आपके विवाह के बाद जब आपकी सास आपकी माहवारी का हिसाब रखने लगती है – 11 जनवरी 2016

अपरा के जन्मदिन के सिलसिले में बहुत से मित्र आश्रम आए थे और उन समान सोच-विचार वाले मित्रों के साथ एक बार फिर खुलकर बातचीत करना अत्यंत सुखद रहा! जब हम एक साथ बैठे हुए थे तो एक महिला मित्र ने, जिसका विवाह अभी एक साल पहले ही हुआ था, बताया कि उस पर न सिर्फ उसके परिवार और उसके सास-ससुर का बल्कि सामान्य रूप से सारे समाज का ही बड़ा ज़बरदस्त दबाव है। किस बात का? जल्द से जल्द गर्भवती होने का!

जी हाँ। भारत में यह बिल्कुल सामान्य बात है कि शादी के कुछ ही माह बाद- शादी, जो अक्सर परिवार द्वारा तय की हुई शादी होती है-हर व्यक्ति यह खुशखबर सुन लेता है: बच्चा होने वाला है! यहाँ यही चलन है, यही होना चाहिए और आपकी शादी का यही एकमात्र मुख्य उद्देश्य है! आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप बच्चे, और जहाँ तक हो सके, लड़का, पैदा करें और परिवार की वंश वृद्धि सुनिश्चित करें और उसके कारोबार के लिए वारिस तैयार हो! आपके जीवन का यही मुख्य उद्देश्य है: जितना जल्दी हो सके, बच्चा पैदा करो!

उस मित्र ने बताया कि वह और उसका पति फिलहाल बच्चा न पैदा करके पर्याप्त खुश और संतुष्ट हैं और उसके स्थान पर एक दूसरे को जानते-समझते हुए और अपने संबंध को कुछ और प्रगाढ़ बनाने की कोशिश करते हुए कुछ वक़्त गुज़ारना चाहते हैं। लेकिन भारत में यह विचार ही अत्यंत असामान्य विचार है। यहाँ लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि बच्चे तो वह गोंद है या वह चुंबक है जो माता-पिता को एक-दूसरे से मज़बूती के साथ जोड़े रखता है! लेकिन जबकि वे इस तरह रहते हुए खुश हैं, उनका परिवार दुखी है! और वह महिला मित्र परिवार और दूसरे सब लोगों के इस दबाव से बहुत अप्रसन्न है!

एक और मित्र, जिसकी तीन साल की बच्ची उस वक़्त अपरा के साथ खेल रही थी, अपने साथ पेश आए इसी तरह के व्यवहार को याद करने लगी। उसकी सास हर माह उससे पूछती कि उसकी माहवारी रुकी या नहीं! यहाँ तककि बाद में उसने कैलेंडर पर उसकी माहवारी के दिनों का हिसाब-किताब रखना शुरू कर दिया और ठीक उन्हीं दिनों में उससे खबर दरियाफ्त करने लगी। जब उसे पता चलता कि माहवारी हो गई है और कम से कम इस माह वह गर्भवती नहीं होगी तो वह बहुत दुखी हो जाती!

क्या आपने कभी कल्पना की है कि किसी महिला को अपने साथ होने वाले ऐसे व्यवहार पर कैसा महसूस होता होगा? उसे लगता होगा कि उस घर में वह सिर्फ प्रजनन की मशीन भर है, और कुछ भी नहीं! किसी को इससे कोई मतलब नहीं है कि वह खुद क्या चाहती है-आपके आसपास का सारा वातावरण यह सोचता है कि आपको भी बच्चे की चाहत होनी चाहिए। और सब के सब पूरी शिद्दत के साथ वह खुशखबर सुनने का इंतज़ार करते रहते हैं।

अगर कुछ माह या साल भर तक उस खबर की घोषणा नहीं होती तो अफवाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है: उन्हें बच्चा पैदा नहीं हो पा रहा है, कुछ न कुछ गड़बड़ है! कौन दोषी है? ज़रूर लड़की ही बाँझ होगी! अभी इलाज शुरू किया या नहीं? ऐसा तो नहीं कि लड़का सम्भोग में रुचि ही न लेता हो? कहीं वह समलैंगिक तो नहीं! इत्यादि, इत्यादि!

अफवाह फरोश पड़ोसी ऐसी बातों के इंतज़ार में ही होते हैं और रस ले-लेकर मुहल्ले भर में इस सामान्य बात को बहुत बड़े कलंक की तरह पेश करते हैं, जबकि वहाँ सिर्फ प्रकृति अपना खेल खेल रही होती है।

यह बेहद हास्यास्पद है कि हम महिलाओं से, और पुरुषों से भी, कहें कि उनका जीवन कैसा होना चाहिए और जीवन के किस बिंदु पर उन्हें क्या सोचना चाहिए, क्या इच्छा करनी चाहिए! समाज के लिए यह कतई स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता और न ही उस महिला के लिए या उस दंपति के लिए। क्योंकि क्या होगा यदि वे वास्तव में बच्चा पैदा न कर पाएँ? इस परिस्थिति पर दृष्टिपात करेंगे, कल…!

जब महिलाएँ अपने पति के विवाहेतर संबंधों को स्वीकार कर लेती है – 7 दिसंबर 2015

जब मैं जर्मनी में था, कुछ मित्र अपने मित्रों की कहानियाँ सुना रहे थे। उनमें से एक कहानी ने मुझे वैसी ही स्थितियों का सामना करने को मजबूर बहुत सी भारतीय महिलाओं के विषय में सोचने को विवश कर दिया। मैंने सोचा, आखिर दोनों में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है: वैवाहिक संबंधों में कुछ महिलाएँ अपने पतियों के विवाहेतर संबंधों को बड़ी सहजता के साथ स्वीकार कर लेती हैं-सुविधाजनक होने के कारण या फिर डर के मारे!

