योग बाज़ार का घपला – योग कक्षा को चुनना जैसे दूध खरीदना! 17 नवम्बर 2014

अपने व्याख्यानों, कार्यशालाओं में और अपने ब्लॉगों में भी मैंने कई बार ज़िक्र किया है कि पश्चिमी दुनिया के साथ मेरे संपर्क की शुरुआत में मुझे एक प्रश्न सदा उलझन में डाल देता था: 'आप कौन सा योग सिखाते हैं?'

यशेन्दु के साथ भी कई बार इसी तरह की बातें होती रही हैं और निश्चय ही, आज भी यही स्थिति बनी हुई है। इसलिए, जब कुछ सप्ताह पहले यशेन्दु ने अपने किसी प्रतिभागी द्वारा पूछे गए इस सवाल का-और उसके बाद नीचे दी गई चर्चा का-ज़िक्र किया, हम हँसे बिना न रह सके!

जब कक्षा के बीच यही प्रश्न पूछा गया तो यशेन्दु ने हमेशा की तरह जवाब दिया था, 'जस्ट योग' ('just yoga')। वह महिला कुछ उलझन में पड़ गई और मन ही मन उसने समझ लिया कि हम लोग 'हठ योग' सिखाते हैं। क्योंकि सभी प्रतिभागी स्वस्थ थे और उत्साह से भरे हुए थे, जब यशेन्दु ने पुनः रवानी में आते हुए तेज़ी के साथ अगले अभ्यास कराने शुरू किए तो स्वाभाविक ही वह महिला भी बड़ी खुश हुई। सत्र के बाद महिला ने उससे पूछा कि क्या उसने भी किसी पॉवर योग ('power yoga') शिक्षक से योग सीखा है?

कुछ देर की उलझन के बाद हम उसके साथ हँसने लगे।

हमारे विचार में कोई विशेष योग नहीं होता है। हमारे योग का कोई ख़ास नाम, कोई ब्रांड या कोई विशिष्ट लक्षण नहीं है। यह योग है, सिर्फ योग, जिसे हमने अपने जीवन की शुरुआत से सीखा है।

इसकी तुलना आप दूध खरीदने से कर सकते हैं। पहले सिर्फ दूध होता था। सबको पता होता था कि दूध गाय से प्राप्त होता है और आज भी गाय ही दूध दे रही है। पहले आप दूध खरीदने बाज़ार जाते थे, दूध मांगते थे और आपको वही मिल जाता था। अब आप बाज़ार जाएँ तो आपको स्किम्ड मिल्क, फुल-फैट मिल्क, हाफ-फैट मिल्क, पाश्चराइज्ड मिल्क, फैट-फ्री मिल्क, ताज़ा, कई दिनों तक खराब न होने वाला आदि कई प्रकार का दूध मिल जाएगा! इसलिए जब आप दूध खरीदने बाज़ार जाते हैं तो आपको बताना पड़ता है कि कौन सा दूध आप खरीदना चाहते हैं!

यही मामला आजकल योग का भी है। पॉवर योग है, अय्यंगार योग है, हॉट योग है, हठ योग, अष्टांग योग, फ्लो योग, मैसूर योग, एक्रो योग, और न जाने कितने प्रकार के योग हैं। वे सिर्फ ‘योग’ नहीं रह गए हैं।

यहाँ हम आज भी दूध खरीदते हैं। और उसी तरह योग खरीदते हैं। यह सिर्फ हठ योग ही नहीं है कि आप उसे सिर्फ शारीरिक व्यायाम समझ लें और उसका अभ्यास करके शरीर को लचीला और मज़बूत बना लें। हमारे जीवन में योग का इससे अधिक महत्वपूर्ण स्थान है। यह आपके दैनिक व्यवहार का प्रश्न है, आपकी मानसिकता पूर्वाग्रहों, आपके विचारों और भावनाओं का प्रश्न!

निश्चय ही, अगर वह आपको स्वस्थ रखता है, आपके संदेहों को दूर करता है तो आपकी जो मर्ज़ी हो, नाम दे लें। लेकिन हम उसे सिर्फ योग कहेंगे और हमेशा आपको समझाने की कोशिश करते रहेंगे कि हम उसे सिर्फ ‘योग’ ही क्यों कहना चाहते हैं!

