धर्म, सेक्स, ईश्वर और आपके पूर्वजों के बीच क्या संबंध है? 13 अक्टूबर 2015

आज से नवरात्रि की शुरुआत है, जो हिंदुओं का एक पवित्र त्योहार है और कई दिनों तक चलता है। यह बताने के स्थान पर कि इन नौ दिनों में हिन्दू क्या करते हैं, मैं आज आपको बताऊँगा कि वे क्या नहीं करते: सेक्स। जी हाँ, और इसे 15 दिन और खींचकर लंबा कर दिया जाता है, जो दोनों मिलाकर 24 दिन हो जाते हैं और माना जाता है कि अच्छे, आस्थावान हिन्दू इन 24 दिनों में संभोग नहीं करते। गजब!

असल में इस बात का एहसास मुझे हाल ही में एक मित्र के साथ बातचीत के दौरान हुआ। वह उच्च जाति का धार्मिक व्यक्ति है और हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों का सख्ती के साथ पालन करता है। बातचीत के दौरान उसने बताया कि दो हफ्तों से उसने सम्भोग नहीं किया है। अपने जीवन में वार्षिक श्राद्ध के इन दो हफ़्तों के दौरान उसने कभी सेक्स नहीं किया। तभी मुझे आगामी त्योहारों में होने वाले जश्न का खयाल आया और मैंने पूछा, ‘तब तो नवरात्रि के अगले दस दिन भी तुम सम्भोग नहीं करोगे?’ उसने कहा कि नही, बिल्कुल नहीं-नवरात्रि के दिन तो बहुत पवित्र होते हैं, सम्भोग का सवाल ही नहीं उठता!

न जाने कितने हिन्दू यह पढ़कर मुझे भला-बुरा कहेंगे-नवरात्रि का पहला दिन है और इसे चर्चा के लिए यही विषय मिला!

पिछले 15 दिन का समय हर साल वह समय होता है जब हिन्दू अपने पूर्वजों को याद करते हैं। इन दिनों में वे अपने मृत पूर्वजों के लिए कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। वे मानते हैं कि इस समय उनके मृतक रिश्तेदार उनके करीब होते हैं। इन दिनों में वे कोई नया या शुभ कार्य शुरू नहीं करते क्योंकि वे मानते हैं कि यह समय अशुभ है और इसलिए उस काम में व्यवधान उपस्थित होंगे। इस समय आप जो भी करें, उसे अपने पुरखों के विचार के साथ करें। सेक्स करना उनके प्रति असम्मान होगा, उनकी अवज्ञा मानी जाएगी और ऐसा करके आप अपने माता-पिता, दादा-दादी और दूसरे पूर्वजों का अपमान कर रहे होंगे!

लेकिन आज और आने वाले नौ दिनों की बात बिल्कुल दूसरी है। नवरात्रि का समय शुभ समय है और आम हिन्दू इन दिनों में बहुत से समारोह आयोजित करते हैं, नए काम शुरू करते हैं और मानते हैं कि ईश्वर का आशीर्वाद इन कार्यों के साथ होगा और उनका परिणाम अच्छा और शुभ होगा! और वे सेक्स करके उसकी पवित्र, लाभदायक ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहेंगे!

जी नहीं, सेक्स एक पाप की तरह है, वह किसी शुभ काम को खराब कर सकता है, जो भी अच्छा काम आप शुरू करना चाहते हैं, उसमें वह व्यवधान उपस्थित कर सकता है! यहाँ, भारत में सेक्स बहुत खराब और अपवित्र काम माना जाता है! आप सोच सकते हैं कि अगर आपके मन में सेक्स को लेकर ऐसी भावनाएँ हैं तो आप सेक्स करते हुए खुद को कितना अपराधी महसूस करेंगे! धर्म के अनुसार भारत में सिर्फ वंशवृद्धि हेतु सेक्स की मान्यता है और अगर आपका उद्देश्य बच्चे पैदा करना नहीं बल्कि प्रेम के वशीभूत अपनी और अपने साथी की शारीरिक क्षुधा शांत करना है तो निश्चित ही वह सर्वथा अनुचित है!

उसके करीब आना, जिसे आप प्रेम करते हैं, उससे लिपटना, चूमना, आनंद लेना और सबसे बढ़कर, अपनी शारीरिक इच्छाओं को संतुष्ट करना आदि हर तरह से बुरा और अनुचित माना जाता है। यहाँ तक कि वे लोग भी, जो सामान्य रूप से सोचने-समझने वाले हैं और समझते हैं कि सेक्स में कोई बुराई नहीं है, सेक्स को लेकर जड़ जमाए बैठी नकारात्मक भावनाओं के चलते सामान्य दिनों में भी अपने साथी के साथ सोते हुए अपराधी महसूस करते हैं। इन पवित्र दिनों में वे सेक्स के बारे में क्या सोचते होंगे, आप कल्पना कर सकते हैं! और यह इन नौ दिनों की ही बात नहीं है, साल भर में यहाँ त्योहारों के इतने सारे शुभ दिन हैं जब-उन लोगों के लिए, जो सेक्स को पाप मानते हैं-प्रेम का यह समारोह वर्जित है।

लेकिन यह इतना गलत विचार है कि मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं अपना विरोध ठीक तरह से कैसे व्यक्त करूँ! इस धरती पर मौजूद सबसे शानदार चीज़, प्रेम के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा शारीरिक मिलन, दो शरीरों का पिघलकर एक हो जाना, प्रेम के चलते होने वाली वह इंद्रियजन्य अनुभूति, वह भावना आदि, इन सभी को धर्म ने आसुरी करार दे दिया है। इन सीमाओं से हमें बाहर निकलना होगा-अपने व्यवहार के धरातल पर ही नहीं, बल्कि अपने दिलो-दिमाग से भी इन गलत विचारों को निकाल बाहर करना होगा!

प्रेम और उसकी अभिव्यक्ति गलत नहीं है बल्कि बहुत सुंदर है!

आस्था आपको पशुओं का मल-मूत्र भी खिला पिला सकती है – 8 अक्टूबर 2015

कल मैंने भारत की एक गंभीर होती जा रही राजनीतिक समस्या का ज़िक्र किया था। आज जिस विषय पर मैं लिखने जा रहा हूँ, उसे पढ़कर आपको हँसी आए बगैर नहीं रहेगी या घृणा से नाक-भौंह सिकोड़ेंगे या स्तब्ध रह जाएँगे! और कूपमंडूक हिन्दू रूढ़िवादियों की बात तो छोड़िए, खुद वर्तमान हिन्दूवादी भारत सरकार भी ठीक इसी बात का प्रचार-प्रसार कर रही है जबकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि गोमूत्र और गोबर के सेवन से कोई लाभ होता है!

जी हाँ, भारत में बहुत से लोग विश्वास करते हैं कि गाय का मल-मूत्र उनके लिए लाभप्रद हो सकता है। वे गंभीरता पूर्वक मानते हैं कि वह बहुत सी बीमारियों का इलाज कर सकता है। इसके अलावा वह पवित्र तो है ही! पवित्र इसलिए कि वह पवित्र गाय द्वारा, जिसे धार्मिक हिन्दू 'मानव जाति की माँ' समझते हैं, उत्सर्जित किया गया है!

यह कोई नई बात नहीं है। दरअसल बहुत से पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि गाय से प्राप्त होने वाले पाँच पदार्थों को अर्थात दूध, दही, घी, मूत्र और मल को, एक कर्मकांड के साथ ग्रहण करने से शरीर पवित्र हो जाता है। यहाँ, वृंदावन में, जोकि 'दैवी चरवाहे' कृष्ण की नगरी है, कई वर्षों से गोमूत्र और गोबर से बनी वस्तुएँ लोकप्रिय हैं। और अब, जब कि एक ऐसी पार्टी सत्ता में है, जो हिन्दू धर्म, हिन्दू परंपरा और हिन्दू मूल्यों का प्रचार-प्रसार करने में लगी है, इन वस्तुओं का बाज़ार अचानक और अधिक फल-फूल रहा है!

