संथारा की मूर्खतापूर्ण परंपरा की वजह से आत्महत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता! 26 अगस्त 2015

सोमवार को मैं एक टी वी परिचर्चा के लिए बहुत लघु-सूचना पर दिल्ली गया था। चर्चा का विषय था, संथारा, जो जैन समुदाय की एक धार्मिक प्रथा है। पहले मैं आपको बताता हूँ कि ठीक-ठीक यह प्रथा है क्या और इस विषय पर अभी अचानक टी वी चर्चा क्यों आयोजित की गई और इस पर मेरा रुख क्या रहा, यह भी स्पष्ट करूँगा।

संथारा, जिसे सल्लेखना भी कहते हैं, जैन धर्म में आस्था रखने वालों की एक प्रथा है, जिसके अनुसार 75 साल से अधिक उम्र वाले लोग स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं। जैन धर्म का कोई वृद्ध व्यक्ति यदि यह महसूस करता है कि जीने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है, अगर वह मुक्ति चाहता है, अगर उसे लगता है कि संसार को उसकी ज़रूरत नहीं है या स्वयं उसे संसार की ज़रूरत नहीं रह गई है तो वह व्यक्ति खाना-पीना छोड़ देता है। अब वह एक कौर भी मुँह में नहीं डालेगा, न ही एक घूँट पानी पीएगा। वह भूख और प्यास सहन करते हुए मौत को गले लगाएगा-और उसके सधर्मी नाते-रिश्तेदार और मित्र उसकी प्रशंसा करेंगे।

अतीत में इसी तरह से उनके संतों ने प्राण त्यागे थे और मरने के इसी तरीके को जैन धर्म गौरवान्वित करता है। लेकिन हाल ही में हाई कोर्ट ने इस प्रथा पर पाबंदी लगा दी है क्योंकि कोर्ट उसे आत्महत्या मानता है।

स्वाभाविक ही, जैन समुदाय इससे नाराज़ है और न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण लेने का विचार कर रहा है, जिससे इस पाबंदी को हटवाया जा सके। उनका कहना है कि कोर्ट या क़ानून प्राचीन समय से चली आ रही इस प्रथा और परंपरा को वर्जित घोषित नहीं कर सकते।

तो इस विषय पर मैं इन पाँच महानुभावों के साथ टी वी पर बहस कर रहा था। मैंने साफ शब्दों में कहा कि यह आत्महत्या के सिवा और कुछ नहीं है-और इसीलिए कोर्ट ने उस पर पाबंदी लगाई है! भारत में हर साल लगभग 200 लोग इस तरीके से खुद अपनी जान ले लेते हैं! अगर कोई भूख-हड़ताल पर बैठता है तो सरकार उसे मरने नहीं देती- बल्कि वह उसे ज़बरदस्ती खाना खिलाती है! और इधर आप खाना-पीना छोड़ देते हैं कि मर जाएँ-क्या फर्क है, दोनों में?

मेरी बात का ज़बरदस्त विरोध हुआ- यह कहते हुए कि यह आत्महत्या नहीं है बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए किया जाने वाला तप है। आत्मा जानती है कि उसका समय पूरा हो गया है और पुनर्जन्म के लिए यह प्रक्रिया ज़रूरी है।

मैंने उनके इस जवाब का खण्डन करते हुए कहा कि यह महज बकवास है और आत्मा या पुनर्जन्म जैसी कोई चीज़ नहीं होती। अगर आप उन्हें खुद की हत्या की इजाज़त देते हैं तो आपको सभी को आत्महत्या की इजाज़त देनी होगी। फिर ऐसा कानून बनाइए कि सभी अपनी मर्ज़ी से मृत्यु का वरण कर सकें- तब हर कोई, जब उसकी मरने की इच्छा होगी, अपनी हत्या का निर्णय ले सकेगा। लेकिन आप यह अधिकार सिर्फ अपने लिए रखना चाहते हैं क्योंकि दूसरों को इसकी इजाज़त ही नहीं है! और ऐसी मौत को आप गौरवान्वित कर रहे हैं, जिससे लोग उनका अनुसरण करने लगें! आप उन्हें आत्महत्या करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं!

