हमारे स्कूली छात्रों के दाँतों की डॉक्टरी जाँच – 24 जुलाई 15

आज मैं प्रति शुक्रवार अपने स्कूल के बच्चों का परिचय कराने वाली सीरीज़ को रोककर उसके स्थान पर स्कूल में बच्चों के लिए ही आयोजित एक दूसरे कार्यक्रम के बारे में बताना चाहता हूँ: दांतों की डॉक्टरी जाँच शिविर के बारे में!

प्रातः 10 बजे, एक छोटी-सी वैन हमारे आश्रम के पिछले गेट से भीतर आई। वैन के पिछले दरवाजे खुले और बहुत सारे उपकरण बाहर निकलते हुए देखे गए। इतनी सी वैन में इतने सारे उपकरण और दंत-चिकित्सक की एक बड़ी सी कुर्सी का होना ही अपने आप में आश्चर्यजनक था, ऊपर से बहुत से छोटे-छोटे उपकरण भी बाहर निकलते गए, जिनकी सहायता से चिकित्सक बच्चों और बड़ों के दाँतों को अंदर तक देख सकते थे और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सफाई भी कर सकते थे। उस गाड़ी में के डी डेंटल कॉलेज, मथुरा से आए 20 दंतचिकित्सकों की एक टीम भी थी, जो हमारे बच्चों के दाँतों की जाँच और आवश्यक होने पर उनका इलाज करने आई थी!

आप कल्पना कर सकते हैं कि हमारे बच्चे आज तक कभी दंतचिकित्सक के क्लीनिक नहीं गए हैं। हमारी एक मित्र, जो मुंबई में एक दंतचिकित्सक है, एक बार यहाँ आई था और उसने हमारे स्कूल के बच्चों के दाँतों की जाँच के बाद उन्हें टूथ ब्रश और टूथ पेस्ट देकर उनके उपयोग का तरीका बताया था। इसके अतिरिक्त, इन बच्चों ने अपने जीवन में अब तक किसी दंतचिकित्सक से भेंट नहीं की है!

ज़्यादातर अभिभावक जानते हैं कि उन्हें अपने बच्चों को दाँतों में ब्रश करना सिखाना चाहिए। अधिकतर घरों में हम देखते हैं कि बच्चों के लिए टूथ ब्रश उपलब्ध हैं। कुछ घरों में नहीं भी होता। और, निस्संदेह यह शंका तो होती ही है कि क्या अभिभावक स्वयं जानते हैं कि किस प्रकार अपने बच्चों को अच्छी तरह ब्रश करने का सही तरीका सिखाएँ।

इन 20 दंतचिकित्सकों ने लगभग 250 बच्चों के दाँतों की न सिर्फ जाँच की बल्कि उनके दाँतों की सफाई करके वाकई बड़ा अद्भुत काम किया है! इन बच्चों में कुछ ऐसे भी थे, जिनके दाँतों की ओर विशेष ध्यान देना आवश्यक जान पड़ा और उन्हें आगे इलाज के लिए डेंटल कॉलेज बुलाया गया है। हम उन्हें अगले सप्ताह वहाँ ले जाएँगे।

यह एक बड़ी सफलता थी और हम खुश हैं कि हम इन बच्चों की सहायता कर पाए और उन्हें मुँह और दाँतों के स्वास्थ्य और उनकी सफाई के बारे में समझा पाये!

यहाँ आप दाँतों की जाँच और उनकी सफाई के कुछ चित्र देख सकते हैं

‘मृत्यु के पश्चात जीवन’ (लाइफ आफ्टर डैथ) कार्यक्रम की तैयारी – 23 जुलाई 15

आश्रम में इस सप्ताहांत आयोजित हो रहे एक कार्यक्रम की तैयारियों में हम बुरी तरह व्यस्त हैं। हमने लोगों को हमारे यहाँ आने और देह-दानदाता के रूप में जुड़ने के लिए आमंत्रित किया है। वे इस बात से राज़ी होंगे कि उनकी मृत्यु के बाद किसी अस्पताल को उनका शरीर दान कर दिया जाएगा, जिससे चिकित्सा के क्षेत्र में प्रगति हेतु उनका उपयोग उपयोग किया जा सके!

सभी धर्मों में मृत्यु पश्चात जीवन संबंधी अपने-अपने तरह-तरह के धार्मिक कर्मकांड और रीति रिवाज होते हैं, जिन्हें पूरा किया जाना ज़रूरी माना जाता है। कुछ धर्म मृत शरीर को जलाते हैं, और कुछ दफनाते हैं। यह सब आत्मा की शांति के लिए, उसे स्वर्ग या जन्नत पहुँचाने के लिए या इसी प्रकार के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। परंतु उस इन्सान के शरीर के साथ क्या किया जाए, जो इन ‘लाभों’ में या ‘आत्मा की शांति’ वगैरह में कोई रुचि नहीं रखता, क्योंकि इन सब बातों पर उसका कभी विश्वास ही नहीं रहा?

मुझे लगता है, इन सब कर्मकांडों के मुक़ाबले अपने शरीर को चिकित्सकीय प्रयोगों के लिए दान कर देना कहीं बेहतर विकल्प होगा। यदि आपके मृत शरीर का कोई अंग किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन बचाने में काम आ जाए, तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? इसलिए नहीं कि ऐसा करने पर आप आगे भी जीवित रहेंगे, बल्कि इसलिए कि मरने के बाद भी आप किसी के काम आए, आपने किसी का जीवन बचाने में मदद की! अगर आप वृद्ध हैं और आपके अंगों का उपयोग किसी दूसरे व्यक्ति के बीमार अंग के स्थान पर प्रत्यारोपित नहीं किया जा सकता तो भी आपका मृत शरीर चिकित्सा के क्षेत्र में प्रयोगों के लिए उपयोग में लाया जा सकता है! न जाने कितने छात्र हैं, जिन्हें शरीर की और उसके विभिन्न अंगों में हो सकने वाली बीमारियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है, जिससे आगे चलकर वे उनका उपचार कर सकें, और यह काम वे आपके शरीर पर प्रयोग करके सीख सकते हैं!