स्वाभाविक ही उनके विज्ञापनों में बहुत सारी अनाप-शनाप मूर्खतापूर्ण बातें हैं: सिर्फ इतना ही नहीं कि गाय का मल-मूत्र बहुत सी बीमारियों के इलाज में असरकारक है, यहाँ तक कि कैंसर भी इस चमत्कारी इलाज से ठीक हो जाता है-और यह उनका सबसे जनप्रिय दावा है। इतना ही नहीं, वे झूठी अफवाहें फैलाने में भी नहीं हिचकिचाते-कहते हैं नासा ने भी यह स्वीकार किया है कि गाय के पिछवाड़े से विसर्जित पदार्थ ग्रहण करना आपके शरीर के लिए लाभप्रद होता है! वास्तव में मैं जानना चाहूँगा कि इससे महत्वपूर्ण और कौन सी बात नेशनल ऐरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन को गाय के मूत्र का विश्लेषण करने की प्रेरणा दे सकती है!

चलिए, मज़ाक छोड़कर कुछ गंभीर बात करें। मेरा मानना है कि लोगों को गाय के मल-मूत्र में उलझाकर देश की वास्तविक समस्याओं की ओर से उनका ध्यान बँटाने का यह एक सोचा-समझा मगर कारगर तरीका है। लेकिन गाय को पवित्र, देवता या माता मानने वालों के पाखंड पर मैं एक बार फिर स्तब्ध रह जाता हूँ! वे उसे माँ कहते हैं, खास मौकों पर उसकी पूजा करते हैं और गाय द्वारा उत्सर्जित सभी वस्तुओं को प्रसाद मानकर उनका सेवन करते हैं-लेकिन जब गाय दूध देना छोड़ देती है तो उसकी कोई चिंता नहीं करते कि उसके साथ क्या हो रहा है, इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि गलियों और कचरे के ढेरों पर वह कूड़ा-करकट और जानलेवा प्लास्टिक खा रही है। उसके चमड़े से बने जूते और बेल्ट इस्तेमाल करने में उन्हें कोई एतराज़ नहीं होता! उस वक्त गाय की दैवी पवित्रता का विचार कहाँ चला जाता है? तब उन्हें नहीं लगता कि अपनी माँ की त्वचा से बने जूते पहनकर वे कोई पाप कर रहे हैं?

किसी पशु के अपशिष्ट को धर्म द्वारा पवित्र बनाकर प्रस्तुत करना वास्तव में विचलित कर देने वाला कृत्य है! इलाज के लिए खुद अपना मूत्र पीना भी कुछ लोगों में लोकप्रिय है। और अब आप गोमूत्र पी रहे हैं-आप गधे या बंदर का मूत्र भी पी सकते हैं! गोमूत्र में पाया जाने वाला कोई उपयोगी एंज़ाइम उसमें भी मौजूद हो सकता है!

मैं पूरी गंभीरता के साथ कहना चाहता हूँ कि मैं इसकी अनुशंसा कभी नहीं करूंगा! गोबर और गोमूत्र वे पदार्थ हैं, जिन्हें शरीर ने बाहर निकाला ही इसलिए है कि वे उपयोगी नहीं हैं, वे अपशिष्ट हैं! शरीर के अंग-प्रत्यंगों से होकर गुजरने के बाद इन पदार्थों का कोई उपयोग नहीं रह गया होता! फिर उन्हें आप क्यों पीएँगे या खाएँगे? बल्कि मैंने सुना है कि इन अपशिष्टों को ग्रहण करने से गाय की आँतों में पाए जाने वाले विषाणुओं के संक्रमण का खतरा भी हो सकता है!

तो धर्म की यही वास्तविक शक्ति है! वह आपको पशुओं का मूत्र पीने और उनका मल खाने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह वही धर्म है, जो एक मनुष्य का छुआ पानी पीने से भी मना करता है क्योंकि उस व्यक्ति को धर्मग्रंथों ने ‘अछूत’ घोषित कर रखा है!

क्या आप नहीं समझते कि धर्म के नाम पर यह बहुत गलत हो रहा है?

भारत में सामाजिक परिस्थिति लगातार बेहद शर्मनाक, शोचनीय और पीड़ादायक हो चली है – 7 अक्टूबर 2015

आम तौर पर मैं अपने ब्लॉग में राजनीति पर नहीं लिखता। उसके लिए मैं सोशल मीडिया का उपयोग करता हूँ लेकिन क्योंकि भारत में सामाजिक परिस्थितियाँ तेज़ी के साथ बिगड़ती जा रही हैं और अब यह विषय लगातार अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा रहा है, अगर आप इजाज़त दें तो आज मैं भी अपना खेद और प्रतिरोध दर्ज कराना चाहूँगा।

हाल ही में भारत में हुई एक घटना दुनिया भर के बड़े समाचार-पत्रों की मुख्य खबर बनी। संभव है, आपने भी इसके विषय में सुना हो। एक गाँव के हिन्दू मंदिर में वहाँ के पुजारी ने भारत की सत्ताधारी पार्टी के एक नेता के बेटे ने उससे जो कहा था, जस की तस उसकी घोषणा कर दी। वास्तव में वह महज एक अफवाह थी कि गाँव के एक मुस्लिम परिवार ने गाय का मांस खाया है। यह सुनते ही भीड़ जुट गई और उसने उस परिवार के घर की दिशा में कूच कर दिया, परिवार के पिता और उसके बेटे को घर से बाहर निकालकर उस पर ईटों से हमला किया। हमला इतना जोरदार था कि पिता की मृत्यु हो गई और बेटे को घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जो इस बुरी तरह से घायल हुआ है कि उसकी जान जा सकती है। फिलहाल वह मौत से संघर्ष कर रहा है। जाँच से पता चला है कि उन्होंने गाय का मांस नहीं बल्कि बकरे का मांस खाया था-लेकिन इससे बच्चों का पिता और उनकी माँ का पति वापस नहीं आ सकते!

यह घटना स्वयं में बेहद घृणास्पद थी और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने ठीक ही उसे अपने पृष्ठों में प्रमुखता से जगह दी लेकिन उससे भी भयावह सत्ताधारी पार्टी के दूसरे सदस्यों की प्रतिक्रिया रही! अफवाह फैलाने वाले बीजेपी के नेता के बेटे तथा कुछ और लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन उनकी पार्टी के नेता उस लड़के के व्यवहार को नज़रअंदाज़ करते हुए तरह-तरह के बहाने बना रहे हैं। उनका कहना है कि वे सब भोले-भाले बच्चे हैं, और उत्साह में यह सब कर बैठे हैं! वे हत्या के आरोप में हुई उनकी गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे हैं!

लेकिन साथ ही वे उनके इस कृत्य पर खुले आम यह कहकर मुहर भी लगा रहे हैं कि जो भी गाय का मांस खाए, उसे यही सज़ा मिलनी चाहिए! हमारे देश की सत्ताधारी पार्टी के एक लोकसभा सदस्य ने कहा कि गाय हमारी माँ है और अगर आपने हमारी माँ की हत्या की है तो आपकी हत्या भी जायज़ है! ये लोग सिर्फ गाय का मांस खाने पर किसी की भी हत्या करने पर उतारू हैं!

निश्चित ही ये सभी राजनैतिक नेता पाखंडी हैं! देश के सबसे महंगे रेस्तराँ गाय का मांस बेचते हैं, देश के कई प्रांतों में, वहाँ की स्थानीय जनता के लिए गाय का मांस एक सामान्य भोजन है। इन सब तथ्यों से उन्हें कोई परेशानी नहीं है! लेकिन वे सामान्य, धार्मिक हिंदुओं की गाय के प्रति अत्यंत संवेदनशील भावनाओं का उपयोग जानबूझकर हिंसा फैलाने में कर रहे हैं, जिससे देश की जनता का ध्रुवीकरण हो जाए, वे दो गुटों में विभक्त हो जाएँ और इन नेताओं को अधिक से अधिक वोट मिल सकें!

