अत्यधिक सेक्स किस तरह एक रूखा अनुष्ठान बनकर रह जाता है – 2 दिसंबर 2015

पिछले दो दिनों में मैंने आपको बताया कि कि क्यों खुले सेक्स संबंध अक्सर सफल नहीं होते। उदाहरण स्वरूप मैंने आपको दो स्थितियों से अवगत कराया था और दोनों ही स्थितियों में संबंधों की असफलता का पहला कारण यह होता है: लोग सेक्स को एक तकनीक के रूप में देखते हैं, एक ऐसी क्रिया, जिससे मनोरंजन होता है, उसमें एक तरह का उत्तेजक आनंद प्राप्त होता है-और वे प्रेम को पूरी तरह भूल जाते हैं!

बहुत से लोग खुले संबंधों के विचार पर मोहित होकर उसे आजमाते हैं। फिर वे बहुत से भिन्न-भिन्न लोगों के साथ हमबिस्तर होने लगते हैं और संभोग में बुरी तरह लिप्त हो जाते हैं। कई बार वे अपने पार्टनर्स इतनी जल्दी-जल्दी बदलते हैं कि उन्हें याद तक नहीं रहता कि कल रात किसके साथ सोए थे। इन संबंधों में भावना नहीं होती, एहसास नहीं होता। तब सेक्स महज शारीरिक क्रिया भर बनकर रह जाती है, एक तरह का यांत्रिक अनुष्ठान, जिसे किसी तरह निपटाया जाना है। उसमें प्रेम नदारद होता है।

कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि हर बार किसी चीज़ की कमी रह गई है। वे समझने लगते हैं कि उन्हें वह प्राप्त नहीं हो रहा है, जिसकी खोज में वे यह सब कर रहे थे: किसी रिश्ते का असली मकसद हासिल नहीं हो पाता। किसी के साथ उस स्तर पर जुड़ाव, जो इतनी गहराई तक चला जाता है, जिसे शारीरिक संसर्ग छू भी नहीं सकता। उन्हें प्रेम नहीं मिल पा रहा है।

ऐसा हो भी नहीं सकता! अगर सेक्स सिर्फ अनुष्ठान है, यांत्रिक कर्मकांड है, जब इससे कोई फर्क न पड़े कि किसके साथ सेक्स संबंध बनाया जा रहा है और भले ही आप खुद अपने पार्टनर का चुनाव कर रहे हों लेकिन आप उन्हें बार-बार बदलते रहें तो आप उस पार्टनर से उस तरह नहीं जुड़ पाएँगे जिस तरह किसी एक के साथ दीर्घजीवी सबंध में जुड़ पाते हैं। और सेक्स को लेकर आपकी भावनाएँ भी समान नहीं होंगी, जैसी कि पहले प्रयोग के समय किसी एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में होती हैं।

आप सेक्स साझा कर सकते हैं, शारीरिक संसर्ग साझा कर सकते हैं और किसी अनुष्ठान में साथ-साथ शामिल हो सकते हैं लेकिन आप वही स्नेह, वही भावनाएँ और वही प्रेम साझा नहीं कर सकते जैसा एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में कर पाते हैं। प्रेम ही वह चुंबक है जो आपको और आपके पार्टनर को जोड़े रखता है। अक्सर लोग समझते हैं कि सेक्स वह गोंद है-लेकिन वास्तव में वह चुंबक सिर्फ और सिर्फ प्रेम है।

मेरे विचार में सेक्स भी महत्वपूर्ण है! जी हाँ, वह संबंधों के आवेग को घनीभूत कर देता है और दो व्यक्तियों को करीब लाने में महत्वपूर्ण स्थान अदा करता है। लेकिन सिर्फ तभी जब शारीरिक के अलावा एक दूसरा रिश्ता भी हो। आप किसी के साथ एक विस्मयकारी रात गुज़ार सकते हैं और नियमित रूप से उसके साथ यौनानुभव प्राप्त कर सकते हैं, जो आपकी शारीरिक जरूरतों को पूरी तरह संतुष्ट और आनंदित भी कर सकता है लेकिन इतना होने के बाद भी आप किसी चीज़ की कमी महसूस करते हैं।

यही 'कोई चीज़' प्रेम है। और मेरे विचार में इस गहरे प्रेम और लगाव को किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा करना असंभव है!

‘मृत्यु के पश्चात जीवन’ (लाइफ आफ्टर डैथ) कार्यक्रम की तैयारी – 23 जुलाई 15

आश्रम में इस सप्ताहांत आयोजित हो रहे एक कार्यक्रम की तैयारियों में हम बुरी तरह व्यस्त हैं। हमने लोगों को हमारे यहाँ आने और देह-दानदाता के रूप में जुड़ने के लिए आमंत्रित किया है। वे इस बात से राज़ी होंगे कि उनकी मृत्यु के बाद किसी अस्पताल को उनका शरीर दान कर दिया जाएगा, जिससे चिकित्सा के क्षेत्र में प्रगति हेतु उनका उपयोग उपयोग किया जा सके!

सभी धर्मों में मृत्यु पश्चात जीवन संबंधी अपने-अपने तरह-तरह के धार्मिक कर्मकांड और रीति रिवाज होते हैं, जिन्हें पूरा किया जाना ज़रूरी माना जाता है। कुछ धर्म मृत शरीर को जलाते हैं, और कुछ दफनाते हैं। यह सब आत्मा की शांति के लिए, उसे स्वर्ग या जन्नत पहुँचाने के लिए या इसी प्रकार के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। परंतु उस इन्सान के शरीर के साथ क्या किया जाए, जो इन ‘लाभों’ में या ‘आत्मा की शांति’ वगैरह में कोई रुचि नहीं रखता, क्योंकि इन सब बातों पर उसका कभी विश्वास ही नहीं रहा?

मुझे लगता है, इन सब कर्मकांडों के मुक़ाबले अपने शरीर को चिकित्सकीय प्रयोगों के लिए दान कर देना कहीं बेहतर विकल्प होगा। यदि आपके मृत शरीर का कोई अंग किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन बचाने में काम आ जाए, तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? इसलिए नहीं कि ऐसा करने पर आप आगे भी जीवित रहेंगे, बल्कि इसलिए कि मरने के बाद भी आप किसी के काम आए, आपने किसी का जीवन बचाने में मदद की! अगर आप वृद्ध हैं और आपके अंगों का उपयोग किसी दूसरे व्यक्ति के बीमार अंग के स्थान पर प्रत्यारोपित नहीं किया जा सकता तो भी आपका मृत शरीर चिकित्सा के क्षेत्र में प्रयोगों के लिए उपयोग में लाया जा सकता है! न जाने कितने छात्र हैं, जिन्हें शरीर की और उसके विभिन्न अंगों में हो सकने वाली बीमारियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है, जिससे आगे चलकर वे उनका उपचार कर सकें, और यह काम वे आपके शरीर पर प्रयोग करके सीख सकते हैं!

काफी समय पहले मेरे पिताजी ने मुझसे यह पता लगाने के लिए कहा था कि कहाँ और किस प्रकार मृत्यु के बाद वे अपना शरीर दान कर सकते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे पिताजी वास्तव में बड़े खुले विचार रखते हैं और इस विचार की वे पहले से ही बहुत सराहना किया करते रहे हैं!