काफी समय पहले मेरे पिताजी ने मुझसे यह पता लगाने के लिए कहा था कि कहाँ और किस प्रकार मृत्यु के बाद वे अपना शरीर दान कर सकते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे पिताजी वास्तव में बड़े खुले विचार रखते हैं और इस विचार की वे पहले से ही बहुत सराहना किया करते रहे हैं!

आखिरकार, इस सप्ताहांत, वे एक फार्म भरेंगे और इस बात को साबित करेंगे। मेरे कुछ नास्तिक मित्र हैं, जिनसे मेरा परिचय सोशल नेटवर्क साइटों पर हुआ है और शुक्रवार और शनिवार को हम सब मिलकर एक कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। हम लोग और भी बहुत से नास्तिक व्यक्तियों से मिलेंगे- क्योंकि सामान्यतया धार्मिक व्यक्ति इसमें रुचि नहीं लेंगे- और उन्हें भी इस विचार से परिचित करेंगे, उनके साथ बात करके, मिल-जुलकर एक-दूसरे को जानेंगे-समझेंगे, कुछ नए मित्र बनाएँगे और इस तरह बहुत से बीमार और घायल व्यक्तियों की मदद करने के अलावा विज्ञान की उन्नति की दिशा में अपना हर संभव योगदान देने का प्रयास करेंगे!

हमें नहीं पता कि आखिरकार कितने लोग आएँगे। साठ से अधिक लोगों से हमें उनके आने की पुष्टि प्राप्त हो चुकी है- लेकिन आप जानते हैं, भारत में क्या होता है- हो सकता है, ज़्यादा लोग आ जाएँ! इसलिए हम भोजन और रहने की व्यवस्था के मामले में आश्रम को अच्छी तरह तैयार करने में लगे हुए हैं और निश्चित ही बहुत पूरे उत्साह के साथ लोगों के आने का और इस कार्यक्रम के शुभारंभ का इंतज़ार कर रहे हैं!

मैं इस कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट रविवार को प्रस्तुत करूँगा!

मोनिका और अस्पताल में उसकी रूममेट – खुशी का अलग-अलग नज़रिया – 27 मई 2015

जब हम मोनिका के साथ अस्पताल में थे तो उसके पड़ोस में एक मलावी की 15 साल की लड़की भी भर्ती थी, जो अपनी माँ के साथ अपने दिल के दो वॉल्व बदलवाने भारत आई थी और कुल मिलाकर दो माह यहाँ रहने वाली थी। जब दोनों लड़कियाँ आपस में बात करतीं तो मैं सोचता कि दोनों लड़कियाँ अलग-अलग कारणों से अस्पताल आई हैं और पता नहीं एक-दूसरे की चिकित्सा संबंधी समस्याओं को जानने के बाद दोनों अपने-अपने बारे में क्या महसूस करती होंगी। और दोनों को इतनी विकट समस्याओं से ग्रसित देखने के बाद हमें, हम जैसे ‘स्वस्थ’ लोगों को अपने बारे में क्या और कैसा महसूस करना चाहिए।

दोनों लड़कियाँ अपनी-अपनी समस्याओं से काफी समय से पीड़ित हैं और उनकी बीमारी के कारण उनके परिवार भी बहुत दुखी हैं। दोनों की शल्यक्रियाएँ एक ही अस्पताल में हुई हैं, एक कई देशों को पार करके बेहतर इलाज और अच्छी सेवाओं की आस में यहाँ आई है और दूसरी पास ही से यहाँ पहुँची है। दोनों की शल्यक्रियाएँ सफल रही हैं लेकिन दोनों को पूरी तरह स्वस्थ होने में अभी काफी वक़्त लगेगा।

कौन ज़्यादा तकलीफ में है और कौन कम पीड़ित है?

मोनिका का चकत्तों से भरा चेहरा और बड़ी-बड़ी सफ़ेद पट्टियों में लिपटा शरीर देखकर उस किशोर अफ़्रीकी लड़की के मन में क्या आता होगा, मैं इसकी कल्पना भर कर पा रहा हूँ। सहानुभूति, शायद दया? शायद वह सोचती होगी: ‘मेरे शरीर पर भी दो बड़े-बड़े निशान हैं मगर कम से कम उन्हें कोई देख नहीं सकता!’ मुझे लगता है, निश्चित ही वह अपनी साफ़, बिना जली त्वचा में बड़ी खुश होगी।

दूसरी तरफ मोनिका उसके साथ वाले बिस्तर के पास खड़ी लड़की की ओर देखती है, जो अचानक अपना हाथ अपनी छाती पर दबा लेती है-दर्द उसके चेहरे पर पल भर के लिए उभरता है और फिर सामान्य हो जाता है। अब सिर्फ शल्यक्रिया का ज़ख्म ही दर्द करता है लेकिन इस दर्द से उपजे डर की आप कल्पना कर सकते हैं क्योंकि वह जानती है कि उसका दिल पूरी तरह उसका अपना असली दिल नहीं है बल्कि उसके दो वॉल्व बदले गए हैं और वह अभी भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुआ है! उसकी धड़कन कभी भी रुक सकती है और कृत्रिम अवयव अचानक काम करना बंद कर सकते हैं। ‘कम से कम मेरे ज़ख्म और चकत्ते सिर्फ बाहरी हैं!’ मोनिका महसूस करती होगी। देखने में अच्छे नहीं लगते मगर जान का उसमें कोई जोखिम नहीं है!

दोनों लड़कियाँ जल्द ही ठीक हो जाएँगी, फिर से खेलने-कूदने लगेंगी और जीवन का मज़ा लेंगी-क्योंकि चाहे कुछ भी हो, बच्चे यही करते हैं। दोनों बहुत सुंदर हैं, छोटे, बड़े, दो या कई सारे चकत्तों के बावजूद। दोनों एक-दूसरे की तरफ देखती हैं और अपने-अपने ज़ख़्मों की तुलना दूसरी के ज़ख़्मों से करती हैं। और जब हम उनकी तरफ देखते हैं तो हमें क्या नज़र आता है, हम क्या सोचते हैं और क्या महसूस करते हैं?

सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार अच्छी चीज़ है। यह मोनिका जैसी बच्ची के लिए बहुत लाभकारी हो सकता है, जिसे यह सब कभी न मिल पाता, अगर उसे संवेदनशील लोगों का सान्निध्य नहीं मिलता, उसके आसपास या दुनिया में सहानुभूतिपूर्ण और दयालु लोग नहीं होते!

