भूखे रह सकते हैं मगर झाड़ू-पोछा नहीं करेंगे – भारतीय समाज में व्याप्त झूठी प्रतिष्ठा की धारणा – 16 जुलाई 2015

हमारे स्कूल का नया सत्र शुरू हुए अब दो सप्ताह हो गए हैं और धीरे-धीरे अब लगने लगा है कि शिक्षिकाओं और बच्चों ने अपनी दैनिक लय पा ली है। नएपन की वह उत्तेजना अब नहीं रह गई है क्योंकि सभी एक-दूसरे के आदी होते जा रहे हैं और बच्चे स्कूल और आसपास के माहौल से काफी हद तक परिचित हो चुके हैं। बच्चों की आमद के बाद हमने भी आश्रम-कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि की है क्योंकि खाना बनाने और स्कूल और आश्रम की साफ-सफाई के लिए हमें अतिरिक्त कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। सफाई-कर्मचारियों की बात निकलते ही हमारा सामना एक व्यर्थ तर्क-वितर्क से हो रहा है, भारतीय समाज में व्याप्त एक बेतुका और हास्यास्पद विचार: बहुत से गरीब लोग भूखे रह लेंगे मगर सफाई (घरेलू नौकरानी) का काम नहीं करेंगे।

इससे अधिक तर्कसंगत बात क्या हो सकती है?: हमें कर्मचारियों की आवश्यकता है, हम जानते हैं की बच्चों के अभिभावक बहुत गरीब हैं और उन्हें रोज़ काम की खोज में भटकना पड़ता है। इसके अलावा, उनके पास कोई विशेष शैक्षणिक योग्यता भी नहीं है कि कहीं ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी पा सकें। तो फिर क्यों न हम इन बच्चों के अभिभावकों को अपने यहाँ सफाई-कर्मचारियों के रूप में रख लें, जिससे उनके पास एक ऐसी स्थाई नौकरी हो जाएगी, जिसमें पढ़ाई-लिखाई की ज़रूरत नहीं होती?

कुछ हद तक तो हम यह करते ही हैं। हम कोशिश करते हैं कि अपने यहाँ आश्रम और स्कूल की साफ़-सफाई और खाना बनाने के लिए अपने स्कूल के बच्चों के अभिभावकों को ही काम पर रख लें। दुर्भाग्य से, अक्सर वे लोग रसोई में काम करने को तो तैयार हो जाते हैं मगर झाड़ू को हाथ तक लगाना नहीं चाहते!

रमोना ने बताया कि कैसे वे लोग मई के महीने में नए बच्चों की भर्ती के सिलसिले में घर-घर घूमते थे और परिवारों से मिलकर उनकी आर्थिक स्थिति का जायज़ा लेते थे कि अभिभावक-गण क्या काम करते हैं। ज़्यादातर घरों में सिर्फ पिता ही कोई काम करता था क्योंकि माँ को घर और बच्चों की देखभाल के लिए घर पर ही रहना होता था। लेकिन एक घर में हमें ऐसी कहानी सुनने को मिली, जिसने हमें उनके प्रति सहानुभूति से भर दिया: माँ और दो बच्चे बच्चों के पिता के घर में रहते हैं लेकिन पिता किसी काम का नहीं है। वह धेले भर का काम नहीं करता, ऊपर से शराबी और जुआरी भी है और जब भी कुछ पैसे पाता है, इन्हीं व्यसनों में उड़ा डालता है।

इसलिए माँ को अपने और अपने बच्चों के लालन-पालन और दीगर खर्चों के लिए अपने जेठों और सास की दया पर निर्भर रहना पड़ता है! वह थोड़ा-बहुत कढ़ाई-बुनाई का काम करती है मगर, क्योंकि वह इस काम में बहुत दक्ष नहीं है, अधिक कमा नहीं पाती कि अपनी जीविका चला सके। उसके जेठों ने शिकायती लहजे में कहा, ‘वह बहुत थोड़े से रुपए कमाती है, हम कब तक उसका खर्च उठाते रहेंगे?

रमोना को आश्चर्य हुआ और उसने सीधे-सीधे कह दिया, ‘क्यों? अगर वह कुछ घरों में झाड़ू-पोछा ही कर ले तो आधा दिन, जब बच्चे स्कूल में होते हैं, काम करके अच्छा-ख़ासा पैसा कमा सकती है!’ और यह सही बात है, जो महिलाएँ घरों में चौका-बासन या झाड़ू-पोछा करती हैं, वे यहाँ काफी पैसे कमा लेती हैं! लेकिन, जैसे ही उन्होंने रमोना के मुँह से ये शब्द सुने, उन्हें सांप सूंघ गया! सब चुप, जैसे यह सलाह देकर उसने कोई बुरी, घृणास्पद बात कह दी हो!

शुरू में वे बहाने बनाते रहे और फिर बात बदलते हुए इस प्रश्न से ही किनारा कर लिया कि जैसा चल रहा है, वही ठीक है, कि वह घर के कामों में ही मदद करती रहे, बाहर जाने की उसे कोई ज़रूरत नहीं है!

तो, एक तरफ लोग जीवन-यापन का मामूली घरेलू खर्च चलाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं, काम की खोज में दर-दर भटकते हैं कि बच्चे भूखे न रहें और दूसरी तरफ उन्हें अपने रिश्तेदारों का मोहताज होना मंज़ूर है, बुरे वक़्त की मार झेलना मंज़ूर है लेकिन साफ़-सफाई का काम करना मंज़ूर नहीं, दूसरों के जूठे बरतन साफ़ करना मंज़ूर नहीं!

यह रवैया बहुत बुरा है, नकारात्मक है। झूठा अहं है, प्रतिष्ठा का आत्मघाती पाखंड है और सबसे बड़ी बात, एक साधारण से काम के प्रति सदियों से जड़ जमाए बैठी गलत धारणा है।

माता-पिता आर्थिक रूप से असमर्थ हैं इसलिए वह नाना-नानी के साथ रहती है – हमारे स्कूल के बच्चे – 19 जून 2015

आज मैं आपका परिचय एक और लड़की, मोनिका से करवाना चाहता हूँ, जो सिर्फ दो हफ्ते बाद से हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू करेगी। वह पाँच साल की है और पिछले दो साल से अपने नाना-नानी के साथ यहीं, वृंदावन में रह रही है।

मोनिका की माँ 25 साल उम्र की है और अपने माता-पिता के पाँच बच्चों में सबसे बड़ी है। सिर्फ सोलह साल की उम्र में उसका विवाह हो गया था और मोनिका उसकी पहली संतान है। उसका पति यानी मोनिका का पिता मजदूरी करता है और अधिकतर दूकानदारों के यहाँ से निर्माण-स्थलों तक ईंटों की ढुलाई का काम करता है। उनके दो और बच्चे हैं, जो अभी तीन और दो साल के हैं। जब सबसे छोटा वाला बच्चा पैदा हुआ तो मोनिका की माँ ने खुद अपनी माँ से मोनिका को अपने पास रखने की विनती की। अपने पति की छोटी सी आमदनी में उसके लिए तीन छोटे-छोटे बच्चों को पालना संभव नहीं था।

