खड़े होकर ऊंचे डेस्क पर कंप्यूटर पर काम करना गरदन, कंधे और कमर के निचले हिस्से में होने वाले दर्द पर कारगर – 7 जनवरी 2014

मैंने अभी भी सन 2013 पर पीछे मुड़कर नज़र दौड़ना नहीं छोड़ा है। बहुत से परिवर्तन साथ लेकर आया यह साल वाकई बड़ा रोमांचक रहा और इस दौरान बहुत से परिवर्तन घटित हुए। उनमें से एक परिवर्तन हमारी पीठ के लिए अच्छा सिद्ध हुआ: हम खड़े होकर काम करने लगे। कई महीनों से हम एक खड़ा ऊंचा डेस्क इस्तेमाल कर रहे हैं और अपने शरीर पर इसका प्रयोग करने के बाद हम कह सकते हैं कि यह काफी सफल प्रयोग रहा!

सामान्यतः रोज़ कई घंटे हम अपने कंप्यूटर के सामने व्यतीत करते हैं। यह ठीक है कि हम घर में होते हैं इसलिए काम रोककर बीच-बीच में अपरा के साथ खेल सकते हैं, थोड़ा चहलकदमी कर सकते हैं या आराम कर सकते हैं, कहीं और जाकर बैठ सकते हैं। लेकिन यह ज़्यादा देर बैठकर काम करना पीठ के लिए ठीक नहीं होता। यह हम जानते थे लेकिन क्या किया जा सकता था? हम इतना ही करते थे कि अपने यौगिक व्यायाम बराबर करते थे और जब भी संभव होता था कंप्यूटर छोड़कर उठ बैठते थे और कोई दूसरा काम करना शुरू कर देते थे। आखिर हमारी पीठ ने ही हमें मजबूर कर दिया कि नहीं, हमें कंप्यूटर पर काम करने के तरीके में कोई न कोई बदलाव लाना ही होगा।

काफी समय से मुझे स्लिप-डिस्क की समस्या रही है। यह दर्द 2006 में बहन की आकस्मिक मृत्यु के बाद पहली बार उभरा था। पता नहीं मुझे स्लिप-डिस्क होने का क्या कारण हो सकता है क्योंकि उस वक़्त मैं कंप्यूटर पर काम बिल्कुल नहीं करता था और न ही कोई भारी और वैसी बड़ी चीज़ें उठाता था। जबकि शुरुआती दर्द कुछ समय बाद खत्म हो गया, कुछ महीनों या सालों बाद वह फिर उभर आया और तब मैंने डॉक्टर के पास जाकर पूरा परीक्षण करवाया। संक्षेप में यह कि यह समस्या मुझे तभी से है और कभी-कभी यह बुरी तरह तकलीफ देती है। विशेषकर लंबे समय तक बैठने के बाद!

जब मेरा यह दर्द रोज़-बरोज की समस्या बन गया और रमोना को भी गर्दन और पीठ के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत रहने लगी तो उसने इस विषय में जानकारी हासिल करने का निर्णय किया और तब उसे खड़े रहकर काम करने के फ़ायदों का पता चला! गूगल और डॉइच बैंक जैसी बड़ी कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को खड़े डेस्क मुहैया कराते हैं और कुछ मित्रों के साथ बात करने पर उन्होंने भी इस बात की पुष्टि की कि उन्हें भी खड़े होकर काम करने की सुविधा मिली हुई है। रमोना ने इस समस्या का और उसके इलाज की विधियों का बारीकी से अध्ययन किया, वीडियोज़ देखे कि कैसे बैठकर काम करने पर रीढ़ की हड्डी धीरे-धीरे घिस जाती है, बैठने और खड़े रहने की उचित मुद्राओं के विषय में पढ़ा और यहाँ तक कि चलती हुई डेस्कों के बारे में भी पढ़ डाला, जिसमें आप एक ट्रेडमिल पर चलते हुए काम कर सकते हैं। स्वाभाविक ही इसमें आपको एक अतिरिक्त लाभ भी प्राप्त होता है क्योंकि इस तरह काम करते हुए आप अपना वज़न भी कम कर रहे होते हैं। लेकिन हमारे लिए यह बहुत दूर की बात थी और हमने फिलहाल इतना ही किया कि अपने लिए खड़े होकर काम करने की सुविधा जुटा ली।

