जब चुनाव, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को धर्म सीमित करता है – 16 सितंबर 2015

कल इस्लाम के विषय में लिखते हुए मैंने आपके सामने स्पष्ट किया था कि कैसे मैं इस्लाम के प्रति पूर्वग्रह नहीं रखता। लिखते हुए मेरे मन में, धर्म की कौन सी बातें मुझे पसंद या नापसंद हैं, इस विषय में कुछ और विचार आ रहे हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि न तो मैं किसी से कहना चाहता हूँ कि उन्हें क्या सोचना चाहिए और न ही मैं पसंद करूँगा कि कोई मुझसे कहे कि मैं क्या सोचूँ। मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैचारिक स्वतंत्रता में विश्वास रखता हूँ और धर्म इस विषय में पूरी तरह भिन्न विचार को प्रश्रय देता है!

आप जानते हैं कि मैं एक नास्तिक व्यक्ति हूँ। मैं काफी समय तक धार्मिक रहा था और अब मैं उसे पूरी तरह छोड़ चुका हूँ- यहाँ तक कि अब मैं ईश्वर पर भी विश्वास नहीं रखता। लेकिन आपको एक बात बताऊँ? मुझे इससे कोई समस्या नहीं है कि आप किसी धर्म के अनुयायी हैं! आप जिसे चाहें, पूजते रहें, सप्ताह में एक, दो या तीन दिन मौन व्रत रखें, उपवास करें, कोई दूसरा काम न करें-सिर्फ बैठकर दस बार या सौ बार पूजापाठ करें, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। वैसे भी धर्म यही कहता है कि वह सिर्फ आपके लिए है, जिससे आप अपनी धार्मिक क्रियाओं को अपनी चार-दीवारी तक सीमित रख सकें! सिर्फ इतनी कृपा करें कि जिस पर आप विश्वास कर रहे हैं, मुझे उस पर विश्वास करने पर मजबूर न करें! इसके अलावा एक बात और: मुझे अपनी बात कहने से रोकने की कोशिश न करें!

मैं एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र का नागरिक हूँ, मेरा जनतंत्र पर प्रगाढ़ विश्वास है और, जैसा कि मैंने कहा, मेरा विचार है कि सभी को यह स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वे अपने विचार बिना किसी संकोच या डर के व्यक्त कर सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे बीच असहमति है, हमें आपस में किसी वाद-विवाद में पड़ने की ज़रूरत ही नहीं है! दुनिया भर में मेरे बहुत से मित्र हैं जो विभिन्न धर्मों को मानते हैं और इसके बावजूद कि उनकी आस्थाओं के बारे में मेरे विचार उनसे बहुत अलग हैं, मेरे उन सभी लोगों के साथ बहुत स्नेहपूर्ण संबंध हैं!

जब तक हम दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाते या उन्हें परेशान नहीं करते, हम एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हुए, एक-दूसरे को मनपसंद चुनाव की, अपने विचार रखने की और उन्हें अभिव्यक्त करने की आज़ादी प्रदान करते हुए बड़े मज़े में एक साथ रह सकते हैं-लेकिन दुर्भाग्य से धर्म इसके आड़े आ जाता है और इस बात पर सहमत नहीं होता या इस सिद्धांत पर काम नहीं करता!

सिर्फ कुछ धर्मों के धर्मप्रचारकों के कामों पर नज़र दौड़ाने की ज़रूरत है। ये लोग दुनिया भर के विभिन्न देशों में कार्यरत हैं और एक समय था जब सिर्फ ईसाई धर्मप्रचारकों का बोलबाला था और वही दुनिया भर में लोगों का धर्म-परिवर्तन किया करते थे और अगर वे स्वेच्छा से धर्म-परिवर्तन नहीं करते थे और बप्तिस्मा नहीं करवाते थे तो उनसे जबर्दस्ती ऐसा करवाते थे। लेकिन यह न समझें कि यह अब बंद हो गया है!

