आध्यत्मिक मूर्खता, जिसका दावा है कि सी-सेक्शन माँ और बच्चे के बीच के लगाव को बाधित करता है – 12 अगस्त 2015

कुछ समय पहले रमोना ने अपनी फेसबुक वाल पर एक टिप्पणी पढ़ी और ऊँचे स्वर में उसके मुँह से अनायास निकल पड़ा, ' आध्यत्मिक मूर्खता!' उसके स्वर में हल्का सा तिरस्कार का भाव था, जिसे सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ और मैंने पूछा, 'ऐसा क्या पढ़ लिया भई!' उसके किसी जान-पहचान वाले ने एक पोस्ट की थी, जिसमें महिलाओं को सलाह दी गई थी कि वे बच्चे को प्राकृतिक रूप से जन्म दें, न कि सी-सेक्शन द्वारा बच्चा पैदा करने का निर्णय लें। टिप्पणी में उनसे दर्द से बचने के लिए लगाया जाने वाला एपिड्यूरल लगवाने के लिए भी हतोत्साहित किया गया था। कारण? उसके अनुसार, महिलाएँ प्रसव-पीड़ा के ज़रिए ही अपने बच्चे से घनिष्टता के साथ जुड़ पाती हैं और इसलिए एपिड्यूरल या सी-सेक्शन द्वारा प्रसव माँ और बच्चे के बीच विकसित होने वाले लगाव में बाधक होता है।

खैर, मेरी पत्नी सोशल नेटवर्क पर चर्चा करने में ज़्यादा रस नहीं लेती इसलिए वहाँ उसने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन बाद में हमने इस विषय पर जो बातें कीं, वे उस पोस्ट को पूरी तरह ख़ारिज कर देती हैं।

निश्चित ही, यह तो हम जानते हैं कि इन विचारों का उद्गम स्थल कहाँ है: आजकल बच्चे की पैदाइश के दिन और समय का पहले से चुनाव करने का नया चलन शुरू हो गया है और जब बच्चे का वज़न एक ख़ास सीमा तक बढ़ जाता है तो उसे शल्यक्रिया द्वारा सी-सेक्शन के ज़रिए सुरक्षित रूप से बाहर निकालना संभव हो जाता है। ऐसी भी औरतें हैं जो प्राकृतिक रूप से बच्चा पैदा करने की कोशिश भी नहीं करतीं, चाहे वह दर्द के डर से हो या किसी और मनगढ़ंत कारण से।

वह व्यक्ति शायद इसी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश कर रहा था। रहस्यवादी अतिशयोक्तियों और कण-कण के बीच मौजूद आध्यात्मिक संबंधों पर अपने विश्वास के चलते वह महज यह नहीं कह सकता: जन्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, उसके ज़रिए अपने शरीर में पैदा हो रहे परिवर्तनों को स्वाभाविक मानकर सहजता के साथ स्वीकार करें। नहीं, हमें उसमें प्रेम और लगाव का अतिरिक्त संचार करना चाहिए, जिससे उसे और अधिक महत्वपूर्ण और ज़्यादा आध्यात्मिक बनाया जा सके।

कुछ लोगों ने इस सिद्धांत पर शक ज़ाहिर करते हुए टिप्पणियाँ लिखीं और उसकी सचाई का प्रमाण माँगा लेकिन उसने कह दिया कि उसे प्रमाण की ज़रूरत नहीं है। यह अनुभव की बात है कि लोग उन चीजों से ज़्यादा प्रेम करते हैं, जिन्हें वे बहुत तकलीफ उठाकर प्राप्त करते हैं।

गज़ब! मतलब हर माँ, जिसके बच्चे को चिकित्सकीय जटिलताओं के चलते शल्यक्रिया द्वारा बाहर निकालना पड़ता है, चिल्ला-चिल्लाकर डॉक्टरों और रिश्तेदारों को कोसती है! क्योंकि उसे प्रसव-पीड़ा नहीं सहनी पड़ी, उसे वह दर्द अनुभव नहीं करना पड़ा, जो कथित रूप से उसके अंदर और ज़्यादा प्यार और लगाव भर देता!

भयानक प्रसव-पीड़ा के बाद पैदा हुए अपने बच्चे के प्रति माँ के उत्कट प्रेम के बारे में इस तरह बात करना बड़ा भावपूर्ण लग सकता है, जबकि वास्तविकता यह है कि वह जन्म देते समय दर्द के कारण, बल्कि कहा जाना चाहिए कि दर्द के बावजूद, अपनी सारी परेशानियाँ और लगाव भूल जाती है। लेकिन यह पूरी तरह मूर्खतापूर्ण है क्योंकि इसका अर्थ यह होगा कि जो महिलाएँ सी-सेक्शन के ज़रिए या सिर्फ दर्द सहन न कर पाने के कारण एपिड्यूराल लगवाकर बच्चे पैदा करती हैं, वे अपने बच्चे से उतना प्रेम नहीं करतीं। अपने बच्चे के साथ उतना लगाव महसूस नहीं करतीं।

अपरा के जन्म के समय हमने भी सी-सेक्शन करवाया था। डॉक्टरों की बहुतेरी कोशिशों के बाद भी रमोना को न सिर्फ दर्द नहीं उठा बल्कि बच्चे को जन्म देने की पूरी प्रक्रिया के दौरान उसे किसी असुविधा का एहसास भी नहीं होता था। अंत में जब डॉक्टरों ने हमसे कहा कि प्राकृतिक प्रसव के लिए और इंतज़ार करना खतरे से खाली नहीं है तो हमने अपनी बच्ची के लिए तय किया कि वह इस संसार में शल्यक्रिया के ज़रिए ही प्रवेश करे। क्या हमें वह प्रसव-पीड़ा और लगाव अनुभव करने के लिए हृदयाघात या मस्तिष्काघात का खतरा मोल लेना चाहिए था? क्या इससे बच्चे को जन्म देने का हमारा अनुभव कम मूल्यवान हो जाता है?

जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं होता। और मैं सोच-समझकर "प्रसव का हमारा अनुभव" कह रहा हूँ क्योंकि मैं भी शुरू से आखिर तक इस अनुभव में सम्मिलित रहा था। जब डॉक्टर रमोना के पेट पर चीरा लगा रहे थे, मैं उसका हाथ पकड़े वहीं खड़ा था और देख रहा था कि यह आश्चर्य कैसे प्रकट होता है और कैसे मेरी बेटी पहली बार इस संसार को अपनी आँखों से देखती है।

जी नहीं, आप यह नहीं कह सकते कि अपरा से रमोना का लगाव ज़रा भी कम है, सिर्फ इसलिए कि उसने सात घंटे प्रसव-पीड़ा नहीं झेली- क्योंकि नवजात शिशु के साथ किसी भी दूसरी महिला के लगाव से उसके लगाव में मैंने आज तक कोई अंतर नहीं पाया है! आप मुझसे यह भी नहीं कह सकते अपरा का जन्म-समय किसी दूसरे बच्चे के जन्म-मुहूर्त से रत्ती भर भी कम महत्वपूर्ण है- क्योंकि हम अस्पताल में बिताए अपने समय को शुरू से आखिर तक आज भी पूरी शिद्दत के साथ याद करते हैं!

और यह बात दुनिया की हर महिला के लिए सच है। अपने बच्चे के प्रति आपका लगाव आपके प्रेम पर निर्भर है न कि प्रसव-पीड़ा के किसी ख़ास अंतराल पर!

अंत में यह कि मेरे पास एक और तर्क है, बल्कि सबसे बड़ा तर्क: मैं अपनी बेटी के साथ बहुत लगाव महसूस करता हूँ। मैंने कोई प्रसव-पीड़ा नहीं झेली, यहाँ तक कि वह मेरे पेट में भी नहीं रही लेकिन फिर भी वह मेरा अटूट हिस्सा है- इस बात से इस तथ्य पर कोई असर नहीं पड़ता कि वह किस प्रक्रिया से गुज़रकर इस संसार में आई है। पिता भी अपनी बेटी से उतना ही लगाव रखता है भई!

तो, जिन मामलों में आध्यात्मिक मूर्खताओं की ज़रूरत नहीं है, उनसे उसे दूर ही रखिए- इससे आप दूसरों को अपमानित करने से बचे रहेंगे!

यथार्थ से कोसों दूर अपने निजी यथार्थ का निर्माण – 17 मार्च 2015

कल मैंने आपको कल्पना और विश्वास की शक्ति के बारे में बताया था कि कैसे आप उसके प्रभाव में अपना एक निजी विश्व निर्मित कर लेते हैं और कैसे आपके आसपास के दूसरे लोग भी ऐसा ही कर रहे होते हैं। इसकी पूरी संभावना होती है कि आपकी यह फंतासी आपके लिए कोई निजी यथार्थ निर्मित कर दे लेकिन उसके साथ एक बड़ा खतरा भी होता है: उस यथार्थ के साथ आप एक सीमा तक ही चल सकते हैं अन्यथा, उस सीमा का अतिक्रमण करने के पश्चात आपको नुकसान पहुँच सकता है, आप बीमार पड़ सकते हैं, यहाँ तक कि आप चारों ओर से मानसिक द्वंद्व में घिर सकते हैं।

दुर्भाग्य से अध्यात्मवादी और धार्मिक दोनों तरह के लोगों के साथ ऐसा होते मैंने कई बार देखा है। वे अपनी एक निजी दुनिया बना लेते हैं, लेकिन ऐसी कल्पनाओं की सहायता से, जो भौतिकी के नैसर्गिक नियमों का पालन नहीं करते। वे वायवी दुनिया में रहते हैं और अक्सर यह नहीं जानते कि उनकी आस्था यथार्थ नहीं है, वह गलत या झूठ सिद्ध हो चुकी है। वे अपनी दुनिया में खो जाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी-ऐसी बातों का दावा करते हैं, जिन्हें दूसरे जानते हैं कि वास्तव में वे बातें गलत या झूठ सिद्ध हो चुकी हैं।

यहीं आकर यह खतरनाक हो जाता है। यह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता कि आप आत्मा, किसी ऊर्जा, किसी ईश्वरीय शक्ति या फरिश्तों पर विश्वास रखते हैं। यह आपके लिए अच्छा हो सकता है, आपका विश्वास या आस्था आपमें आत्मविश्वास भर सकती है या आपके अंदर संकल्पशक्ति का संचार कर सकती है। यहाँ तक कि वह कुछ शारीरिक समस्याओं से भी आपको निजात दिला सकती है। आपको इतना ही ध्यान रखना है कि उसे अधिक दूर तक न ले जाएँ। जी हाँ, ध्यान, किसी शक्ति की सजीव कल्पना और सकारात्मकता या प्रार्थनाएँ आपको शारीरिक पीड़ा या सिरदर्द जैसी तकलीफ़ों को बेहतर तरीके से झेलने और सहन करने की शक्ति प्रदान कर सकती हैं लेकिन जब आपकी हड्डी टूट जाती है तब आपके पास किसी डॉक्टर को दिखाने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।

मैं जानता हूँ कि आजकल ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो ‘आध्यात्मिक शल्यक्रिया’ करते हैं और दावा करते हैं कि इस शल्यक्रिया से शरीर के किसी अंग को काटे बगैर, चाक़ू चलाए बगैर, यहाँ तक कि त्वचा में किसी तरह का चीरा लगाए बगैर वे शल्यक्रिया करते हैं। ये लोग अपने 'मरीज़' को अपनी चमत्कारिक शक्तियों से ठीक करने का विश्वास दिलाने में कामयाब हो जाते हैं परन्तु वास्तव में वे मुर्गी के रक्त का इस्तेमाल कर रहे होते हैं और ऐसा नाटक करते हैं कि मरीज उसे अपना ही रक्त समझता है। वास्तव में यह खतरनाक है क्योंकि वे इलाज के लिए किसी पढ़े-लिखे, पंजीकृत डॉक्टर के पास नहीं जाते!

