टायर मरम्मत के काम से इतनी कमाई नहीं होती कि स्कूल की फीस भरी जा सके – हमारे स्कूल के बच्चे – 4 दिसंबर 2015

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आज शुक्रवार है और हमारे स्कूल के एक या अधिक बच्चों का परिचय आपसे करवाने का दिन। आज सुनीता और कविता की बारी है। वास्तव में ये लड़कियाँ सगी बहनें नही हैं बल्कि चचेरी बहनें हैं लेकिन क्योंकि दोनों साथ रहती हैं, साथ-साथ घूमती-फिरती हैं और यहाँ तककि दोस्त भी साथ-साथ बनाती हैं, मैंने उन्हें एक साथ मिलवाने का निश्चय किया है। वैसे भी, उनके घर का दूसरा कोई विडिओ भी पूरी तरह ऐसा ही लगेगा जैसा यहाँ दिखाया गया है! 🙂

सुनीता और कविता के परिवार उन पहले लोगों में से थे, जिन्होंने अप्रैल माह में स्कूल में भर्ती की तारीखें पता कीं। कैसे? कविता का पिता ठीक आश्रम के मुख्य दरवाज़े के सामने दुकान लगाता है। वह लकड़ी के फट्टों से किसी तरह तैयार की गई झोपड़ी से अधिक कुछ नहीं है, जिस पर एक टूटी-फूटी छत भी है। सामने एक खम्भा है, जिसके चारों ओर टायर रखे हुए हैं: वह खराब टायरों की मरम्मत का काम करता है, साइकिलों के मामूली पंक्चर सुधारता है और कारों, स्कूटरों और साइकिलों में हवा भरता है। स्कूल बस सहित आश्रम के सभी वाहन अपने चकों में वहीं से हवा भरवाते हैं और उसे कोई न कोई मिल ही जाता है, जो बता दे कि हमारे चैरिटी स्कूल में भर्ती कब शुरू होने वाली है।

इस तरह वे आ गए: कविता को लेकर हमारे गेट के सामने काम करने वाला मेकेनिक पिता और उसका भाई, जो उसी सड़क पर 50 मीटर आगे सड़क के दूसरी ओर वैसी ही एक दुकान लगाता है, अपनी बेटी, सुनीता और बेटे सुमित को लेकर।

कविता छह साल की है और सुनीता सात की। पहले दोनों किसी दूसरे स्कूल में पढ़ते थे, जो उनके लिए बहुत महंगा पड़ता था। हमने उनका टेस्ट लिया और उनके नतीजों के अनुसार उन्हें विभिन्न कक्षाओं में भर्ती किया गया: सुनीता को यू के जी में और कविता को एल के जी में, जो हमारे स्कूल की और औपचारिक शिक्षा की शुरुआत से पहले की सबसे निचली कक्षा है। सुमित को हमने इस वर्ष भर्ती नहीं किया क्योंकि वह सिर्फ चार साल का है और अभी स्कूली पढ़ाई के लिहाज से काफी छोटा है।

जब हम बच्चों से मिलने उनके घर गए तब दोनों माँएँ खाना बनाने में पूरी तरह व्यस्त थीं। हालाँकि वे सब साथ ही रहते हैं, दोनों परिवारों की आमदनी और खर्च अलग-अलग हैं और वे अपना-अपना अलग राशन खरीदते हैं और अलग-अलग भोजन बनाते हैं। बड़े भाई के दो लड़के और दो ही लड़कियाँ हैं, जिनमें सुनीता सबसे बड़ी है। छोटे भाई की तीन लड़कियाँ हैं, जिनमें कविता सबसे बड़ी है।

दादा-दादी को मिलाकर परिवार के 13 सदस्य एक बहुत छोटे से मकान में रहते हैं, जिसमें सिर्फ दो कमरे हैं- दो परिवारों के लिए दो कमरे। दादा-दादी टैरेस पर बनी एक झाफरी में सोते हैं, जिसकी छत भी आधी खुली हुई है। परिवार अपनी इस स्थिति को सुधारना चाहता है लेकिन निश्चित ही टायरों में हवा भरकर कोई व्यक्ति धनवान नहीं बन सकता! सामान्यतया वे किसी तरह अपना खर्च निकाल ही लेते हैं लेकिन मकान बनवाना या कोई निर्माण कार्य करवाना जैसे अतिरिक्त कामों के लिए उसमें कोई गुंजाइश नहीं बन पाती!

इस तरह उनकी बच्चियों, सुनीता और कविता को मुफ़्त शिक्षा प्रदान करके इस परिवार की थोड़ी-बहुत मदद कर रहे हैं।

आप भी मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें!

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