यहाँ, भारत में यह अभी भी हो रहा है। ईसाई, हिन्दू और मुस्लिम धर्म-प्रचारक इस काम में एक-दूसरे से होड़ ले रहे हैं! गरीब और सुविधाओं से महरूम लोग भोजन, छत और काम के लालच में उनके झाँसे में आ जाते हैं लेकिन सिर्फ एक शर्त पर: उन्हें धर्म-परिवर्तन करना होगा। बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने एक ही जीवन में कई बार धर्म-परिवर्तन किया है-क्योंकि वे ऐसा करने को मजबूर हैं! ज़िंदा रहने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ता है क्योंकि उन्हें बार-बार यह विकल्प उपलब्ध कराया जाता है। उनके लिए धर्म इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि उसके लिए जान दे दें!

इसीलिए संकटग्रस्त इलाकों के लोग आई एस के बारे में भी ऐसा ही महसूस कर सकते हैं, हालांकि इस्लाम इस मामले में और भी अधिक चरमपंथी है: उनका बाकायदा एक सोचा-समझा कार्यक्रम है- दूसरे धर्म को मानने वाले हर व्यक्ति का या तो धर्म-परिवर्तन करना होगा या उनकी हत्या कर दी जाएगी! यह एक असंभव कार्य है-अपने अंदर ठीक इन रूढ़िवादियों की तरह की आस्था पैदा करना असंभव है! आप कुछ भी कर लें, पूरी संभावना होगी कि आप बहुत जल्द उस वर्ग में शामिल हो जाएँ जिनकी हत्या कर दी गई।

और यही वह बिन्दु है जहाँ दूसरों के प्रति धर्म कतई सहिष्णु नज़र नहीं आता। इसके विपरीत, वह दूसरे धर्मावलम्बियों की हत्या करता है या उनका जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन करके उन्हें अपनी आस्था पर यकीन लाने को मजबूर करता है।

जी नहीं, मैं इसके बरक्स नास्तिकता और जनतंत्र को वरीयता दूँगा!

यह कहना कि इस्लाम शांति का धर्म नहीं है, क्यों इस्लाम के विरुद्ध पूर्वग्रह नहीं है – 15 सितंबर 2015

कल मैंने यूरोपियन सरकारों से अपील करते हुए अपने ब्लॉग में गुजारिश की थी कि धर्म को अपने पैर पसारने का मौका न दें और सिर्फ इसलिए कि मुसलमानों की संख्या बढ़ गई है, बड़ी संख्या में मस्जिदों की तामीर की इजाज़त न दें। शायद बहुत से लोग मेरे इस विचार से यह सोच सकते हैं कि मैं इस्लाम के विरुद्ध पूर्वग्रह से ग्रस्त हूँ। मैं उनके इस सोच का प्रतिवाद करते हुए इस पर थोड़ी चर्चा करना चाहता हूँ।

पहली बात तो यह कि मैं इस्लाम या मुसलमानों के विरुद्ध पूर्वग्रह नहीं रखता लेकिन कुछ समय पहले मैंने कहीं पढ़ा कि यह कह देना इस्लाम विरोधी चर्चा को रोक देने का सबसे अच्छा उपाय है-क्योंकि कोई भी भला व्यक्ति यह कहलाना पसंद नहीं करेगा! लेकिन मैं परस्पर संवाद बंद नहीं करूँगा क्योंकि मेरे विचार में यही वह बात है जो सबसे अधिक ज़रूरी है!

मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ: जी हाँ, आतंकवाद का मुख्य कारण धर्म ही है। और इस्लाम शांति का धर्म नहीं है। हिंसा खुद उसमें मौजूद है!

