संबंधों में आने वाली कठिनाइयों के समय मानसिक संतुलन न खोना – 27 अक्टूबर 2015

हमारी सभी समस्याएँ पैसे से संबंधित नहीं होती। कल के ब्लॉग में मैंने मुख्य रूप से सिर्फ उन समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त किए थे जो व्यापार और वित्त से जुड़ी होती हैं लेकिन निश्चित ही कुछ दूसरी समस्याएँ भी होती हैं जो कभी-कभी आर्थिक समस्याओं से भी अधिक मुश्किल नज़र आती हैं: दोस्तों, रिश्तेदारों और सबसे बढ़कर, अपने जीवन साथी जैसे दूसरे लोगों के साथ संबंधों में पैदा होने वाली समस्याएँ या खटास! इन समस्याओं से कैसे निजात पाएँ?

पहली बात तो यह कि वही पुराना सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है: कोई कदम उठाने से पहले समस्या पर शांत-चित्त होकर विचार करें। स्वाभाविक ही, किसी प्रियकर के साथ कोई कलह, कोई असहमति वाली बात या कोई वाद-विवाद, मतभेद या झड़प आपको बुरी तरह विचलित कर सकते हैं। आप बुरी तरह क्रोधित हो सकते हैं या आपको ऐसा लग सकता है कि आपका संसार टूटकर बिखर गया है, आपकी आँखों से आँसू निकल सकते हैं और विषाद से आप थर-थर काँपने लग सकते हैं। आप सोच सकते हैं कि आपकी बात सही थी या आप खुद अपनी करनी पर पछता रहे हो सकते हैं लेकिन फिर भी इससे आगे विचार करने से पहले या अगली कार्यवाही करने से पहले आपको अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं है कि आप सामने वाले के प्रति कोई कोई सहानुभूति न रखें या यही भूल जाएँ कि उसने आपके साथ कोई बुरा व्यवहार किया है! बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप अपनी भावनाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं और जानते हैं कि उसका उद्गम क्या है। इसका विश्लेषण करें: आपके मन में इस तरह की भावनाएँ पैदा होने का मूल कारण क्या है? क्या सामने वाले की कोई बात इसका कारण है? या आपके किसी व्यवहार के चलते ऐसा हुआ है? आपको ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? क्या वाकई ऐसा व्यवहार आपकी ओर से या सामने वाले की ओर से हुआ है या यह महज आपकी कल्पना है, जो आपको परेशान कर रही है?

मैं खुद भी बहुत भावुक व्यति हूँ लेकिन जबकि कुछ लोगों के लिए यह दिमागी प्रक्रिया बहुत जटिल और कष्टदायी लग सकती है, मेरा मानना है कि समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए कभी-कभी ऐसी पहेलियों से जूझना ही पड़ता है। अगर मैं इतना भावुक हूँ कि मुझे यह भी पता नहीं चल पाता कि मेरी भावनाएँ ऐसी क्यों है तो यह मेरे व्यवहार में भी व्यक्त हो सकता है।

अपने गुस्से पर काबू में न रख पाने के कारण लोग बड़े भयानक और हास्यास्पद अपराध कर बैठते हैं। बाद में अक्सर ऐसा होता है कि उन्हें समझ में भी नहीं आता कि ऐसा उन्होंने क्यों किया! वे क्रोधित थे-लेकिन गुस्सा उतरने पर वे अच्छी तरह जान रहे होते हैं कि उनका व्यवहार कतई तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं था। कि किसी दुख या पीड़ा के चलते उन्हें क्रोध आया था, यह सही है लेकिन सामने वाला बेचारा यह भी नहीं जानता होगा कि उनकी पीड़ा का जिम्मेदार वह है।

इसलिए, अगर आपको पता चल जाए कि आप वैसा क्यों महसूस कर रहे हैं तो आप उस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं।

अगर आपसे कोई गलती हुई है और अब आपको पछतावा हो रहा है तो मेरे खयाल से तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए। लेकिन सामने वाले से आप यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हर हाल में वह आपकी माफी स्वीकार कर ही ले लेकिन आपके लिए यह कदम उठाना और खुद अपने आपको यह तसल्ली देना कि आपसे गलती हुई थी और आपने माफी मांगली, उचित ही होगा। क्योंकि भले ही सामने वाले ने माफ नहीं किया लेकिन आपने कोशिश तो की। और इतना करने के बाद आप अपने मन में शांति का अनुभव करेंगे और प्रकरण को वहीं विराम देकर आगे बढ़ सकेंगे।

यदि सामने वाले ने आपके साथ कोई दुर्व्यवहार किया है, तब आपके पास मौका होता है कि आपको इस विषय में क्या करना चाहते हैं। आप उसके सामने अपनी भावनाएँ रख सकते हैं या यह तय कर सकते हैं कि आप इस विषय में आगे क्या करेंगे। ऐसी स्थिति में आपके पास क्रोध के आवेश में व्यक्त क्षणिक व्यवहार के अलावा अपने मन की वास्तविक भावनाओं के अनुरूप व्यवहार करने का मौका होता है।

अंत में यही कि कुछ भी हो, संदेश एक ही है: कोई भी समस्या सामने हो, आपका संसार टूटकर बिखरने वाला नहीं है। शांत बने रहें और इस बारे में विचार करें कि आप इस विषय में क्या कर सकते हैं!

