अपने दिमाग के दरवाजे दूसरों के लिए खुले छोड़ देने के खतरे – 18 मार्च 2015

यथार्थ से कोसों दूर, काल्पनिक दुनिया के निर्माण के चलते पेश आने वाले मानसिक और शारीरिक खतरों के विषय में कल मैंने लिखा था। इसके एक और खतरे की चर्चा मैंने अब तक नहीं की थी, जिसके बारे में कुछ और विस्तार से लिखने की आवश्यकता है: किसी को जब आप अपनी कल्पनाओं, आस्थाओं और इस तरह प्रकारांतर से आपकी दुनिया को भी प्रभावित करने की छूट दे देते हैं-और फिर वह उसका अनुचित लाभ उठाने लगता है!

अगर आपने परसों की यानी दिनांक 16 मार्च की मेरी टिप्पणी को ध्यान से पढ़ा होगा, जिसमें मैंने बताया था कि कैसे आप अपनी काल्पनिक निजी दुनिया निर्मित कर लेते हैं, तो आप समझ सकेंगे कि इससे मेरा क्या अभिप्राय है। साधारणतया हम अपने विचारों और कल्पनाओं के अनुसार व्यवहार करते हैं और जब हम कुछ आस्थाओं पर विश्वास करने का मन बना लेते हैं तो वे आपका यथार्थ बन जाती हैं। अब इस बात की कल्पना कीजिए कि कोई आपके विचारों को अपने पक्ष में प्रभावित कर रहा है! वह आपके उस यथार्थ को, आपकी उस दुनिया को भी प्रभावित और परिवर्तित कर रहा होगा जिसे आप अपने लिए निर्मित कर रहे हैं!

इस तरह आपको प्रभावित करने वाले बहुत से अलग-अलग व्यक्ति हो सकते हैं। इसकी शुरुआत अभिभावकों के साथ होती है और इसी कारण उनकी ज़िम्मेदारी भी बहुत बढ़ जाती है: सबसे कोमल और आसानी से प्रभावित हो सकने वाले दिमागों तक उनकी पहुँच होती है और उन्हें गढ़ने और जीवन के लिए तैयार करने की ज़िम्मेदारी उन पर आयद होती है। वे एक संसार का निर्माण करते हैं। आपका परिवार, फिर शिक्षक, दोस्त और उसके बाद बहुत से दूसरे लोग, जिन पर आप भरोसा करते हैं या जिन्हें आप विशेषज्ञ या अधिकारी समझते हैं, जिनके विचारों को आप पसंद करते हैं। इनमें विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक और यहाँ तक कि राजनैतिक नेता भी शामिल होते हैं।

एक जिम्मेदार व्यक्ति उन लोगों का खयाल रखता है, जिन्हें वह प्रभावित कर सकता है। स्वाभाविक ही, इस शक्ति का दुरुपयोग भी किया जा सकता है-और शायद आप उन हजारों प्रकरणों के बारे में जानते होंगे जहाँ गुरुओं, धार्मिक नेताओं और विभिन्न संप्रदायों के मुखियाओं ने ठीक यही किया: वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए नहीं बल्कि उन्हें अपनी आज्ञा का शब्दशः पालन करने, उन्हें अपने कहे अनुसार करने हेतु बाध्य करने में किया। उन पर प्रभुत्व स्थापित करके और छल-प्रपंच से इस तरह उनका इस्तेमाल किया कि सिवा उस नेता के किसी और का उससे कोई लाभ नहीं हो सकता था। उनका जबर्दस्ती मत परिवर्तन किया गया, उन्हें असंगत विचारों और कल्पनाओं की घुट्टी पिलाई गई, उनके साथ छल करके उन्हें एक दूसरी दुनिया में ले जाकर स्थापित कर दिया गया जो किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा निर्मित, नियंत्रित और संचालित थी।

नतीजा: जितनी बड़ी संख्या में लोग उनके प्रभाव में आते जाते हैं, उतना ही ये गुरु, संप्रदाय और संगठन अमीर होते जाते हैं। ये अनुयायी, अंधी भेड़ों की तरह उसी दुनिया में रहने लगते हैं, उनके आदेशों का पालन करते हैं और यहाँ तक कि खुद अपने सालों के संबंधों को तोड़ लेते हैं, मित्रता छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि परिवार का परित्याग कर देते हैं। बहुत से लोग सालों उन धूर्तों के जाल में फँसे रहते हैं। कभी-कभी जीवन भर के लिए।