कुरान की इन आयतों पर गौर करें:

जो लोग अल्लाह और उसके पैगंबर के विरुद्ध युद्ध छेड़ते हैं और पूरी शक्ति से उनके विरुद्ध काम करते हैं, उनकी सज़ा है: वध, या फाँसी देना या विपरीत हिस्से के हाथ और पैर काट दिया जाना या अपने भूभाग से निर्वासन: इस दुनिया में यही उनका अपयश है और मरणोपरांत जीवन में बहुत बुरी सज़ा उनका इंतज़ार कर रही है। 5:33

जैसे दूसरे हैं, उसी तरह ये भी धर्म का त्याग करना चाहते हैं, जिससे वे उनके बराबर हो जाएँ: लेकिन ऐसे लोगों को तब तक अपना दोस्त मत बनाओ जब तक वे अल्लाह की राह पर वापस न आ जाएँ (अर्थात जिस बात की मनाही की गई है उससे दूर न रहें)। लेकिन अगर वे फिर भी झूठे, मक्कार और विश्वासघाती बने रहते हैं, तो जहाँ भी वे मिलें, उन्हें गिरफ्तार करके उनका कत्ल करो; और किसी भी हालत में उनसे मित्रता न करो और न ही उनसे मदद लो। 4:89

जो लोग अल्लाह पर और आखिरत पर विश्वास नहीं रखते और न ही अल्लाह और उसके पैगंबर द्वारा वर्जित चीजों को वर्जित नहीं समझते और न ही इस सच्चे धर्म को मानते हैं तो (भले ही वे किताब में वर्णित लोग हों) उनसे तब तक युद्ध करो, जब तक कि वे हारकर और जलील होकर आत्मसमर्पण न कर दें और खुद होकर जज़िया देने के लिए मजबूर न हो जाएँ। 9:29

ये और दूसरी बहुत सी आयतें ही समाचारों में अक्सर दिखाई देने वाली भयानक हिंसा का मूल आधार हैं और जो हमें बुरी तरह डराती और चिंताग्रस्त कर देती हैं। इसी प्रकार इन आयतों से उद्भूत हिंसा ही मुसलामानों के प्रति हमारे मन में संदेह पैदा करती है, भले ही वे हमारे आसपास बिना किसी को नुकसान पहुँचाए शांतिपूर्वक जीवन गुज़ार रहे हों।

लेकिन वे उस पुस्तक पर विश्वास तो करते ही हैं, वे यही कहते हैं कि वह स्वयं ईश्वर के मुँह से निकले शब्द हैं और, मेरी जानकारी में, दूसरे किसी धर्म से अधिक इस बात का दावा भी करते हैं कि वह न सिर्फ पवित्रतम किताब है बल्कि उसके शब्द अटल और पूर्ण सत्य हैं।

और, मेरे शांतिप्रेमी मुसलमानों, यही समस्या है! आप यह दावा नहीं कर सकते कि इस पुरातन किताब का हर शब्द सही या उचित भी है और फिर यह कि इस्लाम शांति का धर्म भी है! आप उसी पुस्तक पर ईमान लाते हैं, जिस पर उन लोगों का भी यकीन है, जो इस धरती के विशाल हिस्से को आतंक के साए में लपेटे हुए है। स्वाभाविक ही, दूसरे सभी धर्मग्रंथों की तरह कुरान में भी कुछ अच्छी बातें भी दर्ज हैं! लेकिन बहुत सारी दकियानूसी, क्रूर, भयानक और अमानुषिक बातें भी लिखी हुई हैं, जिन पर मुसलामानों के लिए चलना अनिवार्य है।

ऐसी विषयवस्तु या पाठ दूसरे धर्मों के धर्मग्रंथों में भी मौजूद हैं लेकिन उनके धर्मावलंबी इस बात का दावा नहीं करते कि उनमें लिखी सारी बातें अटल और अंतिम सत्य हैं या यह कि अब भी वे ग्रंथ अप्रासंगिक नहीं हैं! वे अपने धर्मग्रंथों को समय के संदर्भ में देखते हैं, जैसा करने में इस्लाम असफल रहता है।

यहाँ हम किसी आयत की गलत व्याख्या नहीं कर रहे हैं, न ही हमारी समझ कोई चूक हुई है और न ही इसमें किसी अन्योक्ति, उपमा या अलंकार का हम कोई अनुचित अर्थ ले रहे हैं। सब कुछ स्पष्ट लिखा है। दरअसल इस ग्रंथ की विषयवस्तु उस समय की है जो समय बेहद कुरूप, क्रूर और रक्तरंजित रहा है। और जब तक आप इस किताब से चिपके रहेंगे, तब तक लोग उसे अक्षरशः ग्रहण करेंगे और दूसरे मतावलंबियों की गर्दन उतारने पर आमादा होते रहेंगे!

