अपने हाथ की मदद लें – आपको हस्तमैथुन करते हुए अपराधी क्यों महसूस नहीं करना चाहिए! 3 जून 2015

परसों मैंने आपको काम-वासना की अपनी परिभाषा संक्षेप में बताई थी और यह भी बताया था कि क्यों मैं समझता हूँ कि वह एक सुखद और अच्छी चीज है। उसके बाद कल मैंने बताया कि बढ़ती हुई बलात्कार की घटनाओं का कारण अश्लील फ़िल्में क्यों नहीं हैं-शायद आपमें से कुछ लोगों को इससे आश्चर्य हुआ होगा। वह सब सिर्फ काम-वासना और सेक्स के बारे में मैंने लिखा था-लेकिन आज मैं यौन तुष्टि प्राप्त करने के एक और तरीके के बारे में लिखना चाहता हूँ-हस्तमैथुन।

वास्तव में मेरे विचारों पर मुझे एक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। मैंने ज़िक्र किया था कि अपनी काम-वासना के शमन के लिए सबके पास विकल्प मौजूद होते हैं। एक व्यक्ति ने प्रतिक्रिया व्यक्त की: 'मैं नहीं मानता कि काम भावना बुरी चीज़ है। मैं सहमत हूँ कि यह एक नैसर्गिक अनुभूति है-लेकिन हस्तमैथुन नैसर्गिक नहीं है! वह पूरी तरह अप्राकृतिक है!'

दुर्भाग्य से यह गलत धारणा सर्वत्र व्याप्त है और सिर्फ भारत में ही नहीं कुछ अन्य देशों में भी। जब किशोर-किशोरियों को यौनेच्छा होने लगती है और वे उसे खुद अपने शरीर के ज़रिए जाँचना-परखना चाहते हैं, तभी से उन्हें ये झूठी बातें बता दी जाती हैं।

लड़कों को डराया जाता है कि जब भी उनका वीर्य स्खलित होता है, वे अपने जीवन की ऊर्जा (जीवनी शक्ति) का एक अंश खो बैठते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हर बार जब आप हस्तमैथुन करते हैं, अपने जीवनकाल का कुछ समय कम कर लेते हैं। अर्थात, ज़्यादा हस्तमैथुन करने पर आप लम्बी उम्र तक जी नहीं सकते। कुछ दूसरे अभिभावक अपने लड़कों को बताते हैं कि हस्तमैथुन से अंधत्व आता है। ये बच्चे जब किसी अंधे व्यक्ति को देखते होंगे तो पता नहीं क्या सोचते होंगे! 🙂

हमेशा लड़कियों से कहा जाता है कि अपने शरीर को न छुओ। खुद अपने शरीर के साथ कैसे सम्बन्ध हों, इस बारे में उन्हें अजीबोगरीब बातें सिखाई जाती हैं। जबकि लड़कों के लिए अधिक यौनेच्छा होना पुरुषत्व की निशानी माना जाता है, लड़कियों में उसे शर्मनाक और पाप माना जाता है। अपनी जननेन्द्रियों के बारे में कोई भी बात करना उनके लिए शर्म की बात होती है और ऐसा करना अपराध माना जाता है, यहाँ तक कि अपने मासिक धर्म के बारे में भी-अब आप ही बताइए, ऐसे माहौल में हस्तमैथुन कहाँ से स्वीकार्य होगा? जब माताएँ अपनी बच्चियों को सेक्स के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं बतातीं, सिवा इसके कि 'जो कुछ करना होगा, पति कर लेगा'? जब लड़कियाँ टैंपोन्स का प्रयोग नहीं करतीं या योनि में डालकर ग्रहण की जाने वाली दवाओं का प्रयोग नहीं करतीं क्योंकि वे अपने गुप्तांगों को छूना नहीं चाहतीं कि कहीं उनकी कौमार्य भंग न हो जाए?

