क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं? 14 दिसंबर 2015

क्या सोशल नेटवर्किंग साइट्स जीवन में अकेलापन पैदा कर रहीं हैं

मैं कभी-कभी सोच में पड़ जाता हूँ कि अंततोगत्वा, लंबे अंतराल के बाद सोशल मीडिया का हमारे समाज पर क्या असर होगा। हालांकि सोशल नेटवर्किंग की शुरुआत ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से की गई थी, मुझे लगता है कि वास्तव में वह लोगों में अकेलापन पैदा कर रही हैं।

मैं इस नतीजे पर कैसे पहुँचा? बहुत आसान है: मैंने इस बात पर गौर किया है कि अधिकतर लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों पर क्या देखते हैं और उस पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होती है! उन साइटों के साथ उनका संबंध अत्यंत विरोधाभासी होता है: ऐसा प्रतीत होता है जैसे वहाँ उन्हें अपनी पसंद का पर्याप्त मसाला नहीं मिल पा रहा है और वे बार-बार उन्हीं साइटों को खोलते हैं लेकिन फिर खिन्न होकर उन्हें बार-बार बंद भी कर देते हैं। जो कुछ वे देखते हैं, उसी से यह उदासी पैदा होती है: वे क्या देखते हैं? पार्टियाँ करते हुए, प्रसन्नचित्त होकर समय बिताते हुए और कुल मिलाकर जीवन का आनंद लेते हुए मित्रों के चित्र-परिवार के साथ, अन्य मित्रों के साथ, बहुत सारे लोगों के बीच!

और आप? आप यहाँ बैठे हैं अकेले, अपने मोबाइल फोन, टेबलेट या कंप्यूटर स्क्रीन पर टकटकी लगाए। आप उस मौज-मस्ती का हिस्सा नहीं हैं। पार्टी आपके बगैर जारी है। आपका कोई अपना, साथी या जीवन साथी, नहीं है जो आपको कैंडल लाइट डिनर पर बुलाकर अचरज में डाल दे, जैसा कि एक मित्र ने पोस्ट किया है। आप किसी हिप पार्टी में नहीं जाते, जहाँ हर व्यक्ति झूम-झूमकर नाचता-गाता है और उल्लास में सुध-बुध भूल जाता है। और लगता है, आप उन सब मित्रों से भी दूर हैं, जो इनका विवरण नेट पर पोस्ट करते हैं।

आपका सोशल नेटवर्क, जिसे आपको दूसरे लोगों से जोड़ने के लिए बनाया गया है, वही आपको पूरी तरह अपने हाल पर छोड़ देता है, अकेला और तनहा। वह अगर न होता तो आपको पता ही नहीं चल पाता कि दूसरे किस प्रकार आपकी अनुपस्थिति में आपस में मिल-जुलकर मौज कर रहे हैं। संभव है, तब आप घर में कोई किताब पढ़ते हुए या नहाते हुए या कोई भी अपनी मर्ज़ी का काम करते हुए अपने आप में मस्त रहे आते।

या, कम्प्यूटर के पर्दे को ताकते हुए, नेट पर लिखने के लिए कोई समझदारी से भरी बात पर अपना दिमाग खपाते हुए या ख़ुशी मनाते हुए अपनी कोई पुरानी फोटो तलाशते हुए आप भी वास्तव में बाहर निकल सकते हैं। दोस्त क्या-क्या मौज-मस्ती कर रहे हैं, इसकी ऑनलाइन ताक-झाँक करने की जगह आप किसी दोस्त को फोन कर सकते हैं, उससे रूबरू बात कर सकते हैं!

इस तरह सोशल मीडिया आपको अकेलेपन की ओर ले जा सकता है, जैसा कि इंटरनेट के आने से पहले संभव नहीं था। तब आप हर वक़्त उपलब्ध होते थे, तब आप अपने सभी स्कूली और कॉलेज के दोस्तों से, अपने कार्यालयीन सहकर्मियों से और अपने रिश्तेदारों से एक साथ और हर समय जुड़े होते थे।

इस बात को तब आप अधिक शिद्दत के साथ नोटिस करते हैं जब आप किसी परेशानी में होते हैं और किसी दोस्त की मदद चाहते हैं, जब आप संदेशों के ज़रिए तो लोगों के सम्पर्क में होते हैं लेकिन उनसे रूबरू सम्पर्क नहीं होता। क्योंकि जब आप पर आसमान टूट पड़ा है, आपको किसी गले लगाने वाले की ज़रूरत होती है, न कि किसी आभासी आलिंगन की। कोई वास्तविक कंधा, जिस पर सिर रखकर आप आँसू बहा सकें। कोई आपके पास आए और आपकी बात सुने, आपके वास्तविक जीवन में आपके साथ खड़ा होने वाला ऐसा कोई शख्स।

न भूलें कि सोशल नेटवर्क महज साधन है, ऐसी सुविधा, जिससे आप वास्तविक जीवन के अनुभवों को अधिक गतिशील और पुख्ता बना सकें, न कि वह यथार्थ का विकल्प है कि उसमें लिप्त होकर आप अपनी वास्तविक दुनिया से ही कट जाएँ। अपने सामाजिक जीवन में उसे आनंद-वृद्धि का साधन बनाएँ। उसके गुलाम बनकर उसे यह इजाज़त न दें कि वह आपको अकेलेपन और अवसादग्रस्तता की ओर खींच ले जाए!

संबंधों में आने वाली कठिनाइयों के समय मानसिक संतुलन न खोना – 27 अक्टूबर 2015

हमारी सभी समस्याएँ पैसे से संबंधित नहीं होती। कल के ब्लॉग में मैंने मुख्य रूप से सिर्फ उन समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त किए थे जो व्यापार और वित्त से जुड़ी होती हैं लेकिन निश्चित ही कुछ दूसरी समस्याएँ भी होती हैं जो कभी-कभी आर्थिक समस्याओं से भी अधिक मुश्किल नज़र आती हैं: दोस्तों, रिश्तेदारों और सबसे बढ़कर, अपने जीवन साथी जैसे दूसरे लोगों के साथ संबंधों में पैदा होने वाली समस्याएँ या खटास! इन समस्याओं से कैसे निजात पाएँ?