हालांकि शुरू में मुझे शक था कि हम सारा दिन खड़े-खड़े काम कर पाएंगे, फिर भी हमने अपने कार्यालय को पुनर्व्यवस्थित किया और अपने डेस्कों को छोटे-छोटे टेबलों पर रखते हुए अपने कम्प्यूटरों को थोड़ा ऊपर कर लिया, जिससे खड़े रहने पर कंप्यूटर-स्क्रीन्स आँखों के सामने रहें। इसके अतिरिक्त वहीं हमने पैरों के विश्राम हेतु भी थोड़ी सी जगह का प्रबंध किया, जिससे आवश्यकता पड़ने पर एक-एक कर पैर उठाकर वहाँ रखा जा सके।

पहला दिन काफी मुश्किल रहा। पहले हफ्ते भी दिक्कत हुई। मुझे बीच-बीच में कई बार बैठना पड़ता था, लंबे समय तक एकाग्र रह पाना मुश्किल हो गया और बार-बार लगता था, मैं सारा दिन खड़ा नहीं रह पाऊँगा। कई बार हमने टेबलों की ऊंचाई को घटा-बढ़ाकर देखा, जिससे गर्दन में अकड़न पैदा न हो और रमोना तो कुछ दिन स्पोर्ट्स-शूज पहनकर काम करती रही। लेकिन धीरे-धीरे हमारे पैरों के तलवे, टखने और पैरों की मांसपेशियाँ खड़े रहने की अभ्यस्त होती गईं और हमें पता ही नहीं चल पाया कि बैठकर काम करने की तुलना में कब और कैसे खड़े रहकर काम करना हमारे लिए सहज-सामान्य हो गया।

अब यह हमारे लिए काम करने का बहुत अच्छा तरीका बन गया है! जब पैर थोड़े थक जाते हैं, हम एक-एक करके पैरों को थोड़ा उठाकर डेस्क के नीचे रखे स्टूल पर रख लेते हैं। लेकिन हम सारा दिन खड़े नहीं रहते! जब इच्छा होती है हम बैठ जाते हैं। हमारे पास कुछ ऊंचे स्टूल भी हैं, जिनका हम अर्ध-उत्तिष्ठावस्था में (आधा खड़े रहकर) कुछ देर सहारा ले सकते हैं और फिर हमारे पास ऑफिस में पुरानी कुर्सियाँ भी हैं, जिन पर आवश्यकता पड़ने पर हम विश्राम भी कर सकते हैं। अब हम बेहतर ढंग से एकाग्र हो पाते हैं और ज़्यादा सक्रिय और चपल भी महसूस करते हैं क्योंकि अब कहीं बाहर जाना हो तो कुर्सी से उठकर खड़े होने का झंझट नहीं होता। इस तरीके का यह पहलू विशेष रूप से अपरा को बड़ा पसंद आया-जब उसकी मर्ज़ी होती है वह हमें खींचकर सीधे बाहर निकाल लाती है, कंप्यूटर और काम से दूर, उसके साथ खेलने के लिए!

सबसे मुख्य बात यह कि अब दर्द गायब हो चुका है। पीठ के निचले या ऊपरी हिस्से में कोई जकड़न नहीं होती, लंबे समय तक काम करने पर भी हम प्रसन्न महसूस करते हैं और जब भी थोड़ी बहुत अकड़न महसूस होती है, हम वहीं डेस्क पर खड़े-खड़े ही कुछ योग मुद्राएँ करना शुरू कर देते हैं। इस तरह खड़े होकर काम करने का निर्णय हमारे लिए बड़ा लाभकारी सिद्ध हुआ है!

2014 में थोड़े से बदलाव के रूप में यह मेरी आपको सलाह होगी! कई महीने इस तरीके को आजमाने और उसे वाकई बहुत लाभकारी पाने के बाद ही मैं यह लिख रहा हूँ। अगर आप अपनी पीठ की तकलीफ के लिए कुछ अधिक करना चाहते हैं तो हमारी योग-विश्रांति की कक्षाओं में शामिल हो जाइए, जिनमें मुख्य रूप से "पीठ, गर्दन और कंधों के लिए योग" वाली कक्षाएँ आपके लिए सर्वथा मुफीद होंगी। इसमें आप उन व्यायामों के बारे में भी जान पाएंगे जिन्हें आप अपने नए डेस्क पर काम करते हुए भी कर सकते हैं! और अगर आप वज़न कम करने वाले चलते-फिरते डेस्क की बात सोच रहे हैं तो आप "वज़न कम करने के लिए योग" वाली विश्रांति-कक्षाओं का आनंद प्राप्त कर सकते हैं-अपनी छुट्टियों के समय योग करते हुए वज़न कम कीजिये और उन्हें घर में करने की विधियाँ (योग-मुद्राएँ) सीखिए!