उन्होंने कहा कि उनके पूर्वज भी सदा से इस प्रथा का पालन करते रहे हैं। एक वकील ने, जो इस पाबंदी का विरोध कर रहे हैं, दावा किया कि यह आत्महत्या है ही नहीं क्योंकि आत्मा समय आने पर ही अपने शरीर का त्याग करेगी। इस तरह लोग बिना खाए-पिए महीनों और सालों पड़े रहते हैं। इसके अलावा युवकों को संथारा लेने के लिए नहीं कहा जाता, सिर्फ 75 साल से अधिक उम्र वाले ही संथारा ले सकते हैं।

मेरे विचार से यह कोई तर्क नहीं है कि 'हमारे पूर्वज यही किया करते थे'! इसका अर्थ यह नहीं है कि यह ठीक है और सिर्फ इसलिए कि अतीत में वे कोई गलत बात कर रहे थे इसलिए आपको भी वही करते चले जाना चाहिए! यही तर्क हिंदुओं की सती प्रथा के लिए भी दिया जाता था, जिसमें पति की चिता के साथ पत्नी भी आत्महत्या कर लेती थीं! जब तक उस पर पाबंदी नहीं लगी थी, वास्तव में उन्हें इस परंपरा का अनुपालन करने के लिए मजबूर किया जाता था यहाँ तक कि जबर्दस्ती मृत पति की चिता में झोंक दिया जाता था! तब भी बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया था- लेकिन आखिर किसी देश के क़ानून धर्म या परंपरा के अनुसार नहीं बनाए जा सकते!

आपका यह तर्क भी, कि संथारा सिर्फ वृद्ध व्यक्ति ही ले सकते हैं, एक बेहद कमजोर तर्क है! क्योंकि इस बात का निर्णय कौन करेगा कि कौन वृद्ध है और कौन वृद्ध नहीं है? यह दावा कौन कर सकता है कि वृद्ध लोग समाज के लिए उपयोगी नहीं रह गए हैं या उस पर बोझ बन गए हैं? आप उनके मन में यह विचार क्यों डालना चाहते हैं कि आप 75 साल के हो गए हैं इसलिए अब आपको मरना होगा? बहुत से राजनीतिज्ञ और दूसरे क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अस्सी-अस्सी साल से ज़्यादा उम्र के हो चुके हैं और अपना काम भलीभाँति अंजाम दे रहे हैं! यह देखते हुए कि मेरी नानी मेरी बेटी के लिए कितनी मूल्यवान है, मैं इस मूर्खतापूर्ण परंपरा की खातिर उसे खोना नहीं चाहूँगा! वह इस समय 95 साल की है, शायद उससे भी अधिक- यानी इस तरह हम उसे 20 साल पहले ही खो चुके होते!

और मैं इस बात का जवाब भी देना पसंद नहीं करूँगा कि कोई व्यक्ति एक घूँट पानी पिए बगैर भी एक माह तक ज़िंदा रह सकता है- सालों जीवित रहने की बात तो छोड़ ही दीजिए! यह बकवास के सिवा कुछ नहीं है और मेरी नज़र में पाखंडियों का बहुत बड़ा कपटपूर्ण दावा है- आखिर धार्मिक धोखेबाज़ों का तो काम ही यही है!