नानी, जिसके खुद के दो-दो बच्चे घर पर हैं, मान गई। अब मोनिका अपने नाना-नानी के यहाँ, अपनी 14 साला मौसी और 13 साल के मामा के साथ रहती है।

नाना एक धार्मिक नौटंकी में धार्मिक कथाओं का मंचन करता है। यह ऐसा काम है, जहाँ हमेशा लोगों की ज़रूरत होती है मगर काम करने वाले को ज़्यादा पैसे नहीं मिल पाते। इसलिए उसकी पत्नी भी एक आश्रम और एक गेस्ट हॉउस में नौकरानी का काम करती है। दोनों मिलकर लगभग 7000 से 9000 रुपए यानी 120 से 150 यू एस डॉलर तक कमा लेते हैं, जिसमें से 2000 रुपए यानी 30 डॉलर के आसपास वे घर का किराया चुकाते हैं। घर में एक बड़ा सा कमरा और उससे लगा एक छोटा कमरा है- यह छोटा वाला कमरा वास्तव में संडास और बाथरूम है लेकिन क्योंकि अभी उसमें पानी का कनेक्शन नहीं है और वैसे भी कमरा महज ईंटें रखकर तैयार किया गया ढाँचा भर है, इसलिए वे उसका इस्तेमाल रसोई के रूप में करते हैं।

बड़े गर्व से नानी बताती है कि कैसे उसने अपनी तीन बड़ी बेटियों को 15 या 16 साल की उम्र में, उनके 8वीं या 9वीं पास करते ही ब्याह दिया था। यह गर्व की बात होती है- क्योंकि एक माँ के रूप में उसका यह सबसे बड़ा उत्तरदायित्व था!

उसकी चौथी बेटी से, जो मोनिका की बगल में बैठी थी, हमने पूछा कि क्या वह अभी स्कूल जाती है तो पता चला कि नहीं जाती। उसने 11वीं तक पढ़ाई की है लेकिन फिर उन्होंने घर बदल लिया और उसकी पढ़ाई छूट गई। हालाँकि हम उसे आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे मगर हम जानते हैं कि नानी की योजना शायद कुछ और होगी: जल्द से जल्द उसके लिए लड़का ढूँढ़ना!

लेकिन मोनिका के लिए हमने सुनिश्चित किया है कि उसे परिवार में सबसे अच्छी शिक्षा प्राप्त हो और वह भी मुफ़्त! हम अपने स्कूल में उसका इंतज़ार कर रहे हैं- और जब हम उसके घर गए थे तभी से वह हमारे यहाँ, स्कूल आने के लिए बेताब हो रही है, उसके लिए कुछ दिनों का इंतज़ार भी मुश्किल हो रहा है!

अगर आप मोनिका जैसे बच्चों की कुछ सहायता करना चाहते हैं तो आपका स्वागत है- किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके आप ऐसा कर सकते हैं! शुक्रिया!

हमें शिकायत क्यों नहीं करना चाहिए? इसका उत्तर यहाँ है – 28 मई 2015

मैंने कल आपको बताया था कि जब हम मोनिका या उसकी रूममेट की तरह बुरी तरह ज़ख़्मी या परेशान व्यक्ति देखें तो हमारे भीतर कैसे विचार आने चाहिए और हमें क्या महसूस होना चाहिए। हमें खुश होना चाहिए कि हम स्वस्थ और सुखी हैं, अपने शरीर की बनावट को लेकर, उसकी सुंदरता को लेकर हमें संतुष्ट होना चाहिए। लेकिन यहाँ मैं एक और बात कहना चाहता हूँ! अपने आस-पास को, देश-दुनिया के माहौल को देखते हुए न सिर्फ आपको अपने शरीर के लिए खुश होना चाहिए बल्कि उन आर्थिक, सामाजिक, भौतिक और भावनात्मक बातों के लिए भी खुश और संतुष्ट होना चाहिए जो आपको प्राप्त हैं और जो जीवन आपको मिला है, उसके लिए खुश होना चाहिए!

पिछले कुछ हफ्तों में मैंने यह भी आपको बताया था कि पूर्णेन्दु और रमोना हमेशा नए भर्ती हुए बच्चों के घरों का दौरा करते हैं। जो कुछ वहाँ वे देखते हैं, जिन परिस्थितियों में वे बच्चे रहते हैं, उसे देखना भी जीवन को देखने का एक बिल्कुल अलग नजरिया देते हैं। जो भी उनके साथ वहाँ जाएगा, अपने जीवन की परेशानियों के लिए रोना छोड़ देगा!

भीषण गर्मी से बचने के लिए वे सुबह सबेरे उनके घर जाते हैं लेकिन वापस लौटते हैं तो पसीने में सराबोर, गर्मी से हलाकान लौटते हैं। जिस घर में भी वे जाते हैं, कहीं भी ए सी या सामान्य कूलर तक नहीं होते! कुछ घरों में बाहर के दरवाज़े तक नहीं होते या होते हैं तो सिर्फ एक कमरे का दरवाज़ा बंद किया जा सकता है, उस जगह नहीं, जहाँ जीवन का अधिकांश हिस्सा वे गुज़ारते हैं! अधिकतर घरों में बिजली होती है मगर सब घरों में नहीं। बिजली नहीं तो फिर पंखा वगैरह भी नहीं कि थोड़ी-बहुत ठंडी हवा मिल सके! जिनके यहाँ बिजली है भी तो वहाँ हमारे यहाँ जैसा बैटरी वाला पॉवर बैक-अप इन्वर्टर नहीं होता कि बिजली चली जाए तो कम से कम पंखा चालू रह सके। और बिजली हरदम जाती ही रहती है, विशेष रूप से जब तापमान 45 डिग्री या उससे ऊपर पहुँच जाता है, जैसा कि पिछले कुछ दिनों से हो रहा है।

अधिकतर बच्चों के पिता और कुछ बच्चों की माँएँ भी दैनिक मजदूरी करती हैं। वे सब बाहर, अधिकतर खुली धूप में, विभिन्न निर्माण-स्थलों में काम करते हैं और निश्चित ही उनके काम का वातावरण और परिस्थितियाँ मनुष्यों के काम करने के लिए उपयुक्त या सुरक्षित नहीं होतीं! उन्हें नंगे हाथों से फावड़ा पकड़कर सीमेंट और रेत का मिश्रण तैयार करना होता। वे निर्माण स्थलों पर हर जगह नंगे पाँव घूमते-फिरते रहते हैं या ज़्यादा से ज़्यादा रबर की चप्पलों में। कुछ साल इन्ही परिस्थितियों में काम करने के कारण मिस्त्रियों के हाथ फट जाते हैं।