जी हाँ, यह एक बहुत बड़ी साजिश है। एक और बीजेपी नेता ने प्रांतीय चुनावों से पहले कहा था, ‘अगर दंगे होते हैं तो हम चुनाव जीत जाएँगे’ और अतीत में यह बात सत्य सिद्ध हो चुकी है! राजनैतिक नेता विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच, विशेष रूप से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच, हिंसक प्रतिक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं और इस तरह उन्हें अलग-अलग गुटों में विभक्त कर देते हैं और इस तरह देश के टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते हैं। इन दंगों में, निश्चित ही बहुत से लोग मारे जाएँगे। और अंत में उन्हें अधिकांश हिन्दू वोट प्राप्त होंगे और बहुमत मिल जाएगा। जो लोग अभी कुछ साल पहले तक दंगों के आरोपी थे, आज संसद और विधानसभाओं में बैठे हैं! धर्म और जाति के आधार पर वोट प्राप्त करने और चुनाव जीतने की यह बड़ी आसान सी रणनीति है!

जो थोड़ी बहुत कसर रह गई थी, वह प्रधानमंत्री की चुप्पी ने पूरी कर दी है। उनकी पार्टी विकास का मुद्दा जनता के सामने रखती है लेकिन वह एक प्रहसन से अधिक कुछ भी नहीं है-विकास सिर्फ अमीरों का हो रहा है और वे दिन-ब-दिन और अमीर होते जा रहे हैं जब कि सामान्य गरीब जनता की आर्थिक स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा है! अगर वे धार्मिक हिन्दू नहीं हैं तो उनकी हालत खराब ही हुई है, बल्कि वे संकट में हैं। दुर्भाग्य से दक्षिणपंथी पार्टी की सरकार होने के कारण अतिवादी और अतिराष्ट्रवादी हिन्दू सत्ता में आ गए हैं और न सिर्फ बहुत शक्तिशाली हो गए हैं बल्कि उन्हें इसके लिए पूरा राजनैतिक समर्थन भी मिलता है कि उन लोगों के विरुद्ध हिंसा भड़का सकें, जिनकी आस्थाएँ अलग हैं और जो उनके अनुसार नहीं सोचते।

इसी कारण जाने-माने तर्कवादियों, नास्तिक लेखकों की हत्या की जा चुकी है और धार्मिक चरमपंथियों ने बाकायदा एक सूची बना रखी है, जिसके अनुसार वे एक के बाद एक बुद्धिजीवियों, तर्कवादियों, धर्मविरोधियों या नास्तिकों को निशाना बनाने का विचार रखते हैं।

इस समय हमारा देश अत्यंत नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है और इसीलिए मैं आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ कि इस बहुत संवेदनशील समय की एक झलक आपको दे सकूँ। कल मैंने आपको बताया था कि कैसे एक छोटा सा प्रयास भी मददगार साबित हो सकता है और बहुत से प्रख्यात लेखकों का भी यही विचार है। उन्होंने इसके इस आतंकवाद के प्रतिरोध में सरकार को अपने पुरस्कार वापस कर दिए हैं। हमें यह साबित करना होगा कि हम ऐसा भारत नहीं चाहते। यह एक खुला, सांस्कृतिक विविधतापूर्ण, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबके विचारों का सम्मान करने वाला भारत नहीं है, जिसका दावा करते हम नहीं थकते!

भारत में विवाह पवित्र बंधन है इसलिए पति के द्वारा किया गया जबरन सम्भोग बलात्कार नहीं – 6 मई 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ जो सामान्यतः हमारे समाज में चर्चा का सबसे सदाबहार विषय होता है और मैं भी इस पर अपने ब्लॉग में अक्सर लिखता रहता हूँ: भारत में महिलाओं की स्थिति। आज पुनः इस विषय पर लिखने का कारण सरकार के एक मंत्री का वह बयान है, जिसमें उसने कहा है कि भारतीय संस्कृति में विवाह के अंतर्गत बलात्कार के विचार का कोई अस्तित्व नहीं है। अगर यह सच है तो क्या इससे अच्छी कोई बात हो सकती है?

इस मूर्खतापूर्ण वक्तव्य तक हम कैसे पहुँचे, मैं बताता हूँ: संयुक्त राष्ट्र के जनगणना कोष के अध्ययन का हवाला देते हुए एक महिला संसद सदस्य ने कहा कि भारत में 75% विवाहित महिलाओं के साथ उनके पतियों द्वारा बलात्कार किया जाता है। सदस्य ने सरकार से पूछा कि इस बारे में वह क्या कार्यवाही करने जा रही है।

सत्ताधारी पार्टी के एक मंत्री का जवाब यह था कि यह विचार पश्चिम से आया है और भारत में इसका कोई अस्तित्व नहीं है। 'यह विचार हमारे देश के लिए अच्छा नहीं है!' क्योंकि भारत में, उनके मुताबिक, विवाह एक पवित्र ईश्वरीय विधान और मांगलिक संबंध माना जाता है और भारतीयों की धार्मिक आस्थाओं और संस्कृति के कारण ऐसे कुकृत्य होते ही नहीं हैं।

निश्चित ही आप इस वक्तव्य पर स्तब्ध रह गए होंगे! मैं आपको बताना चाहता हूँ कि भारत में हम लोग एक धर्म समर्थक सरकार से, जो भारत की प्राचीन संस्कृति को बचाए रखने के एजेंडे पर काम कर रही है, इससे बेहतर वक्तव्य की अपेक्षा ही नहीं करते! फिर भी एक भारतीय के रूप में हमारे नेताओं की विचारशून्यता और कुबुद्धि पर सोच-सोचकर हैरान रह जाता हूँ जो ऐसी घटिया और हास्यास्पद बातें ज़बान पर लाते हैं!

हमारी प्राचीन संस्कृति में तलाक़ की कोई अवधारणा मौजूद ही नहीं है। तलाक़ शुरू ही हुआ, जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई और संविधान बना। हिन्दू कोड बिल में तलाक़ का प्रावधान किया गया और महिलाओं के अधिकारों को दर्ज किया गया। उसके बाद ही एक पत्नी के होते हुए दूसरी महिला के साथ विवाह को गैरकानूनी घोषित किया गया। इसका ज़ोरदार विरोध हुआ, तर्क दिए गए कि पति को छोड़ना यानी तलाक़ लेना हिन्दू संस्कृति के विरुद्ध है क्योंकि हिन्दू धर्म के अनुसार दंपत्ति सात जन्मों के लिए विवाहबद्ध होते हैं। विरोध करने वालों का कहना था कि ऐसे क़ानून हमारी पवित्र और दिव्य हिन्दू धार्मिक संस्कृति को नष्ट कर देंगे।

मुझे लगता है, मंत्री महोदय यह भी भूल गए कि अतीत में हमारी इस महान संस्कृति में पति के मरने के बाद उसकी विधवा को पति के साथ ज़िंदा जला देने की परंपरा थी, जिससे वह पुनर्जन्म लेकर पुनः उसी व्यक्ति की पत्नी बन सके। राजा राममोहन रॉय के प्रयत्नों से इस घृणित परंपरा को क़ानून बनाकर समाप्त किया गया-हालाँकि, उसके बाद भी कई सालों तक हिन्दू संस्कृति के झंडाबरदारों ने इस परंपरा का त्याग नहीं किया क्योंकि वे सोचते थे कि यह क़ानून उनकी संस्कृति को नष्ट कर देगा।

उस समय हिन्दू धर्म में पुरुषों को कई पत्नियाँ रखने की आज़ादी थी और मंदिरों में पुरोहितों, पुजारियों और धर्मगुरुओं की यौनेच्छाओं की पूर्ति के लिए धार्मिक वेश्याएँ रखी जाती थीं, जिन्हें देवदासी कहा जाता था!

