हमें घनिष्ट रूप से जुड़ना पसंद है – एक कैनेडियन योग दल का आश्रम आगमन – 13 दिसंबर 2015

कैनेडियन योग दल

पिछले हफ्ते हम आश्रम में कुछ बहुत शानदार लोगों के साथ पूरी तरह व्यस्त रहे: हमारे आश्रम में कैनेडा से एक योग-दल आया था! मुझे कहना चाहिए कि एक बार फिर हमें अपना घर कुछ बहुत सुंदर लोगों के साथ साझा करने का अवसर मिला था!

तीन साल पहले एक योग शिक्षिका हमारे आश्रम में आई थी और उसने हमारे योग-अवकाश शिविर में हिस्सा लिया था। उस समय बहुत से दूसरे लोग भी यहाँ आए थे। उन्होंने यहाँ खूब मौज-मस्ती की थी और विश्रांति लेने के बाद तरोताज़ा होकर वापस गए थे। उनमें से दो लोगों का पुनः स्वागत करने का अवसर हमें इसी साल पहले ही मिल चुका था और यह ऐसा तीसरा सुअवसर था! जब से एलेक्सिस यहाँ से गई थी, उसे हरदम लगता था कि वह पुनः हमारे आश्रम अवश्य आएगी और संभव हुआ तो अपने कुछ साथियों को लेकर भी आएगी।

इस तरह बारह लोगों का एक दल, उसी दिन हमारे आश्रम पहुँचा जिस दिन हम खुद अपनी जर्मनी यात्रा से वापस आए थे। यह दल हमारे योग-विश्रांति शिविर में हिस्सा लेने आया था। हमें ऐसे संबंध बनाना बहुत पसंद है और यह और भी अच्छा लगता है, जब वे कई दूसरे लोगों को लेकर भी आते हैं, ऐसे लोगों को, जो शायद अकेले भारत आने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे!

हमने उनके लिए ताजमहल देखने का इंतज़ाम किया था, जो दिन भर का आगरा प्रवास था। और एक दिन वे हमारे छोटे से शहर के बाज़ारों में घूमते-फिरते रहे, मंदिर देखे और आसपास के दर्शनीय स्थलों का दौरा किया। लेकिन ज़्यादातर समय वे आश्रम की दिनचर्या का जायज़ा लेते हुए गुज़ारते थे। वे आश्रम की दैनिक गतिविधियों से इतने प्रभावित थे कि न सिर्फ उसे बारीकी से देखने-समझने की कोशिश करते बल्कि खुद भी उसके साथ अंतरंग रूप से जुड़ने की और उसके अनुसार ढलने की कोशिश भी करते। स्कूल देखने के बाद वे बच्चों को खाना परोसने में मदद करने लगे, बच्चों की योग कक्षा में शामिल हुए और निश्चित ही, हमने आश्रम में तैयार सुस्वादु भोजन भी साथ-साथ किया। मैं उन्हें अपना निर्माणाधीन रेस्तराँ दिखाने ले गया और उसे लेकर हमारी योजना की जानकारी दी। इसके अलावा, सबने आयुर्वेदिक मालिश और विश्रांति संबंधी उपचार की सेवाओं का लाभ उठाया और शरीर के उन बिंदुओं पर ख़ास वर्जिश की, जहाँ अक्सर दर्द हो जाया करता है।

हमारे मित्र ने और उनके सहयोगी ने मिलकर अपनी योग कक्षाएँ लीं और कुछ और सामूहिक सत्रों का संचालन किया और एक दिन मैंने भी सत्र में शामिल होकर समूह के सदस्यों के साथ बातचीत की। एक आध्यात्मिक गुरु और उपदेशक के रूप में बिताई गई अपनी पिछली ज़िंदगी के अनुभव उनके साथ साझा किए और बताया कि वहाँ से निकलकर आज तक की-जो कुछ भी मैं बन सका हूँ, उसकी- यात्रा कैसी रही।

वास्तव में उन बहुत ख़ास लोगों के साथ हमारा समय बड़ा शानदार बीता। कल दोपहर बाद कैनेडा की फ्लाइट पकड़ने के लिए उन्होंने आश्रम से बिदा ली। गुडबाय कहते हुए बहुत सी आँखों में एक साथ आँसू आ गए-और हम अभी से सोचने लग गए हैं कि वे जल्द से जल्द यहाँ आएँ और हमें उन लोगों का स्वागत करने का मौका मिले।

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि खुले दिल के, खुशमिजाज़ लोगों से और उन लोगों से, जिनमें नई से नई बातें जानने की उत्सुकता होती है और जो भारत को भीतर से जानना चाहते हैं, मुलाक़ात हमेशा एक अद्भुत अनुभव होती है। वे खुश हैं, भारत में आकर और हमसे मिलकर आनंदित हैं, यही हमारा पुरस्कार है-और मैं जानता हूँ, वे भी आश्रम में बिताए समय की कुछ बेहद अविस्मरणीय यादें लेकर घर जा रहे हैं!

yoga

आपके हवाई जहाज़ पर एक बच्चा रो रहा है? क्या करना चाहिए और क्या नहीं? 17 नवंबर 2015

पिछले शुक्रवार को 7 घंटे की हवाई यात्रा के बाद आज मैं आपसे सिर्फ यूँ ही एक बात पूछना चाहता हूँ: क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी हवाई यात्रा में किसी रोते हुए बच्चे के आसपास बैठे हों या वह आपके साथ वाली सीट पर ही बैठा हो? सिर्फ इतना करें कि आपकी किसी हरकत से बच्चे के रोने की असुविधाजनक स्थिति में फँसे माँ-बाप पर कायम मानसिक दबाव और अधिक न बढ़े!

यह न समझें कि अपरा हल्ला मचा रही थी इसलिए मैं ऐसा कह रहा हूँ। जी नहीं, जैसा मैंने पहले बताया, वह तो पूरे हवाई सफर में सोती रही थी! लेकिन यह सच है कि इस हवाई सफर में हमारे साथ बहुत से बच्चे थे, शायद इसलिए कि दो दिन पहले ही दीवाली के समारोह समाप्त हुए थे। बहुत कम लोग इतनी जल्दी भारत छोड़कर जा पाए होंगे और जो परिवार अब जाने लगे थे, उनके साथ, स्वाभाविक ही, बहुत से छोटे-छोटे बच्चे थे!