इसीलिए हमारे लिए यह आवश्यक हो जाता है कि इस धर्म को और अधिक फैलने से रोकें। ऐसी किसी काम की इजाज़त न दें, ऐसी कोई संस्था स्थापित करने की अनुमति न दें, जहाँ इस धर्म का प्रचार किया जाता हो, जिससे रूढ़िवादियों, कट्टरपंथियों और इस्लामी चरमपंथियों के प्रशिक्षण पर लगाम लगाई जा सके। और ऐसी जगहें मुख्य रूप से दुनिया भर में फैली मस्जिदें हैं, जहाँ ये धर्मग्रंथ अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाते हैं।

यह विचार इस्लाम के प्रति किसी पूर्वग्रह या दुर्भावना से उद्भूत नहीं है बल्कि इन धर्मग्रंथों से निकली एक सहज-सामान्य निष्पत्ति है और मैं जानता हूँ कि, आपके शांतिप्रेमी धर्म-भाइयों के लिए मन में हर तरह की शुभाकांक्षा होने के बावजूद, बहुत से दूसरे लोग भी इसी नतीजे पर पहुँचे हैं!

यूरोपियन सरकारों से अपील – शरणार्थियों की मदद करें लेकिन मजहब और मस्जिदों पर सख्त पाबंदी लगाएँ – 14 सितंबर 2015

दो सप्ताह पहले मैंने शरणार्थियों की हृदयविदारक परिस्थिति का वर्णन किया था और यूरोपियन देशों द्वारा दिल खोलकर किए जा रहे उनके स्वागत पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी। हफ्ते भर बाद, पहले भारतीय अखबारों में पढ़ा और उसके बाद जर्मन ऑनलाइन समाचारों में देखा कि इन शरणार्थियों के लिए सऊदी अरब ने जर्मनी में 200 मस्जिदें बनवाने का प्रस्ताव रखा है। उसी आलेख में यह भी ज़िक्र किया गया था कि जर्मनी में आई एस के समर्थक पहले ही उन शरणार्थियों के साथ घुलने-मिलने की कोशिश कर रहे हैं, जो वहाँ अकेले आए हैं। इस बिंदु पर मैं यूरोपियन सरकारों से, और विशेष रूप से जर्मन सरकार से एक गुजारिश करना चाहता हूँ: धर्म को पैर पसारने का मौका कतई न दें। यह उनके लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों को यह थोड़ा अतिवादी या चरमपंथी विचार लग रहा होगा। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी तरह बहुत से लोग इस विषय में चिंतित हैं हालांकि कहने में कतराते हैं क्योंकि वे क्रूर नहीं लगना चाहते, वे नहीं चाहते कि उन्हें भी चरम-दक्षिणपंथी विचारधारा का समर्थक समझ लिया जाए, वे नहीं चाहते कि उन्हें भी जातिवादियों के साथ एक ही टोकरी में रख दिया जाए। लेकिन वे चिंतित हैं, क्योंकि आई एस के समर्थकों की संख्या बढ़ती जा रही है-और उनमें से बहुत से लोग वास्तव में यूरोप के नागरिक ही हैं!

ऐसे बच्चे भी हैं, जो यूरोपियन माता-पिता की संतानें हैं, यूरोपियन मूल्यों के अनुसार और अक्सर ईसाई मूल्यों के अनुसार जिनका लालन-पालन हुआ है, इस्लाम की ओर आकृष्ट हो जाते हैं, चरमपंथी विचार अपना लेते हैं और अंततः देश छोड़कर एक ऐसे धर्म और ईश्वर की खातिर जिहाद के लिए निकल पड़ते हैं जो खुद उनके अभिभावकों के लिए भी पराया है। वे सीरिया और दूसरे युद्धग्रस्त देशों से, ठीक आतंकवादियों के गढ़ों के बीचोबीच, हाथों में बम के गोले लिए वीडियो मैसेज भेजते हैं कि वे उन शहरों और देशों को उड़ा देंगे, जहाँ रहकर वे बड़े हुए हैं!

