अपने बच्चों को टीवी से दूर रखें – यह उनके लिए नुकसानदेह है! 21 अप्रैल 2015

कल मैंने आपको एक ऐसे विज्ञापन के विषय में बताया था, जिसका समर्थन मैं कतई नहीं कर सकता। यह उत्पाद अभिभावकों को और भी ज़्यादा अपराध-बोध से ग्रस्त कर देगा। बच्चों को टीवी से दूर कहीं और व्यस्त रखकर अभिभावकों के लिए और ज़्यादा मुक्त समय मुहैया कराके। जहाँ मैं समझता हूँ कि इस उत्पाद का प्रस्तुतीकरण बड़ा बेहूदा है वहीं मैं टीवी से बच्चों को दूर रखने के नज़रिये का पूरा समर्थन करता हूँ-क्योंकि वह उनके लिए अच्छा नहीं है।

स्वाभाविक ही, विज्ञापन के इस क्लिप में कहा गया कि टीवी देखने वाले बच्चों में मोटापे की समस्या का खतरा अधिक होता है। मेरा विश्वास है कि सभी जानते होंगे कि यह तर्कसंगत बात है: अगर आप टीवी के सामने बैठे हैं तो स्वाभाविक ही आप बगीचे में दौड़-भाग करने या ट्रैंपोलीन पर कूद-फांद करने या अपने दोस्त या भाई-बहन को लपककर पकड़ने के मुक़ाबले कम कैलोरी खर्च करेंगे! सीढ़ियाँ चढ़ना-उतरना, रसोई, बैठक और बेडरूम के बीच दौड़-भाग करना आदि- निश्चित ही अगर बच्चे टीवी स्क्रीन के सामने न बैठें तो वयस्कों के मुक़ाबले वे दिन भर में ज़्यादा फासला तय कर सकते हैं!

लेकिन इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जितना आप समझते हैं, टीवी देखने से वे उतना नहीं सीखते। कोई शिल्प बनाने की शिक्षा देने वाला कार्यक्रम आ रहा हो तो टीवी से मदद मिल सकती है और आप साथ मिल-बैठकर पेंट कर सकते हैं या कोई हस्तशिल्प या कलाकृति तैयार कर सकते हैं। मगर अभी वह समय नहीं आया है! अगर वे सिर्फ टीवी कार्यक्रम भर देखते रहते हैं और खुद कुछ करके नहीं देखते तो टीवी उन्हें वह लाभ नहीं पहुँचा सकता, जिसकी आप अपेक्षा करते हैं! असल में चीजों को महसूस करने के लिए उन्हें छूकर देखना पड़ेगा, उन्हें कूदना-फाँदना पड़ेगा, खुद एक पैर पर खड़े होकर देखना पड़ेगा तभी वे संतुलन बनाना सीख पाएँगे। गोंद लगाकर कागजों को चिपकाकर देखना होगा कि गोंद कैसे अपना काम करता है और इस काम को सफाई से किस तरह किया जा सकता है! यह सही है कि बच्चे जो कुछ भी देखते हैं, उसे खुद करके देखने का उनमें बड़ा उत्साह होता है मगर आपको उनके सामने स्वयं कुछ करने की संभावना निर्मित करनी होगी!

और इसके बाद हम समस्या के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर आते है: बच्चे जो देख रहे हैं, उसका कथ्य क्या है!

तो ठीक है, आपका कहना है कि आपका बच्चा सिर्फ बच्चों के चैनल देखता है? कभी आपने गौर किया कि उन टीवी कार्यक्रमों में क्या दिखाया जाता है? एक-दूसरे को आग के हवाले करते, जान से मारने की कोशिश में भाग-दौड़ करते, लड़ते-झगड़ते कार्टून चरित्रों के बनावटी और कर्कश स्वर? पड़ोसी बच्चे को सिर्फ इसलिए बर्फ में जमा दिया क्यों कि उसने उन्हें झूले पर बैठने नहीं दिया!