बहुत से लोग दूसरों से न सिर्फ धोखा खाते हैं बल्कि उन बहुत सी हवाई बातों पर भरोसा भी करने लगते हैं। इस चमकीली फंतासी के अतिरिक्त वे परियों, जिन्नों, फरिश्तों और ईश्वरीय शक्तियों की दुनिया में खो जाते हैं। उनकी दुनिया हैरी पॉटर या लॉर्ड ऑफ़ द रिंग की फंतासियों, कभी पढ़ी या सुनी गई गुह्य किंवदंतियों और प्रवचनों और स्वाभाविक ही, विभिन्न देशों के धार्मिक मिथकों और आख्यानों का मिला-जुला रूप होती है! अपनी दुनिया में उन्हें चीज़े स्याह-सफ़ेद नज़र आती हैं, कुछ सिर्फ अच्छी या भली शक्तियाँ होती हैं तो कुछ बुरी और शरीर से उन बुरी शक्तियों को निकाल बाहर करना लक्ष्य होता है, जिनके कारण आप बीमार पड़े हुए हैं और जो दुनिया भर में फैली बुराइयों की जड़ है।

कुछ लोगों के लिए यह दिमागी बीमारियों का रास्ता सिद्ध होता है। उनकी वायवीय, दुनिया यथार्थ दुनिया से, जिसकी कुछ मूलभूत वास्तविकताएँ हैं, जिनके कुछ भौतिक नियमों, सिद्धांतों और तथ्यों को हम सब मानते हैं और जिनकी हम उपेक्षा नहीं कर सकते, भटककर बहुत दूर निकल गई है! वे हवा में तैर रहे हैं और जिसे हम सब यथार्थ कहते हैं, उससे उनका रत्ती भर संबंध नहीं रह गया है। वे भ्रमित हैं और उन आवाज़ों को सुनते हैं, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, उन खतरों को महसूस करते हैं जो कहीं हैं ही नहीं। वे उन चीजों से भयग्रस्त हो जाते हैं जो उनकी कल्पना में बसती हैं, उनकी हवाई दुनिया में मौजूद हैं।

यह शारीरिक और मानसिक रूप से उनके लिए नुकसानदेह है कि वे यथार्थ से दूर अपनी काल्पनिक दुनिया में खोए रहें, अपनी आस्थाओं और अपनी मनगढ़ंत सृष्टि में विचरते रहें और वस्तुगत तथ्यों की उपेक्षा करें। यथार्थ जिसमें हम सब शरीक हैं, वह नहीं, जिसे आपने अपनी कल्पना में रचा है! जब भी आप यथार्थ से अलग किसी दूसरी बात पर विश्वास करते हैं, जब आप निर्णय करते हैं कि वस्तुगत जगत से अलग किसी दूसरी कल्पना पर आस्था रखने लगें तब कृपया इस बात का खयाल रखें। अपने दोनों पैर ज़मीन में मजबूती के साथ जमाकर रखें, वास्तविक दुनिया में निवास करें!

आप अपना एक निजी विश्व रचते हैं – प्लासिएबो इफैक्ट और खुशी के लिए! 16 मार्च 2015

आज मैं हमारे जीवन के एक बहुत रोचक तथ्य के विषय में लिखना चाहता हूँ: अपनी कल्पनाओं और अपने खयालों की सहायता से हम किस तरह अपना यथार्थ गढ़ते हैं! अगर आप किसी चीज़ पर विश्वास करते हैं तो उसकी सृष्टि करना भी शुरू कर देते हैं-और इस तरह अपने विचार को वास्तविक जीवन में स्थापित कर देते हैं। इस तरह हम सब अपने-अपने अलग-अलग संसारों में निवास करते हैं।

कुछ दिन पहले हम खाना खाने के बाद मेरे पिताजी के कमरे में बैठे हुए थे और मैं पिता की गतिविधियों को बड़े गौर से देख रहा था: उन्होंने आयुर्वेदिक दवाई की एक गोली निकालकर मुँह में रखी, फिर क्लब सोड़ा की बोतल का ढक्कन खोलकर एक घूँट लिया और उसके साथ गोली गटक ली। मुझे अपनी ओर प्रश्नवाचक मुद्रा में मुँह फाड़े ताकता देखा तो कहा: "क्लब सोड़ा के साथ दवाई जल्दी असर करती है!"

मैं हँस पड़ा और मेरी देखादेखी वे भी हँसे बगैर नहीं रह सके, हालांकि अपनी इस धारणा पर दृढ़ रहते हुए कि वास्तव में कोई भी दवा सादे पानी के मुक़ाबले उस गैस युक्त, सनसनाते, बुलबुले वाले पानी के साथ लेने पर ज़्यादा बेहतर और त्वरित असर करती है।

स्वाभाविक ही, इसका बड़ा अच्छा मनोवैज्ञानिक असर होता है, प्लासिएबो (placebo) इफ़ेक्ट, जिसका निर्माण अपनी कल्पनाओं, विचार-सरणी और अपने मस्तिष्क की सहायता से आप स्वयं करते हैं! स्वाभाविक ही, आपके रोग-लक्षणों के अनुसार आपकी पीड़ा कम हो जाती है, आप अच्छा महसूस करते हैं, आपको महसूस होता है कि शरीर में रक्त की मात्रा बढ़ गई है, वह अधिक सुचारू रूप से काम कर रहा है, रक्त-संचार बेहतर हुआ है या आपकी त्वचा की जलन कम हुई है। क्योंकि जिस पानी के साथ आपने दवा ली थी, उसमें सनसनाहट मौजूद थी!

