक्सर होने लगा है: संयुक्त परिवार टूटा तो नहीं लेकिन उनकी रसोइयाँ अलग हो गईं, अर्थात, प्रतिज्ञा के पिता को अपनी पत्नी और होने वाली बच्ची की परवरिश की ज़िम्मेदारी स्वयं अकेले उठानी होगी और परिवार के दूसरे पुरुष सदस्यों की कमाई पर अपने लिए आर्थिक मदद की आस छोड़नी होगी।

पिता साधारण मजदूर है, जैसा कि उसका पिता और दोनों भाई भी हैं। उसकी पत्नी बताती है कि वह संगतराश है, जिसका सीधा सा अर्थ यह है कि वह निर्माणाधीन इमारतों में फर्श पर ग्रेनाइट या मार्बल बिछाने के काम में सहायक के रूप में काम करता है क्योंकि वह स्वयं कुशल मजदूर नहीं है बल्कि वह सामान्य मजदूर है। वह पत्थरों को ढोकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है, सीमेंट का मिश्रण तैयार करता है और उनके लिए, जो वास्तव में फर्श पर मार्बल बिछाते हैं, ऐसे ही दूसरे साधारण काम करता है। और क्योंकि काम के लिए उसका किसी के साथ कोई पक्का समझौता नहीं है और न ही वह किसी स्थापित कंपनी या किसी ठेकेदार का स्थायी नौकर है, उसे रोज़ सबेरे काम ढूँढ़ने निकलना पड़ता है।

प्रतिज्ञा की माँ बताती है कि उसे मुश्किल से सिर्फ आधे माह ही काम मिल पाता है, जिसका अर्थ यह हुआ कि दो-दो बच्चों-प्रतिज्ञा का एक तीन साल का भाई भी है-के राशन के लिए, कपड़े लत्तों के लिए परिवार को नियमित रूप से आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

ऐसे में, पाँच साल की उम्र होते ही प्रतिज्ञा को स्कूल भेजने की समस्या पेश आई। लेकिन कहाँ? सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर इतना खराब होता है कि लड़की को वहाँ भेजना लगभग समय का अपव्यय ही था। और निजी स्कूल बहुत ख़र्चीले हैं और स्कूल फीस और परीक्षा फीस अदा करना और वर्दियाँ, किताब-कापियाँ खरीदने का खर्च वहन करना उनके लिए असंभव था।

इन्हीं सब कारणों से प्रतिज्ञा की माँ अपनी बेटी को लेकर ठीक भर्ती के समय हमारे पास आई और 60 नई भर्ती होने वाली लड़कियों में से एक प्रतिज्ञा भी थी! अब हमारे स्कूल में वह पूरी तरह मुफ्त शिक्षा पा रही है और सिर्फ शिक्षा ही नहीं पा रही है बल्कि किताबें, कापियाँ, पेंसिलें और गरमागरम भोजन भी पा रही है-जिनके लिए उसके परिवार को एक नया पैसा खर्च नहीं करना पड़ता!

आप भी प्रतिज्ञा जैसे बच्चों का सहारा बन सकते हैं और उन्हें शिक्षित करने के काम में हमारी मदद कर सकते हैं-किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

जब पिता बनने की ज़िम्मेदारी सिर पर पड़ी तभी पैसे कमाना शुरू किया – हमारे स्कूल के बच्चे – 20 नवंबर 2015

आज मैं आपका परिचय कृष्ण नाम के एक लड़के से करवाना चाहता हूँ जो पाँच साल उम्र का है। उसने हमारे स्कूल में इसी वर्ष की शुरुआत से आना शुरू किया है और वह बहुत ही खुशमिजाज़ लड़का है!