तो मैं जानता हूँ कि मेरे लिखने से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला लेकिन हो सकता है, कुछ लोगों को इसमें सोचने-समझने के लिए थोड़ी-बहुत वैचारिक खुराक मिल जाए: हस्तमैथुन संसार का सबसे अधिक नैसर्गिक काम है! आप खुद आसपास के जानवरों को ध्यान से देखिए-वे हर समय यह सब करते रहते हैं! हमारे बगीचे में कुछ बंदर हैं, जो आपस में हर समय सेक्स करते रहते हैं और आसपास कोई न भी मिले तो भी, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता- वे अपने लिए राहत का उपाय ढूँढ़ ही लेते हैं!

मैं मानता हूँ कि हम बंदरों से कुछ अलग हैं-हालाँकि, जितना दिखाई देते हैं, उतना अलग भी नहीं हैं-लेकिन हस्तमैथुन मनुष्यों के लिए भी पूरी तरह प्राकृतिक है! यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि अगर कभी-कभी आप अपने कामोन्माद की तुष्टि स्वयं कर लेते हैं तो उससे कोई शारीरिक या स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ पैदा नहीं होतीं। इससे आप जल्दी नहीं मरने वाले और न ही आप अंधे होंगे। इसके विपरीत, यौनेत्तजना और उसका नैसर्गिक शमन आपके शरीर में बहुत से लाभप्रद हार्मोन्स, एंड्रोर्फ़िन्स आदि, भी पैदा करते हैं और उससे आपको सिर्फ विश्राम ही नहीं मिलता या तनाव ही दूर नहीं होता। उसके बाद आप अपने काम में अधिक एकाग्र हो सकते हैं, आपकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है और आप अधिक प्रसन्न महसूस करते हैं, क्योंकि आपने अपनी एक मूलभूत इच्छा और शारीरिक ज़रूरत पूरी की है!

आपकी जानकारी के लिए एक बात और बता दूँ कि आप मुझसे कितना भी कहें कि आप न तो हस्तमैथुन करते हैं और न ही कभी किया है, हम सब असलियत जानते हैं-यह काम सब करते हैं और सबने कभी न कभी यह किया होता है! हाँ, उसके लिए सबको अपराध-बोध अलग-अलग मात्रा में होता है!

स्वाभाविक ही, अगर आप ऐसे ईश्वर पर विश्वास करते हैं, जो आपको इस बात की सजा देता है कि आप अपने आपको अपने प्रयासों से खुश रख पा रहे हैं, तो यह आपकी मर्ज़ी है। ठीक है, अपने आपको पापी समझिए-लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि अगर आप उस पर विश्वास न करने का निर्णय कर लें तो आपका जीवन अधिक सुखद हो जाएगा!

ऐसा जीवन, जिसकी डोर पूरी तरह आपके हाथों में होगी – अक्षरशः!

कामुकता – एक आनंदित करने वाली नैसर्गिक अनुभूति – उसे बीमारी समझने वाले स्वयं बीमार हैं – 1 जून 2015

कुछ समय पहले मेरे एक परिचित ने अश्लील फिल्मों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी नज़र में ये फिल्में लोगों के मन में काम-वासना या कामोत्तेजना पैदा करती हैं और उसी का परिणाम है कि भारत में बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती चली जा रही हैं। संक्षेप में, वे सोचते हैं कि जितना ज़्यादा अश्लील फिल्में लोग देखेंगे, उतनी ही अधिक संख्या में महिलाओं पर बलात्कार होगा।

इससे पहले कि मैं और विस्तार में जाऊँ, मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ: कामुकता या कामोत्तेजना बुरी चीज़ कतई नहीं है। यह इंद्रियों में होने वाली एक नैसर्गिक संवेदना, अनुराग और एहसास है और वह सभी में पाई जाती है। पुरुष और स्त्रियाँ, शारीरिक रूप से सक्षम या अक्षम, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, यह हर एक व्यक्ति में मौजूद होती है। काम-वासना सब में है-सच यह है कि अगर आपमें नहीं है तो आपके शरीर में कोई न कोई विकृति है! हर एक में अलग-अलग परिमाण में काम-वासना पाई जाती है, जो उनके शरीर में मौजूद हार्मोन्स और निश्चित ही, मानसिक अवस्थाओं से उपजी भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर होती है।

