आस्था आपको पशुओं का मल-मूत्र भी खिला पिला सकती है – 8 अक्टूबर 2015

कल मैंने भारत की एक गंभीर होती जा रही राजनीतिक समस्या का ज़िक्र किया था। आज जिस विषय पर मैं लिखने जा रहा हूँ, उसे पढ़कर आपको हँसी आए बगैर नहीं रहेगी या घृणा से नाक-भौंह सिकोड़ेंगे या स्तब्ध रह जाएँगे! और कूपमंडूक हिन्दू रूढ़िवादियों की बात तो छोड़िए, खुद वर्तमान हिन्दूवादी भारत सरकार भी ठीक इसी बात का प्रचार-प्रसार कर रही है जबकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि गोमूत्र और गोबर के सेवन से कोई लाभ होता है!

जी हाँ, भारत में बहुत से लोग विश्वास करते हैं कि गाय का मल-मूत्र उनके लिए लाभप्रद हो सकता है। वे गंभीरता पूर्वक मानते हैं कि वह बहुत सी बीमारियों का इलाज कर सकता है। इसके अलावा वह पवित्र तो है ही! पवित्र इसलिए कि वह पवित्र गाय द्वारा, जिसे धार्मिक हिन्दू 'मानव जाति की माँ' समझते हैं, उत्सर्जित किया गया है!

यह कोई नई बात नहीं है। दरअसल बहुत से पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि गाय से प्राप्त होने वाले पाँच पदार्थों को अर्थात दूध, दही, घी, मूत्र और मल को, एक कर्मकांड के साथ ग्रहण करने से शरीर पवित्र हो जाता है। यहाँ, वृंदावन में, जोकि 'दैवी चरवाहे' कृष्ण की नगरी है, कई वर्षों से गोमूत्र और गोबर से बनी वस्तुएँ लोकप्रिय हैं। और अब, जब कि एक ऐसी पार्टी सत्ता में है, जो हिन्दू धर्म, हिन्दू परंपरा और हिन्दू मूल्यों का प्रचार-प्रसार करने में लगी है, इन वस्तुओं का बाज़ार अचानक और अधिक फल-फूल रहा है!

स्वाभाविक ही उनके विज्ञापनों में बहुत सारी अनाप-शनाप मूर्खतापूर्ण बातें हैं: सिर्फ इतना ही नहीं कि गाय का मल-मूत्र बहुत सी बीमारियों के इलाज में असरकारक है, यहाँ तक कि कैंसर भी इस चमत्कारी इलाज से ठीक हो जाता है-और यह उनका सबसे जनप्रिय दावा है। इतना ही नहीं, वे झूठी अफवाहें फैलाने में भी नहीं हिचकिचाते-कहते हैं नासा ने भी यह स्वीकार किया है कि गाय के पिछवाड़े से विसर्जित पदार्थ ग्रहण करना आपके शरीर के लिए लाभप्रद होता है! वास्तव में मैं जानना चाहूँगा कि इससे महत्वपूर्ण और कौन सी बात नेशनल ऐरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन को गाय के मूत्र का विश्लेषण करने की प्रेरणा दे सकती है!

चलिए, मज़ाक छोड़कर कुछ गंभीर बात करें। मेरा मानना है कि लोगों को गाय के मल-मूत्र में उलझाकर देश की वास्तविक समस्याओं की ओर से उनका ध्यान बँटाने का यह एक सोचा-समझा मगर कारगर तरीका है। लेकिन गाय को पवित्र, देवता या माता मानने वालों के पाखंड पर मैं एक बार फिर स्तब्ध रह जाता हूँ! वे उसे माँ कहते हैं, खास मौकों पर उसकी पूजा करते हैं और गाय द्वारा उत्सर्जित सभी वस्तुओं को प्रसाद मानकर उनका सेवन करते हैं-लेकिन जब गाय दूध देना छोड़ देती है तो उसकी कोई चिंता नहीं करते कि उसके साथ क्या हो रहा है, इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि गलियों और कचरे के ढेरों पर वह कूड़ा-करकट और जानलेवा प्लास्टिक खा रही है। उसके चमड़े से बने जूते और बेल्ट इस्तेमाल करने में उन्हें कोई एतराज़ नहीं होता! उस वक्त गाय की दैवी पवित्रता का विचार कहाँ चला जाता है? तब उन्हें नहीं लगता कि अपनी माँ की त्वचा से बने जूते पहनकर वे कोई पाप कर रहे हैं?

किसी पशु के अपशिष्ट को धर्म द्वारा पवित्र बनाकर प्रस्तुत करना वास्तव में विचलित कर देने वाला कृत्य है! इलाज के लिए खुद अपना मूत्र पीना भी कुछ लोगों में लोकप्रिय है। और अब आप गोमूत्र पी रहे हैं-आप गधे या बंदर का मूत्र भी पी सकते हैं! गोमूत्र में पाया जाने वाला कोई उपयोगी एंज़ाइम उसमें भी मौजूद हो सकता है!

मैं पूरी गंभीरता के साथ कहना चाहता हूँ कि मैं इसकी अनुशंसा कभी नहीं करूंगा! गोबर और गोमूत्र वे पदार्थ हैं, जिन्हें शरीर ने बाहर निकाला ही इसलिए है कि वे उपयोगी नहीं हैं, वे अपशिष्ट हैं! शरीर के अंग-प्रत्यंगों से होकर गुजरने के बाद इन पदार्थों का कोई उपयोग नहीं रह गया होता! फिर उन्हें आप क्यों पीएँगे या खाएँगे? बल्कि मैंने सुना है कि इन अपशिष्टों को ग्रहण करने से गाय की आँतों में पाए जाने वाले विषाणुओं के संक्रमण का खतरा भी हो सकता है!

तो धर्म की यही वास्तविक शक्ति है! वह आपको पशुओं का मूत्र पीने और उनका मल खाने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह वही धर्म है, जो एक मनुष्य का छुआ पानी पीने से भी मना करता है क्योंकि उस व्यक्ति को धर्मग्रंथों ने ‘अछूत’ घोषित कर रखा है!

क्या आप नहीं समझते कि धर्म के नाम पर यह बहुत गलत हो रहा है?

हमारे स्कूल में गुरुओं की लोकप्रिय जादुई हाथ की सफाई का नरेंद्र नायक के प्रदर्शन द्वारा पर्दाफाश – 13 अगस्त 2015

आज हमने अपने स्कूल में एक कार्यक्रम आयोजित किया। हालांकि वह तुलनात्मक रूप से कम समय में अचानक तय कर लिया गया था, उससे हमें बड़ी प्रत्याशाएँ थीं। नरेंद्र नायक, जो शायद भारत के सबसे जाने-माने तर्कवादी हैं, हमारे यहाँ आए और बच्चों के सामने अपनी प्रस्तुति दी!

सन 2009 में, जब हम न्यूयॉर्क में थे, अचानक एक दिन हमें नेट पर उनका एक शुरुआती वीडियो देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वीडियो में वे अपने विद्यार्थियों के साथ मिलकर झूठे गुरुओं द्वारा दिखाए जाने वाले करतब करके दिखा रहे थे और उनका भांडा फोड़ रहे थे कि कैसे वे तथाकथित चमत्कार गुरुओं की दैवी शक्तियों के कारण नहीं होते बल्कि वे महज जादू के खेल हैं। मैंने उनसे संपर्क किया और पिछले कुछ सालों से हम दोनों एक-दूसरे के कामों पर नज़र रखते आ रहे थे। कुछ हफ्ते पहले संपन्न नास्तिकों की मीटिंग के पश्चात हम पुनः उनके संपर्क में आए। उनका दिल्ली आने का कार्यक्रम था और उन्होंने हमारे स्कूल आने का प्रस्ताव रखा। मुझे लगा, यहाँ उनका स्वागत करना हमारे लिए बड़ी ख़ुशी की बात होगी!