एक दोस्त ने मुझे बताया, एक महिला, जिसे वह बीस साल से भी ज़्यादा समय से जानता है, अपने पति के साथ काफी समय से अत्यंत असामान्य परिस्थितियों में रह रही है: उसका पति हफ्ते में लगभग एक बार उससे मिलने घर आता है। बाकी समय वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहता है। जब वह घर आता है तो सब कुछ ऐसा होता है जैसे वे दोनों सामान्य विवाहित पति-पत्नी हों: वह अपने गंदे कपड़े लेकर आता है और वह उन्हें धोती है, उस रोज़ वह एक अतिरिक्त व्यक्ति के लिए खाना बनाती है और इस तरह वह एक सामान्य काम पर से घर लौटा हुआ पति होता है!

लेकिन वे एक साथ नहीं सोते-और कहानी के इसी बिंदु पर मुझे पूछना ही पड़ा: क्या पहले शुरू हुआ, अलग-अलग बिस्तरों पर सोना या गर्लफ्रेंड के साथ रहना? अलग-अलग बिस्तरों सोना पहले शुरू हुआ था! एक बार महिला ने अपने पति से कहा था कि वह भविष्य में उसके साथ यौन संबंध नहीं रखना चाहती। वह उसके साथ सोना नहीं चाहती थी और उसने पति के सामने यह विकल्प भी रखा कि यदि वह चाहे तो कहीं और जाकर अपनी यौन ज़रूरतें पूरी कर सकता है।

बहुत से कारण थे कि वे अलग नहीं हुए और मुख्य रूप से सिर्फ इसलिए कि यह बहुत आसान और सुविधाजनक था: वे अपने टैक्स और बैंक खाते एक रखे हुए थे, जिस तरह वह हमेशा से रहती आई थी, अब भी रह सकती थी और पति को उसकी स्वतंत्रता भी उपलब्ध हो गई। उनके संबंध अच्छे हैं, यानी बाकी सब कुछ ठीक है।

मेरे मन में तुरंत उन परिवारों का खयाल आया, जिनसे मिलने रमोना अक्सर उनके घर जाती रहती है-हमारे स्कूली बच्चों के घर, जहाँ अक्सर महिलाएँ ढोंग करती हैं, जैसे वे एक सामान्य, सुखी दाम्पत्य संबंध में बंधी हुई हैं जबकि वास्तव में उनके पति ज़ोर-शोर से विवाहेतर संबधों में मुब्तिला होते हैं। एक नज़र में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पति और पत्नी के बीच बेगानापन व्याप्त है और उनके बीच आन्तरिक संबंधो का लोप हो चुका है-लेकिन वे विवाह का भ्रम बनाए रखती हैं। दंपति के रूप में साथ जीवन बिताने का ढोंग, क्योंकि संबंध विच्छेद की तुलना में यह आसान और सुविधाजनक है और एक ऐसे समाज में जहाँ एकाकी महिला पर लोगों का कहर टूट पड़ता हो, निश्चित ही तलाकशुदा कहलाने से बहुत बेहतर!

मुझे समानताएँ नज़र आती हैं। मुझे लगता है, कुल मिलाकर दोनों स्थानों पर स्थिति एक जैसी है। इसी तरह चलाना अधिक सुविधाजनक है। साथ ही मैं यह फैसला नहीं दे रहा हूँ कि यह ठीक है या गलत है या कि यह एक देश के संदर्भ में सही और दूसरे की परिस्थितियों में गलत है! मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि मैंने दोनों में ये समानताएँ पाईं और उन्हें आपके सामने रख रहा हूँ।

उन्मुक्त सेक्स संबंध बनाना गलत नहीं है परन्तु मुझे लगता है, वे सफल नहीं हो पाते – 3 दिसंबर 2015

पिछले तीन दिन से खुले संबंधों के बारे में लिखने के बाद और यह बताने के बाद कि क्यों वे अक्सर असफल रहते हैं, आज मैं एक और बात बहुत स्पष्ट कर देना चाहता हूँ: जबकि मेरा विश्वास है कि वे सफल नहीं हो सकते, अगर लोग इन संबंधों को आजमाना चाहते हैं तो मैं नहीं समझता कि उसमें कुछ भी गलत है।

मैं सामान्य रूप से खुले दिमाग वाला और खुले और स्पष्ट रवैए वाला व्यक्ति हूँ, विशेष रूप से सेक्स को लेकर। मैं मानता हूँ कि यह पूरी तरह आपका चुनाव होना चाहिए कि आप किसके साथ सेक्स संबंध रखना चाहते हैं। अगर आप कई अलग-अलग लोगों के साथ सम्भोग करना चाहते हैं तो कीजिए। अगर आप किसी एक व्यक्ति के साथ बंधे नहीं रहना चाहते तो वैसा ही करें। अगर आप किसी एक व्यक्ति के साथ सुदीर्घ और पक्का संबंध रखते हुए आपसी समझौते के तहत अधिक पार्टनर्स रखने की स्वतंत्रता चाहते हैं तो वह भी मेरे लिए पूरी तरह स्वीकार्य है।

सेक्स एक वर्जना बन चुका है, जबकि यह दुनिया में सबसे अधिक आनंददायक कार्य है और इसके साथ तरह-तरह के प्रयोग करना, और नई-नई चीजें आजमाना और भी आनंददायक उत्तेजना प्रदान करता है। शायद इसी आनंद के चलते इसका दमन किया जाता है, जिससे लोगों को अपने काबू में रखा जा सके।

इसकी जगह आप अपने आपको शक्तिशाली बनाने में सेक्स का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन जब मैं यह कहता हूँ तो मेरा मतलब यह नहीं होता कि सिर्फ इसलिए कि समाज इसे वर्जित करता है, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के साथ संभोग करने से आप अधिक शक्तिशाली और कार्यक्षम हो जाते हैं। जी नहीं, मेरा मतलब होता है कि आप अपने दिल की सुनें और अपने शरीर की आवश्यकता तो पूरी करें ही, अपनी भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति भी करें। कि अपनी दिली इच्छाओं के सामने आप परम्पराओं और सामाजिक नियमों को व्यवधान न बनने दें।