सामान्य परिस्थितियों में भी वह आसानी से उत्पन्न हो जाती है। वास्तव में, एक मामूली विचार भी काम-वासना पैदा करने के लिए पर्याप्त है। इसके लिए फिल्म या किसी कामोत्तेजक फोटो या तस्वीर की ज़रूरत नहीं है! इसके अलावा, सामान्य बॉलीवुड या हॉलीवुड मूवी भी आपमें कामोत्तेजना या काम-वासना पैदा कर सकती है-या अपने कार्यालय में अपनी कुर्सी पर बैठे, कोई बिल्कुल अलग काम करते हुए भी महज एक विचार आपमें कामोत्तेजना पैदा कर सकता है! इसके विपरीत, अगर किसी व्यक्ति में कोई शारीरिक या मानसिक गड़बड़ी है और वह कामोत्तेजना महसूस नहीं कर पाता तो घंटो अश्लील फिल्में देखता रहे, उसे कभी, कोई कामोत्तेजना नहीं होगी!

न सिर्फ कामवासना नैसर्गिक है, वह वास्तव में बहुत खूबसूरत चीज़ भी है! काम-वासना की भावना से और खासकर जब आप उसे संतुष्ट कर देते हैं तो आप भीतर तक स्वतः ही खुशी और आनंद में डूबने-उतराने लगते हैं, परितुष्ट महसूस करते हैं, प्रेम की गहरी अनुभूति में सराबोर हो उठते हैं। काम-वासना आपको असीम प्रसन्नता और मुक्ति प्रदान करती है और मेरी नज़र में, वह बलात्कार जैसे घृणित अपराध का कारण हो ही नहीं सकती! इस उत्कट आनंद के साथ बलात्कार की कोई संगति नहीं बैठती। लेकिन इसके बारे में और अधिक विस्तार से कल लिखूँगा।

काम-वासना हमेशा से इस संसार का हिस्सा रही है। यह सर्वव्यापी है-साहित्य से लेकर कलाओं तक, घरों में मौजूद मूर्तियों से लेकर पूजास्थलों में उकेरी गई चित्रकारी तक। तकनीक के विकास के साथ इनकी प्रतिकृतियाँ सर्वसुलभ हो गई हैं, माउस के एक क्लिक के साथ आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर तुरंत हाजिर! लेकिन दुर्भाग्य से कामवासना या कामोत्तेजना के बारे में वही पुरानी समझ अब भी बरकरार है, उसमें रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं हुआ है।

आज भी बहुत से लोग काम-वासना को बुरी चीज़ समझते हैं। जितना अधिक वे कट्टर होते जाते हैं, काम-वासना, सेक्स और उसके आसपास मौजूद हर चीज़ को वे उतना ही अधिक बुरा समझते जाते हैं। कामुक होना बीमार मस्तिष्क होने का प्रमाण माना जाता है। एक स्वस्थ मस्तिष्क में ऐसे कामोत्तेजक विचार नहीं आ सकते और पाक-साफ़ शरीर में ऐसे एहसासात, ऐसी इच्छाएँ और वासनाएँ पैदा भी नहीं होनी चाहिए। अगर आप सेक्स का आनंद लेते हैं या उसके बारे में सोचते भी हैं तो अपने आपको अपराधी महसूस करना चाहिए। शारीरिक वासनाओं की अनुभूति का दमन किया जाना चाहिए। अतिधार्मिक लोग ब्रह्मचर्य की इसी धारणा पर विश्वास करते हैं। सन्यास के ज़रिए वे पवित्रता प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

मैं समझता हूँ कि यही वास्तव में रुग्ण सोच है। धर्म ने लोगों के मन में यह बात बिठा दी है कि कामुकता बुरी चीज़ है। यह पूर्वाग्रह ही लोगों को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार बनाता है! ब्रह्मचर्य पूरी तरह अप्राकृतिक विचार है। संभोग का दमन करके शुद्धि प्राप्त करने का दावा करना पूरी तरह अवैज्ञानिक है लेकिन धर्म इसकी परवाह नहीं करता!