यह सब एक समय हमारी संस्कृति थी। आप हमारे समाज की हालत समझ सकते हैं, इस देश की परम्पराओं और इतिहास पर उनके विश्वासों को समझ सकते हैं! और भारतीय इतिहास के हर कालखंड में हिन्दू धर्म ने महिलाओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझा है। उनकी हैसियत किसी वस्तु से बढ़कर नहीं रही है, वे सिर्फ उपभोग की और बच्चे जनने की मशीने भर रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र कह सकता है कि भारत में 75% शादीशुदा महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं और इसे अपराध माना जाना चाहिए। लेकिन हमारी राष्ट्रवादी, धार्मिक सरकार इस बात से सहमत नहीं है क्योंकि 'यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध' है! जी हाँ, इस देश में स्त्रियों को उनकी औकात दिखाने के लिए पुरुष उन पर बलात्कार करते हैं, यह दर्शाने के लिए कि देखो, तुम कमज़ोर हो! और महिलाओं को बलात्कार की शिकायत ही नहीं करनी चाहिए क्योंकि अगर किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो दोष उसी का होता है-वे अनुपयुक्त कपड़े पहनकर या अपने अनुचित व्यवहार से पुरुषों को बलात्कार के लिए आमन्त्रित करती हैं! अगर आप महिलाओं के प्रति कुछ अधिक दरियादिल हैं, उनके प्रति दया दिखाना चाहते हैं तो आप उनके कपड़ों या व्यवहार पर भले ही टिप्पणी न करें मगर कहेंगे कि 'कभी कभी लड़कों से युवावस्था के जोश में गलती हो ही जाती है', जैसा कि उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के पिता मुलायम सिंह ने कुछ समय पहले कहा था।

परंपरागत भारतीय संस्कृति में एक महिला अपने पति की मिल्कियत होती है। अपनी पत्नी पर उसका सम्पूर्ण अधिकार होता है। महिलाओं को यह शुरू से ही पता होता है। पुरुष अपनी लड़कियों को अनजान लड़कों की तरफ देखने या बात तक करने से मना करते हैं। उनका कन्यादान होता है, विवाह के समय उसे अनजान व्यक्ति को दान कर दिया जाता है और एक ऐसे व्यक्ति के साथ सोने के लिए मजबूर कर दिया जाता है, जिसे वह जानती तक नहीं होती। क्या बलपूर्वक किया गया यह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) किसी बलात्कार से कम है?

लेकिन नहीं, विवाह के पश्चात् पति द्वारा पत्नी के साथ बिना सहमति के सम्भोग करना भारत में बलात्कार नहीं माना जाता। निश्चय ही संयुक्त राष्ट्रसंघ गलत होगा। शिकायत करने वाली हर महिला गलत होगी।

गैर हिंदुओं को भारत के धार्मिक समारोहों में शामिल होने के लिए प्रेरित करने संबंधी एक मज़ेदार रिपोर्ट – 26 फ़रवरी 2015

मैं कई बार आपको बता चुका हूँ कि हमें आश्रम में मेहमानों का स्वागत करते हुए अत्यंत ख़ुशी होती है! वास्तव में बड़ा अच्छा लगता है जब हम अलग-अलग देशों के लोगों को एक साथ अपने यहाँ पाते हैं और जब वे सब एक-दूसरे के साथ अपने विचार और अपनी मान्यताएँ साझा करते हैं। निश्चय ही वे भारत में देखी और अनुभव की गई बातें भी हमें बताते हैं-और अभी हाल ही में प्राप्त रिपोर्ट न सिर्फ हमें हँसने के लिए मजबूर करती है बल्कि यह सोचने के लिए भी मजबूर करती है कि धार्मिक कर्मकांड आयोजित करने वाले लोग आखिर क्यों दूसरों को इन समारोहों में आग्रह पूर्वक आमंत्रित करते हैं और उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए हर तरह का दबाव भी बनाने की कोशिश करते हैं।

आश्रम के दो मेहमान कुछ दिन पहले वृन्दावन के केशी घाट गए थे, जहाँ घाट की सीढ़ियाँ सीधे यमुना नदी में उतर जाती हैं। आजकल नदी में पानी बहुत कम रह गया है मगर लोग हर दिन अपने तीर्थयात्रियों के लिए आरती करने से बाज़ नहीं आते। हमारे मेहमान दंपति यही पूजा समारोह देखने गए थे-और वास्तव में उनके मुताबिक पूरा समारोह अत्यंत मज़ेदार रहा।

सामान्यतः लोग एक ओर बैठ जाते हैं और थोड़ी दूरी से सामने हो रहे समारोह को देखते हैं। वे घाट पर आए और सोच ही रहे थे कि किसी ऐसी जगह बैठा जाए जहाँ से समारोह अच्छी तरह देख सकें कि उनके पास कुछ श्रद्धालु आए और उनसे अपने साथ चलने का आग्रह करने लगे। वे उनके पीछे चल पड़े और कुछ देर बाद ही अपने आपको भीड़ के बीचोंबीच खड़ा पाया। लोगों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें और साथ ही उस अप्रतिम अनुभव में वे भी सहभागी हो सकें इसलिए वे वही सब करते भी रहे जैसा उनसे कहा जा रहा था।

और वाकई वह अनुभव अपने आप में एक ही था! उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें आटे के गोले प्राप्त हुए, जिन्हें उन्होंने नदी में फेंक दिया और कैसे आसपास खड़े लोगों को कोई नुकसान न पहुँचे इस बात का ध्यान रखते हुए उन्होंने जलते दियों की बड़ी और भारी आरती उठाकर भीड़ के बीच लहराया और यहाँ तक कि छोटी-छोटी नावों दिए रखकर नदी के उथले पानी में बहाए और एक लम्बी लकड़ी की सहायता से उन्हें स्थिर रखने की कोशिश करते रहे कि वे लुढ़ककर पानी में गिर न जाएँ। उन्हें एक खोखला सींग दिया गया, जिसमें दूध भरा गया और उनसे कहा गया कि उसे एक विशेष तरीके से नदी पर थामे रहें कि दूध पानी में गिरता चला जाए। संतुलन का वह एक चुनौतीपूर्ण काम था, जिसमें अपने आप को बैरियर के उस पार गिरने से बचाते हुए सींग को नदी में इतनी दूर रखना था कि दूध पानी में ही गिरे! सींग खाली होने के बाद ही वे राहत की साँस ले पाए- और ये क्या, वे हैरान रह गए जब एक नहीं बल्कि दो बार कोई आया और सींग को फिर भर गया!

आश्रम में आकर वे सारी गतिविधियों की नकल उतार-उतारकर बताते रहे और सब आपस में ठहाके लगा-लगाकर हँसते रहे। स्वाभाविक ही उन्हें बड़ा मज़ा आया था और उन्होंने बताया कि वास्तव में वे पूरी गतिविधियों में संलग्न हो गए थे लेकिन साथ ही कुछ समय में ही उस सबसे आजिज़ आ गए थे। वहाँ बहुत शोर-शराबा हो रहा था, नदी के गंदले, स्थिर और निर्जीव पानी से दुर्गंध उठ रही थी और संतुलन बनाए रखने के लिए उन्हें बहुत सी अजीबोगरीब हरकतें करनी पड़ रही थीं। लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने उन हरकतों का काफी मज़ा लिया। और यह भी स्पष्ट था कि वे कतई नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं, इन गतिविधियों के पीछे की कहानी क्या है, तर्क क्या है, उद्देश्य क्या है!