जब इन गर्मियों में हम कृष्ण के घर गए तो वास्तव में उसके खेल में व्यवधान का कारण बन गए: वह उनके कमरे की ऊपरी मंज़िल पर रहने वाले कुछ मित्रों के साथ एक छत से दूसरी छत पर कूदने-फाँदने का खेल खेल रहा था। बार-बार पुकार लगाने पर आखिर उसने अपनी माँ का कहा माना और हमसे बात करने नीचे उतरकर आया।

फिर एक साथ बैठकर हमने कृष्ण और उसकी माँ से उनकी कहानी सुनी। कृष्ण के माता-पिता का विवाह 9 साल पहले वृंदावन से आधे दिन की यात्रा की दूरी पर स्थित एक गाँव में हुआ था। उस समय कृष्ण के पिता के पास कोई रोज़गार नहीं था और न ही आमदनी का कोई दूसरा साधन था। उसके पिता, जिनकी सिलाई की एक दूकान थी, उनकी भी आर्थिक मदद करता था। लेकिन जब उनका पहला बच्चा यानी कृष्ण की बड़ी बहन, जो अब आठ साल की है, पैदा हुई, उसके पिता ने कहा कि आखिर कब तक वे उनके खर्चे उठाते रहेंगे, खाने-पीने और कपड़े-लत्तों से लेकर उनकी दूसरी सारी देनदारियाँ चुकाते रहेंगे। आखिर कृष्ण के परिवार को घर छोड़ना पड़ा।

वे वृंदावन आ गए और सबसे पहले कृष्ण के पिता ने एक जनरल स्टोर खोलकर व्यापार में भाग्य आज़माया। दुर्भाग्य से दुकान उनकी अपेक्षानुरूप नहीं चल पाई और जब कई हफ्ते सिर्फ नुकसान उठाते हुए गुज़र गए, उन्होंने दुकान बंद कर दी। फिर कृष्ण का पिता पेंटर बन गया। और आज भी वह यही काम कर रहा है। क्योंकि वह किसी कंपनी में काम नहीं करता, उसे भवन-निर्माण में लगे और दूसरे मजदूरों की तरह रोज़ नया काम तलाशना पड़ता है। स्वाभाविक है कि इस तरह उसे रोज़ काम नहीं मिल पाता और इसलिए उनकी आमदनी बहुत अनियमित है।

जितनी कमाई वह कर पाता है, उसमें कई बार दो कमरे वाले उस मकान का किराया अदा करना भी मुश्किल हो जाता है-जबकि उन्हें बिजली भी उपलब्ध नहीं है! तार-वार बाकायदा जुड़े हुए हैं लेकिन उनके पास मीटर नहीं है और इसलिए बिजली भी नहीं है। रात में वे मोमबत्तियाँ जलाकर रौशनी करते हैं, गर्मियों में पंखे के लिए और सर्दियों में हीटर के लिए तरसते रहते हैं।

कृष्ण की बहन स्कूल जाती है और पहले कृष्ण भी उसी स्कूल में पढ़ने जाता था। लेकिन दो-दो बच्चों की स्कूल फीस, परीक्षा फीस, किताब-कापयों और उनके साथ लगा दूसरा सारा खर्च नियमित रूप से उठाना उनके लिए बेहद मुश्किल होता था। इसलिए वे बड़े खुश हैं कि समय पर हमारे स्कूल आ गए और कम से कम कृष्ण की भर्ती हमारे यहाँ हो गई। अब वह हमारे यहाँ आकर पूर्णतया मुफ़्त शिक्षा पा रहा है। शिक्षिकाएँ बताती हैं कि वह बड़ा समझदार बच्चा है और दूसरे सहपाठियों की मदद के लिए सदा तत्पर रहता है!

आप भी कृष्ण जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं-किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

चाय बेचकर स्कूल का खर्च नहीं उठाया जाता – हमारे स्कूल के बच्चे – 13 नवंबर 2015

आज मैं आपका परिचय एक साथ तीन बच्चों से करवाना चाहता हूँ-तीन सगे भाई-बहन, जो इसी साल से हमारे स्कूल में पढ़ने आ रहे हैं। उनमें से गोंविंद दस साल का, योगेश आठ का और उनकी बहन भक्ति पाँच साल की है।