कुछ लोगों को एक सीमा के बाद अचानक शक होने लगता है। जैसे-जैसे शक बढ़ता जाता है, वे खुद अपने दिमाग से सोचने की ओर अग्रसर होते हैं। यह उन्हें बहुत कठिन और खतरनाक लगता है, एक तरह से वे एक लंबे अर्से बाद खुद अपने पैरों पर खड़े हो रहे होते हैं, धीरे-धीरे खुद चलना सीख रहे होते हैं! निश्चित ही यह परिवर्तन उनकी उस दुनिया को तहस-नहस कर देता है, जिसे उन्होंने खुद गढ़ा होता है और इतने सालों में जिसके वे आदी हो चुके होते हैं। जिस गुरु का वे इतना सम्मान करते थे, जिससे इतना प्यार करते थे, वह अचानक उनका दुश्मन हो जाता है और उसके साथ उनके वे सारे मित्र भी, जो उस गुरु के कारण इतने सालों से उनके मित्र बने हुए थे।

तो, अगर कोई व्यक्ति आपकी रचना-प्रक्रिया को समझ ले या उसमें प्रवेश पा ले तो वह आपके मस्तिष्क को नियंत्रित भी कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब आप उसे प्रवेश करने दें! इसलिए अगर किसी को अपने इतना नजदीक आने दे रहे हैं तो बहुत सतर्क रहें-और जब आपको लगे कि वह आपके द्वारा प्रदत्त इस सुविधा का गलत लाभ उठा रहा है या उसका इस्तेमाल ज़िम्मेदारी के साथ नहीं कर रहा है तो उसका प्रवेश वर्जित कर दें!

सतर्क रहें और अपना ध्यान रखें!

क्या आसाराम की यह ‘छोटी सी’ गलती क्षमायोग्य है? क्या उसे भुलाया जा सकता है?-5 सितम्बर 2013

एक लड़की के साथ आसाराम द्वारा कथित रूप से किए गए यौन दुराचार और उसके बाद उसकी गिरफ्तारी के बारे में सिर्फ मीडिया में ही हलचल नहीं है। मैं पिछले तीन दिन से इस बारे में लिखता ही रहा हूँ और उनके नजदीकी व्यक्तियों और कई दूसरे लोगों की प्रतिक्रियाएँ भी प्राप्त हो रही हैं। कुछ प्रतिक्रियाएँ ऐसी भी आई हैं जिन्हें देखकर मुझे शक होता है कि कहीं इनकी दिमागी हालत खराब तो नहीं है!

उदाहरण के लिए ट्विटर पर दी गई प्रसिद्ध गुरु श्रीश्री रविशंकर की प्रतिक्रिया पर गौर करें। उन्होंने कहा: "अगर आप एक जाने-माने व्यक्ति हैं और आपसे कोई गलती हो गई है तो सार्वजनिक रूप से उसे स्वीकार करें। लोगों के दिल इतने बड़े हैं कि आप सोच भी नहीं सकते। वे आपको माफ कर देंगे और सब कुछ भूल जाएंगे।" रुकिए, क्या कहा? मुझे थोडा स्पष्ट करने दीजिए: अगर आप आसाराम हैं और आपने किसी 16 साल की लड़की को, जिसे उसके अभिभावकों ने आपकी देख-रेख में रखा है, यौन रूप से प्रताड़ित किया है तो आपको इतना ही करना है कि किसी स्टेज पर खड़े होकर, माइक्रोफोन पर या वीडियो कैमेरे के सामने कहें, "माफ करें, मुझसे गलती हुई!" और बस, जनता आपको माफ कर देगी और आपकी करतूतों को भूल जाएगी। जी हाँ, और कानून भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा!

यही मतलब है न आपका, श्रीश्री? क्या आप वास्तविकता से कोसों दूर निकल गए हैं या आप वाकई समझते हैं कि ऐसे जघन्य अपराधों को माफ कर दिया जाना चाहिए, उन्हें भूल जाना चाहिए, खासकर उनके अपराधों को, जो प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं? क्या यह कोई नया अधिकार है जो सिर्फ धार्मिक, अमीर और यशस्वी गुरुओं को प्रदान किया गया है या यह सड़कछाप, सामान्य अपराधियों को भी उपलब्ध है?