पहली बात तो यह कि वही पुराना सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है: कोई कदम उठाने से पहले समस्या पर शांत-चित्त होकर विचार करें। स्वाभाविक ही, किसी प्रियकर के साथ कोई कलह, कोई असहमति वाली बात या कोई वाद-विवाद, मतभेद या झड़प आपको बुरी तरह विचलित कर सकते हैं। आप बुरी तरह क्रोधित हो सकते हैं या आपको ऐसा लग सकता है कि आपका संसार टूटकर बिखर गया है, आपकी आँखों से आँसू निकल सकते हैं और विषाद से आप थर-थर काँपने लग सकते हैं। आप सोच सकते हैं कि आपकी बात सही थी या आप खुद अपनी करनी पर पछता रहे हो सकते हैं लेकिन फिर भी इससे आगे विचार करने से पहले या अगली कार्यवाही करने से पहले आपको अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं है कि आप सामने वाले के प्रति कोई कोई सहानुभूति न रखें या यही भूल जाएँ कि उसने आपके साथ कोई बुरा व्यवहार किया है! बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप अपनी भावनाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं और जानते हैं कि उसका उद्गम क्या है। इसका विश्लेषण करें: आपके मन में इस तरह की भावनाएँ पैदा होने का मूल कारण क्या है? क्या सामने वाले की कोई बात इसका कारण है? या आपके किसी व्यवहार के चलते ऐसा हुआ है? आपको ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? क्या वाकई ऐसा व्यवहार आपकी ओर से या सामने वाले की ओर से हुआ है या यह महज आपकी कल्पना है, जो आपको परेशान कर रही है?

मैं खुद भी बहुत भावुक व्यति हूँ लेकिन जबकि कुछ लोगों के लिए यह दिमागी प्रक्रिया बहुत जटिल और कष्टदायी लग सकती है, मेरा मानना है कि समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए कभी-कभी ऐसी पहेलियों से जूझना ही पड़ता है। अगर मैं इतना भावुक हूँ कि मुझे यह भी पता नहीं चल पाता कि मेरी भावनाएँ ऐसी क्यों है तो यह मेरे व्यवहार में भी व्यक्त हो सकता है।

अपने गुस्से पर काबू में न रख पाने के कारण लोग बड़े भयानक और हास्यास्पद अपराध कर बैठते हैं। बाद में अक्सर ऐसा होता है कि उन्हें समझ में भी नहीं आता कि ऐसा उन्होंने क्यों किया! वे क्रोधित थे-लेकिन गुस्सा उतरने पर वे अच्छी तरह जान रहे होते हैं कि उनका व्यवहार कतई तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं था। कि किसी दुख या पीड़ा के चलते उन्हें क्रोध आया था, यह सही है लेकिन सामने वाला बेचारा यह भी नहीं जानता होगा कि उनकी पीड़ा का जिम्मेदार वह है।

इसलिए, अगर आपको पता चल जाए कि आप वैसा क्यों महसूस कर रहे हैं तो आप उस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं।

अगर आपसे कोई गलती हुई है और अब आपको पछतावा हो रहा है तो मेरे खयाल से तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए। लेकिन सामने वाले से आप यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हर हाल में वह आपकी माफी स्वीकार कर ही ले लेकिन आपके लिए यह कदम उठाना और खुद अपने आपको यह तसल्ली देना कि आपसे गलती हुई थी और आपने माफी मांगली, उचित ही होगा। क्योंकि भले ही सामने वाले ने माफ नहीं किया लेकिन आपने कोशिश तो की। और इतना करने के बाद आप अपने मन में शांति का अनुभव करेंगे और प्रकरण को वहीं विराम देकर आगे बढ़ सकेंगे।

यदि सामने वाले ने आपके साथ कोई दुर्व्यवहार किया है, तब आपके पास मौका होता है कि आपको इस विषय में क्या करना चाहते हैं। आप उसके सामने अपनी भावनाएँ रख सकते हैं या यह तय कर सकते हैं कि आप इस विषय में आगे क्या करेंगे। ऐसी स्थिति में आपके पास क्रोध के आवेश में व्यक्त क्षणिक व्यवहार के अलावा अपने मन की वास्तविक भावनाओं के अनुरूप व्यवहार करने का मौका होता है।

अंत में यही कि कुछ भी हो, संदेश एक ही है: कोई भी समस्या सामने हो, आपका संसार टूटकर बिखरने वाला नहीं है। शांत बने रहें और इस बारे में विचार करें कि आप इस विषय में क्या कर सकते हैं!

प्यार का कोई विलोम नहीं है – 7 सितंबर 2015

मेरे लिए प्रेम जीवन का एक प्रमुख विषय है। सदा से रहा है। वास्तव में मैं समझता हूँ कि अधिक से अधिक लोगों को अपने जीवन में प्रेम को अधिक से अधिक प्रमुखता देनी चाहिए क्योंकि उससे उन्हें लाभ हो सकता है। प्रेम पर चर्चा करने वाले लोगों यानी आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों के प्रचार के विपरीत मैं यह मानता हूँ कि प्रेम का विलोम कुछ भी नहीं है। ऐसी कोई विपरीत भावना नहीं है, जिसका अस्तित्व प्रेम की उपस्थिति में असंभव हो।

परस्पर विरोधी चीज़ें एक साथ नहीं रह सकतीं, ठीक? कोई व्यक्ति एक साथ लंबा और ठिगना नहीं हो सकता। तापमान एक साथ ठंडा और गरम नहीं हो सकता। आपके बाल एक साथ लंबे और छोटे नहीं हो सकते। इसी तरह लोग सोचते हैं कि घृणा या डर भी प्रेम के विलोम हैं। कई लोग मुझसे कहते रहते हैं: "जहाँ प्रेम होगा वहाँ घृणा नहीं हो सकती" या अगर "आपमें प्रेम का भाव है तो फिर डर के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।" मैं नहीं समझता कि ये दोनों वक्तव्य सच हैं।

मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि प्रेम दूसरी किसी भी भावना के साथ एक साथ रह सकता है! प्रेम छल के साथ रह सकता है, वह जूनून के साथ एक साथ रह सकता है। यहाँ तक कि प्रेम का अस्तित्व नापसंदगी (अरुचि) के साथ, अज्ञान या विरक्ति के साथ भी हो सकता है।

आपने भी ऊपर उल्लिखित एहसासों (भावनाओं) को प्रेम के साथ, एक साथ मौजूद देखा होगा लेकिन आप शायद कल्पना भी नहीं कर सकते कि घृणा और डर के साथ भी प्रेम अपना सहअस्तित्व बना लेता है।