मई में जब हम उनसे मिलने उनके घर गए तो सबसे छोटी, भक्ति घर पर नहीं थी। वह अपने नाना-नानी से मिलने पास के ही बड़े शहर, मथुरा गई थी। गर्मी की छुट्टियों में वह कुछ दिनों से उनके पास ही रह रही थी।

उनके मुहल्ले में पहुँचते ही हमने अपने आपको उनके परिवार के छोटे से घर में हर तरफ फैले माल-असबाब से घिरा पाया। कपड़े से ढँकी एक मोटर साइकल बाहर रखी हुई थी, बरतन, लोटे और बाल्टियाँ थीं और अहाता कोने में रखे हैण्ड-पंप के पानी से भीगा हुआ था। छोटी सी जगह में वे किसी तरह सामान के साथ अटे पड़े थे।.

यह मकान काफी समय से उनका घर बना हुआ है। उनके अभिभावकों के विवाह के तुरंत बाद ही पिता के माता-पिता ने उनकी मदद करने का विचार किया, जिससे उन्हें दैनिक उपयोग के किसी सामान की कमी महसूस न हो और जीवन में स्थिरता आ सके। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने बेटे के लिए यह ज़मीन का टुकड़ा खरीदा था, जिस पर, बढ़ते हुए परिवार की ज़रूरतों के मुताबिक, थोड़ा-थोड़ा करके उन्होंने कुछ कमरे, एक बेडरूम और रसोईघर बनवा लिया है।

तीन बच्चों का यह पिता एक छोटी सी चाय की दुकान लगाता है। उसे दुकान भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वास्तव में वह एक लकड़ी के बक्से जैसी गुमटी भर है, जिसे सड़क के किनारे रखकर वह दिन भर चाय बनाकर बेचता है।

स्वाभाविक ही, इस काम में व्यापार की दृष्टि से कुछ दिन बहुत अच्छे होते हैं-त्योहारी दिनों में, धार्मिक समारोहों के वक़्त और निश्चित ही तीर्थयात्रा के मुहूर्तों में, जब वृंदावन में बाहरी भक्तों का मेला लगा होता है। लेकिन यह स्थिति साल भर नहीं रहती और गर्मी के दिनों में और बारिश के मौसम में चाय की बिक्री नगण्य हो जाती है और दुकान का खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

आवश्यक घरेलू खर्चों के लिए कभी-कभी पर्याप्त पैसे मिल जाते हैं लेकिन अधिकतर उन्हें उनमें कटौती करके गुज़र-बसर करनी पड़ती है। इन आवश्यक खर्चों में से एक खर्च निश्चित ही बच्चों की पढ़ाई का खर्च होता है! इसीलिए जब उन्हें हमारे स्कूल के बारे में पता चला और वे समय पर हमारे पास आ गए तो वे बड़े खुश हुए कि चलो, बच्चों के हमारे स्कूल में भर्ती हो जाने से उन्हें बड़ी राहत हो जाएगी!

एक सस्ते निजी प्राथमिक विद्यालय में पहले गोविंद चौथी कक्षा में पढ़ता था लेकिन जब हमने उससे उसका पूरा नाम पूछा तो वह अपने सरनेम के हिज्जे भी नहीं कर पाया। ऐसा ही कुछ योगेश के साथ भी हुआ जो वहाँ दूसरी कक्षा में पढ़ रहा था मगर अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पाया। इससे हमारी यह धारणा पुनः पुष्ट हुई कि उनके पास अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं: वे सिर्फ उन्हें किसी सस्ते स्कूल में पढ़ाने की हैसियत रखते हैं, जहाँ वास्तव में वे कुछ भी सीख नहीं सकते!

इस तरह हमारे यहाँ गोविंद अभी अपर के जी में पढ़ रहा है जबकि योगेश और भक्ति लोअर के जी में साथ-साथ पढ़ते हैं। वे लोग खूब मौज-मस्ती करते हुए अपनी पढ़ाई कर रहे हैं और परिवार भी खुश है-बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का बोझ अब उनके कंधों पर से उतर चुका है!

इन जैसे बच्चों की आप भी मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें!