मुझे इस उदाहरण से एक बात स्पष्ट समझ में आती है कि हम अपनी दुनिया के निर्माता स्वयं होते हैं। अपनी आस्थाओं और विश्वासों को अपने जीवन में लागू कर देते हैं, अपने आचरण में ढाल लेते हैं- अपनी आस्थाओं और विश्वासों को बाध्य कर देते हैं कि वह आपके दैनिक जीवन की वास्तविकता बन जाए-कम से कम खुद अपने लिए।

जहाँ आपके दावों, आपके विचारों और कल्पनाओं के प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं होती, ऐसे गुह्य और रहस्यमय मामलों में यह ठीक काम करता है! इसका कोई जैविक, भौतिक प्रमाण नहीं होता कि जो आप कह रहे हैं वह गलत ही है- इसलिए आप हमेशा उसे ठीक समझ सकते हैं। और अगर उसमें आप अपनी आस्था भी मिला देते हैं तो फिर वह आपके लिए यथार्थ बन जाता है, जिसमें फरिश्ते आपका मार्गदर्शन करते हैं, किसी अनिष्टकारी अज्ञात शक्ति से आपके तार जुड़ जाते हैं या आप मृत व्यक्तियों अथवा प्रेतात्माओं से बात कर सकते हैं और अंत में ईश्वर का अस्तित्व भी आपके लिए एक वास्तविकता बन जाता है।

धर्म के चारों ओर स्थित बातें भी इसी श्रेणी में आती हैं। किसी दैवी या ईश्वरीय शक्ति में आस्था, मनुष्य के लिए तथाकथित ईश्वर के बनाए नियमों के बारे में यह विश्वास कि अगर आप कोई नियम तोड़ते हैं तो पाप करते हैं और अगर आप उन नियमों पर चलते हैं तो सुरक्षित रहते हैं। कि पूजा-अर्चना आपको बचा सकती है, आपको स्वस्थ कर सकती है आपकी पीड़ा हर सकती है, आपकी सहायता कर सकती है। आदि आदि।

कल्पना, आस्था और फिर अंततः यथार्थ। आप किसी भी बात पर विश्वास कर सकते हैं और वह आपके लिए सत्य भी बन सकता है। इसमें बड़ी शक्ति है लेकिन साथ ही, यह खतरनाक भी सिद्ध हो सकता है। इन खतरों के बारे में मैं कल के ब्लॉग में लिखूँगा।

3 तरह के लोग, जो हमारे आश्रम में रहना पसंद करते हैं – 12 फरवरी 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हमारे पास धार्मिक रुचियों वाले कई लोगों के ईमेल आते हैं, जो हमारे आश्रम आना चाहते हैं लेकिन स्वाभाविक ही उनकी धार्मिक अपेक्षाओं को पूरा करना हमारे लिए संभव नहीं होता। मैंने यह भी बताया था कि कैसे उनके ईमेल या चिट्ठियों की पंक्तियों से या उनकी भाषा से ही आप उनके सोच की दिशा और उनके इरादे भाँप सकते हैं। यह सही है कि आश्रम आने की इच्छा व्यक्त करते हुए कभी-कभी हमें ऐसे सन्देश प्राप्त होते हैं लेकिन अधिकतर संदेश ऐसे लोगों के होते हैं, जो इनसे ठीक विपरीत विचार और भावनाएँ रखते हैं।

वास्तव में दूसरी तरह के ईमेल हमारे पास ज़्यादा आते हैं। खुले तौर पर धार्मिक लोगों के अलावा, जिनके बारे में मैंने कल लिखा था, तीन तरह के लोगों से आज आपको मिलवाना चाहता हूँ, जो हमसे आश्रम के बारे में पूछताछ करते हैं।

1) सामान्य स्त्री पुरुष जो तनाव मुक्ति की खोज में यहाँ आते हैं

पहले 'वर्ग' में वही 'मुख्यधारा' के लोग होते हैं, जो कॉर्पोरेट दुनिया की तनाव और भागदौड़ वाली ज़िन्दगी से ऊबकर और अपने काम की, घर की और आम जीवन की गुमनामी से आजिज़ आकर सुकून की खोज में यहाँ आते हैं। ये लोग जीवन में अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं और शान्ति, तनाव मुक्ति, यहाँ तक कि अपनी शारीरिक तकलीफों के इलाज के लिए यहाँ आते हैं। वे ऐसे उपाय चाहते हैं, जिनकी सहायता से उनके विभिन्न व्यसनों, शारीरिक व्याधियों का इलाज हो सके, कुछ ऐसे व्यायाम सीख सकें, जो उन्हें उनके मौजूदा दर्द से राहत प्रदान कर सकें और भविष्य में भी उन्हें होने से रोक सके।

निश्चय ही हर तरह के लोगों के लिए हमारे दरवाज़े खुले हैं क्योंकि हम जानते हैं कि योग और आयुर्वेद विज्ञान के अंग हैं, जो न सिर्फ शारीरिक व्याधियों में बल्कि मानसिक शान्ति के लिए भी बहुत उपयोगी हैं। हमारे आश्रम में कुछ दिन ठहरकर ही उन्हें बहुत लाभ हो सकता है-और हम जीवन के हर पड़ाव पर स्थित, हर स्तर के, हर क्षेत्र में काम करने वाले और हर जगह के लोगों को मित्र बनाकर और उनके बारे में जानकर खुश होते हैं!

2) स्वास्थ्य-सचेत लोग जिन्हें अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की लालसा होती है

हमसे पूछताछ करने वाले दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं, जो अपने शरीर और इस धरती के लिए निरापद वैकल्पिक जीवन-चर्या में रुचि रखते हैं। वे निरामिष, शाकाहारी, कच्चा खाने वाले, चिकित्सक, मालिश इत्यादि और वैकल्पिक चिकित्सा में दिलचस्पी रखने वाले और ऐसे ही कई तरह के लोग होते हैं। कोई भी, जो यह जानता है कि योग और आयुर्वेद उसे एक और दृष्टिकोण, अतिरिक्त ज्ञान और बहुत सी नई टिप्स और जीवन-शैली से परिचित कराएगा, उन्हें जानने-समझने में मदद करेगा, जीवन में नए परिवर्तन लाने में सहायक होगा।

हम इन लोगों का खुले मन से, बाहें फैलाकर स्वागत करते हैं और हमारे पास जो कुछ भी है, उनके साथ साझा करके खुश होते हैं और हम खुद भी उनके ज्ञान और अनुभवों से बहुत कुछ सीखते हैं। ज्ञान का आदान-प्रदान और एक दूसरे की सहायता-शानदार!