इस सहानुभूतिपूर्ण रवैये से आपको कुछ वैसा प्राप्त होगा, जिसे सुकून या कृतज्ञता कहा जा सकता है। यह ख़ुशी कि आपके शरीर पर किसी प्रकार के चकत्ते नहीं हैं, यह संज्ञान कि आपकी समस्याएँ, दरअसल, इन किशोरवय लड़कियों की तुलना में कितनी छोटी, कितनी अमहत्वपूर्ण हैं!

मुझे लगता है कि बीच-बीच में हमें इन भावनाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करते रहना चाहिए: इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस परिस्थिति से दो-चार हैं, जिसकी आप शिकायत कर रहे हैं, कोई न कोई है, जो उससे भी अधिक विकट परिस्थिति में फँसा हुआ है लेकिन मजबूती और हिम्मत के साथ हँसते हुए उसका सामना कर रहा है! जी हाँ, वह खुश है क्योंकि उसकी सोच सकारात्मक है, वह जानता है कि कैसे जीवन की कदर की जाए, हर हाल में जीवन का मज़ा लिया जाए! आप परेशान हैं क्योंकि आपकी शक्ल वैसी नहीं है, जैसी आप कल्पना करते रहते हैं, अपनी नज़र में आप बदसूरत हैं क्योंकि आपके बाल झड़ते जा रहे हैं, आपकी छातियाँ बहुत छोटी-छोटी हैं या बहुत बड़ी हैं या आपकी मांसपेशियाँ वैसी सुडौल नहीं हैं, जैसी आप चाहते हैं। आप जीवन की छोटी-मोटी बातों के लिए दुखी हैं। अपनी सोच को विस्तार दीजिए, सामने मौजूद विशाल दृश्य पटल पर नज़र दौड़ाइए और यह समझने की कोशिश कीजिए कि आप जैसे भी हैं, आपके पास जो कुछ भी है, वही आपके लिए पर्याप्त है, उतने भर से आप खुश रह सकते हैं!

मोनिका की दूसरी शल्यक्रिया: उसकी बाईं आँख, दाहिनी बाँह और दाहिनी छाती – 26 मई 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हमारा पिछला हफ्ता दिल्ली के पास स्थित गुड़गाँव नामक शहर में गुज़रा, जहाँ हम मोनिका को लेकर अस्पताल गए थे, जहाँ उसकी दूसरी शल्यक्रिया की जानी थी। आज मैं आपको उस शल्यक्रिया के बारे में बताना चाहूँगा और साथ ही यह भी कि अब उसकी हालत कैसी है।

डॉक्टर द्वारा जाँच कर लिए जाने के बाद हमने तय किया कि उसकी शल्यक्रिया जल्द से जल्द करवाई जाए और अगली शल्यक्रिया के लिए हमने पिछले शनिवार, 23 मई का दिन नियत किया। स्वाभाविक ही रमोना और मैं और हमारे साथ अपरा भी पूरे समय मोनिका और उसकी माँ के साथ रहने वाले थे। आश्रम से हम शुक्रवार के दिन चले और दोपहर को मोनिका को अस्पताल में भर्ती करा दिया, रात के भोजन के बाद शल्यक्रिया हो जाने तक उसे कुछ भी खाना-पीना नहीं था।

दो घंटे की शल्यक्रिया के बाद और लगभग इतने समय बाद ही होश आने पर मोनिका को उसके कमरे में स्थानांतरित कर दिया गया। उसके सिर, बाँह और बाँह से होते हुए पूरी छाती पर सफ़ेद पट्टियाँ बंधी थीं। स्वाभाविक ही, उसकी बाईं आँख ढँकी हुई थी और दाहिनी बाँह मजबूत पट्टियों से कसकर बंधी हुई थी, जिसने उसकी बाँह को शरीर से 90 अंश के कोण पर ऊपर उठा रखा था।

लेकिन डॉक्टरों से बात करने पर हमें पता चला कि उन्होंने सिर्फ मोनिका की आँख और बाँह पर ही काम नहीं किया था: उन्हें उसकी दाहिनी छाती के ऊपरी हिस्से में सूजन नज़र आई थी और उन्होंने शल्यक्रिया के दौरान ही निर्णय लिया था कि उस प्रभावित त्वचा को निकालकर, उसे भी जांघ से निकाली जाने वाली त्वचा से प्रतिरोपित कर दें। इस हेतु और बाँह के नीचे किए जाने वाले प्रतिरोपण हेतु उन्होंने पुनः उसकी बाईं जांघ से त्वचा निकाली, जहाँ से पहले भी वे त्वचा निकाल चुके थे। शल्यचिकित्सक ने हमें बताया कि उन्होंने आपस में सलाह मशविरा किया और उसी पैर की त्वचा का इस्तेमाल करने का निर्णय लिया-दूसरी जांघ को बाद में आवश्यक होने पर इस्तेमाल करने के लिए छोड़ दिया, क्योंकि मोनिका पर भविष्य में भी कई शल्यक्रियाएँ की जानी आवश्यक होंगी।

रविवार के दिन हमें झटका सा लगा जब हमने देखा कि मोनिका के पैरों की पट्टियाँ और साथ ही उसकी पैंट और बिस्तर की चादर रक्त से सने हुए हैं! पट्टियाँ बदलने के बाद हमें बताया गया कि यह एक सामान्य घटना है और कुछ देर में सब कुछ ठीक हो जाएगा। बाद में, सोमवार तक पट्टियों पर खून नज़र नहीं आया।

अभी मोनिका को हफ्ते भर और अस्पताल में रहना होगा। गुरुवार को पहली बार मोनिका की पट्टियाँ बदली जाएँगी और उसके बाद हमें देखना होगा कि उसे कब अस्पताल से छुट्टी मिलती है। निश्चित ही पिछली बार की तरह इस बार भी उसे आसपास के किसी गेस्ट हाउस में कुछ समय के लिए रहना होगा, जिससे डॉक्टर हर दूसरे दिन उसका मुआयना कर सकें। पिछली बार की तरह, जब उसकी गरदन पर शल्यक्रिया की गई थी, इस बार उसे पूरे समय बिस्तर पर लेटे नहीं रहना होगा। संभवतः शुक्रवार से वह उठकर बैठ सकेगी और शायद चल-फिर भी सके।

वह अभी से काफी तंदरुस्त लग रही है और माँ से कभी अपने पैरों की, तो कभी हाथों की, तो कभी गरदन की मालिश करने के लिए कहती रहती है। जब डॉक्टर आए तो उसने पूछा कि क्या अब वह ठोस खाना नहीं खा सकती क्योंकि उसे अब तक मिलने वाले सूप ज़्यादा पसंद नहीं हैं-और लो, उसका अनुरोध मान्य कर लिया गया! तो परिस्थितियों के अनुरूप, मोनिका ठीक-ठाक है, तेज़ी के साथ स्वास्थ्य लाभ कर रही है और उसका मन तरोताजा और उत्फुल्ल है!