अपने बच्चों के घर दोबारा जाने पर हमें सकारात्मक विकास दिखाई देता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 6 नवंबर 2015

आज मैं आपका परिचय एक ऐसे लड़के से करवाना चाहता हूँ जिसके सहोदर भाई-बहनों को हम बहुत समय से जानते हैं। इसका नाम रवि है, जो योगमाया और नीरज का छोटा भाई है। योगमाया और नीरज का परिचय हम एक या डेढ़ साल पहले करवा चुके हैं। रवि अभी नौ साल का है और इसी साल से उसने हमारे स्कूल आना शुरू किया है।

सन 2014 में जब हम उनके घर गए थे तो उनका परिवार टिन की छत वाले एक कमरे के मकान में रहता था। कमरे के अलावा छत कुछ अतिरिक्त जगह भी घेरे हुए थी, जिसके कारण उन्हें थोड़ी सी अतिरिक्त जगह प्राप्त हो जाती है। उनके पास बिजली का पंखा नहीं था और इसलिए बच्चे ज़्यादातर अपने दादा-दादी के यहाँ सोते थे। वैसे भी उस एक कमरे में परिवार के छह सदस्य बड़ी मुश्किल से समा पाते थे।

उस समय हमें पता चला था कि बहुत पहले उन्होंने एक और प्लॉट खरीदा था जिस पर वे एक बड़ा सा मकान बनवाना चाहते थे। उस समय तक यह काम नहीं हो पाया था। इस साल जब हम उनसे मिलने गए तो हमें एक सुखद परिवर्तन देखने को मिला: किसी तरह वे उस प्लॉट पर नया मकान बनवाने में कामयाब हो गए थे, जिसमें अब उनके पास दो कमरे हैं! फिलहाल वह ईंटों से बनी दीवार से ही घिरा हुआ है और उस पर सिर्फ बड़ा सा टिन का शेड भर डाला है, जिससे कमरों के अलावा बरामदे के रूप में कुछ अतिरिक्त जगह भी निकल आई है। निश्चित ही नई जगह में उनके पास गुज़ारा करने के लिए थोड़ी अधिक जगह है!

उनके लिहाज से इतना बड़ा काम मजदूर पिता की मामूली आमदनी से कर पाना बड़ी सफलता मानी जानी चाहिए। पिता महीने में तीसों दिन हाड़तोड़ मेहनत करता है और उसे भाग्यशाली कहा जा सकता है कि उसे रोज़ काम मिल जाता है। बच्चों की माँ बताती है कि वह बहुत भरोसेमंद मजदूर है इसलिए ठेकेदार बिना किसी हीलोहुज्जत के खुशी-खुशी उसे काम पर रख लेते हैं। इससे घर के लिए हर माह थोड़े-थोड़े पैसे बचाना संभव हुआ और उसके बाद बच्चों के दादा-दादी से कुछ पैसे उधार लेकर और पड़ोसियों से कुछ ऋण लेकर परिवार घर बनवाने में सफल हुआ।

इन्हीं आर्थिक परेशानियों के चलते वे घर की नई दीवारों पर प्लास्टर या पेंट नहीं करवा पाए हैं:उनके पास इससे अधिक काम करवाने के लिए पैसे नहीं हैं। अब वे पहले अपना क़र्ज़ चुकाएँगे और पुनः बचत शुरू करेंगे और उसके बाद धीरे-धीरे घर में सुधार करते जाएँगे।

उनकी सबसे बड़ी बहन बहुत पहले हमारे स्कूल आती रही थी लेकिन तीसरी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी। उसका मन पढाई में नहीं लगता। योगमाया, जिसने हमारे स्कूल की प्राथमिक कक्षाओं तक पढ़ाई की थी, अब किसी दूसरे स्कूल में आगे की पढ़ाई जारी रखे हुए है और नीरज अभी भी हमारे स्कूल में पढ़ रहा है। और अंत में रवि, जो पहले किसी दूसरे स्कूल में पढ़ने जाता था, अब हमारे स्कूल में पढ़ने आ रहा है।

स्कूल आना उसे बहुत पसंद है और उसने अब बहुत से यार-दोस्त बना लिए हैं। कक्षा में वह मन लगाकर पढाई करता है और स्कूल शुरू होने के बाद से कुछ ही महीनों में उसने काफी कुछ सीख लिया है!