यौनेच्छाओं का यही दमन पुरुषों और महिलाओं को उसकी खोज की ओर, उसकी अधिकाधिक जाँच-परख की ओर उद्यत करता है, भले ही यह वे ढँके-छुपे तरीके से करते हों। और उसके बाद वह कई रुग्ण तरीकों से फूट पड़ता है-यौन अपराध की शक्ल में, जिन्हें होता हुआ हम रोज़ देखते हैं, क्योंकि अपनी नैसर्गिक उत्तेजनाओं को बाहर निकालने का कोई रास्ता उनके पास नहीं होता!

कामुकता: सैकड़ों सालों से उसकी शोहरत एक मनोविकार के रूप, एक गर्हित अनुभूति के रूप में रही है और मेरे विचार में, इस धारणा को बदलने का वक़्त आ गया है!

नग्नता से अधिक नैसर्गिक और क्या हो सकता है? 7 सितम्बर 2014

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि सन 2006 में अपने स्वीडन प्रवास के दौरान आयोजित आध्यात्मिक उत्सव में मुझे कई लाजवाब दोस्तों से मुलाकात का मौका मिला। उनमें एक स्वीडिश दम्पति भी थे, जिन्होंने अपनी एक कार्यशाला आयोजित की थी और जो मेरी कई कार्यशालाओं में सहभागी हुआ करते थे। उस उत्सव के दर्मियान और बाद में भी उन्हें बेहतर ढंग से जानने का मुझे काफी मौका मिला। उस शानदार गर्मियों के बारे में आपको कुछ और विस्तार से बताना चाहता हूँ।

यह दम्पति मेरी तरह कार्यशालाएँ आयोजित करते थे मगर तरह-तरह के बहुत से विषयों पर। मैं उन्हें कभी बच्चों के साथ चित्रकारी करते देखता, कभी सहभागियों को नग्न शरीरों पर चित्रकारी करना सिखाते हुए और मुझे यह भी पता चला कि वे यौनिकता पर व्याख्यान भी दिया करते थे। मेरी कुछ कार्यशालाओं में आकर वे उनमें सक्रिय हिस्सा लेते और उनका पूरा लुत्फ़ उठाते।

कार्यक्रमों से अवकाश मिलने पर कभी-कभी हमें बात करने का मौका भी मिल जाता और कुछ समय बाद ही हम एक-दूसरे को बेहतर जानने लगे। वह फोटोग्राफर भी था और उसने मुझे बताया कि पिछले बीस सालों में एक भी दिन ऐसा नहीं गुज़रा जब उसने किसी न किसी चीज़ का कोई फोटो न लिया हो। अपनी कला के प्रति उसके समर्पण से मैं बहुत प्रभावित हुआ! उत्सव में भी वह फोटो लेता रहा था और बाद में मेरे भी कुछ फोटो लिए।

जब उन्होंने मुझसे पूछा कि उत्सव के समापन के बाद मेरा क्या कार्यक्रम है तो मैंने उन्हें बताया कि कुछ दिन मैं अवकाश पर हूँ और अगले हफ्ते तक यहीं रहूँगा और उसके बाद ही जर्मनी लौटूँगा। उन्होंने तुरंत मुझे अपने यहाँ, स्टॉकहोम आमंत्रित कर लिया, वह भी मेरे साथी संगीतज्ञ के साथ।

स्वाभाविक ही मैंने उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया और उत्सव समाप्त होते ही हम उनकी कार में बैठकर सीधे उनके घर, स्टॉकहोम की ओर रवाना हो गए।

उन्होंने मुझे घुमाया-फिराया, अपने कुछ दोस्तों से मिलवाया और इस देश को और करीब से जानने का मौका पाकर मैं बड़ा खुश हुआ! उत्सव के नैसर्गिक वातावरण के बाद मुझे अपेक्षा थी कि मैं फ्रैंकफर्ट जैसे किसी बड़े शहर जा रहा हूँ क्योंकि स्टॉकहोम स्वीडन की राजधानी है। लेकिन अपेक्षा के विपरीत मैं एक शांत मगर बहुत ही खूबसूरत जगह पर पहुँच गया था।