आखिरकार, इस सप्ताहांत, वे एक फार्म भरेंगे और इस बात को साबित करेंगे। मेरे कुछ नास्तिक मित्र हैं, जिनसे मेरा परिचय सोशल नेटवर्क साइटों पर हुआ है और शुक्रवार और शनिवार को हम सब मिलकर एक कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। हम लोग और भी बहुत से नास्तिक व्यक्तियों से मिलेंगे- क्योंकि सामान्यतया धार्मिक व्यक्ति इसमें रुचि नहीं लेंगे- और उन्हें भी इस विचार से परिचित करेंगे, उनके साथ बात करके, मिल-जुलकर एक-दूसरे को जानेंगे-समझेंगे, कुछ नए मित्र बनाएँगे और इस तरह बहुत से बीमार और घायल व्यक्तियों की मदद करने के अलावा विज्ञान की उन्नति की दिशा में अपना हर संभव योगदान देने का प्रयास करेंगे!

हमें नहीं पता कि आखिरकार कितने लोग आएँगे। साठ से अधिक लोगों से हमें उनके आने की पुष्टि प्राप्त हो चुकी है- लेकिन आप जानते हैं, भारत में क्या होता है- हो सकता है, ज़्यादा लोग आ जाएँ! इसलिए हम भोजन और रहने की व्यवस्था के मामले में आश्रम को अच्छी तरह तैयार करने में लगे हुए हैं और निश्चित ही बहुत पूरे उत्साह के साथ लोगों के आने का और इस कार्यक्रम के शुभारंभ का इंतज़ार कर रहे हैं!

मैं इस कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट रविवार को प्रस्तुत करूँगा!

गैर हिंदुओं को भारत के धार्मिक समारोहों में शामिल होने के लिए प्रेरित करने संबंधी एक मज़ेदार रिपोर्ट – 26 फ़रवरी 2015

मैं कई बार आपको बता चुका हूँ कि हमें आश्रम में मेहमानों का स्वागत करते हुए अत्यंत ख़ुशी होती है! वास्तव में बड़ा अच्छा लगता है जब हम अलग-अलग देशों के लोगों को एक साथ अपने यहाँ पाते हैं और जब वे सब एक-दूसरे के साथ अपने विचार और अपनी मान्यताएँ साझा करते हैं। निश्चय ही वे भारत में देखी और अनुभव की गई बातें भी हमें बताते हैं-और अभी हाल ही में प्राप्त रिपोर्ट न सिर्फ हमें हँसने के लिए मजबूर करती है बल्कि यह सोचने के लिए भी मजबूर करती है कि धार्मिक कर्मकांड आयोजित करने वाले लोग आखिर क्यों दूसरों को इन समारोहों में आग्रह पूर्वक आमंत्रित करते हैं और उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए हर तरह का दबाव भी बनाने की कोशिश करते हैं।

आश्रम के दो मेहमान कुछ दिन पहले वृन्दावन के केशी घाट गए थे, जहाँ घाट की सीढ़ियाँ सीधे यमुना नदी में उतर जाती हैं। आजकल नदी में पानी बहुत कम रह गया है मगर लोग हर दिन अपने तीर्थयात्रियों के लिए आरती करने से बाज़ नहीं आते। हमारे मेहमान दंपति यही पूजा समारोह देखने गए थे-और वास्तव में उनके मुताबिक पूरा समारोह अत्यंत मज़ेदार रहा।

सामान्यतः लोग एक ओर बैठ जाते हैं और थोड़ी दूरी से सामने हो रहे समारोह को देखते हैं। वे घाट पर आए और सोच ही रहे थे कि किसी ऐसी जगह बैठा जाए जहाँ से समारोह अच्छी तरह देख सकें कि उनके पास कुछ श्रद्धालु आए और उनसे अपने साथ चलने का आग्रह करने लगे। वे उनके पीछे चल पड़े और कुछ देर बाद ही अपने आपको भीड़ के बीचोंबीच खड़ा पाया। लोगों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें और साथ ही उस अप्रतिम अनुभव में वे भी सहभागी हो सकें इसलिए वे वही सब करते भी रहे जैसा उनसे कहा जा रहा था।

और वाकई वह अनुभव अपने आप में एक ही था! उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें आटे के गोले प्राप्त हुए, जिन्हें उन्होंने नदी में फेंक दिया और कैसे आसपास खड़े लोगों को कोई नुकसान न पहुँचे इस बात का ध्यान रखते हुए उन्होंने जलते दियों की बड़ी और भारी आरती उठाकर भीड़ के बीच लहराया और यहाँ तक कि छोटी-छोटी नावों दिए रखकर नदी के उथले पानी में बहाए और एक लम्बी लकड़ी की सहायता से उन्हें स्थिर रखने की कोशिश करते रहे कि वे लुढ़ककर पानी में गिर न जाएँ। उन्हें एक खोखला सींग दिया गया, जिसमें दूध भरा गया और उनसे कहा गया कि उसे एक विशेष तरीके से नदी पर थामे रहें कि दूध पानी में गिरता चला जाए। संतुलन का वह एक चुनौतीपूर्ण काम था, जिसमें अपने आप को बैरियर के उस पार गिरने से बचाते हुए सींग को नदी में इतनी दूर रखना था कि दूध पानी में ही गिरे! सींग खाली होने के बाद ही वे राहत की साँस ले पाए- और ये क्या, वे हैरान रह गए जब एक नहीं बल्कि दो बार कोई आया और सींग को फिर भर गया!

आश्रम में आकर वे सारी गतिविधियों की नकल उतार-उतारकर बताते रहे और सब आपस में ठहाके लगा-लगाकर हँसते रहे। स्वाभाविक ही उन्हें बड़ा मज़ा आया था और उन्होंने बताया कि वास्तव में वे पूरी गतिविधियों में संलग्न हो गए थे लेकिन साथ ही कुछ समय में ही उस सबसे आजिज़ आ गए थे। वहाँ बहुत शोर-शराबा हो रहा था, नदी के गंदले, स्थिर और निर्जीव पानी से दुर्गंध उठ रही थी और संतुलन बनाए रखने के लिए उन्हें बहुत सी अजीबोगरीब हरकतें करनी पड़ रही थीं। लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने उन हरकतों का काफी मज़ा लिया। और यह भी स्पष्ट था कि वे कतई नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं, इन गतिविधियों के पीछे की कहानी क्या है, तर्क क्या है, उद्देश्य क्या है!