लेकिन मेरा विश्वास है कि देर-सबेर अधिकतर लोगों का मन उन्हें बता देगा: यही है वह! वह व्यक्ति, जिसे मैं किसी और के साथ साझा नहीं करना चाहता और जिसके लिए मैं स्वयं एकमात्र व्यक्ति बने रहना चाहता हूँ।

मेरी नज़र में अन्य सभी संबंध सफल नहीं हैं।

अत्यधिक सेक्स किस तरह एक रूखा अनुष्ठान बनकर रह जाता है – 2 दिसंबर 2015

पिछले दो दिनों में मैंने आपको बताया कि कि क्यों खुले सेक्स संबंध अक्सर सफल नहीं होते। उदाहरण स्वरूप मैंने आपको दो स्थितियों से अवगत कराया था और दोनों ही स्थितियों में संबंधों की असफलता का पहला कारण यह होता है: लोग सेक्स को एक तकनीक के रूप में देखते हैं, एक ऐसी क्रिया, जिससे मनोरंजन होता है, उसमें एक तरह का उत्तेजक आनंद प्राप्त होता है-और वे प्रेम को पूरी तरह भूल जाते हैं!

बहुत से लोग खुले संबंधों के विचार पर मोहित होकर उसे आजमाते हैं। फिर वे बहुत से भिन्न-भिन्न लोगों के साथ हमबिस्तर होने लगते हैं और संभोग में बुरी तरह लिप्त हो जाते हैं। कई बार वे अपने पार्टनर्स इतनी जल्दी-जल्दी बदलते हैं कि उन्हें याद तक नहीं रहता कि कल रात किसके साथ सोए थे। इन संबंधों में भावना नहीं होती, एहसास नहीं होता। तब सेक्स महज शारीरिक क्रिया भर बनकर रह जाती है, एक तरह का यांत्रिक अनुष्ठान, जिसे किसी तरह निपटाया जाना है। उसमें प्रेम नदारद होता है।

कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि हर बार किसी चीज़ की कमी रह गई है। वे समझने लगते हैं कि उन्हें वह प्राप्त नहीं हो रहा है, जिसकी खोज में वे यह सब कर रहे थे: किसी रिश्ते का असली मकसद हासिल नहीं हो पाता। किसी के साथ उस स्तर पर जुड़ाव, जो इतनी गहराई तक चला जाता है, जिसे शारीरिक संसर्ग छू भी नहीं सकता। उन्हें प्रेम नहीं मिल पा रहा है।

ऐसा हो भी नहीं सकता! अगर सेक्स सिर्फ अनुष्ठान है, यांत्रिक कर्मकांड है, जब इससे कोई फर्क न पड़े कि किसके साथ सेक्स संबंध बनाया जा रहा है और भले ही आप खुद अपने पार्टनर का चुनाव कर रहे हों लेकिन आप उन्हें बार-बार बदलते रहें तो आप उस पार्टनर से उस तरह नहीं जुड़ पाएँगे जिस तरह किसी एक के साथ दीर्घजीवी सबंध में जुड़ पाते हैं। और सेक्स को लेकर आपकी भावनाएँ भी समान नहीं होंगी, जैसी कि पहले प्रयोग के समय किसी एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में होती हैं।

आप सेक्स साझा कर सकते हैं, शारीरिक संसर्ग साझा कर सकते हैं और किसी अनुष्ठान में साथ-साथ शामिल हो सकते हैं लेकिन आप वही स्नेह, वही भावनाएँ और वही प्रेम साझा नहीं कर सकते जैसा एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में कर पाते हैं। प्रेम ही वह चुंबक है जो आपको और आपके पार्टनर को जोड़े रखता है। अक्सर लोग समझते हैं कि सेक्स वह गोंद है-लेकिन वास्तव में वह चुंबक सिर्फ और सिर्फ प्रेम है।

मेरे विचार में सेक्स भी महत्वपूर्ण है! जी हाँ, वह संबंधों के आवेग को घनीभूत कर देता है और दो व्यक्तियों को करीब लाने में महत्वपूर्ण स्थान अदा करता है। लेकिन सिर्फ तभी जब शारीरिक के अलावा एक दूसरा रिश्ता भी हो। आप किसी के साथ एक विस्मयकारी रात गुज़ार सकते हैं और नियमित रूप से उसके साथ यौनानुभव प्राप्त कर सकते हैं, जो आपकी शारीरिक जरूरतों को पूरी तरह संतुष्ट और आनंदित भी कर सकता है लेकिन इतना होने के बाद भी आप किसी चीज़ की कमी महसूस करते हैं।

यही 'कोई चीज़' प्रेम है। और मेरे विचार में इस गहरे प्रेम और लगाव को किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा करना असंभव है!

एक से अधिक सेक्स पार्टनर के साथ आपसी संबंधों में रोमांच, थ्रिल, उत्तेजना और असफलता – 1 दिसंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे बहुत से खुले संबंध टूटने लगते हैं क्योंकि संबंधित लोग वास्तव में खुला और स्वतंत्र होने के स्थान पर मुख्य पार्टनर के साथ अपने संबंध में लिप्त रहे आते हैं। एक और परिस्थिति है, जिसका सामना होने पर भी अक्सर संबंध टूटते हैं: जब पार्टनरों में से कोई एक अपने साथी में रुचि खो देता है, क्योंकि एक के साथ अधिक समय बिताने के बाद वह उससे बोर होने लगता है!