मोनिका के बारे में मेरे पिछले ब्लॉग आप यहाँ पढ़ सकते हैं और उसकी मदद के हमारे काम में हाथ बंटा सकते हैं!

मोनिका ने डॉक्टरों को बताया कि उसकी पिछली शल्यक्रिया से उसे कितना लाभ हुआ और अब दूसरी शल्यक्रिया की योजना – 25 मई 2015

मैं हाल ही में दिल्ली में एक सप्ताह गुज़ारकर लौटा हूँ। दरअसल, गुड़गाँव में, जहाँ के एक अस्पताल में मोनिका का इलाज चल रहा है। आपको मोनिका याद होगी, जो एक दुर्घटना में बुरी तरह जल गई थी। आप उसके बारे में मेरे ब्लॉग यहाँ पढ़ सकते हैं। पिछले शनिवार के दिन उसकी दूसरी शल्यक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हुई!

मोनिका पर हुई पहली शल्यक्रिया की सफलता के बारे में मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ। उस समय शल्यक्रिया के बाद एक सप्ताह वह अस्पताल में रही थी और फिर एक माह तक पास स्थित एक गेस्ट हाउस में, क्योंकि उसे हर दूसरे दिन पट्टियाँ बदलवाने अस्पताल जाना पड़ता था।

उसके बाद वह वृन्दावन वापस आ गई थी और फिर स्कूल भी आने लगी। वास्तव में समय का यह अचूक सदुपयोग था-एक तरह से वह सर्दियों की छुट्टियों में गई और छुट्टियाँ खत्म होने के कुछ दिन बाद वापस आ गई और इस तरह उसकी स्कूली पढ़ाई ज़्यादा नुकसान नहीं हुआ!

उसने तेज़ी के साथ स्वास्थ्य लाभ किया है लेकिन अपनी गरदन सीधी रखने के लिए उसे सामने की तरफ एक कॉलर पहनना पड़ता है-और गरदन सीधी रखना परम आवश्यक है क्योंकि अन्यथा शल्यक्रिया द्वारा प्रतिरोपित त्वचा नीचे झूल जाएगी और इतने दिनों की मेहनत और आर्थिक व्यय पर पानी फिर जाएगा। वह अपनी जली हुई त्वचा और चकत्तों पर दिन में कई बार तेल लगाती है और माँ रोजाना उसकी त्वचा की मालिश भी करती है।

इस स्कूली सत्र की अंतिम परीक्षा के बाद हम मोनिका को लेकर पुनः डॉक्टर के पास गए थे। पिछले महीने, दागों में सुधार हो रहा है या नहीं, इसकी दोबारा जाँच के लिए डॉक्टर ने उसे पुनः बुलाया था। डॉक्टर उसे देखकर बहुत खुश हुए और पूछा कि शल्यक्रिया के पहले की और बाद की स्थितियों के बीच उसे क्या अंतर महसूस हो रहा है। उसने बताया कि पहले वह अपनी गरदन हिला-डुला नहीं पाती थी और उसे अपनी ठुड्डी नीचे रखनी पड़ती थी और अब ये दोनों हरकतें वह आसानी के साथ कर पाती है और सिर को भी दोनों तरफ और नीचे-ऊपर चला पाती है। यह बहुत बड़ी कामयाबी है और एक सुखद क्षण।

उसी समय हमने अगली शल्यक्रिया की योजना बना डाली थी। डॉक्टर की सलाह थी कि मई में शल्यक्रिया की जाए और हम इस पर सहमत हो गए क्योंकि तब गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी होंगी और स्कूली पढ़ाई में बिना अधिक व्यवधान के उसकी शल्यक्रिया भी हो जाएगी और वह कुछ दिन स्वास्थ्यलाभ भी कर सकेगी। इसके अलावा, वह साल का सबसे गरम समय होगा और उसे यह समय शानदार एयर कंडीशंड कमरों में व्यतीत करने का मौका भी मिल जाएगा! उनके घर में सिर्फ एक पंखा है और जब बिजली चली जाती है तो स्वाभाविक ही, वह भी काम नहीं करता! और निश्चित ही, विशेष रूप से मोनिका के लिए गर्मी बहुत अधिक तकलीफदेह होती है!

जहाँ त्वचा का प्रत्यारोपण किया गया था, उस जगह की जाँच और दूसरे चकत्तों को देखने के बाद डॉक्टर ने पूछा कि उसे बाईं आँख, मुँह और दाहिनी बाँह की इन तीन चिकित्साओं में से कौन सा काम अधिक आवश्यक लगता है, जिसके सम्पन्न हो जाने पर उसकी सामान्य कार्यक्षमता में अधिक से अधिक इजाफा हो सकेगा। उसने उत्तर दिया कि वह सबसे पहले दाहिनी बाँह की, जिसे फिलहाल वह सिर्फ 90 अंश तक ही उठा पाती है, चिकित्सा चाहती है, जिससे वह उसे पूरी तरह उठाने में सक्षम हो जाए।

किन्तु डॉक्टर का कहना था कि आँख भी बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए वह दोनों की एक साथ, मिली-जुली शल्यक्रिया और चिकित्सा करेंगे: बाईं आँख पर काम किया जाएगा, जिससे वह पलकों को बंद कर सके और साथ ही दाहिनी बाँह को भी मुक्त कर सके।