विमान में हमारे आसपास लगभग पाँच बच्चे थे और पीछे से भी कुछ बच्चों की आवाज़ें आ रही थी। जिन लोगों ने बहुत सारे छोटे बच्चों के साथ हवाई यात्रा की है, जानते होंगे कि उनमें से किसी न किसी एक बच्चे को प्लेन में चढ़ना ही बहुत अप्रिय लग रहा होता है। वह अपना असंतोष तेज़ और तीखे स्वर में चीखते-चिल्लाते हुए व्यक्त करता है-और उसका रोना किसी तरह सोने की कोशिश कर रहे सहयात्रियों के मनोरंजन का साधन बन जाता है।

ऐसी परिस्थिति में निश्चित ही आपको आसपास के लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सुनने को मिलेंगी: उनमें से कुछ तो जैसे कान बंद कर लेते हों या बहरे हो, विमान में पहले से व्याप्त कोलाहल में एक और स्वर के योग से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता-वे लोग अपने काम में लगे रहते हैं और बगल में हो रही चीख-चिल्लाहट से पूरी तरह अलिप्त रहे आते हैं। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि अधिकांश माँओं-बापों को ऐसे लोग सबसे अधिक भाते होंगे!

एक और तरह की प्रतिक्रिया होती है, जिसे भी सामान्यतया पसंद किया जाता है: आसपास का कोई अजनबी न जाने किस कारण से रोते हुए बच्चे का ध्यान बँटाने के लिए तरह-तरह के उपाय करता नज़र आता है। कभी-कभी यह उपाय काम कर जाता है लेकिन कई बार समस्या उससे बदतर होती है, अरुचि भयंकर होती है, प्रयास विफल ही नहीं होते, कई बार समस्या और बिगड़ जाती है। ज़्यादातर अभिभावक आपके प्रयासों पर खुश ही होंगे इसलिए एकाध बार यह प्रयास अवश्य कर सकते हैं!

कुछ व्यक्ति तीसरी श्रेणी में आते हैं और मैं विनती करना चाहता हूँ कि इस श्रेणी में आपकी गिनती कभी न हो! वे लोग जो, स्वाभाविक ही, नाराज़ होने लगते हैं। देखिए, मैं समझ सकता हूँ कि आप थके होंगे, न तो आप सो पा रहे हैं और न ही शांतिपूर्वक हवाई यात्रा में मनोरंजनार्थ उपलब्ध अपना मनपसंद कार्यक्रम ही देख पा रहे हैं। वहाँ मौजूद लोगों में कोई भी ऐसा नहीं कर पा रहा है। बहरहाल, बच्चे के अभिभावक भी नहीं कर पा रहे हैं। वे इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि उनके बच्चे का तेज़ स्वर में रोना-चिल्लाना आपको परेशान कर रहा है और वे भरसक कोशिश कर रहे हैं कि बच्चा किसी तरह बहल जाए। लेकिन उनकी ओर बार-बार ताकती आपकी गुस्साई नज़रें, जानबूझकर गहरी साँसें भरकर अपनी हताशा का प्रदर्शन या उन्हें सुनाते हुए आपका कोई कटाक्ष करना, इत्यादि समस्या में ज़रा सा भी सुधार नहीं ला सकते!

इसके विपरीत, आपकी एकमात्र उपलब्धि यह होती है कि आप बच्चे के एक अभिभावक को चिंताग्रस्त कर देते हैं और दूसरे को नाराज़ और इस प्रकार आप दोनों पर अतिरिक्त मानसिक बोझ डाल देते हैं और नतीजतन बच्चा और अधिक रोने-चिल्लाने लगता है। असल में बच्चे इस बात को ठीक-ठीक महसूस कर लेते हैं कि कब उनके माता-पिता आपा खो रहे हैं और यह उन्हें असुरक्षित कर देता है और वे घबरा जाते हैं-कुल मिलाकर नतीजा यह होता है कि आप अपने व्यवहार से बच्चे को और अधिक रोने-धोने के लिए उद्यत कर देते हैं!

तो कृपया इस बात को समझें कि बच्चा बेहद थक गया है, आसपास इतने सारे लोगों को देखकर, कर्कश आवाज़ों के कारण और अजनबी वातावरण में बुरी तरह डर गया है। हो सकता है, आम तौर पर बच्चों को हवाई यात्रा में पेश आने वाली इअर प्रेशर की समस्या का सामना हो या सम्भव है, वह यह न समझ पा रहा हो कि उसके प्यारे माता-पिता इस भयानक जगह क्यों आ गए हैं जबकि घर में गर्म और नरम बिस्तर सहित सारी सुख-सुविधाएँ हासिल थीं!

हर व्यक्ति जानता है कि एक नन्हे बच्चे के लिए यह कतई आदर्श परिस्थिति नहीं है। कोई भी अभिभावक अत्यधिक प्रसन्न और संतुष्ट होगा यदि उनका बच्चा शोरगुल और सैकड़ों लोगों की भीड़ के बीच ज़रा सी बंद जगह में बिना किसी नखरे के या बिना रोए-धोए यात्रा कर ले। इसलिए एक-दूसरे के साथ सौजन्यता के साथ पेश आएँ, एक दूसरे को और एक-दूसरे की परिस्थितियों को थोड़ा बेहतर ढंग से समझने की कोशिश करें और संयत और शांतचित्त बने रहें। मैँ आपको विश्वास दिलाता हूँ कि बच्चा भी इस बात को समझेगा और थोड़ी देर में स्थिरचित्त हो जाएगा! फिर वह हम सब लोगों के लिए सुखद और आरामदेह विमान-यात्रा सिद्ध होगी। जमकर बैठिए, शांत रहिए, शोर को बाहर भगाइए और हर तरह के रोमांच और उत्तेजना के साथ जीवन का मज़ा लीजिए!

जर्मनी जाने की तैयारियाँ – 12 नवंबर 2015

कल के शानदार दीवाली समारोह के पश्चात आज हम एक बिल्कुल अलग तरह की तैयारियों में व्यस्त हो गए थे: रमोना, अपरा और मैं कल जर्मनी के लिए रवाना होंगे! हमें आधी रात के बाद दिल्ली से उड़ान भरनी थी लिहाजा हम आज ही यात्रा की सारी तैयारियाँ कर लेना चाहते थे!