क्या आपने कभी लव-हेट रिलेशनशिप नहीं देखी? क्या आपके सामने कभी भी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई, जहाँ ऐसा हुआ हो कि जिससे आप प्रेम करते हैं, उसने आपका कोई अहित किया हो? भले ही यह बहुत कम समय के लिए हुआ हो लेकिन जब आप क्रोधित या अपमानित हुए तो क्या उसमें कुछ मात्रा में घृणा भी नहीं मिली हुई थी। और उस समय, क्षण भर के लिए ही सही, क्या आपने यह नहीं सोचा कि आपके बीच प्रेम नहीं रह गया है।

इसी तरह मेरा विश्वास है कि भय के साथ भी यही होता है। वह भी एक ही समय में एक साथ मौजूद हो सकता है। आप प्रेम भी कर रहे हो सकते हैं और उसी वक़्त आपको डर भी लग रहा हो सकता है कि यदि आप कुछ ज़्यादा खुलेंगे तो पता नहीं क्या हो। क्या आपको फिर बुरा लगेगा? क्या आपकी बहुमूल्य भावनाओं का गलत इस्तेमाल कर लिया जाएगा? इससे आपके प्रेम पर कोई असर नहीं होगा लेकिन आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उसी वक़्त आपके मन में भय भी मौजूद था- एक साथ दोनों!

तो यह बहुत स्पष्ट है: जितनी शिद्दत से मेरा भरोसा है कि प्रेम है, उतनी ही शिद्दत से मेरा मानना है कि उसके साथ डर या घृणा भी मौजूद हो सकती है। और ये दोनों भी महज नैसर्गिक भावनाएँ हैं, जिन्हें हम अपने अस्तित्व का हिस्सा मान सकते हैं!

अपनी साढ़े तीन साल की बच्ची, अपरा के बगैर पहली बार माँ और पा – 14 जुलाई 2015

कल मैंने आपको अपरा के पहले लंबे सफर के बारे में बताया था, जिसमें हम दोनों साथ नहीं थे: तीन दिन और दो रातें- अपने चाचा और परनानी के साथ खजुराहो घूमने! उसका समय तो बड़ा शानदार गुज़रा- लेकिन हमारा क्या? माँ और पा की क्या हालत हुई?

मैंने पहले ही बताया कि जाने से पहले हमने अपरा से अच्छी तरह बात कर ली थी कि रात को उसे हमारे बगैर सोना होगा। हम जानते थे कि उसके लिए यह सबसे मुश्किल वक़्त होगा। हमने उसे समझाया कि हम वहाँ उसके साथ नहीं होंगे और वह हमारे पास तुरंत आ भी नहीं सकेगी- लेकिन वह निश्चिंत थी कि उसे कुछ नहीं होगा, कोई परेशानी नहीं होगी। हम जानते थे कि दिन में वह हमें भूली रहेगी मगर यही अपने बारे में हम नहीं कह सकते थे!

जब वे सब चले गए, हमारी अजीब हालत हो गई: साढ़े तीन साल में पहली बार अपरा हमारे साथ नहीं थी! और तब हमें समझ में आया कि वह हमारी कितनी छोटी-छोटी बातों में शामिल थी, हमारे मामूली से मामूली कामों के पीछे यही होता था कि उसे तकलीफ न पहुँचे, उसे दिक्कत न हो! आज ऑफिस में उसकी कोई छेड़-छाड़ नहीं होने वाली थी, हमारा ध्यान अपनी ओर खींचने वाला आज यहाँ नहीं था और खाना खाते समय तो ऐसी निस्तब्धता थी कि पूछो मत! लेकिन वास्तव में हम पल-पल उसकी अनुपस्थिति का एहसास कर रहे थे और बहुत छोटी-छोटी, मामूली बातें हमें उसकी याद दिलाती थीं कि हम उसे कितना मिस कर रहे हैं: वह उठ न जाए इसलिए आज भी सबेरे हम फुसफुसाहटों में बात करते रहे, जबकि… वह बिस्तर पर नहीं थी। फोन पर बात करते हुए मैं आदतन दूसरे कमरे में चला जाता था कि कहीं वह आकर कान में चीखने न लगे और मैं फोन पर कुछ सुन न पाऊँ! यह सब सहज हो जाता था मगर हर बार तुरंत अपरा का खयाल आता था कि अरे, वह तो यहाँ नहीं है!

जी हाँ, हम उसे बुरी तरह मिस कर रहे थे। मैं जानता हूँ कि बहुत से अभिभावक कहते हैं कि बच्चों से मुक्त सप्ताहांत कितना स्वच्छंद और सुखद होता है! लेकिन हम ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं करते। मेरे विचार में इसका मुख्य कारण यह है कि उसके होते हुए भी हम किसी चीज़ से वंचित नहीं रहते। जो हम करना चाहते हैं, सब कुछ उसकी उपस्थिति में भी करते हैं और उसके साथ हम हर बात का आनंद लेते हैं! ऐसी कोई बात हमारे साथ नहीं होती कि वह चली गई है इसलिए ‘अब मौका मिला है, इसे निपटा लें’!

स्वाभाविक ही, पहले दिन रात को उसे रोता देखकर हम दुखी हुए थे लेकिन उससे अधिक हमें गर्व हो रहा था कि इतनी सी उम्र में वह हमारे बगैर बाहर चली गई और हालांकि शुरू में थोड़ा बिसूर रही थी लेकिन बाद में ठीक से सो गई और दूसरी रात तो हमें उतना मिस भी नहीं किया और बिना रोए सो गई। और अब वह आ गई है- रोमांचित, उत्साह से भरी और वहाँ की हर बात बताने के लिए बेताब!

इस यात्रा में उसने कितना कुछ सीखा! उसे दूरी की अवधारणा का बेहतर ज्ञान हुआ और वह यह समझने लगी कि कार में लंबे समय तक सफर करने पर पर शाम को मर्ज़ी होने पर आप माँ और पा के पास तुरत-फुरत नहीं पहुँच सकते। उसने सीखा कि कुछ पल आसपास चाचा न हो तो और किसी को पुकारकर मदद ली जा सकती है। उसने यह भी जाना कि बिना किसी को बताए कहीं भी नहीं चल देना चाहिए…और हर माता-पिता मानेंगे कि यह जीवन का बहुत बहुमूल्य पाठ उसने पढ़ा! इसके अलावा उसने हजारों छोटी-छोटी बातें सीखी होंगी, जिन्हें आप तब सिर्फ अनुभव करते हैं, जब घर पर नहीं होते।