आप भी जानते हैं कि शुरू में सब कुछ बड़ा उत्तेजक और रोमांचक लगता है लेकिन कुछ हिचकिचाहट भी होती है: इन संबंधों को समाज उचित नहीं मानता अर्थात समाज में यह एक टैबू ही है। इसलिए वे डरते हैं कि लोगों को पता चलने पर वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? या भविष्य में किसी दिन मुझे पता चलेगा कि मैं ज़िन्दगी भर वैश्यागीरी करता रहा? सबसे प्रमुख संबंध यानी जिसके साथ सबसे पहले संबंधों की शुरुआत हुई थी, एक तरह की सुरक्षा जैसा होता है, एक सुरक्षित सहारा-समाज के दूसरे लोगों के सन्दर्भ में भी और खुद अपनी भावनाओं और विचारों के सन्दर्भ में भी। यह एक सुविधाजनक ढाँचा होता है, जिसकी कार्यविधि और व्यवस्था के बारे में आपको पता होता है कि वह कैसे काम करता है और दूसरे सेक्स संबंधों के रोमांच से तुष्ट होकर या ऊबकर आप पुनः जिसके पास निःसंकोच वापस जा सकते है।

लेकिन कुछ समय बाद वे इस रोमांच से आश्वस्त होते जाते हैं। बार-बार पार्टनर बदलने की उन्हें आदत पड़ जाती है बल्कि इस जीवन-शैली को अपनाने वाले ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है। आप तुरंत अनुमान लगा सकते हैं कि उसके बाद क्या होता होगा: उन्हें किसी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती!

नियमित रूप से किसी एक व्यक्ति के साथ रहना बहुत उबाऊ हो जाता है, बहुत से उत्तेजक, विविधतापूर्ण, नए से नए और तैयार विकल्प मौजूद होते हुए किसी एक के साथ रहना! सीधी सी बात है, खुले संबंध में भी सुदीर्घ संबंधों के कारण होने वाली दिक्कतों को क्यों भुगता जाए?

पहला मुख्य पार्टनर जो दे सकता है, वह अब इतना आकर्षक नहीं रह गया है कि उसी के साथ रहने की कोई मजबूरी हो। अगर दोनों एक जैसा महसूस कर रहे हों तो ये संबंध आपसी समझौते के तहत बिना किसी बड़ी मुसीबत के समाप्त हो जाते हैं और दोनों अपने-अपने अलग रास्तों पर निकल पड़ते हैं। अगर दोनों की जीवन शैली यही है तो भविष्य में वे एक रात के साथियों की तरह मिल भी सकते हैं लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

लेकिन अगर दोनों में से सिर्फ एक की जीवन शैली ऐसी है तो दूसरे का दुखी होना अपरिहार्य है और पता चलते ही वह इन खुले संबंधों को कोसना शुरू कर देगा और उसका अहं यह सोचकर चोट खा सकता है कि सामने वाले को कभी भी उससे अधिक प्रिय व्यक्ति नहीं मिल सकेगा! पूरी संभावना होती है कि ऐसा व्यक्ति स्थिर संबंध की ओर वापस लौट आए, जिसमें इतना अनुशासन होगा कि अपने मुख्य संबंध के बाहर किसी और से सम्भोग का त्याग कर दे। जब आप इस दर्द का अनुभव कर लेते हैं तो उसके बाद उन्हीं खुले संबंधों के अनुभव को आप दोहराना नहीं चाहेंगे!

लेकिन इस प्रकरण के सन्दर्भ में मूल समस्या दूसरी है: जब लोग सेक्स को प्यार से नहीं जोड़ते। लेकिन उस विषय पर विस्तार से कल…

क्या आप भी अपने आपको सेक्स का सबसे बड़ा खिलाड़ी समझते हैं – 30 नवंबर 2015

मैंने पहले कई बार खुले संबंधों के बारे में लिखा है और उन पर विस्तार से अपना मत भी रखा है। हालांकि अब भी इस विषय में मेरा मत काफी हद तक वही है जो पहले था, मैं आज अपने ब्लॉग का उपयोग इसी स्वच्छंद जीवन शैली पर लिखने के लिए करना चाहता हूँ-क्योंकि मुझे अब भी लगता है कि यह किसी भी हालत में ज़्यादा समय तक सुचारू रूप से नहीं चल सकता!

मैं बहुत से ऐसे लोगों से मिल चुका हूँ जिन्हें स्वच्छंद और खुले संबंध पूरी तरह स्वीकार्य हैं, कुछ दूसरे हैं जो किसी के साथ इसे शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और कुछ और हैं जो पहले ही इसमें लिप्त हो चुके हैं। और एक वर्ग उनका भी है जो पहले इसमें मुब्तिला रह चुके हैं। ज़्यादातर लोगों को शुरू में बहुत रोमांच होता है लेकिन समय के साथ अंततः उन्हें पता चलता है कि वे भ्रमित थे। अब वे उससे निराश हो चुके हैं क्योंकि अब उन्हें लगता है कि उसके बारे में जैसा उन्होंने सोचा था, उनका अनुभव वैसा नहीं रहा है।

जो लोग इस तरह जीवन बिताना चाहते हैं, स्वाभाविक ही, शुरू में उन्हें इसमें बड़ी उत्तेजक सम्भावनाएँ दिखाई देती हैं। बिना अपने मुख्य पार्टनर की सुरक्षा खोए स्वच्छंद रूप से किसी भी पुरुष या महिला के साथ सोने की आज़ादी। तीसरे या चौथे व्यक्ति को भी बिस्तर पर लाकर सेक्स के ज़ायके को और चटपटा बनाने की संभावना भी। ईर्ष्या या ऐसे ही दूसरे अप्रिय एहसासों से निपटने का कोई झंझट नहीं क्योंकि समझौते के मुताबिक आखिर हर कोई दूसरे यौन साथियों का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र है!

दुर्भाग्य से, मैंने देखा है कि यही तथ्य लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्याएँ खड़ी करता है! वे समझते हैं कि यह बड़ा मज़ेदार है, वे किसी दूसरे के साथ संभोग करते रहेंगे और उनके पार्टनर को इस बात से ईर्ष्या नहीं होगी-लेकिन पार्टनर के प्रति अपने अनुराग को और अपनी ईर्ष्या को वे खुद ठीक से नहीं समझ पा रहे हैं, उसे कम आँक रहे हैं! वे नहीं समझते कि उनका पार्टनर भी यही कर सकता है-वह भी दूसरों के साथ यौन संबंध बना सकता है!