और सबसे बड़ी बात, यहाँ भी प्रकृति के इतना करीब! गर्मी के उस मौसम में मेरे मित्रों ने तैराकी का मज़ा लेने का कार्यक्रम तय किया। दस मिनट के भीतर हम सब बीच शहर से जंगल के प्राकृतिक वातावरण में पहुँच गए, जहाँ मेरे संगीतकार, मेरे मित्र दम्पति और उनके एक मित्र के सिवा कोई भी दिखाई नहीं देता था। हम जंगल के बीचोंबीच स्थित एक झील के किनारे पहुँच गए। हर तरफ चारों ओर हरियाली थी और सन्नाटा पसरा था।

मेरे मित्र तुरंत झील के बिल्कुल किनारे पहुँचे, अपने कपड़े उतारे और पानी में कूद पड़े। वहाँ पूरी तरह नंगे होकर तैरना उनके लिए इतनी सामान्य बात थी कि उसके बारे में उन्होंने दूसरी बार नहीं सोचा। बड़ी सहजता से सभी कपड़े उतारे और पानी में कूद पड़े! और उन्हें इतनी स्वाभाविकता से यह करते देख मुझे लगा कि यहाँ ज़्यादा संकोच करना या शर्म दिखाना हास्यास्पद होगा! तो मैंने भी जो कुछ भी मेरे शरीर पर था उतार फेंका और कूद पड़ा झील के साफ, शीतल जल में और बहुत देर तक उनके साथ नहाता रहा।

मेरा भारतीय संगीतज्ञ संकोच करता रहा और चड्डी पहने ही पानी में उतरा और ज़्यादा गहराई तक हमारे साथ नहीं आया क्योंकि वह तैरना नहीं जानता था।

पानी में तैरने का मेरे जीवन का वह सबसे अद्भुत अनुभव था! चारों तरफ निस्तब्धता व्याप्त थी और हम प्रकृति के साथ अठखेलियाँ कर रहे थे। दूसरा देखने-सुनने वाला लोई न था!

साधारणतया मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो न्यूडिस्ट बीचों पर सैर करना पसंद करते हैं। हालाँकि मैंने ऐसे बीच बहुत देखे हैं मगर वहाँ जाकर निःसंकोच अपने कपड़े उतारना मुझे रास नहीं आता। लेकिन यहाँ मामला कुछ दूसरा ही था! यहाँ ‘न्यूड बीच’ का कोई संकेतक नहीं लगा था और न ऐसी कोई हिदायत थी की आपको इस सीमा तक नंगा होना है या इस तरह नहाना या तैरना है और अगर कुछ पहनना ही है तो क्या पहनना है। सब कुछ प्राकृतिक था, पूरी तरह खुला और मुक्त!

डेनमार्क की इस यात्रा में मैंने जाना कि साधारणतया स्केण्डीनेवियन देशों के निवासी अधिक प्राकृतिक हैं और अपनी नग्नता को लेकर अधिक खुले और आज़ाद। मेरे लिए यह अनुभव चिर अविस्मरणीय रहेगा!

नग्नता की अधिकता आपके शिश्नोत्थान को कम करती है! 6 फरवरी 2014

मैंने कल कहा था कि बुर्के में ढँकी-छिपी महिलाओं के साथ भी बलात्कार होता है। कोई नहीं कह सकता कि वे अंगप्रदर्शक कपड़े पहनती हैं। जबकि यह सिद्ध करता है कि कपड़े बलात्कार का कारण नहीं हैं, वहीं यह उस तथ्य को भी उजागर कर देता है, जिसे मैं बार-बार दोहराता रहा हूँ: शरीर का वह अंग, जिसे आप हमेशा छिपाकर रखते हैं, आसपास के लोगों के लिए सेक्सी बन जाता है क्योंकि उसे वे अक्सर देख नहीं पाते। शायद यही बात थी जिसने एक व्यक्ति को यह कहने पर उद्यत कर दिया कि यौन उत्पीड़न पर काबू पाने के लिए भारत में नग्न कॉलोनियों की स्थापना कर देनी चाहिए!