खैर, सारी तो नहीं लेकिन जहाँ तक संभव हो सकता था। रमोना काफी ज़ोर-शोर से तैयारियों में लगना चाहती थी लेकिन इस बीच आश्रम में चल रही अनेकानेक गतिविधियों के बीच वह तैयारियों की शुरुआत भी नहीं कर सकी। फिर भी कम से कम हम इतना तो कर ही पाए कि जर्मनी के ठंडे मौसम से बचाव के लिए अपनी सभी सूटकेसें गरम कपड़ों से भर लें!

निश्चित ही, अपरा ने भी अपना सूटकेस अच्छी तरह तैयार कर लिया है! वही सबसे ज़्यादा उत्सुक भी थी! बहुत दिनों से सुबह की शुरुआत ही उसके इस प्रश्न से होती थी: "हम जर्मनी कब जाने वाले हैं?" और सारा दिन वह बार-बार यात्रा के बारे में पूछती रहती थी। दोपहर के भोजन के समय वह आश्रम के दूसरे बच्चों से कहती कि हम जर्मनी में रोटी नहीं खाएँगे, ब्रेड खाएँगे। वह अपने खिलौनों को रोज़ गौर से देखती है और तय करती है कि कौन से खिलौने ले जाने हैं और किन्हें यहीं छोड़ना है। नए कपड़े पहनना उसने बंद कर दिया है क्योंकि उन्हें हमने जर्मनी में पहनने के लिए खरीदा था। और सबसे बड़ी बात, उन गतिविधियों की लंबी फेहरिस्त बनाई जा रही है कि जर्मनी जाकर क्या-क्या मस्ती करनी है, कहाँ कहाँ जाना है, इत्यादि, इत्यादि!

पिछले दो दिनों से अपरा थोड़ी थकी-थकी सी लग रही थी, उसे ठंड लग गई थी और तेज़ सर्दी और ख़ासी से वह बहुत परेशान थी। कल उसे बुखार भी था लेकिन आज वह ठीक लग रही है। रमोना और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि हमें बीमार बच्चे के साथ हवाई यात्रा का पहले से अनुभव है लेकिन निश्चित ही मैं ऐसी यात्रा बार-बार नहीं करना चाहूँगा!

लेकिन क्योंकि वह अब काफी ठीक है, हमें विश्वास है कि कल वह हवाई यात्रा का पूरा आनंद ले पाएगी और क्योंकि यह फ्लाइट दिन में है तो वह आसपास के वातावरण को भी मन भर देख सकेगी और उसे अधिक से अधिक जज़्ब कर सकेगी!

मैं अब आपसे यहीं बिदा लेता हूँ और कल जब मैं सुरक्षित जर्मनी पहुँचूँगा, तभी मैं अपना अगला ब्लॉग लिखूँगा!

जीवन का आनंद लेते हुए खुद को अपराधी महसूस न करें! 5 अक्टूबर 2015

कई बार मुझे अपने ब्लॉग के विषय उन लोगों से बातचीत के दौरान प्राप्त होते हैं जो किसी न किसी ऐसी समस्या से दो-चार हो रहे होते हैं जो बहुत से दूसरे लोगों की समस्या भी हो सकती है। ऐसी ही एक समस्या के विषय में आज मैं लिखना चाहता हूँ: एक मेहमान आश्रम आई थी जो यह निर्णय नहीं ले पा रही थी कि आगे कहाँ जाए। उसका कार्यक्रम पहले से तय था, उसके पास और भी विकल्प थे और वह अपने पसंदीदा स्थानों की यात्रा भी करना चाहती थी-लेकिन क्या वह इतना स्वार्थी हो सकती थी कि अपनी मनचाही जगह चली जाए?

इस महिला ने बड़ा मददगार स्वभाव पाया था और वह कुछ संगठनों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थी। अपने खाली समय में वह स्वैच्छिक रूप से चैरिटी का काम किया करती थी, अपने देश में भी और तीसरी दुनिया, अफ्रीका और भारत में। पैसे कमाने के लिए वह एक बड़ी कंपनी में काम करती थी और बड़ी खुश थी कि इस बार उसे पूरे छह हफ्ते का अवकाश मिला है। इतना लंबा अवकाश उसे पहले कभी नहीं मिला था। वह घूम-फिरकर उन जगहों को देखना चाहती थी जहाँ वह पहले खुद सेवा-कार्य कर चुकी थी।

क्योंकि वह एक सुरक्षित वातावरण में रहकर भारत को जानना-समझना चाहती थी इसलिए सबसे पहले एक सप्ताह उसने हमारे साथ बिताया। अपने अंतिम दो सप्ताहों को छोड़कर बाकी समय का उसने कोई पक्का कार्यक्रम नहीं बनाया था। इन दो सप्ताहों में वह पश्चिम बंगाल के एक चैरिटी संगठन के लिए, जिसकी मदद वह पिछले कई साल से कर रही थी, कुछ स्वैच्छिक सेवा-कार्य करना चाहती थी। वह एक अनाथाश्रम में बच्चों को पढ़ाना चाहती थी। इस बीच वह खाली थी लेकिन जब वह हमारे यहाँ रह रही थी, यह निर्णय करने में कि कहाँ जाए, उसे बड़ी परेशानी हो रही थी।

उसे समुद्र से बड़ा प्रेम था और केरल, गोवा में भारत के बहुत से सुहाने समुद्र किनारों को उसने देख रखा था-वास्तव में उसकी इच्छा वहीं, किसी बीच में जाकर पाम वृक्षों की छाया में लेटकर विश्राम करने की थी। लेकिन उसके सामने पहले अनाथाश्रम जाकर बच्चों को पढ़ाने का विकल्प भी था या किसी दूसरे चैरिटी में शामिल होकर विकलांग बच्चों के किसी स्कूल में पढ़ाने का।

वह इन विकल्पों के बीच पिस रही थी: वास्तव में वह कामों से कुछ दिनों का विराम लेकर समुद्री बीच के खुशनुमा एहसास का आनंद लेना चाहती थी लेकिन इससे उसे अपने स्वार्थी होने का एहसास होता था, बल्कि लगता था, जैसे वह बहुत आत्मकेंद्रित व्यक्ति है जो चैरिटी कार्यों के अपने दोनों विकल्पों को छोड़कर अपना समय और पैसा अपने सुख और आनंद पर खर्च कर रही है!