मैं मानता हूँ कि वे इन अनुभवों की बहुत सी यादें लेकर यहाँ से जाएँगे और अपने मेहमानों को उस वातावरण का अनुभव और मज़ा लेने के लिए हम प्रेरित भी करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें इन सब गतिविधियों में शामिल होने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए थे।

वास्तव में आप अपने, निश्चित ही हिन्दू, रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों का प्रदर्शन और आयोजन कर रहे हैं और आपके कर्मकांडों और रीति-रिवाजों से अनजान एक गैर हिन्दू व्यक्ति जब आपके पास आता है तो उसे अपने संस्कारों में शामिल करने की ज़रूरत क्या है, आप क्यों चाहते हैं कि एक गैर हिन्दू आपकी परम्पराओं का अनुकरण करे? अगर आप अपने धर्म से उसका साक्षात्कार कराना चाहते हैं तो उस मेहमान से वे सब कर्मकांड करवाने की ज़रूरत नहीं है, जिन्हें वह समझता नहीं है। आपके धर्म को वह इन गतिविधियों की सहायता से कतई बेहतर तरीके से नहीं जान सकता! क्या आप अपनी धार्मिकता का प्रदर्शन भर करना चाहते हैं? अगर ऐसा करना ही चाहते हैं तो दूसरों से वही सब करवाने की क्या आवश्यकता है, जो आप कर रहे हैं? या फिर अंत में, क्या आप उनसे कोई चन्दा या चढ़ावा वसूल करना चाहते हैं? पैसे के लिए धार्मिक प्रहसन का पाखंडी आयोजन!

इसके अलावा मैं उन हिंदुओं के बारे में भी सोचता हूँ, जो इन कर्मकांडों में शामिल होते हैं। दरअसल बहुत से हिन्दू भी नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, इन अनुष्ठानों का उद्देश्य क्या है, इनके पीछे की कहानी क्या है! वे भी आँख मूंदकर अपने पुरोहितों की गतिविधियों का और उसके आदेशों का पालन करते चले जाते हैं, जैसा कि उनके माता-पिता और पूर्वज सैकड़ों वर्षों से करते रहे थे और पीढ़ी दर पीढ़ी अपने बाल-बच्चों को भी दिखाते रहे, बार-बार वहाँ आकर उनके साथ उन्हें दोहराते रहे और इस तरह वह आपके सोच और चेतना का हिस्सा बनता चला गया। वे इन रीति-रिवाजों में निहित प्रतीकों को नहीं जानते, उनमें अंतर्निहित अभिप्राय से वे अनभिज्ञ होते हैं। इसलिए एक तरह से उनके लिए भी यह एक खेल-तमाशे के सिवा कुछ भी नहीं होता। खेल, जिसमें दैवी आशीर्वाद के लाभ की संभावना भी मौजूद होती है।

मैं समझ सकता हूँ कि अपने खेल का आनंद आप विदेशियों के साथ साझा करना चाहते हैं लेकिन मैं आपको आगाह करना चाहता हूँ कि आपके लिए वह उपहास का कारण भी बन सकता है, वे आपके रीति-रिवाजों की हँसी उड़ा सकते हैं, उन पर अनुचित टीका-टिप्पणी कर सकते हैं-और मैं जानता हूँ, आप यह पसंद नहीं करेंगे! तो फिर क्यों नहीं हम यह करते कि अगर कोई हमारे पास आकर आग्रह पूर्वक उनमें शामिल होने का निवेदन करता है तभी उन्हें शामिल किया जाए अन्यथा उन्हें सब कुछ दूर से देखने दें! किसी पर कोई दबाव न डालें और उनके प्रति निर्लिप्त होकर अपना काम करते रहें।

और सबसे बड़ी बात, जब आपको थोड़ा समय मिले तो नदी के बारे में सोचिए, इन आयोजनों के चलते उसमें होने वाले प्रदूषण के बारे में, उससे संबन्धित दूसरी समस्याओं के बारे में सोचिए और सोचिए कि इन आयोजनों में वास्तव में आप कितनी मूर्खताएँ कर रहे होते हैं। 🙂

नए ज़माने के भारतीय युवाओं: क्या आप अपने परिवार के तथाकथित पिछड़ेपन पर शर्मिंदा हैं? 23 दिसंबर 2014

कुछ अर्सा पहले एक भारतीय युवक ने मुझसे संपर्क किया कि उसके कुछ प्रश्नों का मैं कोई हल सुझाऊँ। कुल मिलाकर वह जानना चाहता था कि अपने परिवार वालों की परंपरागत जीवन-पद्धति और उनके रूढ़िवादी विचारों के साथ एक आधुनिक, खुले विचारों वाले युवा के रूप में वह किस तरह तालमेल बिठाए। मैं जानता हूँ कि यह सिर्फ इस युवक की ही समस्या नहीं है इसलिए आज के ब्लॉग में मैं इन्हीं प्रश्नों की चर्चा कर रहा हूँ।

उस व्यक्ति ने जो बताया वह मैं पहले बहुत से लोगों से भी सुन चुका था। वे लोग अक्सर बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाते हैं, जो अधिकतर बड़े शहरों में स्थित होते हैं, जहाँ उन्हें ‘आधुनिक संसार’ की बहुत सी चीजें देखने को मिलती हैं, वे बहुत पढ़ते-लिखते हैं और वैश्विक मीडिया से भी उनका अच्छा ख़ासा परिचय हो जाता है। यहाँ तककि उनका विदेशियों से भी सम्पर्क हो सकता है, जिसके कारण वे भारत के बाहर के लोगों के विचारों से परिचित हो जाते हैं। जब वे अपने छोटे से गाँव या कस्बे में लौटते हैं तब पहले से बिल्कुल बदल चुके होते हैं। कुछ लोगों के साथ यही बात तब भी होती है जब वे अपने घर पर ही होते हैं! इंटरनेट ने सारी दुनिया को इस तरह खोलकर रख दिया है कि उसके बारे में जानकारी हासिल करने के लिए आपको बाहर तक निकलना नहीं पड़ता!

इस तरह ये युवा ऐसे विचार विकसित कर लेते हैं जिस दिशा में उनके परिवार वालों ने कदम भी नहीं रखा होता। युवा लड़के और लड़कियों के मित्र भी वैसे ही होते हैं, आधुनिक और धर्म के पुराने रीति-रिवाजों, कर्मकांडों और उनकी सीमाओं से मुक्त। जब वे घर पर होते हैं तो अपने परिवार वालों को उन्हीं सब रीति-रिवाजों और कर्मकांडों का अनुपालन करते देखते हैं और उन्हें लगता है कि उनके करीबी रिश्तेदार, जिन्हें वे इतना चाहते हैं, बहुत अंधविश्वासी हैं। कि वे जाति-प्रथा को, जिसे वे बेहद बुरा समझते हैं, उचित मानते हैं। वे महिलाओं के साथ व्यवहार से सम्बंधित सभी बुरी भारतीय परंपराओं का पालन करते हैं!