अगर आप खड़े होकर ऊंचे डेस्क पर काम करने का विचार कर रहे हैं और इस विषय में आपके मन में कुछ प्रश्न हैं तो मुझे नीचे दिए गए कमेन्ट बॉक्स में लिखिए-इस विषय में आपको सलाह प्रदान करके मुझे खुशी होगी और इस विषय में आपके अनुभवों के बारे में जानकर भी!

घायल अथवा बीमार के साथ नका्रात्मक बातें न करें – 6 मार्च 13

सोमवार को मैं आपसे कह रहा था कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों मैं सकारात्मकता का साथ नहीं छोड़ता हूं, जैसे कि पिछले हफ्ते अपने दोस्त गोविंद के साथ घटी दुर्घटना के बाद भी सकारात्मक बना रहा। मैं इस बात में पूरा विश्वास करता हूं कि सकारात्मक विचार हमारी मदद करते हैं – खासकर ऐसी विकट परिस्थितियों में जब नकारात्मकता की गहरी खोह में गिरने की प्रबल संभावना रहती है। दुर्भाग्य से सभी लोग इस बात से सहमत नहीं होते या इस विचार को समझते नहीं हैं। पिछले सप्ताह गोविंद के साथ अस्पताल में बिताए दिनों के दौरान मैंने इसका साक्षात प्रमाण देखा।

बहुत सारे लोग गोविंद की मिजाज़पुर्सी के लिए आते हैं लेकिन मेरा मक़सद केवल एक ही रहता है उसे प्रसन्नचित्त रखना और उसके साथ समय बिताना। एक रिश्तेदार आया, दुर्घटना की कहानी सुनी और सिर हिलाते हुए दुखी स्वर में बोला, "अब तो तुम कभी दौड़ भाग नहीं कर पाओगे, कूद भी नहीं सकोगे", मैंने तुरंत इसका विरोध किया और बताया कि डॉक्टर ने ऐसा कुछ नहीं कहा है। उल्टे सर्जरी के बाद तो कुछ हफ्तों की फीजियोथैरेपी की मदद से वह बिल्कुल ठीक हो जाएगा। अगले दिन एक दूसरे सज्जन ने पूछा, "क्या तुम अब चल पाओगे?" एक महाशय तो कल भी अपनी राय प्रकट करते हुए कह रहे थे कि "अगर आपरेशन सफल न हो तो तुम्हारी टांग सीधी नहीं हो पाएगी। ऐसा भी हो सकता है कि यह हमेशा टेढ़ी ही रहे।"

एक महिला रिश्तेदार तो जितनी देर वहां रहती, उतनी देर बिसूरती ही रहती थी। आखिरकार मुझे कहना पड़ा कि ये नाटक कब तक चलता रहेगा? ऐसे मामलों मे मैं कोई संकोच नहीं करता / बड़ा मुंहफट हूं। इस तरह रोने का कोई कारण भी तो नहीं है। जो होना था वह हो गया और अगर यहां बैठकर आप इस तरह आंसू बहाते रहेंगें तो इससे गोविंद की कोई मदद नहीं होने वाली है। हां, इससे यहां बैठे सभी लोग दुखी और हो जाएंगें।

इन छोटी मोटी टिप्पणियों का मेरे दोस्त की मनःस्थिति पर कितना बुरा असर हुआ यह तब स्पष्ट नज़र आया जब उसने अगले दिन अपनी सूजी हुई टांग की तरफ देखते हुए अपने एक सहकर्मी से वेदनापूर्वक कहा, "पता नहीं अब मैं वापिस अपने काम पर जा पाऊंगा या नहीं।" मैंने उसे समझाया, "अरे, तुम ऐसे क्यों सोच रहे हो? तुम ठीक हो जाओगे। सब कुछ ठीक होगा और एक दिन ऐसा आयेगा जब तुम यह भी भूल जाओगे कि तुम्हारे साथ क्या हुआ था। यह सब भी तुम्हें तब याद आयेगा जब तुम किसी की टूटी हुई टांग के बारे में सुनोगे। तब तुम अपने आप से कहोगे, हां, मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था!"