माँएँ एक या दो छोटे-छोटे कमरों में एक साथ छह-छह बच्चों की और घर की देखभाल करती हैं और ऊपर से घर को सुव्यवस्थित रखने की ज़िम्मेदारी भी उसी की होती है। आमदनी कम होने के कारण बहुत कम खर्च में उन्हें पूरे परिवार के भोजन की व्यवस्था करनी होती है, ज़्यादातर रोटी-सब्ज़ी या चावल-दाल जैसे मूलभूत अनाजों और खाद्य पदार्थों से ही काम चलाना पड़ता है।

फटे-पुराने कपड़ों में बच्चे दिन भर गंदी, धूल भरी सड़कों पर खेलते रहते हैं। उनमें से कई वास्तव में बीमार होते हैं लेकिन इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं होते। दस-दस साल के बच्चे अपना नाम तक नहीं लिख पाते और कई किशोर बच्चों को यही पता नहीं होता कि उनकी उम्र ठीक-ठीक क्या है। लगभग सभी खेतों में पाखाना करने जाते हैं या सड़क के किनारे बैठकर पाखाना करते हैं-बहुत कम घरों में संडास उपलब्ध होता है।

और भारत का यह सबसे बुरा चित्र नहीं है और न ही दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई है-भारत में इससे भी बुरी हालतों में लोग रहते हैं! और आपका जीवन कितना भी बुरा क्यों न दिखाई दे, अगर आप ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं तो निश्चित ही समझ जाएँगे कि आपके देश में आपसे भी बुरी हालत में रहने वाले और उसमें सारा-सारा जीवन गुज़ार देने वाले लोग भी मौजूद हैं! जब भी आप अवसादग्रस्त हों, इस विषय में सोचिए और सिर्फ सोचते ही मत रहिए बल्कि यह समझने की कोशिश कीजिए कि वास्तव में आपका जीवन इससे कितना बेहतर है!

अर्थात, शिकायत मत कीजिए! और सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति के संदर्भ में ही नहीं-अपनी सामाजिक हैसियत के संदर्भ में भी, अपने प्रेमसंबंधों को लेकर, किसी से प्रेमसंबंध न हो पाने या प्रेमसम्बन्धों में आ गई खटास को लेकर भी!

दुनिया की बुरी हालत पर अवसादग्रस्त न हों बल्कि कुछ ऐसा करें कि वह आपकी आँखें खोल दे और आपको पता चले कि आपका जीवन कितना सुखद और सम्पन्न है और तब आप उसमें सकारात्मक परिवर्तन ला सकेंगे और साथ ही उनकी मदद भी कर सकेंगे, जो आपसे अधिक बुरी परिस्थितियों में जीवन गुज़ार रहे हैं!

भारत – जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और पैसे वालों की शिकार हो गई है – 19 मई 2015

कल मैंने हमारे स्कूल में होने वाली बच्चों की भर्तियों की चर्चा करते हुए आपको बताया था कि कभी-कभी हमें कुछ बच्चों को इस बिना पर ‘नहीं’ कहना पड़ता है कि उनके माता-पिता ‘पर्याप्त गरीब नहीं हैं’, हालांकि हम जानते हैं कि उनके परिवार भी किसी भी दृष्टिकोण से धनवान नहीं हैं। मैंने ज़िक्र किया था कि मैं ‘गरीब’ और ‘ज़्यादा गरीब नहीं’ के बीच अंतर करने की आवश्यकता से निजात पाना चाहता हूँ। लेकिन मेरी कामना एक कदम और आगे बढ़ चुकी है: मैं आर्थिक परिस्थिति के अंतर के अनुसार निर्णय करने की आवश्यकता को पूरी तरह समाप्त करना चाहता हूँ! मैं शिक्षा में सबके बीच पूरी समानता चाहता हूँ, चाहे किसी के लिए भी हो!

दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा सबके लिए समान रूप से सुलभ नहीं है। बहुत से पश्चिमी देशों में, खास कर जर्मनी में, मैंने कई स्कूल देखे, जिन्हें सरकार चलाती है और जहाँ हर सामाजिक हैसियत वाले बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। वहाँ भी निजी स्कूल हो सकते हैं, जहाँ काफी महंगे बोर्डिंग स्कूलों में उनकी अच्छी देखभाल होती होगी और जहाँ बहुत धनवान लोग अपने बच्चों को भेजते होंगे-लेकिन अगर आपके पास पर्याप्त पैसे न भी हों, तो भी न सिर्फ आपके बच्चे को विद्यार्जन का अधिकार होगा बल्कि कानूनी नियमों के अनुसार उसे स्कूल जाना अनिवार्य होगा! और माता-पिता चाहे जितना कमाते हों, हर लड़का या लड़की ऐसे स्कूल में पढ़ाई करेंगे, जहाँ पढ़ाई का स्तर अच्छा होगा। वे सब बराबर होंगे और एक ही कतार में, एक साथ बैठकर, एक समान ही शिक्षक से शिक्षा ग्रहण करेंगे!

भारत में यह एक दूर का सपना है। यहाँ सिर्फ वही बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, जिनके माता-पिता काफी पैसा कमाते हैं। अगर किसी बच्चे के अभिभावक अपढ़ हैं तो वे वैसे भी शिक्षा को अधिक महत्व नहीं देते क्योंकि उन्हें स्वयं अपने जीवन में उसकी ज़रूरत नहीं पड़ी थी। दूसरी तरफ, अगर वे वास्तव में बच्चे को स्कूल भेजना ही चाहते हैं, तो वे उन्हें सरकारी स्कूलों में या फिर किसी सस्ते निजी स्कूल में ही भेज पाने की क्षमता रखते हैं। नतीजा: वहाँ उन्हें निचले स्तर की शिक्षा से ही संतोष करना पड़ता है और कहीं-कहीं तो बिल्कुल पढ़ाई नहीं होती!

गावों में सरकारी स्कूलों की हालत इतनी बुरी है कि सिर्फ कागजों पर ही इन स्कूलों का अस्तित्व मौजूद है और शिक्षक साल में सिर्फ दो बार स्कूल आते हैं-अपनी तनख़्वाहें लेने! मैंने एक बार आपको एक ग्रामीण स्कूल के बारे में बताया था, जहाँ स्कूल की इमारत तबेले के रूप में इस्तेमाल हो रही थी! यह सबकी खुली आँखों के सामने होता रहता है और सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ही इस बुराई की जड़ है। तो ऐसी स्थिति में अभिभावक अपने बच्चों को इन सरकारी स्कूलों में क्यों भेजें?