मेरे विचार में जैसी स्वतन्त्रता मैं अपनी बेटी को देना चाहता हूँ, उस ओर उसका यह पहला कदम है। मैं चाहता हूँ कि वह जाने कि कुछ भी हो, हम हमेशा उसके साथ हैं, जब भी उसकी इच्छा हो, लौटकर अपने सुरक्षित स्वर्ग में आ सकती है। एक भरोसेमंद आसरा- लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह भरोसेमंद है, यह आसरा पाँव की बेड़ी नहीं बनेगा। उसे बाहर निकलकर दुनिया को करीब से देखने की आज़ादी मिलनी चाहिए। इस यात्रा के रोमांच को और उससे प्राप्त नए अनुभवों के रोमांच को उसे सदा बरकरार रखना रखना चाहिए। इस तरह, मेरा विश्वास है कि वह दुनिया के बारे में उससे कहीं अधिक जान सकेगी, जितना हम आश्रम में बैठकर उसे बता सकते हैं! निश्चित ही, हम भी उसके साथ यात्राओं पर जाएँगे, लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जब वह अपने चाचाओं के साथ ही नहीं, खुद अकेली घूमेगी-फिरेगी।

मैं जानता हूँ कि उस दिन मुझे गर्व का अनुभव होगा- और यह भी जानता हूँ कि मैं उसे बहुत मिस करूँगा!

जब परिवर्तन मित्रों के बीच नज़दीकियाँ कम कर देते हैं – 8 जून 2015

निश्चय ही प्रेम और मित्रता के बारे में, दिलों की गहरी नजदीकी के बारे में और भौतिक अंतरंगता के बारे में मैं पहले कई बार विस्तार से लिख चुका हूँ। और निश्चित रूप से, जब भी मैंने ऐसे विषयों पर लिखा है, हर बार इस बात का ज़िक्र अवश्य किया है कि भौतिक नजदीकी के मुक़ाबले दिलों की नजदीकी हर हाल में अधिक महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से हाल ही में मैंने एक बार फिर नोटिस किया कि यह तथ्य वास्तव में कितना महत्वपूर्ण है!

मेरा एक दोस्त है, जिसके साथ मैं हमेशा से बहुत घनिष्ठ रहा हूँ। हम एक-दूसरे को लंबे समय से जानते हैं और अपनी मित्रता के दौरान हम जीवन के विभिन्न चरणों से गुजरे हैं, कभी काफी नजदीक रहते हुए तो कभी लगातार बहुत समय तक एक-दूसरे से दूर रहते हुए।

जब हम एक साथ नहीं भी रहते थे और न सिर्फ मिलते नहीं थे बल्कि फोन पर भी महीनों हमारी बातचीत भी बंद रहती थी, तब भी हम आपस में करीबी महसूस करते थे। कभी कभी सालों गुज़र जाते और हम बारह-बारह महीनों में भूले-भटके ही मिल पाते थे! इस दौरान पूरे समय मुझे महसूस होता था कि जब भी हम मिलते हैं, हम आपस में काफी मजबूती के साथ, बहुत घनिष्ठता के साथ जुड़े हुए हैं।

लेकिन अब परिस्थिति कुछ बदल गई है। मुझमें और मेरे जीवन में बहुत सारे परिवर्तन आ गए हैं और मज़ेदार बात यह कि हम लोग अब परस्पर काफी नजदीक भी रहने लगे हैं, एक-दूसरे से माह में कम से कम दो बार अवश्य मिल लेते हैं लेकिन दुर्भाग्य से अब मैं उससे उतनी नजदीकी महसूस नहीं करता।

बहुत से परिवर्तनों का मैंने ज़िक्र किया और निश्चित ही उनमें से एक है मेरे विचारों में आए परिवर्तन। जो विषय मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, उन पर हमारे विचारों में बहुत अंतर है। इतना अधिक कि हम एक-दूसरे के साथ कभी सहमत नहीं हो पाते और इसलिए उन विषयों को चर्चा में ही नहीं लाते या कभी उस पर चर्चा होने लगी तो उसे बीच में ही छोड़ देते हैं। कुछ समय तक यह निभ गया।

लेकिन समय बीतने के साथ यह महसूस होने लगता है कि कैसे जीवन के प्रति आपका बुनियादी नज़रिया और विचार बातचीत के हर दूसरे विषय को प्रभावित करने लगता है। और अंत में, वह मुलाक़ात और आपसी बातचीत भी महज रस्म अदायगी और औपचारिक वार्तालाप में तब्दील हो जाती है।

एक ऐसी रस्म, जिसे मैं अपनी पुरानी मित्रता की खातिर जारी रखने की औपचारिकता निभाता रहूँगा।

मैं अपनी भावनाएँ खुलकर व्यक्त करने में विश्वास रखता हूँ और इसलिए अपने मित्र से मैंने कहा कि अब हमारे बीच उतनी नजदीकी नहीं रह गई है। उसके जवाब ने मेरी भावनाओं की सत्यता की पुष्टि कर दी: उसने कहा, नहीं, सब कुछ ठीक है।

इसका आशय यह था कि उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे बीच अब उतनी नजदीकी नहीं रह गई है- या इससे भी कि मैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ। यह अपने आप में सिद्ध करता है कि वास्तव में अब हमारे बीच कोई घनिष्ठता नहीं रह गई है। और इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता-लेकिन यह एहसास भी समय के साथ समाप्त हो जाएगा!

जब मैं अपनी भावनाओं की कदर नहीं करता तो अपनी ऊर्जा गँवा रहा होता हूँ – 7 जून 2015

काफी समय पहले से मेरा एक सिद्धान्त रहा है, जिसे मैं बार-बार आजमा भी चुका हूँ और वह हर बार सही भी प्रमाणित हुआ है: दूसरे लोगों के बारे में अपनी भावनाओं पर विश्वास कीजिए। अगर आप महसूस करते हैं कि आप दोनों के बीच पट नहीं पाएगी-किसी भी संबंध में यह लागू होता है-तो संबंध तोड़ दीजिए। अगर आप इंतज़ार करते हैं, कोशिश करते रहते हैं कि किसी तरह निभ जाए तो आप सिर्फ अपना समय और अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहे होते हैं और आपको अंततः उसे समाप्त करना ही पड़ता है!