किसी एक बच्चे को या बच्चों के दिन के भोजन को प्रायोजित करके आप भी रवि जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं! और इसके लिए हम अभी से आपका शुक्रिया अदा करते हैं।

परिवार के साथ मगर संयुक्त परिवार का हिस्सा नहीं – हमारे स्कूल के बच्चे – 30 अक्टूबर 2015

आज मैं आपका परिचय एक लड़के से करवाना चाहता हूँ, जो पिछले तीन साल से हमारे स्कूल में पढ़ रहा है। उसका नाम ईशु है। वह ग्यारह साल का है और अपने भाई-बहनों में सबसे छोटा है।

शुरू में ईशु का घर काफी बड़ा सा लगता है। प्रवेशद्वार एक हाल में खुलता है, जिसमें उससे लगे हुए कमरों में जाने के लिए कई दरवाज़े हैं। लेकिन इनमें से सिर्फ एक कमरा ही ईशु और उसके परिवार का है! दूसरे कमरे ईशु के चाचा ने किराए पर उठा रखे हैं। और रसोई को सभी साझा कर लेते हैं।

एक तरह से ईशु संयुक्त परिवार में रहता है लेकिन दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो संयुक्त परिवार में नहीं रहता: सभी परिवारों की आमदनी अलग है, वे खाना अलग-अलग पकाते हैं और अलग-अलग ही खाते हैं-लेकिन वे एक ही मकान में रहते साथ-साथ हैं। सभी परिवारों ने अपने परिवार का परंपरागत व्यवसाय अर्थात नाई का व्यवसाय चुना है और शहर की एक ही गली में उनकी अलग-अलग दुकाने हैं।

पैसे तो वे कमाते हैं- किन्तु तीन-तीन बच्चों को पालना, कमरे का किराया अदा करना और परिवार के दूसरे आवश्यक मदों के खर्चे भी कम नहीं होते! इसलिए उनका सबसे बड़ा लड़का, जो स्नातक की पढ़ाई कर रहा है, अपनी पढ़ाई का खर्च पूरा करने के लिए देवताओं की मूर्तियों के कपड़ों पर कढ़ाई का काम करता है। ईशु की बहन यानी परिवार की बीच की सन्तान अभी सातवीं कक्षा में पढ़ती है और ईशु हमारे स्कूल की पहली कक्षा में।

वह पिछले तीन साल से हमारे स्कूल में पढ़ रहा है अर्थात नियमित स्कूल की पढ़ाई से पहले की दो के जी कक्षाओं से शुरू करके अभी प्राथमिक स्कूल की पहली कक्षा में है और यहाँ बड़ा प्रसन्न रहता है। उसके चचेरे भाई भी हमारे स्कूल में पढ़ने आते हैं लेकिन उनके अतिरिक्त भी उसने बहुत से दूसरे मित्र बना लिए हैं।

हमारे स्कूल में ईशु की मुफ़्त पढ़ाई परिवार के लिए बहुत बड़ी राहत है क्योंकि यहाँ न सिर्फ उसे फीस नहीं भरनी पड़ती बल्कि भोजन, किताब-कापियाँ पेन्सिल इत्यादि लिखने-पढ़ने का सामान भी मुफ़्त प्राप्त होता है-और सबसे बड़ी बात, स्तरीय शिक्षा प्राप्त होती है, जो उसे भविष्य में अपने पैरों पर खड़ा करेगी और अपने परिवार की वर्तमान स्थिति के विपरीत वह एक नियमित और पर्याप्त पैसे कमाने के काबिल बन सकेगा।

ईशु जैसे बच्चों की आप भी मदद कर सकते हैं-किसी एक गरीब बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके।

गरीबों को सिर्फ निम्न स्तरीय शिक्षा ही नसीब हो सकती है – हमारे स्कूल के बच्चे – 23 अक्टूबर 2015