भले ही इस राष्ट्रीय समस्या को सुलझाने के लिए यह कोई गंभीर सुझाव नहीं है, खासकर भारत जैसी यौन-कुंठित संस्कृति में। लेकिन उनकी यह बात एक सत्य की ओर इंगित अवश्य करती है और आज मैं इसी बात का विस्तार के साथ विश्लेषण करना चाहता हूँ।

किसी प्रासंगिक उदाहरण की खोज में मुझे विभिन्न पश्चिमी देशों के नग्न समुद्री बीचों की अपनी यात्राओं की याद आ गई, जहां नंग-धड़ंग पुरुष और महिलाएं घंटों धूपस्नान लेते रहते हैं। कुछ लोगों को यह हास्यप्रद लग रहा होगा कि अपनी यात्राओं में मैं ऐसे नग्न समुद्री बीचों पर भी जाया करता था, लेकिन मैं नहीं समझता कि यह कोई आश्चर्य की बात है। मैं सदा से ऐसे लोगों के साथ रहा हूँ, जो प्राकृतिक ढंग से जीने के हामी रहे हैं तथा अपने नंगे शरीर से अधिक प्राकृतिक और क्या होगा? और अब उस प्रश्न का मुख्य हिस्सा कि आप यह क्यों समझते हैं कि ऐसे बीचों पर जाना, जहां हर कोई नंगा है, एक अजीबोगरीब बात है? क्योंकि आप सोचते हैं कि वहाँ सभी पुरुष अपने उत्थित लिंगों के साथ आसपास लेटी नंगी औरतों की तरफ नज़रें गड़ाए घूर रहे होंगे!

अगर आप कभी ऎसी जगहों में गए हैं तो जानते होंगे कि इस बात में कोई सचाई नहीं है। मैं कई बार भीड़ भरे नग्न समुद्री बीचों पर गया हूँ, जहां पुरुष, महिलाएं, किशोर और बच्चे निस्संकोच घूमते दिखाई देते हैं। मैंने आज तक एक भी पुरुष नहीं देखा, जिसका शिश्न उन्नत दिखाई दे रहा हो।

क्यों? क्योंकि नग्नता एक बहुत स्वाभाविक बात है और जब सभी नग्न हैं तो फिर उसमें कोई विशेषता नहीं रह जाती, सारी कामुकता समाप्त हो जाती है कि शिश्नोत्थान हो जाए। इसीलिए ऐसे माहौल में किसी को यौन रूप से प्रताड़ित करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता।

समाज ने इन जननांगो के साथ शर्म को इस तरह से संयुक्त कर दिया है कि कई देशों के लोग नग्न बीचों, आरामगाहों और कॉलोनियों के बारे में सुनकर दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। उनके मुंह खुले के खुले रह जाते हैं, जब वे सुनते हैं कि दुनिया में ऐसी जगहें भी हैं जहां लोग शरीर पर बिना कुछ ओढ़े, आदमजाद नंगे घूमते-फिरते दिखाई देते हैं। जितना ही आप अपने शरीर को ढँकते हैं, जितना आप उसे छिपाते हैं उतना ही सेक्सी वह बन जाता है। कल को अगर आप अपने पैरों के नाखूनों को छिपाने लगें तो वह भी ज़्यादातर लोगों को उतना ही सेक्सी लगने लगेगा, जितना उन्हें ये जननांग आज लग रहे हैं।

जब आप किसी चीज़ को ढँक देते हैं तो लोग देख नहीं पाते कि उसमें कुछ भी विशेष नहीं है, उसमें कोई असाधारणता नहीं है, कि करोड़ों-अरबों पुरुषों और महिलाओं के पास वही है जो उनके पास है, वही शारीरिक अंग हैं, वही उत्तेजनाएँ, भावनाएँ और शारीरिक आवश्यकताएँ हैं। छिपाने पर उनकी यह उत्सुकता शांत नहीं होती।

अब यह मत समझिए कि अपनी बात को सही साबित करने के लिए मैं अपने आश्रम में नग्न लोगों का समाज स्थापित करने जा रहा हूँ। लेकिन संभव है भविष्य में किसी समय उस टिप्पणीकार की सलाह पर सरकारें खुद नग्न कालोनियों की स्थापना करें, जिससे यौन अपराधों पर रोक लगाई जा सके। जब तक यह नहीं होता तब तक भारतीयों को अपने भीतर बहुत से बदलाव लाने की जुगत करनी होगी!