मेरे कहने का अर्थ क्या है, बताता हूँ। अपने जीवन में मैं कई बार ऐसे लोगों से मिला हूँ, जिनके साथ कुछ ही समय बाद मैंने महसूस किया कि हमारी पटरी आपस में नहीं बैठ पा रही है। उनकी बातों से, उनके कामों से, उनके चेहरे के हाव-भाव से या महज उनके व्यक्तित्व से प्रस्फुटित होती ऊर्जा से इस तरह की भावना या एहसास आपको होने लगता है। इन बातों का कुछ ऐसा असर आप पर पड़ता है कि आपको एहसास हो जाता है कि आप इस व्यक्ति के मित्र नहीं बन सकेंगे।

कभी-कभी यह भावना इतनी तीव्र होती है कि कि आप सतर्क रहते हैं कि उनसे किसी तरह का वाद-विवाद न हो। आपकी राय उनसे बहुत अलग होती हैं।

लेकिन इतनी सी बात पर उनसे विचारों का आदान-प्रदान समाप्त करने का आपको कोई कारण नज़र नहीं आता और वास्तव में आप उनके मित्र बने रहना चाहते हैं, उनके साथ सामान्य मधुर संबंध बनाए रखना चाहते हैं, उनके साथ समय गुज़ारना चाहते हैं। इस प्रकार उनके साथ आप किसी न किसी तरह निभाना चाहते हैं। आप उनकी उन टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ करते हैं, जिन पर सामान्य रूप से आपको एतराज़ होता।

लेकिन कुछ समय पश्चात्-और यह समय कुछ हफ़्तों से लेकर महीनों का हो सकता है-आप ऐसे बिंदु तक पहुँच जाते हैं, जिसके आगे आप उस संबंध को निभा नहीं सकते। एक ऐसा बिंदु, जिसके बाद, अगर आप अपने प्रति सच्चे, ईमानदार बने रहना चाहते हैं, अपनी अस्मिता बनाए रखना चाहते हैं तो उनके साथ दूरी बनाना लाज़िमी हो जाता है।

इसी बिन्दु पर आकर संबंधों में दरार पड़ जाती है और फिर वे टूट जाते हैं। और उसके बाद आप बहुत हल्का, बहुत अच्छा महसूस करते हैं। बहुत दिनों तक आपने उस संबंध को बनाए रखा लेकिन उसके लिए आपको बहुत प्रयास करना पड़ा, बहुत सारी ऊर्जा और समय खर्च करना पड़ा! आखिर जब वह समाप्त हो गया, जब आपको अंतिम रूप से पता चल गया कि यह संबंध इसी तरह आगे नहीं चल पाएगा तो आप बहुत मुक्त महसूस करने लगे। मुक्त इसलिए कि आगे अब यह प्रयास आपको नहीं करना पड़ेगा!

हो सकता है कि आपको इस बात का अफसोस हो कि क्यों इस संबंध को बनाए रखने के लिए आपने इतने लम्बे समय तक इतना गम्भीर प्रयास किया। परेशान न हों-जो कुछ हुआ, अच्छा हुआ! आप सामने वाले को ठीक तरह से जानना चाहते थे और अब आप पूरी तरह आश्वस्त हैं कि आप दोनों एक-दूसरे के अनुरूप नहीं थे। अगली बार आप अपनी भावनाओं को कुछ जल्दी सुन पाएँगे और तदनुसार त्वरित कार्यवाही करेंगे!

कामुकता – एक आनंदित करने वाली नैसर्गिक अनुभूति – उसे बीमारी समझने वाले स्वयं बीमार हैं – 1 जून 2015

कुछ समय पहले मेरे एक परिचित ने अश्लील फिल्मों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी नज़र में ये फिल्में लोगों के मन में काम-वासना या कामोत्तेजना पैदा करती हैं और उसी का परिणाम है कि भारत में बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती चली जा रही हैं। संक्षेप में, वे सोचते हैं कि जितना ज़्यादा अश्लील फिल्में लोग देखेंगे, उतनी ही अधिक संख्या में महिलाओं पर बलात्कार होगा।

इससे पहले कि मैं और विस्तार में जाऊँ, मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ: कामुकता या कामोत्तेजना बुरी चीज़ कतई नहीं है। यह इंद्रियों में होने वाली एक नैसर्गिक संवेदना, अनुराग और एहसास है और वह सभी में पाई जाती है। पुरुष और स्त्रियाँ, शारीरिक रूप से सक्षम या अक्षम, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, यह हर एक व्यक्ति में मौजूद होती है। काम-वासना सब में है-सच यह है कि अगर आपमें नहीं है तो आपके शरीर में कोई न कोई विकृति है! हर एक में अलग-अलग परिमाण में काम-वासना पाई जाती है, जो उनके शरीर में मौजूद हार्मोन्स और निश्चित ही, मानसिक अवस्थाओं से उपजी भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर होती है।

सामान्य परिस्थितियों में भी वह आसानी से उत्पन्न हो जाती है। वास्तव में, एक मामूली विचार भी काम-वासना पैदा करने के लिए पर्याप्त है। इसके लिए फिल्म या किसी कामोत्तेजक फोटो या तस्वीर की ज़रूरत नहीं है! इसके अलावा, सामान्य बॉलीवुड या हॉलीवुड मूवी भी आपमें कामोत्तेजना या काम-वासना पैदा कर सकती है-या अपने कार्यालय में अपनी कुर्सी पर बैठे, कोई बिल्कुल अलग काम करते हुए भी महज एक विचार आपमें कामोत्तेजना पैदा कर सकता है! इसके विपरीत, अगर किसी व्यक्ति में कोई शारीरिक या मानसिक गड़बड़ी है और वह कामोत्तेजना महसूस नहीं कर पाता तो घंटो अश्लील फिल्में देखता रहे, उसे कभी, कोई कामोत्तेजना नहीं होगी!