इससे बेहतर रवैया तो आसाराम के पुत्र का रहा जो अपने पिता की तरह ही इस गुरु-उद्यम का एक हिस्सा है। वह दो दिन पहले दिल्ली आया और आसाराम की गिरफ्तारी के विरुद्ध आंदोलन कर रहे अपने समर्थकों और अपने पिता के भक्तों की भीड़ के सामने एक छोटा सा प्रवचन दे डाला। उसने अपने पिता द्वारा किए गए तथाकथित ‘अच्छे’ कामों का बखान करते हुए कहा कि उसके पिता "उतने बुरे नहीं हैं जितना मीडिया उन्हें चित्रित कर रहा है।" उसके कहने का अर्थ यह था कि "यदि कोई व्यक्ति सौ अच्छे काम कर ले तो उसके द्वारा की गई कुछ गलतियों पर गौर करते समय उन अच्छे कार्यों को भी देखा जाना चाहिए!"

स्पष्ट है कि पुत्र स्वीकार कर रहा है कि उसके पिता से कुछ ‘छोटी मोटी’ गलतियाँ हुई हैं। ठीक ही है, बलात्कार तो उसने नहीं किया। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार आसाराम लड़की के साथ यौन संबंध बनाने में असमर्थ रहा लेकिन वह उसके सामने नंगा खड़ा हो गया और लड़की के वस्त्र भी उतारने की कोशिश की। इसके अलावा उसने लड़की के जिस्म को बुरी नीयत से छुआ, उसके अंगों को सहलाया, उसे मुख-मैथुन करने के लिए कहा और उसके मना करने पर धमकाया कि अगर उसने अपने परिवार वालों से इस मुलाक़ात के बारे में कुछ भी बताया तो उसकी और उसके परिवार वालों की हत्या कर दी जाएगी।… छोटी-मोटी गलती, और क्या!

पता नहीं क्यों, मेरा मन आसाराम के पुत्र की इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होता कि उसके द्वारा जीवन में किए गए ‘अच्छे’ काम उसकी इस गलती पर बहुत भारी पड़ते हैं! खासकर जब आप इस बात का भी विचार करते हैं कि इस लड़की के अलावा और भी बहुत सी युवतियाँ और किशोरियाँ हो सकती हैं जिन्हें आसाराम और उसके सहायकों ने आसाराम के साथ ‘व्यक्तिगत मुलाकातों’ के लिए चुना होगा! नारायण साई की तरफ से, जो आरोपी का पुत्र है, ऐसा वक्तव्य आने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि, ऐसा कहा जाता है कि, वह खुद भी अपने आपको कृष्ण और अपनी शिष्याओं को गोपियाँ-कृष्ण की सखियाँ, बताता है! पता नहीं कितनी बच्चियों और औरतों का इन दो आदमियों की असली तस्वीर के साथ साबका पड़ा होगा, जो बेचारी, डर के मारे कुछ नहीं बोल नहीं पाई होंगी और मजबूरी में ऐसी घिनौनी हरकतें करते हुए शर्मसार हुई होंगी?

मैं इस 16 साल की लड़की का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ जिसने बोलने का साहस दिखाया और मजबूती के साथ अपनी बात पर डटी रही। उसके इस कदम से बहुत सी नाबालिग और मासूम लड़कियां और महिलाएं इन बाबाओं के चंगुल में आने से बच गईं!

आसाराम और जवान लड़कियों के लिए उसकी न बुझने वाली पिपासा – 4 सितंबर 2013

दो दिनों से मैं आपको आसाराम के बारे में बता रहा हूँ कि उस पर क्या आरोप लगाया गया है और अब तक वह अपनी गिरफ्तारी से किस तरह बचता रहा। अब जबकि उसने बयान देना शुरू कर दिया है और अपने लिए जमानत की मांग कर रहा है, उसके बारे में और भी कई तरह की जानकारियाँ प्राप्त हो रही हैं जिनसे उसके बारे में एक से एक बढ़कर शर्मनाक, वीभत्स बातें सामने आ रही हैं: आसाराम ने एक ऐसी सुनियोजित और सुसंगठित प्रणाली विकसित कर रखी थी जिसके जरिये वह, इस नाबालिग लड़की की तरह, अक्सर ही अपने उपभोग के लिए महिलाओं की व्यवस्था कर लिया करता था।

इस मामले में आसाराम अकेला व्यक्ति नहीं है जिसे गिरफ्तार किया गया है! उसका एक निकट सहयोगी भी है, जिसका नाम शिवा है। इस व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया गया है और जैसी कि लगातार नई जानकारियाँ सामने आ रही हैं, शिवा ने बताया है कि आसाराम लड़कियों से अकेले में मिलने का आदी था। इसी तरह, शिवा के अनुसार, आसाराम अकेले में उस सोलह साल की लड़की से मिला था जो अब उस पर अपने यौन शोषण का आरोप लगा रही है। इतना ही नहीं, इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि शिवा ने अनगिनत लड़कियों और युवतियों को आसाराम के गुप्त कमरे के दरवाजे तक पहुंचाया था, जिसके बाद के काम का जिम्मा आसाराम खुद उठाता था!