3) भारत यात्रा का सपना देखने वाले गूढ़ और रहस्यमय हिप्पी

गूढ़ और रहस्यमय बातों में रुचि रखने वाले लोग अगले वर्ग में आते हैं। ये लोग अपने आपको आध्यात्मिक या रूहानी कहते हैं लेकिन धार्मिक कहलाना पसंद नहीं करते। जो पुरुष और महिलाएँ दर्शन-शास्त्र और एक अलग तरह की जीवन-शैली में रुचि रखते हैं, जो दूसरों से, अपने समाज से अपने आपको ‘कुछ खास और अलग’ पाते हैं और उनके साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। अपने आपकी खोज में वे अक्सर लंबी यात्राएँ करने के लिए तैयार होते है। इस बात को समझने के लिए कि आखिर वे क्या चाहते हैं, वे कौन हैं और उन्हें कौन सी बात खुश कर सकती है। वे अपने जीवन का गहरा अर्थ खोजना चाहते हैं और उसे योग और आयुर्वेद के माध्यम से समझने की कोशिश करने के लिए तत्पर हैं।

मैं हिप्पी शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ लेकिन बहुत से लोग, भले ही इस वर्ग में आते हों, अपने आपको इस नाम से जोड़ना नहीं चाहेंगे और इस ओर ध्यान नहीं देंगे। मैं जानता हूँ कि इन लोगों के लिए भी हमारे दिल खुले हुए हैं और हमें इस बात की खुशी है कि अक्सर हम इन लोगों के लिए स्वर्ग साबित हो सकते हैं, ऐसी शीर्ष जगह, भारत में आने के बाद जिनके यहाँ वे निःसंकोच भ्रमण कर सकते हैं-क्योंकि अक्सर देखा यह गया है कि यह देश उनकी उम्मीदों से बिल्कुल अलग सिद्ध होता है। जैसा कि मैंने कल बताया, निश्चय ही हमारे आश्रम में उन्हें एक ऐसी जगह मिल जाती हैं, जहाँ धार्मिक कट्टरता और कूपमंडूकता का कोई स्थान नहीं है। इस दीवाने मुल्क से हम धीरे-धीरे उनका परिचय करवाते हैं और अपने जीवन में उन्हें शामिल करके, अपने प्यार और जीवंतता से उन्हें अपना बनाकर, हम आशा करते हैं कि उनकी तलाश में, उनकी खोज में उनकी मदद कर सकेंगे।

मछली बेचना और भाषण देना दो बिल्कुल अलग बातें हैं – 12 जनवरी 2014

सन 2006 की शुरुआत में, जब मैं अभी आस्ट्रेलिया में ही था, मेरे साथ एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने मुझ पर ज़ाहिर किया कि आध्यात्मिक माहौल बहुत व्यावसायिक हो गया है। मैं एक अध्यात्मिक बाज़ार में उपस्थित था-और उसके लिए काम न करने के मेरे निर्णय ने मेरे आयोजकों को आश्चर्यचकित और निराश कर दिया।

पूरी कथा बयान करनी हो तो बता दूँ कि मेरे आयोजक भी वहाँ अपना स्टाल लगाने वाले थे और जब हम वहाँ पहुंचे, उन्होंने बताया कि सप्ताहांत के लिए उन्होंने कोई कार्यशाला नहीं रखी है और उसकी जगह इस अपेक्षा में मुझे यहाँ ले आए हैं कि मैं दूसरों की मदद करने का अपना काम वहाँ करूं। पहले भी मैं ऐसे आयोजनों में शिरकत कर चुका था और उनके विषय में मेरे मन में कोई पुख्ता विचार नहीं बन पाए थे। मैं पहले सिर्फ एक दर्शक के रूप में ही इन कार्यक्रमों में शामिल हुआ था, वक्ता के रूप में नहीं, लेकिन मैं जानता था कि वहाँ बहुत से कार्यक्रम एक साथ व्यवस्थित रूप से आयोजित होते रहते हैं, जैसे अक्सर बड़े मॉल में ख़रीदारी का अनुभव होता है, कुछ-कुछ उस तरह। इसलिए इस बार भी मैं यूं ही चला गया था कि देखते हैं, क्या नज़ारा देखने-समझने को मिलता है।

हम एक बहुत विशाल इमारत तक आए, जहां यह आयोजन हो रहा था और मेरे आयोजक मुझे सीधे अपने स्टाल में ले गए, जिसे उन्होंने एक दिन पहले ही तैयार कर रखा था। उस हाल से गुजरते हुए मैंने दूसरे प्रदर्शकों के स्टालों पर नज़र दौड़ाई। लोग क्रिस्टल्स (स्फटिक), एंजेल-कार्ड, आध्यात्मिक पुस्तकें, सिंगिंग बौल्स (बजाने वाले बर्तन) और बहुत सी उपहार में देने योग्य वस्तुएँ बेच रहे थे। वहाँ अपने अपने स्टाल लगाए टेरो कार्ड से भविष्य बताने वाले लोग थे, अतीन्द्रियदर्शी और ज्योतिषी बैठे हुए थे। आप अपने प्रभामंडल का फोटो प्राप्त कर सकते थे, कई विभिन्न तरीकों से अपना भविष्य जान सकते थे और पर्दों से पृथक्कृत छोटे-छोटे केबिनों में अपनी मालिश करवा सकते थे। बगल में स्थित कुछ बड़े हालों में कई कार्यक्रम भी वहाँ चल रहे थे, जहां गुरुओं आदि के व्याख्यानों के टाइम-टेबलों की घोषणाएँ हो रही थी और उनके पर्चे बांटे जा रहे थे। वह एक तरह का आध्यात्मिक सुपरमार्केट ही था, एक मेला, जहां ऊर्जा को खरीदना-बेचना सहज रूप से चल रहा था।