वास्तव में मैंने पाया है कि बिस्तर पर प्रवीणता के संदर्भ में यह समस्या अतिशय अहं से संबंधित है। जैसे हर महिला समझती है कि बिस्तर पर वह सबसे प्रवीण स्त्री है वैसे ही हर पुरुष अपने आपको सेक्स का सबसे शक्तिशाली, प्रवीण और उत्तेजक खिलाड़ी समझता है! एक तरफ महिला पार्टनर समझती है कि पुरुष पार्टनर को मिलने वाली कोई भी स्त्री सेक्स के मामले में मेरे जितनी प्रवीण हो ही नहीं सकती तो दूसरी तरफ पुरुष सोचते हैं कि मेरे अंदर सेक्स की इतनी दक्षता और क्षमता है कि कोई स्त्री एक बार मेरे साथ सो ले तो किसी दूसरे के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती!

एक बार जब आप इस संभावना को अपने लिए खोल देते हैं तो आपको जल्द ही पता चलता है कि वास्तविकता कुछ अलग है! अचानक आप नोटिस करते हैं कि सिर्फ आप ही माह में तीन या चार अलग-अलग लोगों के साथ मौज नहीं ले रहे हैं या एक रात के साथियों के साथ संभोगरत नहीं हो रहे हैं बल्कि आपका पार्टनर भी उसी राह पर चल पड़ा है। स्वाभाविक ही, उस पर भी दूसरे विपरीतलिंगियों की नज़रें हैं और वह भी इस स्वच्छंदता का भरपूर आनंद ले रहा है या ले रही है!

मेरे प्रिय मित्रों, यहीं से असली समस्या की शुरुआत होती है। ईर्ष्या, हर वक़्त दबा हुआ गुस्सा-क्योंकि जो आप स्वयं कर रहे हैं, उसी बात पर आप अपने पार्टनर पर नाराज़ नहीं हो सकते- आपको सामान्य नहीं रहने देता। ईर्ष्या के कारण उपजे इसी दुःख और कथित अपमान के चलते छोटी-छोटी बातों पर आपस में झगड़े शुरू हो जाते हैं!

मैंने कई खुले संबंधों को इसी तरह असफल होते हुए देखा है, जिसका कारण यही होता है कि दोनों पार्टनर पर्याप्त खुले और लचीले नहीं थे और अपने मुख्य पार्टनर से उतने अलिप्त नहीं हो सके थे, जितना वे समझते थे कि हो गए हैं!

अहं के चलते आपसी संबंधों में आने वाली समस्याओं से कैसे निपटें – 29 अक्टूबर 2015

एक सप्ताह से मैं जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं के बारे में लिखते हुए यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि उनसे कैसे निपटा जाए। आर्थिक समस्याओं से शुरू करते हुए मैंने आपसी संबंधों में पैदा होने वाली समस्याओं पर चर्चा की थी और कल जानलेवा बीमारियों और जीवन में भूचाल पैदा करने वाले अपघातों या उनसे होने वाली अपंगताओं के बारे में लिखा था। जबकि ये समस्याएँ निश्चित ही बड़ी गंभीर समस्याएँ हैं, जिनमें दूसरों की मदद की ज़रूरत पड़ सकती है, एक और समस्या अक्सर मेरी नज़र से गुज़रती है और जिनसे निपटना ज़्यादातर लोगों के लिए ख़ासा मुश्किल होता है: संबंधों में अहं के चलते पैदा होने वाली परेशानियाँ।

ऐसा लगता है कि इस विषय का ज़िक्र आते ही लोग आहें भरने लगे हैं, जो मुझे लगभग सुनाई दे रही हैं। लगभग सभी वे लोग, जो किसी स्थाई संबंध में मुब्तिला हैं, समझ गए हैं कि मैं किस बात का ज़िक्र कर रहा हूँ। यह समस्या सबसे जटिल है और सबसे महत्वपूर्ण भी क्योंकि आपसी संबंध का अर्थ ही है साथ रहना, दोनों का मिलकर एक हो जाना! जबकि अहं बहुत निजी इयत्ता है, खुद को दूसरों के ऊपर रखना- साथ रहने वाले दो व्यक्तियों के बीच एक ऐसी मनःस्थिति, जो समस्याएँ पैदा कर सकती है!

बहुत से उदाहरणों में आप देख सकते हैं कि कहीं आपके साथ भी यह समस्या तो नहीं है। पहला उदाहरण है: आपके साथी ने कोई छोटी सी गलती की और आपने उसे ठीक करके उसे बता दिया कि उससे आपको तकलीफ पहुँची है लेकिन आपका साथी इस बात का बतंगड़ बना देता है या बना देती है। उसका अहं यह मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि उसने कोई गलती की है और आपके बीच लंबा वाद-विवाद शुरू हो जाता है, जबकि बात ज़रा सी है, बल्कि विवाद की कोई बात ही नहीं है-सिर्फ अहं के चलते यह समस्या पैदा हुई है। या, आप स्वयं नोटिस करते हैं कि अपनी गलती मानना आपके लिए भी कितना मुश्किल है जबकि आप जानते हैं कि इस मामले में आप किसी न किसी तरह दोषी तो हैं ही। आपका अहं आपको अपनी गलती स्वीकार करने और पश्चाताप करने या माफ़ी मांगने से रोकता है।

लेकिन यह सिर्फ अफ़सोस ज़ाहिर करने की बात नहीं है! उदाहरण के लिए, अगर आपके मन में अपने कमरे को नए सिरे से सजाने का कोई विचार है या आप साथ मिलकर छुट्टियाँ मनाने का कोई कार्यक्रम बना रहे हैं और इस संबंध में आपका विचार आपके साथी से बिल्कुल मेल नहीं खा पा रहा है तो आप तभी कोई रास्ता निकाल सकते हैं जब आपमें से कोई एक अपने अहं को तिलांजलि देकर सामने वाले की बात मान ले! हालांकि अच्छा हो अगर कोई बीच का रास्ता निकल सके-कोई पर्यटन-स्थल, जो आप दोनों को पसंद हो या घर की कोई सजावट, जो दोनों के मन को भा सके!