न सिर्फ कामवासना नैसर्गिक है, वह वास्तव में बहुत खूबसूरत चीज़ भी है! काम-वासना की भावना से और खासकर जब आप उसे संतुष्ट कर देते हैं तो आप भीतर तक स्वतः ही खुशी और आनंद में डूबने-उतराने लगते हैं, परितुष्ट महसूस करते हैं, प्रेम की गहरी अनुभूति में सराबोर हो उठते हैं। काम-वासना आपको असीम प्रसन्नता और मुक्ति प्रदान करती है और मेरी नज़र में, वह बलात्कार जैसे घृणित अपराध का कारण हो ही नहीं सकती! इस उत्कट आनंद के साथ बलात्कार की कोई संगति नहीं बैठती। लेकिन इसके बारे में और अधिक विस्तार से कल लिखूँगा।

काम-वासना हमेशा से इस संसार का हिस्सा रही है। यह सर्वव्यापी है-साहित्य से लेकर कलाओं तक, घरों में मौजूद मूर्तियों से लेकर पूजास्थलों में उकेरी गई चित्रकारी तक। तकनीक के विकास के साथ इनकी प्रतिकृतियाँ सर्वसुलभ हो गई हैं, माउस के एक क्लिक के साथ आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर तुरंत हाजिर! लेकिन दुर्भाग्य से कामवासना या कामोत्तेजना के बारे में वही पुरानी समझ अब भी बरकरार है, उसमें रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं हुआ है।

आज भी बहुत से लोग काम-वासना को बुरी चीज़ समझते हैं। जितना अधिक वे कट्टर होते जाते हैं, काम-वासना, सेक्स और उसके आसपास मौजूद हर चीज़ को वे उतना ही अधिक बुरा समझते जाते हैं। कामुक होना बीमार मस्तिष्क होने का प्रमाण माना जाता है। एक स्वस्थ मस्तिष्क में ऐसे कामोत्तेजक विचार नहीं आ सकते और पाक-साफ़ शरीर में ऐसे एहसासात, ऐसी इच्छाएँ और वासनाएँ पैदा भी नहीं होनी चाहिए। अगर आप सेक्स का आनंद लेते हैं या उसके बारे में सोचते भी हैं तो अपने आपको अपराधी महसूस करना चाहिए। शारीरिक वासनाओं की अनुभूति का दमन किया जाना चाहिए। अतिधार्मिक लोग ब्रह्मचर्य की इसी धारणा पर विश्वास करते हैं। सन्यास के ज़रिए वे पवित्रता प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

मैं समझता हूँ कि यही वास्तव में रुग्ण सोच है। धर्म ने लोगों के मन में यह बात बिठा दी है कि कामुकता बुरी चीज़ है। यह पूर्वाग्रह ही लोगों को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार बनाता है! ब्रह्मचर्य पूरी तरह अप्राकृतिक विचार है। संभोग का दमन करके शुद्धि प्राप्त करने का दावा करना पूरी तरह अवैज्ञानिक है लेकिन धर्म इसकी परवाह नहीं करता!

यौनेच्छाओं का यही दमन पुरुषों और महिलाओं को उसकी खोज की ओर, उसकी अधिकाधिक जाँच-परख की ओर उद्यत करता है, भले ही यह वे ढँके-छुपे तरीके से करते हों। और उसके बाद वह कई रुग्ण तरीकों से फूट पड़ता है-यौन अपराध की शक्ल में, जिन्हें होता हुआ हम रोज़ देखते हैं, क्योंकि अपनी नैसर्गिक उत्तेजनाओं को बाहर निकालने का कोई रास्ता उनके पास नहीं होता!

कामुकता: सैकड़ों सालों से उसकी शोहरत एक मनोविकार के रूप, एक गर्हित अनुभूति के रूप में रही है और मेरे विचार में, इस धारणा को बदलने का वक़्त आ गया है!

प्रेम आपके जींस से ज्यादा महत्वपूर्ण है – 23 फरवरी 2014

पिछले सप्ताह मैंने एक माँ के बारे में आपको बताया था, जो अपनी 18 वर्षीय बेटी को लेकर मेरे व्यक्तिगत सत्र में आई थी। उसने अपनी बेटी के 18वें जन्मदिन पर उसे बताया कि जिस व्यक्ति ने उसका लालन पालन किया था और जिसे वह अपना पिता मानती है वह दरअसल उसका जैविक पिता नहीं है। लड़की का जैविक पिता एक और व्यक्ति था, जिसके साथ अतीत में उस महिला का कुछ दिनों का विवाहेतर संबंध रहा था मगर अब उसके बारे में वह कुछ भी नहीं जानती थी। अब यह ज़िम्मेदारी मुझ पर आ पड़ी थी कि उस लड़की से बात करूँ जो, स्वाभाविक ही, मानसिक रूप से बुरी तरह हिल गई थी।

माँ व्यथित थी और अपराधबोध से ग्रसित नज़र आ रही थी क्योंकि उसने अपनी बेटी को इस मानसिक हड़कंप में डाल दिया था। उसने विस्तार के साथ मुझे बताया कि क्यों उसने इतने लंबे अंतराल के बाद अपनी बेटी पर यह रहस्य उजागर किया। दरअसल बेटी को इतने साल झूठ और धोखे में रखना उसे अनैतिक लग रहा था और यह अपराधबोध उसे भीतर से खा रहा था। इस झूठ को उसने अपने दिल में छिपाकर रखा था और उसे लगता था कि उसके बढ़ते बोझ से एक दिन वह फट पड़ेगा।

और मैं सोच रहा था कि इतने लंबे अंतराल के बाद इस सत्य को उजागर करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। लड़की अब बालिग हो चुकी थी और इस भयावह सच से दूर, जिस स्थिति में थी, उसी में खुश थी। यह सत्य उसे कोई लाभ नहीं पहुँचाने वाला था। उसकी चिंता करने कोई और व्यक्ति नहीं आने वाला था क्योंकि उस व्यक्ति का कोई संपर्क-सूत्र उनके पास नहीं था। इसके विपरीत इस रहस्योद्घाटन से उसने उस पिता को भी खो दिया था, जिसे वह पिता मानती आई थी और जो हमेशा-हमेशा के लिए उसका पिता रहा आता! लेकिन अब ये विचार व्यर्थ थे क्योंकि उसने पहले मुझसे कोई सलाह नहीं ली थी। तब मैंने लड़की से बात की।

लड़की के दिमाग में वह पुरुष, जिसके जींस वह लिए हुए थी, पूरी तरह मौजूद था। मैं उससे किस तरह मिल सकती हूँ? अगर मैं उसकी खोज करूँ और पा जाऊँ तो वह मेरे साथ कैसा व्यवहार करेगा? और मेरे माँ के पूर्व-पति का क्या, जिसे मैं अपना पिता मानती हूँ? समझ में नहीं आता क्या सोचूँ, क्या करूँ। मैं सिर्फ बैठकर रो सकती हूँ क्योंकि मेरा सारा जीवन ही झूठ का पुलिंदा बन गया है! मैं आज तक एक झूठी ज़िंदगी जी रही थी! मुझे महसूस होता है जैसे मेरे शरीर का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा मुझसे टूटकर अलग हो गया है!