आसाराम और शिवा के अलावा पुलिस ने शिल्पी नामक एक और महिला को, जो उस हॉस्टल की वार्डन थी जहां वह किशोरी रहा करती थी, भी सम्मन भेजा है। वह हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों की सुरक्षा और उनकी देखभाल की जिम्मेदार थी और उसे इस प्रकरण के बारे में कुछ और बातें मालूम होनी चाहिए। बल्कि उम्मीद की जा सकती है कि इस पूरे मामले में उठ रहे बहुत से प्रश्नों के जवाब उसके पास हो सकते हैं। दुर्भाग्य से उसने पुलिस के नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया है। विपरीत इसके, वह फरार हो गई है और पुलिस को उसका कोई पता नहीं है। पुलिस ने उसकी धर-पकड़ के लिए खोजी दस्ते की नियुक्ति की है। मामला बड़ा रोमांचक होता जा रहा है? कुछ कुछ!!

स्वाभाविक ही मीडिया सब कुछ देख रहा था और उसने अपनी तरफ से खोज की। कहा जाता है कि कभी वह आसाराम के बहुत निकट थी और इसी के चलते उसे वार्डन बनाया गया था। क्या अक्सर लड़कियों को आसाराम के पास वही भिजवाया करती थी? क्या वह हमेशा अपने ‘कर्मकांड’ से उनका इलाज कर दिया करता था?

जैसा कि लड़की का परिवार साफ-साफ कहता आ रहा है, यह एक बहुत सुव्यवस्थित अपराध था: किसी भी कारण से हो, लड़की एक बार बेहोश हो चुकी थी। वह तुरंत ही होश में आ गई लेकिन उसके अभिभावकों को बताया गया कि कोई भूत उसके पीछे लग गया है, कि वह बीमार पड़ गई है और यह भी कि उन्होंने आसाराम के किसी मंत्र द्वारा उसका उपचार करने की कोशिश भी की थी मगर उसे पूरी तरह स्वस्थ करने के लिए गुरु को स्वयं ही उस पर कोई कर्मकांड करना होगा!

शिवा ने स्वीकार किया है कि यह भूत वाली कहानी पीड़िता के अभिभावकों को बताई गई थी। इससे यह स्पष्ट है कि यह कोई अचानक उत्तेजना में किया गया अपराध नहीं था बल्कि सुनियोजित ढंग से अच्छा खासा जाल बिछा कर किया गया अपराध था! वही उस लड़की को कमरे तक लेकर आया था, जैसा कि पहले भी वह कई बार कर चुका था-लेकिन जिसने इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत की थी, हॉस्टल की वह वार्डन, फरार है।

स्वाभाविक ही, मेरे मन में कई प्रश्न उपस्थित हो रहे हैं। क्या उसके विभिन्न केन्द्रों में हॉस्टलों की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई है? बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के पवित्र कार्य की आड़ में कहीं उसने युवा लड़कियों की फौज तो इकट्ठा नहीं कर रखी है जिससे जब मर्ज़ी हो किसी लड़की का चुनाव अपने लिए कर सके; नाबालिग लड़कियों के साथ व्यभिचार की इच्छा रखने वाले अपने बीमार दिमाग की तृप्ति के लिए? ऐसी लड़कियां जिनके अभिभावक पूरी तरह उस पर भरोसा करते हैं, जिससे वे शिकायत लेकर कहीं जा भी ना सकें, अपने ऊपर हुए इन हादसों का कहीं ज़िक्र भी न कर सकें? लड़कियां जो शिकायत करने की बात तो छोड़िए, उसे ईश्वर की तरह पूजती हैं, जिसके चलते वह स्वतन्त्रता पूर्वक उनके साथ कुछ भी कर सके? लड़कियां, जो धमकाने पर डर जाएँ और उसका मुक़ाबला करना भी चाहें तो न कर सकें?

हम इस प्रकरण में हो रहे नित नये आयामों पर नज़र रखे हुए हैं और इंतज़ार कर रहे हैं कि कब सच्चाई सामने आती है-भले ही यह कार्य हमें कितना भी अरुचिकर क्यों न प्रतीत हो!