भारत में उन्हीं अभिभावकों के बच्चे दूर तक आगे बढ़ सकते हैं, जिनके पास काफी पैसा है। हमारे देश में भ्रष्टाचार और फिर बड़े व्यावसायिक घरानों ने शिक्षा से सबसे अधिक लाभ उठाया है। भ्रष्टाचार के चलते सरकारी स्कूल किसी काम के नहीं हैं और बड़े लोगों ने इस क्षेत्र में व्यापार करने और पैसा बनाने की अपर संभावना देख ली: उन्होंने उसे एक उद्योग की तरह शुरू कर दिया, पैसा निवेश किया और शिक्षा की दुकाने खोल लीं। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार आप विभिन्न स्तरों की शिक्षाओं में से किसी एक को चुन सकते हैं। शिक्षा के एक ब्रांड के अंतर्गत भी अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार आप खरीदी जाने वाली सुविधा और शिक्षा का चयन कर सकते हैं!

मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूँ कि भले ही बच्चा बहुत बुद्धिमान और प्रतिभाशाली हो, अगर उसके माता-पिता बेटे की स्तरीय शिक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर सकते तो उसे अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती! और अगर आपके पास औसत मात्रा में ही धन उपलब्ध है तो? तो आपका बच्चा औसत स्तर की शिक्षा ही प्राप्त कर पाएगा!

ऐसे अभिभावकों के दुख का अंदाज़ा मैं लगा सकता हूँ। वे मध्यम वर्ग के माता-पिता होते हैं, जो जानते हैं कि उनका बच्चा बहुत बुद्धिमान है, होनहार है और वे मेहनत करके पर्याप्त रकम का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं और यहाँ तक कि बेटे या बेटी की पढ़ाई के लिए ऋण तक लेते हैं- लेकिन वे अपने बच्चे को अपनी अपेक्षा के अनुसार शिक्षा नहीं दिलवा पाते, शिक्षा के स्तर के साथ कोई न कोई समझौता करना ही पड़ता है। दरअसल अच्छी शिक्षा बहुत महंगी और उनकी कूवत से बाहर होती है!

एक बार मैंने आपको बताया था कि कैसे एक बार एक दंपति कार से हमारे स्कूल आए। वे अपने बच्चों को हमारे स्कूल में भर्ती करवाना चाहते थे। हमने उन्हें नम्रतापूर्वक मना कर दिया क्योंकि स्पष्ट ही वे किसी भी निजी स्कूल की फीस अदा करने में समर्थ थे। लेकिन अभिभावकों के चेहरे पर छाई निराशा देखकर हम उनका दर्द समझ गए: हमारे स्कूल जैसे अच्छे निजी स्कूल की फीस अदा करना उनकी सामर्थ्य के बाहर था। इस तरह उनका यही दोष था कि वे इतना अधिक कमाते थे कि हमारे स्कूल में उनके बच्चों के लिए कोई जगह संभव नहीं थी!

इस देश में, जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और बड़े उद्योगपतियों की दबंगई का शिकार है, सारे बच्चे एक बराबर नहीं हैं। मैं गैर बराबरी की इस व्यवस्था में बदलाव देखना चाहता हूँ! और मैं इस दिशा में काम करता रहूँगा! कैसे? यह आप कल के ब्लॉग में पढ़ेंगे!

कठिन निर्णय: कब कोई बच्चा हमारे स्कूल में भर्ती होने के लिहाज से ‘पर्याप्त गरीब नहीं’ होता? 18 मई 2015

पिछले हफ्ते मैंने भ्रष्टाचार के चलते हमारे सामने पेश आने वाली स्कूल संबंधी दिक्कतों के बारे में बताया था। मैंने बताया था कि भारत में शिक्षा पूरी तरह व्यवसाय बन चुकी है। अंत में मैंने संक्षेप में स्कूल खोलने के पीछे मौजूद सोच को स्पष्ट करते हुए बताया था कि हम किसके लिए और क्या कर रहे हैं: अपने आसपास के गरीब बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा और उनके परिवारों की मदद! मैं पहले ही घोषणा कर चुका हूँ कि अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में अपने सोच-विचार को आपके सामने लगातार रखता रहूँगा और मुझे लगता है कि इस काम में पूरा अगला हफ्ता लग जाएगा! आज इसकी शुरुआत करते हुए मैं हमारे सामने आने वाले सबसे पहले प्रश्न पर चर्चा करूँगा: कौन हमारे स्कूल के लिए 'पर्याप्त गरीब' है और कौन आर्थिक रूप से पर्याप्त समर्थ है?

जब भी हमारे यहाँ नई भर्तियाँ शुरू होती हैं, हम व्यक्तिगत रूप से हर बच्चे के घर जाते हैं और देखते हैं कि वे कहाँ रहते हैं। इससे हमारे सामने कई बातें स्पष्ट हो जाती हैं- पहली बात तो यह कि हम हर बच्चे और उसकी परिस्थिति को व्यक्तिगत रूप से जानने लगते हैं और इससे बच्चा स्वतः ही हमसे नज़दीकी महसूस करने लगता है। और स्वाभाविक ही हम यह जानने में समर्थ हो जाते हैं कि वास्तव में उस परिवार के बच्चे को हमारे स्कूल में स्थान की ज़रूरत है या नहीं।

वास्तव में यह काम आसान नहीं होता और अक्सर हमें अपने स्कूल के बच्चों के परिवारों के बीच काफी अंतर नज़र आता है। कुछ लोगों के पास रहने के लिए अपना खुद का मकान होता है-अपने बाप-दादाओं से प्राप्त या कहीं से ऋण लेकर बनवाया हुआ। कुछ झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले परिवार होते हैं, किसी में सिर्फ तीन तरफ ईंट की दीवारें होती हैं, टीन की छत होती है, जिसमें अभी से छेद नज़र आ रहे होते हैं। कुछ लोगों को रोज़ काम की खोज में निकलना पड़ता है या कुछ ऐसे होते हैं, जो बीमारी के चलते कोई काम ही नहीं कर पाते, जब कि कुछ लोगों के पास काफी हद तक काम तो होता है मगर उससे पर्याप्त आमदनी नहीं होती। कुछ लोग चार बच्चों को पालने लायक कमा लेते हैं लेकिन उनके पास पालने-पोसने के लिए सात बच्चे होते हैं! कुछ और होते हैं, जहाँ परिवार में बच्चा तो एक ही होता है मगर कमाने वाला भी एक ही होता है-दूसरा या तो मर चुका होता है या फिर वे अलग हो चुके होते हैं!