तो, इस तरह वे आज सबेरे हमारे स्कूल के बच्चों के सामने लगातार तीन घंटे खड़े होकर विस्तार से बताते रहे कि क्यों उन्हें किसी बात पर विश्वास करने से पहले कई बार सोचना चाहिए, कोई बात समझ नहीं आ रही हो तो प्रश्न पूछना चाहिए और क्यों किसी सामान्य मनुष्य की कथित दैवी शक्ति पर विश्वास करके उसकी पूजा नहीं करनी चाहिए, न ही उसके चरणों में लोटना चाहिए क्योंकि ऐसी दैवी शक्तियों का कोई अस्तित्व नहीं है और सारे मनुष्य बराबर और एक जैसे हैं।

उन्हें बच्चों के साथ देखना अद्भुत अनुभव था! बच्चे देखकर अचंभित रह गए जब नरेंद्र नायक ने एक मृत जादूगर और तथाकथित गुरु, सत्य सांई बाबा की तरह दिखावटी सोने का हार निकालकर सबके सामने रख दिया। सबके मुँह आश्चर्य से खुले के खुले रह गए जब पानी से भरे दिए को एक बच्चे ने जलाकर दिखाया। दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गए जब उन्होंने एक नुकीले त्रिशूल को अपनी जीभ से पीछे धकेला। उनके प्रदर्शनों के वीडियो देखकर वे रोमांच से भर उठे जब नंगे हाथों से एक व्यक्ति पर शल्यक्रिया करने वाला वीडियो उन्होंने दिखाया और तब भी जब खौलते तेल में नंगे हाथ डालकर वे पूड़ियाँ तल रहे थे!

कई बच्चों को और कुछ शिक्षिकाओं को भी उन्होंने सामने बुलाया और वे भी इस प्रदर्शन का हिस्सा बने: उन्होंने बीच से कटी एक रस्सी पकड़ी और उसे इस तरह जोड़कर दिखा दिया जैसे वह कटी हुई न रही हो। उन्होंने ताश के पत्तों में से एक पत्ता चुना, जिसे नरेंद्र भाई ने सही-सही बता दिया, जैसे वे मस्तिष्क में चल रही बातों को पढ़ना जानते हों। बच्चों की बाँह पर उन्होंने जलती हुई सलाई रख दी और उनकी जीभ पर जलता हुआ कपूर रख दिया और उन्हें कुछ नहीं हुआ!

कहने की आवश्यकता नहीं कि सभी ने इस प्रदर्शन का आनंद लिया। लेकिन वह महज जादू का खेल नहीं था! हर हाथ की सफाई के बाद नरेंद्र नायक हमारे बच्चों को बताते थे कि यह कोई चमत्कार नहीं है, बताते थे कि यह कैसे होता है। इससे बहुतेरे ‘दैवी चमत्कार’ अचानक सामान्य हाथ की सफाई बनकर रह गए, जिन्हें तेज़ गति, सही सामग्रियों के चुनाव या भौतिकी के मूल सिद्धांतों के सहारे प्रदर्शित किया गया!

इस प्रदर्शन को देखकर हमारे बच्चों को न सिर्फ इन हाथ की सफाईयों से चमत्कृत होने का मौका मिला बल्कि वे यह सोचने के लिए मजबूर भी हुए कि धार्मिकों द्वारा बताई जाने वाली बहुत सी चमत्कारपूर्ण बातें क्या वास्तव में सच हैं। इससे उन्हें सच और झूठ का फर्क करने का तर्कपूर्ण रास्ता भी समझ में आया।

मेरा विश्वास है कि यह बच्चों को अपने दिमाग से सोचने की शिक्षा देने का हमारा एक और तरीका है, इस प्रदर्शन के बाद इस दिशा में हम एक कदम अवश्य आगे बढ़े हैं। कि वे आँख मूँद कर किसी पर न तो विश्वास करें और न ही उसका अनुसरण करें। कि उन्हें प्रश्न पूछने से नहीं झिझकना चाहिए और संतोषजनक उत्तर मिलने तक पूछते रहना चाहिए।

नरेंद्र नायक के प्रदर्शन के चित्र यहाँ देखें।

पश्चिमी महिला के लिए क्यों भारत में सामाजिक जीवन बनाने में दिक्कतें पेश आ सकती हैं – 2 जुलाई 2015

पिछले कुछ ब्लॉगों में मैं उन चुनौतियों के विषय में लिखता रहा हूँ, जिनका सामना उन पश्चिमी महिलाओं को करना पड़ सकता है, जो अपने भारतीय पति के साथ भारत में रहने का इरादा रखती हैं। मैंने यह भी बताया कि इन चुनौतियों का फैलाव काफी विस्तृत है- अपनी भारतीय सास के साथ पैदा होने वाले मतभेदों से लेकर इस प्रश्न तक कि आप किस हद तक अंधविश्वास से परिपूर्ण भारतीय परंपराओं को स्वीकार करेंगी, या घरेलू हिंसा को, यहाँ तक कि आपके बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहारों को आप कहाँ तक सहन करेंगी। आज मैं कुछ और आगे जाकर इस विषय में अपने विचार रखना चाहता हूँ- आपके घरेलू संबंधों से परे, अपने संयुक्त परिवार के बाहर की दुनिया से आपके संबंध कैसे होंगे? आपका सामाजिक जीवन कैसा होगा?

स्वाभाविक ही, जब आप किसी दूसरे देश में बसती हैं और अपने लिए एक सामाजिक जीवन तैयार करने की कोशिश करती हैं तब आपको लगभग शून्य से शुरुआत करनी पड़ती है। 'लगभग' मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आपका पति और उसका परिवार इस काम में आपकी मदद कर सकते हैं। शायद! भारत की जनसंख्या इतनी अधिक है कि यह समस्या नहीं होती कि आपको लोग कहाँ मिलेंगे- लेकिन सवाल यह है कि क्या आप उनके साथ नज़दीकी बढ़ाना चाहेंगी!

पश्चिम में पली-बढ़ी होने के कारण और इस कारण कि वहाँ के खुले समाज में आपका लालन-पालन और विकास हुआ है, एक औसत भारतीय की तुलना में आप बिल्कुल अलग ढंग से सोच रही होती हैं। सिर्फ यही बात आपके लिए भारत में कुछ परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने में बाधक हो सकती हैं।

एक उदाहरण लें: आप अपने पति के साथ बाज़ार में घूम रही हैं और अचानक पति की एक परिचित महिला से आप लोगों की मुलाक़ात हो जाती है। आप गपशप करने लगती हैं और आपको लगता है कि यही भारत में आपका सबसे पहला संपर्क है। शायद आपकी पहली मित्र। वह भी आपसे मिलकर उल्लसित दिखाई दे रही है। आपके बीच मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान होता है और वह वादा करती है कि सप्ताहांत में वह आपके पास आएगी। आप भी व्यग्र हो उठती हैं और नाश्ते की तैयारियाँ शुरू करते हुए इस बात की आदत डालने का प्रयास करने लगती हैं कि ‘सप्ताहांत’ का अर्थ कोई एक खास दिन नहीं है, वह कभी भी धमक सकती हैं!

लेकिन क्या आप कल्पना कर सकती हैं कि जब रविवार की शाम तक भी आपके यहाँ कोई न आए तो आपको कैसा लगेगा?

अधिकतर भारतीय खुद अपनी कही बात को कोई विशेष महत्व नहीं देते, खासकर इस तरह की मुलाकातों में कही बातों को। पश्चिम में आपकी आदत होती है कि आप मुलाक़ात का एक निश्चित दिन और समय तय करते हैं और अगर सामने वाले का कार्यक्रम किसी कारण स्थगित होता है तो वह अपने न आ पाने की सूचना देता है। पहली बात तो भारतीय लोग इसे बहुत गंभीर नहीं मानते! इसलिए उसके बारे में उन्हें कोई अफसोस भी नहीं होता-यह भिन्न विचारों और समझ की बात है! उनका फोकस दूसरी बातों पर होता है और कुल मिलाकर चीजों को देखने का नज़रिया भी बिल्कुल अलग प्रकार का होता है।

स्वाभाविक ही, बातचीत के विषय भी बिल्कुल अलग होंगे क्योंकि हर एक की रुचियाँ उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भी निर्भर होती हैं। बहुत सी महिलाओं के पास बातचीत के लिए इसके अलावा कोई दूसरा विषय नहीं होता कि उसका पहला बच्चा कब होने वाला है या वह कितने बच्चे पैदा करेगी- जब कि आप कुछ अधिक गंभीर विषयों पर बात करना चाहेंगी!