किसी दुसरे की ज़िम्मेदारी ओढ़ने की कोशिश भी मत कीजिए- 24 अक्तूबर 2013

कल मैंने बताया था कि कैसे एक मित्र ने अपने गृहप्रवेश के समारोह में मेरे परिवार को आमंत्रित नहीं किया और उससे मैं काफी हद तक उदासीन बना रहा, हालांकि शुरू में मुझे हल्का सा दुख ज़रूर हुआ था। लेकिन कहानी वहीं समाप्त नहीं हुई-आज मैं आपको उस घटना के चलते पैदा हुए क्रोध, भ्रम और दूसरी भावनाओं के विषय में बताता हूँ।

सभी जानते हैं कि मैं बहुत स्पष्टवादी व्यक्ति हूँ और ज़्यादा देर तक किसी बात को दिल में नहीं रखता। दो दिन बाद जब हमारी भावनाएँ और सारा मामला थोड़ा ठंडा पड़ गया, मैंने संक्षेप में यह कहानी और अपनी भावनाएँ फेसबुक पर शेयर कर दीं। मेरी आदत है कि मैं कभी किसी की पहचान फेसबुक पर ज़ाहिर नहीं करता और इस मामले में भी अपने नियम का पालन करते हुए सिर्फ अपनी भावनाओं का निष्कर्ष ही फेसबुक पर व्यक्त किया।

लेकिन हमारा एक मित्र, जो उस मेजबान का रिश्तेदार था, उस फेसबुक पोस्ट पर बहुत नाराज़ हुआ। फेसबुक पर अपनी नाराजगी ज़ाहिर करते हुए और मेरी नास्तिकता पर, साथ ही फेसबुक पर भी हज़ारों लानतें भेजते हुए उसने उस मेजबान की पहचान ज़ाहिर कर दी, जो मैं बिलकुल नहीं चाहता था। इसलिए मैंने फेसबुक पर उसके कमेन्ट को हटाकर उसे फोन किया और सारे मामले को स्पष्ट करने का आग्रह किया।

संक्षेप में यह कि हमारे उस मित्र ने, जो मेजबान के रूप में उस आयोजन में शामिल हुआ था, मुझसे कहा कि मैंने न्योता न मिलने की बात को गलत ढंग से लिया है और मेजबान का घर इतना छोटा है कि सारे मेहमानों का स्वागत करने में दिक्कत हो सकती थी, और वैसे भी मैं वहाँ आयोजित धार्मिक कार्यक्रम और मिर्च-मसालेदार खाना पसंद नहीं करने वाला था और सबसे ऊपर यह कि कुछ दिन बाद वह मेजबान मुझे अलग से, कुछ ज़्यादा पारिवारिक भोजन के लिए आमंत्रित करने वाला था।

एक हफ्ते बाद मुझे जन्मदिन की मुबारकबाद देते हुए उस मेजबान का फोन आ गया। मगर उस मामले पर अपना स्पष्टीकरण देते हुए उसने बिल्कुल अलग बात बताई। उसने कहा कि उसने किसी को भी बुलाया नहीं था लेकिन सबको आयोजन की तारीख बताई थी। यह बड़ा अजीबोगरीब बयान था- उसके मेहमान यह कैसे जान पाए कि किस समय आना है? क्या यह महज संयोग था कि सभी मेहमान एक समय पर आयोजन में पहुँच गए? अंततः उसे भी अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने माफी मांगी। हैरान करने वाली बात यह थी कि उसने इस बात से इंकार किया कि उसने बाद में हमें, अलग से खाने पर बुलाने की बात कही थी और दूसरे स्पष्टीकरणों से भी, जो उस मित्र द्वारा मुझे उसकी तरफ से दिये गए थे।

अब यह स्पष्ट था कि हमारा मित्र उस गलती पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा था जो उसने नहीं, उसके रिश्तेदार मेजबान ने की थी। अगर कोई हमें कुछ दिन बाद खाने पर बुलाना चाहता था तो वह हमें उसी दिन फोन करके बता सकता था। फोन करने में कितना वक़्त लगता है! बाद में उस मित्र से कई बार बात हुई और मैंने उससे कहा कि कोई भी अपने सारे परिवार की और सारे रिश्तेदारों की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। ऐसा कर पाना संभव ही नहीं है क्योंकि उनके अपने अलग व्यक्तित्व हैं और वे अपने निर्णय खुद लेते हैं, जो, हो सकता है उससे बिल्कुल भिन्न हों, जो उसी परिस्थिति में आप लेते! मैंने उसे यह भी बताया कि मेरे सब भाई और पत्नी तक अपने कामों की ज़िम्मेदारी खुद उठाते हैं!

मेरे मित्र ने मुझसे झूठ बोला था। यह एक अजीब-सा, अनोखा एहसास था, खासकर इसलिए कि झूठ बोलने की उसे कतई आवश्यकता नहीं थी। पहले मुझे न बुलाए जाने का दुख था फिर फेसबुक पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने पर प्रताड़ित होने का और अब यह, कि मुझसे व्यर्थ झूठ बोला जा रहा है।

