आज मैं आपका परिचय कृष्ण नाम के एक लड़के से करवाना चाहता हूँ जो पाँच साल उम्र का है। उसने हमारे स्कूल में इसी वर्ष की शुरुआत से आना शुरू किया है और वह बहुत ही खुशमिजाज़ लड़का है!
जब इन गर्मियों में हम कृष्ण के घर गए तो वास्तव में उसके खेल में व्यवधान का कारण बन गए: वह उनके कमरे की ऊपरी मंज़िल पर रहने वाले कुछ मित्रों के साथ एक छत से दूसरी छत पर कूदने-फाँदने का खेल खेल रहा था। बार-बार पुकार लगाने पर आखिर उसने अपनी माँ का कहा माना और हमसे बात करने नीचे उतरकर आया।
फिर एक साथ बैठकर हमने कृष्ण और उसकी माँ से उनकी कहानी सुनी। कृष्ण के माता-पिता का विवाह 9 साल पहले वृंदावन से आधे दिन की यात्रा की दूरी पर स्थित एक गाँव में हुआ था। उस समय कृष्ण के पिता के पास कोई रोज़गार नहीं था और न ही आमदनी का कोई दूसरा साधन था। उसके पिता, जिनकी सिलाई की एक दूकान थी, उनकी भी आर्थिक मदद करता था। लेकिन जब उनका पहला बच्चा यानी कृष्ण की बड़ी बहन, जो अब आठ साल की है, पैदा हुई, उसके पिता ने कहा कि आखिर कब तक वे उनके खर्चे उठाते रहेंगे, खाने-पीने और कपड़े-लत्तों से लेकर उनकी दूसरी सारी देनदारियाँ चुकाते रहेंगे। आखिर कृष्ण के परिवार को घर छोड़ना पड़ा।
वे वृंदावन आ गए और सबसे पहले कृष्ण के पिता ने एक जनरल स्टोर खोलकर व्यापार में भाग्य आज़माया। दुर्भाग्य से दुकान उनकी अपेक्षानुरूप नहीं चल पाई और जब कई हफ्ते सिर्फ नुकसान उठाते हुए गुज़र गए, उन्होंने दुकान बंद कर दी। फिर कृष्ण का पिता पेंटर बन गया। और आज भी वह यही काम कर रहा है। क्योंकि वह किसी कंपनी में काम नहीं करता, उसे भवन-निर्माण में लगे और दूसरे मजदूरों की तरह रोज़ नया काम तलाशना पड़ता है। स्वाभाविक है कि इस तरह उसे रोज़ काम नहीं मिल पाता और इसलिए उनकी आमदनी बहुत अनियमित है।
जितनी कमाई वह कर पाता है, उसमें कई बार दो कमरे वाले उस मकान का किराया अदा करना भी मुश्किल हो जाता है-जबकि उन्हें बिजली भी उपलब्ध नहीं है! तार-वार बाकायदा जुड़े हुए हैं लेकिन उनके पास मीटर नहीं है और इसलिए बिजली भी नहीं है। रात में वे मोमबत्तियाँ जलाकर रौशनी करते हैं, गर्मियों में पंखे के लिए और सर्दियों में हीटर के लिए तरसते रहते हैं।
कृष्ण की बहन स्कूल जाती है और पहले कृष्ण भी उसी स्कूल में पढ़ने जाता था। लेकिन दो-दो बच्चों की स्कूल फीस, परीक्षा फीस, किताब-कापयों और उनके साथ लगा दूसरा सारा खर्च नियमित रूप से उठाना उनके लिए बेहद मुश्किल होता था। इसलिए वे बड़े खुश हैं कि समय पर हमारे स्कूल आ गए और कम से कम कृष्ण की भर्ती हमारे यहाँ हो गई। अब वह हमारे यहाँ आकर पूर्णतया मुफ़्त शिक्षा पा रहा है। शिक्षिकाएँ बताती हैं कि वह बड़ा समझदार बच्चा है और दूसरे सहपाठियों की मदद के लिए सदा तत्पर रहता है!
आप भी कृष्ण जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं-किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!
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