डॉक्टर ने बताया कि जिस तरह गरदन और कॉलर के साथ किया था, शल्यक्रिया के बाद बाँह को भी एक फ्रेम में कसकर रखा जाएगा, जिससे प्रत्यारोपित त्वचा एक साथ खिंचकर झूल न जाए। और इसलिए मोनिका को इस बार फिर कुछ दिन और अस्पताल में रहना होगा और उसके बाद, पिछली बार की तरह, अस्पताल के आस-पास किसी गेस्ट हाउस में भी, जिससे उसकी नियमित जाँच हो सके और पट्टियाँ बदली जा सकें।

कल मैं आपको इस शल्यक्रिया और अपने सप्ताहांत के बारे और भी बहुत कुछ बताऊँगा।

अगर आप भी मोनिका की मदद करना चाहते हैं या उसके इलाज और स्वास्थ्य लाभ के संबंध में कोई आर्थिक मदद करना चाहते हैं तो आप यहाँ पढ़कर अपनी आर्थिक मदद भिजवा सकते हैं। शुक्रिया!

पैरों में विकलांगता और लगातार दर्द – पोलियो नहीं सिर्फ विटामिनों की कमी – हमारे स्कूल के बच्चे – 20 मार्च 2015

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल के एक लड़के और एक लड़की से करवाना चाहता हूँ, जिनके नाम क्रमशः अर्जुन और खुशबू हैं। जब आप खुशबू की ओर देखते हैं तो आपको हमारे स्कूल की दूसरी लड़कियों की तरह एक सामान्य लड़की नज़र आती है। लेकिन जब आप एक नज़र अर्जुन पर डालते हैं तो आप तुरंत समझ जाते हैं कि वह अपनी कक्षा के दूसरे लड़कों जैसा नहीं है: 14 साल के अर्जुन के पैर कुछ विकृत नज़र आते हैं, उसका शरीर छोटा है और अपने सहपाठियों से लगभग आधा तथा अपनी 13 वर्षीय बहन से भी बमुश्किल आधा है।

खुशबू उम्र में परिवार की सबसे छोटी संतान है। उसका सबसे बड़ा भाई 22 साल का है, दूसरा 17 साल का, फिर अर्जुन है और अंत में वह। उसका पिता एक मजदूर है और जब भी और जो भी काम उसे मिल पाता है, कर लेता है। काम ढूँढ़ना पड़ता है और जब मिल जाता है तब वह दिन भर में 250 रुपए यानी लगभग 4 डॉलर रोजाना कमा लेता है।

सबसे बड़े लड़के ने छठी कक्षा के बाद स्कूल जाने से मना कर दिया और धार्मिक नाटक-मंडलियों में शामिल हो गया, जहाँ पहले रोजाना 60 रुपए यानी लगभग 1 डॉलर उसे मिला करते थे, जो अब, 10 साल बाद 100 रुपए यानी लगभग डेढ़ डॉलर हो गए हैं। खाना-नाश्ता अलग से वहीं मिल जाता है। इस तरह पिता और पुत्र मिलकर दूसरे लड़के की स्कूल-फीस भरते हैं-लेकिन उसके बाद बाकी दोनों बच्चों के लिए उनके पास ज़्यादा कुछ बचता नहीं है! और यही कारण है कि अब वे दोनों हमारे स्कूल में पढ़ रहे हैं।

जब तीन साल पहले अर्जुन हमारे स्कूल आया था तो हमने उसकी माँ से उसके अंग्रेज़ी के x आकार के पैरों के बारे में पूछा था। उसने तब बताया था कि अर्जुन को पोलियो की बीमारी है। स्वाभाविक ही उसे चलने में बड़ी दिक्कत होती है लेकिन फिर भी वह एक खुशमिजाज़ बच्चा है और दिन भर बच्चों के साथ खेलता रहता है और खूब दौड़-भाग करता है। यहाँ तक कि वह योगासन भी करता है और काफी अच्छी तरह करता है!

जब अर्जुन तीन साल का था तभी से उसे पैरों की यह तकलीफ शुरू हो गई थी। उसके पैर पहले टेढ़े पड़ने लगे और गलत दिशा में मुड़ गए, जिससे उसके पैरों में दर्द रहने लगा। परिवार उसके पैरों की मालिश इत्यादि करते थे और सोचते थे कि उसे लाभ मिल रहा है लेकिन समय बीतने के साथ स्पष्ट होता गया कि पैरों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। किसी ने कहा कि उसे पोलियो है, लिहाजा उन्होंने भी मान लिया और शांत बैठ गए-लेकिन सिवा पैरों की विकृति और उसके साथ उभरने वाले दर्द के बच्चे में पोलियो के और कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ रहे थे। कुछ साल बाद शहर में लगे एक मुफ्त पोलियो कैंप में वे उसे दिखाने ले गए। तब तक उसके पैर x आकार के हो चुके थे, जिन्हें देखते ही डॉक्टरों ने कहा कि इस बीमारी में शल्यक्रिया से लाभ हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता। अब, शल्यक्रिया के डर से कि उसमें भीषण दर्द होगा और यह भी निश्चित नहीं है कि बच्चा ठीक हो ही जाएगा, उन्होंने शल्यक्रिया नहीं करवाई।

इस तरह समय गुज़रता रहा और सभी यही समझते रहे कि अर्जुन को बचपन से ही पोलियो है। यह तो जब हम उसके घर गए और हमें पता चला कि उसे न तो किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाया गया है और न ही आधिकारिक तौर पर किसी डॉक्टर ने आज तक बीमारी की पोलियो के रूप में पहचान की है, हम उसे डॉक्टर के पास ले गए। रक्त की जाँच और एक्स रे की जाँच के बाद पता चला कि शायद अर्जुन बचपन से आज तक विटामिनों और खनिजों की कमी के कारण यह कष्ट भुगतता रहा है। इस कारण उसकी हड्डियाँ ठीक तरह से विकसित नहीं हो पाईं और कमजोर होती गईं। उनमें अंदरूनी दरारें पड़ती गईं और दर्द रहने लगा। समय पर उनका इलाज नहीं हो पाया और इस तरह आज, बेहतर पोषक आहार ग्रहण करने के बावजूद उसके पैरों की विकृति में और लंबी दूरी तक चलने पर होने वाले घुटनों के दर्द में कोई कमी नहीं आ पा रही है। उसका ऊपरी हिस्सा तो भारी होता जा रहा है मगर पैर अब भी कमजोर हैं और उसके शरीर का वज़न संभालने में अक्षम हैं।