मैं मानता हूँ कि वे इन अनुभवों की बहुत सी यादें लेकर यहाँ से जाएँगे और अपने मेहमानों को उस वातावरण का अनुभव और मज़ा लेने के लिए हम प्रेरित भी करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें इन सब गतिविधियों में शामिल होने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए थे।

वास्तव में आप अपने, निश्चित ही हिन्दू, रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों का प्रदर्शन और आयोजन कर रहे हैं और आपके कर्मकांडों और रीति-रिवाजों से अनजान एक गैर हिन्दू व्यक्ति जब आपके पास आता है तो उसे अपने संस्कारों में शामिल करने की ज़रूरत क्या है, आप क्यों चाहते हैं कि एक गैर हिन्दू आपकी परम्पराओं का अनुकरण करे? अगर आप अपने धर्म से उसका साक्षात्कार कराना चाहते हैं तो उस मेहमान से वे सब कर्मकांड करवाने की ज़रूरत नहीं है, जिन्हें वह समझता नहीं है। आपके धर्म को वह इन गतिविधियों की सहायता से कतई बेहतर तरीके से नहीं जान सकता! क्या आप अपनी धार्मिकता का प्रदर्शन भर करना चाहते हैं? अगर ऐसा करना ही चाहते हैं तो दूसरों से वही सब करवाने की क्या आवश्यकता है, जो आप कर रहे हैं? या फिर अंत में, क्या आप उनसे कोई चन्दा या चढ़ावा वसूल करना चाहते हैं? पैसे के लिए धार्मिक प्रहसन का पाखंडी आयोजन!

इसके अलावा मैं उन हिंदुओं के बारे में भी सोचता हूँ, जो इन कर्मकांडों में शामिल होते हैं। दरअसल बहुत से हिन्दू भी नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, इन अनुष्ठानों का उद्देश्य क्या है, इनके पीछे की कहानी क्या है! वे भी आँख मूंदकर अपने पुरोहितों की गतिविधियों का और उसके आदेशों का पालन करते चले जाते हैं, जैसा कि उनके माता-पिता और पूर्वज सैकड़ों वर्षों से करते रहे थे और पीढ़ी दर पीढ़ी अपने बाल-बच्चों को भी दिखाते रहे, बार-बार वहाँ आकर उनके साथ उन्हें दोहराते रहे और इस तरह वह आपके सोच और चेतना का हिस्सा बनता चला गया। वे इन रीति-रिवाजों में निहित प्रतीकों को नहीं जानते, उनमें अंतर्निहित अभिप्राय से वे अनभिज्ञ होते हैं। इसलिए एक तरह से उनके लिए भी यह एक खेल-तमाशे के सिवा कुछ भी नहीं होता। खेल, जिसमें दैवी आशीर्वाद के लाभ की संभावना भी मौजूद होती है।

मैं समझ सकता हूँ कि अपने खेल का आनंद आप विदेशियों के साथ साझा करना चाहते हैं लेकिन मैं आपको आगाह करना चाहता हूँ कि आपके लिए वह उपहास का कारण भी बन सकता है, वे आपके रीति-रिवाजों की हँसी उड़ा सकते हैं, उन पर अनुचित टीका-टिप्पणी कर सकते हैं-और मैं जानता हूँ, आप यह पसंद नहीं करेंगे! तो फिर क्यों नहीं हम यह करते कि अगर कोई हमारे पास आकर आग्रह पूर्वक उनमें शामिल होने का निवेदन करता है तभी उन्हें शामिल किया जाए अन्यथा उन्हें सब कुछ दूर से देखने दें! किसी पर कोई दबाव न डालें और उनके प्रति निर्लिप्त होकर अपना काम करते रहें।

और सबसे बड़ी बात, जब आपको थोड़ा समय मिले तो नदी के बारे में सोचिए, इन आयोजनों के चलते उसमें होने वाले प्रदूषण के बारे में, उससे संबन्धित दूसरी समस्याओं के बारे में सोचिए और सोचिए कि इन आयोजनों में वास्तव में आप कितनी मूर्खताएँ कर रहे होते हैं। 🙂

शिव लिंग – हिन्दू धर्म में लिंग की पूजा कैसे शुरू हुई – 17 फरवरी 2015

आज हिंदुओं का त्योहार शिवरात्रि है, जिसे शिव और उनकी पत्नी पार्वती के विवाह के दिन के रूप में मनाया जाता है। सभी हिन्दू मंदिरों में यह दिन साल की सबसे बड़ी शिव-पूजा का होता है। आप में से अधिकांश यह जानते होंगे कि शिव की पूजा शिवलिंग या शिवलिंगम के रूप में की जाती है, जो लिंग के आकार की एक मूर्ति होती है। आज मैं आपके सामने हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित इस पूजा की कहानी प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

यह कहानी शिव पुराण और कई अलग-अलग ग्रन्थों में वर्णित है और स्वाभाविक ही, सबमें थोड़ा-बहुत अंतर है। आपकी जानकारी के लिए मैं उनमें से दो कहानियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

शिव की पहली पत्नी का देहांत हो गया और शिव उसके दुख में बेचैन, पागलों की तरह नंग-धड़ंग जंगल-जंगल भटकते रहे।

जंगल में बहुत से ऋषि-मुनि रहा करते थे-जो बहुत सी सिद्धियाँ प्राप्त महात्मा थे। उनकी पत्नियाँ भी उनके साथ रहा करती थीं और जब शिव इस तरह भटकते हुए वहाँ पहुँचे तो उन पत्नियों ने उन्हें नंग-धड़ंग देखा। सम्पूर्ण दैवी वैभव के साथ दमकता शिव का नग्न शरीर देखकर वे अपना संयम खो बैठीं और आनंदित होकर उनके पीछे भागने लगीं और अंत में उन्हें छूने लगीं, उनसे लिपटने लगीं।

संयोग से उसी समय उनके पति यानी वे ऋषि-मुनि भी वहाँ पहुँच गए और अपनी पत्नियों को शिव के निकट आलिंगन में देखकर क्रोधित हो उठे और अनैतिकता और व्यभिचार का आरोप लगाते हुए शिव को बहुत बुरा-भला कहने लगे। सबने मिलकर अपनी सिद्धियों को एकत्र किया और शिव को, बल्कि उनके लिंग को शाप दिया कि वह कटकर धरती पर गिर जाए!

इसी कहानी का एक दूसरा रूप भी है, जिसके अनुसार वे ऋषि-मुनि शिव पर नुकीले पत्थर फेंकते हैं, जिनकी चोटों से उनका लिंग कटकर नीचे गिर जाता है।

बहरहाल, कुछ भी हो, लिंग धरती पर गिर जाता है और जहाँ वह गिरता है, उसी जगह स्थिर खड़ा हो जाता है और दावानल की तरह आग के शोले में तब्दील हो जाता है। जहाँ भी वह जाता-कैसे जाता था, यह न पूछिए, मेरी पत्नी ने भी पूछा और मैं उसका जवाब नहीं दे पाया-सामने आने वाली हर चीज़ स्वाहा हो जाती और हर तरफ हाहाकार मच जाता। दुनिया भर में अपशकुन दिखाई देने लगे और हर तरफ विनाशकारी घटनाएँ होने लगीं जैसे प्रलय आ गया हो। पर्वत गड़गड़ाहट के साथ टूट-फूटकर गिरने लगे, हर तरफ आग फैल गई और लोग आतंकित हो उठे। क्या संसार का अंत होने वाला है?

अब तो सभी देवता और ऋषि-मुनि घबरा गए और संसार के रचयिता, ब्रह्मा के पास गए। जानकारी मिलते ही वे उन सभी को लेकर शिव के पास गए और उनसे दया की याचना करने लगे। उनकी पूजा-अर्चना के पश्चात उन्होंने कहा: "कृपा करके अपना लिंग पुनः धारण कर लीजिए, वह सारे संसार को तहस-नहस कर देगा!"

उनकी आराधना से शिव प्रसन्न हुए और अपना लिंग वापस लेने के लिए राज़ी हो गए। लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी: "मैं अपना लिंग तभी वापस लूँगा जब आप उसकी पूजा-अर्चना शुरू कर देंगे!"