हाल की तरफ निकलने वाले मुख्य रास्ते पर स्थित मेरे आयोजक का स्टाल भी काफी बड़ा था। आखिर, वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपनी सारी योजना के बारे में मुझे बताया। उसने मुझसे कहा, "हम अपने स्टाल का एक छोटा सा हिस्सा पर्दों की सहायता से ढँक देते हैं और आप अपना व्यक्तिगत सत्र यहीं लगा सकते हैं। और बाद में हम आपके प्रवचन के स्थान और समय की घोषणा कर देंगे। उस वक़्त यहाँ बहुत से लोग मौजूद होंगे और आसपास घूम रहे लोगों में जिनकी इस विषय में रुचि होगी, वे आपका प्रवचन सुनने वहाँ आ जाएंगे!"

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया, उन्हें क्या कहूं कि मैं क्या सोच रहा हूँ। आखिर मैंने कहा "यहाँ बहुत हल्ला-गुल्ला है", जो ज़ाहिरा तौर पर दिखाई भी दे रहा था, और फिर उन्हें समझाना शुरू कर दिया कि सलाह-सत्र (counseling session) हेतु सिर्फ पर्दे लगाकर इस शोर-शराबे और दूसरे व्यवधानों को दूर नहीं किया जा सकता। इस कार्यक्रम में विश्रांति के लिए कोलाहल रहित सम्पूर्ण एकांत चाहिए! इसके अलावा मैं इस तरह व्याख्यान नहीं दे सकता, जैसे कोई मछली-बाज़ार लगा हो और हर मछली बेचने वाला अपनी मछली की प्रशंसा करता हुआ चीख रहा हो: मछली ले लो, सस्ती स्वादिष्ट मछली! व्याख्यान देते समय मुझे व्याख्यान पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है, अपने श्रोताओं की आँखों में आंखे डालकर देखना होता है, जिससे मैं उनकी प्रतिक्रिया का अंदाज़ा ले सकूँ और फिर मैं अपने व्याख्यान पर उनसे भी एकाग्रता की अपेक्षा करता हूँ! बार-बार लोग ताक-झांक करें या आकर बैठें और जब उन्हें लगे कि उनकी इसमें रुचि नहीं है तो वापस चले जाएँ, यह सब मुझे मंजूर नहीं है। मैं किसी चीज़ का विज्ञापन नहीं करना चाहता और न ही कुछ बेचने की कोशिश कर रहा हूँ!

किसी ने, शायद मज़ाक में कहा कि "मुझे लगा यह व्यक्ति ध्यान का बहुत बड़ा विशेषज्ञ है और कहीं भी, कभी भी ध्यान लगा सकता है"। मैंने उससे कहा कि वह इस कला का उस्ताद होगा मगर मैं जानता था कि मैं ऐसा नहीं कर सकूँगा। मैं खुद भीड़-भाड़ में भी अपना ध्यान तो लगा सकता हूँ मगर जब मुझे दूसरों के साथ चर्चा भी करनी है तो मुझे बाहर भी एकाग्र होने की आवश्यकता होगी, अपने श्रोताओं पर मेरे व्याख्यान का असर भी मुझे जानना-समझना होगा और इसलिए मुझे उस भीड़ भरे बाज़ार जैसी जगह में अतिरिक्त शांति की आवश्यकता होगी!

मुझे लगता है कि मैं ऐसे मेलों के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ।

जब मैं एक सच्ची प्रेत-कथा का साक्षी बना – 10 फरवरी 2013

मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मैं गूढ़ और रहस्यमय लोगों, गुरु, अतींद्रियदर्शी, शमन और कई दूसरे लोगों, के संपर्क में सबसे पहले 2005 में आया। पता नहीं कैसी कैसी अजीबोगरीब और बेतुकी बातों पर लोग भरोसा करते हैं यह सोचकर मैं आश्चर्य में पड़ गया। मैं जानता था कि भारत में तो लोग अंधविश्वासी हैं और भूत-प्रेतों और दूसरी काल्पनिक बातों पर भरोसा करते हैं, मगर पश्चिम में भी बहुत से ऐसे लोग मिल जाएंगे, मैंने तब तक नहीं सोचा था। यह आश्चर्य ही था कि बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे पश्चिमी लोग भी ऐसी ऊलजलूल बातों पर विश्वास करते हैं। और बहुत से लोग ऐसी बातों को बढ़ावा देते हैं और कभी-कभी लोगों के ऐसे विश्वासों का लाभ उठाकर पैसा भी बना लेते हैं। एक सीमा के बाद मैंने उस पर सोचना छोड़ दिया- आखिर हर किसी को अपनी मर्ज़ी से किसी बात पर विश्वास करने की आज़ादी तो है ही। लेकिन फिर एक घटना हुई और मैंने जाना कि लोग मुझे कितना मूर्ख समझते थे।

एक शाम मैं कुछ लोगों के साथ बैठा था जो एक कार्यक्रम के बाद रुक गए थे। मुझे याद आता है कि वह कोई ध्यान का सत्र था। वे सब लोग मेरे इस कार्यक्रम में दूसरी या तीसरी बार आए थे और भारत के बारे में, मेरे विचारों के बारे में जानने या मेरे साथ सिर्फ कुछ वक्त बिताने के लिए बहुत उत्सुक थे। इसलिए मैंने ही उन्हें कुछ देर बातचीत करने के लिए रोक लिया था। जिस केंद्र में यह सत्र आयोजित किया गया था वह मेरे आयोजक के घर, जहां मैं रुका हुआ था, से लगा हुआ ही था इसलिए वापस जाने की कोई जल्दी नहीं थी। आयोजक स्वयं घर जा चुकी थी मगर घर अधिक दूर नहीं था इसलिए हम वहाँ बैठकर गप्पें मारते हुए जब तक चाहें शाम गुज़ार सकते थे।