नहीं, नहीं, नहीं! बच्चों के लिए तैयार किए गए ये कार्यक्रम कतई बच्चों के देखने लायक नहीं हैं! कुछ उपयोगी कार्यक्रम भी हो सकते हैं मगर अधिकतर कार्यक्रम तो मूर्खतापूर्ण और कुरुचिपूर्ण ही होते हैं, जिन्हें आपके बच्चों को कतई नहीं देखना चाहिए! हिंसा, रोने का नाटक करना, नखरे और ज़िद आदि, जो आप बच्चों में देखते हैं, उनकी जड़ वास्तव में उन्हीं टीवी कार्यक्रमों में होती है, जिन्हें आपके बच्चे देख रहे होते हैं और जो दरअसल सामान्य, विकास परक टीवी कार्यक्रमों से भी ज़्यादा खराब होते हैं… जबकि आप खुश होते हैं कि बच्चा व्यस्त है, आपको परेशान नहीं कर रहा है और आपको अपने लिए उन्मुक्त समय मिल गया है!

बुद्धू बक्से के इस ज़हर से उन्हें दूर रखिए और अगर आपको लगता है कि वास्तव में कोई बढ़िया कार्यक्रम आपकी नज़र में है तो कृपा करके खुद बैठकर उनके साथ देखें, जिससे न सिर्फ आप ध्यान रख सकें कि क्या दिखाया जा रहा है बल्कि उन्हें समझ में न आने वाली बातों को समझाकर उन्हें बता सकें!

लेकिन इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है, बच्चों को खेलने की ओर प्रवृत्त करना, स्वतः कोई नई चीज़ खोजने के लिए प्रोत्साहित करना। उनके साथ सकारात्मक हों और उनके साथ रचनात्मक व्यवहार करें- भविष्य में यह उनके लिए बहुत लाभप्रद हो सकता है!

अपने बच्चों को व्यस्त और टीवी से दूर रखें लेकिन इसलिए नहीं कि वे आप पर बोझ हैं! 20 अप्रैल 2015

आज मैं एक विज्ञापन के बारे में संक्षेप में लिखना चाहता हूँ, जिसने मुझे एक बार फिर यह बताया कि बच्चों के प्रति लोगों का रवैया कितना विकृत है। कई बार लगता है जैसे उनके बच्चे उन पर बोझ हों!

दरअसल ये विचार मेरे दिमाग में तब आए जब मेरी पत्नी ने मुझे एक विज्ञापन दिखाया। उसने अपने फेसबुक न्यूज़फीड पर यह विज्ञापन कई बार देखा था लेकिन उसका शीर्षक ही उसे पसंद नहीं आया था लिहाजा बहुत दिनों तक उसने उस पर क्लिक नहीं किया था। शीर्षक था: कभी सोचा- “अपने बच्चे द्वारा टीवी के सामने बिताए जा रहे समय को कैसे कम किया जाए?” क्योंकि अपरा टीवी नहीं देखती और यू ट्यूब पर वही वीडियो देखती है जिन्हें हम उसके लिए चुनकर दिखाते हैं, इसलिए हमारे लिए उस विज्ञापन का कोई खास महत्व नहीं था। लेकिन एक दिन यूँ ही उत्सुकतावश उसने उस प्रचार-वीडियो को देखा।

अपने आप में विचार अच्छा था: एक कंपनी है, जो हर माह कुछ शिल्प कला के उपकरण, पेंट और कुछ किताबों से भरा डिब्बा आपके घर भेजती है। एक अनोखा व्यावसायिक विचार, जो बच्चों के साथ उनके अभिभावकों को भी कुछ रचनात्मक करने की प्रेरणा दे सकता है। यह उत्पाद मेरी नज़र में कतई बुरा नहीं था। लेकिन समस्या थी तो उसके विज्ञापन के साथ!