मैंने उससे कहा कि वही करो, जो तुम्हारा दिल चाहता है। अगर तुम्हारी इच्छा है कि बीच पर जाकर विश्राम किया जाए, तो वही करो। अपराधबोध के इस हास्यास्पद एहसास को खुद पर हावी न होने दो, उसे इस बात की इजाज़त मत दो कि तुम्हें ही निर्देश देने लगे। मुझे गलत मत समझो, मैं खुद चैरिटी का काम करता हूँ और उसमें सबकी मदद का स्वागत है-मगर तुम खुद भी महत्वपूर्ण हो! यह पैसा कमाने के लिए तुमने बहुत श्रम किया है। कंपनी की व्यस्त नौकरी में तुमने बहुत तनाव झेला होगा और इस प्रवास के बाद वापस जाकर फिर तुम्हें अपने आपको उसी में झोंक देना है। इतना करने के बाद तुम्हारा विश्राम करने का पूरा हक़ है।

वैसे भी तुम कुछ समय बाद दो हफ्तों तक बच्चों को पढ़ाने वाली ही हो! इस काम में भी बहुत ऊर्जा खर्च होती है और जब तुम पर्याप्त विश्राम कर लोगी तभी तुम्हें वह ऊर्जा प्राप्त होगी! अगर तुममें ऊर्जा बचेगी ही नहीं तो तुम क्या पढ़ा पाओगी!

इस बात के लिए कभी खुद को अपराधी मत समझो कि आपके पास दूसरों से अधिक है। क्योंकि अधिक है, इसीलिए आप दूसरों को दे पा रहे हो-लेकिन आपको अपनी चिंता भी करनी चाहिए, अपना खयाल रखना चाहिए। दूसरों को खुश करने के लिए खुद को दुखी मत करो! इस तरह काम नहीं चलता!

भारत के विभिन्न इलाकों में एक सप्ताह का सफर – 19 जुलाई 2015

मेरा पिछला सप्ताह लगातार यात्राओं का रहा! पहले काफी समय से मैं भारत में सिर्फ दिल्ली विमान तल से आश्रम और आश्रम से दिल्ली की यात्राएँ ही करता रहा था पर इस बार भारत में मैंने एक सप्ताह में कई हज़ार किलोमीटर का रास्ता तय किया!

सप्ताह की शुरुआत हुई सोमवार से, जब मैं सबेरे-सबेरे हवाई जहाज़ से गौहाटी के लिए निकल पड़ा। गौहाटी उत्तर-पूर्वी भारत के राज्य, असम का सबसे बड़ा शहर है और दिल्ली के पूर्व में 2000 किलोमीटर दूर स्थित है और जहाँ पहुँचने में हवाई जहाज़ से अढ़ाई घंटे लगते हैं। मैं वहाँ सबेरे पहुँचा और सात घंटे बाद, शाम तक वापस भी आ गया। क्यों? बाँस के लिए!

आपको पता होगा कि हम अपने आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी'ज़ की सजावट के लिए बाँस का इस्तेमाल कर रहे हैं। तो, बाँस विषयक अधिक जानकारी के लिए, उसके नमूने देखने और कुछ ऐसे लोगों से मिलने के लिए, जो बाँस का काम और उसका व्यापार करते हैं, मैंने एक दिन में पश्चिम से पूर्व पूरे देश को पार किया और वापस आया। स्वाभाविक ही, आश्रम वापस पहुँचते ही मुझे थकान महसूस होने लगी!

सोमवार की गतिविधियों की जानकारी लेते हुए, आराम करते हुए और अगले कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाते हुए दो दिन मैंने वृंदावन में बिताए। हमेशा की तरह तुरत-फुरत प्लान-क्योंकि गुरुवार को सबेरे रमोना, अपरा और मैं कार से उत्तर भारत की ओर, हिमालय की तरफ निकल पड़े।

हमारा लक्ष्य हिमालय की तराई में स्थित भारत के उत्तरी राज्य, उत्तराखंड का एक क़स्बा, कोटद्वार था। यह 300 किलोमीटर की सड़क यात्रा थी- छह घंटे में हम वहाँ पहुँच गए। बाँसों के काम के लिए प्रसिद्ध एक और स्थान, इस बार एक उपचार संयंत्र, जहाँ बाँसों को जलरोधक बनाया जाता है और उसे कीटाणुओं से बचाने के रासायनिक उपाय किए जाते हैं।

वहाँ लोगों से मुलाक़ात और चर्चा के बाद हमने हरिद्वार की ओर प्रस्थान किया, जो गंगा नदी के किनारे बसा शहर है और जहाँ हमने वह रात और अगली रात बिताने का निश्चय किया। लेकिन दूसरे दिन हमने आम पर्यटकों की तरह दृश्यावलोकन में समय नहीं बिताया। हमारे पास ऋषिकेश के कुछ पते थे, जहाँ जाकर हम कुछ देखना चाहते थे। पुनः बाँसों के लिए ही! उन्होंने बाँसों का उपयोग भवन निर्माण के लिए किया था और हम देखना चाहते थे कि उन्होंने यह किस तरह किया है- वास्तव में हम एक और जानकारी प्राप्त करना चाहते थे और कुछ हद तक, हम जो अपने रेस्तराँ में करने जा रहे हैं, उससे तुलना करना चाहते थे। तो हम वहाँ गए, गंगा पार की, विभिन्न लोगों से मुलाक़ात और चर्चा की और अंत में वापस होटल आ गए। वास्तव में यह छुट्टियाँ बिताने जैसा नहीं था लेकिन अपरा ने इस दौरे का पूरा-पूरा मज़ा लिया और भरपूर समय बिताया- उसे वहाँ स्वीमिंग पूल में तैरने का मौका मिला और बहुत सारे नूडल्स खाने को मिले!

कल शाम को हम वापस आश्रम आ गए- लेकिन मैं देर तक सो न सका: सुबह उठकर मैं एक और यात्रा पर निकल गया, इस बार 200 किलोमीटर दूर, हापुड़, जो हमारे इलाके में बाँसों की सबसे बड़ी मंडी है। वहाँ मुझे देश भर के कई तरह के बाँस देखने का मौका मिला- और जिस तरह का बाँस हमें चाहिए था, वहाँ मिल भी गया।

यह सप्ताह काफी सफल रहा और मैं अब बहुत थक गया हूँ लेकिन मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा है। मुझे लग रहा है जैसे मैं अभी भी कार में ही हूँ, यात्रा कर रहा हूँ और कल मुझे धीरे-धीरे अपने योगासन करने होंगे, विशेष रूप से अपनी मांसपेशियों के लिए आवश्यक योगासन- लेकिन कुल मिलाकर सब कुछ बड़ा अच्छा रहा!