लड़कों और लड़कियों को भर्ती किया जाता है, जबरदस्ती उनका मतपरिवर्तन करवाया जाता है और भयंकर धर्मयुद्ध में झोंक दिया जाता है। यूरोपियन परिवारों के किशोरों को, जिनकी कोई इस्लामी पृष्ठभूमि नहीं रही है, युवक-युवतियों को, जो पूरी तरह यूरोपीय जीवन में घुले-मिले नज़र आते हैं लेकिन, स्वाभाविक ही उन इलाकों में रहते हैं, जहाँ इस्लाम के मानने वालों का विशाल बहुमत है और जहाँ उस देश की भाषा कोई नहीं बोलता, जहाँ वे रह रहे हैं। बाद में वे खुद ही इन जिहादियों की भर्ती करने वाले बन जाते हैं और अपने दोस्तों को भी अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश करते हैं।

हमें सतर्क रहना होगा कि यह आतंकवाद न फैले। यह धार्मिक आतंकवाद है, इसकी जड़ में धर्म है। मैं जानता हूँ कि ऐसे विचार रखने वाला मैं अकेला व्यक्ति नहीं हूँ। हमें हर इंसान की मदद करनी चाहिए, हर एक की जान बचाने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए और यह संभव किया जाना चाहिए कि वे भी हमारे साथ मिल-जुलकर रह सकें-लेकिन हमें आतंकवाद के विस्तार के लिए ज़मीन मुहैया नहीं करानी चाहिए।

हम पहले ही इंग्लैंड के उन इलाकों के वीडिओज़ और फोटो देख चुके हैं, जहाँ इस्लाम के अनुयायी निवास करते हैं और अपने अलग नियमों का प्रचार करते हैं। इन इलाकों को वे देश के दूसरे इलाकों से काटकर रखने की कोशिश करते हैं जिससे अपना एक अलग क्षेत्र बनाकर वहाँ शरिया क़ानून लागू कर सकें। वे स्थानीय खुली संस्कृति को अपने अनुयायियों के लिए वर्जित करके अपने इलाके की महिलाओं पर दबाव डालते हैं कि उन्हें क्या पहनना चाहिए और कैसा व्यवहार करना चाहिए! मैं बिल्कुल नहीं चाहूँगा कि यूरोप के किसी इलाके में लोग शरिया क़ानून लागू करने का दावा करें!

आप जानते हैं कि सामान्य रूप से मैं धर्म का विरोधी हूँ और इसमें सभी धर्म शामिल हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि जर्मनी में ज़्यादातर लोग बहुत धार्मिक नहीं हैं और जो हैं भी, वे ईसाइयत में विश्वास रखते हैं-वह धर्म, जिसके अनुयायी हाल-फिलहाल में इस बात के लिए नहीं जाने जाते कि दल बनाकर किसी विस्फोटक सामूहिक हिंसा में शामिल होते हों!

और ऐसी स्थिति में सऊदी अरब का इन देशों में मस्जिदें बनवाने का प्रस्ताव अत्यंत विडंबनापूर्ण और गंदा मज़ाक लगता है! खुद उसने और दूसरे मुस्लिम देशों ने, जो इस संकटग्रस्त इलाके के काफी करीब हैं, एक भी शरणार्थी को अपने यहाँ शरण नहीं दी है, जब कि ये शरणार्थी उनके स्वधर्मी भी हैं! वे अपने देश में शरण देकर उनकी मदद नहीं कर सकते-लेकिन जर्मनी में उनके लिए 200 मस्जिदें बनवा सकते हैं!? यह अत्यंत हास्यास्पद है और जब कि मैंने समाचारों में पढ़ा है कि जर्मन राजनीतिज्ञ पहले ही इसका विरोध कर रहे हैं, मुझे पूरी आशा है कि जर्मन सरकार का आधिकारिक उत्तर भी वैसा ही दो टूक होगा!