मैंने उससे कहा कि वह अब एक वयस्क है और चीजों को देखने-समझने का उसके पास एक परिपक्व नज़रिया होना चाहिए। एक मजबूत महिला की तरह उसे अपने भीतर इस झटके को, जो महज एक जानकारी है, झेलने की हिम्मत पैदा करनी चाहिए और उसे देखना चाहिए, जो पीछे छूट रहा है: तब वह पाएगी कि वास्तव में कुछ भी नहीं बदला है।

मेरी नज़र में यह बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं था कि कौन उसका जैविक पिता है। आप उसका नाम नहीं जानते, उसके बारे में अब तक कभी सोचा भी नहीं और उसके बगैर आपने किसी बात की कमी भी महसूस नहीं की-अब उसकी कमी क्यों महसूस हो? अब वह अचानक इतना महत्वपूर्ण क्यों हो जाए कि उसके विचार मात्र से आप अपनी ज़िंदगी तहस नहस कर बैठें?

अगर आप मजबूत नहीं हैं तो यह बात आपको भ्रमित करती रहेगी। इसके विपरीत अगर आप उसे सही परिप्रेक्ष्य में देखने की हिम्मत जुटा लें तो पाएंगे कि आप अब भी उसी ठोस ज़मीन पर खड़े हुए हैं, दुनिया में आपकी जगह ज़रा भी नहीं बदली है। जिस पुरुष ने आपका लालन-पालन किया और जो आपसे प्रेम करता है और जिससे आप भी बहुत प्रेम करती हैं वही हमेशा आपका पिता था और हमेशा-हमेशा के लिए आपका पिता बना रहेगा! आपका जींस उस प्रेम के सामने कोई मानी नहीं रखता, जो उस व्यक्ति से आपको अब तक प्राप्त होता रहा है और आगे भी जीवन भर प्राप्त होता रहेगा!

आप जैसी भी हैं, एक परिपूर्ण व्यक्ति हैं और सबसे पहले आपको अपने जीवन में स्थिरता प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। बाद में अगर आपका दिल चाहे तो उस व्यक्ति की खोज भी कर सकती हैं मगर इस खोज से कोई बड़ी आशा न रखें। यह खोज तभी शुरू करें जब आपको लगे कि उस खोज के परिणाम आपकी मौजूदा ज़िंदगी पर कोई असर नहीं डाल पाएंगे।

वही बने रहें जो आप अब तक थीं। प्रेम आपके जींस से ज़्यादा महत्वपूर्ण है!

अपने अरेंज्ड मैरेज के विषय में वर और वधु कैसा अनुभव करते हैं? 2 दिसंबर 2013

पूरे पिछले हफ्ते मैं भारतीय विवाहों के विषय में लिखता रहा हूँ। संदर्भ था: भारतीय विवाहों में आमंत्रित किए जाने पर पश्चिमी लोगों द्वारा अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और अपने सम्मोहक और भड़कीले विवाह में वर और वधू की भूमिका! लेकिन अभी भी एक प्रश्न बचा रह गया है, जो पश्चिमी लोग यह पता चलने पर पूछते हैं कि विवाह अरेंज्ड था:

9) नव विवाहित दंपति इस विषय में क्या सोचते हैं? वे ऐसे अरेंज्ड विवाह से खुश होते हैं या दुखी?

स्वाभाविक ही यह प्रश्न जायज है क्योंकि उनके चेहरे देखकर आप समझ नहीं सकते कि वे सचमुच खुश हैं या संध्या-समारोह में सकुचाते, मुसकुराते हुए सिर्फ अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं! उनसे अपेक्षा है कि वे राजकुमार और राजकुमारी जैसे नज़र आएँ। दूल्हा गंभीर और गौरवान्वित दिखाई दे और दुल्हन शर्मीली और अपने परिवार से बिदा होने के दुख में, स्वाभाविक ही, थोड़ी गमगीन। लेकिन सवाल यह है कि उनकी वास्तविक भावनाएँ क्या हैं, इस विवाह से वे कैसा महसूस कर रहे हैं?

निश्चय ही इस पर कोई सामान्य टिप्पणी करना मुश्किल है कि कोई व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा है क्योंकि इस विवाह के पीछे हजारों कहानियाँ हो सकती हैं। ऐसे अरेंज्ड विवाहों से अनजान और अनभ्यस्त विदेशियों की यह आम प्रवृत्ति होती है कि वे दंपति को इस विवाह से असंतुष्ट और दुखी समझ बैठते हैं। यह आवश्यक नहीं है और अधिकतर ऐसा नहीं होता कि वर और वधू दुखी ही हों।

एक पारंपरिक परिवार में एक युवा व्यक्ति पहले से जानता है कि उसका विवाह अरेंज्ड ही होना है। इस नियति को न सिर्फ वे खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं बल्कि बचपन से उसका इंतज़ार भी कर रहे होते हैं! वे फिल्मों में नायक और नायिका को आपस में मिलते हुए और लंबे प्रेम-प्रसंग के पश्चात आपस में विवाह करते हुए देखते हैं मगर उन्हें अपना खुद का जीवन बहुत अलग जान पड़ता है: अभिभावक अपनी लड़कियों को हमउम्र लड़कों से दूर रखते हैं, विवाह से पहले दूसरे लड़कों के साथ घूमना-फिरना सामाजिक रूप से अस्वीकार्य होता है और अगर कोई लड़की किसी लड़के से मिलते-जुलते पाई जाती है और उसके साथ हँसते-खिलखिलाते (प्रसन्न) दिखाई देती है तो यह अभिभावकों के लिए शर्म की बात मानी जाती हैं।

व्यक्तिगत संबंध इस समाज में सामान्य नहीं हैं, कम से कम भारतीयों के विशाल बहुमत के लिए। इसलिए प्रेम-विवाह आज भी दुर्लभ ही हैं और जब कि 'लव कम अरेंज्ड मैरेज' की संख्या बढ़ रही है, अभी भी अधिकांश लड़के और लड़कियों में यह हिम्मत नहीं होती कि सामाजिक रूप से स्वीकृत सीमा को लांघ सकें, अपने विवाह के लिए अपनी पसंद के किसी व्यक्ति का नाम सुझा सकें। किसी दूसरे लड़के या लड़की में अपनी रुचि ज़ाहिर करके वे अपने अभिभावकों को नाराज़ नहीं करना चाहते, उन समस्याओं से जूझने का खतरा नहीं उठा सकते, जो उनके ऐसा करने पर पेश आ सकती हैं। शायद वे ऐसे परिवेश में ही नहीं रहते, जो इसकी इजाज़त देता है। हो सकता है कि वे घूमने-फिरने वाले बहिर्मुखी व्यक्ति न हों, जो ऐसे किसी व्यक्ति को अपने लिए खोज सकें।

सारांश यह कि ऐसे कुछ लोग हो सकते हैं, जो अपने अभिभावकों द्वारा चुने गए जीवन साथी से खुश न हों, कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो न तो खुश हों और न दुखी, जो अपने विवाह के नतीजे से पूरी तरह अनजान, दिग्भ्रमित से हों और कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं, जो किसी और से विवाह करना चाहते थे मगर अपनी नियति से अब समझौता कर चुके हों। इसके बावजूद यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि अधिकांश युवा अपने विवाह से खुश होते हैं और विवाह के दिन पूरे समारोह का पूरा आनंद उठाते हैं!