फिर भी, मेरे अंदर उस मित्र के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है और इस पूरे वाकये के बावजूद हमारी मित्रता पर कोई आंच नहीं आएगी। क्यों? क्योंकि मैं समझ रहा हूँ कि उसने ऐसा क्यों किया। वह मेरे दुख को कुछ हल्का करना चाहता था और चाहता था कि मेरे और उसके रिश्तेदार मेजबान के बीच कोई कटुता न रहे। यह प्रेम और मित्रता से लबालब कोमल हृदय से की गई मासूम कोशिश थी। मैं जानता हूँ, यह उसका स्वभाव है-दूसरों की गलतियों की अथवा उनके कामों की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेना। लेकिन अगर कोई दूसरा भोजन करता है तो उसका पेट नहीं भरने वाला। अगर कोई दूसरा कोई गलती करता है तो उसकी जिम्मेदारी आप नहीं ले सकते! दूसरों की गलतियों का बोझ आप क्यों ढोना चाहते हैं? मुझे अच्छा लगता अगर दूसरे की ज़िम्मेदारी लेने की कोशिश करने की जगह वह सिर्फ इतना कहता: "मुझे पता नहीं, उसने तुझे क्यों नहीं बुलाया"। आखिर, मित्रता इस बात की मोहताज नहीं होनी चाहिए कि आप मुझे अपने हर आयोजन में बुलाएँ ही।

अंत भला तो सब भला! यह कहकर कि यह इतनी बड़ी बात नहीं है, मैंने सारे मामले को रफा-दफा किया। अपनी भावनाएँ और विचार दर्ज करने की गरज से मैंने सोशल मीडिया में इस विषय पर लिखा और अब यहाँ लिख रहा हूँ। इन विषयों पर हमारे विचार और धारणाएँ अलग हो सकते हैं मगर मैं जानता हूँ कि उसके दिल में प्रेम, मित्रता और नेकनीयती हैं- और मैं उससे अभी भी उसी तरह प्रेम करता हूँ।

श्री श्री रविशंकर पर लिखने के बाद प्रशंसा , अपशब्दों एवं चेतावनियों का लेखा – जोखा – 22 फरवरी 13

Balendu

श्री श्री रविशंकर की मोबाइल फोन चार्ज करने की तथाकथित चमत्कारी शक्तियां हों या मेरे लेखों पर आईं प्रतिक्रियाएं, इस पूरे सप्ताह डायरी के पन्नों पर श्री श्री रविशंकर छाए रहे। मैंने सोचा कि क्यों न अपनी डायरी के इन पन्नों पर विभिन्न लोगों की प्रतिक्रियाओं को आपसे साझा करूं। आपके लिए भी रोचक रहेगा यह जानना।

निःसंदेह श्री श्री रविशंकर के अनुयायियों और आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के सदस्यों की प्रतिक्रिया आक्रोश से भरी हुई थी। कुछ लोगों की प्रतिक्रिया तो इतनी भद्दी थी कि वे गाली – गलौज पर उतर आए थे। मैं ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग अपने ब्लॉग पर नहीं करता हूं और इसीलिए यहां भी उसे नहीं लिखूंगा। इन बीते चार दिनों में उन्होंने जिस अश्लील, अभद्र और अपमानजनक भाषा का प्रयोग मुझे लताड़ने के लिए किया है, उसकी शायद कल्पना भी न कर पाएं आप। मजे की बात तो यह है कि ये सभी लोग वे हैं जो ध्यान करते हैं, जो शांति और संतुलन की खोज में रहते हैं एवं जिन्हें उनके गुरु स्वयं यह शिक्षा देते हैं उन्हें किसी के भी बारे में कुछ भी बुरा न कहना चाहिए और न ही सोचना चाहिए।

जब कभी भी मैं किसी पाखंडी गुरु के बारे लिखता हूं या उसके कपट का भंडाफोड़ करता हूं तो ऐसा ही होता है। यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। उनसे मुझे यही उम्मीद थी कि वे एक डरे हुए जानवर की भांति दुम दबाकर भाग जाएंगें। अपने पूज्य गुरु की धोखाधड़ी से आमना – सामना होने पर ये भक्तगण अपने बचाव के लिए आक्रमण की मुद्रा में आ गए हैं लेकिन अफसोस कि ये अपना बचाव भी समझदारी के साथ नहीं कर पा रहे हैं।

कुछ सामान्य प्रतिक्रियाएं भी आईं हैं। एक व्यक्ति जिसने श्री श्री की सिखाई हुई प्राणायाम की क्रियाओं का अभ्यास किया और उनसे लाभान्वित भी हुआ, उसने अपने गुरु की इन बेतुकी बातों की सफाई देने की कोशिश की। लेकिन वह स्वयं इस प्रश्न पर उलझन में था कि क्यों कोई ऐसी बेहूदा बात लिखेगा या अपने प्रवचन में कहेगा। तो उसने गुरु के वचनों को जायज़ ठहराने के लिए एक रास्ता निकाला कि उस प्रवचन में आए श्रोता ग्रामीण अंचलों के ‘भोले – भाले‘ और ‘कम बुद्धि‘ के लोग थे और अपने गुरु के श्रीमुख से ऐसी ही कहानियां सुनना चाहते थे।

दर असल इस कहानी की इस प्रकार व्याख्या करना बड़ा ही हास्यास्पद है। आप बड़ी चतुराई से यह कहना चाह रहे हैं: कि श्रोता मूर्ख हैं, इसलिए गुरु जी को उनके स्तर की बात करनी पड़ती है। वाह, क्या बात है! क्या एक प्रबुद्ध व्यक्ति से इस प्रकार की उम्मीद की जाती है? सबसे पहली बात तो यह है कि कभी भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति मूर्ख है। इसके अलावा आप यह नहीं कह सकते कि श्रोता जो सुनना चाहते थे, उन्हें वहीं सुना दिया गया। एक ईमानदार व्यक्ति कदापि ऐसा व्यवहार नहीं करेगा। चलिए मान लेते हैं कि लोग श्री श्री रविशंकर से यही सब सुनना चाहते हैं, तो भी क्या लोगों को खुश करने के लिए उन्हें ऐसी बेहूदी बातें बोलनी चाहिए थीं?