मेरा विश्वास है कि यह पाबंदी बनी रहेगी और मेरे खयाल से यह अच्छा ही है कि आखिरकार यह प्रथा भी समाप्त हो जाएगी।

सम्पूर्ण विश्वास बहुत खतरनाक होता है, सिर्फ दिखावा कीजिए कि आप ईश्वर पर भरोसा करते हैं 4 जुलाई 2013

कल जो दर्दनाक कहानी मैंने आपको बताई थी उस पर मीडिया और इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर काफी चर्चा हो रही है। बहुत से लोग यह कहकर कि वह व्यक्ति और वह परिवार अनपढ़ और मूर्ख था, सीधे-सीधे सारे मामले पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे थे। एक व्यक्ति ने कहा कि, ‘बहुत ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ और कुछ धार्मिक लोगों ने कहा कि उसे ईश्वर की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए थी। मैं इन बातों का और इससे संबन्धित कुछ दूसरी बातों का जवाब देना चाहता हूँ और, आप विश्वास करें या न करें, मैं उस व्यक्ति के इस आत्मघाती कदम के पीछे मौजूद कुछ स्वाभाविक तर्क प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

मैं, एक नास्तिक और अधर्मी, एक ऐसे व्यक्ति के समर्थन में क्यों सामने आना चाहता हूँ, जिसने ईश्वर के दर्शन की लालसा में अपनी और अपने परिवारवालों की हत्या कर दी हो? क्योंकि मुझे लगता है कि ईश्वर के अवतरित होने और उन्हें बचा लेने के विश्वास के बारे में धर्म ने उसे धोखा दिया है! उसकी यह मंशा कतई नहीं थी कि वह मर जाए या अपने परिवार की जान ले ले; वह तो पूरे विश्वास के साथ समझ रहा था कि उन्हें कुछ नहीं होगा, ईश्वर उन्हें बचा लेंगे।

जिन्होंने यह कहा कि वह व्यक्ति मूर्ख था, शायद यह नहीं जानते कि वह व्यक्ति अनपढ़ बिल्कुल नहीं था। वह एक स्वतंत्र (freelance) फोटोग्राफर था, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजने वाला समझदार व्यक्ति था। कम से कम इतना तो था ही कि वह कोई ग्रामीण अनपढ़ नहीं था जिसे आप कुछ भी कह दें और वह मान ले। नहीं, वह मूर्ख और अपढ़ नहीं था। आप उसे अंधविश्वासी कह सकते हैं, मगर बहुत से पढे-लिखे लोग अपने आपको धार्मिक और ईश्वर पर भरोसा करने वाला कहते हैं और अंधविश्वासी भी होते हैं, क्योंकि वे धर्मग्रंथों में वर्णित कथाओं पर विश्वास करते हैं।

और जब कोई कहे कि ‘ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ तो इस बात पर तो हंसी आए बगैर नहीं रहती, क्योंकि इसका तात्पर्य यह होता है कि थोड़ा-बहुत अंधविश्वासी होना ठीक है! आप इस व्यक्ति को ‘ज़्यादा अंधविश्वासी’ कहेंगे क्योंकि उसने जहर मिला हुआ प्रसाद अपने परिवार को खिला दिया था और विश्वास किया था कि ईश्वर उन्हें मरने नहीं देंगे। मगर सच्चाई यह है कि ईश्वर का प्रसाद ‘पवित्र’ होता है और उसे खाने से कुछ अच्छा हो सकता है, इतना समझना आपके विचार में उचित है! लेकिन क्या यह भी अंधविश्वास नहीं है? आप भी, जब भी मंदिर जाते हैं तो प्रसाद लेना नहीं भूलते कि उससे आपका कुछ भला हो सकता है-उसने यह सोचा कि प्रसाद जहरीला होने के बावजूद प्रसाद है और उसे ग्रहण करने से उसका भला ही होगा। क्या दोनों बातों में कोई अंतर है?