और इस तरह सारे संसार में, मंदिरों में शिव-लिंगों की स्थापना की गई और शिव के लिंग की पूजा-अर्चना की शुरुआत हुई।

आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि यह एक मज़ाक है! लेकिन नहीं, मज़ाक नहीं है-यहाँ इसी कहानी का एक और संस्करण प्रस्तुत है, उम्मीद है, आप पसंद करेंगे:

इस कहानी के अनुसार शिव का अपनी दूसरी पत्नी, पार्वती के साथ विवाह हो चुका है। और वे जंगलों में नंग-धडंग जंगलों में घूम रहे हैं किसी दुःख से नहीं बस ऐसे ही क्योंकि उनका मन कर रहा है और इस तरह उनका सामना ऋषियों की पत्नियों से होता है। पत्नियाँ उनके शरीर के मनभावन आकर्षण से अपने आपको बचा नहीं पातीं और उनसे लिपटने लगती हैं। लेकिन उनके पतियों को यह अच्छा नहीं लगता। वे शिव के लिंग को शाप देते हैं और वह वहीं धरती पर गिर जाता है और सारे संसार में हाहाकार और प्रलय की स्थिति पैदा हो जाती है।

इस संकट से निपटने के लिए सब इकट्ठा होते हैं और सोचते हैं कि शिव के लिंग को कौन पकड़ कर लाए! और अगर पकड़ भी लाए तो उसे कहाँ रखा जाए? जी हाँ, यह विचार आते ही इसका स्वाभाविक उत्तर भी उन्हें मिल गया: सिर्फ पार्वती ही शिव के लिंग को अपनी योनि में धारण कर सकती हैं!

वे सभी पार्वती की आराधना करते हैं और इस तरह इस प्रथा की शुरुआत होती है: योनि में स्थापित खड़े शिवलिंग की पूजा!

शिवलिंग के बारे में यानी हिन्दू धर्म के सबसे बड़े पाखंड के बारे में कुछ और कहानियाँ लेकर मैं कल फिर हाजिर होऊँगा। तब तक मेरे ब्लॉग का इंतज़ार करें।

पवित्र गाय के विषय में हिन्दू पाखंड – 26 जनवरी 2015

बहुत समय नहीं हुआ जब आश्रम आए कुछ मेहमानों के साथ एक शाम आग तापते हुए अच्छी-ख़ासी रोचक चर्चा हुई थी। हम भारत में उन्हें हुए अनुभवों के बारे में बात कर रहे थे और तभी एक, जर्मनी से आई एक डॉक्टर ने यह प्रश्न जड़ दिया: मैंने पढ़ा है कि भारत में गायों को पवित्र माना जाता है लेकिन शहर में लोगों को मैं पैदल देखती हूँ तो पाती हूँ कि बहुत से लोग चमड़े के जूते पहने हुए हैं और इसके अलावा वे चमड़े के बेल्ट और चमड़े के बैग भी निःसंकोच इस्तेमाल करते हैं। वे इन दोनों बातों का तालमेल किस तरह बिठा पाते हैं?

इसका उत्तर दरअसल मुझे सिर्फ एक पंक्ति में देना पड़ा: लोग बड़े पाखंडी हैं। यह सच है, इसके अलावा आप इसे क्या कहेंगे? भारत आए किसी पर्यटक को इसे और किस तरह समझाएँगे?

हिन्दू धर्म कहता है कि गाय पवित्र है। यह सही है। लेकिन आपको सिर्फ बाहर निकलकर इधर-उधर नज़रें भर घुमाना है और आपको हर तरफ गायों की दुरवस्था देखने को मिल जाएगी: आवारा, शहर भर में घूमती हुई, हर तरह का, जो मिल जाए, कचरा और कूड़ा-कर्कट खाती हुई, अक्सर प्लास्टिक और दूसरी खतरनाक अखाद्य वस्तुएँ खाती हुई। वे अक्सर मरियल सी और बीमार होती हैं। यह सब एक पवित्र गाय भुगतती है और लोग देखते रहते हैं! क्यों और कैसे?

या क्या गाएँ तभी तक पवित्र हैं जब तक वे दूध देती हैं या आपकी चाकरी करती हैं? क्योंकि देखने में यही आता है: दूध देने वाली गाएँ, जब बच्चे पैदा नहीं कर पातीं और इसलिए दूध देना बंद कर देती हैं तो उन्हें बाहर निकालकर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है और वही गाएँ सड़क पर भटकती दिखाई देती हैं।

सिर्फ केरल और पश्चिम बंगाल को छोड़कर भारत के लगभग सभी राज्यों में गौहत्या गैरकानूनी है लेकिन साथ ही भारतीय चमड़ा व्यवसाय बहुत विशाल है। उसका “कुल व्यापार 5 बिलियन डॉलर्स का है और उससे होने वाली आय भारत की कुल निर्यात आय का लगभग 4% है”। ये दोनों बातें कैसे संभव हैं- गायों का वध भी अवश्य किया जाता होगा तभी चमड़ा व्यवसाय के ये आँकड़े हासिल किए जा सकते हैं! और धार्मिक लोग भी इस चमड़े का इस्तेमाल करते हैं!

आखिर मंदिरों में धड़ल्ले से इस्तेमाल होने वाले तबले पर चढ़ाया जाने वाला और दूसरे वाद्ययंत्रों में इस्तेमाल होने वाला चमड़ा कहाँ से आता है? मैंने इसके बारे में जानकारी हासिल की- बकरी या गाय के चमड़े से। क्या गाने-बजाने वाले यह पूछते हैं कि चमड़ा किस जानवर का है? क्या आप समझते हैं कि मंदिर के पुजारी इस बात की जाँच करते हैं कि उनके मंदिर की पवित्रतम जगहों में प्रवेश पाने वाला वाद्य पूरी तरह पवित्र चमड़े का बना हुआ है?

मुझे इस बात में संदेह है।

मैं आपको यह भी बताना चाहता हूँ कि सभी हिन्दू शाकाहारी नहीं होते। भारत की लगभग 80% आबादी हिन्दू है। और सिर्फ 30% भारतीय ही शाकाहारी हैं। इसका अर्थ है कि बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू भी मांसाहारी हैं। मैकडोनल्ड्स भारत में चिकन और बकरे के गोश्त से तैयार बर्गर बेच सकता है लेकिन क्या आप समझते हैं कि जब भी कोई हिन्दू सैंडविच में या किसी और खाने में मौजूद मांस का टुकड़ा खाते हैं तो क्या वे इसे सुनिश्चित करने के लिए कि उसमें गाय का मांस नहीं है, किसी से पूछते हैं?

जी नहीं, वे नहीं पूछते।

और इन्हीं सब बातों के चलते मैं कहता हूँ कि वे पाखंडी हैं। आप गायों से प्रेम करने का दिखावा करते हैं, उसकी पूजा करते हैं, यहाँ तक कि उसका पेशाब पीते हैं क्योंकि आप समझते हैं कि उससे आपको कोई अलौकिक दैवी शक्ति प्राप्त हो जाएगी- लेकिन फिर आप उन्हें मरने के लिए सड़कों पर छोड़ देते हैं, उन्हें बूचड़खानों में भेज देते हैं, उनका मांस खाते हैं, उनकी खाल के जूते पहनते हैं और तबलों और वाद्ययंत्रों पर उनका चमड़ा चढ़ाकर अपने पूजाघरों में ले जाते हैं, जिसे वैसे आप अपवित्र मानते हैं!

अंत में मेरे पास हमेशा यह सवाल खड़ा रह जाता है: सिर्फ गाय ही क्यों? गाय की पूजा करो और कुत्ते को लात मारो। गाय की रक्षा करो और सूअर को खा जाओ। क्यों?