वे अपने घर में इनके विरुद्ध तर्क-वितर्क करते हैं, बहस करते हैं मगर कोई नतीजा नहीं निकलता। वे वहाँ अल्पमत में होते हैं-और आखिर वे अपने परिवार के सदस्यों से प्रेम भी करते हैं लिहाजा वे उन्हें अपमानित भी नहीं करना चाहते! लेकिन वे ऐसे माहौल में असुविधा महसूस करते हैं, शर्म महसूस करते हैं। परिवार के विषय में वे अपने मित्रों से बात करना भी पसंद नहीं करते। नए ज़माने के अपने दोस्तों को घर बुलाते हुए उन्हें असुविधा होती है, वे उन्हें अपने परिवार से मिलवाना नहीं चाहते। दोस्त उनके परिवार के बारे में क्या सोचेंगे, करीबी रिश्तेदारों का उन पर क्या असर होगा, ये प्रश्न उन्हें हॉन्ट करते हैं।

सबसे पहले तो मैं कहूँगा कि आप अपने परिवार के लिए शर्मिंदा होना छोड़ें। आप उनके विचारों, उनके कामों और उनकी आस्थाओं के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। सिर्फ उन्हें इतना बता दीजिए कि आप क्या सोचते हैं, क्यों आप उन बातों पर विश्वास नहीं करते, जिन पर वे करते हैं और उन परम्पराओं का अनुपालन भी नहीं करना चाहते, जिन पर चलना उन्हें आवश्यक लगता है। बातचीत अवश्य कीजिए, जिससे भले ही परिवार वाले उन्हें न समझ पाएँ, कम से कम वे उन्हें जान तो लें। हो सकता है, आपको बार-बार अपनी बात समझाना पड़े लेकिन आखिर वह आपका परिवार है। वे आपसे प्रेम करते हैं और आपको उनके साथ तालमेल बिठाने के लिए कोई न कोई समान आधार ढूँढ़ना ही चाहिए। एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु बने रहिए-न तो वे आपको विभिन्न समारोहों और कर्मकांडों में, जिन्हें आप पसंद नहीं करते या जिन पर चलना आपके लिए असंभव है, शामिल होने का दबाव डालें और न ही आप यह अपेक्षा करें कि वे आपके कहे अनुसार चलने लगेंगे। एक बार यह स्पष्ट कर देने के बाद कि क्यों आप उन बातों को अनुचित मानते हैं, आप उन्हें उनकी अपनी मर्ज़ी के अनुसार चलने के लिए स्वतंत्र छोड़ दीजिए। अगर वे पूजा-पाठ करते हैं या उपवास करते हैं तो आपको इसमें क्या परेशानी हो सकती है?

जहाँ तक आपके मित्रों का सवाल है, मैं वही सलाह दुंगा: बातचीत करते रहिए। अपने परिवार के बारे में उन्हें खुलकर बताइए और इस मामले में आप क्या सोचते हैं, यह भी। मुझे पक्का विश्वास है आप ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं होंगे! बस, बात कीजिए और उन्हें अपने और अपने परिवार के बारे में अच्छी तरह जानने दीजिए। अगर वे आपके सच्चे मित्र हैं तो आपके परिवार की आस्थाओं और उनके विचारों के आधार पर आपके प्रति उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। इसके विपरीत वे आपको बेहतर समझ पाएँगे, समझ सकेंगे कि आप किस पृष्ठभूमि से आते हैं।

लेकिन कुछ आस्थाओं के साथ बहुत गंभीर समस्याएँ भी हैं, जिन्हें न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही बर्दाश्त। कभी-कभी ये आस्थाएँ या परंपराएँ सीमा के बाहर हो जाती हैं, जहाँ हम कह सकते हैं कि वास्तव में वे आपके मित्रो को दुःख (नुकसान) पहुँचा रही हैं या उन्हें अपमानित कर रही हैं। यह एक अलग विषय है, जिस पर कल मैं विस्तार से लिखूँगा।

मेरे जर्मन मित्र का हमारे आश्रम में विवाह – 14 जुलाई 2013

आज मैं आपको 2005 में हुए एक समारोह की जानकारी देना चाहता हूँ जिसे मैंने स्वयं तो नहीं देखा मगर जिसके बारे में मुझे कई बार बताया गया और जिसके वीडियो मैंने देखे हैं: मेरे दो जर्मन मित्रों का हमारे आश्रम में सम्पन्न विवाह समारोह! चलिये आपको इसके बारे में शुरू से बताता हूँ।

इन मित्रों ने हमसे कहा कि वे भारत आना चाहते हैं। पुरुष मित्र तो कई बार भारत आया था मगर महिला (पत्नी) पहली बार भारत आ रही थी। विवाह के समय होने वाले बहुत से समारोहों और कर्मकांडों के बारे में उन्होंने लोगों से सुन रखा था और उनके वीडियो भी देख रखे थे। वे इन विवाहों की गहमा-गहमी और चमक-दमक से बहुत प्रभावित थे और चाहते थे कि वे आश्रम में ही पूर्णतः भारतीय पद्धति से अपना विवाह रचाएँ। मैंने उनसे कहा कि ऐसा हो सकता है और इस तरह उन्होंने आश्रम आने का और वहाँ विवाह रचाने का कार्यक्रम बनाया। कुछ गलतफहमियाँ भी पैदा हुईं मगर सौभाग्य से कटुता कभी नहीं आ पाई।

वे अक्तूबर में दिल्ली आए और मेरे भाई यशेंदु ने, जो पहले से उन्हें जानता था, एयरपोर्ट जाकर उनका स्वागत किया और उन्हें आश्रम लेकर आया। वे मेरी उपस्थिति की कल्पना से, कि मैं उन्हें दरवाजे पर पहुँचकर गले लिपट जाऊंगा, वे बड़े खुश थे मगर मैं वहाँ नहीं था। मेरे भाइयों ने उन्हें बताया कि मैं आयरलैंड गया हुआ हूँ जहां मेरा कोई कार्यक्रम पहले से तय था। उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि यशेंदु से वे जर्मनी में मिले ज़रूर थे मगर उसे अच्छी तरह से जानते नहीं थे और मेरे दूसरे भाई, पूर्णेन्दु से तो वे बिल्कुल ही अपरिचित थे। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि अब उनका विवाह समारोह कैसे संभव हो पाएगा! मैं नहीं होऊंगा तो सारे क्रिया-कर्म और समारोह कौन सम्पन्न कराएगा?

मुझे बाद में पता चला कि वे नहीं जानते थे कि मैं उन्हें आश्रम में नहीं मिलूंगा। मुझे लगा कि मैंने उन्हें बता दिया था और यह तो था ही कि अपने भाइयों को मैंने उनके आने और विवाह के उनके कार्यक्रम की जानकारी दे दी थी। मेरा कार्यक्रम पहले से ही तय था लेकिन स्वाभाविक ही, सूचना के आदान-प्रदान में गफलत हो गई थी। जैसे वे नहीं जानते थे कि मैं आश्रम में उन्हें नहीं मिलूंगा वैसे ही मैं नहीं जानता था कि वे मुझसे यह अपेक्षा कर रहे थे कि मैं उनके विवाह के कर्मकांड सम्पन्न करूंगा! यह मैं समझ रहा था कि हिन्दू धर्मग्रंथों और उसमें वर्णित हर तरह के संस्कारों में होने वाले कर्मकांडों की मुझे अच्छी जानकारी होने की वजह से वे मुझसे ऐसी अपेक्षा कर रहे थे। लेकिन वे नहीं जानते थे कि अलग-अलग रस्मों के लिए हमारे यहाँ अलग पुरोहित होते हैं। मैंने आज तक किसी का भी विवाह नहीं कराया था। मेरे भाइयों या पिताजी ने भी यह काम नहीं किया था। हम लोग धर्मोपदेशक थे और धर्मग्रंथों पर प्रवचन किया करते थे, जिसमें उनके पदों को गाना, उन्हें लोगों को समझाना और उनकी व्याख्या करना हमारा काम हुआ करता था। आम तौर पर हम कोई कर्मकांड नहीं करते थे। लेकिन हमें कई ऐसे पंडितों का पता था जो ऐसे काम किया करते थे और जब मैंने उन्हें आमंत्रित किया था, यह बात मेरे दिमाग में थी।