अंधविश्वास के मूल में धर्म और उसकी कथाएँ हैं जिन्हें आप इस प्रकरण में साफ-साफ देख सकते हैं। धर्मग्रंथ यह कहते हैं कि उनमें लिखी कोई बात मिथ्या नहीं है और यह व्यक्ति दरअसल बहुत ज़्यादा धार्मिक था और धर्मग्रंथों में कही गई बातों पर अक्षरशः विश्वास करता था! ईश्वर पर और उसकी शक्ति पर उसका अटूट विश्वास था; इतना अधिक कि वह समझता था कि विषाक्त प्रसाद ग्रहण करने के बाद भी ईश्वर उसे बचा सकेंगे। यहाँ तक कि दूसरों के सामने अपने विश्वास को प्रमाणित करने के लिए वह सारी घटना की वीडियो शूटिंग भी कर रहा था। उसने वह सभी ग्रंथ पढ़ रखे थे जिनमें बताया गया था कैसे अपने भक्तों को ईश्वर बचा लेते हैं और वह उनके पदचिन्हों पर चल रहा था। आखिर उसकी हत्या किसने की? अंधविश्वास ने या सिर्फ अटूट श्रद्धा ने?

तो क्या आप सभी धार्मिक लोगों को उसे सच्चा आस्तिक मानकर, उसका सम्मान नहीं करना चाहिए? एक ऐसा व्यक्ति, जिसका विश्वास इतना गहरा था कि उसने जहर तक खा लिया? आप तो डर जाते, क्योंकि आपका ईश्वर पर पर्याप्त विश्वास नहीं है, इतना भरोसा नहीं है कि वह आपको जहर खाने के बाद भी बचा लेगा! जैसा इस व्यक्ति ने किया, अगर आप वैसा नहीं कर सकते तो यही कहा जा सकता है कि दरअसल आपमें ईश्वर और धर्मग्रंथों के प्रति सम्पूर्ण विश्वास और सम्मान है ही नहीं!

हम इस सच्ची कहानी से क्या सीख ले सकते हैं? शायद यह कि ईश्वर पर पूरी तरह विश्वास करना ठीक नहीं है क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं तो आप सोचते रह जाएंगे कि वह आकर आपको बचा लेगा और इधर आपकी जान चली जाएगी। हाँ, ईश्वर को आप मूर्ख बना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, यह कहकर कि मैं तुम पर पूरा विश्वास करता हूँ, जबकि आप खुद जानते हैं कि आप उस पर उतना विश्वास नहीं करते!

अगर धर्म को मानने का आपका यही तरीका है तो फिर मेरे लिए यह आश्चर्य का विषय है कि आप अपने आप से और अपने ईश्वर से कितना झूठ बोलते हैं! अगर आप यही करना चाहते हैं तो कीजिए, लेकिन मुझे लगता है कि यह बेईमानी के अलावा कुछ नहीं है। अगर आप अपने आपको धर्म-परायण कहते हैं तो आपको उस पर और धर्मग्रंथों में लिखी सभी बातों पर 100% विश्वास करना चाहिए, जैसा कि इस व्यक्ति ने किया।

मैं कहता हूँ कि ऐसे धर्मग्रंथों को नष्ट कर दिया जाना चाहिए, विस्मृत कर दिया जाना चाहिए। ये धर्मग्रंथ ऐसे-ऐसे अंधविश्वास फैलाते हैं जिनके कारण परिवार उजड़ जाते हैं और जो लोगों की मौत का कारण बनते हैं। और जब मैं ऐसा कहूँ तो आपको मेरा विरोध भी नहीं करना चाहिए, बल्कि आगे इनकी पुनरावृत्ति न हो, इसके प्रयास में हाथ बटाना चाहिए, जिससे समाज को इनके दुष्प्रभावों से मुक्त किया जा सके!

आप ईश्वर और धर्मग्रंथों पर किस हद तक विश्वास कर सकते हैं, इसका एक उदाहरण – 3 जुलाई 2013

कुछ दिन पहले मैंने धार्मिक अंधविश्वास के चलते होने वाले भयंकरतम परिणाम के बारे में एक खबर पढ़ी: एक परिवार के पाँच सदस्यों की मृत्यु के बारे में। अगर उनकी मृत्यु इतनी दुखद नहीं होती तो उन्हें मूर्खतापूर्ण कहा जा सकता था। लेकिन मैं पूरी गंभीरता के साथ कह सकता हूँ कि ये लोग धर्म द्वारा कत्ल किए गए हैं। इसके अलावा धर्म के कारण ही उस परिवार के तीन और लोग मरणासन्न पड़े हुए हैं।