धार्मिक और सामाजिक कारण, जिनके चलते भारतीय महिलाएँ अत्याचारपूर्ण संबंधों में बंधी रहती हैं – 2 दिसंबर 2014

कल मैंने एक स्कूली लड़की की माँ के बारे में बताया था, जो अपने पति को छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी, इसके बावजूद कि वह खुद पैसे कमाती है और उसका पति उसे मारता-पीटता है। मैं इस विषय पर और विस्तार से लिखना चाहता था कि क्यों भारतीय महिलाएँ, उनके घर के अत्याचारी और कई बार अकल्पनीय रूप से हिंसक माहौल के बावजूद, अक्सर अपने पति और परिवार के साथ ही बंधी रहती हैं।

जैसा कि मैंने ज़िक्र किया था, सामान्यतः आर्थिक सुरक्षा इसका एक प्रमुख कारण है। बहुत सी महिलाएँ पढ़ी-लिखी नहीं होतीं, कभी घर से बाहर निकलकर कोई काम नहीं किया होता और इसलिए अक्सर उनकी अपनी कोई आमदनी नहीं होती। स्वाभाविक ही, उन्हें यह एहसास होता है कि वे अपना भरण-पोषण खुद नहीं कर सकतीं, अपने बच्चों का खर्च उठाना तो दूर की बात है!

दूसरा, और मेरे विचार में ज़्यादा महत्वपूर्ण कारण है, तलाक को लेकर भारतीय समाज का दकियानूसी रवैया। तलाक किसी भी महिला के लिए भयानक होता है। पहले एक जीवनसाथी का होना, फिर अचानक उसका न होना। अक्सर तलाक के लिए महिला को ही दोषी ठहराया जाता है, पुरुष को नहीं। भले ही वह कहती रहे कि उसका पूर्व-पति शराबी था, उसके साथ मार-पीट करता था, लोगों की प्रतिक्रिया यही होती है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती, अर्थात उसने भी कुछ न कुछ गलत बात की होगी और इसी कारण वह उस पर हाथ उठाने पर आमादा हुआ, जोकि, स्वाभाविक ही, उसका अधिकार है। दुर्भाग्य से भारत में घरेलू हिंसा आज भी इतनी सामान्य और सर्वव्यापी है कि लोगों को इन बातों पर कोई अचरज भी नहीं होता!

दुखद, अपमानजनक और अत्याचार पूर्ण सम्बन्ध में बने रहने का एक और कारण धर्म है। जी हाँ, मेरे विचार से हर धर्म दंपत्तियों से और विशेष रूप से महिलाओं से कहता है कि दांपत्य एक पवित्र बंधन है। कि तुम्हें अपने पति या पत्नी की देखभाल करनी चाहिए। महिलाओं के मामले में यह भी कि उसका भला-बुरा, सब कुछ अपने पति पर निर्भर है। कि तुम्हें पति की आज्ञा का पालन करना ही होगा।

हिन्दू धर्म में स्त्रियों के लिए पति को छोड़ना पाप माना जाता है। विवाह दैवी कार्य है और आपसे इस बात की अपेक्षा नहीं की जाती कि आप इस पवित्र बंधन को तोड़ेंगे, जो कि ईश्वर की ओर मिली नेमत है। सच तो यह है कि जब आप हिन्दू धर्म के अनुसार विवाह करते हैं तो सिर्फ इस जन्म के लिए नहीं करते बल्कि अगले सात जन्मों के लिए विवाह बंधन में बंधे रहते हैं!

जब मैंने रमोना को यह बताया तो उसने रूखे स्वर में उत्तर दिया: 'तो क्या हुआ? हो सकता है यह उनका सातवाँ जीवन हो? और मैं हँसे बगैर न रह सका। बिल्कुल, सही बात है, आप कैसे जान सकते हैं?

इस धर्मप्रधान देश में, जहाँ बहुसंख्यक लोग परम्पराओं और पुराने रीति-रिवाजों पर बहुत ज़ोर देते हैं और अपने तरीके से अपना जीवन ‘मर्यादा' के साथ जीते हैं, अपने अधिकारों के प्रति जाग्रत महिला को सराहना नहीं मिलती। एक महिला, जो अपने विवाह को बर्बाद करने पर तुली हो, जो अपने बच्चों को उनके पिता से दूर कर रही हो या जो परिवार के लिए शर्मनाक स्थितियाँ पैदा कर रही हो, उसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

या उस महिला को जो स्वाभिमानी हो, जो अपने शरीर, मस्तिष्क और भावनाओं सहित अपने जीवन का आदर करती हो। जो आईने में बिना आँसू बहाए झाँक सकती हो। जो इतनी मजबूत हो कि खुद पर आने वाली हर मुसीबत का सामना कर सकती हो और जो उसे सही लगता हो, अपनी मर्ज़ी से कर सकती हो। अपनी और अपने बाल-बच्चों कि सुरक्षा कर सकती हो।

अपने आत्मसम्मान के लिए उठ खड़े हों और पुनः अपने जीवन की लगाम खुद अपने हाथ में ले लें। आप कर सकते हैं-और, हालांकि बहुत से लोग आपके विरुद्ध होंगे, आपके साथ खड़े होने वाले भी कम नहीं होंगे!

जब भगवान भी बलात्कार करते हैं – हिन्दू मिथकों का भारतीय समाज पर असर – 3 नवंबर 2014

आज भी एक त्यौहार है और वृन्दावन में धार्मिक लोग परिक्रमा लगाकर इसे मनाते हैं। हिन्दू मिथकों के अनुसार इस दिन भगवान चार महीनों की लम्बी नींद से जागते हैं। यह विष्णु और तुलसी के विवाह का दिन भी है और भारत में आज के दिन से पुनः विवाहों के मौसम की शुरुआत होती है। आज के ब्लॉग में मैं इन धार्मिक कथाओं पर नज़दीकी नज़र डालते हुए भारतीय संस्कृति पर हुए उनके असरात का जायज़ा लेना चाहूँगा।

संक्षेप में पौराणिक कथा से मैं इसकी शुरुआत करता हूँ:

धर्मग्रंथों के अनुसार जलंधर नाम का एक दैत्य था। उसके पास अपना रूप बदलने की शक्ति थी, जिसके चलते वह किसी भी व्यक्ति का शरीर धारण कर सकता था। अपनी इस शक्ति का प्रयोग वह औरतों पर करता और उनके पतियों का रूप धरकर धोखे से उनका शीलभंग करने में सफल हो जाता। पता चलने पर जब पति उससे लड़ने आते तो कोई भी उसे मार न पाता। यह अद्भुत शक्ति उसे उसकी पत्नी के पतिव्रता होने के कारण प्राप्त थी। जी हाँ, पत्नी की स्वामिभक्ति के कारण वह दैत्य बलात्कार पीड़िता स्त्रियों के पतियों के हाथों मारा जाने से बच जाता।

सारे पति मिलकर विष्णु के पास, जिन्हें सबसे बड़ा परमेश्वर माना जाता है, गए और उससे मदद मांगी। विष्णु ने जलंधर को हराने के लिए उसी के तरीके को आजमाने का निश्चय किया: उन्होंने जलंधर का रूप धरा और दैत्य की पत्नी से सम्भोग करने में सफल रहे। वृंदा पतिव्रता नहीं रही और इस तरह उसके दैत्य पति की शक्ति जाती रही। अंततः विष्णु जलंधर को मारने में सफल रहे।

इस तरह धोखा देने के कारण वृंदा विष्णु पर बहुत क्रोधित हुई और उन्हें पत्थर हो जाने का श्राप दिया। फिर वह मृत जलंधर के साथ सती हो गई।

फिर वही वृंदा पुनर्जन्म लेकर पवित्र तुलसी का पौधा बनी और आखिर तुलसी और शालिग्राम, यानी पत्थर के रूप में विष्णु, का विवाह सम्पन्न हुआ।