इसलिए वे थोड़े से परेशान थे, यहाँ तक कि अपना विवाह भी फिलहाल स्थगित कर देना चाहते थे कि कुछ दिन घूम-घामकर वापस चले जाएंगे। तब पूर्णेंदु ने सोचा कि मुझसे बात की जाए और सीधे फोन पर उनकी बात मुझसे करा दी। मज़ेदार बात यह कि तब भी उन्होंने मुझसे नहीं कहा कि वे यह अपेक्षा कर रहे थे कि मैं आश्रम में रहूँगा। खैर, मैंने उनसे कहा कि मेरा सारा परिवार उनका ख्याल रखेगा और विवाह भी सम्पन्न करवा देगा। यह भी कि वे बिल्कुल परेशान न हों और आराम से, प्रसन्नता पूर्वक अपना समय गुजारें।

सौभाग्य से वे राजी हो गए और मेरे परिवार ने 19 अक्तूबर 2005 को होने वाले उनके विवाह का इंतज़ाम करना शुरू कर दिया। मेरे भाइयों और बहन ने सारा प्रबंध किया: शादी के कपड़ों से लेकर कर्मकांड के लिए वेदी और समिधा और हवन सामग्री जुटाने तक और पुरोहित के इंतज़ाम से लेकर शादी में लगने वाली दीगर वस्तुओं के इंतज़ाम तक। यहाँ तक कि दूल्हा-दुल्हन को कपड़े पहनाना और पूरे कर्मकांड के बारे में कि किस वक़्त क्या किया जाना है, इसकी जानकारी देना, आदि सब कुछ मेरे भाईयों और बहन ने किया और इसके बहुत सारे चित्र लिए और वीडियो भी बनवाई। वह शाम सभी के लिए एक अविस्मरणीय शाम सिद्ध हुई, जिसने उन्हें हमारे परिवार से और आश्रम के साथ गहराई से जोड़ दिया।

हालांकि मैं वहाँ नहीं था, फिर भी मैं बहुत खुश था कि मेरे मित्रों ने अपना विवाह हमारे घर में सम्पन्न कराया। बाद में वे दीवाली मनाने के लिए हमारे आश्रम में कुछ दिन और ठहरे और त्योहार के खानों का कई दिन तक मज़ा लिया। आज भी वे अपने मित्रों से बताते रहते हैं कि कैसे वे आश्रम में हमारे परिवार और सारे आश्रम वासियों के निस्वार्थ स्वागत, खातिरदारी और अपनत्व से बहुत भावविभोर हो गए थे।

मैं खुश हूँ कि इन दो खास मेहमानों का अपने आश्रम में स्वागत करने का बाद में कई बार हमें मौका मिला। वे कई बार हमारे यहाँ आए और हम भी सपरिवार कई बार जर्मनी में उनके यहाँ गए जहां हमारा भी उसी तरह बड़ी आत्मीयता के साथ स्वागत किया गया। और आज मैं यह बताना चाहता हूँ कि जैसे उनका विवाह हमारे घर में हुआ उसी तरह मेरा और मेरी पत्नी का जर्मन विवाह उनके घर में सम्पन्न हुआ था।

जब बहुत सारा पंचामृत नाली में बह गया……..24 मार्च 13

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो 2005 में भी मेरे भीतर बहुत बदलाव आना बाकी था। निःसंदेह जीवन का नाम ही परिवर्तन है। सन 2000 के दिसम्बर में गुफा छोड़ने के बाद से मेरी जिंदगी में बहुत कुछ बदल रहा था लेकिन उसके बाद भी बहुत कुछ शेष था जो अभी बदलना बाकी था। गुरु का चोला छोड़ने के बाद धर्म और उस ‘गुरुत्व’ के विषय में मेरे भीतर काफी मंथन चलता रहा। उन दिनों जब मैं जर्मनी में था तो वहां एक रोचक वाकया हुआ। उसे याद करके जहां एक तरफ मुझे हंसी आती थी वहीं दूसरी तरफ कुछ धार्मिक अनुष्ठानों की सार्थकता पर संदेह होने लगता था।

जर्मनी में काम करते हुए वहां मेरे बहुत से मित्र बन गए थे। वहां ऐसे बहुत सारे वैकल्पिक चिकित्सक थे जो मेरे लेक्चर, कार्यक्रम, व्यक्तिगत सत्र आदि में शामिल होने के लिए आया करते थे और उनमें से भी कुछेक मेरे दोस्त बन गए थे। उनमें से एक पुरुष ने मेरा एक कार्यक्रम आयोजित करने की इच्छा व्यक्त की और मैंने भी खुशी खुशी हां भर दी। उसने मुझे हाइडलबर्ग में आमंत्रित किया जहां उसके एक मित्र का सेंटर था। वहां काम करते हुए हमारी बातचीत के दौरान मुझे मालूम हुआ कि मेरा यह नया मित्र हाइडलबर्ग के एक नज़दीकी उपनगर में अपना नया मकान बना रहा था। चंद हफ्तों में मकान बनकर तैयार होने वाला था। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसके गृहप्रवेश समारोह में शामिल हो सकूंगा और नए घर में कुछ धार्मिक अनुष्ठान कर सकूंगा। मैंने हामी भर दी। मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं थी और मैं एक दोस्त के लिए यह काम प्रसन्नतापूर्वक करने के लिए तैयार था।

घर तैयार होने के बाद हम कई दोस्त वहां इकठ्ठा हुए। हम करीब तीस लोग वहां मौजूद थे और उनमें से बहुतों को मैं जानता था। हमने अनुष्ठान की शुरुआत पंचामृत अभिषेक से की। इसमें भगवान की मूर्ति को दूध, शहद और अन्य सामग्रियों से नहलाया जाता है और प्रभु के अनुग्रह की कामना की जाती है। इस दौरान मैं मंत्रोच्चारण कर रहा था और अन्य सभी लोग अभिषेक में भाग ले रहे थे। इस धार्मिक कृत्य के संपन्न होने के उपरांत अभिषेक का यह सामग्री मिश्रित दूध गिलासों में डालकर सबको पीने के लिए दिया जाता है। यह स्वादिष्ट होता है और माना जाता है कि यह ईशकृपा से पूरित होता है। यह एक प्रकार का पवित्र पेय होता है जो आपको ईश्वर की अनुकंपा, शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है। अभिषेक की समाप्ति पर किसी ने वह दूधभरा कटोरा गृहस्वामी को थमा दिया, वह उठा और उस कटोरे को लेकर बाहर चला गया। कमरे में उपस्थित सब लोग प्रतीक्षा करने लगे। उनमें से कुछ को यह पता था कि वह क्या लाने वाला है। उन्हें इंतजार था सकारात्मक ऊर्जा से पूरित पंचामृत का। जब मेरा वह मित्र कमरे में वापिस लौटा तो उसके हाथ खाली थे। क्या हुआ? वह ईशकॄपायुक्त पंचामृत कहां गया?