राजस्थान का एक धार्मिक व्यक्ति, कंचन सिंह राजपूत, ईश्वर के प्रेम में बहुत आगे बढ़ गया। वह ईश्वर को देखना और उसका अनुभव करना चाहता था और उसे विश्वास था कि वह जहर भी खा ले तो ईश्वर उसे बचा लेगा। उसका यहाँ तक विचार था कि जहर खाने पर ईश्वर उसके पास आने पर मजबूर हो जाएगा और उसने अपनी माँ, भाई और पत्नी तक को इस बात पर विश्वास करने पर राज़ी कर लिया। और इस तरह वे चारों और उसके और उसके भाई के चार बच्चे उस घरेलू समारोह में शरीक हुए। समारोह के पश्चात उन सबने प्रसाद खाया। इस प्रसाद में ही घर के मुखिया ने जहर मिलाकर रखा था।

यह व्यक्ति खुद कैमेरामैन था और प्रसाद खाने तक के उत्सव-समारोह की और बाद में अपनी और परिवार के सभी सदस्यों की मृत्यु की भी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहा था। वे सभी, कुछ देर बाद बेहोश हो गए और उनमें से पाँच तो मृत्यु को प्राप्त हुए। उस व्यक्ति की भतीजी को सबेरे होश आया तो उसने इमरजेंसी कॉल करके डॉक्टरों आदि को बुलाया। उसे और परिवार के दो और सदस्यों को नाज़ुक हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया।

दुर्भाग्यवश मैं यह पता नहीं कर पाया कि आखिर वे तीनों बच पाए या नहीं। जब मैंने इस छोटे से समाचार को फेसबुक पर पोस्ट किया था, मेरे विदेशी मित्र भौंचक्के रह गए थे: कोई भी जहर क्यों खाएगा? कोई यह कैसे समझ सकता है कि जहर खाने से आप ईश्वर को देख सकते हैं? क्या यह किसी मतिभ्रम के चलते होता है? नहीं, तो फिर क्या कारण है? और फिर जहर खाना ही है तो खुद खा लो, पूरे परिवार को क्यों खिलाते हो?

इस व्यक्ति के इस जघन्य कर्म का कारण धर्म और धर्म के परिणामस्वरूप मन में बैठे अंधविश्वास में निहित है। हिन्दू धर्मग्रंथों में शिव के विषपान और उस पर विष का कोई असर न होने का ज़िक्र आता है। इसके अलावा कई कथाएँ हैं जिनमें लोगों को, उनकी पवित्रता और उनकी ईशभक्ति के कारण किसी न किसी भगवान द्वारा मृत्यु के मुख से छुड़ा लिया गया।

इसलिए इस समाचार को पढ़कर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। गाहे बगाहे ऐसी घटनाएँ भारत में, जहां धार्मिक विश्वास और अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं, होती ही रहती हैं। यहाँ लोगों का धर्मग्रन्थों में और ईश्वर में अगाध विश्वास है। उन्हें भरोसा होता है कि जब वे संकट में होंगे तब शिव आएंगे और उन्हें बचा लेंगे, जैसा कि धर्मग्रंथों में उन्हें बहुत से लोगों की सहायता करते हुए दर्शाया गया है।

उनका ईश्वर पर अटूट विश्वास होता है और धर्म उन्हें यही सिखाता है: अगर आपका ईश्वर पर अटूट, पागलपन की हद तक भरोसा है तो वह आपकी रक्षा करता है। अगर आप चाहें तो इसे इस बात का प्रमाण भी मान सकते हैं कि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है। धार्मिक लोग तर्क करेंगे कि उन अभागों का ईश्वर पर पर्याप्त अटूट भरोसा नहीं था अन्यथा शिव, कृपा करके, उन्हें बचा लेते। उन्होंने इतना भरोसा किया था कि ईश्वर से मिलने की आशा में अपनी और अपने परिवार की जान तक दांव पर लगा ली थी। इससे ज़्यादा आखिर कितना विश्वास कोई कर सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें सारे घटनाक्रम की वीडियो फिल्म नहीं बनानी चाहिए थी क्योंकि ईश्वर नहीं चाहता कि उसकी कोई फिल्म बने?