आप अभी से देख सकते हैं कि अंतर बहुत है और ज़्यादातर प्रकरणों में जब हम उनके घर जाते हैं तो तुरंत ही उस परिवार की कठिन परिस्थिति के बारे में जान जाते हैं। ऐसे प्रकरण कम ही होते हैं, जहाँ हम बच्चों के माता-पिता से कहते हैं कि हम उनके बच्चों को भर्ती नहीं कर पाएँगे। लेकिन ऐसे प्रकरण भी होते ही हैं।

हम अक्सर पाते हैं कि बच्चों के माता या पिता की आय औसतन 4000 रुपए प्रतिमाह होती है और जब हम किसी ऐसे घर में पहुँचते हैं, जहाँ परिवार की आय लगभग 10000 रुपए है और खिलाने, लालन-पालन करने और पढ़ाने-लिखाने के लिए सिर्फ एक ही बच्चा है तो हम नम्रतापूर्वक अभिभावकों से कोई दूसरा स्कूल देखने के लिए कह देते हैं। हमारे स्कूल में, जिस जगह यह बच्चा पढ़ता, वह अब किसी अधिक गरीब बच्चे के उपयोग में आ सकती है, जिसके माता-पिता वास्तव में किसी दूसरे स्कूल में उसकी शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते! ऐसा परिवार, जिसे तुलनात्मक रूप से मदद की अधिक आवश्यकता है।

लेकिन साथ ही हम यह भी जानते हैं कि यह पिता भी अधिक धनवान नहीं है! हम जानते हैं कि वह कई स्कूल ढूँढ़ लेगा लेकिन उसके लिए ऐसा स्कूल ढूँढ़ना मुश्किल होगा, जहाँ बच्चे को अच्छी शिक्षा भी मिल सके और जिसका खर्च वहन करने में उसे कठिनाई भी न हो। निश्चित ही, हमारे स्कूल की पढ़ाई का स्तर उसे किसी दूसरे स्कूल में नहीं मिलेगा! आखिर हम क्या कर सकते हैं-हमारी अपनी सीमाएँ भी हैं! अधिक से अधिक संख्या में गरीब बच्चों को पढ़ाने की परिकल्पना तो है लेकिन एक बिन्दु के बाद हमें ‘नहीं’ कहना ही पड़ता है।

मैं नहीं चाहता कि आगे ऐसी परिस्थिति निर्मित हो कि हमें यह तय करने की समस्या से दो-चार होना पड़े कि कौन पर्याप्त गरीब है और किसके पास काफी पैसा है कि बच्चे को हमारे स्कूल में भेजना उनके लिए आवश्यक न हो। फिलहाल तो हम ऐसा कर रहे हैं लेकिन भविष्य में हमारे पास एक कार्य-योजना है, जिससे हम यह काम कुछ अलग तरह से कर सकेंगे। उसके बारे में मैं आपको अगले कुछ दिनों तक बताता रहूँगा।

अपने आस-पास नज़र दौड़ाएँ और देखें कि कोई भूखा तो नहीं सो रहा! 4 मई 2015

आज मैं आपके लिए कुछ आँकड़े लेकर हाजिर हुआ हूँ:

विश्व

– दुनिया की 80% आबादी प्रतिदिन 10 डॉलर से कम आमदनी पर गुज़ारा करती है।

– दुनिया के 64% सबसे गरीब लोग सिर्फ पाँच देशों में निवास करते हैं।

– दुनिया के सिर्फ 85 धनवान लोगों की संपत्ति कुल 3.5 बिलियन डॉलर है, जो सबसे गरीब लोगों की कुल संपत्ति का आधा है।

– दुनिया के 805 मिलियन गरीब लोगों को आज भी पर्याप्त भोजन प्राप्त नहीं होता।

– इनमें से 791 मिलियन लोग विकासशील देशों में निवास करते हैं।

– विकासशील देशों के 13.5 % लोग कुपोषित हैं।

– एशिया के 526 मिलियन लोगों को रोज़ सिर्फ आधा पेट भोजन ही मिल पाता है।

– दुनिया का हर नवाँ व्यक्ति रोज़ भूखे पेट सोता है।

– दुनिया के पाँच साल से कम उम्र के 45% बच्चे कुपोषण से मृत्यु का शिकार होते हैं और 20% सामान्य से कम वज़न होने के कारण पैदा होने वाली बीमारियों के नतीजे में।

– दुनिया में हर साल एड्स, मलेरिया और टीबी से मरने वाले कुल मनुष्यों की संख्या से भूख से मरने वाले लोगों की संख्या कहीं ज्यादा है।

– दुनिया में 20000 बच्चे रोज़ भूख के कारण मारे जाते हैं।

भारत

– भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार अपनी आमदनी का 70% भोजन की मद में खर्च करते हैं।

– गरीबी रेखा से ऊपर वाले परिवार अपनी आमदनी का 50% भोजन की मद में खर्च करते हैं।

– मध्य वर्गीय परिवार भोजन पर अपनी आमदनी का 30% खर्च करते हैं।

– भारत में पैदा होने वाले 40% फल और सब्जियाँ तथा 20% अनाज आपूर्ति के खराब प्रबंधन के कारण नष्ट हो जाते हैं-और भोजन सामग्री गरीब उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाती है।

– भारत में 190 मिलियन लोग भूखे रहने को मजबूर हैं।

– भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के 30.7% बच्चों का वज़न सामान्य से कम है।

– भारत का हर चौथा बच्चा कुपोषण का शिकार है।

– पाँचवे जन्मदिन से पहले मौत के मुख में समाने वाले दुनिया के कुल बच्चों में से 24% भारत में बसते हैं।

– भारत में प्रतिदिन 3000 बच्चे कुपोषण से मरते हैं।

– 30% नवजात भारतीय बच्चे बचपन में ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

ये तथ्य अत्यंत दुखदायी हैं और इस बात का बहुत बड़ा प्रमाण भी कि दुनिया भर में इस बारे में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अगर हम सभी अपनी संपत्ति या अपनी आमदनी में से कुछ पैसे जरूरतमंदों के साथ साझा करें तो किसी के लिए भी भूख के कारण मरने की नौबत नहीं आएगी! और भले ही आप सोचते हों कि ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते, आप जो भी बन पड़े, करें। आप अकेले भूख का अंत नहीं कर सकते-लेकिन सब मिल-जुलकर उसका अच्छी तरह मुक़ाबला कर सकते हैं!