मस्जिदें तामीर करने के लिए जगह उपलब्ध कराने के किसी भी प्रयास का मैं विरोधी हूँ। इन मस्जिदों में उनके धर्मग्रन्थ पढ़ाने वाले इस्लामिक स्कूल होंगे-और पढ़ाया जाने वाले पाठ्यक्रम पर किसी का कोई अंकुश नहीं हो सकता! पुलिस कार्यवाहियों में न जाने कितनी बार सामने आया है कि इन जगहों में आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त लोगों को छिपाया जाता है। आतंकवादी हमलों के बाद कितनी ही बार हमने सुना है कि इन मस्जिदों में रहकर और इन स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करते हुए उनका वास्तविक लक्ष्य उसी देश के विरुद्ध काम करना था, जहाँ के वे नागरिक हैं और उन्हीं लोगों को नुकसान पहुँचाना था, जिनके साथ वे रहते हैं।

लेकिन फिर भी यह अपील सरकार से है, उन लोगों से है, जो इस विषय में कुछ कर सकते हैं, जनता और देश की सुरक्षा संबंधी निर्णय लेते हैं। दूसरे सभी लोगों का, सामान्य जनता का कर्तव्य यही है कि इंसानियत के नाते इन शरणार्थियों की ज़्यादा से ज़्यादा मदद करें। इसलिए इन लोगों की हर संभव मदद करें, जहाँ भी, जैसे भी संभव हो, जितना भी आपसे बन सके। खुद इंसान बनें और दूसरों के साथ भी इंसानियत का व्यवहार करें।

सिर्फ इस बात का खयाल रखें कि मजहब को अपने पैर पसारने का मौका न मिले।

क्या बुर्का न पहनकर महिलाएं पुरुषों को बलात्कार करने का आमंत्रण देती हैं? 5 फरवरी 2014

पिछले तीन सप्ताह से मैं यौन उत्पीड़न और बलात्कार के संबंध में ब्लॉग लिख रहा हूँ। इनमें मेरा फोकस मुख्य रूप से भारत पर रहा है मगर कुछ सामान्य बातें भी इनमें आ गई हैं। हालांकि वस्त्र कभी भी बलात्कार का कारण नहीं रहे हैं, इस बारे में मैं पहले भी एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ फिर भी आश्चर्य होता है कि बहुत से लोग अब भी लिख रहे हैं कि महिलाओं के अंगप्रदर्शक पहनावे के कारण पुरुषों के लिए अपने आपको काबू में रखना मुश्किल हो जाता है। इसी तर्क को आधार बनाकर मैं आपके सामने आज एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, जिससे पता चलता है कि प्रचलित धारणा के विपरीत बुर्के में पूरी तरह ढँकी-छिपी महिलाएँ भी बलात्कार से बच नहीं पातीं!

जी हाँ, यह एक तथ्य है। इस्लाम ने इस मूर्खतापूर्ण विचार का अनुगमन किया कि बलात्कार होने पर वह पीड़िता का दोष माना जाएगा और उन्होंने औरतों के लिए बुर्का पहनने का यह भयंकर नियम लागू कर दिया। मुस्लिम महिलाओं को, उनके परिवार की धार्मिक कट्टरता के अनुपात में, अपने शरीर के अधिकांश या किसी भी अंग को खुला रखने की इजाज़त नहीं है। उनके विचार में महिलाओं के बाल, उनके सामान्य कपड़े, उनके हाथ, यहाँ तक कि उनका चेहरा और आँखें भी किसी पुरुष को इतना उत्तेजित करने के लिए काफी हैं कि वह उन पर बलात्कार करने के लिए उद्यत हो जाए। यह पर्दा-नुमा, आकृतिहीन परिधान उनकी सुरक्षा की गारंटी की तरह पेश किया जाता है।