मैं तो सिर्फ एक सच्चाई जानता हूँ: धर्म ने उस परिवार की जान ली थी। यह बहुत दर्दनाक है और मेरे लिए तो यह एक और इशारा या प्रमाण है कि लोगों को कम से कम धार्मिक और अंधविश्वासी होना चाहिए!

क्या आप आपनी परंपराओं को बचाए रखने के लिए अपने बच्चों की आहुती देने के लिए तैयार हैं?-15 मई 2013

आज मैं आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के बारे में अपनी आखिरी डायरी लिख रहा हूँ। कम से कम कुछ दिनों तक तो इस बारे में नहीं लिखूँगा। मैं आयोजित विवाहों के बारे में कई दिनों से लिख रहा हूँ जिसमें मैंने बहुत संयम और तर्क के साथ समझाने की कोशिश की है कि क्यों मैं उसे सही विचार नहीं मानता। मैंने अपने तर्कों को काफी विस्तार से प्रस्तुत किया है और प्रेम विवाह के विरोधियों के तर्कों का जवाब भी दिया है। विवाह के बारे में लगभग सभी बिंदुओं को छूते हुए मैंने उन पर अपनी राय व्यक्त कर दी है। लेकिन कुछ लोगों पर मैं बिना क्षुब्ध हुए अपनी राय नहीं रख पाया, मेरे लिए ऐसा करना संभव ही नहीं था, वे हैं अपनी ‘महान संस्कृति’ के कट्टरपंथी रखवाले जो अनगिनत बच्चों की मौत का कारण बनते हैं। ये वे लोग हैं जो अपने ही बच्चों के अपनी मर्ज़ी से विवाह करने पर, उनके विवाह को अस्वीकार कर देते हैं क्योंकि वे परिवार द्वारा आयोजित विवाह करने से इंकार करते हैं।

एक दिन भी नहीं गुज़रता जब मैं किसी ऐसी घटना के बारे में नहीं पढ़ता। मैं सिर्फ ऑनर किलिंग के बारे में नहीं कह रहा हूँ, जो कि अपने आप में क्रूरतम अपराध हैं, बल्कि मैं बात कर रहा हूँ उन युवा दंपतियों की जो अपनी जान ले लेते हैं, जो आत्महत्याएँ करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनके परिवार वाले किसी भी हालत में उनके जीवन-साथी को स्वीकार नहीं करेंगे। वे अपने परिवार को दुखी और परेशान करने से बेहतर समझते हैं कि प्रेम में एक साथ जीवन का परित्याग कर दें। वे अपने अभिभावकों से प्रेम करते हैं, अपने परिवार को चाहते हैं लेकिन उन्हें एक प्रेमी भी मिला है जिससे जुदा होकर जीने की कल्पना भी वे नहीं कर सकते। वे अपने प्रेमी और परिवार दोनों के साथ रहना चाहते हैं। वे सबके साथ रहना चाहते हैं जिनसे वे प्रेम करते हैं।

इसलिए वे एक-दूसरे का हाथ पकड़कर ट्रेन के सामने कूद जाते हैं। अपने कमरे में एक साथ फांसी लगा लेते हैं। एक दूसरे को गोली मार देते हैं या जहर खा लेते हैं। देखिये किस तरह यह बेहूदा विचार, यह जिद्दी मानसिकता और यह घृणास्पद रवैया दो मासूम युवा जीवनों के अंत का कारण बनता है।

इन डायरियों को लिखने के दौरान किसी ने मुझसे पूछा: ‘आखिर आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) से आपको इतनी शिकायत क्यों है? लाखों लोग इसी तरह विवाह कर रहे हैं!’ मैं बताता हूँ कि इनसे मुझे क्या समस्या है: यह व्यवस्था इन युवा प्रेमियों की हत्या कर रही है! यह न सिर्फ उनके सपनों का खात्मा करती है बल्कि वह उन्हें निराशा और हताशा के ऐसे अवसाद में ढकेल देती है जहां स्वयं अपने हाथों से अपने जीवनों का अंत कर लेने के सिवा उन्हें कोई चारा नहीं दिखाई देता!