आप समझ चुके होंगे कि बात किस ओर इशारा कर रही है: किसी साझेदारी में आपको कोई न कोई साझा पथ खोजना ही पड़ता है। मेरा विश्वास है कि प्यार में किसी न किसी एक को अपने अहं का परित्याग करना चाहिए! अपने आपको सही बताने का और अपनी बात पर अड़े रहने का कोई अर्थ नहीं है और सामने वाले अपने साथी की खुशी में खुश होने का भी अपना अलग आनंद है-भले ही इसके लिए अपने मन को कुछ अलग तरह से तैयार करना पड़े! सफल संबंधों में आप यही चीज़ पाएँगे: दो लोग, जो आपस में चर्चा करते हैं, एक दूसरे की वरीयताओं को जानते-समझते हैं और तदनुसार अपना रास्ता चुनते हैं, जिसमें स्वतंत्रता और आनंद दोनों प्राप्त होते हैं।

मैं एक बार और कहना चाहता हूँ कि यह आसान नहीं है-लेकिन अगर आप प्रेम में मुब्तिला हैं तो मुझे लगता है कि आप इसका उचित बंदोबस्त कर सकते हैं!

बात करने के लिए कभी-कभी आपको किसी दूरस्थ मित्र की ज़रूरत पड़ती है – 8 सितंबर 2015

हाल ही में मैं अपने एक मित्र से बात कर रहा था। वह आस्ट्रिया में रहता है और उससे मेरी मुलाक़ात छह साल पहले अपने आस्ट्रिया दौरे के समय हुई थी। इस बीच हम लोग कभी-कभार बात करके एक-दूसरे के हालचाल ले लिया लिया करते थे, एक दूसरे की गतिविधियों के बारे में पूछ-ताछ कर लेते थे। पिछले हफ्ते उसका फोन आया, सिर्फ मौसम का हाल जानने के लिए नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में, मुझसे मदद चाहता था।

हर व्यक्ति जानता है कि मित्र होते ही इसलिए हैं कि ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद ली जा सके। लेकिन ऐसे मौके भी आते हैं, जब आप अपनी कुछ बातें अपने करीबी मित्रों को नहीं बता सकते, आप कुछ बातें उनके साथ साझा करने में संकोच करते हैं। ऐसे वक़्त, आपका कोई ऐसा दूर रहने वाला मित्र हो, जो सारी परिस्थिति को कुछ दूर से देख-समझ सके, तो अच्छा होता है। मेरे आस्ट्रियाई मित्र के साथ कुछ ऐसा ही था।

जब पहले-पहल मेरा उससे परिचय हुआ था, तब, हाल ही में अपनी पत्नी और दो छोटे-छोटे बेटों के साथ वह अपने नए घर में रहने आया था। नई जगह में नए जीवन की शुरुआत करते हुए वे बहुत उल्लसित थे। उनका बड़ा बेटा उसी साल स्कूल जाना शुरू करने वाला था और सब कुछ बढ़िया चल रहा था।

फोन पर उसने मुझे बताया कि परिस्थितियों में बहुत सारी तब्दीलियाँ आ चुकी हैं। उसे पता चला है कि सालों से उसकी पत्नी उसके साथ छल कर रही थी और उनके साझा दोस्त के साथ उसके संबंध थे। इसलिए वह उससे अलग होकर तलाक लेना चाहता था। उसका दिल टूट चुका था और वह यह निर्णय ले भी चुका था: अर्थात, वह उसे भूल भी नहीं पा रहा था और उससे संबंध भी तोड़ना चाहता था।

यह समझने के लिए कि वह अपने स्थानीय मित्रों से इस बारे में बात क्यों नहीं कर सकता था, आपको दो और बातें जाननी आवश्यक हैं। मेरा दोस्त बहुत छोटे से गाँव में रहता था, जहाँ हर कोई अक्षरशः एक-दूसरे को जानता है। संबंध टूटने या संबंध में तनाव होने जैसी कोई भी खबर वहाँ छिपी नहीं रह सकती थी- बाज़ार-मुहल्लों में इसकी चर्चा होनी शुरू हो जाती और तुरंत हर कोई इसे जान सकता था।

दूसरा कारण यह था कि उसकी पत्नी कुछ समय से शराब की आदी हो चुकी थी। मेरे मित्र ने पत्नी की मदद की लेकिन इस बात का भी भरसक प्रयास किया कि गाँव में यह बात न फैले। वह अपनी पत्नी को, परिवार की प्रतिष्ठा को और बच्चों को इन सब परेशानियों से दूर रखना चाहता था और उन्हें बदनामी से बचाना चाहता था।

और अभी भी वह यही कर रहा था। वह अपना सिरदर्द अपने दोस्तों के साथ साझा नहीं करना चाहता था-वह अपनी वैवाहिक समस्याओं के बारे में उनसे कहना नहीं चाहता था सिर्फ इसलिए कि सारा गाँव तुरंत इस बात को जान जाएगा। दूसरी समस्या यह थी कि पत्नी की शराब की लत की वजह से वह अपने बेटों को उसके पास छोडना नहीं चाहता था! बिना पत्नी को तकलीफ पहुँचाए यह बात भी वह किसी से नहीं कह सकता था- कम से कम वह ऐसा समझता था! क्योंकि, हर कोई वह बात जान जाएगा, जिसे वह इतने समय से छिपाने की कोशिश कर रहा था!