क्यों आप खुद कठपुतली बनकर अपने जीवन को किसी गुरु के हवाले करना चाहते हैं?- 22 जुलाई 2013

आज गुरु-पूर्णिमा है, जिसे आचार्य दिवस भी कहा जा सकता है। इस दिन हर शिष्य अपने गुरु का सम्मान करता है। सारा साल भले ही वह उसे भूला हुआ हो, आज के दिन वह गुरु के पास अवश्य आएगा, गुरु के पाँव पखारेगा, उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेगा और उसे दक्षिणा के रूप में कुछ धन अर्पित करेगा। अगर वह बहुत दूर रह रहा है तो वह उससे फोन पर बात करेगा और उनसे आशीर्वाद लेगा। मैं खुद भी बहुत समय तक गुरु की भूमिका में रहा हूँ और इस स्थिति से वाकिफ हूँ। मैं अब बदल चुका हूँ, इतना बदल चुका हूँ कि जिस बात की मैं सालों पहले खुद अनुशंसा किया करता था उसी का आज मैं कड़ाई के साथ विरोध करता हूँ। इसके साथ ही गुरुवाद के इस चलन का भी।

मैं धर्म-ग्रन्थों में लिखी बातों पर भरोसा किया करता था और उसी का उपदेश देते हुए उसका प्रचार-प्रसार करता था। वह यह कि: "गुरु के बिना आपकी मुक्ति नहीं है। मुक्ति ही मनुष्यमात्र का लक्ष्य होना चाहिए और मुक्ति प्राप्त करने के लिए उसे जीवन भर प्रयास करते रहना चाहिए-इसलिए हर एक को चाहिए कि पहले वह एक ऐसे गुरु की तलाश करे जो उसे मुक्ति दे सकता है।"

आज मैं महसूस करता हूँ कि लोगों की यही हालत इस क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार की जड़ है। भोले भाले, मासूम लोग उनके पास आते हैं और उन्हें तीन बातें सिखाई जाती हैं:

1) आपको मुक्ति तभी मिलेगी जब आप किसी को गुरु बना लें।

2) जैसे आपके एक ही पिता हो सकते हैं उसी तरह आप जीवन में सिर्फ एक ही व्यक्ति को गुरु बना सकते हैं।

3) आपको अपना सर्वस्व गुरु को समर्पित करना होगा। वह आपकी सारी ज़िम्मेदारी वहन करेगा और बदले में आपको वही करना होगा जो उसका आदेश हो।

जिस पल आप अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण करते हैं, आप अपने सारे कर्मकांड उसे अर्पित कर देते हैं। आप उसकी सलाह पर चलते हैं और अपनी प्रार्थनाएँ, मन ही मन, उसके साथ ही करते हैं। उसके इस दावे पर

कि वह आपको इस मृग-माया से निकालकर मुक्ति दिलाएगा, आप अपनी सहमति से और खुशी-खुशी उसकी कठपुतली बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्वाभाविक ही गुरु इसे और इसके साथ आने वाली हर चीज को पसंद करते हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है। अपने शिष्यों को अपने साथ बनाए रखने के लिए वे इस नियम का प्रचार करते हैं कि किसी भी शिष्य का एक ही गुरु हो सकता है।

यह पूरी व्यवस्था ही मेरे विचार में, दुरुपयोग तथा शोषण करने के इरादे से ही बनाई गई है और यही कई दशकों से, बल्कि सदियों से हो रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों के मस्तिष्क पर पूरा अधिकार रखते हैं और वे जान-बूझकर दौलत पाने और न सिर्फ अपने शारीरिक सुख बल्कि अपनी स्वैर, अप्राकृतिक यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी उनका दुरुपयोग करते हैं। वहाँ होने वाले कृत्य बेहद अनैतिक और समाजविरोधी होते है।

मेरे विचार में गुरु महज एक शिक्षक होता है, जो कि उसका शाब्दिक अर्थ भी है। अगर आप कुछ सीखना चाहते हैं तो आपको गुरु की आवश्यकता पड़ती है। जब मैं स्कूल जाता था तो कक्षा के सारे बच्चे शिक्षकों को आदर के साथ ‘गुरुजी’ कहा करते थे। इस बात से कोई मतलब नहीं होता था कि वह व्यक्ति कौन है। कोई भी, जिससे आप कुछ सीखते हैं, आपका गुरु हो सकता है, भले ही वह आपसे उम्र में छोटा ही क्यों न हो। और इस तरह आपके कई गुरु हो सकते हैं, जो भी आपको शिक्षा प्रदान करता है।

किसी की कठपुतली मत बनिए। जिससे भी आप कुछ सीखते हैं उसे आप आदरपूर्वक शिक्षक का दर्जा दे सकते हैं। लेकिन किसी एक व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर न रहिए। अपने संबंध को सिर्फ शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध ही बना रहने दें और उसमें किसी दैवत्व के पहलू को जगह न दें।