उसने उस पंचामृत को नाली में बहा दिया था! उसे यह पता नहीं था कि उसका क्या करना है इसलिए उसे फेंक दिया उसने। कई लोगों को यह जानकर बड़ा झटका लगा। जब मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा तो मुझे हंसी आ गई। वह अपराधबोध से दबा जा रहा था कि उसने पवित्र पेय का अपमान कर दिया है। इस घटना को याद करके आज भी मैं उन मित्रों के साथ बहुत हंसता हूं। सब लोग उस पावन पंचामृत का पान करने के लिए प्रतीक्षारत थे जिसे उसने स्नान का गंदा पानी समझकर नाली में बहा दिया था।

लेकिन इस घटना ने एक नए विचार को मेरे भीतर जन्म दियाः क्या अर्थ है ऐसी पावनता का जिसे कोई व्यक्ति समझता ही न हो? आपकी एक धार्मिक क्रिया के फलस्वरूप एक पेय बना लेकिन एक व्यक्ति, जिसने कभी ऐसे अनुष्ठान में हिस्सा न लिया हो, सोचता है कि यह प्रभु की मूर्ति का मैल ही तो है। क्या ऐसे कर्मकांड की कोई प्रसांगिकता है? क्या पाइपों में बहने के बाद भी यह पंचामृत घर को पवित्र कर रहा है? कुछ लोग कहेंगें कि तुमने पंचामृत को नाली में बहा दिया है तो यह इस घर के लिए अशुभकारी होगा!

वास्तव में मैं ऐसा कभी नहीं मानता था कि यदि कोई कर्मकांड शास्त्रोक्त विधि से संपन्न नहीं किया गया है तो यह अशुभ फलदायी होता है। क्या इन सबका प्रभाव महज मनोवैज्ञानिक नहीं होता?

अंधविश्वासियों की किस्में – 3: सफल, धनवान व्यवसायी – 13 मार्च 13

अनपढ़ ग्रामीण और आम मध्यमवर्गीय आदमी के बाद आज मैं अंधविश्वासियों की तीसरी किस्म के बारे में चर्चा करूंगाः

अंधविश्वासी, सफल व्यवसायी

मैं इस श्रेणी के लोगों को बखूबी जानता हूं क्योंकि अपने जीवन के पिछले हिस्से में, जब मैं भारत में एक गुरु हुआ करता था, इनमें से बहुतों के साथ मेरा काफी नज़दीकी संपर्क रहा था। जब कभी भी मैं लैक्चर या प्रवचन देता था तो वहां हमेशा बड़ी तादाद में दौलतमंद लोग उपस्थित रहते थे। अकसर वे ही मेरे कार्यक्रमों के आयोजक होते थे और इसी वजह से मैं इन सफल व्यवसाइयों की सोच को समझ पाया। धनवान होने के साथ ये सभी धार्मिक और अंधविश्वासी भी होते हैं।

यहां भी भीरुता की वजह से अंधविश्वास पनपता है। जितनी बड़ी सफलता, उतना बड़ा भय। शुभमुहूर्त पर ही इनकी सफलता का दारोमदार टिका रहता है। अशुभ मुहूर्त में किया गया काम यानी असफलता की गारंटी। हो सकता है कि आप दिवालिया हो जाएं। दीवालिया होने का मतलब आप अब दुनिया के लिए किसी काम के नहीं रहे।

अंधविश्वासी व्यवसायी जमकर व्यापार करते हैं लेकिन इस बात का खास ध्यान रखते हैं कि सभी महत्वपूर्ण मीटिंग 'शुभ समय' पर हों। यदि यह संभव नहीं हो पाता है तो उस अशुभ समय का संतुलन बैठाने के लिए पूजापाठ करवाते है। समय के साथ उनकी यह धारणा बलवती होती जाती है कि उनकी सफलता अंधविश्वासों पर निर्भर करती है। अंधविश्वासों की परिधि से बाहर जाकर काम करने के ख्याल से ही उनकी रूह कांपने लगती है। यदि उन्हें लगता है कि उनकी सफलता कि पीछे किसी बाहरी शक्ति, उसके आशीर्वाद या किसी अन्य ऊर्जा का हाथ है तो उन्हें हर पल यह भय सताता रहता है कि यदि उन्होंने उसका अनादर किया तो वह शक्ति अपना वरदहस्त वापिस खींच लेगी।

आखिर ये लोग ऐसा क्यों करते है? सीधी सी बात है – उन्हें स्वयं पर और अपनी क्षमताओं पर भरोसा नहीं है। उनमें आत्मविश्वास की बेहद कमी होती है और वे यह मानकर बैठे हैं कि उनकी सफलता के पीछे उनके कठिन परिश्रम या कौशल का कोई हाथ नहीं है, यह तो किसी रहस्यमयी शक्ति के चमत्कार का परिणाम है। निश्चय ही वे असुरक्षा की भावना से घिरे रहते हैं क्योंकि उन्हे हर वक़्त यही भय सताता रहता है कि पता नही कब सौभाग्य उनका साथ छोड़कर चला जाए। उन्हें अपनी काबिलियतों पर भरोसा नहीं होता और इसीलिए वे अंधविश्वास की बैसाखियों का सहारा लिए रहते हैं। वह अदृश्य शक्ति उनका साथ छोड़कर न चली जाए इसके लिए दिनरात उसे मनाने का प्रयास करते रहते हैं।

यदि आप इस बात में विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि एक सफल उद्योगपति इतना अंधविश्वासी हो सकता है तो मैं आपको विश्वास दिलाने के लिए एक सटीक उदाहरण देता हूं। मुकेश अंबानी, जो खरबों डॉलर की दौलत के साथ भारत का सबसे अमीर और दुनिया में नौवे नम्बर का सबसे दौलतमंद शख्स है, ने एक अरब डॉलर की लागत से मुम्बई में एक सत्ताईस मंजिला घर बनाया। गृहप्रवेश से पहले उसे लगा कि घर में कोई वास्तुदोष है और परिवार के लिए इसकी ऊर्जा हितकर नहीं रहेगी। इसी बात पर गॄहप्रवेश स्थगित कर दिया गया। महीनों तक उस वास्तुदोष के निवारण के लिए यज्ञ, हवन और अन्य पूजापाठ चलते रहे। अंततः उस दोषमुक्ति के बाद ही उन्होंने अपने नए घर में पैर रखा। तो आपने देखा भारत का सबसे धनवान व्यक्ति, जिसकी बहुत अधिक आलोचना हुई थी इतना बेशकीमती घर बनाने के लिए, ने भी पंडितों, ज्योतिषियों और धर्मगुरुओं का आशीर्वाद लेने के बाद ही गृहप्रवेश किया।

कर्म-कांडों से नहीं मिलता स्वर्ग: नानीजी – 3 जनवरी 13

पिछले महीने जो कुछ भी हुआ है, उन सब के बीच एक चीज़ जो बेहद पक्की हुई है कि जीवन और मृत्यु के संदर्भ में अपने अधार्मिक दृष्टिकोण को लेकर मेरा परिवार और मैं स्वयं और अधिक मज़बूत हुए हैं। लोगों ने भले ही सीधा नहीं पूछा हो लेकिन मैं जानता हूं कि कुछ पाठकों के मन में यह प्रश्न था: अम्मा जी की मृत्यु पर कोई धार्मिक कर्म-कांड न करने को लेकर मेरे पिताजी और मेरी नानी जी का क्या कहना था, उनकी क्या सोच थी. चूंकि कई बार मैंने लिखा था कि वे हम बच्चों से कहीं ज़्यादा धार्मिक थे।