स्थानीय डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये हैं: उनका कहना है कि इस अवस्था में उसका इलाज यहाँ संभव नहीं है। हमारा इरादा उसे किसी बड़े अस्पताल ले जाकर, वहाँ के डॉक्टरों से सलाह लेने का है, जिससे उसके बेहतर भविष्य के लिए भरसक कुछ किया जा सके।

जब कि उसकी बहन और उसके सहपाठी बहुत पहले से अपने लंबे, स्वस्थ पैरों सहित अच्छे-खासे विकसित हो चुके हैं, उसे कीचड़ पार करके अपने एक कमरे वाले घर में प्रवेश करना मुश्किल होता है। लेकिन यह पुनः कहना होगा कि वह खूब सक्रिय और खुशमिजाज़ बालक है और अपने साथियों के साथ खेल-खेल में कुश्ती आदि लड़ने में भी उसे गुरेज़ नहीं होता।

भविष्य में उसका क्या होगा, कहा नहीं जा सकता लेकिन हम उसकी मदद के लिए हमेशा तैयार हैं! अगर आप भी हमारे काम में मदद करना चाहते हैं तो कोई भी सहयोग राशि प्रदान करके हमारी मदद कर सकते हैं-हर तरह की सहायता बहुमूल्य होती है!

दर्द, नुकसान और राहत – 25 जनवरी 2015

मेरे शरीर का एक हिस्सा उखाड़कर निकाला जा रहा है। यह बड़ा हिंसक और रक्तरंजित है।

मुझे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा है।

प्रतिरोध असंभव है- मेरी ज़बान सुन्न है जैसे लकवा मार गया हो, अस्पष्ट फुसफुसाहटों के अतिरिक्त कुछ भी पैदा करने में असमर्थ।

मैं यह होने दे रही हूँ। मैंने नियति के सम्मुख समर्पण कर दिया है।

मशीनों की खरौंचों, अपने मांस पर चलती आरियों के बीच मैं स्थिरचित्त बैठी हुई हूँ। एक बार आँख झपकाई है, एक बार आह भरी है, बस।

ऊपर तेज़ प्रकाश है। चमकदार, इतना चमकदार कि कमरे का बाकी हिस्सा धुंधले साए में समा गया है। यह रुचिकर नहीं है। लेकिन यह अंत नहीं है।

अचानक मैं कमर सीधी करके नीचे, उधर देखती हूँ जहाँ वह दिखाई दे रहा है जो कुछ समय पहले तक मेरे शरीर का हिस्सा था।

दो टुकड़े, हड्डियों जैसे, चार छोटे-छोटे पैर, मुड़े-तुड़े, टूटे-फूटे।

मैं उनकी अनुपस्थिति महसूस कर रही हूँ, जैसे अपने मांस में कोई सूराख। उनके निशान वहाँ मौजूद हैं।

अलविदा, अक्कल-दाढ़, मेरी अक्कल-दाढ़, अलविदा!

🙂

इस गद्यांश की लेखक: मेरी पत्नी रमोना। परसों दो खराब निचली अक्कल-दाढ़ों को शल्यक्रिया द्वारा निकलवाने के तुरंत बाद लिखा गया। वैसे चिंता न करें, वह स्वस्थ हैं और निश्चय ही नुकसान के एहसास से उबर चुकी हैं।

चिकित्सा क्षेत्र के पेशेवर लोगों के लिए – आवश्यक जुड़ाव और दूरी – 20 जनवरी 2015

कल मैंने आपको बताया था कि मैं पिछले कई हफ्तों और महीनों से कितना व्यस्त रहा हूँ और यह भी कि इस बात से वास्तव में अब हम बड़ी खुशी महसूस कर रहे हैं। क्योंकि हमने कई घंटे अस्पताल में बिताए हैं, मेरे मन में उन लोगों के विषय में बहुत से विचार आ रहे हैं, जो वहाँ काम करते हैं- क्योंकि डॉक्टर या नर्स से अधिक अपने काम में व्यस्त रहने वालों की आप कल्पना नहीं कर सकते।

सबसे पहली बात तो यह कि आपको वास्तव में अपने काम से प्रेम करना चाहिए, तभी आप उसे ठीक तरह से कर पाएँगे। मुझे लगता है कि चिकित्सा-क्षेत्र में काम करने वालों पर यह और अधिक लागू होता है। यह एक प्रायोगिक काम है जिसे हाथों से करना होता है। नर्स, डॉक्टर यहाँ तककि उनके सहायक तक को पूरे समय लोगों के साथ, उनके करीब रहना होता है लेकिन वे वह सामान्य, सुविधाजनक दूरी बनाए नहीं रख सकते जो सामान्यतः दूसरे हर क्षेत्र में काम करने वाले बनाए रख पाते हैं। दूसरों को छूना आवश्यक होता है, दूसरों के शरीर के विभिन्न हिस्सों को नजदीक से देखना, उनकी बात सुनना ज़रूरी होता और वह भी पूरी बारीकी, एकाग्रता और तन्मयता के साथ!

वे लंबी शिफ्टें करते हैं और सारा दिन पूरी तरह उसी माहौल में रहते हैं: आपातकालीन फर्ज़, लंबी शल्यक्रियाएँ, मरीजों के इलाज के पहले और बाद में पेश आने वाली चिकित्सकीय चुनौतियाँ, सफलता के किस्से और त्रासदियाँ। अपने काम में पूरी तरह संलग्न हुए बगैर कोई चारा नहीं। साथ ही हर समय अपने आपको चैतन्य और तरोताजा बनाए रखने के लिए उन्हें अपने मरीजों से एक खास पर्याप्त दूरी भी बनाकर रखनी पड़ती है।

हर व्यक्ति अपने लिए अपनी निजी ज़िंदगी भी चाहता है। दूसरों के लिए किए जा रहे किसी काम के लिए अपने आपको 100% समर्पित कर देना असंभव होता है। ऐसा काफी समय तक, बहुत लंबे समय तक भी संभव हो सकता है लेकिन अगर आप अपने निजी जीवन के लिए वक़्त नहीं निकालते तो कभी न कभी ऐसा एक लम्हा आएगा जहाँ आप टूट जाएँगे!

