आज मैं आपका परिचय एक साथ तीन बच्चों से करवाना चाहता हूँ-तीन सगे भाई-बहन, जो इसी साल से हमारे स्कूल में पढ़ने आ रहे हैं। उनमें से गोंविंद दस साल का, योगेश आठ का और उनकी बहन भक्ति पाँच साल की है।
मई में जब हम उनसे मिलने उनके घर गए तो सबसे छोटी, भक्ति घर पर नहीं थी। वह अपने नाना-नानी से मिलने पास के ही बड़े शहर, मथुरा गई थी। गर्मी की छुट्टियों में वह कुछ दिनों से उनके पास ही रह रही थी।
उनके मुहल्ले में पहुँचते ही हमने अपने आपको उनके परिवार के छोटे से घर में हर तरफ फैले माल-असबाब से घिरा पाया। कपड़े से ढँकी एक मोटर साइकल बाहर रखी हुई थी, बरतन, लोटे और बाल्टियाँ थीं और अहाता कोने में रखे हैण्ड-पंप के पानी से भीगा हुआ था। छोटी सी जगह में वे किसी तरह सामान के साथ अटे पड़े थे।.
यह मकान काफी समय से उनका घर बना हुआ है। उनके अभिभावकों के विवाह के तुरंत बाद ही पिता के माता-पिता ने उनकी मदद करने का विचार किया, जिससे उन्हें दैनिक उपयोग के किसी सामान की कमी महसूस न हो और जीवन में स्थिरता आ सके। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने बेटे के लिए यह ज़मीन का टुकड़ा खरीदा था, जिस पर, बढ़ते हुए परिवार की ज़रूरतों के मुताबिक, थोड़ा-थोड़ा करके उन्होंने कुछ कमरे, एक बेडरूम और रसोईघर बनवा लिया है।
तीन बच्चों का यह पिता एक छोटी सी चाय की दुकान लगाता है। उसे दुकान भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वास्तव में वह एक लकड़ी के बक्से जैसी गुमटी भर है, जिसे सड़क के किनारे रखकर वह दिन भर चाय बनाकर बेचता है।
स्वाभाविक ही, इस काम में व्यापार की दृष्टि से कुछ दिन बहुत अच्छे होते हैं-त्योहारी दिनों में, धार्मिक समारोहों के वक़्त और निश्चित ही तीर्थयात्रा के मुहूर्तों में, जब वृंदावन में बाहरी भक्तों का मेला लगा होता है। लेकिन यह स्थिति साल भर नहीं रहती और गर्मी के दिनों में और बारिश के मौसम में चाय की बिक्री नगण्य हो जाती है और दुकान का खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाता है।
आवश्यक घरेलू खर्चों के लिए कभी-कभी पर्याप्त पैसे मिल जाते हैं लेकिन अधिकतर उन्हें उनमें कटौती करके गुज़र-बसर करनी पड़ती है। इन आवश्यक खर्चों में से एक खर्च निश्चित ही बच्चों की पढ़ाई का खर्च होता है! इसीलिए जब उन्हें हमारे स्कूल के बारे में पता चला और वे समय पर हमारे पास आ गए तो वे बड़े खुश हुए कि चलो, बच्चों के हमारे स्कूल में भर्ती हो जाने से उन्हें बड़ी राहत हो जाएगी!
एक सस्ते निजी प्राथमिक विद्यालय में पहले गोविंद चौथी कक्षा में पढ़ता था लेकिन जब हमने उससे उसका पूरा नाम पूछा तो वह अपने सरनेम के हिज्जे भी नहीं कर पाया। ऐसा ही कुछ योगेश के साथ भी हुआ जो वहाँ दूसरी कक्षा में पढ़ रहा था मगर अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पाया। इससे हमारी यह धारणा पुनः पुष्ट हुई कि उनके पास अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं: वे सिर्फ उन्हें किसी सस्ते स्कूल में पढ़ाने की हैसियत रखते हैं, जहाँ वास्तव में वे कुछ भी सीख नहीं सकते!
इस तरह हमारे यहाँ गोविंद अभी अपर के जी में पढ़ रहा है जबकि योगेश और भक्ति लोअर के जी में साथ-साथ पढ़ते हैं। वे लोग खूब मौज-मस्ती करते हुए अपनी पढ़ाई कर रहे हैं और परिवार भी खुश है-बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का बोझ अब उनके कंधों पर से उतर चुका है!
इन जैसे बच्चों की आप भी मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें!
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