आप पूछेंगे, यह सब हमें खुद क्यों करना पड़ा! यह मैं आपको बाद में कभी बताऊँगा कि क्यों मुझे खुद देश भर में घूम-घूमकर इस काम को इस तरह सम्पन्न करना पड़ा।

यहाँ आप हमारी हरिद्वार यात्रा के कुछ चित्र देख सकते हैं

अपरा की पहली यात्रा, जिसमें माँ और पा उसके साथ नहीं थे – 13 जुलाई 2015

बच्चों के लालन-पालन के दौरान आप बहुत से अनुभव 'पहली बार' करते हैं। पिछले हफ्ते रमोना और मुझे एक बहुत बड़ा अनुभव हुआ: साढ़े तीन साल में पहली बार हमारी बेटी हमारे साथ हमारे बिस्तर पर नहीं सोई, पहली बार वह हमारे बगैर किसी यात्रा पर चली गई!

जी हाँ, अपरा बिना माँ और पा के एक लम्बी यात्रा पूरी कर वापस आ गई है। हर साल मेरी नानी को अपनी पेंशन लेने अपने गृहनगर जाना पड़ता है। उनके पति सरकारी मुलाजिम थे इसलिए उन्हें फैमिली पेंशन मिलती है- लेकिन पेंशन उन्हें वहीं से प्राप्त करनी पड़ती है, जहाँ वे पहले रहा करते थे और यह जगह है, मध्यप्रदेश के खजुराहो के पास स्थित एक शहर!

आश्रम में ठहरी हुई एक मेहमान, हाना ने भी वहाँ साथ जाने का इरादा कर लिया! और इस तरह नानीजी, पूर्णेन्दु, हाना और नानीजी की देखभाल के लिए एक महिला कर्मचारी- और हाँ, अपरा भी- पिछले बुधवार को प्रातः कार से खजुराहो की ओर निकल पड़े।

जब से वहाँ जाने का कार्यक्रम बना, अपरा ने ज़िद पकड़ ली कि इस बार चाचा के साथ वह ज़रूर जाएगी! पहले भी वह कई बार मचलती रहती थी मगर तब पूर्णेन्दु के साथ मेहमान होते थे और उसे गाइडेड टूर पर उनके साथ देश भर के लंबे सफर पर और काफी समय के लिए जाना होता था, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं था और फिर नानी भी और उसकी और आश्रम की एक विश्वस्त पारिवारिक सदस्य भी साथ रहने वाली थी। लिहाज़ा हम मान गए- हालांकि हल्के संदेह के साथ कि क्या वह हमारे बगैर जाएगी और क्या हमारे बगैर तीन दिन रह लेगी!

लेकिन अब लगता है, हम व्यर्थ चिंता कर रहे थे! वह तो जाने के लिए इतना व्याकुल और उत्साहित थी कि घर में रहने की बात भी सुनना नहीं चाहती थी! हमने उसे बार-बार बताया कि रात को उसे चिपटाकर सुलाने के लिए न तो माँ रहेगी, न पा। 'कोई बात नहीं, मैं मुन्नू चाचा से चिपटकर सो जाऊँगी!,' उसका जवाब होता। हम सोच रहे थे कि ऐन निकलते वक़्त शायद वह अपना इरादा बदल देगी लेकिन पता चला, हम कितना गलत सोच रहे थे: वह तो नानी से भी पहले फुदककर कार में बैठ गई और जब कार चल पड़ी, ख़ुशी के मारे पीछे वाली खिड़की से देर तक हाथ हिला-हिलाकर बाय बाय करती रही!

उस दिन पूरे समय और दूसरे दिन भी पूर्णेन्दु हमारी बिटिया के फ़ोटो भेजता रहा, जिनमें वह कभी हाथ हिला रही होती तो कभी तरह-तरह के पोज़ बनाकर हँसती-खिलखिलाती नज़र आती- ग्वालियर के किले के सामने, खजुराहो के किसी मंदिर की सीढ़ियों पर, पांडव जलप्रपात के सामने, होटल के स्वीमिंग पूल में नहाती और एक हाथी पर चढ़ी हुई!

वह तो आनंदमग्न, अपनी यात्रा के रोमांच का पूरा-पूरा मज़ा ले रही थी! लेकिन क्या वह यहाँ से भागकर चली गई थी और अपने माँ-पा को मिस भी नहीं कर रही है? निश्चय ही एक साढ़े तीन साला बच्चे के साथ यह हो ही नहीं सकता था! पहले दिन, रात को स्काइप पर चाचा की गोद में बिसूरती एक बच्ची का वीडियो कॉल प्राप्त हुआ, ‘अब मैं आप लोगों के पास आना चाहती हूँ!’ और उसके गालों पर आँसुओं की कुछ बूंदें लुढ़क पड़ीं! यह देखकर माता-पिता का दिल न डूबने लगे, संभव नहीं है! लेकिन फिर थोड़ी समझाइश और चतुर चाचा की तरफ से किए गए मनबहलाव के उपायों ने आखिर उसे नींद की गोद में धकेल ही दिया। और फिर दूसरे दिन कोई समस्या पेश नहीं आई!

और शुक्रवार को तीन दिन का शानदार समय बिताकर वे सब वापस भी आ गए! हमसे दूर दो रातें- लेकिन रोमांच और मौज-मस्ती से भरे तीन दिन- हमारी बिटिया अब वाकई काफी बड़ी हो गई है!

हाँ, लेकिन उसके बगैर हमें यहाँ कैसा लग रहा था? सोचता हूँ, कल का ब्लॉग इसी प्रश्न पर न्योछावर किया जाए!

अपरा की इस रोमांचक यात्रा के कुछ चित्र आप यहाँ देख सकते हैं।

कृपया इसे अवश्य पढ़ें यदि आप रोजमर्रा की जिन्दगी से बचने के लिए छुट्टियाँ मनाने जाते हैं! 2 फरवरी 2015

कल मैंने आपको सारांश में बताया था कि जब मैं छुट्टियाँ बिताने कहीं बाहर जाता हूँ तो मैं क्या महसूस करता हूँ। मैं जानता हूँ कि छुट्टियों के बारे में मैं दूसरों से कुछ अलग विचार रखता हूँ। और मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि कई लोग जब अपनी छुट्टियों के बारे में बताते हैं तो लगता है जैसे वे कुछ गलत काम कर रहे हों। अपनी छुट्टियों को लेकर नहीं बल्कि अपने दिनचर्या को लेकर!