मरीज आते रहेंगे और इलाज कराके वापस चले जाएँगे। कुछ अधिक दिन रहेंगे और उनके साथ आप एक तरह का जुड़ाव महसूस करने लगेंगे जबकि कुछ लोग एकाध दिन के लिए आएँगे और चल देंगे। कुछ कहानियाँ होंगी, जो आपके मन को छू लेंगी-जैसे मोनिका की कहानी ने हमारे अस्पताल में कई दिलों को भीतर तक स्पर्श किया। आप दूसरों की सेवा करके, उनके लिए चिंतित होकर और उनकी देखभाल करके गौरवान्वित महसूस करेंगे।

दुर्भाग्य से ऐसे भी लोग आपके पास लाए जाएँगे, जिनके लिए किसी भी तरह की सहायता में देर हो चुकी होगी। तब आपको उनकी मदद करनी होगी, जो पीछे छूट जाएँगे।

यह सब सोचते हुए मैं एक बार फिर सबका ध्यान इस बात की ओर ले जाना चाहता हूँ कि यह काम हम सबके लिए कितना बहुमूल्य है। उन सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया जो चिकित्सा क्षेत्र में काम कर रहे हैं। और उनके लिए एक सलाह भी: याद रखें कि आपकी भी अपनी एक निजी ज़िंदगी है और उसका भी आपको खयाल रखना है। आपको अपने काम से एक दूरी बनाए रखनी है, छोटी सी मगर एक आवश्यक दूरी, भले ही आप कितना भी अपने काम के प्रति समर्पित हों!

आपरेशन के बाद मोनिका के पिता या परिवार का कोई सदस्य न तो अस्पताल आये और न ही फोन किया! 29 दिसंबर 2014

पिछले 48 घंटों से आश्रम में होने के बाद भी मैं और रमोना हर वक़्त मोनिका के बारे में ही सोचते रहे हैं। सिर्फ यह नहीं कि अब, शल्यक्रिया के बाद उसका क्या हालचाल है-जैसी परिस्थितियाँ थी उसके अनुसार इसका उत्तर यही है कि हाल बहुत अच्छा है-बल्कि उसके परिवार के बारे में, आसपास के माहौल के बारे में, शनिवार को उसे अस्पताल में छोड़ आने के बाद वहाँ हुए अपने अनुभवों के बारे में और छोटी-छोटी बातों और घटनाओं के बारे में, जिनके बारे में हम इस बीच चर्चा करते रहे हैं। इन सभी बातों पर अपना आँखों देखा हाल और अपने विचार आपके सामने रखने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।

शनिवार को मोनिका से मिलकर ही हम वृन्दावन वापस लौटे थे। वह जाग रही थी और प्रसन्न थी। वह फलों का रस पी पा रही थी और उसने कहा कि जो पनियल सूप उसे दिया गया था वह स्वादिष्ट नहीं था। मैंने शल्यक्रिया करने वाले डॉक्टरों से बात की तो उन्होंने बताया कि सब कुछ ठीक-ठाक है और मोनिका को अभी कुछ दिन और अस्पताल में रहना होगा, जिससे वे उसके ज़ख़्मों की ठीक तरह से निगरानी कर सकें।

उसके बाद वे हर दूसरे दिन उसकी पट्टियाँ बदलेंगे। क्योंकि हर दूसरे दिन पट्टियाँ बदलवाने के लिए तीन घंटा अस्पताल आने में और वापस घर जाने में मोनिका को थकान हो जाएगी, हम मोनिका और उसकी माँ के लिए अस्पताल के आसपास दो हफ्तों या एक माह के लिए किराए के किसी कमरे का इंतज़ाम करने की कोशिश कर रहे हैं। वहाँ से, जब भी आवश्यकता होगी, वह आसानी के साथ अस्पताल आ-जा सकेगी और इस तरह जल्दी स्वस्थ भी हो सकेगी!

अब यहाँ का हाल सुनिए। जलती हुई लपटों पर अपने दोनों हाथ थामे हम कभी-कभी मोनिका के ज़ख़्मों और उस शारीरिक और मानसिक पीड़ा के बारे में सोचते हैं, जिन्हें वह पिछले दिनों भोगती रही है! शल्यक्रिया से पहले, जब वह थोड़ा बेचैन दिखाई दे रही थी, हमने उसे दिलासा देते हुए कहा था कि परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है, जितना तुमने पिछले दिनों सहा है, उससे बुरा तुम्हारे साथ कुछ भी नहीं हो सकता!

मोनिका की माँ अपनी बेटी की देखभाल करने, उसके साथ बातचीत करने, उसका हाथ हाथों में लेकर प्यार करने और उसके साथ हँसी-मज़ाक करने के लिए उसके साथ ही रह रही है, जिससे उसे अकेलापन महसूस न हो और उसका हौसला भी बना रहे। और मोनिका का हालचाल लेने के उद्देश्य से हम भी लगातार उसकी माँ के संपर्क में बने रहते हैं। अस्पताल की नर्सें, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, बहुत ही दोस्ताना और मददगार हैं और हमें विश्वास है कि वे मोनिका की उचित प्रकार से देखभाल करती रहेंगी!

और यह अच्छी बात ही हुई-क्योंकि उसकी माँ और हम लोगों के अलावा मोनिका से न सिर्फ मिलने कोई नहीं आया बल्कि हालचाल लेने के लिए फोन तक किसी ने नहीं किया! न तो उसका पिता उसे देखने आया, न ही परिवार का कोई दूसरा सदस्य! अभी तक पिता को यह भी नहीं पता कि मोनिका की शल्यक्रिया हुई या नहीं, हुई तो कैसी रही या अब उसकी बेटी का क्या हाल है! उसे अपनी बेटी से कोई लेना-देना ही नहीं है! घर से एक फोन तक नहीं आया। यह सोच पाना बड़ा कठिन है मगर हम जब-तब अपने मित्रों, शुभचिंतकों और मददगारों की शुभकामनाएँ मोनिका तक पहुँचाते रहते हैं और उसे बताते हैं कि दुनिया में बहुत से लोग हैं, जो उसके लिए चिंतित हैं, उसकी मदद को आतुर हैं और चाहते हैं कि वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाए!