यह सब देखकर मुझे लगा कि अपने मित्र के पास रोज अस्पताल आने का मेरा निर्णय बिल्कुल सही रहा। उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता है और इसके अलावा मैं उसे प्रसन्नचित्त और सकारात्मक रखने की कोशिश करता रहता हूं। मैं उसे उसे समझाता रहता हूं कि एक टांग ही तो टूटी है, यह मुश्किल भी खत्म हो जाएगी और वह वापिस भला चंगा हो जाएगा।

मैं आप सभी से अनुरोध करना चाहता हूं: अगली बार जब कभी भी आप किसी बीमार या घायल का हाल पूछने के लिए जाएं तो वहां बैठकर नकारात्मक बातें न करें। मुस्कराते रहें, मरीज़ को हौंसला दें, सकारात्मक रहें और बीमार को उम्मीद बंधाएं। यदि आप अपनी चिंताएं मरीज़ को बताने लगेंगें तो ऐसा करके आप पहले से ही पीड़ा भुगत रहे व्यक्ति की परेशानियों में इज़ाफा ही करेंगें।

यदि आप सकारत्मक रहेंगें तो मेरी तरह आप भी यह कह पाएंगें, "घबराओ मत, तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे।" कल गोविंद की सर्जरी हो गई और सब कुछ ठीकठाक निपट गया। अब उसकी टांग ठीक होने में बस थोड़ा सा समय और लगेगा और उसके बाद वह फिर से चलने का अभ्यास करने लगेगा।

सकारात्मक हूँ, अपने दोस्त गोविंद के साथ हुई दुर्घटना के बाद – 4 मार्च 13

मैं आगरा जाने के लिए तैयार हो रहा हूं। पिछले छह दिनों से मैं यही कर रहा हूं। मैं रोज सुबह उठता हूं, दैनिक काम निपटाता हूं और चल पड़ता हूं अस्पताल की तरफ अपने दोस्त गोविंद से मिलने।

गोविंद मेरा सबसे पुराना दोस्त है। हम दोनों नर्सरी स्कूल में साथ पढ़ने गए और चार साल की उम्र से लेकर आज तक यह दोस्ती कायम है। पिछले हफ्ते मंगलवार को उसका फोन पूर्णेंदु के पास आया तो मुझे धक्का सा लगा। रात को करीब आठ बजे के आसपास उसने फोन पर बताया कि दफ्तर से घर लौटते हुए उसके साथ दुर्घटना हो गई है। उसने कहा कि उसे अस्पताल ले जाने के लिए कार लेकर आ जाओ। हम लोग तुरंत घर से निकल पड़े। लेकिन जब पूर्णेंदु ने बताया कि गोविंद स्वयं फोन पर बात कर रहा था तो मेरी चिंता कुछ कम हो गई क्योंकि इसका मतलब था कि वह होश में था और बातचीत कर रहा था। पूर्णेंदु बता रहा था कि चोट लगने के तुरंत बाद ही गोविंद को पता चल गया था कि उसकी टांग की हड्डी टूट गई है।

उसने पूर्णेंदु को बता दिया था कि वह कहां पर है। अतः हम वहां पहुंचे। उसे उठाकर गाडी में डाला तो वह दर्द के मारे चीख पड़ा। हम उसे सीधे नज़दीक के अस्पताल ले गए। गोविंद ने बताया कि जिस टेंपो में वह सफर कर रहा था, उसे एक कार ने टक्कर मार दी। वह उछलकर टेंपो से बाहर जा पड़ा। ज़मीन पर गिरते ही उसे अहसास हो गया था कि उसके पैर की हड्डी टूट गई है। अस्पताल में हुए एक्स रे ने इस बात की पुष्टि कर दी कि उसके पैर की दो हडिडयां – टिबिआ और फिब्युला, पूरी तरह टूट गई हैं।