भारत के गरीब बच्चों का भरण-पोषण करने के हमारे काम में आप भी हमारी मदद कर सकते हैं- हमारे स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

आँकड़ों का स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया

"मैं ईश्वर की इच्छा से गरीब हूँ और इस बारे में कुछ नहीं किया जा सकता" – धर्म का बुरा प्रभाव – 26 मार्च 2015

मैंने परसों के अपने ब्लॉग में बताया था कि भारतीयों के लिए अपने जीवन में और सामान्य रूप से जीवन के नैसर्गिक बदलावों को स्वीकार करना पश्चिमी लोगों के मुक़ाबले आसान होता है। दुर्भाग्य से इसके असरात सिर्फ सकारात्मक ही नहीं होते और आज के अपने ब्लॉग में मैं इसी विषय पर अपने विचार लिखना चाहता हूँ।

क्या हो अगर आप जीवन को जस का तस स्वीकार तो करें मगर उसमें मौजूद बुरी बातों को लेकर परेशान भी न हों? क्या आप कल्पना नहीं कर सकते कि अगर ऐसा हो जाए तो वह आपके जीवन में कितनी नकारात्मकता पैदा कर सकता है? सामान्य रूप से मैं मानने के लिए तैयार हूँ कि यह सकारात्मक नज़र आता है-बशर्ते वह आपके अंदर निष्क्रियता न पैदा करे और इतना असमर्थ न बना दे कि आप जीवन में कोई बदलाव न ला सकें। हमारे स्कूल के बच्चों के अभिभावकों के साथ दैनिक जीवन में हुए अनुभव यहाँ प्रस्तुत हैं: जब गरीब लोग अपनी बुरी हालत को जस का तस स्वीकार कर लेते हैं और उनसे बाहर निकलने की कोशिश तक नहीं करते।

जी हाँ, हमने बहुत से गरीब परिवारों के साथ बातचीत की है, बहुत से पुरुष और महिलाएँ, जो बहुत गरीबी में किसी तरह ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। बहुत से लोग काम तो करते हैं लेकिन उन्हें इतनी कम मज़दूरी मिल पाती है कि बड़ी मुश्किल से अपना और अपने बच्चों के पेट भर पाते हैं। फिर भी जब आप उनके घर जाते हैं और उनके पास काम नहीं होता तो वे सिर्फ यूँ ही घर में पड़े-पड़े समय गुज़ार देते हैं। वे बताते हैं कि वे पुजारी हैं या रिक्शा चलाते हैं और कभी काम मिल जाता है तो कभी-कभी काम नहीं भी मिल पाता। कहीं-कहीं उनका कोई बड़ा लड़का या लड़की कोई काम करके पैसे कमा लेते हैं और इस तरह परिवार का गुज़र-बसर हो ही जाता है। फिर और अतिरिक्त प्रयास करने की ज़रूरत क्या है?

वे कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करते। अपनी वर्तमान परिस्थिति से निकलने और ऊपर उठने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास करने का, थोड़ी अधिक मेहनत करने का उनके अंदर कोई उत्साह ही नज़र नहीं आता!

यही वास्तविकता है- अगर हमारे लिए ईश्वर यही चाहता है, अगर यही उस सर्वशक्तिमान की इच्छा है…हम उनके मुख से ऐसे वाक्य अक्सर सुनते हैं और एक नास्तिक के रूप में यह बात मुझे उद्वेलित करती है, मैं अविश्वास से भर उठता हूँ! वास्तव में मैं समझ नहीं पाता कि आप कैसे नहीं देख पाते कि आप भी खुशहाल हो सकते हैं, आपके पास भी पर्याप्त खाने-पीने के लिए हो सकता है और कैसे आप सोच सकते हैं कि कोई कंजूस, सर्वशक्तिमान अधम यह निर्णय करे कि आप जीवन में सफल नहीं हो सकते! और यह धर्म के कारण पैदा हुई मानसिकता है!

हिन्दू धर्म ऐसी शिक्षाओं से भरा पड़ा है, जो लोगों से अपनी नियति स्वीकार करने के लिए कहती हैं, कि वे संघर्ष न करें, कि वैसे भी होनी-अनहोनी पहले से ही लिख दी गई है। यही कारण है कि अपने शराबी पतियों से रोज़ मार खाने वाली महिलाएँ भी तलाक के बारे में सोच भी नहीं पातीं: कि मेरे जीवन में यही लिखा है, ईश्वर यही चाहता है, यही मेरी नियति है।

इसलिए स्वाभाविक ही, परिवर्तन को स्वीकार करने का माद्दा रखना एक अच्छी बात है और यह खुशी की बात है कि भारतीय संस्कृति में यह बड़े पैमाने पर मौजूद है क्योंकि इसकी भारतीयों को आवश्यकता भी है। लेकिन उन्हें चाहिए कि वे पश्चिमी लोगों से परिश्रम और अनुशासन सीखें और अपनी दुखदाई परिस्थितियों से बाहर निकलने और जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करें!

अपने प्रथम विश्व के बच्चों को भारत जैसे कम विकसित देशों का दर्शन क्यों करवाना चाहिए? 12 मार्च 2015

पिछले कुछ दिनों से मैं भारत के बारे में गैर-भारतीयों की, हमारे बच्चों के घरों के निरीक्षण के बाद हमारे मेहमानों की और भारत की गरीबी पर सामान्य रूप से विदेशी पर्यटकों की प्रतिक्रियाओं के बारे में लिखता रहा हूँ। कभी-कभी वे विदेशी मेहमान पूछते हैं कि क्या उन्हें बच्चों को भी लेकर आना चाहिए और मैं इस बारे में कहना चाहता हूँ कि मेरे विचार में उन्हें अधिक से अधिक ऐसा करना चाहिए!

मैं सचमुच यह समझता हूँ कि आपके बच्चों के लिए छुट्टियाँ मनाने का यह सबसे बढ़िया तरीका है क्योंकि यह उनके लिए बड़ा लाभप्रद सिद्ध होगा। यदि आप स्वयं पश्चिमी देशों में पले-बढ़े हैं तो शायद आपने महसूस किया होगा कि आपके लिए भारतीय जीवन की कल्पना कितनी मुश्किल रही थी, विशेष रूप से यहाँ के बच्चों की हालत के बारे में, जो अमीरी-गरीबी की विषमताओं के ठीक बीचों-बीच जीवन निर्वाह कर रहे होते हैं।

अगर आप जन्म से पहली दुनिया के निवासी हैं और सिर्फ दो सप्ताह के लिए उस दुनिया को छोड़कर गर्मी की छुट्टियाँ मनाने बाहर निकले हैं और वह भी किसी क्लब-रिसोर्ट में सारा वक़्त गुजारने के लिए, तो आप बच्चों को छुट्टियाँ मनाने किसी कम विकसित देश में ले जाने में कतराएँगे। आपने दुनिया के बहुत से दूसरे हिस्सों की खराब हालत के बारे में सुन रखा होता है, आप बहुत से खौफनाक चित्र और वीडियोज़ देख चुके होते हैं। लेकिन इन देशों में जाकर, वहाँ के जीवन का अनुभव प्राप्त करना बिलकुल अलग बात होती है!