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मुझे छुट्टियाँ पसंद हैं। मुझे पत्नी के साथ किसी दूसरे शहर जाकर छुट्टियाँ मनाना पसंद है, वहाँ जाकर बिना किसी निश्चित कार्यक्रम के अपनी मर्ज़ी से कुछ दिन गुज़ारना पसंद है, यह सोचकर ही मुझे बड़ा अच्छा लगता है कि अगर हम चाहेंगे तो किसी होटल में सारा दिन अकेले रहकर गुज़ार सकते हैं और अपने मनपसंद रेस्तराँ में रात का खाना खा सकते हैं। मैं ये सब बातें पसंद करता हूँ-लेकिन यह मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। मैं अपनी छुट्टियों के अधीन नहीं हूँ। मेरा पूरा साल मेरी छुट्टियों पर केन्द्रित नहीं है। जब हम वापस लौटते हैं तो हम बात करते हैं कि छुट्टियाँ कितनी अच्छी रहीं और अपने काम पर लग जाते हैं।

मैंने कुछ दिन पहले ही आपको बताया था कि मैं अपने काम से प्यार करता हूँ। सिर्फ काम से ही नहीं, अपने जीवन से, अपने आश्रम से, अपने स्कूल से, अपने चैरिटी के काम से, अपने व्यवसाय से, अपने परिवार, दोस्तों, मिलने-जुलने वालों, बच्चों और अपने मेहमानों से। और मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जो ऐसा महसूस नहीं करते। जो अपने सामान्य जीवन में अपने रूटीन से खुश नहीं हैं।

आश्रम से बिदा लेते समय अकसर लोगों की आँखें भर आती हैं। स्वाभाविक ही हम यह जानकर खुश होते हैं कि आश्रम में उनका समय बहुत अच्छा रहा और दुनिया के इस कोने में बने अपने मित्रों को छोड़कर जाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है और इस कारण उनकी आँखों में आँसू आ गए! लेकिन कभी-कभी ये आँसू निश्चित रूप से यह नहीं बताते कि यहाँ उनका समय अच्छा रहा बल्कि यह बताते हैं कि आगे आने वाला समय अच्छा नहीं होगा! घर जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा होता और उन्हें दुख होता है कि अब उन्हें वहीं वापस जाना होगा।

चाहे वह उनका काम हो, व्यवसाय हो, उनकी पारिवारिक स्थिति हों या सामान्य अकेलापन या जीवन से असंतोष हो-उनकी छुट्टियाँ उनके लिए खुशियाँ लेकर आती हैं जब कि सामान्य रूप से अपने जीवन में वे खुश नहीं होते। छुट्टियों को सामान्य जीवन से ‘पलायन’ नहीं होना चाहिए जबकि उन्हें आजकल इसी तरह विज्ञापित किया जा रहा है! जी हाँ, छुट्टियों में आप अपने भीतर ऊर्जा का पुनर्संचार करते हैं और कुछ अलग, नया देखते हैं, कुछ अलग करते हैं और नए लोगों से मिलते-जुलते हैं। लेकिन अपने सामान्य जीवन, अपने रूटीन से भागकर आपको छुट्टियों का कार्यक्रम नहीं बनाना चाहिए!

इस तरह अपने सामान्य जीवन को आपकी ऊर्जा पूरी तरह निचोड़ लेने की इजाज़त मत दीजिए! अगर आपको लगे कि आप सिर्फ इसलिए जीवित हैं कि कुछ महीनों बाद कहीं बाहर जाकर छुट्टियाँ बिता सकें, अगर आप अपनी छुट्टियों का इंतजार कर रहे हैं और उनसे पलायन की कल्पना कर रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप अपना जीवन नहीं जी रहे हैं। तब शायद साल में आप सिर्फ चार सप्ताह की ज़िंदगी जी रहे हैं!

अपने जीवन को बरबाद न होने दें। उसमें परिवर्तन लाने की कोशिश करें और अभी, इसी समय से यह कोशिश शुरू कर दें!

सही और गलत की पहचान करने और अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार करने में यात्राएँ किस तरह मददगार होती हैं? 6 नवंबर 2014

कल मैंने लिखा था कि जीवनशैली या जीवन के अधिकांश निर्णयों के मामले में सही-गलत का कोई एक बंधा-बंधाया मानदंड नहीं होता। जबकि सामान्यतः मैं यही सलाह देता हूँ कि जो भी आप करें आत्मविश्वास के साथ करें, मैं यह भी कहना चाहूँगा कि सिर्फ अपने विचारों पर इतने जड़ न हो जाएँ कि दूसरों की उचित बातों पर ध्यान ही न दे पाएँ। मन को खुला रखें और अपने आपको इतना लचीला बनाकर रखें कि उचित बातों को ग्रहण कर सकें!

सही और गलत का पहला पाठ आप अपने माता-पिता से सीखते हैं फिर आसपास के माहौल से। लेकिन आसपास दूसरे माता-पिता भी होते हैं, जो वास्तव में उन्हें सही या गलत के बारे में दूसरी बातें सिखाते हैं। और यहाँ आपको अपना दिमाग खुला रखना चाहिए। दूसरी जगह, दूसरे घर-परिवार, दूसरे देश और वहाँ की संस्कृतियाँ-हर जगह सही या गलत के बारे अलग-अलग नज़रिया होता है और अगर आप अपने नज़रिए पर बहुत अधिक जड़ नहीं हैं तो आप उनके नज़रिए को अधिकाधिक जान और समझ सकते हैं! हो सकता है कि तब आप उनके नज़रिए के साथ बेहतर तरीके से तालमेल बिठा सकें।

यात्राएँ इस बारे में बहुत अधिक मदद करती हैं। स्वाभाविक ही मैं बीच पर हफ्ते भर की छुट्टियाँ बिताने की बात नहीं कर रहा हूँ, जहाँ आप लोगों से दूर अपने होटल की सुविधाओं के बीच रह रहे होते हैं। इससे आप दूसरी संस्कृतियों के करीब नहीं आ पाएँगे क्योंकि आपको खुश करने की ग़रज़ से होटल के आयोजक होटलों में और बीचों पर आपकी ही संस्कृति का प्रदर्शन करेंगे। जी नहीं, दूसरों की संस्कृतियों और परम्पराओं को और वहाँ की भिन्नता को जानने-समझने और अनुभव करने के लिए आपको वहाँ कुछ अधिक समय गुज़ारना होगा!