आज मैं आपका परिचय दो लड़कों से करवाना चाहता हूँ, जिन्होंने इसी साल से हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया है और जिनके नाम हैं, धनेश और हितेश। वृंदावन के सबसे गरीब इलाके में रहने वाले एक परिवार के चार बच्चों में ये दो सबसे बड़े बच्चे हैं।

बच्चों का पिता पेंटर के रूप में काम करता है लेकिन उसके पास मासिक आमदनी वाला कोई स्थिर काम नहीं है और रोज़ सबेरे उसे काम की खोज में निकलना पड़ता है-कभी ठेकेदारों के संपर्कियों से ज़रिए तो कभी लेबर मार्केट में मजदूरों की तलाश में निकले भवन निर्माताओं या ठेकेदारों से बातचीत करके। कभी तो कुछ दिन काम करने की जगह मिल जाती है और कभी कोई काम नहीं मिलता और स्वाभाविक ही, जब महीने के अधिकतर दिनों में काम मिल जाता है तो उस माह आमदनी भी अधिक हो जाती है। लेकिन अक्सर यह होता है कि माह में ज़्यादा से ज़्यादा पंद्रह दिनों का काम ही मिल पाता है।

इतने संघर्ष के पश्चात कमाए रुपयों से भी मुश्किल से ही घर का खर्च चल पाता है। पाँच दिन की कमाई तो सिर्फ एक कमरे वाले घर का किराया चुकाने में ही खर्च हो जाती है, जिसमें परिवार के छह सदस्य मुश्किल से समा पाते हैं। यह कमरा भी एक और परिवार के मकान का एक हिस्सा है। मकान के मुख्य हाल में स्थित हैंड पंप पर ही वे लोग नहा-धो लेते हैं और शहर के बाहर खेतों में सबेरे-सबेरे दिशा-मैदान के लिए चले जाते हैं।

लड़कों की माँ घर में रहकर बच्चों की देखभाल करती है। दस साल उम्र का धनेश सबसे बड़ा है और घर के कामों में हाथ बँटाता है। हितेश छह साल का है। उनका चार साल का एक भाई और दो साल की एक नन्हीं सी बहन भी है। वे सभी दिन का बहुत सारा समय बाहर दूसरे बच्चों के साथ खेलते-कूदते हुए और मटरगश्ती करते हुए बिताते हैं।

जब हम उनके घर गए थे तब हमने पूछा था कि क्या धनेश पहले कभी स्कूल नहीं गया।.पता चला वह स्कूल जाता था लेकिन वह एक सस्ता निजी स्कूल था जहाँ पढाई का स्तर बहुत खराब था! धनेश ने बताया कि उनके गणित के शिक्षक ने बीच सत्र में (पढ़ाई के सत्र के बीचोंबीच) स्कूल की नौकरी छोड़ दी थी और तब से साल के अंत तक स्कूल में गणित की पढ़ाई-लिखाई बिल्कुल बंद रही।

इस तरह, तीन बच्चों को पढ़ाने की चिंता के साथ वे इस बात से भी ठगा सा महसूस कर रहे थे कि जिस स्कूल की पढ़ाई पर वे इतना सारा पैसा खर्च करते रहे थे, वह व्यर्थ हो गया था! इसलिए जब उचित समय पर उन्हें हमारे स्कूल के बारे में पता चल गया तो वे ख़ुशी से फूले नहीं समाए और उन्होंने अपने दो बच्चों को तुरंत हमारे यहाँ भर्ती करा दिया!

अब धनेश और हितेश, दोनों हमारे स्कूल की पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ रहे हैं। दोनों बहुत जीवंत, चंचल और होशियार बच्चे हैं और हमारे शिक्षक उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए तत्पर हैं!