वह एक कार्टून वीडियो था और उसमें एक माँ और पिता टीवी पर टकटकी लगाए अपने बच्चे की ओर परेशान से देख रहे हैं और नीचे लिखा है- ‘आप हमेशा से चाहते थे कि आपका बच्चा टीवी से दूर हो जाए…..’ और जब माँ कहती है- ‘तुम उसे टीवी के सामने से हटाओ और उसके साथ खेलो?’ तो पिता बहाना करके भागने की कोशिश करता है- ‘मैं व्यस्त हूँ, उसके साथ खेलने का मेरे पास समय नहीं है!’ और माँ परेशान सी गंभीर सोच में डूबी हुई कहती है- ‘व्यस्त तो मैं भी हूँ।’ उसके बाद कुछ वैज्ञानिक आंकड़े देते हुए प्रमाणित किया गया है कि टीवी देखना बच्चों के लिए क्यों बुरा है और अंत में इस समस्या का समाधान है: वही डिब्बा- और फिर आप देखते हैं कि पिता खर्राटे लेता हुआ सो रहा है और संतुष्ट माँ आनंद विभोर सी खेल में व्यस्त बच्चे को देख रही है।

तो उनकी समस्या यह नहीं है कि बच्चे टीवी देख रहे हैं बल्कि यह है कि माता-पिता अपने लिए समय कैसे निकालें! वे जानते हैं कि टीवी बच्चे के लिए ठीक नहीं है पर हाय, उनके पास बच्चे के साथ खेलने का समय नहीं है! और यह रहा समस्या के इलाज का अचूक नुस्खा: खिलौनों से भरा यह डिब्बा खरीदिए, जो बच्चे को व्यस्त रखेगा और फिर आपके पास समय ही समय है!

जी नहीं, परवरिश का यह तरीका ठीक नहीं है! अगर आपका कोई बच्चा है तो उसके प्रति आपकी कुछ ज़िम्मेदारी भी है! यह आप अच्छी तरह जानते हैं-अन्यथा यह पढ़कर या वीडियो क्लिप देखकर आप परेशानी महसूस नहीं करते कि 3 से 7 साल तक की उम्र बच्चे के मानसिक विकास के लिए निर्णायक होती है, कि मस्तिष्क का 80% विकास 5 साल की उम्र तक हो जाता है-और वह उसके सक्रिय व्यवहार से ही संभव होता है, कि जो बच्चे बहुत ज़्यादा टीवी देखते हैं, उनमें मोटापे की संभावना अधिक होती है! यह सब आप अच्छी तरह जानते हैं और आपको बुरा लगता है जब आप अपने बच्चे के दैनिक क्रियाकलापों पर गौर करते हैं, उसकी दिनचर्या पर नज़र दौड़ाते हैं। इसलिए अपने आप में बदलाव लाएँ!

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आपको भी अपने काम के लिए या सोचने-विचारने के लिए समय नहीं मिलना चाहिए! यह नहीं कह रहा हूँ कि दिन का हर पल आप अपने बच्चे के साथ ही बिताएँ! लेकिन अगर आप हर माह वह वह शिल्प सिखाने वाला डिब्बा खरीदने का मन बना चुके हैं तो कृपा करके कुछ समय निकालिए, बच्चे के साथ बैठिए और उन उपकरणों का बच्चे के साथ मिलकर इस्तेमाल कीजिए। उसके ज़रिए न सिर्फ उसके समय का सदुपयोग हो सके या उसके मस्तिष्क का बेहतर विकास हो सके बल्कि वह आपके परस्पर सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने का जरिया भी बने! अगर उसके साथ कोई प्यार करने वाला व्यक्ति हो, कोई अपना व्यक्ति सशरीर मौजूद हो तो आपका बच्चा बहुत कुछ अतिरिक्त भी सीख सकता है!

यह दुख की बात है कि ऐसे विज्ञापन तैयार किए जा रहे हैं और यह भी कि वास्तव में वे लोगों के घरों तक भी पहुँच रहे हैं! मैं जानता हूँ कि आप अपने बच्चों से प्रेम करते हैं-तो फिर आलसी मत बनिए-उठिए और उनके साथ खेलिए! यह मत कहिए कि आप बहुत व्यस्त रहते हैं और बच्चे के साथ खेलने का नंबर बाद में कभी आएगा-उसके सबसे सुनहरे वर्ष इतनी तेज़ी के साथ बीत जाएँगे कि आपको पता भी नहीं चलेगा!

