आज मैं आपका परिचय दो लड़कों से करवाना चाहता हूँ, जिन्होंने इसी साल से हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया है और जिनके नाम हैं, धनेश और हितेश। वृंदावन के सबसे गरीब इलाके में रहने वाले एक परिवार के चार बच्चों में ये दो सबसे बड़े बच्चे हैं।
बच्चों का पिता पेंटर के रूप में काम करता है लेकिन उसके पास मासिक आमदनी वाला कोई स्थिर काम नहीं है और रोज़ सबेरे उसे काम की खोज में निकलना पड़ता है-कभी ठेकेदारों के संपर्कियों से ज़रिए तो कभी लेबर मार्केट में मजदूरों की तलाश में निकले भवन निर्माताओं या ठेकेदारों से बातचीत करके। कभी तो कुछ दिन काम करने की जगह मिल जाती है और कभी कोई काम नहीं मिलता और स्वाभाविक ही, जब महीने के अधिकतर दिनों में काम मिल जाता है तो उस माह आमदनी भी अधिक हो जाती है। लेकिन अक्सर यह होता है कि माह में ज़्यादा से ज़्यादा पंद्रह दिनों का काम ही मिल पाता है।
इतने संघर्ष के पश्चात कमाए रुपयों से भी मुश्किल से ही घर का खर्च चल पाता है। पाँच दिन की कमाई तो सिर्फ एक कमरे वाले घर का किराया चुकाने में ही खर्च हो जाती है, जिसमें परिवार के छह सदस्य मुश्किल से समा पाते हैं। यह कमरा भी एक और परिवार के मकान का एक हिस्सा है। मकान के मुख्य हाल में स्थित हैंड पंप पर ही वे लोग नहा-धो लेते हैं और शहर के बाहर खेतों में सबेरे-सबेरे दिशा-मैदान के लिए चले जाते हैं।
लड़कों की माँ घर में रहकर बच्चों की देखभाल करती है। दस साल उम्र का धनेश सबसे बड़ा है और घर के कामों में हाथ बँटाता है। हितेश छह साल का है। उनका चार साल का एक भाई और दो साल की एक नन्हीं सी बहन भी है। वे सभी दिन का बहुत सारा समय बाहर दूसरे बच्चों के साथ खेलते-कूदते हुए और मटरगश्ती करते हुए बिताते हैं।
जब हम उनके घर गए थे तब हमने पूछा था कि क्या धनेश पहले कभी स्कूल नहीं गया।.पता चला वह स्कूल जाता था लेकिन वह एक सस्ता निजी स्कूल था जहाँ पढाई का स्तर बहुत खराब था! धनेश ने बताया कि उनके गणित के शिक्षक ने बीच सत्र में (पढ़ाई के सत्र के बीचोंबीच) स्कूल की नौकरी छोड़ दी थी और तब से साल के अंत तक स्कूल में गणित की पढ़ाई-लिखाई बिल्कुल बंद रही।
इस तरह, तीन बच्चों को पढ़ाने की चिंता के साथ वे इस बात से भी ठगा सा महसूस कर रहे थे कि जिस स्कूल की पढ़ाई पर वे इतना सारा पैसा खर्च करते रहे थे, वह व्यर्थ हो गया था! इसलिए जब उचित समय पर उन्हें हमारे स्कूल के बारे में पता चल गया तो वे ख़ुशी से फूले नहीं समाए और उन्होंने अपने दो बच्चों को तुरंत हमारे यहाँ भर्ती करा दिया!
अब धनेश और हितेश, दोनों हमारे स्कूल की पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ रहे हैं। दोनों बहुत जीवंत, चंचल और होशियार बच्चे हैं और हमारे शिक्षक उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए तत्पर हैं!
हितेश और धनेश जैसे बच्चों की शिक्षा में आप भी मदद कर सकते हैं-किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!
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