मैं कहता हूँ कि वहाँ की यात्रा करके, वहाँ के जीवन को करीब से देखना, खुद अनुभव करना और उसे अपने बच्चों को भी दिखाना बड़ी अच्छी बात होगी। आप खुद अनुभव कर रहे होंगे कि आप कितने सौभाग्यशाली हैं-क्या आप अपने बच्चों के लिए भी वही सब नहीं चाहेंगे?

उन्हें दिखाइए कि बहुत से दूसरे लोग कैसा जीवन जीते हैं, शुरू से उन्हें समझाइए, उन्हें जिज्ञासु बनाइए! इस बात से भयभीत न हों कि यह उनके लिए बहुत ज़्यादा हो जाएगा- बच्चों में समझने की अद्भुत क्षमता होती है और वे अपने आसपास की चीजों के साथ आसानी के साथ तालमेल बिठा लेते हैं। अकसर हम बच्चों की समझने की शक्ति को वास्तविकता से कम आँकते हैं, स्वाभाविक ही इस तरह छुट्टियाँ गुज़ारना समुद्री बीचों की छुट्टियों की तरह आरामदेह नहीं होगा मगर वह उनके जीवन के लिए उससे बहुत ज़्यादा कीमती सिद्ध होगा! वे उन चीजों को देखेंगे, उन बातों का स्वतः अनुभव करेंगे अन्यथा जिन्हें वे सिर्फ टीवी पर देख पाते या अपने स्कूलों की किताबों में पढ़ते। उनके बारे में सुनी-सुनाई बातों के स्थान पर वे दोनों के बीच का अंतर महसूस कर पाएँगे। दूर किसी अनदेखी, अनजानी जगह पर होने वाली बातें मानकर उन्हें खारिज करने की जगह वे उन पर ध्यान देंगे, उनकी परवाह करेंगे और उन पर सोच-विचार करेंगे। वे बातें उनके नजदीक घटित हो रही होंगी, वह उनके लिए यथार्थ होगा!

आश्रम के बच्चों के साथ आज तक के अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि यह सदा लाभप्रद होता है, यह अनुभव बच्चों को किसी तरह की हानि नहीं पहुँचाता!

और फिर निश्चित रूप से आप इस अनुभव को कुछ आरामदेह छुट्टियों के साथ जोड़ सकते हैं-आप एकाध हफ्ते के लिए किसी बीच पर भी जा सकते हैं-लेकिन कृपा करके उन्हें इन बातों को देखने और जानने-समझने का मौका भी अवश्य प्रदान करें!

एक प्रश्न और उसका उत्तर: गरीबी के बीचोंबीच लगातार इतने समय हम कैसे रह सकते हैं? 11 मार्च 2015

हमारे आश्रम में आने वाले मेहमान अक्सर हमारे स्कूल के बच्चों के घरों का दौरा करते हैं और कल मैंने उनके कुछ अनुभव आपके साथ साझा किए थे। किसी ने पूछा: आप ऐसी गरीबी हर वक़्त देखते कैसे रह सकते हैं? वास्तव में भारत आने वाले कई यात्री हमसे यह सवाल करते हैं। आपको आश्चर्य होगा कि वास्तव में हमारे पास इसका उत्तर मौजूद है।

भारत में गरीब और अमीर के बीच का यह स्वाभाविक अंतर हर वक़्त आपको दिखाई देता रहता है। एक विशाल मंदिर है, जिसे बनाने में गुरु को अपने अनुयायियों से प्राप्त करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं और उस मंदिर के सामने चीथड़ों में गरीब भिखारी हाथ फैलाए खड़े हैं। आप दिल्ली की सड़कों पर घूमिए, किसी भी हाट-बाज़ार या एम्पोरियम से, जहाँ कोई भी वस्तु उससे कम महंगी नहीं है, जितनी वह न्यूयॉर्क या पैरिस में है, ख़रीदारी करके बाहर निकलिए और कोई न कोई बच्चा आपके शर्ट की बाँह खींचते हुए आपसे भीख मांग रहा होगा: मैं भूखा हूँ, कुछ खाने के लिए खरीद दीजिए!

जी हाँ, यहाँ बार-बार आपको गरीबी की याद दिलाई जाती है। निश्चय ही, बच्चों के बीच काम करते हुए हमें हर समय यह देखना पड़ता है और हमें ऐसी बहुत सी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है, जिन्हें फीस लेने वाले स्कूलों को नहीं करना पड़ता। हमें उनके जीवन में आने वाली आर्थिक समस्याओं को जानने का मौका मिलता है और स्वाभाविक ही हमें उनके साथ सहानुभूति होती है।

सर्वप्रथम मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि आप धरती के किसी भी कोने में हों, गरीबी हमेशा से है और हर जगह है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप लंदन के किसी पॉश रेस्तराँ में बैठे डिनर ले रहे हैं या मध्य अफ्रीका के किसी शरणार्थी शिविर में पीने का पानी वितरित कर रहे हैं-इस दुनिया में हर स्तर पर गरीबी मौजूद है-ऐसे भी बच्चे हैं, जो भूख से मरे जा रहे हैं, कुछ दूसरे बच्चे हैं, जो स्कूल नहीं जा पाते और कुछ और हैं, जो मामूली स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। तो, आपके भारत आने से गरीबी नहीं बढ़ी है बल्कि अचानक आपको उसकी याद आ गई है, वह पहले से मौजूद थी और अब वह आपके सामने बेहतर तरीके से उजागर हुई है। घर में सोफ़े पर बैठे-बैठे आपको उसकी गंभीरता का पता कभी नहीं चल पाता!

मुख्य बात यह है कि आप उसके बारे में क्या सोचते हैं, कैसा महसूस करते हैं और यहाँ रहते हुए यदि आपके अंतःकरण को उस गरीबी ने छुआ है, अगर उसे देखकर आपके मन में मदद करने की इच्छा जागृत हुई है तो कृपा करके इस इच्छा को अपने घर वापस जाने के बाद भी हमेशा ज़िंदा रखें! इस भावना की दुनिया को सख्त जरूरत है कि सब एक साथ मिलकर उनकी ओर मदद का हाथ बढ़ाएँ, जिन्हें मदद की आवश्यकता है।

और इस प्रश्न का जवाब यह है: हम अच्छा से अच्छा जो कुछ भी कर सकते हैं, करते हैं।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी मदद कितनी छोटी है लेकिन जब आप कुछ देखते हैं और उससे आपका मन पसीजता है तो मदद करने की कोशिश अवश्य कीजिए, परिवर्तन लाने की कोशिश अवश्य कीजिए, इसके बारे में दूसरों को अवश्य बताइए। मैं जानता हूँ कि कुल गरीब बच्चों की संख्या की तुलना में हमारा स्कूल बहुत छोटा है। बच्चों को भोजन कराने और शिक्षा प्रदान करने का यह एक बहुत छोटा सा प्रयास है, जिससे उन बच्चों का भविष्य बेहतर हो सके। यदि हमारे स्कूल की तरह और भी कई स्कूल हो जाएँ तो यह बहुत बड़ा काम हो सकता है! आप भी मदद कर सकते हैं-उदाहरणार्थ, एक बच्चे को प्रायोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन की व्यवस्था करके!