अनजानी दुनिया में प्रवेश की उत्तेजना, प्रसन्नता, गर्व और कुछ घबराहट भी-मैं समझता हूँ, अपने विवाह के दिन यही भावनाएँ आम तौर पर भारतीय नव-दम्पतियों में पाई जाती हैं।

जबरदस्ती अपने आपको झूठी ख़ुशी के हवाले न करें- 17 अक्तूबर 2013

हमारी प्रिय मित्र सिल्विया ने पिछले किसी दिन के ब्लॉग पर टिप्पणी करते हुए एक और विचार का ज़िक्र किया है, जो अपने आपको आध्यात्मिक मानने वाले लोगों में व्यापक रूप से प्रचलित है। इस पर पूरी तरह अमल करने पर यह भी, पिछले ब्लॉगों में चर्चित विचारों की तरह ही आपके लिए सरदर्द पैदा करने वाला सिद्ध होगा। काफी सोच-विचार के बाद और कुछ सीमा तक ही इस विचार को जीवन में उतारा जा सकता है: "आप स्वयं अपने आपको प्रसन्न कर सकते हैं!"

सिल्विया ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि इस कथन में कुछ औचित्य तो है मगर वह नहीं समझती कि उसे हर विपरीत परिस्थिति का इलाज मानते हुए हर कहीं लागू किया जा सकता है। इस विश्वास के चलते कि "आपको स्वयं अपनी खुशी प्राप्त करनी है" आप बहुत सी परेशानियों को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। मैं उसकी बात से सहमत हूँ और इस पर कुछ विस्तार से कहना चाहता हूँ।

इस सलाह के पीछे का विचार गलत नहीं है। आपका मूड कैसा हो इस बारे में आप सोच-समझकर स्वयं ही निर्णय लेते हैं। आप स्वयं ही यह निर्णय लेते हैं कि आप चीजों और परिस्थितियों को किस तरह ग्रहण करना चाहते हैं। आप स्वयं यह निर्णय ले सकते हैं कि आप किसी व्यक्ति के साथ, उसके प्रति दिल में पूर्वाग्रह रखते हुए मिलना चाहते हैं या खुले दिल से। आप खुद यह निर्णय लेते हैं कि मौसम आपका मूड खराब कर दे। यह आप पर निर्भर है कि आपकी सास की कोई टिप्पणी आपको परेशान और क्रोधित कर दे या न करे।

फिर भी मुझे यह बात माननी पड़ेगी कि इस नियम की कुछ सीमाएं भी है। उसका अर्थ यह नहीं है कि कितनी भी बुरी परिस्थिति में आप फंसे हों, अपनी मनःस्थिति को बदलकर खुश हो जाएँ! इसके विपरीत, इस तरह का सोच और रवैया आपके लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हो सकता है!

इसका अर्थ तो यह होगा कि मान लीजिए अपने साथी के साथ आपके सम्बन्ध ठीक नहीं है और वह आपको लगातार गालियाँ बकता रहता है और आपको बुरा लगता है कि उसे आपकी भावनाओं की कद्र नहीं है और इसके बावजूद आप इस परिस्थिति को बदलने का प्रयत्न नहीं करते बल्कि सोचकर बैठे रहते हैं कि इस परिस्थिति के लिए आप ही जिम्मेदार हैं। समझ बैठे हैं कि इसमें आपकी ही कुछ गलती रही होगी। आपको आत्मग्लानि हो रही है क्योंकि आपको बुरा लग रहा है और परिस्थिति से आप खुश नहीं हैं। आपको लग रहा है कि आपको अपनी आध्यात्मिकता का स्तर ऊंचा उठाना होगा, कि आपको पर्याप्त आत्मज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता है, जिससे समझ सकें कि ये विपरीत परिस्थितियाँ आपको और ऊंचा उठाती हैं। अगर आप इस हालत में भी खुश रह लेते हैं तो आपको लगेगा कि आप आध्यात्मिकता की एक सीढ़ी ऊपर उठ गए।

नहीं, नहीं, नहीं। इस वाक्य का यह अर्थ कदापि नहीं है! मैं अब भी उसे गलत नहीं कहूँगा बल्कि आप ही उसे ठीक तरह से समझ नहीं पाए कि अपने आपको खुश करने के लिए आपको क्या करना चाहिए! आपको इस परिस्थिति से अपने आपको निकालना होगा! इस बात को स्वीकार कीजिए कि जिसे आप चाहते हैं, जब वह आपका अपमान करता है तो आपको दुख होता है। यह बिल्कुल स्वाभाविक बात है कि आप ऐसा महसूस करते हैं! इसे स्वीकार करें कि आपको गुस्सा आता है, जब किसी काम पर आप हफ्तों मेहनत करते हैं और उसका सारा श्रेय आपका सहकर्मी उड़ा ले जाता है! स्वीकार करें कि आपकी भी कुछ आवश्यकताएँ हैं और जब वे पूरी नहीं होती तो आप दुखी होते हैं।

ये सभी भावनाएँ पूरी तरह उचित हैं। वे होती ही हैं और आवश्यक नहीं कि वे ‘नकारात्मक’ ही होती हों। वे इशारा करती हैं कि आप परिवर्तन चाहते हैं लेकिन उस परिवर्तन का अर्थ यह भी हो सकता है कि आप गाली-गलौज करने वाले लोगों से किनारा कर लें, अपना पक्ष किसी के सामने दृढ़ता के साथ रखें और कुछ समय अपने लिए भी बचाकर रखें, इत्यादि। जब तक आपको भीतर से खुशी न महसूस हो, नकली खुशी को जबर्दस्ती न ओढ़ लें। वह बिन्दु तलाश करें जहां आप खुश होते हैं-और उसके साथ आने वाली दूसरी भावनाओं का भी स्वागत करें!