ज़्यादातर भारतीय परिवारों में व्याप्त अंधविश्वास के बारे में आपको मैंने पहले ही बताया। आपका भारतीय परिवार बहुत असाधारण रूप से प्रगतिशील ही क्यों न ही क्यों न हो और मिथ्या अंधविश्वासों पर भरोसा न भी करता हो तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आपके आसपास के अन्य सभी लोगों में अंधविश्वास इस तरह कूट-कूटकर भरा होता है कि हर चर्चा में उसका प्रभाव दिखाई देता है! क्या आप मुहूर्त, व्रत-उपवास, धार्मिक समारोहों से सम्बंधित प्रश्नो से बचना चाहते हैं? उन्हें सुनने की आदत डालिए या फिर दोस्तों से बातचीत बंद कर दीजिए। आपको बुरा लग रहा है? किसी बिंदु पर आकर आप स्वयं अनुभव करेंगे कि इस मित्रता के लिए बहुत सारी ऊर्जा और बहुत सारा समय व्यर्थ करने में आप रुचि नहीं रखते।

मैंने घरेलू हिंसा के बारे में लिखा था और यह भी कि कैसे आपको अपने बच्चों के विरुद्ध किसी तरह की हिंसा स्वीकार नहीं करनी चाहिए। लेकिन आप अपने मित्रों और उनके घरों में होने वाली हिंसा का क्या करेंगे? क्या आप उनके घरों में जाना पसंद करेंगे कि आपके बच्चे उनके बच्चों के साथ खेलें और फिर उन्हें अपने माता-पिता से गालियाँ खाता या पिटता देखें? आप इसे पसंद नहीं करेंगे, आप नहीं चाहेंगे कि आपका बेटा या आपकी बेटी यह सब नज़ारा देखे और उनका संवेदनशील मन इन कटु बातों का अनुभव करे! फिर आप अपने बच्चे को अपने तरीके से, अपने परिवेश में पालना-पोसना शुरू कर देंगी।

हो सकता है कि भारत के बड़े शहरों में, जहाँ लोग अधिक खुले दिमाग वाले होते हैं और अलग तरह का जीवन व्यतीत करते हैं, ये बातें कुछ भिन्न हों। लेकिन बहुत भिन्न भी नहीं और फिर सारे लोग भी वैसे खुले दिमाग के नहीं होते! तथ्य यह है कि आज भी भारत में जीवन के प्रति अपरंपरागत रवैया रखने वाले इने-गिने लोग ही दिखाई पड़ते हैं।

अपनी जर्मन पत्नी के साथ हुए अपने निजी अनुभव के आधार पर कहना चाहता हूँ कि बहुत प्रयासों के बाद भी आपको बहुत थोड़े लोग ही मिल पाते हैं, जिनके साथ आप वास्तव में अपना समय गुज़ारना पसंद करेंगी। लेकिन फिर- यह सबकी व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है और इस पर भी कि आप ठीक-ठीक क्या चाहती हैं। तो आगे बढ़िए, मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं!

लेकिन अगर आप अपने भारतीय पति के साथ अपने देश में बसना चाहती हैं तो अगले सोमवार से मेरे ब्लॉग पढ़ना शुरू कीजिए क्योंकि मैं उन समस्याओं पर लिखने जा रहा हूँ, जिनसे उसकी मुठभेड़ हो सकती है, क्योंकि उसके लिए वह वातावरण बिल्कुल अपरिचित और नया होगा!

भारत में विवाहित पश्चिमी महिलाओं: क्या आप ‘रजोधर्म के भारतीय नियमों’ का पालन करती हैं? 30 जून 2015

कल मैंने बताया था कि भारतीय पुरुष से विवाहित एक पश्चिमी महिला जब भारत में पुरुष के संयुक्त परिवार के साथ रहने लगती है तो उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। संभवतः उनमें से एक समस्या यह होगी कि अपनी सास की बातों और आदेशों का वह किस सीमा तक पालन करे या उसे अपने व्यक्तिगत मामलों में किस हद तक दखलंदाज़ी करने के इजाज़त दे। आज मैं एक दूसरी समस्या के बारे में लिखना चाहता हूँ: किस हद तक आप, पश्चिम से आई एक महिला होने के नाते, अपने संयुक्त परिवार की धार्मिक, दक़ियानूसी और अंधविश्वास से परिपूर्ण गतिविधियों को स्वीकार करे। क्या आप उनमें हिस्सा लेंगी?

फिर, हमेशा की तरह, इस क्षेत्र में भी जो समस्याएँ पेश आएँगी, वे सबकी अलग-अलग व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर होंगी। आपका लालन-पालन कहाँ हुआ, आपके आसपास का माहौल कितना धार्मिक था, आपकी आस्थाएँ क्या हैं और किस हद तक आप किसी और को प्रसन्न करने के लिए दूसरे धर्म की परंपराओं का पालन करने के लिए तैयार हैं? इसके साथ ही यह आपके जीवन साथी और उसकी आस्था और उसके परिवार पर निर्भर करता है। साथ ही यह देखना होगा कि परंपराओं और रीति-रिवाजों का परिवार पर असर कितना तीव्र है।

एक बात निश्चित है और आपको सदा याद रखनी चाहिए: आपको ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिए जिसे आप करना नहीं चाहतीं। कोई भी आप पर ऐसे किसी धार्मिक कार्य को करने के लिए दबाव नहीं डाल सकता जो आपके अंदर गहराई से जड़ें जमाकर बैठी बातों के विपरीत है। इस बात को अच्छी तरह जान लें और अगर आपका जीवन साथी आपको उस ओर ठेलने की कोशिश कर रहा है, जिधर आप नहीं जाना चाहतीं तो इस पर विचार-मंथन करने का समय आ गया है कि आपके बीच वास्तव में प्यार है भी या नहीं और क्या इस संबंध के लिए इतना संघर्ष करना उचित है।

लेकिन इसके बावजूद मेरा विश्वास है कि निश्चित ही ऐसी स्थितियों से निपटने के और भी तरीके हो सकते हैं क्योंकि आपका आपसी प्रेम ही आपको एक-दूसरे से जोड़े हुए है और एक को दूसरे का सम्मान करने के काबिल बनाता है।

दैनिक जीवन में उठने वाले प्रश्न इस प्रकार हो सकते हैं: खाना तैयार है, आपने खाना बनाने में मदद की है और आपकी सास आपके हाथ में खाने की थाली देती है, पूजा घर की ओर इशारा करते हुए कहती है- या अगर आप उनकी भाषा नहीं समझते तो स्वयं कर के दिखाती है कि कैसे सर्वप्रथम ईश्वर को भोग चढ़ना होगा तब आप खुद खा पाएँगी। क्या आप न सिर्फ इस नियम का पालन करेंगी बल्कि स्वयं भोग भी चढ़ाएँगी?