नहीं, मैं नहीं मानता कि आप उनके बचाव में यह स्पष्टीकरण या बहाना पेश कर सकते हैं। मेरे विचार से कोई एक ऐसा व्यक्ति नियुक्त है जो सब कुछ लिखता है या प्रत्येक प्रवचन को रिकॉर्ड करता है और फिर उसका एक अलग वेबपेज बनाता है, एक अलग लेख लिखता है जिसका कोई रीव्यू नहीं किया जाता श्री श्री ने यह सब कहा, इसे प्रकाशित किया गया और जब उन्होंने देखा कि हर कोई उनके ‘सर्वज्ञ‘, ‘सर्वव्यापी‘ या ‘आलौकिक‘ होने की बात पर यकीन करने को तैयार नहीं है तो उन्होंने इस कहानी को वेबपेज से हटा लिया।

कई पाठकों और मित्रों ने मेरा समर्थन करते हुए टिप्पणियां की हैं। जो लोग इस संगठन की कार्यप्रणाली से निराश हुए हैं एवं वे जो उन्हें एक सच्चा और संजीदा गुरु मानते थे, उनके भी कॉमेंट्स आए हैं। कुछ मित्र इन लेखों को लेकर मेरे बारे में चिंतित हैं। उनका मानना है कि श्री श्री का संगठन बहुत बड़ा है और उनके पास पैसे की ताक़त है, पहुंच वाले लोग हैं, अतः मुझे किसी भी तरह का नुकसान पहुंचा सकते हैं।

इस समर्थन के लिए मैं आप सभी मित्रों का धन्यवाद करता हूं। मेरे बारे में चिंता करने की कोई बात नहीं है। मैं जानता हूं कि मैं अकेला नहीं हूं जब मैं इन पोंगापंथी गुरुओं के बारे में लिखता हूं, इनकी धोखाधड़ी का भंडाफोड़ करता हूं या जब इन पाखंडियों, लम्पटों और नकली धर्मगुरुओं की खबरें इकठ्ठी करता हूं। मेरी तरह और भी हजारों लाखों लोग हैं जो इन गुरुओं से नाखुश हैं। वे जानते हैं कि जो हो रहा है, वह ग़लत है और वे सभी मेरा समर्थन करते हैं। मैं जानता हूं कि वे मेरी तरह मुखर नहीं हैं। लेकिन इस बात को केवल मैं ही नहीं जानता, वे सारे गुरु भी अच्छी तरह से जानते समझते हैं।

लड़ाके लड़ाई जारी रखना पसंद करते हैं – 5 जुलाई 2009

जीवन में आने वाली समस्याओं का सामना लोग अलग अलग तरीकों से करते हैं। निश्चय ही इस बात का संबंध जीवन के प्रति उनके मूल दृष्टिकोण से और आस पास के लोगों के साथ होता है। आप देखते हैं कि अधिक मुश्किल परिस्थितियों में कुछ लोग बेहद आक्रामक हो जाते हैं। वे समस्या को और उससे उपजे संघर्ष को बनाए रखना चाहते हैं और ऐसे लोग अधिकतर क्रोध के वशीभूत परिस्थिति का ठीक तरह से जायज़ा नहीं ले पाते, उसे समझ नहीं पाते। ऐसे लोग आसानी से आक्रांत हो जाते हैं जबकि कोई उन्हें नुकसान नहीं पहुंचना चाहता। वे महसूस करते हैं जैसे उनकी तरह सारी दुनिया ही आक्रामक है और उन पर हमले कर रही है। वार्तालाप का एक साधारण वाक्य उन्हें असुरक्षित बना देने के लिए काफी होता है और वे इतने त्रस्त हो उठते हैं कि प्रतिरक्षा में वे स्वयं आक्रामक हो जाते हैं। और इस तरह एक संघर्ष की, एक युद्ध की स्थिति बन जाती है।

मैं इस तरह का व्यक्ति नहीं हूँ। वास्तव में मैं इसका उलट व्यवहार करता हूँ। यदि कुछ अच्छा और आसानी के साथ हो रहा है तो मैं प्रसन्न होता हूँ। और अगर कुछ बातें कोई परेशानी खड़ी कर रही हैं, और परिस्थिति बिगड़ती ही जा रही है तो मैं सिर्फ उससे दूरी बना लेता हूँ। मैं संघर्ष करना और लड़ाई नहीं चाहता, मैं शांति, आनंद और प्रेम के साथ जीना चाहता हूँ। लड़ाके हमेशा अगले आक्रमण से भयभीत रहते हैं और वे कभी अपने अस्त्र-शस्त्रों को अपने से अलग नहीं कर पाते।

हिंसा और दंगा: विध्वंस से आपको क्या प्राप्त होता है? – 1 मई 2009

आज हम लोग रात का खाना खाने बाहर गए थे और अपने पीज़ा का इंतज़ार करते हुए आज की छुट्टी के बारे में चर्चा कर रहे थे। जर्मनी में आज मई की पहली तारीख थी, मजदूर दिवस, और थॉमस और आइरिस ने बताया कि हर साल इस दिन लोग समूहों में सरकार और वर्तमान समाज व्यवस्था का विरोध और उसका प्रतिवाद करते हैं। और यह प्रतिवाद कई बार हिंसक भी हो जाता है और राष्ट्रीय सम्पदा को नुकसान पहुंचाने का कारण बन जाता है। वाहनों को आग के हवाले कर दिया जाता है और दुकानों और घरों में तोड़ फोड़ की जाती है। इससे विरोध करने वालों को कुछ भी प्राप्त नहीं होता। लोगों के घायल हो जाने की संभावना होती है और बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान भी हो सकता है। लेकिन वे साल दर साल यह करते ही रहते हैं।