ध्यान के समय जो धीमा संगीत चल रहा था उसके स्वर अभी भी जारी थे और हम सब दुनिया भर के दर्शनों पर चर्चा का आनंद ले रहे थे। तभी अचानक बिजली और संगीत बंद हो गए। और अगले ही क्षण दोनों फिर चालू हो गए। हम सब आश्चर्य से एक दूसरे को देखते रह गए। भारत में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होती-बिजली की कटौती वहाँ आम बात है। मगर यहाँ, जर्मनी में मैंने आज तक पल भर के लिए भी बिजली जाते नहीं देखी, पूरे समय व्यवधान रहित बिजली मुहैया की जाती है। मेरे मित्रों ने कहा कि, खैर कभी कोई बहुत बड़ी समस्या आने पर ऐसा हो भी सकता है, मगर अपवाद स्वरूप ही ऐसा होता है। कुछ टूट गया होगा और उसे दूसरी लाइन से जोड़ने के लिए बिजली बंद करनी पड़ी होगी। कुछ पल के लिए इस कैफियत से हम सब संतुष्ट हो गए। हम फिर बातों मे मशगूल हो गए लेकिन दो मिनट बाद फिर फिर वही हुआ! हम फिर एक-दूसरे की तरफ ताकते हुए इंतज़ार करने लगे। ऐसा तीन बार हुआ तो यह सामान्य बात नहीं थी। क्या मामला है, देखने के लिए हम उठ खड़े हुए और सोचा अपने आयोजक से बात की जाए कि पहले भी कभी ऐसा हुआ है क्या? जब हम ध्यान वाले कमरे से बाहर निकले हमें सामने वाला दरवाजा बंद होने की आवाज़ सुनाई दी और जब मैंने खिड़की से बाहर झाँककर देखा तो एक काला साया भागता दिखाई दिया। मैंने ध्यान से देखा तो उसका चलने का ढंग वगैरह देखकर मुझे लगा मैं उस आकृति को पहचान रहा हूँ- और लो, वह तो मेरी आयोजक ही लान पार करके अपने घर की तरफ जा रही थी! सामने पहुँचकर उसने दरवाजा खोला तो कमरे का प्रकाश उस पर पड़ा और मेरा शक दूर हो गया।

निश्चय ही, मैं अकेला नहीं था जिसने उसे खिड़की से लान में दौड़ लगाते देखा था। कमरे में अजीब सा सन्नाटा छा गया। सभी ने खिड़की के बाहर, दरवाजे से फ्यूज़-बॉक्स तक गौर से नज़र दौड़ाई; फ्यूज़-बॉक्स का दरवाजा जल्दबाज़ी में थोड़ा सा खुला रह गया था। मेहमानों से क्या कहा जाए, समझ में नहीं आ रहा था, मगर हमने अपनी बातचीत को वहीं विराम दिया और आपस में ‘गुड-नाइट’ कहकर बिदा हो गए। जब सब चले गए मैं घर आया और देखा कि मेरी आयोजक शांति से बैठकर कोई किताब पढ़ रही है। उसने मुझे ‘हेलो’ कहा और कुछ आश्चर्यचकित दिखाई देने की कोशिश करने लगी। मैंने सीधे सीधे पूछा, ‘आपने मेन-स्विच से कमरे की बिजली क्यों बंद कर दी थी?’ उसने फिर वही झूठा आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘नहीं, वह मैं नहीं थी! मैं तो पूरे समय यहीं थी! लेकिन मैं जानती हूँ…’ अब उसकी आवाज़ ज़रा धीमी हो गई- ‘कभी-कभी ऐसा होता है यहाँ। मुझे लगता है कि कोई अतृप्त आत्मा है जो प्रकाश के लिए इधर-उधर भटकती रहती है!’

मुझे लगता है कि निश्चय ही मैं उस वक़्त भौचक रह गया होऊंगा और उसे अविश्वास और आश्चर्य से घूरता हुआ सोच रहा होऊंगा कि इस बात पर बहस करना मौजू होगा या नहीं। मैंने कोई बात न करना ही उचित समझा। अगर वह इतना बड़ा नाटक कर सकती थी तो अब अपनी बात से पीछे हटने वाली नहीं थी। इसलिए बहस में क्यों उलझा जाए? मैंने विषय बदल दिया लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि मैं इन फिजूल की बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता। एक अनोखी अनुभूति मुझे हुई, एक मज़ेदार वाकया मेरे साथ हुआ था। एक और सीख मुझे मिली: सिर्फ अंधविश्वासी लोग ही दुनिया में नहीं बसते बल्कि अंधविश्वास को विश्वसनीय बनाने के लिए और उसे और आगे ले जाने के लिए कुछ लोग स्टंट भी कर सकते हैं!

पाश्चात्य लोगों का गुरु बनना – पश्चिम के आध्यात्मिक जगत का अनुभव – 27 जनवरी 2013

मैं वर्ष 2005 में कई लोगों से मिला जो कि अलग-अलग जगहों, अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि और अलग-अलग रुचियों के व्यक्ति थे। वहां मैं कुछ ऐसे लोगों के सम्पर्क में आया जो कि स्वयं को आध्यात्मिक कहते थे और उनसे मिलकर मैंने यह महसूस किया कि वह खुद को गुरु समझते थे। सिर्फ भारत के ही गुरुओं से नहीं बल्कि आधुनिक और पाश्चात्य गुरुओं व उनके अनुयायियों से भी मिला। दरअसल वे लोग अपने आप को भारतीय गुरुओं के शिष्य मानते थे और उन्होंने अपना धन्धा शुरू कर दिया था, कुछ बिन्दुओं में वह अपने गुरुओं की नकल, व तौर-तरीकों का अभिनय भी करते थे। बहुत सी बातें है, पश्चिमी आध्यात्मिक लोग जिसमें विश्वास करते है, यह कुछ मेल नहीं खाता।