फिर कुछ प्रश्न माह में सिर्फ एक बार उपस्थित होंगे: भारत में मासिक धर्म के समय महिलाओं का रसोई में प्रवेश वर्जित होता है। आज भी बहुत सी महिलाएँ इन दिनों में परिवार के साथ भोजन करने नहीं बैठतीं। उन्हें दैनिक जीवन के बहुत से और भी काम करने की मनाही होती है, जैसे कपड़े या बरतन धोना। कुछ परिवारों में इन कुछ दिनों में महिलाएँ अलग कमरे में सोती हैं! उन्हें इस अवधि में अपवित्र समझा जाता है। आपके पति का परिवार इन परंपराओं को लेकर कितना सख्त है? मेरी नज़र में तो यह पूरी तरह मूर्खता पूर्ण है और किसी महिला को ऐसी बात के लिए, जो स्पष्ट ही जैविक रचना से संबंधित है और कुदरती प्रक्रिया है, अपमानित करना ठीक नहीं है! अगर आप भी ऐसा ही महसूस करती हैं तो मैं सलाह दूंगा कि अपने पति को समझाएँ कि यह एक नैसर्गिक चक्र है, जिसके कारण एक दिन बेटे और बेटियाँ पैदा होती हैं- इसमें गंदगी या अपवित्रता जैसी कोई बात नहीं है! अंत में यह आपका चुनाव होगा कि आप किस सीमा तक इन अंधविश्वासों को स्वीकार या अस्वीकार करती हैं- लेकिन अपने आपसे यह प्रश्न पूछकर पहले से अपनी तैयारी करना हर हाल में बेहतर सिद्ध होगा।

तो शायद त्योहारों पर उनके पारिवारिक समारोहों में शामिल होने में आपको कोई एतराज़ नहीं होगा और जब कि आप निश्चय ही बहुत सी छोटी-मोटी बातों के साथ समझौता कर लेंगी, कुछ और पहलू आपको परेशान करते रहेंगे। मैं सिर्फ आपसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि किसी भी समस्या को अपने मन में न रखें। आपको खुलकर बात करनी होगी और आपके पति को भी यह सब सुनने की सलाहियत होनी चाहिए और उसका हल ढूँढ़ने में आपकी मदद करनी चाहिए। मुझे विश्वास है कि वह इसका कोई न कोई हल निकालने में सफल हो पाएगा, जो आप दोनों के लिए सुविधाजनक हो- भले ही आपके आसपास के लोगों का इस विषय में कोई भी मत क्यों न हो!

एक साधु कहता है, यहाँ सोना गड़ा है और भारत सरकार वहाँ खोदना शुरू कर देती है! 4 नवंबर 2013

आज मैं आपको एक ऐसी सत्यकथा सुनाने जा रहा हूँ, जिस पर विश्वास करना आपके लिए बड़ा मुश्किल होगा। प्रथमदृष्ट्या यह कहानी आपको अविश्वसनीय लग सकती है मगर भारत में यह घटना वास्तव में घटित हुई है। और हाँ, शायद दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां ऐसी मूर्खतापूर्ण बात संभव हो सकती है।

कुछ सप्ताह पहले एक साधु, शोभन सरकार ने अपने आसपास के लोगों को बताया कि उसने एक खजाने का सपना देखा है और वह खजाना कहीं दूर नहीं, वहीं, उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में, एक परित्यक्त किले में ज़मीन के नीचे गड़ा हुआ है। उसने दावा किया कि यह महज सपना नहीं है बल्कि वास्तव में उन्नीसवीं शताब्दी के इस किले में धरती के नीचे 1000 टन सोना-चाँदी गड़ा हुआ है, जिसे निकालने के लिए सिर्फ वहाँ थोड़ी सी खुदाई करने की ज़रूरत है! लेकिन उसमें एक पेंच भी था: अगर खुदाई ठीक से नहीं हुई तो सारा सोना मिट्टी हो जाएगा!

भारत एक ऐसा देश है, जहां लोग किसी भी बात पर विश्वास कर लेते हैं। साधारण लोगों में ही ऐसे विश्वासु नहीं पाए जाते बल्कि कई राजनेता और मंत्री भी इसके शिकार हैं, जो बेसिर-पैर की हास्यास्पद बातों पर भी विश्वास कर लेने की क्षमता रखते हैं! संयोग से इस सपने की खबर एक केंद्रीय मंत्री तक पहुंची और उनकी सहायता से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि यह कहानी सच भी हो सकती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग एक सरकारी उपक्रम है, जिस पर स्मारकों और ऐतिहासिक स्थानों की देखरेख का जिम्मा होता है और जो पुरातात्विक महत्व के स्थानों की खोज और उससे जुड़ी खुदाई आदि के काम करता है। तो, इसी सरकारी संस्था का उपयोग किले में खुदाई के लिए किया गया।

जल्द ही यह खबर सारे मीडिया जगत में छा गई। यह एक चटपटी और सनसनीखेज खबर थी और इसके विरोध में भी कई स्वर उभर रहे थे। एक तथाकथित पहुंचे हुए महात्मा के स्वप्न के आधार पर जनता का इतना रुपया इस खुदाई में बरबाद किया जा रहा था इसलिए मेरे जैसे संदेही लोग भी बड़ी तादात में थे, जो सरकार की इस कार्यवाही का मज़ाक बना रहे थे। कुछ लोग उस काल्पनिक सोने पर अपना दावा भी पेश करने लगे: जैसे उस राजा के कई वारिस निकल आए जो उसे अपनी अपने पूर्वजों की मिल्कियत मानते थे और कम से कम कुछ प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करना चाहते थे! इसके अलावा शोभन सरकार के शिष्य भी अपना कमीशन चाहते थे!

खैर, फिर टीवी चैनल्स बड़ी-बड़ी वैन में कैमरे और दूसरे उपकरण लेकर किले में पहुँच गए और वहाँ का विवरण लाइव टेलिकास्ट करना शुरू कर दिया! उनकी बातों का लब्बोलुआब यह था कि अगर यह खजाना मिल जाए तो भारत आर्थिक रूप से दुनिया के अग्रणी मुल्कों में शामिल हो जाएगा क्योंकि वह खजाना दुनिया में आज तक खोजा गया सबसे बड़ा सोने का भंडार होगा! अचानक वह गाँव नींद से जाग उठा था, दूर-दूर से लोग आ रहे थे और जैसे जैसे भीड़ बढ़ती थी, सुरक्षा के इंतज़ाम भी कड़े होते जाते थे! रात-दिन पहरा देने के लिए हजारों की संख्या में पुलिस बल और सुरक्षा कर्मी लगाए गए। गाँव वाले भी मौका देखकर थोड़ा बहुत कमाने के जुगाड़ में लग गए। उन्होंने बाहर से आने वाले लोगों के लिए भोजन की और चाय, समोसों, पकौड़ों की दुकानें खोल लीं। गाँव को जोड़ने वाले रास्तों के किनारे भी कई ऐसी दुकानें नज़र आने लगीं।

इधर पुरातत्व विभाग की खुदाई को कई दिन बीत गए! जब तीन-चार दिन में उन्हें कुछ नहीं मिला तो धीरे-धीरे लोग निराश होने लगे। सबसे पहले अखबारों और टीवी के रिपोर्टर्स बिदा होने लगे और उनके साथ बहुत से दूसरे लोगों ने भी घर का रुख किया, हालांकि साधु अब भी लोगों का उत्साह बढ़ाने में लगे हुए थे। जब छह या सात दिनों बाद कुछ नहीं मिला तो प्रकल्प से जुड़े हुए सरकारी अधिकारी चिंतित होने लगे। उनके लिए मुंह छिपाना मुश्किल हो गया। अब उन्होंने कहना शुरू किया कि किसी व्यक्ति के स्वप्न के आधार पर वे खुदाई नहीं कर रहे थे बल्कि मेटल डिटेक्टर ने धरती के नीचे वास्तव में किसी धातु के होने की सूचना दी थी। एक और व्यक्ति ने ज़ोर देकर कहा कि भले ही उन्हें सोना न मिला हो मगर यदि उन्हें कुछ पुरानी मूर्तियां या पुरातात्विक अवशेष भी मिल जाते हैं तो भी वह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन साधारण जनता हतोत्साहित हो रही थी क्योंकि उन्हें मूर्तियों से कोई मतलब नहीं था और कुछ दिन बाद धीरे-धीरे उनकी संख्या कम से कमतर होने लगी। और फिर उनके साथ खाने-पीने की दुकानें भी उठने लगीं। आखिर खुदाई के 12वें या 13वें दिन पुरातत्व विभाग ने अपना प्रोजेक्ट बंद कर दिया। उन्हें खजाना नहीं मिला था।

वाकई अविश्वसनीय! चर्चित होने को लालायित उस बूढ़े साधु के स्वप्न पर न जाने कितना रुपया और समय व्यर्थ बरबाद किया गया। और साधु ने भी अपना निर्णय सुना दिया: खुदाई ठीक से नहीं की गई; अगर आप उसके प्रति गंभीर होते तो आपको खजाना अवश्य मिलता! न जाने कैसे देश में हम रह रहे हैं!?