मैं जानता हूँ कि यह हर देश में होता है लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि क्यों कुछ लोगों का दिमाग हिंसा और विध्वंस में लिप्त होता है। यहाँ तक कि उन्हें इसमें मज़ा आने लगता है। ऐसा लगता है जैसे उनके लिए यह एक खेल और आनंद का बायस होता है जब कुछ टूटता है, कुछ नष्ट होता है या कोई घायल होता है या कोई आर्थिक नुकसान बरपा होता है।

जब मैं भारत में था तब मैंने किसी अखबार में पढ़ा कि सरकार ने इस तरह के हिंसक प्रतिवाद से निपटने के लिए अब एक कानून बना दिया है। जो समूह या संगठन इन हिंसक वारदातों में ज़िम्मेदार पाए जाते हैं या जो लोग मौका ए वारदात पर पकड़े जाते हैं उन्हें नष्ट हुई संपत्ति का मूल्य चुकाना पड़ता है। हम कई स्थानों में हमेशा ही ऐसा होता हुआ देखते हैं। आप समझ नहीं पाते कि लोग ऐसा क्यों करते हैं। अगर वे कुछ बना नहीं सकते तो फिर नष्ट क्यों करते हैं? मैं चाहता हूँ कि लोग अपनी संवेदना को जागृत करें और दूसरों को नुकसान पहुंचाने में खुशी तलाश करने से बाज आएँ।

मोह से कामना और कामना से क्रोध तक – 27 जुलाई 2008

कल मैं कामना और मोह के बारे बात कर रहा था। गीता में कहा गया है कि मोह से कामना उत्पन्न होती है। यदि कामना की पूर्ति नहीं होती तो वह क्रोध में परिवर्तित हो जाती है और क्रोध आपको अंधा बना देता है। क्रोध में आप सत्य को नहीं देख पाते और आपकी सद्बुद्धि जाती रहती है। जब आप अपनी सद्बुद्धि खो देते हैं तो आप अपना बहुत बड़ा नुकसान कर बैठते हैं। आवश्यक है कि आप प्रेम में लिप्त हों, मोह में नहीं। मैं पहले ही इस बारे में बहुत कुछ कह चुका हूँ। आपको प्रेम करना चाहिए। यही एकमात्र जरिया है जिससे आपको साक्षात सत्य के दर्शन होते हैं।

अपने क्रोध को प्रेम से परास्त करो – 20 जुलाई 2008

कल एक और 17 साल की लड़की उपचार सत्र में उपस्थित हुई थी। जब मैंने उससे उसके आने का कारण पूछा तो उसने बताया कि वह एक लड़के को भूलना चाहती है। उस लड़के के साथ एक साल तक उसके संबंध रहे और अब वह उस संबंध को तोड़ना चाहती थी क्योंकि वह लड़का ‘एक गुस्सैल व्यक्ति’ था। उसने बताया कि अभी भी उसके साथ उसका संबंध है और वह उसे भूल नहीं पाएगी। मैंने पूछा कि जब वह उसे भूलना चाहती है तो संबंध क्यों रखे हुए है; अगर वह उससे मिलती रहेगी तो भूल कैसे पाएगी? तब उसने कहा कि उसके साथ संबंध न रखना बेहद मुश्किल काम है। वह इस बात पर निश्चित थी कि वह अब भी उससे बहुत अधिक प्रेम करता है और यह भी कि वह यह नहीं कह सकती कि वह उससे प्रेम नहीं करती। तो इसका मतलब यह हुआ कि दोनों एक दूसरे को अब भी बहुत प्रेम करते हैं मगर उसकी गुस्सैल प्रवृत्ति के कारण वह उसके साथ नहीं रहना चाहती।

कोई भी क्रोध नहीं करना चाहता। ऐसी भावनाएं क्यों पैदा होती हैं? इसका कारण पता करना आवश्यक है और उसके बाद या तो उस कारण को दूर करना आवश्यक है या फिर उसका सामना करने के अपने तरीके को बदलना आवश्यक है। आप जानते हैं, मैं भावनाओं का दमन करने की सलाह नहीं दे रहा हूँ। मैंने अपनी डायरी में क्रोध पर पहले भी लिखा है और अगर आप प्रेम और क्रोध की तुलना करें तो पाएंगे कि प्रेम हमेशा विजयी हुआ है। इसलिए अगर आप जानते हैं कि आप क्या चाहते हैं, आप अगर अपने क्रोध पर विजय पाना चाहते हैं तो प्रेम की सहायता से आप ऐसा कर सकते हैं। और प्रेम से अच्छा कारण क्या होगा ऐसा करने का?