मैं भी एक गुरु की पृष्ठभूमि से था। मैंने इस पेशे को छोड़ दिया क्योंकि मुझे इस पेशे में एक बात नहीं अच्छी लगती कि गुरु अनुयायी बनाते है और मैं लोगों को अपना अनुयायी नहीं बल्कि मित्र बनाना चाहता हूं। मुझे यह भी पता चला कि कुछ पाश्चात्य लोग भारतीय गुरुओं के शिष्य हैं परन्तु मैंने हमेशा उन्हें गले से लगाया भोजन पर निमंत्रित किया और यह प्रयास किया कि हमारे बीच में कोई दूरी न रहे|

यह मेरे लिये सामान्य बात थी कि लोगों के खुद के गुरु थे। अकसर वे गुरु भारतीय होते थे परन्तु मैं उनसे परिचित नहीं होता था। मैं इस अवधारणा से पूर्व परिचित था ही इसलिए मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन किसका शिष्य है, बस मैं यह नहीं चाहता कि वो मुझे गुरु समझाने लग जाएँ|

हांलांकि एक बार मुझे अप्रिय भी लगा कि जिन लोगों के साथ मैं रह रहा हूं वह एक अलग दृष्टिकोण रखते हैं। मैं और भारत से मेरा संगीतकार तथा यशेन्दु, हम लोग अपने नये आयोजक के घर के लिविंग रूम में बैठे हुए थे। यह पुराना और बहुत ही बड़ा घर था और जो आयोजक थी वह एक महिला थी। वह महिला अकेले उस बड़े से घर में रहती थी। मेरा संगीतकार जो कि जर्मनी पहली बार आया था, उसने हमेशा से भारतीय लोगों की भीड़, संयुक्त परिवार वाले घर और हमेशा शोरगुल वाला माहौल ही देखा था और जब वह इस महिला के घर आया तो उसका सोचना बस यही था कि यह सच में बहुत ही वीरान जगह है जो वह पहली बार देख रहा है। वास्तव में वह डर गया था और उसे लग रहा था कि इस घर में कहीं कोई भूत तो नहीं।

हांलांकि हमारी आयोजिका भी इस विचार से हतोत्साहित नहीं थी, और उनका आत्मा, भूत-प्रेत और देवदूतों में पूरा विश्वास था। जब हम वहां थे तो मैं थोड़ा व्यस्त था और इन बातों पर ध्यान नहीं दे पाया। यद्यपि मैं भूतों की कहानियों और जिसको कभी देखा नहीं ऐसी किसी भी डरावनी चीज़ पर विश्वास नहीं करता तो मैंने इस विचार को बिल्कुल ही खारिज कर दिया और अपना काम करने लगा, नये-नये लोगों से मिलने लगा और उन्हें मित्र बनाने लगा।

उन लोगों में से बाद में एक मित्र ने मुझे बताया कि हम किस महिला के साथ रह रहे है क्योंकि मुझे जर्मन नहीं आती तो इसलिये मुझे पता भी नहीं चल पाता था कि जो लोग मेरे पास आते थे उनसे क्या बोला गया। सभी कुछ साधारण था, जब भी ध्यान (मेडीटेशन) होता था उस समय मोमबत्ती जलती थी और बहुत ही धीमे स्वर में संगीत बजता था जो कि बहुत अच्छा था। मैं भी लोगों के बजाय आयोजक से बात करता था और मैंने देखा कि वास्तव में लोगों को कार्यशाला, ध्यान (मेडीटेशन), अलग-अलग सत्रों से पहले शान्त कराना भी एक कला है।

बाद में मुझे पता चला कि यह औरत वास्तव में खुद को एक द्रष्टा (भूत, भविष्य जानने वाला) समझती है। मतलब वह महिला इस भ्रम में थी कि वह अदृश्य आत्माओं को देख सकती है जो कि अन्य लोग नहीं देख सकते और ये अदृश्य आत्माएं उस महिला को उसके परिवेश का रहस्य बताती थी। इसलिये यह महिला उन लोगों को वह सारे रहस्य बताती थी जो लोग मुझसे मिलने के लिये आते थे। इन बातों से लोगों में क्या छाप पड़ी होगी!

इसके अतिरिक्त, यह बात मैंने सिर्फ उस महिला के घर पर अनुभव नहीं की बल्कि अन्य जगहों पर भी की कि उन लोगों में इस बात को लेकर एक अहंकार था कि वह अदृश्य आत्माओं को देख सकते हैं। इसे मैं ‘आध्यात्मिक अहंकार’ कहने लगा जब मैंने ऐसे अनुभवों को महसूस किया कि लोग अपने इस झूठे ज्ञान के कारण अपने आप को सन्त समझने लगे हैं और किसी न किसी तरीके से खुद को अन्य लोगों से बेहतर समझते हैं और सोचते हैं कि लोगों को इस बात के लिये आभारी होना चाहिये कि वह अपने इस ज्ञान को लोगों में बांटते हैं। कुछ लोग उन्हें पसन्द करते है और ऐसे पाश्चात्य गुरुओं के अनुयायी होते है या फिर कुछ उन्हें त्याग देते थे।

वर्ष 2005 में मैं इन घटनाओं से व्यवहारिक रूप से सीख रहा था। मैंने इन सब तथाकथित आध्यात्मिक जगत को समझना शुरू किया कि इस भ्रम को और आत्माओं को कैसे ज़रिया बनाना है। पहली बार मैंने इस गूढ़ अहंकार का अनुभव किया और पहली बार मैंने पाश्चात्य गुरुओं के बारे में जाना। यह सब देखने के बाद मैंने यह निश्चय किया कि एक गुरु बनने का पेशा निश्चय ही मेरे लिये नहीं है।