क्या वास्तव में आप काल्पनिक संसार को वास्तविक संसार से अधिक वरीयता देते हैं? 18 सितम्बर 2014

कल मैंने कुछ कारण बताए थे कि क्यों आपको टीवी नहीं देखना चाहिए। मेरी नजर में टीवी देखना समय बिताने का इतना बुरा तरीका है कि जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। टीवी देखने के विरोध में कुछ और कारणों को सूचिबद्ध करते हुए आज मैं इस विषय का समापन करूँगा:

4) वह विज्ञापनों के हमले का ऐसा ज़रिया है, जिसके प्रभाव से आप मुक़ाबला नहीं रह सकते!

किसी भी टीवी सीरियल या टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्म के बीच ब्रेक लेते हुए लगातार अनेकों विज्ञापन प्रदर्शित किए जाते हैं। आप आधा घंटा भी लगातार किसी मनोरंजन का या समाचार या किसी जानकारी का या उसे समझने का लाभ नहीं उठा पाते। उन विज्ञापनों में से कुछ तो आप तक पहुँचते ही हैं और जितनी खूबसूरती, चतुराई और मक्कारी के साथ उन्हें तैयार किया गया है उसी अनुपात में वे आपके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं और अपने लक्ष्य में सफल हो जाते हैं! आपको उन वस्तुओं के विज्ञापन इतनी बार देखने पड़ते हैं कि न सिर्फ आप उन्हें अच्छी तरह जानने लगते हैं बल्कि उन पर भरोसा भी करने लगते हैं। सिर्फ बार-बार उन्हें देखते रहने के कारण। इसी तरह ये विज्ञापन आपके अवचेतन में यह एहसास पैदा कर देते हैं कि उन चीजों का आपके पास होना बहुत ज़रूरी हैं भले ही आपके लिए वे कितनी भी अनुपयोगी क्यों न हों। कोई इलेक्ट्रोनिक सामान, खाने-पीने की वस्तुएँ या बीमा पॉलिसियाँ, कुछ भी!

सच यह है कि ये विज्ञापन बेहद असरदार होते हैं। यह अपनी बात मनवाने का, दिमाग को लुंज-पुंज करके उसमें अपनी बात स्थापित करने का बहुत ही नर्मो नाज़ुक और सूक्ष्म मगर बेहद पुरअसर तरीका है, जिसके सामने आप निरुपाय हो जाते हैं! अगर आप नहीं चाहते कि आपके साथ ऐसा हो तो टीवी बंद कर दीजिए!

5) टीवी देखकर आप काल्पनिक दुनिया में खो जाते हैं और फिर जीवन के यथार्थ आपको आवसाद से भर देते हैं!

यह मुद्दा आखिरी मगर कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस पर मैं अधिक जोर भी नहीं दे पाऊँगा क्योंकि यह ऎसी बात है जिसे आप अक्सर समझ ही नहीं पाते, विशेषकर यदि आप बहुत ज़्यादा टीवी देखते हैं: वे टीवी सीरियल और फ़िल्में आपको इस तरह बाँध लेती हैं कि आप उसी में डूब जाते हैं, दूसरी बातों पर सोच ही नहीं पाते। वे महज किस्से-कहानियाँ होती हैं मगर इतनी अच्छी तरह पेश की जाती हैं, उनका निर्देशन इतना यथार्थवादी होता है कि नतीजतन आप इस तरह उनके मुख्य चरित्रों के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं कि उनकी भावनाएँ आपके साथ एकरूप हो जाती हैं! आप उनके साथ दुखी होते हैं, उनका सुख आपका सुख बन जाता है! सवाल यह है कि इसमें समस्या क्या है?

धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से आपका संपर्क कम होता जाता है। आप सोच रहे होंगे कि यह कुछ अतिवादी सोच है मगर ऐसा नहीं है! यह प्रक्रिया जो आपको काल्पनिक दुनिया में खींच ले जाती है, बहुत धीमी गति से काम करती है। इसकी शुरुआत इससे होती है कि आप कल्पना करने लग जाते हैं कि यह एक वास्तविक दुनिया है। आप रुपहले पर्दे की उस दुनिया की तुलना अपने जीवन से करते हैं तो पाते हैं कि आपकी वास्तविक दुनिया उस दुनिया से कभी भी बेहतर नहीं हो सकती!

पहली बात तो यह कि वास्तविक दुनिया कभी भी टीवी और फिल्मों की दुनिया की तरह रोमांचक, रुपहली और उत्तेजक घटनाओं से परिपूर्ण नहीं हो सकती! उसमें पूरे जीवन की कहानी दो घंटों में पेश कर दी जाती है और आपको महसूस होता है कुछ छूट रहा है! टीवी सीरियल्स में हर हफ्ते कोई न कोई मरता है, शादी करता है, किसी न किसी के साथ धोखा होता है, कोई दुर्घटना हो जाती है और बचा लिया जाता है या उसके प्रेमी के साथ उसका मिलन हो जाता है! अगर यह जीवन के बहुत करीब होगा या उससे मिलता-जुलता होगा तो वह बड़ा उबाऊ हो जाएगा और उसे देखना कोई पसंद नहीं करेगा-आखिर आप अपने जैसे किसी साधारण व्यक्ति को क्यों देखना चाहेंगे? आपने गौर किया होगा कि 'बिग ब्रदर' जैसे रियलिटी शो भी ऐसे लोगों को ही चुनते हैं जो अपने जीवन में सामान्य, साधारण लोगों से कुछ अलग होते हैं, जिससे उसे ज़्यादा से ज़्यादा 'असाधारण' और रोचक बनाया जा सके!

टीवी देखने की आदत का आखिर नतीजा क्या होता है? नतीजा यह होता है कि अपने जीवन से जिन लोगों की अयथार्थवादी और गैर मामूली उम्मीदें होती हैं वे निराश हो जाते हैं।

टीवी के पर्दे से दूर रहिए, अपने बच्चों को प्रकृति के नजदीक ले जाइए, वास्तविक दुनिया का आनंद लीजिए!

आपका समय अमूल्य है, उसे टीवी सीरियल देखकर बरबाद न करें! 17 सितंबर 2014

हम लोग इस वक़्त जर्मनी में एक सुखद और भावुक कर देने वाला सप्ताह गुज़ारकर भारत की ओर उड़ान भरने वाले हैं। दुर्भाग्य से अपरा को सर्दी और खाँसी हो गई है और बहुत छींकें आ रही हैं, बल्कि मामूली बुखार भी है। वैसे कोई ख़ास बात नहीं है और हमें विश्वास है कि हम बगैर किसी परेशानी के भारत पहुँच जाएँगे। पिछली बार लगभग पूरे सफ़र में वह सोती रही थी-और मैं भी उसके साथ सोता रहा था। और इस बीच रमोना कोशिश करती रही कि समय गुज़ारने के लिए कोई टीवी कार्यक्रम देखे मगर आखिर उसका मन नहीं हुआ। जब मेरी नींद खुली तो हम टीवी पर चर्चा करते रहे कि किस तरह वह एक व्यसन की तरह चिपक जाता है और यह भी कि क्यों मैं टीवी सीरियलों पर समय बरबाद करने को बहुत बुरा समझता हूँ। तो, ये रहे वे कारण, जिनके चलते मैं समझता हूँ कि आपको टीवी नहीं देखना चाहिए:

1) टीवी देखना समय की बरबादी है!