मैं मानता हूँ कि लाखों लोग आयोजित विवाह करते हुए भी रह रहे हैं लेकिन उनके पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है, इसे आप नहीं देखते? आपकी महान संस्कृति जिसे आप उसके ‘मूल स्वरूप’ में बनाए रखने के लिए क्या कुछ नहीं करते, दो प्रेमियों को अपनी जाति के बाहर विवाह करने तक की इजाज़त नहीं देती!

जब आप अपनी संस्कृति के ‘मूल स्वरूप’ की बात करते हैं तब आपका असली मतलब क्या होता है? आपके दादा-दादी के विवाह किस तरह आयोजित (अरेंज) किए गए थे और आप भी उनके अभिभावकों की तरह क्यों नहीं करते? दस साल की उम्र में अपने बच्चों के विवाह कीजिए ना, क्यों नहीं करते? आप वैसा नहीं करते क्योंकि संस्कृति, समय और परंपराएँ इस बीच बदल गई है! वैसा करना अब आपके लिए संभव ही नहीं रहा। तो ध्यान रखें कि आप अपने बच्चों को उनकी इच्छा के विरुद्ध आपके द्वारा उनके लिए चुने गए लड़के या लड़की से विवाह करने के लिए धमका नहीं सकते, बाध्य नहीं कर सकते! अन्यथा यही होगा कि कि वे अपने जीवन का खात्मा भी कर सकते हैं जो आपके जीवन और आपकी अंतरात्मा पर हमेशा के लिए बोझ बना रहेगा।

आप अपने बच्चों से प्रेम करते हैं। वे भी आपसे प्रेम करते हैं लेकिन आप समझते हैं कि क्योंकि वे आपके द्वारा तय किए गए लड़के या लड़की से विवाह नहीं करना चाहते, वे आपसे प्रेम नहीं करते। वे एक ऐसे ‘शरीर’ के साथ अपना सारा जीवन नहीं गुजारना चाहते जिसे आपने घंटे भर में उनके लिए चुन लिया है, क्योंकि इतनी देर में आप उसका शरीर ही तो देख पाते हैं। किसी के साथ गुजरे अपने अनुभव से, उसके साथ विकसित हुए जज़्बातों के आधार पर और साथ बिताए पलों में अंकुरित प्रेम के आदान-प्रदान की उत्कटता पर विचार करने के बाद अपने बारे में वे खुद निर्णय करना चाहते हैं।

क्या आपको यह समझाने के लिए कि वह किसी लड़के से प्रेम करती है आपकी बेटी को ट्रेन के नीचे आकर जान देने की आवश्यकता पड़नी चाहिए? क्या आपके लड़के को अपने आपको आग में झोंक देना चाहिए सिर्फ इसलिए कि आपको यह पता चल सके कि वह जैसे आपको चाहता है वैसे ही किसी लड़की से भी प्रेम करता है? सिर्फ इसलिए कि यह ज़ाहिर हो सके कि बेटा आपको कितना चाहता था कि आपका दिल दुखाने और आपकी आज्ञा का उल्लंघन करने से ज़्यादा उसने मौत को गले लगाना पसंद किया? यह कि प्रेम बहुत अधिक ताकतवर होता है? मूर्खता छोड़ें, जीवन बचाएं, आंसुओं को व्यर्थ ज़ाया ना होने दें और अपने बच्चों को अपने दिल का कहा मानने की इजाज़त दें!