लोग यह तर्क कर सकते हैं कि अगर आप धर्मग्रंथों और धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं तो आपको एक आध्यात्मिक और धार्मिक गुरु की आवश्यकता हो सकती है। मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा इसी काम में खर्च किया है। आज मैं आपसे पूछना चाहता हूँ: आखिर आप क्यों इस धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं? मेरे विचार में यह बिलकुल व्यर्थ है। आप एक ईमानदार और सुखपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। इसके लिए वेदों, कुरान या बाइबल की आपको कहाँ आवश्यकता है? उन्हें पढ़कर आप अपने ज्ञान के क्षितिज को सीमित कर लेंगे, अपने रास्ते को संकरा कर लेंगे और संदेहग्रस्त हो जाएंगे। तो अगर आपको ऐसे दर्शन की आवश्यकता ही नहीं है तो फिर धार्मिक गुरु की आवश्यकता क्यों होगी?

अपने गुरु आप खुद बनिए। आपका प्रेम, आपकी सहज विनम्रता और नैतिकता आपकी गुरु है। यही चीज़ें आपको सही रास्ता दिखाएंगी। बस, उन्हें वैसा करने आज़ादी दे दीजिए।

अपनी जिम्मेदारियों से बचने का गुरु प्रदत्त सम्मोहक प्रस्ताव – 3 अप्रैल 2013

कल मैंने उन जिम्मेदारियों के बारे में लिखा था जो एक लेखक और पाठक, दोनों पर, आयद होती हैं और यह भी कि अपने जीवन और अपने कर्मों की सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी उन्हें उठानी ही चाहिए। हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए और उन्हें अपने कंधों पर उठाने का साहस होना चाहिए। इस बात पर सभी सहमत होंगे कि ऐसा ही होना चाहिए मगर हिन्दू धर्म और प्रचलित गुरुवाद, दुर्भाग्य से, कुछ दूसरी ही बात सिखाते हैं: आप अपनी सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने गुरु पर डाल सकते हैं और आपको ऐसा करना भी चाहिए।

जी हाँ, यही सब बड़े से बड़े धर्मग्रंथों में लिखा हुआ है और यही सब कुछ सैकड़ों सालों से गुरुओं का उपदेश रहा है जिसे उनके शिष्य निष्पादित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसके पीछे का विचार यह है कि आप अपने आपको पूरी तरह गुरु के चरणों में निछावर कर दें। अपने साथ आप अपने बुरे कर्मों को और अपने अच्छे कर्मों को भी गुरु को समर्पित कर दें और अपने लिए बिना किसी अपेक्षा के जैसा गुरु कहता है वैसा करते चले जाएँ। फिर आप उस स्थिति को प्राप्त हो जाएंगे जहां आपके सारे कर्म आपके नहीं रह जाएंगे और इस तरह मृत्यु के बाद आपको स्वर्ग प्राप्त हो जाएगा।

यही वह आधार है जिस पर सारे गुरुवाद की इमारत खड़ी है। गुरु लोगों का आह्वान करते हैं: आओ, अपने सारे कर्म मुझे सौंप दो, वही करो जिसके लिए मैं तुम्हें प्रेरित कर रहा हूँ और फिर तुम्हें इस जीवन की, यहाँ तक कि उसके बाद की भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अपने आप को समर्पित कर दो, निछावर कर दो, तुम्हारे इस जन्म की और अगले जन्मों की भी चिंता मैं करूंगा।

कितना आकर्षक विचार है! किसी भोले-भाले, साधारण धर्मभीरु व्यक्ति के लिए यह एक ललचाने वाला प्रस्ताव है! हर हिन्दू जो ऐसे धार्मिक वातावरण में बड़ा हुआ है यह विश्वास कर सकता है कि यही एकमात्र उचित राह है। कोई भी इसके मोहक स्वरों को समझ सकता है: मेरी नौका में सवार हो जाओ, मैं तुम्हें उस पार पहुंचा दूँगा! तुम्हें सोचने की, चिंता करने की ज़रूरत नहीं, तुम वहाँ सुरक्षित पहुँच जाओगे। तुम नौका को हिला नहीं सकते, लहरों के तेज़ थपेड़े तुम्हें डिगा नहीं सकेंगे, डूबने की तो कोई संभावना ही नहीं- यहाँ तक कि तुम गीले तक नहीं होगे!