इसकी शुरुआत छोटी-छोटी बातों से होती है। पश्चिमी देशों में किसी अजनबी का स्वागत हाथ मिलाकर किया जाता है या शायद गालों को चूमकर। वहाँ इसे सही और उचित समझा जाएगा। भारत जैसे दूसरे देशों में शारीरिक संपर्क इतना सामान्य नहीं होता और छोटी-छोटी बातों पर या बार-बार शारीरिक संपर्क को उचित नहीं माना जाता। इतनी निकटता से कुछ लोग अपमानित भी महसूस कर सकते हैं। खाना खाते वक़्त टेबल पर हाथों से खाना, उंगलियाँ चाटना या डकार लेना पश्चिमी देशों में अनुचित माना जाता है। लेकिन भारत में भोजन पकाने वाला इन संकेतों को अपनी प्रशंसा समझेगा कि उसका भोजन आपको पसंद आया और आपने छककर, भरपेट भोजन किया।

लेकिन यह सिर्फ टेबल मैनर्स (भोजन की औपचारिकताओं) या लोगों के स्वागत तक ही महदूद नहीं है! जब आप थोड़ा गहरे उतरते हैं और सामने वाले को, दूसरे नज़रियों और दृष्टिकोणों को कुछ बेहतर जानने-समझने लगते हैं, आपमें खुलापन आता जाता है। दूसरों के जीवनों में हो रही घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में आप अपने जीवन को तौलते हैं और उनके विश्लेषण के बाद आपका दृष्टिकोण, आपका नजरिया, आपके विचार बदल भी सकते हैं।

संभव है आपके पास इतनी दूर, पश्चिमी देशों की यात्राएँ करने लायक पैसा न हो मगर इसके बावजूद आप यात्रा करके अपने नज़रिए को विस्तार दे सकते हैं। हल्की-फुल्की यात्राएँ कीजिए, ट्रेन या बसों में कीजिए, दूसरे किसी शहर घूम आइए, अपने आम गंतव्यों से परे कुछ दूर: दूसरी संस्कृतियाँ, जितना आप समझते हैं, उतनी दूर नहीं हैं!

किसी अकेली विदेशी महिला का भारत में सुरक्षित रूप से सफर करना! 20 अक्टूबर 2014

वे लोग, जिन्होंने हमारे न्यूज़लैटर को सब्सक्राइब किया है, जानते होंगे कि हमने अपनी वेबसाइट पर एक नया पृष्ठ शुरू किया है: अकेली महिलाओं के लिए भारत भ्रमण

अगर आप उस पेज पर जाएँ तो पाएँगे कि वहाँ किसी नए पर्यटन का या किसी नई यात्रा का प्रस्ताव नहीं किया गया है। हम वहाँ अपनी सामान्य और नियमित यात्राओं का ही उल्लेख कर रहे हैं और विशेष रूप से महिलाओं से कह रहे हैं कि अगर वे चाहें तो हम अपने आश्रम के किसी गाइड के साथ भारत भर में कहीं भी उनके सुव्यवस्थित और सुरक्षित पर्यटन का इंतज़ाम कर सकते हैं। आश्रम में आने वाले मेहमानों की मांग पर हम पहले से ही किसी गाइड के साथ अकेले यात्राओं की व्यवस्था करते ही रहे हैं। फिर हमने यह अतिरिक्त पृष्ठ क्यों शुरू किया और उसे सिर्फ महिलाओं पर क्यों केन्द्रित किया?

उन महिलाओं की सुविधा के लिए, जिनके साथ यहाँ आने वाला कोई नहीं है, भारत भ्रमण का उनका सपना पूरा करने के उद्देश्य से! आजकल भारत से इतने ज़्यादा नकारात्मक समाचार आ रहे हैं कि लोग यहाँ आने में घबराते हैं, खासकर महिलाएँ, यहाँ उनके विरुद्ध होने वाले भयंकर अपराधो की खबरों से हर वक़्त दहशतज़दा रहती हैं! वे यहाँ आने में हिचकिचाती हैं क्योंकि वे अपने परिवार वालों और मित्रों से सुनती रहती हैं: 'तुम भारत क्यों जाना चाहती हो? वह भी अकेले!'

इसलिए वे महिला पर्यटक भी, जिन्होंने हमसे सारी जानकारियाँ हासिल कर ली होती हैं और अंतिम रूप से यहाँ आने का निश्चय कर चुकी होती हैं, वे भी हमसे बार-बार पूछती रहती हैं: 'क्या भारत में अकेले घूमना सुरक्षित होगा?' क्या अपने करीबी लोगों के डर की अनदेखी करनी चाहिए या कहीं और जैसे मयोरका (स्पेन), इटली, फ्लोरिडा या कैलिफ़ोर्निया चले जाना चाहिए।

इन प्रश्नों पर मैंने पूरे चार ब्लॉग लिखे हैं, जिनमें मैंने कुछ सुरक्षात्मक उपाय सुझाए हैं और कुछ टिप्स दिए हैं कि आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। हम हमेशा कहते आए हैं कि आइए, अवश्य आइए, डरिए नहीं, यहाँ यात्रा करना पूरी तरह सुरक्षित है-हालांकि यह बहुत आसन भी नहीं है!

जी हाँ, आप ऐसा कर सकती हैं। आप भारत आ सकती हैं और अगर आपके पास पर्याप्त जानकारी है, अगर आपको ठीक-ठीक पता है कि आप किधर जा रही हैं और ऐसा करते हुए आपको किन बातों का ख़याल रखना चाहिए, तो पूरी संभावना है कि वास्तव में आपका सफर आनंददायक सिद्ध हो। हम लोगों से हमेशा कहते हैं कि पेरिस में भी आप कुछ अंधेरी जगहों में यूँ ही निरुद्देश्य भटकते नहीं रह सकते! आप पहले से पता कर लेते हैं कि वहाँ घूमना-फिरना सुरक्षित होगा या नहीं और यह भी कि वहाँ से वापस घर किस तरह लौटना है।

लेकिन बहुत सी महिलाएँ असुरक्षा के साए में यात्रा नहीं करना चाहेंगी। मैं समझ सकता हूँ- अगर आप सुरक्षित महसूस नहीं करतीं तो आपको बाहर निकलना अच्छा नहीं लगेगा! खुद को आप सबसे बेहतर तरीके से जानती हैं और समझ सकती हैं कि रिक्शा या टॅक्सी लेने जैसे छोटे-मोटे काम अंजाम देते वक़्त भी आपको बहुत सतर्क रहना पड़े तो आपकी यात्रा का मज़ा किरकिरा हो सकता है।

भारत में निडर होकर यात्रा कर पाएँ, इस उद्देश्य से हम ऐसी महिलाओं की मदद करना चाहते हैं, जिससे वे भारत भ्रमण का अपना सपना पूरा कर सकें और यहाँ की यात्राओं का आनंद उठा सकें। आपका ईमेल प्राप्त होते ही हम आपके साथ होंगे और फिर आपके कार्यक्रमों की विस्तृत रूपरेखा तैयार करते हुए आगे की यात्राओं में और उस दिन तक साथ रहेंगे, जब हम आपको घर-वापसी के लिए विमानतल पर बिदा नहीं कर देते!