तो इस तरह उसने मुझे यह पूछने के लिए फोन किया था कि क्या किया जाए।

सबसे पहले तो मैंने उससे कहा कि उसके और शीघ्र ही भूतपूर्व हो जाने वाली पत्नी के विषय में लोग क्या सोचेंगे, उसे इस बात की चिंता छोड़ देनी चाहिए! उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। उसके दिल में मची हलचल, उसकी भावनाएँ और उसके बच्चे अधिक महत्वपूर्ण हैं! इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे क्या सोचते हैं और दूसरे क्या कहेंगे- उसके बच्चों को सुरक्षित होना चाहिए! उसे चिंता न करने की सलाह देने के अलावा मैंने उससे कहा कि किसी अच्छे वकील से मिलकर उससे सारी बातों की चर्चा करे।

फिर अपने दोस्त से मिले और बात करे। आपको चाहिए कि अपने अंदर की बात किसी न किसी को अवश्य बताएँ! उसकी पत्नी को शराब की लत के संबंध में मदद की ज़रूरत है और यह बात छिपाकर कोई लाभ नहीं है, उससे यह लत छूटने वाली नहीं है। उसे दबाने की कोशिश करके वह उसकी कोई मदद नहीं कर रहा होगा-और अंत में मैंने उससे कहा कि अब तुम्हारे बेटों को तुम्हारी ज़रूरत है!

मैंने उसे उससे कहा कि कैसे गाँव छोड़कर किसी दूसरे शहर में रहना भी एक विकल्प हो सकता है, फिर से एक नया जीवन शुरू करना- लोगों की बेकार चर्चाओं से, अफवाहों, कानाफूसियों से दूर किसी शांत जगह में। इस बीच एक दिन सब ठंडा पड़ जाएगा और सिर्फ वही, जो उसके सच्चे मित्र हैं, उसके साथ खड़े रहेंगे!

वह खुश हुआ, मुख्य रूप से इसलिए कि वह किसी से अपनी बात साझा कर सका। और मैं खुश हूँ कि मेरे ऐसे मित्र भी हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर मुझे, इतनी दूरी के बावजूद, याद कर लेते हैं!

दिन भर के कामकाज और मेहनत के बाद क्या आप सेक्स के लिए बेहद थक जाते हैं? 10 अगस्त 2015

कुछ समय पहले मुझसे किसी ने अपनी एक व्यक्तिगत समस्या पर सलाह मांगी: दिन भर कामकाज में व्यस्त रहता था। जब घर लौटता था तो अपने काम के तनाव और श्रम के कारण मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यंत शिथिल पड़ जाता था। या तो उसके पास समय नहीं होता था या समय होता था तो इतनी शक्ति नहीं होती थी कि पत्नी के साथ सम्भोग कर सके! इसके चलते स्वाभाविक ही पत्नी असंतुष्ट रह जाती थी और दुखी रहने लगी थी। उसे क्या करना चाहिए?

सर्वप्रथम तो यह कि यह बड़ी अच्छी बात है कि आप किसी दूसरे से सलाह मांगने की ओर उद्यत हुए हैं क्योंकि समय आ गया है कि आप इस विषय में गंभीर हो जाएँ! जब आपके संबंध उस स्तर तक पहुँच जाते हैं, जहाँ शिकायतों का स्वर तीक्ष्ण होने लगता है और दोनों एक-दूसरे से अप्रसन्न रहते हैं तब आपके लिए अपनी जीवन-चर्या पर गंभीरता पूर्वक विचार करना ज़रूरी हो जाता है! अच्छा हो अगर आप उसमें कुछ बड़े परिवर्तन भी कर सकें!

दूसरे, मैं आशा करता हूँ कि सहवास-सुख की कमी सिर्फ आपकी पत्नी नहीं, बल्कि आप भी महसूस कर रहे होंगे!

जब एक बार आप विवाह कर लेते हैं तो आपके साथ हाड़ मांस का एक और प्राणी भी साथ रहने लगता है, जिसकी आपसे कुछ जायज़ अपेक्षाएँ होती हैं। यहाँ मैं आर्थिक अपेक्षाओं की बात नहीं कर रहा हूँ! और स्पष्ट कहूँ तो मैं सिर्फ भौतिक अपेक्षाओं की बात भी नहीं कर रहा हूँ! असल में यह समस्या सेक्स से संबंधित है ही नहीं। वह भावनाओं और प्रेम से संबंधित है। परस्पर प्रेम के साझेदार के रूप में आपकी पत्नी का आपके हृदय और आपके समय पर कुछ अधिकार तो है ही!

आप खुद निर्णय करें: आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है? क्या आप अपने काम के लिए जी रहे हैं या सिर्फ आजीविका के लिए काम कर रहे हैं? आपको अपना काम ज़्यादा प्रिय है या पत्नी के साथ समय बिताना?

मुझे गलत न समझें- अपने काम में भी आपको मज़ा आना चाहिए। लेकिन ज़्यादा आनंद आपको अपने परिवार या साथी के साथ समय बिताने में आना चाहिए। अगर इस तरह आप अपना दिल पत्नी के सामने नहीं खोल सकते तो आपको जीवन जीने का कोई और तरीका अख्तियार करना चाहिए था!

बहुत से लोग कहेंगे: 'मैं यह सब, इतनी कड़ी मेहनत उन्हीं के लिए कर रहा हूँ, अपने परिवार के लिए, उनके भविष्य के लिए और बच्चों के लिए!' विशेष रूप से, जब आपके बच्चे भी हैं तो आपको यह समझना चाहिए कि आप ऐसे आनंद में अपना समय नहीं गुज़ार सकते। मेरा दावा है कि अगर आप कुछ कम काम करते हैं, थोड़ा कम पैसा कमाते हैं लेकिन कुछ अधिक समय परिवार और पत्नी के साथ गुज़ारते हैं तो आपका जीवन वास्तव में बेहतर हो जाएगा!

अगर आप इसी तरह चलते रहे, अपना रवैया नहीं बदला तो आप और आपका साथी एक-दूसरे से और दूर होते चले जाएँगे। अब आपको तय करना होगा कि आप साथ रहने में और एक-दूसरे से प्रेम करने में ज़्यादा रुचि रखते हैं या अपने काम में ही रमे रहना चाहते हैं। अगर आप अपने काम को चुनते हैं और पत्नी भी किसी दूसरी बात में मन लगा लेती है, कोई ऐसी रुचि पैदा कर लेती है, जहाँ वह अपना समय बिताना चाहती है तो फिर आपके पास शिकायत का कोई कारण नहीं होना चाहिए!