वे समर्पण कर देते हैं। यह बहुत आसान है और यह समाज में अच्छा भी माना जाता है! यह घोषणा करते हुए वे गर्व से भर उठते हैं: "मैंने सर्वस्व परित्याग किया है, मैं उपासना में लीन हो गया हूँ, मैं भक्त हूँ और सिर्फ वही करता हूँ जो मेरे गुरु की वाणी मुझसे करवाती है। मैं कुछ भी नहीं हूँ।" यह विनम्रता ही उनसे अपेक्षित है। उनसे कहा गया है कि ‘अपने अहं को खत्म करो’ अन्यथा गुरु आपकी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। आपके कर्मों कि ज़िम्मेदारी वह तभी लेगा जब आपके कर्मों पर उसका अधिकार होगा।

लेकिन गुरु की इस सेवा के बदले आपको एक निश्चित फीस भी अदा करनी होगी। कुछ गुरु सीधे यह फीस वसूल नहीं करते। कुछ बैंक की तरह होते हैं जहां कुछ विशिष्ट सेवाओं के लिए आपका एक तरह का बीमा किया जाता है। लेकिन आपको भुगतान करना अवश्य पड़ता है, सीधे सीधे या फिर किसी और माध्यम से।

ये गुरु आपकी इस मनोवृत्ति का लाभ सिर्फ मोटी रकम वसूल करके ही नहीं उठाते। उनके कई शिष्य इतने समर्पित होते हैं कि वे उनकी ज़बान खुलते ही उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं। उनके शिष्यों द्वारा प्रदत्त यह शक्ति उनके लिए यौन शोषण की राह भी खोल देती है। पहले शिष्य रहीं कुछ महिलाओं ने मुझे बताया कि वे तो अपने गुरु को भगवान ही समझती थीं। उन्होंने अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था, इस विश्वास के साथ कि गुरु के आदेश का पालन करने पर वे उनके माध्यम से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी। जब उनसे कहा गया कि गुरु की सेवा हेतु उनके बेडरूम में जाओ, उनके जननांगों का मर्दन करो और यहाँ तक कि उनके साथ संभोग करो तो उनमें से बहुत सी इंकार नहीं कर सकीं। ऐसे कई प्रकरण हैं जहां गुरुओं ने अपनी शिष्याओं का इस तरह शोषण किया क्योंकि वे अपने भोलेपन में यह सोचती थीं कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

इस तरह आप देखते हैं कि अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं न उठाकर उन्हें किसी और को सौंपने का आसान रास्ता अख्तियार करके आप कहाँ पहुँच सकते हैं। यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं उठाओ, अपने कर्मों और उनसे उपजे परिणामों की पूरी ज़िम्मेदारी आपकी है। समझिए कि जीवन का आनंद उठाने के लिए किसी गुरु की आपको कोई आवश्यकता नहीं है।

अतीत में सगे संबंधियों द्वारा किए गए यौन शोषण से कैसे उबरें – 10 मार्च 13

मैंने आपको बताया था कि सन 2005 में एक महिला मुझसे मिलने आई थी। जब वह छोटी बच्ची थी तब पिता उसका यौन शोषण किया करते थे। पिता के इस कुकृत्य का उसके मन पर ऐसा दुष्प्रभाव पड़ा कि वह अपने जीवन में कभी किसी पुरुष को स्वीकार नहीं कर पाई। यूं तो उसने कुछ पुरुषों से प्रेम भी किया मगर किसी को भी अपने दिल के नज़दीक नहीं आने दिया। उसकी कहानी बडी ह्रदयविदारक थी। अपने व्यक्तिगत काउंसलिंग सत्रों के दौरान इस तरह के कई मामले मेरे सामने आते रहते हैं। दुख के साथ कहना पड़ता है कि वास्तव में अनेकों लोगों के दुखद अतीत से मेरा परिचय हुआ।

बहुत सी महिलाओं ने मुझे बताया कि जिस पुरुष ने उनका यौन शोषण किया वह या तो उनका पिता, भाई, चाचा – ताऊ, पुरुष रिश्तेदार या अन्य कोई ऐसा था जिस पर उनके माता – पिता भरोसा करते थे। कुछ ने बताया कि उनके मां – बाप को यह बात पता थी लेकिन फिर भी उन्होंने इसके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। कुछ इस डर से चुप रहीं कि मुंह खोलने पर कोई उन्हें प्यार नहीं करेगा या शर्म के मारे इस बात को अपने तक ही सीमित रखे रहीं। लेकिन आज जब वे पीछे मुड़कर देखती हैं तो खुद से सवाल करती हैं कि वे चुप क्यों रहीं।