अंधविश्वास के प्रति सहिष्णुता बरक्स बच्चों को अंधविश्वास से दूर रखना- 9 अक्टूबर 2013

कल मैंने बताया था कि हमारे कुछ कर्मचारी काम छोड़ कर चले गए क्योंकि वे चेचक से पीड़ित हो गए थे। जब मैंने इस बारे में सोशल मीडिया में लिखा तो प्रत्युत्तर में मुझे बहुत सा फीडबैक मिला। कल मैंने यह भी बताया था कि कुछ लोगों ने मुझसे पूछा कि मैंने उन्हें डॉक्टर के यहाँ क्यों भेजा, जबकि कुछ लोगों ने एक अन्य प्रश्न पर अपनी उलझन व्यक्त की: जब उन्होंने बिना दवा खाए स्वस्थ होकर वापस आने की अनुमति चाही तो हमने उन्हें इंकार कर दिया। क्यों?

अपने इस निर्णय के कारण मुझ पर आरोप लगाए गए कि मैंने सिर्फ इसलिए किसी का रोजगार छीन लिया कि वे उस बात पर विश्वास नहीं करते थे, जिस पर मैं करता हूँ। सबसे पहले मैं इस आरोप का जवाब देना चाहता हूँ। वास्तव में, साधारणतया मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे कर्मचारी किन बातों पर विश्वास करते हैं। वे हिन्दू हों, ईसाई हों, मुसलमान या नास्तिक हों-यह उनकी अपनी मर्ज़ी है और न तो मैं इस बारे में कभी पूछता हूँ और न ही इस मामले में कोई हस्तक्षेप करता हूँ। दुनिया को देखने की उनकी समझ का उनके काम की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ता। मैं इस मामले में बहुत पेशेवर रवैया अपनाता हूँ और उनसे भी यही अपेक्षा रखता हूँ।

हमारे आश्रम के, सब नहीं तो अधिकतर कर्मचारी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि हम लोग धार्मिक बिलकुल नहीं हैं। वे यह भी जानते हैं कि हमारे परिवार में सिर्फ एक पूजा करने वाला व्यक्ति है और वह है हमारी नानी। उनका एक पूजाघर भी है, जिसे सिर्फ वही इस्तेमाल करती हैं। वे यह भी जानते हैं कि बड़े से बड़े धार्मिक त्योहारों में भी हम कोई धार्मिक आयोजन नहीं करते और उपवास के दिन भी हम सामान्य रूप से भोजन करते हैं। इसके अलावा आप किसी प्रकार के धार्मिक या जातिगत लक्षण हमारे यहाँ नहीं पाएंगे। लेकिन उन्हें अपनी धार्मिक पूजा-अर्चना करने से हम नहीं रोकते।

यह आपसी समझ दैनंदिन के कार्य-व्यवहार को सुचारु रूप से चलाने में बड़ी सहायक है और कभी कोई समस्या पेश नहीं आती। लेकिन अब हमने बहुत सोच-समझकर एक निर्णय लिया है: यह सही है कि किसी कर्मचारी के विश्वास पर हम कोई असर नहीं डालना चाहते और न ही उनके विश्वास पर कोई निर्णय सुनाना चाहते हैं लेकिन हमारे आश्रम में बहुत से छोटे-छोटे बच्चे रहते हैं, जिनके प्रति हमारी कुछ ज़िम्मेदारियाँ है। इन बच्चों को हमारे यहाँ सिर्फ इसलिए नहीं भेजा गया है कि हम उनके खाने, कपड़े और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करें बल्कि इसलिए भी कि हम उन्हें शिक्षित करें-स्कूल में और घर में भी। आचार-व्यवहार और नैतिक शिक्षा ऐसे विषय हैं, जिन्हें बच्चे अपने घर में व्यवहृत संस्कृति से सीखते हैं और आश्रम इन बच्चों का घर ही है।

हम खुले विचारों वाले लोग हैं और लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील और सहिष्णु हैं। ये बच्चे आसपास मौजूद सांस्कृतिक माहौल से हिन्दू धर्म के बारे में जानेंगे। लेकिन जब यह धर्म खतरनाक अंधविश्वास की ओर बढ़ने लगे तो उसकी एक सीमा तय करना आवश्यक है। हम समझते हैं कि इसी बिन्दु पर हमें दखल देना चाहिए और अपने वचनों और कार्यों से उन्हें बताना चाहिए कि वे चीजों को वैज्ञानिक दृष्टि से देखना सीखें, और यह भी कि दवा और आपके भीतर मौजूद नैसर्गिक शक्ति के कारण बीमारी ठीक होती है न कि पूजा-पाठ और कर्मकांडों से!

हम समझते हैं कि अगर हमारे दो कर्मचारी दवा न लेने का निर्णय लेकर हमें छोड़ कर चले जाएँ और फिर हमारी सम्मति के साथ वापस भी आ जाएँ तो यह बात बच्चों पर गलत असर डालेगी। वही दवा उन बच्चों को भी खानी पड़ी थी। वे कर्मचारी आएंगे और उन्हें अपने अंधविश्वासों की शिक्षा देंगे और जब बच्चे कहेंगे कि उन्होंने भी वे दवाएँ खाई हैं तो यह सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि उन्होंने दवाइयाँ खाकर गलत काम किया है। जिन्होंने दवाइयों का अच्छा असर अपनी आँखों से देखने के बाद भी दवाइयाँ नहीं खाईं और अपने विश्वास की खातिर नौकरी तक छोड़ दी, वे लोग अब और भी ज़्यादा ढीठ और अड़ियल हो चुके होंगे और पूरी शक्ति के साथ दवाओं के विरुद्ध बातें करेंगे और बच्चों पर यह असर डालेंगे कि हमेशा डॉक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं होती और दूसरी ऊलजलूल बातें भी उनके कोमल मस्तिष्क में ठूँसने की कोशिश करेंगे।

अगर अंधविश्वास अज्ञान के चलते हुआ है तो फिर भी एक बात है मगर जब उस पर अर्थहीन ज़िद्द और अन्धी रूढ़ियों का मुलम्मा भी चढ़ जाए तो यह बहुत ही बुरा होता है। और हम बच्चों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को बहुत गंभीरता से लेते हैं-इसलिए हम उन्हें अंधे, रूढ़िवादी विश्वासों से दूर ही रखना चाहते हैं!

क्या अन्धविश्वास ही चेचक का एकमात्र इलाज है? 8 अक्तूबर 2013

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे हमें चेचक के चलते अपने दो कर्मचारियों से हाथ धोना पड़ा था। नहीं, वे मरे नहीं, सिर्फ हमें छोड़ कर चले गए क्योंकि वे अपनी दवाइयाँ नहीं खाना चाहते थे-और हम उनके कारण दूसरों को खतरे में नहीं डाल सकते थे। और हाँ, हमने उन्हें बता दिया कि अगर माह भर बाद पूरी तरह स्वस्थ होकर वे आते भी हैं तो हम उन्हें वापस काम पर नहीं रखेंगे।

जब मैंने यह कथा सोशल मीडिया पर साझा की तो मुझे कई तरह की प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, अधिकतर प्रतिक्रियाओं की मुझे आशा भी थी और उनमें से कुछ अज्ञान के चलते की गई थीं और कुछ नितांत अपमानजनक थीं। कुछ प्रतिक्रियाएँ हमारे कार्य के समर्थन में भी आई थीं।