अपनी पत्नी से यह अपेक्षा न करें कि वह ताजिंदगी घर की सफाई करती रहेगी, बच्चों की देखभाल करती रहेगी और आपका इंतज़ार करती रहेगी कि जब आपको समय मिलेगा तो आप आएँगे और उसके साथ समय बिताएँगे। या उसके साथ बिस्तर साझा करेंगे- हालांकि इस मामले में सेक्स सिर्फ एक निशानी है कि आप लोग आपस में कितना करीब हैं। वह सिर्फ परस्पर प्रेम का भौतिक इज़हार है! और फिलहाल आपका काम उसे धीरे-धीरे खत्म कर रहा है!

आपके लिए आवश्यक है कि दैनिक जीवन में आप अपने प्रेमीजनों के लिए समय निकालें और फिर सप्ताहांत को वास्तविक सप्ताहांत बनाएँ- परिवार के साथ कहीं छुट्टियों पर निकल जाएँ या दो दिन का समय उनके साथ कुछ अलग तरह से बिताने की कोशिश करें। सिर्फ समय न गुजारें- ज़िंदगी का लुत्फ उठाएँ!

क्या आध्यात्मिकता (धार्मिकता) का अर्थ यह है कि आप दगाबाजी करें फिर अपने आप को माफ़ भी कर दें? 15 जुलाई 2015

कुछ सप्ताह पहले यहाँ आश्रम के एक मेहमान के साथ मैंने एक व्यक्तिगत सलाह सत्र किया था। वह शारीरिक विश्रांति और मानसिक स्पष्टता हेतु भारत आया था और इसलिए उसने हमारे आयुर्वेद योग अवकाश कार्यक्रम की बुकिंग की थी। कार्यक्रम के अंतर्गत वह योग कक्षाओं में शामिल हुआ और आयुर्वेदिक मालिश और चिकित्सा प्राप्त की। इससे बढ़कर, उसने मुझसे बात करने की इच्छा भी प्रकट की। वास्तव में वह महज अपनी निजी गुप्त बातों और उनके चलते उसके मस्तिष्क में व्याप्त जटिलताओं को सुलझाने के उद्देश्य से सारी बातचीत करना चाहता था।

उस व्यक्ति ने अपने संबंध के बारे में मुझे बताया। वह आठ साल से एक महिला के साथ संबंध रखे हुए थे। वे एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे और एक दूसरे की भावनाओं का खयाल रखते थे लेकिन कभी विवाह करने का विचार उनके मन में नहीं आया। वे जिस तरह रहा करते थे, उसी में खुश थे और उन्हें एक दूसरे के होने के बारे में किसी आधिकारिक प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं थी। पिछले तीन साल से वे एक साथ, एक छत के नीचे रह भी रहे थे।

बोलते-बोलते इसी क्षण वह थोड़ा हिचकिचाया फिर कहा, "लेकिन मैं कभी भी उसके प्रति वफ़ादार नहीं रहा था।" वह काफी समय से अपने साथी के साथ धोखेबाज़ी कर रहा था और कई दूसरी महिलाओं के साथ यौन संबंध रखे हुआ था। ये सभी संबंध उन महिलाओं से होते थे, जिनसे वह कुछ समय पहले ही मिला होता था, फिर उनके बीच एक रात का संबंध बन जाया करता था और बाद में कभी उनकी मुलाक़ात नहीं होती थी। संयोग से, एक महिला ऐसी भी थी जो दोनों की साझा मित्र थी।

अपने सलाह सत्रों में अब तक मैं बहुत से लोगों से बातचीत कर चुका हूँ और यह विषय मेरे लिए कतई नया नहीं था। इसलिए जब यह व्यक्ति चुप हुआ और उसने बड़ी आशा से मेरी तरफ आँख उठाकर देखा तो मैंने उसे वही सलाह दी, जो अक्सर इन मसलों पर देता आया हूँ: सच का दामन न छोड़ें! अगर आप किसी और से प्रेम करते हैं तो उसे अपने साथी से कहें। अगर आप यह बात छिपाते हैं तो यह भेद जहर बनकर धीरे-धीरे न सिर्फ आपके संबंधों को दूषित करेगा बल्कि आपके दिमाग को भी करेगा। समय आएगा, जब आप अपने आपको इतना बुरा समझने लगेंगे कि अपना भेद छिपा नहीं पाएँगे। अभी भी मौका है, अगर आप ईमानदारी से सारी बातें खुलकर उसे बता दें और माफी माँग लें तो संभव है, वह आपको क्षमा कर दे।

लेकिन मेरी सलाह पर उसकी प्रतिक्रिया पर मैं स्तब्ध रह गया: "ओह, मैं अपने आपको गुनहगार नहीं समझता! मैं उस तरह का आदमी नहीं हूँ। मैं अपने आपको माफ कर सकता हूँ! लेकिन मुझे डर है कि वह इतना घबरा जाएगी कि अवसादग्रस्त हो सकती है! जिस घर में हम रह रहे हैं, वह उसी का है- वह मुझे निकाल बाहर करेगी…पता नहीं, इस शहर में मैं अपना घर ले पाऊँगा या नहीं!"

चलिए, सच तो सामने आया: आध्यात्मिक रूप से यह आदमी इतना पहुँचा हुआ है कि एक महिला के साथ दगाबाज़ी करके खुद अपने आपको माफ कर सकता है और ऊपर से यह दावा भी कर सकता है कि वह उस महिला से प्रेम करता है! इससे ज़्यादा क्या स्पष्ट होना था! फिर, वह उस महिला के साथ उसके घर में रहने में अपना फायदा भी स्पष्ट देख रहा है… अब उसके दिमाग का एक भ्रम मुझे दूर करना था: अगर आप ऐसा कुछ करते हैं, जिससे आपके साथी को नुकसान पहुँचे और फिर उस बात को उससे छिपाते भी हैं तो स्पष्ट है कि आप उससे प्रेम नहीं करते बल्कि सिर्फ उसके प्रेम का लाभ उठाना चाहते हैं!

आईने की तरह साफ – क्या ख़याल है आपका?