तो आज हमने जर्मनी के लिए वापसी की उड़ान भरी और आन्द्रे हमें म्यूनिख एयरपोर्ट पर लेने आया। शाम को हम एक संगीत सभा में गए जिसे सूसी के स्कूल की ओर से आयोजित किया गया था और जिसमें वहाँ के विद्यार्थी ही अभिनेता, गायक और नर्तक थे और उन्होंने ही, सूसी की तरह, वाद्यवृंद की रचना की थी। यह पहला मौका था जब मैं किसी संगीत सभा में शामिल हुआ था और मुझे यह बहुत अच्छा लगा। वह अधिकतर जर्मन में था इसलिए मैं पूरी तरह समझ नहीं पाया मगर बावजूद इसके उसका आनंद अवश्य उठाया। मैं सेनेमा और टीवी देखना उतना पसंद नहीं करता लेकिन यह एक शानदार शाम थी।

जब क्रोध आये तो क्या करें? – 5 जून 2008

एक उपचार सत्र में किसी ने मुझसे पूछा: "मैं बहुत आक्रामक हूँ और अकसर बिना किसी इच्छा के या दुर्भावना के दूसरों पर चिल्लाने लगता हूँ। मैं अपने इस क्रोध का सामना किस तरह कर सकता हूँ?"

मैंने उसे एक बहुत व्यावहारिक सलाह दी: जब किसी के साथ आपकी कोई चर्चा हो रही हो और लगे कि आपको गुस्सा आने वाला है और आप उस पर चीखने-चिल्लाने वाले हो, आप एक गिलास पानी लेकर उसे पी जाओ। एक गहरी सांस लो और शांत हो जाओ। जब आप गुस्सा होते हैं तब क्या होता है? मैं हमेशा कहता हूँ कि तब आपकी आँखें बंद हो जाती हैं और मुंह खुल जाता है। मेरा कहने का मतलब है कि चेहरे पर स्थित आँख बंद नहीं होती मगर आप महसूस नहीं कर पाते कि वह क्या देख रही है। आप देख नहीं पाते कि आपके सामने कौन खड़ा है, आप क्या कर रहे हैं, आप क्या कह रहे हैं और परिस्थिति कैसी है। तो आप खुली आँखों वाले अंधे होते हैं।

क्रोध आपको दिशा निर्देश दे रहा है और आपके माध्यम से बात कर रहा है। वह आपका सत्य नहीं है जो बात कर रहा है और इसीलिए कई बार आपने देखा होगा कि बाद में अपनी बात पर आपको पछतावा भी होता है। आवश्यक है कि समय रहते ही आप अपनी आँखें खोलें और मुंह बंद कर लें। आँखें खोलने का अर्थ यह है कि आपको यह पता होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं। कोशिश करें कि जब क्रोधित हों तब आप चुप रहें। इससे आपको अपने भीतर देखने और सोचने में मदद मिलेगी। जब आप चिल्ला रहे होते हैं तब दिमाग में सोचने के लिए कोई स्थान नहीं होता। चीखना-चिल्लाना व्यर्थ होता है और यह दूसरों की भावनाओं को चोट पहुंचा सकता है।

क्रोध एक आग है जो आपको जलाती है और दूसरों को भी। जब क्रोध आता हुआ महसूस हो तब इससे पहले कि वह आपके शब्दों के माध्यम से, जिन्हें आप स्वयं कहना नहीं चाहते, दूसरों को चोट पहुंचा सके आप पानी पीना शुरू कर दीजिये और अपने हार्मोन्स को शांत होने का मौका दीजिये। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप अपनी भावनाओं का दमन करें। अपनी भावनाएं व्यक्त करना आवश्यक है। आप अपने गुस्से को बिना दूसरों को चोट पहुंचाए भी व्यक्त कर सकते हैं। आपके गुस्से के कारण दूसरे क्यों कष्ट पाएँ? जब आप महसूस करें कि क्रोध आपको भीतर ही भीतर जला रहा है एक तकिया ले लें और उस पर मुक्के मारना शुरू कर दें। अपने क्रोध को बह जाने दें! अपने आपको गुस्सा होने दें! दमन किसी भी हालत में उचित नहीं है।

कर्म के तीन प्रकार-संचित,प्रारब्ध एवं क्रियमाण – 14 May 08

मैं आप को अगले सू त्र के बारे में भी बताना चाहूँगा जिसकी मैंने कल के व्याख्यान में व्याख्या कि थी| तीसरे अध्याय के सूत्र की सहायता से मैं यह स्पष्ट करूँगा कि पूर्व का दर्शन कैसा है और पतंजलि का लेखन किस प्रकार का है| कितने अद्भुत रूप से इस व्यक्ति ने सब कुछ इन सूत्रों से स्पष्ट किया है| यदि आप इसका शब्दशः अनुवाद करेंगे तो यह आप को हास्यप्रद लगेगा और संभवतः आप भ्रमित हो जायेंगे| सूत्र है कि-
“यदि आप अपने कर्मों को जान लें तो आप अपनी मृत्यु का समय जान सकते हैं|”

तो आप को क्या लगता है? हाँ यह आश्चर्यजनक है और इसकी सैकड़ो व्याख्याएं हैं| आइये इसके पीछे छुपे दर्शन को समझते हैं| पूर्व का समस्त दर्शन कर्म पर आधारित है किन्तु पश्चिम में यह अपने सही रूप में नहीं आया| यहाँ बहुत से भ्रम हैं क्यों कि दर्शन के मूल सिद्धांत के स्थान पर किसी व्याख्या को अपना लिया गया|

वास्तव में ऐसा कहा जाता है कि कर्म तीन प्रकार के होते हैं-संचित,प्रारब्ध और क्रियमाण| संचित का अर्थ है-संपूर्ण,कुलयोग| अर्थात मात्र इस जीवन के ही नहीं अपितु पूर्वजन्मों के सभी कर्म जो आपने उन जन्मों में किये हैं| आपने इन कर्मों को एकत्र करके अपने खाते में डाल लिया है|