रात भर वह उसी पास के अस्पताल में रहा लेकिन अगले दिन हम उसे आगरा के एक बड़े अस्पताल में ले गए जहां अब उसकी सर्जरी होगी। डॉक्टर उसके पैर की सूजन उतरने का इंतज़ार कर रहे हैं। तब तक उसे दर्दनिवारक दवाएं दी जा रही हैं। इन दवाओं से कभी तो दर्द कम हो जाता है और कभी नहीं। जब दवा असर नहीं करती उस वक्त गोविद बहुत कराहता है।

तो यह कारण था कि मैं पिछले हफ्ते रोज आगरा जाता रहा। अमूमन मैं आश्रम से बाहर नहीं जाता हूं। इसी कारण सबको मेरा रोज बाहर जाना अजीब सा लग रहा था। लेकिन मुझे अपने प्रिय मित्र के लिए यह सब करना अच्छा लग रहा था। मुझे अच्छा लग रहा था कि ऐसे कष्ट के समय में मैं उसके साथ हूं, उसका ध्यान बदलने की कोशिश कर रहा हूं और लतीफे सुनाकर उसे हंसा रहा हूं।

यह एक बड़ी दुखद बात है कि गोविंद एक दुर्घटना का शिकार हुआ। लेकिन जो होना था, वह हो गया। अब हमें इस स्थिति का सामना करना है तो बेहतर होगा कि हम इसमें भी कुछ सकारात्मक देखने की कोशिश करें। हो सकता था कि कुछ इससे भी ज्यादा बुरा हो जाता!

वह यहां बिस्तर पर लेटा हुआ है, मैं इसमें भी कुछ फायदे देख रहा हूं: वह काम पर न जाकर आराम कर रहा है और आखिरकार हम दोनों को बतकही करने का कुछ तो वक़्त मिला। हालांकि वह हम दोनों वृंदावन में ही रहते हैं और वह काम पर बहुत दूर भी नहीं जाता, फिर भी हम दोनों बहुत कम समय के लिए मिल पाते हैं। वह सप्ताहांत में आता है तो बहुत सारे काम साथ में लाता है और कई बार बस थोड़ी देर बैठकर चला जाता है। लेकिन अब हम दुनिया जहान की बातें कर रहे हैं क्योंकि उसे कहीं जाना नहीं है।

दूसरा एक बड़ा फायदा जो हुआ है वह यह कि अब उसे पढ़ने के लिए थोड़ा वक़्त मिला है। गोविंद को पुस्तकें पढ़ने का बहुत शौक है लेकिन कभी इतना समय ही नहीं मिल पाया कि एक किताब में पूरी तरह डूब जाए। लेकिन अब जब तक वह अस्पताल में है और सर्जरी के बाद घर लौटने पर भी वह तुरंत काम पर नहीं जा पाएगा, तब उसके पास भरपूर समय होगा, किताबों को पूरी तरह चाटने का!

रोजाना आगरा जाना मेरे लिए भी फायदेमंद साबित हुआः घर से निकलने के थोड़ी देर बाद ही मुझे अपरा की याद सताने लगती है। साथ ही यह सोचकर अच्छा लगता है कि हमारे रहने और काम करने की स्थितियां कितनी अनुकूल और अद्भुत हैं! सामान्यतः मैं पूरे दिन आश्रम में रहता हूं और जब जी चाहे तब उसे देख सकता हूं। जब भी मन करता है, मैं अपनी डेस्क से उठकर जा सकता हूं अपने बच्चे के साथ खेलने के लिए। खुद को धन्य मानता हूं कि अपनी बेटी के साथ इतना वक़्त बिता पाता हूं! अकसर पूरे दिन मैं रमोना के साथ ही काम करता रहता हूं। जब मैं बाहर चला जाता हूं तो उसे भी मेरी अनुपस्थिति खलती है। लेकिन. . . . . इसका मतलब यह भी है कि जब मैं लौटकर वापिस घर आता हूं तो बहुत स्नेह और उल्लास के साथ मेरा स्वागत होता है!

एक दुर्घटना घटी, गोविंद अस्पताल में है, वह बड़ी परेशानी में है और सब यह कामना कर रहे हैं कि वह जल्दी स्वस्थ होकर घर वापिस आ जाए। लेकिन अच्छा तो ये हो कि हम इस नकारात्मक घटना के भी कुछ सकारात्मक परिणाम देखें तो अंततः हम कह सकें कि सब कुछ ठीक है|