इस पौराणिक कथा को हर कोई जानता है। अब मैं वर्तमान काल में भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं पर इस कथा के परिणामों पर नज़र डालते हुए चार बिन्दुओं में अपनी बात रखना चाहता हूँ। स्वाभाविक ही इन्हें समाज पर धर्म के बड़े दुष्परिणामों के रूप में देखा जा सकता है:

1) अगर कोई किसी महिला पर बलात्कार करता है तो आप उसकी पत्नी के साथ बलात्कार कर सकते हैं क्योंकि आपके भगवान ने भी तो यही किया था।

आज इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ लोग बलात्कारी के परिवार की स्त्रियों पर बलात्कार करके बदला लेते हैं।

2) अपने धोखेबाज़, बलात्कारी पति की रक्षा के लिए स्त्रियों को वफादार और पवित्र होना चाहिए।

आज के भारतीय समाज में यह आम बात है कि स्त्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वह तो पवित्रता की मूर्ति बनी रहे भले ही उसका पति बाहर जाकर कहीं भी मुँह मारता रहे, नजर आने वाली हर लड़की के साथ छेड़छाड़ करता रहे।

3) पति की मृत्यु के बाद पत्नी को आत्महत्या कर लेनी चाहिए।

दो सौ साल पहले तक यह एक सामान्य बात थी। इस प्रथा को सती प्रथा कहा जाता है और इस तरह आत्महत्या करना बड़े गर्व की बात होती थी क्योंकि यह काम उसकी स्वामिभक्ति का सबूत माना जाता था। राजा राममोहन रॉय ने एक कानून बनवाकर इस प्रथा को समाप्त करवाया लेकिन मेरी किशोरावस्था तक भी हम समाचार-पत्रों में ऐसे प्रकरणों के समाचार पढ़ते रहते थे। आज भी राजस्थान में ऐसे मंदिर हैं, जहाँ सती हुई स्त्रियॉं की पूजा की जाती है।

4) बलात्कार पीड़िता को अपने बलात्कारी उत्पीड़क के साथ विवाह रचाना चाहिए।

भारत में गाँवों की पंचायतों में कई बार ऐसे निर्णय आज भी सुनाए जाते हैं। दोनों परिवार अकसर इस बात पर राज़ी होते हैं कि बलात्कार की यही तार्किक परिणति हो सकती है।

इस चर्चा से आप भारतीय संस्कृति में महिलाओं की स्थिति का स्पष्ट अनुमान लगा सकते हैं। उसे बलात्कार के कारण बलात्कार झेलना पड़ता है, अपने पति के दीर्घ जीवन और संरक्षण के लिए प्रयास करने पड़ते हैं, उसे अपने पति के लिए खुद भी जीवन से हाथ धोना पड़ता है और अंत में, उसे खुद पर बलात्कार करने वाले अत्याचारी अपराधी के साथ विवाह करना पड़ता है और जीवन भर पत्नी बनकर उसकी सेवा भी करनी पड़ती है।

और इस देश के इस पाखंडी धर्म में कहा जाता है कि यहाँ स्त्रियॉं का इतना आदर किया जाता है कि उन्हें देवी का दर्जा हासिल है। ऐसे धर्म और ऐसी संस्कृति का आदर करने की आप मुझसे अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं?

पुनश्च: इन शब्दों के लिए मुझे गाली देने की जिनकी तीव्र इच्छा हो रही हो, वे पहले अपने धर्मग्रंथों को पढ़ें और सबसे पहले उन्हें गाली दें, जिन्होंने इन ग्रन्थों को लिखा है। मैं सिर्फ उनका हवाला देकर उसके दुष्परिणामों की ओर इशारा भर कर रहा हूँ….

मुझे सेक्स पसंद है- और यह पसंदगी भी मुझे पसंद है! 6 अगस्त 2014

कल मैंने बताया था कि कैसे बहुत से भारतीय पुरुष अपने घर की स्त्रियों को तो शालीन व्यवहार की और अपने आपको ढँककर रखने की हिदायत देते हैं लेकिन खुद नेट पर अर्धनग्न महिलाओं की तस्वीरें देखते हैं, उसकी उत्तेजना का मज़ा लेते हैं। वे यह पसंद करते हैं मगर तुरंत ही इस आनंद को लेकर अपराधबोध से ग्रसित हो जाते हैं। खुद अपनी यौनिकता के लिए अपराधबोध-इसे सही तरीका नहीं कहा जा सकता!

मुझे लगता है कि मैं पहले एक बार इस अपराधबोध की अभिव्यक्ति की चरमावस्था के बारे में लिख चुका हूँ: जब लोग सिर्फ और सिर्फ प्रजनन के उद्देश्य से यौन सम्बन्ध स्थापित करते हैं। जी हाँ, ऐसा भी होता है। कुछ हिन्दू समूह और सम्प्रदाय मौजूद हैं, जो इस नियम का सख्ती के साथ पालन करने की कोशिश करते हैं। वे तभी आपसी प्रेम का आनंद लेते हैं, जब वे संतान उत्पन्न करना चाहते हैं। अन्यथा पति-पत्नी अन्तरंग रूप से एक दूसरे को छुए बगैर साथ-साथ रहने के कर्तव्य का पालन भर करते रहते हैं। क्यों? क्योंकि हिन्दू धर्म कहता है कि सिर्फ मज़े के लिए यौन सम्बन्ध स्थापित करना गलत है, यौन आनंद में लिप्त होना पाप है!

जब आप अपने साथी के साथ सेक्स करते हैं तो स्वाभाविक ही, उसका आनंद लेते हैं-उस सुख से बचना मुश्किल है। लेकिन उसका आनंद लेना तो पाप कर्म है इसलिए आप सेक्स करते ही नहीं हैं। और जब सेक्स करना आपकी मजबूरी ही बन जाए, क्योंकि यह बच्चा पैदा करने का एकमात्र तरीका है, तो आप सिर्फ उन दिनों में ही सेक्स करते हैं, जब पत्नी गर्भधारण के योग्य होती है और उसे भी जल्द से जल्द निपटा दिया जाता है, जिससे कम से कम आनंदप्राप्ति सुनिश्चित की जा सके, आप कम से कम पाप के भागी बनें!

आपको बधाई कि आपने धर्म को पाप-पुण्य, अपराध और लज्जा के जंजाल में आपको फाँसने की इजाज़त दे दी!

प्रसंगवश यह कि यह दकियानूसी मान्यताएँ सिर्फ हिन्दू धर्म की बपौती नहीं हैं! इस्लाम में तो सेक्स और शारीरिक सुख के प्रति बहुत विकृत नजरिया है ही मगर ईसाइयत में भी इसी तरह की कहानियाँ मैंने सुनी हैं। बूढ़ी औरतें और दादियाँ घर की युवा लड़कियों को जीवन का बहुमूल्य पाठ इस तरह पढ़ाती हैं: जो स्त्रियाँ अपने अंगों को छूती हैं, पति के बिस्तर पर सोने का आनंद लेती हैं और यहाँ तक कि खुद स्वतःस्फूर्त, अपने प्रयास से चरम सुख का आनंद प्राप्त कर लेती हैं, वेश्याओं के सादृश्य हैं। सेक्स करना हर धर्म में एक गन्दा और शर्मनाक काम है-विशेष रूप से, लड़कियों और महिलाओं के लिए!

मेरे विचार से, महिला और पुरुष दोनों के लिए इसमें किसी शर्म या अपराधबोध की बात ही नहीं है! इसी तरह आप जीवन का सम्पूर्ण सुख उठा सकते हैं! सेक्स कौन पसंद नहीं करता? लेकिन धर्म के प्रभाव में, आप उसे पसंद करने के बाद भी उसके बारे में बुरा ही महसूस करते हैं।

मैं तो सेक्स पसंद करता हूँ-उससे संबन्धित हर बात मुझे प्रिय है!

आशा करता हूँ कि आप भी ऐसा ही महसूस करते होंगे!