‘प्रारब्ध’,‘संचित’ का एक भाग है,इस जीवन के कर्म| आप सभी संचित कर्म इस जन्म में नहीं भोग सकते क्यूंकि यह बहुत से पूर्वजन्मों का बहुत बड़ा संग्रह है| इसलिए इस जीवन में आप जो कर्म करते हैं, प्रारब्ध, वो आप के संचित कर्म में से घटा दिया जायेगा| इस प्रकार इस जीवन में आप केवल प्रारब्ध भोगेंगे,जो आप के कुल कर्मों का एक भाग है|
तीसरा कर्म क्रियमाण है,वो कर्म जो आप इस जीवन में प्रतिदिन करते हैं| और क्रियामान कर्म से ही संचित कर्मों का निर्माण होता है| तो यह जोड़ घटाना कैसे चलता है?
हमने पहले ही कर्म के प्रति आसक्ति और अनासक्ति के बारे में बता चुके हैं|
और जो भी कर्म हम पूर्ण चैतन्यता से नहीं करते वो क्रिया नहीं प्रतिक्रिया है|
जिसके प्रति आप चैतन्य नहीं हैं वो क्रिया नहीं हो सकती| और जब हम बिना चैतन्यता के कर्म करते हैं,जैसा प्रायः दैनिक जीवन में होता है तो हमारे संचित कर्म बढ़ जाते हैं| यदि कोई आप का अपमान करे और आप क्रोधित हो जाएँ तो आपके संचित कर्म बढ़ जाते हैं| परन्तु,यदि कोई अपमान करे और आप क्रोध ना करें तो आप के संचित कर्म कम होते हैं|
इसे मैं एक योगी के उदाहरण से और अधिक स्पष्ट करता हूँ| वो एक वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न थे कि तभी एक व्यक्ति वह आया और उनका बहुत अपमान किया| वो शांत रहे| कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी,ना वाह्य रूप से ना अंतर्मन में,उन्हें क्रोध भी नहीं आया| बाद में उनके शिष्यों ने,जो सब कुछ देख सुन रहे थे,पूछा कि आप को क्रोध नहीं आया? तो उन्होंने उत्तर दिया कि संभवतः पूर्वजन्म में मैंने उसका अपमान किया था, वास्तव में मैं प्रतीक्षा में था कि वो आकर मेरा अपमान करे| अब मेरा हिसाब बराबर हो गया| अगर मैं क्रोध करता तो फिर कर्म संचित हो जाते|

यही कर्म का सम्पूर्ण दर्शन है| यदि आप चैतन्य रहें, प्रतिक्रिया ना करें तो अपने संचित को नष्ट कर सकते हैं| और इसके लिए आप के अंतर्मन में शांति होनी चाहिए| क्रोध का शमन नहीं करना है अपितु क्रोध उत्पन्न ही नहीं होना चाहिए| और इस प्रकार चैतन्य रहते हुए जब आप अपने संचित को नष्ट करते रहेंगे तो एक दिन वो शून्य हो जायेगा| जब वो समाप्त हो जायेगा तब आप को इस जीवन मरण के चक्र में फिर पड़ने कि आवश्यकता नहीं होगी| हम जन्म क्यों लेते हैं? हम बार बार शरीर धारण क्यों करते हैं? अपने संचित कर्मों को भोगने के लिए| जब तक हमारा हिसाब पूरा नहीं होता तब तक हमें जन्म लेकर अपने कर्मों को भोगना पड़ता है| और जब इस सब का अंत होता है तब सारी इच्छायें और तृष्णायें मिट जाती हैं और पुनः जन्म लेने कि आवश्यकता नहीं रह जाती| यही वास्तविक अंत है, अन्यथा हम यूँ ही जन्म मरण के चक्र में फंसे रहेंगे|

इसलिए,पतंजलि को समझने का प्रयास करें| वह सामान्य मृत्यु के बारे में बात नहीं कर रहे हैं| यह चक्र चलता जायेगा और आप क्रियमाण के द्वारा संचित कर्म का निर्माण करते रहेंगे| परन्तु जब आप अपने संचित को भोग लेंगे और आपका हिसाब पूरा हो जायेगा, तब वह वास्तविक मृत्यु होगी, वास्तविक अंत| और इस तरह यदि आप को अपने कर्मों का ज्ञान है तो आप अपनी मृत्यु का समय बता सकते हैं|

आज हम मुंस्टर शहर में थे,खिली धूप और सुहाने मौसम का आनंद हमने बाज़ार में खरीदारी और उद्यान में टहल कर उठाया| यह एक सुंदर शहर है और काफी हरियाली है| कल की दैनन्दिनी मैं वुपरटाल में लिखूंगा,जहाँ हम कल सुबह जा रहे हैं|