दो बातें मुख्य रूप से सामने आईं, जिन पर लोग हमसे और हमारी कार्रवाई से सहमत नहीं थे। पहली बात तो यह थी कि क्यों हम बच्चों और अपने कर्मचारियों को डॉक्टर के पास ले गए। यह सामान्य बात है-भारत में धार्मिक और अंधविश्वासी लोग विश्वास करते हैं कि चेचक की बीमारी देवी के गुस्से की अभिव्यक्ति है और उसके दंड को आपको भुगतना ही होता है और उसे मनाने के लिए कर्मकांड और पूजा-अर्चना भी की ही जाती है। लोग मुझे सिखाने (पढ़ाने) की कोशिश कर रहे थे कि यह एक ऐसी बीमारी है जो बिना किसी डॉक्टर की मदद के ही ठीक हो जाती है और इस बीमारी की कोई दवा नहीं है। उनका तर्क था कि हमारा डॉक्टर एक अंधविश्वासी व्यक्ति था, जो ऐसी दवाओं पर विश्वास कर रहा था, जिसका बीमारी पर कोई असर होने वाला नहीं था, इस तरह वह दरअसल हमें ठग रहा था।

जिन्होंने इस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त की, वे लोग शायद यह सोच रहे हैं कि मैं और मेरा परिवार और हमारे साथ पश्चिम में रहने वाले वे सब लोग, जो ऐसी बीमारियों के इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, बेवकूफ है। जी हाँ, डॉक्टर हमें मूर्ख बना रहा है और हम बेवकूफ़ों की तरह विश्वास कर रहे हैं कि वह हमारी सहायता कर सकता है। वे यहाँ तक कहते हैं कि आज के दिन इस बीमारी की कोई दवा नहीं है। मेरा जवाब है: क्या आपने इस विषय को गहराई से जानने की कोशिश की है!

इसमें कोई शक नहीं कि शरीर को वेरिसेल जोस्टर (varicella-zoster) वाइरस, जिसे चेचक का वाइरस भी कहा जाता है, के विरुद्ध लड़ने के लिए अपने भीतर रोग-प्रतिरोधकों (antibodies) का निर्माण करना पड़ता है। मैं भी जानता हूँ कि तीन दिन में सीधे चेचक ठीक करने की गोली या इंजेक्शन जैसी कोई चीज़ उपलब्ध नहीं है! लेकिन आप दवाइयों की सहायता से अपनी रोग-प्रतिरोधक शक्तियों (immune system) को मजबूत कर सकते हैं और बीमारी से होने वाली तकलीफ़ों पर राहत पहुंचा सकते हैं! वयस्क विषाणु रोधी (antiviral) दवाइयाँ ले सकते हैं और कई तरह के मरहम और ज़िंक युक्त पाउडर भी उपलब्ध हैं। तेज़ बुखार होने पर आप बुखार उतारने की दवा ले सकते हैं और दवाओं से बीमारी को फैलने से रोक भी सकते हैं। आप इस बारे में बहुत कुछ कर सकते हैं और इन्हीं दवाइयों के चलते हमारे बच्चे सात दिन में पूरी तरह ठीक हो गए जब कि बिना किसी इलाज के मरीज को ठीक होने में कई सप्ताह लग जाते हैं। इसके अलावा, बीमारी के कारण कमजोर हुए शरीर में दूसरी बीमारियों का आक्रमण भी हो सकता है, और आँखों और मस्तिष्क से संबन्धित कई दूसरी पेचीदगियाँ भी हो सकती हैं, जिन्हें रोकने के लिए डॉक्टर से इलाज करवाना ज़रूरी है। क्या आप डॉक्टर के पास न जाकर ऐसे खतरे उठाना पसंद करेंगे?

पर हाँ, लोग ऐसे खतरे उठाना पसंद करते हैं! हमारे दो भूतपूर्व कर्मचारियों का उदाहरण आपके सामने है, वे धोखे से भी दवाइयों पर विश्वास नहीं कर सकते मगर अंधविश्वास पर विश्वास कर सकते हैं। इसके बावजूद कि दवाइयों का सकारात्मक परिणाम उनके सामने है। अगर वे ठीक हो जाते हैं तो यह देवी की मेहरबानी होगी, घुसपैठिए वाइरस पर उनकी रोग-प्रतिरोधी शक्तियों की विजय नहीं! वे पूजा पाठ करेंगे, देवी को प्रसाद समर्पित करेंगे और हफ्तों तकलीफ सहन करेंगे लेकिन अपनी सोच में कोई परिवर्तन नहीं लाएँगे। (अपने मस्तिष्क के कपाट खोलकर उसकी सफाई नहीं करेंगे।) आशा ही की जा सकती है कि किसी दिन, संभव है, अगली पीढ़ी में ही, लोग ऐसा करेंगे।

लोगों के लिए दूसरा आपत्त्तिजनक बिन्दु यह था कि हमने अपने भूतपूर्व कर्मचारियों से कहा कि स्वस्थ हो जाने के बाद भी वे वापस नौकरी पर न आएँ। इस आपत्ति और इस मामले के साथ जुड़े दूसरे प्रश्नों के विषय में मैं कल लिखूंगा।

अंधविश्वासी लोग अपनी नौकरी छोड़ देंगे मगर अपना अंधविश्वास नहीं छोड़ सकते- 7 अक्तूबर 2013

पिछले सप्ताह मैंने आपको बताया था कि अपरा को चेचक निकल आई है-अब वह लगभग पूरी तरह सामान्य हो गई है, थोड़े से लाल निशान रह गए हैं, जो कुछ खुजलाते हैं। अधिकतर छाले पूरी तरह ठीक हो गए हैं। बच्चों की प्रतिरोध क्षमता क्या कमाल दिखाती है, आश्चर्य होता है! मैं आपको आश्रम के कुछ दूसरे लोगों के विषय में बताना चाहता था, जिन्हें चेचक हो गई थी और इस बीमारी के कारण जो दिलचस्प वाकए यहाँ पेश आए, उनके बारे में भी।

एक छोटी बच्ची को चेचक हो जाए यह उसके परिवार के लिए जीवन भर में घटने वाली एक सामान्य सी बात है। किसी किंडरगार्टेन या स्कूल जाने वाले बच्चे के लिए यह लगभग असंभव सी बात है कि उसे कभी न कभी चेचक न निकल आए। स्कूल इस बीमारी के विषाणुओं के प्रजनन केंद्र होते हैं, जहां वे एक साथ इतने सारे कोमल शरीरों के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। वे एक के बाद दूसरे पर इतने बेआवाज कूदते-फाँदते रहते हैं कि पता ही नहीं चलता कब, किसको यह बीमारी हो गई। ऐसा ही, जब प्रांशु का इलाज चल रहा था तो पवन और जय सिंह के साथ हुआ और वे अपने-अपने बिस्तरों पर बुखार और सारे शरीर पर उठे दानों और छालों के साथ पड़े थे। हमने बहुत कोशिश की कि अपरा को उनसे दूर रखा जाए और यहाँ तक कि उन बच्चों को हर संभव अलग-थलग कर दिया, जिससे आश्रम परिवार के असंख्य लोग संक्रमित होने से बचे रह सकें।

लेकिन, जैसा कि आप जानते हैं, अपने प्रयास में हम सफल नहीं हुए और मुझे लगता है कि यह विषाणु बेहद अदृश्य और शातिर है, जो किसी दूसरे पर तभी अपना कोई निशान छोड़ता है जब पहले वाला लगभग पूरी तरह संक्रामण मुक्त हो जाता है। वह कैसे काम करता है, मैं नहीं जानता मगर उसने सिर्फ हमारे बच्चे को ही संक्रमित नहीं किया बल्कि 25 और 35 साल के हमारे दो कर्मचारी भी इस बीमारी से ग्रसित हो गए।

किसी के शरीर पर लाल छालों जैसा कुछ देखने पर और उसे बुखार में कंपकंपाते देखकर जैसा तर्कसंगत व्यवहार कोई भी आम व्यक्ति करेगा वैसा ही हमने किया: हमने उन्हें डॉक्टर के पास भेज दिया। हमने डॉक्टर के इलाज की फीस अदा की और उनके लिए दवाइयाँ खरीदीं-आखिर हम चाहते थे कि वे जल्द से जल्द ठीक हो जाएँ और आश्रम के उनके दूसरे सहकर्मी भी स्वस्थ रहे आएँ।

आश्रम के अधिकांश कर्मचारियों की तरह वे लोग भी हमारे आश्रम में ही रह रहे थे और उन्होंने फोन करके अपनी बीमारी के विषय में अपने परिवार वालों को बताया। दूसरे दिन उनके परिवार के कुछ लोग आश्रम आ गए और हमसे बात करने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने हमसे कहा कि हमारी (अंग्रेज़ी) दवाइयाँ वे लोग नहीं लेंगे और उसकी जगह कुछ कर्मकांड किए जाएंगे। उनकी नज़र में, यह देवी का गुस्सा था जो छालों की शक्ल में उन बीमारों के शरीर पर उभर आया था। इसका सिर्फ एक ही इलाज था: देवी को प्रसन्न करना और वह पूर्ण श्रद्धा, पूजा-पाठ और प्रसाद-समर्पण से ही संभव था!