स्पष्ट है, मेरे माता-पिता और मेरी नानी जी सभी ने अपने जीवन का बहुत बड़ा भाग धर्म के साथ बिताया है। विशेष रूप से यहां वृंदावन में, किसी भी व्यक्ति के लिए धर्म से जुड़ा होना बिल्कुल सामान्य है, लेकिन मेरे पिताजी के लिए यह और अधिक महत्व रखता था क्योंकि वे मेरे दादाजी की तरह ही प्रवचन करते थे यानी उनकी आय का स्रोत ही धर्म को लोगों के नज़दीक लाना था। मेरी दादी के कमरे में आज भी वेदी रखी है और वे प्रतिदिन प्रार्थना करती हैं।

मुझमें और हम भाइयों में इन वर्षों के दौरान हुए बदलावों के साथ-साथ वे भी बहुत बदले हैं। एक धार्मिक गुरू और धर्मोपदेशक से यहां तक पहुंचना मेरे लिए एक लंबी प्रक्रिया थी. मैं हमेशा से बहुत खुला रहा हूं। इसके बावजूद कि मैं इस बात का बहुत ध्यान रखता हूं कि मेरे माता-पिता की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचे, मैं हमेशा उनसे बात कर सकने में और उन्हें यह बता पाने में सक्षम था कि मेरी सोच यहां तक कैसे आ पहुंची. चूंकि सोच में आए इस बदलाव के मेरे कारण न सिर्फ़ मेरे विवेक के स्तर पर बल्कि मन के स्तर पर भी बिल्कुल स्पष्ट, तार्किक और समझने योग्य हैं, वे अक्सर मेरी बात सुनकर सहमति में सिर हिलाते थे, कई बातों से सहमत हुए और मेरे इस तरह सोचने को स्वीकार किया।

इसी कारण से यह मेरे लिए बहुत अधिक आश्चर्यजनक नहीं था कि मेरे पिता किसी कर्म-कांड के इच्छुक नहीं थे, न ही तब जब उनकी बेटी की मृत्यु 2006 में हुई थी और न ही अब जब उनकी पत्नी की मृत्यु 2012 में हुई। उन्होंने कहा कि उनके जीवन से प्रकाश जा चुका है, क्या किसी तरह के आयोजन या कर्म-कांड से वह प्रकाश वापस आ पाएगा? यह उनकी इच्छा थी कि बेहद सामान्य रूप से दाह-संस्कार कर उन्हें विदा किया जाए।

जहां तक नानीजी का प्रश्न है, मैं पूरी तरह से आश्वस्त नहीं था कि इन सभी कर्म-कांडों और धार्मिक प्रथाओं में उनकी कितनी आस्था है। जब उनके संबंधी यहां आए थे तो हमारे बीच उन सभी रीतियों के बारे में बात हुई जो हमने नहीं की, क्योंकि सब इस बारे में पूछ रहे थे। हालांकि एक दिन, ऐसी ही बातचीत के बाद उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया. 90 साल की नानीजी जिन्होंने अपना पूरा जीवन एक धार्मिक व्यक्ति के रूप में बिताया, ने मुझसे कहा: ‘बेटा, मेरे बाल धूप में सफ़ेद नहीं हुए हैं। कोई भी दुनिया भर का कर्म-कांड करने से स्वर्ग नहीं चला जाता। उससे कुछ नहीं होता। सबसे ज़्यादा ज़रूरी यह है कि आप अपनी ज़िंदगी में क्या करते हैं। अच्छा कर्म कीजिए और सच्चाई के साथ रहिए।’

धर्म कहता है, बुरे वक़्त पर मरे तो परिवार के पांच लोग और मरेंगे! – 2 जनवरी 13

अम्मा जी की मृत्यु से लेकर अब तक का समय बहुत तनावपूर्ण रहा। ज़ाहिर है अंदर बहुत-सी भावनाएं जमा थीं जिनके बारे में मैंने लिखा भी है। इसके अलावा बाहर से भी लोगों ने भांति-भांति की भावनाएं व्यक्त की। उनमें बहुत-सी बातें ऐसी थी जो सोचने को विवश करें, मैंने उन बातों को नोट कर लिया ताकि जब भी समय मिले मैं अपनी डायरी में उन बातों को विस्तार से रख सकूं। लिखने को बहुत सी चीज़ें हैं क्योंकि मृत्यु जीवन के सबसे बड़े चमत्कारों में से एक है और लोग हमेशा इसके इर्द-गिर्द कहानियां बुनते रहे हैं, धर्म ने उन कहानियों को अपना तड़का लगाकर पेश किया है और इस तरह से रीतियां और प्रथाएं गढ़ी गई हैं। आज मैं एक और ऐसी ही हिन्दू अवधारणा के बारे में लिखना चाहता हूं जो उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके किसी परिजन की मृत्यु हो जाती है: पंचक

पहले यह बताता हूं कि पंचक होता क्या है. हिन्दू कैलेंडर में सब कुछ चांद की अवस्था के अनुसार होता है। अपने पूरे चक्र में चांद सभी राशि चिह्नों से होकर गुज़रता है और अंत में यह कुम्भ और मीन राशि से होकर जाता है। एक राशि चिह्न पर चांद लगभग ढाई दिनों तक ठहरता है, कभी-कभार उससे थोड़ा कम भी। पंचक की अवधि वह होती है जब चांद कुम्भ और मीन राशि पर ठहरा होता है, यानी लगभग पांच दिन लंबी अवधि जो हर महीने होती है।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, अगर कोई पंचक की अवधि के दौरान यानी उन पांच दिनों में मरता है, तो इसका अर्थ है दुर्भाग्यों का तांता लगने वाला है। दुर्भाग्य की अति तो यह है कि असल में ऐसा होने पर उसी परिवार के पांच और लोग काल के गाल में समा जाएंगे। मौत के काल से बचने का एक ही उपाय है कि परिवार द्वारा एक विशेष तरह का आयोजन किया जाए।

अम्मा जी के दाह-संस्कार पर किसी ने हमसे पूछा कि क्या हमने इस बात की जांच की है कि कहीं अम्मा जी का निधन पंचक की अवधि के दौरान तो नहीं हुई। मैंने कहा कि हम इन सब में विश्वास नहीं करते और हमें यह जांचने की कोई आवश्यकता नहीं है। यहां तक कि अगर हमें पता चलता कि उनका निधन उसी अवधि में हुआ तो भी हमारे लिए इसका कोई अर्थ नहीं रहेगा, न ही हम स्वयं को बचाने के लिए कोई कर्म-कांड शुरू करेंगे।

यह सच है कि हमारे लिए इसका कोई अर्थ नहीं है लेकिन स्पष्ट रूप से यह धार्मिक आस्था वाले कई लोगों के लिए बहुत महत्व रखता है। वे घबरा जाते हैं, डर जाते हैं और इस भय से दबकर एक और कर्म-कांड करने पर विवश हो जाते हैं। बीते दिनों में कई लोगों ने मुझसे कहा कि मैं धर्म को नकारात्मक नज़रिए से देखता हूं। कृपया मुझे बताइए, कि क्या पंचक किसी परिजन की मौत के कारण पहले से ही दुखी परिवार को बिना मतलब ही एक और मुसीबत में नहीं डालता। एक परिवार ने अपना एक सदस्य खो दिया है, वे सब दुखी हैं, शोक-संतप्त हैं और ठीक उसी समय आप उन्हें कहते हैं कि आपके परिवार के पांच और सदस्यों की मृत्यु होगी! यह अपने आप में कितना निष्ठुर और क्रूर है? मेरे लिए, यह केवल एक और साक्ष्य ही है कि धर्म का व्यवसाय लोगों में भय बैठाकर ही चलता है।