हितेश और धनेश जैसे बच्चों की शिक्षा में आप भी मदद कर सकते हैं-किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

एक और समारोह, जिसने बच्चों को आश्चर्य में डाल दिया – 19 अक्टूबर 2015

कल मैंने आपको शनिवार को संपन्न अपने जन्मदिन समारोह के बारे में बताया था। असल में पार्टी सुबह-सुबह बच्चों के भोजन और उनके लिए एक अनपेक्षित विस्मय के साथ शुरू होने वाली थी। लेकिन शनिवार को वृंदावन के एक इलाके में चुनाव होने वाले थे और क्योंकि हमारे स्कूल के कई बच्चे उसी इलाके से आते हैं, उनकी उस दिन की छुट्टी घोषित कर दी गई थी। लिहाजा वे उस दिन पार्टी में शामिल न हो सके और हमें एक बार और पार्टी आयोजित करने का मौका मिल गया-और इतना ही नहीं, इस समारोह में एक और सुयोग का आनंद भी सम्मिलित हो गया: थॉमस और आइरिस के भारतीय विवाह की दसवीं वर्षगाँठ के उत्सव का आनंद!

आज सुबह बच्चे आए तो यही सोच रहे होंगे कि रोज़ की तरह वह भी एक सामान्य दिन होगा लेकिन वे आश्चर्य में पड़ गए जब उन्हें भोजन के लिए पुकारा गया और उन्हें पता चला कि यह कोई सामान्य भोजन नहीं है, हम और हमारे मेहमान पहले से वहाँ मौजूद थे और उन लोगों का इंतज़ार कर रहे थे कि बच्चे आएँ और भोजन शुरू किया जाए! इस तरह हम सबने एक साथ दोपहर का भोजन किया और उसके बाद, जब सब खा-पीकर निपट गए और पुनः एकत्र हुए, बच्चों के लिए एक और आश्चर्य इंतज़ार कर रहा था: जी हाँ, सारे बच्चों को नए बस्ते प्राप्त हुए!

यह मेरे परिवार और मेरे मित्रों द्वारा मुझे दिया गया जन्मदिन का उपहार था! उन्होंने हर बच्चे के लिए पहले ही एक-एक बस्ता बनवाकर रख लिया था, जिन्हें अब हम वितरित कर सकते थे। लेकिन सबसे बड़ा उपहार तो मुझे मिला था बच्चों के चेहरों पर खिली मुस्कुराहटों के रूप में! जिस तरह वे अपने नए बस्तों को हाथ में लेकर उलट-पलट रहे थे, जाँच रहे थे कि नए बैग में क्या-क्या नई खूबियाँ हैं, हर ज़िप को खोलकर देखते थे कि नए बस्ते में पहले के मुकाबले कितनी जगह है, उसे देखकर मैं भाव विभोर हो गया!

लेकिन सिर्फ मेरे जन्मदिन के कारण ही हमने आज के दिन को इस तरह नहीं मनाया! असल में आज का दिन एक और संयोग के कारण खुशी और समारोह का एक ख़ास दिन बन गया था: आज थॉमस और आइरिस के भारतीय विवाह की दसवीं सालगिरह थी। विश्वास नहीं होता कि इतना समय गुज़र गया, मगर वास्तव में आज से दस साल पहले थॉमस और आइरिस पहली बार हमारे आश्रम आए थे। यह सन 2005 की बात है, जब जर्मनी में हम एक-दूसरे से मिले थे और हमें एक-दूसरे को जानने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। फिर उन्होंने भारत की यात्रा की और हमारे यहाँ आए। और यहाँ उन्होंने भारतीय पद्धति से विवाह किया था-और, स्वाभाविक ही, हमें उस दिन को भी समारोह पूर्वक मनाना था!

इस प्रकार, एक तरह से वह बर्थडे और शादी की वर्षगाँठ की तीसरी सम्मिलित पार्टी थी जिसे हमने बच्चों के साथ साझा किया!

ऐसा शानदार परिवार और ऐसे खूबसूरत दोस्त पाकर मैं अभिभूत हूँ-और यह बड़ी ख़ुशी की बात है कि मैं इस ब्लॉग के ज़रिए आपके साथ भी इस ख़ुशी को साझा कर पा रहा हूँ! मुझे आशा है कि किसी दिन आप भी हमारे किसी समारोह में सम्मिलित होंगे!