यहाँ, भारत में यह एक सामान्य मगर मूर्खतापूर्ण अंधविश्वास है कि चेचक का कोई इलाज नहीं है। मैंने इसके बारे में, 2010 में, लिखा था और दुर्भाग्य से उसमें अभी भी उसमें कोई बदलाव नहीं आया है। लोग सोचते हैं कि कोई इलाज नहीं है, बीमारी अपने आप गायब हो जाएगी और कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए। इसके विपरीत-अगर आप दवाइयों लेते हैं या चेचक के छालों पर मरहम लगाते हैं तो आप देवी के और भी भीषण प्रकोप के भागी बनते हैं क्योंकि आपने उसकी सज़ा को श्रद्धा के साथ स्वीकार नहीं किया है!

हमने उन कर्मचारियों को उन बच्चों के उदाहरण देकर समझाने की कोशिश की जो डॉक्टर के इलाज से हफ्ते भर में ठीक हो गए थे-लेकिन वे कोई तर्क सुनना ही नहीं चाहते थे। कीमती दवाइयाँ फेंकनी पड़ीं और वे अपने परिवार वालों के साथ आश्रम छोड़कर चले गए। वापस जाते हुए गेट के पास पहुँचकर उन्होंने पूछा कि क्या वे ठीक होकर काम पर आ सकते हैं तो हमने उन्हें मना कर दिया। वे अपना काम छोड़ने के लिए तैयार थे मगर दवाइयाँ खाने के लिए नहीं।

जब यह सब चल ही रहा था मैंने इसका हाल सोशल नेटवर्क पर साझा किया था और कई मज़ेदार और कुछ विचलित कर देने वाले फीडबैक मुझे मिले, जिन्हें कल मैं आपके साथ साझा करूंगा।

आस्था और अंधविश्वास में कोई फर्क नहीं – अपनी आस्था पर विश्वास करना बंद करें! 5 जुलाई 2013

कल वाले विषय पर बहुत से धार्मिक व्यक्ति मुझसे कहते हैं कि मैं इन दो बातों को गड्ड-मड्ड कर रहा हूँ: आस्था और अंधविश्वास। मुझसे कहा जाता है कि मैं धार्मिक आस्था को अंधविश्वास न कहूँ क्योंकि दोनों में बहुत अंतर हैं और मुझे इन बातों को बारीकी से समझने के लिए दोनों के बीच के अंतर को समझना चाहिए। अपने ब्लॉग की आज की प्रविष्टि में मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं 'अंधविश्वास' शब्द को लेकर बिल्कुल गफलत में नहीं हूँ और न ही इस आस्था और अंधविश्वास के बीच कोई घालमेल करने की मेरी मंशा है। मैं इस बात को समझ रहा हूँ जो आप मुझसे कह रहे हैं लेकिन मैं आपसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि मेरे विचार में धर्म और अंधविश्वास के बारे में आपके सभी विचार एक ही श्रेणी में रखे जा सकते हैं। कैसे, मैं समझाने की कोशिश करता हूँ।

यह तो स्पष्ट ही है कि ऐसी बातें सिर्फ धार्मिक और ईश्वर पर विश्वास करने वाले लोग ही किया करते हैं। क्यों? इसलिए कि उन्हें अंधविश्वासी समझा जाना अच्छा नहीं लगता! जब मैं कहता हूँ कि धार्मिक कृत्य दरअसल में अंधविश्वास ही हैं तो उन्हें बुरा लग जाता है। उनके अनुसार भगवान के चरणों में फूल चढ़ाना आस्था है जब कि दुष्ट शक्तियों से या बुरी नज़र से बचने के लिए दरवाजे पर नींबू और मिर्ची टांगना अंधविश्वास है! मेरी नज़र में, दोनों में कोई बहुत ज़्यादा अंतर नहीं है- दोनों ही बातें इस विश्वास पर आधारित हैं कि कोई न कोई अलौकिक शक्ति मौजूद है जो आपके इन कामों पर अपनी प्रतिक्रिया देती हैं। आपको उस पर विश्वास करने के लिए कहा गया है, जब कि उसका कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। आपको किसी की पूजा करनी है जिसके अस्तित्व के बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इसे आप आस्था कहते हैं और मैं कपोल-कल्पित कथा कहता हूँ।

इसी संदर्भ में मुझसे एक बार किसी ने पूछा कि क्या मंदिर जाना भी अंधविश्वास ही है। मैंने कहा कि आप स्वयं इसका उत्तर दे सकते हैं! मंदिर क्या है? वह एक घर या कमरे जैसा होता है जिसकी दीवारें सोने और चाँदी से मढ़ी होती हैं और बीचोंबीच पूजाघर होता है जहां एक सिंहासन पर पत्थर या सोने या चाँदी के भगवान विराजमान होते हैं। आप वहाँ जाते हैं और उस मूर्ति के सामने कुछ खाने का सामान रखते हैं और घंटी बजाते हैं। आप यह काम जीवन भर करते रहते हैं और आप अच्छी तरह जानते हैं कि खाने के सामान को आज तक कभी भी भगवान द्वारा छूआ तक नहीं गया। भोजन कम कभी नहीं हुआ। फिर भी आप दावा करते हैं कि भगवान हर बार उसे खाते हैं और वह आपके लिए पवित्र प्रसाद हो जाता हैं जिसे आप श्रद्धापूर्वक स्वयं खाते हैं और लोगों में बांटते हैं कि इससे आपका कुछ भला होगा। अगर आपने उसे ईश्वर को नहीं चढ़ाया होता तो वह भोजन उतना अच्छा नहीं होता। क्या यह सब अंधविश्वास नहीं है?

मंदिर जाने का विचार ही मूलतः अंधविश्वास से परिपूर्ण है। आपका धर्म आपसे कहता है कि ईश्वर हर जगह निवास करता है। अगर यह सच है तो उससे मिलने के लिए आपको मनुष्य द्वारा निर्मित किसी इमारत तक क्यों जाना पड़ता है? हिन्दू धर्म के संदर्भ में कहें तो ईश्वर को उसे नहलाने-धुलाने, कपड़े पहनाने, खाना खिलाने और यहाँ तक कि उसकी रक्षा करने के लिए नौकरों की ज़रूरत क्यों पड़ती है? अगर वे नौकर उसकी ठीक तरह से देखभाल न करें, अगर उनके हाथ गंदे हों या अगर वे उसकी सेवा में कोई चूक कर दें तो समझा जाता है कि यह उनके लिए अशुभ होगा। क्या यह भी अंधविश्वास नहीं है?

यह सब आपके धर्म का हिस्सा है लेकिन मैंने आपको बताया कि कैसे यह अंधविश्वास भी है। मैं एक और बात आपको बताता हूँ: आपका धर्म आपको मेरे जैसे लोगों से वाद-विवाद करने से रोकता भी है। अपने धर्मग्रंथ पढ़ें, वहाँ लिखा हुआ है! क्यों? क्योंकि आप, वैसे भी, कुछ सिद्ध नहीं कर पाएंगे। लेकिन धर्म पर विश्वास करने वाले इससे कोई सबक नहीं लेते। वे तर्क करते हैं और अपने प्रयास में दो-तीन बार असफल हो जाने के बाद पैर पीछे खींच लेते हैं और गोलमोल सी कुछ बातें कहते हैं, "ईश्वर की लीला अपरंपार है, रहस्यमय है", या "दिल में प्रेम हो तो भ्रम दूर हो जाते हैं और सब ठीक नज़र आता है!"