जब हम पिछले दिनों लखनऊ, जहां मुसलमानों की तादाद तुलनात्मक रूप से कुछ ज़्यादा है, गए थे तब वहाँ मैंने लगभग दस साल की एक लड़की को बुर्का पहने देखा। मुझे वह बड़ा अमानवीय लगा, जैसे उस मासूम बच्ची को जेल में डाल दिया गया हो। मेरी नज़र में यह एक बीमार समाज द्वारा की जाने वाली कार्यवाही है। बुर्के के पीछे का मूल विचार यह है कि पुरुष किसी महिला को देखकर अपनी यौनेच्छाओं पर काबू नहीं रख सकते, भले ही वह महिला एक दस साल की अबोध बच्ची ही क्यों न हो। क्या पुरुष वास्तव में अपने आपको काबू में रखने में इतने असमर्थ होते हैं? मुझे यह सोचकर बड़ा दुख होता है हालांकि वह बच्ची ऐसा महसूस नहीं करती होगी और न ही उसकी माँ या बहन। मैं जानता हूँ कि उसका समाज अपने दैनिक जीवन में इतनी गहराई से नहीं सोचेगा लेकिन मेरे लिए यह बहुत कठोर बात है और यह मुझे आम तौर पर सभी धर्मों पर और विशेषकर इस मज़हब पर सवाल उठाने के लिए मजबूर करता है।

मेरी नज़र में यह पूरी तरह तर्क-हीन बात है कि पहले तो महिला से बुर्का पहनने के लिए कहा जाए कि यह उन्हें पुरुषों से सुरक्षित रखेगा और अगर बलात्कार हो ही जाए तो दोष भी उन्हीं पर मढ़ा जाएगा। कुछ लोग तर्क करेंगे कि मुस्लिम समाज में और मुस्लिम देशों में बलात्कार की घटनाएं बहुत कम देखने में आती हैं। ऐसे देशों में, जहां इस्लाम के शरिया कानून लागू हैं, बलात्कार से पीड़ित महिला को आज भी चार पुरुषों कि गवाही का इंतज़ाम करना पड़ता है, जो पुष्टि करते हैं कि उसके साथ बलात्कार होता हुआ उन्होंने अपनी आँखों से देखा है, जैसे कि खुद पर हुए बलात्कार की दोषी वही हो! इसलिए आखिर अपने ऊपर हुए बलात्कार की रिपोर्ट वह करे ही क्यों? परिवार के पुरुष और महिलाएं सभी बलात्कार को छिपाना चाहते हैं-शर्म, कलंक और यहाँ तक कि बलात्कार के परिणामस्वरूप दी जाने वाली संभावित सज़ा का डर उन्हें सताता है। जी हाँ, इतनी बुरी तरह प्रताड़ित महिला अगर चार पुरुष गवाहों को हाजिर करने में असमर्थ रहती है तो प्रकरण खारिज हो जाता है और फिर दोष उसी पर मढ़ दिया जाता है।

जी नहीं, आपके कपड़े आप पर होने वाले बलात्कार का कारण नहीं हो सकते और किसी महिला को सर से पाँव तक एक काले लबादे में ढँक देना भी उसे बलात्कार से सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता, बल्कि उसकी संभावना बढ़ जाती है।

जी हाँ, मैं जानता हूँ कि बहुत सी मुस्लिम महिलाएं कहती हैं कि बुर्के में वे अपने आपको सुरक्षित महसूस करती हैं। प्रश्न यह है कि बुर्के के बगैर वे असुरक्षित क्यों महसूस करती हैं। कारण स्पष्ट है: क्योंकि यह आपका दोष है, उन बीमार-दिमाग धार्मिक लोगों का दोष जो खुले आम कहते हैं कि एक नाबालिग, छह साल की बच्ची को देखकर भी वे अपनी यौनेच्छा पर काबू नहीं रख पाते!

अगर आप चाहें तो मुझे धार्मिक रूढ़ियों के प्रति असहिष्णु कह लें लेकिन जब तक ऐसी स्थिति है मैं अपनी इस बात पर अडिग रहूँगा: अगर कोई धर्म औरतों से कहता है कि यौन दुराचार और बलात्कार से बचने के लिए वह अपने आपको ढँककर रखे तो यह गलत बात है और हमेशा गलत ही रहेगी और ऐसा धर्म भी मेरी नज़र में हमेशा गलत ही रहेगा।