भले ही आप यहाँ न आ सकें, भले ही आप इन बच्चों की मदद न कर सकें और भले ही आप आर्थिक रूप से इतने सक्षम न हों कि कोई आर्थिक सहयोग कर सकें-फिर भी कोशिश कीजिए कि आपके आसपास मौजूद किसी ज़रूरतमंद की कोई न कोई मदद कर पाएँ। कभी-कभी महज एक मुस्कान, मदद के लिए बढ़ा हुआ एक हाथ और सहानुभूति के कुछ अच्छे शब्द भी इतने कीमती साबित होते हैं कि आप कल्पना नहीं कर सकते!

जब कि दुनिया में बुराई आपको विह्वल किए दे रही है, इस बात पर विचार करें: आप जो भी करते हैं, चाहे वह प्रयास कितना भी छोटा क्यों न हो, कोई न कोई असर अवश्य डालता है!

हमारे स्कूल के बच्चों के घरों का दौरा करने वाले पश्चिमी मेहमानों की प्रतिक्रियाएँ – 10 मार्च 2015

हर शुक्रवार को हम अपने स्कूल के बच्चों के घरों का दौरा करते हैं और मैं अपने ब्लॉग में उसके बारे में लिखता हूँ। आश्रम में आया कोई मेहमान जब हमारे साथ आने की इच्छा प्रकट करता है तो हम उसे भी साथ ले जाते हैं। इन दौरों में उन्हें होने वाले अनुभवों के बारे में आज मैं अपने ब्लॉग में लिखना चाहता हूँ और साथ ही वापस आने के बाद होने वाली उनकी प्रतिक्रियाओं के बारे में भी।

ये मेहमान भारत का वह दूसरा रूप देखते हैं जो यहाँ आने वाले सामान्य पर्यटक निश्चय ही नहीं देख पाते। यहाँ तक कि वे भी नहीं, जो खास तौर पर यहाँ के "ग्राम्य-जीवन" का अनुभव लेने आते हैं-क्योंकि वे गाँव, जहाँ ट्रेवल-एजेंट उन्हें ले जाते हैं, वह भी खास पर्यटकों की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखते हुए चुना जाता है और गाँव के परंपरागत घरों में ही उनके रहने का अच्छा-खासा इंतज़ाम किया जाता है, समुचित ग्रामीण भोजन, चाय और नाश्ते परोसे जाते हैं। हमारे मेहमान वास्तविक परिवारों को और वास्तविक घरों को देखने जाते हैं, उनके आसपास का माहौल देखते हैं और विशेष रूप से यह देखते हैं कि वहाँ हमारे स्कूल के बच्चे किस तरह गुज़र-बसर करते हैं।

स्वाभाविक ही ये परिवार गरीब होते हैं और इसीलिए तो उनके बच्चे हमारे स्कूल में पढ़ने आते हैं। उनके घर अलग-अलग तरह के होते हैं। कुछ लोगों को पैतृक संपत्ति में घर मिला होता है तो उनके घर पर्याप्त बड़े होते हैं, कभी-कभी उनके यहाँ बाहर खेलने के लिए आँगन इत्यादि भी उपलब्ध होता है लेकिन दूसरी तरफ अधिकांश बच्चों के घर किराए से लिए गए होते हैं, किसी की मामूली झुग्गी होती है तो किसी का तीन दीवारों वाला, बिना पुता या आधा-अधूरा घर होता है, जिसे धूप और पानी से बचने के लिए प्लास्टिक की पन्नी से ढँक दिया गया होता है और उसका मासिक किराया भी अदा करना होता है! हमारा दौरा आकस्मिक होता है और हमें पता नहीं होता कि जब हम उनके घर जाएँगे तब वे किस हाल में होंगे-और स्वाभाविक ही हमारे साथ आने वाले मेहमान भी नहीं जानते! वे उनका दैनिक रहन-सहन देखकर हैरान और स्तब्ध रह जाते हैं। वे सोच भी नहीं सकते कि वहाँ लोगों को सामान्य मूलभूत सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होतीं। अक्सर बिजली नहीं होती, पानी के लिए सड़क तक जाकर हैंड पंप से पानी निकालकर लाना पड़ता है और नित्यकर्म के लिए संडास या बाथरूम भी उपलब्ध नहीं होते।

हालांकि जाने से पहले आप तैयार होते हैं कि वहाँ क्या देखने को मिल सकता है फिर भी यथार्थ वहाँ बहुत अलग होता है: गंदी, सँकरी सड़कें और गलियाँ चलकर उनके घरों तक पहुँचना, यह तथ्य कि वहाँ आसपास कोई टॉयलेट उपलब्ध नहीं है और रेत में लोटते नंग-धड़ंग बच्चों को देखना, जहाँ आसपास ही छोटे-छोटे सूअर के बच्चे भी मुँह मार रहे हैं या गंदे पत्थरों, कमचियों से खेलते बच्चों को देखना।

यह सब देखकर आप यह महसूस किए बगैर नहीं रह सकते कि इसकी शिकायत करना भी व्यर्थ है। आप अपने जीवन को देखते हैं और महसूस करते हैं कि आप न सिर्फ भाग्यशाली हैं कि इतनी सारी सुविधाएँ पा गए हैं बल्कि "आपका पसंदीदा आइसक्रीम नहीं मिल रहा है" या "आपके पर्दे कालीन से मैच नहीं कर रहे हैं" जैसी बहुत सी बातों की शिकायतें करते हुए निहायत भोंडे भी लगते हैं। आप इस बात को समझने लगते हैं कि जिस भौतिक सुरक्षा के लिए आप चिंतित और परेशान हैं, वह महज आपके दिमाग का फितूर है।

इसे आप तब और भी शिद्दत के साथ महसूस करते हैं जब उन मुसकुराते चेहरों की ओर देखते हैं। उन आँखों की ओर, जो एक तरफ मूलभूत सुविधाओं से महरूम रहने की पीड़ा प्रकट करते हैं तो दूसरी ओर संतोष और उल्लास से दमक रही होती हैं।

हमारे विदेशी मेहमानों से अक्सर मिलने वाली प्रतिक्रियाएँ इस प्रकार होती हैं: इस बात पर आश्चर्य कि वे कितना सहज-सामान्य जीवन जीते हैं और यह कि लोग गरीबी में भी इतने खुश रह सकते हैं!

जितना खुश आप अभी रहते हैं, आपको उससे ज़्यादा खुश रहना चाहिए! बिल्कुल, इसमें कोई शक नहीं!