ऐसा नहीं था कि हम उसे अस्पताल में सिर्फ भर्ती भर कराके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते। हम किसी को उसके साथ भेज भी सकते थे और तब हमें सब कुछ खुद नहीं करना पड़ता। लेकिन हम सब कुछ खुद करना चाहते थे। हम उनके साथ वहाँ खुद रहना थे और हमारे लिए भी यह अच्छा अनुभव रहा और अब भी है। जब आप किसी व्यक्ति की मोनिका जैसी त्रासद परिस्थिति में उसके साथ रहते हैं और उसकी मदद में तहे दिल से लगे रहते हैं तो आप सशरीर, दिलोदिमाग के साथ अपने आपको उस काम में झोंक देते हैं!

अब पूर्णेन्दु, रमोना, अपरा और मैं थोड़े समय के लिए अमृतसर जा रहे हैं। ज़ख्मी अवस्था में मोनिका के स्कूल आने से पहले ही हमारा वहाँ जाने का कार्यक्रम तय था और होटल और टिकिट बुक हो चुके थे। कुछ दिन हम वहाँ आराम करेंगे और लोगों से मिलेंगे-जुलेंगे, कुछ घूमना-फिरना होगा-मगर मोनिका हमारे दिमाग में हर वक़्त बनी रहेगी और निश्चय ही हम उसके और उसके डॉक्टरों के संपर्क में रहेंगे। वापसी में, 2 जनवरी के दिन हम उससे मिलने अस्पताल जाएँगे और जैसा कि डॉक्टरों ने कहा है, वही समय उसके अस्पताल से छुट्टी पाने का होगा, इसलिए उस दिन हम उसे उसके कमरे में खुद लेकर आएँगे। इस विषय में मैं आपको बताता ही रहूँगा!

मोनिका की पहली सर्जरी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई – 26 दिसंबर 2014

आज मैं यह ब्लॉग दिल्ली के पास स्थित शहर गुड़गांव से लिख रहा हूँ। आर्टेमिस हॉस्पिटल से अच्छी खबर है: आज मोनिका पर पहली शल्यक्रिया की गई है! उसकी दाहिनी आँख और गरदन पर डॉक्टरों ने अभी-अभी एक महत्वपूर्ण काम सफलतापूर्वक अंजाम दिया है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आजकल इतना बड़ा काम काफी कम समय में पूरा हो जाता है। जब से हमने आपको मोनिका के विषय में बताना शुरू किया है कि उसके इलाज को लेकर हम किस तरह आगे बढ़ेंगे, तभी से हम यही आशा कर रहे थे कि किसी न किसी प्रकार से इसी साल हम उसकी पहली शल्यक्रिया करवा पाएँगे।

और बहुत से उदार मददगारों, मित्रों और अन्य लोगों की सहायता से, जो मोनिका की कहानी से द्रवित हुए, हम यहाँ तक पहुँचे है! उन सबका धन्यवाद, जिन्होंने इस पीड़ा को साझा किया और आर्थिक मदद की!

पिछले शनिवार को ही मोनिका को लेकर मैं यहाँ पहुँच गया था और सारा दिन शल्यक्रिया से पहले होने वाले विभिन्न परीक्षण करवाता रहा: खून और पेशाब की जाँच, एक्स-रे और चेतनाशून्य करने से पहले होने वाले परीक्षण आदि। सब कुछ ठीक-ठाक रहा, सिर्फ चेतनाशून्य करने वाले डॉक्टर ने कुछ परेशानी व्यक्त करते हुए बताया कि क्योंकि मोनिका मुँह नहीं खोल पाती, एक पाइप भीतर डालकर उसके श्वसन को सुनिश्चित किया जाएगा। लेकिन एक बार फिर हमें इस अस्पताल के चुनाव पर संतोष हुआ-उन्होंने हमें धैर्यपूर्वक और मित्रतापूर्ण लहजे में सब कुछ समझाया कि बिना किसी विशेष परेशानी के यह कैसे किया जाएगा।

और इसलिए हम कल ही पहुँच गए थे। हमारे साथ उल्लास में दमकती मोनिका, उसकी माँ और प्रसन्नचित्त अपरा भी थी, जिसे लग रहा था, जैसे वह कहीं छुट्टियाँ मनाने निकली हो, क्योंकि हम लोग अस्पताल के पास ही एक होटल में रुके थे।

मोनिका को भर्ती करा दिया गया और उसे खाना देना बंद कर दिया गया, जिससे वह दूसरे दिन यानी आज सबेरे होने वाली शल्यक्रिया के लिए समुचित रूप से तैयार हो सके। शल्यक्रिया आज आठ बजे शुरू हुई और उसमें लगभग तीन घंटे लगे। मोनिका को होश में आने में काफी समय लगा और स्वाभाविक ही उसकी आँखों और गरदन पर बहुत सारी पट्टियाँ बंधी थीं (बड़ा सा बैंडेज बंधा था), लेकिन वह मुस्कुरा रही थी!

सब कुछ अच्छी तरह से सम्पन्न हो गया। अब उसे पूरी तरह स्वस्थ होने के लिए कुछ समय आराम करने की ज़रूरत है। कुछ दिन वह अस्पताल में ही रहेगी और उसे अपनी आँखों पर कुछ समय पट्टियाँ बांधे रखना होगा और बाद में दो सप्ताह तक आँखों पर शल्यक्रिया के बाद लगाई जाने वाली पट्टी भी लगाए रखनी होगी। लेकिन कुछ हफ्तों में ही वह पुनः अपनी गरदन चलाने में और आँखें बंद करने में समर्थ हो जाएगी! सफल इलाज की ओर पहला कदम रखा जा चुका है!

एक बार पुनः हम उन सभी को धन्यवाद कहना चाहते हैं जिन्होंने अब तक हमारी सहायता की, उन डॉक्टरों और अस्पताल के दूसरे कर्मचारियों का धन्यवाद, जो हमारी सहायता करते रहे और आगे भी करते रहेंगे! यह कितनी खुशी की बात है कि हम सब मिलकर इस पीड़ित बच्ची की सहायता कर सके!