छोटे परिवारों में क्या होता है? जहां केवल एक परिवार में केवल तीन सदस्य बचे हों? क्या वे सभी मर जाएंगे? एक पूरा परिवार समूल नष्ट हो जाएगा केवल इस कारण कि उसके एक सदस्य की मृत्यु का समय सही नहीं था? यह प्रथा बेतुकी और निरर्थक है जिसे बड़े आराम से सिद्ध किया जा सकता है कि उन लोगों का कुछ नहीं होता जिन्हें पंचक के तथाकथित सिद्धांत के बारे में कुछ पता ही नहीं है। उनके परिवार में कोई नहीं मरता – या फिर शायद यह केवल हिन्दु परिवारों पर लागू होता है?

इस धार्मिक अंधविश्वास के बारे में जब हमें याद दिलाया गया तो हमारा विश्वास और मज़बूत ही हुआ कि हम इस दाह-संस्कार को किसी कर्म-कांड से नहीं जोड़ने वाले। केवल अपना दुख, अपना शोक प्रकट करेंगे और अम्मा जी को सप्रेम अपने दिल में अपनी स्मृतियों में बनाए रखेंगे।

दावत से दिखावे की रस्म पूरी होती है न कि मौत की – 28 दिसम्बर 12

पिछले कई दिनों से मैं हिंदु परिवारों द्वारा मानी जाने वाली उन सभी धार्मिक रीतियों और प्रथाओं के बारे में लिखता आ रहा हूं जिसे हम नहीं मानते हैं। उस दौरान मैंने बताया था कि हिंदू घर में मौत के तेरहवें दिन एक भोज का आयोजन किया जाता है। इसे ‘तेरहवीं’ कहते हैं।

धार्मिक व्यक्ति मौत के बाद अपना पूरा वक़्त घर में ही बिताते हैं और हर दिन एक पंडित किसी न किसी कर्म-कांड का आयोजन करवाने घर आता है। तेरहवीं इन सब में सबसे महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि उस दिन मृत व्यक्ति के परिजनों की अपवित्रता समाप्त होती है. इसके लिए कई सारी प्रथाएं हैं, पंडित के निर्देशों के अनुसार उस दिन की जाने वाली महत्वपूर्ण चीज़ों में सबसे अहम है भोज का आयोजन।

सबसे पहले आप तेरह ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, उन्हें वस्त्र देते हैं, धन देते हैं, बर्तन व अन्य घरेलू चीज़ें देते हैं। वे सबसे महत्वपूर्ण अतिथि होते हैं और उन्हें भोजन के साथ दुनिया भर के उपहार मिलते हैं। क़िस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता है! इन पंडितों के अलावा आप जितने लोगों को संभव हो सके भोजन कराएंगे. लोग अपनी सामाजिक और आर्थिक हैसियत के हिसाब से 50, 100, 500 या 1000 लोगों को भोजन करवाते हैं।

यहीं से सारी समस्या शुरू होती है, इसी वजह से यह प्रथा सिर्फ़ हम जैसे अधार्मिकों के बीच अप्रिय नहीं है: यह भोज एक तरह की रेस बन गया है कि कौन अपने प्रियजन की मौत पर कितने लोगों को खिला सकता है। आप जितने ज़्यादा लोगों को खिलाते हैं, उतना ही ज़्यादा प्यार आप अपने मृत परिजन से करते हैं, करते थे। लेकिन वे क्या करें, जिनकी ये सब कर पाने की हैसियत ही नहीं है? वे लोग जिन्होंने अपनी बेटियों के ब्याह में दहेज की ऊंची रकम देने के लिए कर्ज़ लिया है? कल्पना कीजिए कि उनके घर में किसी की अचानक मृत्यु हो जाए और अब उन्हें पूरे शहर को दावत पर बुलाना है! ये उनकी माली हालत को तहस-नहस कर देगा!

भले ही कुछ लोग इस प्रथा का विरोध कर रहे हैं, लेकिन हमारे समाज में इसे बेहद सामान्य माना जाता है. जब हमने ऐसा कोई आयोजन न करने की बात कही थी तो लोग चौंक गए थे। ज़ाहिर-सी बात है, कुछ लोगों को यह मौक़ा मिल गया कि वे उनके द्वारा आयोजित दावतों का किस्सा सुनाकर शेखी बघारेंगे. एक आदमी ने कहा कि उसने अपनी पत्नी की मृत्यु पर 900 लोगों को खाना खिलाया! भाई, यह बताकर तुम क्या साबित करना चाहते हो? कि तुम किसी के हमेशा के लिए चले जाने का शोक प्रकट करने में हमसे बेहतर हो? अगर तुम्हें पसंद है तो बेशक ऐसा करो…जहां तक हमारा सवाल है, अम्माजी की मृत्यु के सिर्फ़ तेरह दिन बाद हम कोई भोज या उत्सव बिल्कुल भी आयोजित नहीं करना चाहेंगे। 

ये कैसा आयोजन है? आप इसलिए दावत दे रहे हैं कि आपकी अपवित्रता दूर हो गई? नहीं, हम ऐसा नहीं कर पाते, हमें समझ नहीं आता कि आख़िर हम यह ज़रूरत क्यूं महसूस करेंगे कि ढेर सारे लोगों को बुलाकर यह दिखाया जाए कि इस आयोजन पर हम कितने पैसे खर्च कर सकते हैं! दिखावे में हमारी दिलचस्पी नहीं है, न ही हम ऐसा मानते हैं कि इस दौरान हम कभी भी अपवित्र हुए और हम कोई विधि-विधान भी नहीं करते।

जब लोगों ने हमसे पूछा कि भोज के लिए उन्हें कब आना चाहिए, हमने उनसे कहा कि हम कोई कर्म-कांड नहीं कर रहे. बब्बा जी के दोस्त भी, जिन्हें उनके आने की ख़बर मिली थी, ने पूछा और बब्बा जी ने उन्हें भी मना कर दिया, हम कुछ नहीं कर रहे. आख़िर में नौबत ऐसी आई कि लोगों के इस सर्किल से कोई आया ही नहीं, कोई भी नहीं। और हमें इससे किसी तरह की कोई शिकायत भी नहीं है।

लेकिन अंत में बस एक ख़्याल रह जाता है: अगर ये आयोजन ही आपको फिर से पवित्र बनाते हैं और हमने ये किया नहीं, तो क्या धार्मिक व्यक्तियों की नज़र में हम हमेशा के लिए अपवित्र रह जाएंगे? क्या अब वे तब तक हमारे पास नहीं आएंगे जब तक हम यह कर्म-कांड पूरा नहीं कर लेते?

रोचक विचार है, हालांकि मुझे लगता नहीं लोग इस चरम तक जाएंगे!