बिना दमन किए, बिना कष्ट उठाए क्रोध से कैसे निपटें? – 7 मई 2008

आज का उपचार-सत्र बहुत लंबा चला। एक औरत आई और कहने लगी कि वह बहुत कष्ट में है और उसके मन में बहुत सारी कटुता और दुर्भावनाएँ भारी पड़ी हैं। तेरह साल के वैवाहिक जीवन के बाद उसके पूर्व-पति ने किसी दूसरी औरत की खातिर दो साल पहले उसे छोड़ दिया था। ऐसे ही एक दिन उसने सब बताया और दो दिन बाद वह चला गया। अब उसे पता चला है कि वह उस औरत के साथ जल्द ही शादी करने वाला है। वह मुझसे जानना चाहती थी कि उसे अंतिम रूप से मुक्त करने के लिए वह क्या करे। मेरे एक प्रश्न के जवाब में उसने बताया कि पिछले दो साल उसने बहुत मानसिक कष्ट और तनाव में बिताए। बाद में सिर्फ एक बार वे मिले थे और उसने जानना चाहा था कि उसने उसे क्यों त्याग दिया, उसकी गलती क्या थी। दोनों ही उस मुलाकात में बहुत रोए मगर उसके पूर्व-पति ने उसे छोडने का कोई कारण नहीं बताया।

यह सब बताते हुए वह औरत बहुत भावुक हो गई थी। मैं देख सकता था कि उसने कितना भीषण दुख सहा है और सह रही है मगर मैं यह भी समझ पा रहा था कि उसने अपने क्रोध और उसके उन्माद को नहीं जिया जो बहुत स्वाभाविक रूप से पति के अलगाव के बाद उसके भीतर समाये हुए थे। मैंने उसे बताया कि अपने आपको गुस्सा होने की इजाज़त देना कितना ज़रूरी है। अपने क्रोध को स्वीकार करना लाजिमी है। कोई आपके साथ ऐसा करता है तो क्रोध एक प्राकृतिक एहसास है। ठीक है कि यह एक नकारात्मक एहसास है मगर आप ऐसा महसूस करने पर बुरी नहीं बन जातीं। वह यथार्थ है और आपको उसे जीना है।

उसका पूर्व-पति उस भेंट में उसका सामना नहीं कर सका इसका अर्थ यह था कि वह स्वयं भी अपने भीतर ग्लानि का अनुभव कर रहा था। वह महिला अपने क्रोध को व्यक्त करने की जगह सिर्फ अकेली सब कुछ सहन करती रही। उसने मुझसे पूछा कि किस तरह वह अपने क्रोध को स्वीकार करे और कैसे उसे जिए? और मैंने उसे समझाया कि अपने क्रोध को वह बाहर निकाल सकती है।

हो सकता है मैंने पहले भी यह तरीका बताया हो : जब आप टोयलेट जाएँ तब एक कलम साथ ले जाएँ और टोयलेट पेपर पर उन बातों को लिखते जाएँ जो आपको गुस्सा दिला रही हैं। इस तरह लिखें जैसे वह आपके सामने बैठा है और अपने क्रोध को धीरे धीरे निकलने दें। जब आप सब कुछ लिख चुकें, उस टॉइलेट पेपर का वही उपयोग करें जिसके लिए वह बना है और फिर उसे पानी से संडास में बहा दें। तेज़ पानी के प्रवाह से बहा दें उसे!

उसने कहा कि वह इस मामले का कोई सुखद अंत चाहती है क्योंकि वह उसके साथ अपने संबंध को बड़ा महत्व देती है। उसने यह भी बताया कि उसके पूर्व-पति और उस औरत की शादी उसी दिन है जिस दिन दो साल पहले उसने उसे त्याग दिया था। मैंने जवाब दिया: अपने गुस्से को निकाल बाहर करने के बाद, उसे टोयलेट में बहा देने के बाद तुम्हें चाहिए कि उसे माफ कर दो और फिर उसे भूल जाओ। तारीख को भी याद मत रखो। किसलिए यह सब? इतना सब कर लेने के बाद तुम क्यों दुखी रहो, क्यों तड़पो, क्लेश सहो? अगर तुम इससे मुक्ति नहीं पातीं तो आगे 5-10 साल तुम और इसी तरह दुख और पीड़ा सहती रहोगी। अपने क्रोध का दमन करने के कारण दो साल तुमने इतना सब सहा। तो सबसे पहले अपने क्रोध को स्वीकार करो और उसे बाहर निकालो, फिर अपने पूर्व-पति को माफ करो और अंत में उसे भूल जाओ। जीवन में और भी न जाने कितनी खूबसूरत चीज़ें हैं। अब वह तुम्हारे जीवन का हिस्सा नहीं रहा। इस संसार का उपभोग करो और तुम फिर से खुश हो सकती हो, हंस-बोल सकती हो और प्रेम भी कर सकती हो।

मैं रोज़ ही कई लोगों से मिलता रहता हूँ और वे अपनी परेशानियाँ मुझसे साझा करते हैं। मैं उपचारक हूँ, मैं सलाह देता हूँ और परामर्श सत्र आयोजित कर उनकी परेशानियों को दूर करने का प्रयास करता हूँ। और कभी-कभी उन व्यक्तियों की वास्तविक पहचान ज़ाहिर किए बगैर इस डायरी में उनके उन अनुभवों को दर्ज करता हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि मेरे कई पाठक इसी तरह की परिस्थितियों से गुज़र सकते हैं और ऐसी ही या इनसे मिलती जुलती समस्याओं से घिरे विकट मानसिक क्लेश से दो चार हो सकते हैं। यह डायरी सारी दुनिया में असंख्य लोग पढ़ते हैं और मुझे विश्वास है कि यह कुछ पाठकों को अवश्य लाभ पहुंचाती होगी या कुछ पाठक ऐसे भी होंगे जिनके कोई जानने वाले ऐसी परिस्थिति से गुज़र रहे हों और वे उन्हें उचित सलाह दे सकें।