नहीं, वे कुछ नहीं सीखेंगे और यह भी अंधविश्वास का ही एक और चिह्न हैं। क्योंकि कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए आपको विश्वास ही करना पड़ता है, भले ही वह तर्कहीन और अक्सर गलत सिद्ध होने वाली बात ही क्यों न हो!

इस चर्चा के बाद आस्था और अंधविश्वास उतने भिन्न दिखाई नहीं देते! आपका क्या विचार है?

सम्पूर्ण विश्वास बहुत खतरनाक होता है, सिर्फ दिखावा कीजिए कि आप ईश्वर पर भरोसा करते हैं 4 जुलाई 2013

कल जो दर्दनाक कहानी मैंने आपको बताई थी उस पर मीडिया और इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर काफी चर्चा हो रही है। बहुत से लोग यह कहकर कि वह व्यक्ति और वह परिवार अनपढ़ और मूर्ख था, सीधे-सीधे सारे मामले पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे थे। एक व्यक्ति ने कहा कि, ‘बहुत ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ और कुछ धार्मिक लोगों ने कहा कि उसे ईश्वर की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए थी। मैं इन बातों का और इससे संबन्धित कुछ दूसरी बातों का जवाब देना चाहता हूँ और, आप विश्वास करें या न करें, मैं उस व्यक्ति के इस आत्मघाती कदम के पीछे मौजूद कुछ स्वाभाविक तर्क प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

मैं, एक नास्तिक और अधर्मी, एक ऐसे व्यक्ति के समर्थन में क्यों सामने आना चाहता हूँ, जिसने ईश्वर के दर्शन की लालसा में अपनी और अपने परिवारवालों की हत्या कर दी हो? क्योंकि मुझे लगता है कि ईश्वर के अवतरित होने और उन्हें बचा लेने के विश्वास के बारे में धर्म ने उसे धोखा दिया है! उसकी यह मंशा कतई नहीं थी कि वह मर जाए या अपने परिवार की जान ले ले; वह तो पूरे विश्वास के साथ समझ रहा था कि उन्हें कुछ नहीं होगा, ईश्वर उन्हें बचा लेंगे।

जिन्होंने यह कहा कि वह व्यक्ति मूर्ख था, शायद यह नहीं जानते कि वह व्यक्ति अनपढ़ बिल्कुल नहीं था। वह एक स्वतंत्र (freelance) फोटोग्राफर था, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजने वाला समझदार व्यक्ति था। कम से कम इतना तो था ही कि वह कोई ग्रामीण अनपढ़ नहीं था जिसे आप कुछ भी कह दें और वह मान ले। नहीं, वह मूर्ख और अपढ़ नहीं था। आप उसे अंधविश्वासी कह सकते हैं, मगर बहुत से पढे-लिखे लोग अपने आपको धार्मिक और ईश्वर पर भरोसा करने वाला कहते हैं और अंधविश्वासी भी होते हैं, क्योंकि वे धर्मग्रंथों में वर्णित कथाओं पर विश्वास करते हैं।

और जब कोई कहे कि ‘ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ तो इस बात पर तो हंसी आए बगैर नहीं रहती, क्योंकि इसका तात्पर्य यह होता है कि थोड़ा-बहुत अंधविश्वासी होना ठीक है! आप इस व्यक्ति को ‘ज़्यादा अंधविश्वासी’ कहेंगे क्योंकि उसने जहर मिला हुआ प्रसाद अपने परिवार को खिला दिया था और विश्वास किया था कि ईश्वर उन्हें मरने नहीं देंगे। मगर सच्चाई यह है कि ईश्वर का प्रसाद ‘पवित्र’ होता है और उसे खाने से कुछ अच्छा हो सकता है, इतना समझना आपके विचार में उचित है! लेकिन क्या यह भी अंधविश्वास नहीं है? आप भी, जब भी मंदिर जाते हैं तो प्रसाद लेना नहीं भूलते कि उससे आपका कुछ भला हो सकता है-उसने यह सोचा कि प्रसाद जहरीला होने के बावजूद प्रसाद है और उसे ग्रहण करने से उसका भला ही होगा। क्या दोनों बातों में कोई अंतर है?

अंधविश्वास के मूल में धर्म और उसकी कथाएँ हैं जिन्हें आप इस प्रकरण में साफ-साफ देख सकते हैं। धर्मग्रंथ यह कहते हैं कि उनमें लिखी कोई बात मिथ्या नहीं है और यह व्यक्ति दरअसल बहुत ज़्यादा धार्मिक था और धर्मग्रंथों में कही गई बातों पर अक्षरशः विश्वास करता था! ईश्वर पर और उसकी शक्ति पर उसका अटूट विश्वास था; इतना अधिक कि वह समझता था कि विषाक्त प्रसाद ग्रहण करने के बाद भी ईश्वर उसे बचा सकेंगे। यहाँ तक कि दूसरों के सामने अपने विश्वास को प्रमाणित करने के लिए वह सारी घटना की वीडियो शूटिंग भी कर रहा था। उसने वह सभी ग्रंथ पढ़ रखे थे जिनमें बताया गया था कैसे अपने भक्तों को ईश्वर बचा लेते हैं और वह उनके पदचिन्हों पर चल रहा था। आखिर उसकी हत्या किसने की? अंधविश्वास ने या सिर्फ अटूट श्रद्धा ने?

तो क्या आप सभी धार्मिक लोगों को उसे सच्चा आस्तिक मानकर, उसका सम्मान नहीं करना चाहिए? एक ऐसा व्यक्ति, जिसका विश्वास इतना गहरा था कि उसने जहर तक खा लिया? आप तो डर जाते, क्योंकि आपका ईश्वर पर पर्याप्त विश्वास नहीं है, इतना भरोसा नहीं है कि वह आपको जहर खाने के बाद भी बचा लेगा! जैसा इस व्यक्ति ने किया, अगर आप वैसा नहीं कर सकते तो यही कहा जा सकता है कि दरअसल आपमें ईश्वर और धर्मग्रंथों के प्रति सम्पूर्ण विश्वास और सम्मान है ही नहीं!

हम इस सच्ची कहानी से क्या सीख ले सकते हैं? शायद यह कि ईश्वर पर पूरी तरह विश्वास करना ठीक नहीं है क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं तो आप सोचते रह जाएंगे कि वह आकर आपको बचा लेगा और इधर आपकी जान चली जाएगी। हाँ, ईश्वर को आप मूर्ख बना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, यह कहकर कि मैं तुम पर पूरा विश्वास करता हूँ, जबकि आप खुद जानते हैं कि आप उस पर उतना विश्वास नहीं करते!

अगर धर्म को मानने का आपका यही तरीका है तो फिर मेरे लिए यह आश्चर्य का विषय है कि आप अपने आप से और अपने ईश्वर से कितना झूठ बोलते हैं! अगर आप यही करना चाहते हैं तो कीजिए, लेकिन मुझे लगता है कि यह बेईमानी के अलावा कुछ नहीं है। अगर आप अपने आपको धर्म-परायण कहते हैं तो आपको उस पर और धर्मग्रंथों में लिखी सभी बातों पर 100% विश्वास करना चाहिए, जैसा कि इस व्यक्ति ने किया।

मैं कहता हूँ कि ऐसे धर्मग्रंथों को नष्ट कर दिया जाना चाहिए, विस्मृत कर दिया जाना चाहिए। ये धर्मग्रंथ ऐसे-ऐसे अंधविश्वास फैलाते हैं जिनके कारण परिवार उजड़ जाते हैं और जो लोगों की मौत का कारण बनते हैं। और जब मैं ऐसा कहूँ तो आपको मेरा विरोध भी नहीं करना चाहिए, बल्कि आगे इनकी पुनरावृत्ति न हो, इसके प्रयास में हाथ बटाना चाहिए, जिससे समाज को इनके दुष्प्रभावों से मुक्त किया जा सके!