तो, अगर आप भारत आना चाहती हैं लेकिन भारत भ्रमण पर अकेले नहीं निकलना चाहतीं, अगर आपके मन में कोई हिचकिचाहट है और मन में डर की भावना लिए यात्रा नहीं करना चाहतीं तो हमें सिर्फ एक ईमेल कीजिए। हमें बताइए कि भारत आकर आप क्या करना चाहती हैं, क्या-क्या देखना चाहती हैं, कहाँ-कहाँ घूमना चाहती हैं और हम उसी वक़्त से आपकी यात्रा की प्लानिंग करना शुरू कर देंगे! इससे आपकी बहुत सी चिंताएँ और परेशानियाँ दूर हो जाएँगी। सबसे महत्वपूर्ण यह होगी कि स्थानीय पुरुष के साथ होने के कारण आप सुरक्षित महसूस करेंगी।

लेकिन, अगर आप एक पुरुष भी हैं और चाहते हैं कि हम आपके साथ चलें तो आपका भी स्वागत है, आप भी ईमेल भेज सकते हैं।

माता-पिता की सबसे बड़ी ख़ुशी: अपने बच्चे को अधिक से अधिक खुश देखना – 11 सितम्बर 2014

जो व्यक्ति जर्मनी की इस यात्रा का सबसे अधिक इंतज़ार कर रहा था वह थी अपरा! हमने एक सप्ताह पहले ही उसे बता दिया था कि हम वहाँ जाने वाले हैं-और तभी से उसकी ख़ुशी देखते ही बनती थी! ख़ुशी के मारे वह यहाँ-वहाँ उछलती-कूदती, नाचती-झूमती और हँसती-खिलखिलाती रहती। उसके बाद से जब भी हम जर्मनी का ज़िक्र छेड़ते, वह ख़ुशी से फूली न समाती, वह उसके शरीर से फूटी पड़ती थी और हम कह उठते कि वाकई उस जैसे बच्चे के चेहरे पर आप उसकी भीतरी दुनिया को स्पष्ट देख पाते हैं जबकि वयस्कों की यह दुनिया हज़ार पर्दों के पीछे छिपी होती है!

फिर वह हर किसी को बताती रही कि उन्हें उसके साथ जर्मनी जाने की अनुमति है या नहीं और बाद में तो यह उसके लिए एक तरह का खेल ही बन गया। जिस दिन हमें जाना था, वह जिद करने लगी कि वह खुद अपना सूटकेस पैक करेगी और फिर सूटकेस लेकर सारे आश्रम में यहाँ से वहाँ फिरती रही कि सब देख लें कि आज वह जर्मनी रवाना हो रही है।

विमानतल पर भी वह पूरी तरह जागी हुई थी और अपने छोटे से लाल सूटकेस को खुद लुढ़काते हुए सुरक्षा जाँच तक और बाद में दरवाजे तक ले जा सकती थी और उसने जिद करके यही किया भी। पूरे सफर में चाहे वह हवा में उड़ान भरते वक़्त हो या विमानतल पर हो, उसके चेहरे पर नए-नए आए आत्मविश्वास, उत्तेजना और रोमांच से पैदा हल्की मुस्कान देखते ही बनती थी।

बोर्डिंग के लिए हमें लंबी दूरी तक एस्केलेटर पर चलना पड़ा और लगता था हम एक ही एस्केलेटर पर सैकड़ों बार चढ़-उतर रहे हैं और हालाँकि हममें से एक अपरा के साथ ही होता था मगर अपरा के दिखते ही दूसरे को उसकी तरफ देखकर हाथ हिलाना पड़ता था।

हवाई जहाज़ में वह कंबल लपेटकर बैठ गई और घर से लाया हुआ खास नाश्ता उसने किया और साथ ही हवाई जहाज़ में मिलने वाली चीज़ें भी अच्छी तरह चखीं, जिसमें "नमक मिला लाल जूस" भी था, साथ लाई किताबें पढ़ीं, सामने के टीवी पर्दे पर बच्चों वाले खेल खेलती रही और अंत में थककर सुखद-संतुष्ट नींद में डूब गई।

लेकिन फ्रैंकफ़र्ट विमानतल पर उतरते ही उसका झूमते-मटकते, लंबे-लंबे डग भरते हुए और उछलते-कूदते हुए चलना सबसे मज़ेदार था। उसे आगे होने वाली घटनाओं का आभास हो गया था और उसकी प्रत्याशा में उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान फैली हुई थी और वह छोटी-छोटी बातों को देखकर विस्मित होती और इशारों में हमें भी बताती जाती।

कल रात को, सोते समय रमोना ने कहा, 'आज का दिन बड़ा अच्छा रहा, हवाई जहाज़ पर भी और अब यहाँ!' और वह मुस्कुरा दी। आज सुबह, तड़के 4 बजे जब हम सब सोकर उठे, उसने कहा, 'हम फिर से जर्मनी में हैं!' और एक बार फिर मुस्कुराई।

मैंने जो देखा, सुना और महसूस किया उसे ही शब्दों में यहाँ व्यक्त करने की भरसक कोशिश की है लेकिन मुझे लगता है मैं उसमें असफल रहा हूँ। जब मैं अपनी बच्ची की तरफ देखता हूँ, उसकी आँखों में ख़ुशी की चमक, सहज, न रुकने वाली हँसी देखता हूँ, जब उसे नाचते-गाते, खेलते-कूदते देखता हूँ तो गदगद हो उठता हूँ मगर उस सुखद एहसास को, दिल में उमड़ती भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए असंभव होता है।