एक अन्य महिला ने बताया कि वह जब दस साल की थी तो उसके दादा उसका यौन शोषण करते थे। वह अकसर उनसे मिलने जाया करती थी और उसके मां – बाप यह सोच खुश रहते थे कि बच्ची अपने दादा के साथ अच्छा समय बिताती है, बागवानी में उनका हाथ बंटाती है और उनके साथ बोर्ड गेम्स खेलती है। चौदह – पन्द्रह साल की उम्र तक वह दादा के घर जाती रही। क्यों? क्योंकि दादा उसे भरपूर जेबखर्च देते थे लेकिन इस शर्त पर कि वह ‘इस बात’ की भनक किसी को भी नहीं लगने देगी।

एक और महिला ने बताया कि उसे रात को अंधेरे में डर लगता है और इसकी वजह है उसका बड़ा भाई। जब वह बहुत छोटी थी तो वह रात में उसका यौन शोषण किया करता था। भाई और माता – पिता का प्यार खोने के डर से उसने इसके बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। किशोरावस्था आने पर जब उसने यह बात मां – बाप को बताई तो उन्होंने इस पर यकीन ही नहीं किया।

किसी पुरुष रिश्तेदार का उनकी टांगों पर दबाव देते हुए हाथ रखना, धीरे धीरे हाथों को जांघों तक ले जाना या फिर उन्हें अपनी बाहों में लेकर छाती से चिपका लेना – ये कुछ ऐसी स्थितियां होती थीं जब वे बहुत असहज महसूस करती थीं और कई बार यह भी लगता था कि उनके शरीर पर अतिक्रमण हो रहा है। कई बार यह सब इतना दबे – ढके तरीके से होता था कि प्रतिकार करना ठीक नहीं लगता था और कई बार यह सब इतने आक्रामक तरीके से होता था कि दहशत और शर्म से उनकी ज़ुबान पर ताला पड़ जाता था। ऐसा नहीं कि केवल लड़कियों के साथ ऐसा होता है। लड़के, बच्चे और किशोर भी इसका शिकार होते हैं और ताउम्र इन गहरे ज़ख्मों के साथ जीते हैं।

यह तब भी होता था और आज भी हो रहा है। ऐसा सब जगह हो रहा है लेकिन इसकी चर्चा नहीं होती। जिसके साथ यह घिनौना काम होता है उसके लिए इस अनुभव से उबर पाना बहुत ही मुश्किल होता है। इसी कारण से यौन उत्पीड़न के शिकार ये लोग मेरे पास आते थे कि मैं इससे उबरने में उनकी मदद करूं।

जीवन में लगभग हर प्रकार की स्थिति से जूझ रहे व्यक्तियों की काउंसलिंग का खासा अनुभव मुझे है लेकिन मैंने पाया है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में हमेशा ज़ख्म बहुत गहरे होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि उन घटनाओं ने बच्चों के कोमल मन को इतना आहत किया होता है कि अब उन्हें किसी पर भरोसा नहीं होता। स्थिति तब और भी विकट हो जाती है जब अपराधी वह व्यक्ति होता है जिसे वे सबसे ज्यादा प्यार करते थे।

निश्चय ही ये निहायत व्यक्तिगत किस्म के मामले होते हैं और मैं हर मामले में परिस्थितियों के अनुरूप अलग अलग सलाह देता था। पीड़ित को चाहिए कि वह ऐसे व्यक्ति की तलाश करे जिस पर उसे पूरा भरोसा हो और जिसे वह अपने मन की बात बता सके। अपनी कहानी, इससे जुड़ी हुई अन्य बातें, आपके भय और इससे जुड़े हुए अन्य बुरे ख्यालात, जिन्हें आप बेझिझक उस व्यक्ति को बता सकें। ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने उस बीते हुए जीवन के बारे में खुलकर नहीं बताते और उन यादों को इस उम्मीद में दिल के किसी गहरे कोने में छुपाए रखते हैं कि शायद समय के साथ ये बुरी स्मृतियां धुंधली पड़ जाएंगीं। लेकिन होता इससे ठीक उल्टा है। दिल के कोने में दबे हुए वे ज़ख्म रह – रहकर हरे होते रहते हैं।

एक अनुभवी थैरेपिस्ट या काउंसलर कुछ तकनीकों की मदद से इन यादों को भुलाने में आपकी मदद कर सकता है। वह आपकी मदद कर सकता है कि किस प्रकार इन्हें दुःस्वपनों की भांति भुलाकर नया जीवन शुरु किया जा सकता है। आपको इन बुरी यादों को भुलाना ही होगा। मैं इसी काम में लोगों की मदद कर रहा था।