यह बड़ी सहज, स्वाभाविक तर्कपूर्ण बात है: इस दृश्य-यंत्र के सामने बिताए जाने वाले समय का उपयोग आप बहुत से दूसरे कामों को निपटाने, जैसे, घर की सफाई और उसे व्यवस्थित करने में कर सकते हैं। अगर इन कामों को निपटाने के बाद ही आप टीवी देखने बैठे हैं तो उसकी जगह आप मित्रों से मेल-मुलाक़ात कर सकते हैं, कुछ रचनात्मक कर सकते हैं, चित्रकारी सीख या कर सकते हैं, खेल सकते हैं, तैरने जा सकते हैं या किसी बेहतर काम में अपनी ऊर्जा खपा सकते हैं। टीवी के सामने बैठना आपको कुछ भी प्रदान नहीं करता। वह सिर्फ आपका समय गुज़ारने का काम करता है। अगर आप टीवी पर चल रहे कार्यक्रम में दिमागी तौर पर शामिल हो जाते हैं, उसमें डूब जाते हैं तो दो-तीन घंटे इस तरह गुज़ारना कोई बड़ी बात नहीं है! अगर आपके पास बहुत सारा फालतू समय है तो उसके सामने अवश्य बैठिए लेकिन अगर नहीं है तो इस चीज़ से दूर ही रहें!

2) आप इस समय का उपयोग कुछ नया सीखने में कर सकते हैं मगर करते नहीं!

लेकिन इस पर ईमानदारी के साथ सोचा जाए: जी हाँ, दुनिया को देखने-समझने के लिए टीवी से बढ़कर कुछ नहीं है। वह आपको डॉक्यूमेंटरीज़ देखने की सुविधा प्रदान करता है, दुनिया के बारे में अधिक से अधिक जानने का अवसर। दूसरी संस्कृतियों को गहराई से समझने के लिए, महत्वपूर्ण विषयों पर हो रही चर्चाओं से अपनी ज्ञान-वृद्धि के लिए या रोज़मर्रा जीवन में काम आने वाली वस्तुएँ कैसे काम करती हैं, जानने के लिए आप उनसे सम्बंधित टीवी कार्यक्रम देख सकते हैं। आप ऐसा कर तो सकते हैं मगर अक्सर 90% मामलों में आप ऐसा नहीं कर रहे होते।

आप टीवी का उपयोग निरर्थक मनोरंजन के लिए करते हैं। जी हाँ, ईमानदारी की बात यही है। इसलिए जब आप कोई ताज़ा सीरियल (soap opera) या रियलिटी शो देखते हैं तो यह मत कहिए कि आप अपने सोच-विचार की सीमाओं का विस्तार कर रहे हैं! आप सिर्फ यह चाहते हैं कि मस्तिष्क को कुछ सोचना न पड़े, टीवी आपका शुद्ध मनोरंजन करे और आपके मन को हल्का सा स्पर्श करता हुआ निकल जाए!

3) वह आपको-और आपके बच्चों को और ज़्यादा- आक्रामक बनाता है!

यह कोई नयी बात नहीं है और मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग यह बात नहीं मानते। लेकिन मैं मानता हूँ! ख़ासकर आपके बच्चों के सम्बन्ध में! वे आपको टीवी के सामने बैठा हुआ देखते हैं तो वे भी देखने लगते हैं। और आजकल के टीवी कार्यक्रम, ख़ास बच्चों के लिए तैयार कार्यक्रम भी, इस कदर हिंसा से भरे होते हैं कि मैं कभी नहीं चाहूँगा कि मेरी बेटी ये कार्यक्रम देखे! जो वे देखते हैं उस पर सहज ही विश्वास कर लेते हैं, सोचने लगते हैं कि जो टीवी पर दिखाया जा रहा है वही उचित है, वैसा ही होना चाहिए भले ही उसमें लोगों को आपस में लड़ता-झगड़ता, मार-काट करता दिखाया जा रहा हो या निरुद्देश्य अति-हिंसा दिखाई जा रही हो! इसमें टीवी के कारण शारीरिक गतिविधियों में स्वाभाविक ही आ जाने वाली कमी को जोड़ लें, व्यायाम हेतु समयाभाव को जोड़ लें तो ये सब मिलकर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करते हैं जिसमें स्वाभाविक रूप से बच्चों के कोमल मस्तिष्क में हिंसा प्रवेश कर जाती है-और आप भी इससे अछूते नहीं रहते!

इस बारे में अपने कुछ और विचार मैं कल के ब्लॉग में लिखूँगा!