सही या गलत का निर्धारण दृष्टिकोण है या तथ्य! 5 नवंबर 2014

दूसरों के साथ बातचीत का रोचक पहलू यह है कि आप अक्सर ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनके अनुभव, विचार और जानकारियाँ आपसे भिन्न होते हैं। जब आवश्यकता हो, आप उनसे लाभ उठा सकते हैं और प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। आपको उपयोगी जानकारियाँ प्राप्त हो सकती हैं, जिन्हें आप दूसरों तक भी पहुँचा सकते हैं। लेकिन एक अप्रिय बात भी हो सकती है: आप संदेह में पड़ सकते हैं कि आप जो कर या सोच रहे हैं, वह ठीक है या नहीं।

यह असामान्य बात नहीं है: कामकाज के दौरान हाल ही में हुई कोई घटना आप अपने दोस्तों को बताते हैं और वे आपकी प्रतिक्रिया पर आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि आपने ऐसा क्यों सोचा! क्या ऐसी स्थिति में शांत रहना उचित नहीं होता? या इसके विपरीत, क्या आखिरकार इस मामले में सख्त रवैया अपनाना ज़्यादा ठीक नहीं होता? यह भी हो सकता है कि दोनों में से एक आपकी प्रतिक्रिया का ज़ोरदार समर्थन करे और दूसरा अविश्वास में महज सिर हिलाकर रह जाए कि ये आप क्या कर बैठे।

क्या जीवन जीने का कोई सही तरीका हो सकता है? या कोई गलत तरीका?

स्वाभाविक ही कुछ बातें स्पष्ट रूप से, हर लिहाज से और हर जगह गलत होती हैं: किसी का क़त्ल करना गलत है और चोरी, डकैती और इस तरह की दूसरी सभी गतिविधियाँ भी सामान्यतः सर्वत्र गलत मानी जाती हैं। लेकिन ऐसी स्थितियाँ भी पेश आती हैं, जहाँ सही और गलत में इस तरह दिन और रात की तरह स्पष्ट अंतर करना संभव नहीं होता!

आप यह भी कह सकते हैं कि अपने माता-पिता का अपमान करना गलत है- लेकिन यह अपमान वाली बात कहाँ लागू होती है? क्या आपके लिए उनके द्वारा लिए गए निर्णयों पर न चलना उनका अपमान करना माना जाएगा? क्या उनके नैतिक मानदंडों और मूल्यों का अनुपालन न करना गलत होगा? यह निश्चित रूप से हो सकता है कि वे इसे गलत मानें जबकि आप पूरी तरह अलग विचार रखते हों!

क्या मैं ठीक कर रहा हूँ?

यह सामान्य प्रश्न जीवन के किसी भी मुकाम पर सामने आ सकता है! व्यवसाय, आपसी सम्बन्ध, बच्चों की शिक्षा, मित्रता- आप कभी भी ऐसी स्थिति में आ सकते हैं, जहाँ आपको लगेगा कि अब क्या किया जाए। भले ही अक्सर आप अपने निर्णय आत्मविश्वास के साथ लेते हों, अक्सर होने वाली आलोचनाओं को आसानी के साथ दरकिनार कर देते हों मगर एक ऐसा बिंदु होता है, जहाँ आप खुद अपनी ओर और उस परिस्थिति की ओर देखते हैं और सोच में पड़ जाते हैं:

मुझे क्या करना चाहिए?

मैं आपको एक बात बताता हूँ: कोई दूसरा कभी नहीं बता सकता कि आपको क्या करना चाहिए और न ही कोई दैवी हस्तक्षेप या प्रेरणा होती है, जो अचानक हर चीज़ ठीक कर दे। फिर भी, कहा जाना चाहिए कि न तो कुछ गलत होता है और न सही और सभी कभी-कभार ऐसी परिस्थितियों से गुज़रते ही रहते है।

मन ही मन उन बातों का जायजा लीजिए, जो आप वास्तव में जानते हैं, उन निर्णयों, विचारों को याद कीजिए, जिनके बारे में आप सुनिश्चित हैं कि वे ठीक हैं और उन्हें बदलने की ज़रूरत नहीं है। भले ही लोग कहते रहें कि आप गलत हैं। फिर उस बिन्दु से धीरे-धीरे आगे बढ़िए और अपनी भावनाओं और विचारों के सहारे आगे बढ़िए। सलाह लीजिए, जब आपको लगे कि यह उचित है-और पता कीजिए कि आप किस बात को वास्तव में अनुचित समझते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एहसास अक्सर अस्थाई होता है। कभी-कभी उस परिस्थिति से कुछ देर के लिए या रात भर के लिए दूर हो जाना भी मदद करता है। उसके बाद फिर नए उत्साह और साहस के साथ शुरू हो जाइए और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़िए!

व्यापार में भी सिर्फ पैसा ही सब कुछ नहीं है – 2 सितम्बर 2014

जब मैं जर्मनी में था तो एक महिला मेरे एक व्यक्तिगत-सलाह-सत्र में आई। उसकी कुछ समस्याएँ थीं और वह समझ नहीं पाती थी कि वह इस विषय में क्या करे। इनमें से एक समस्या के संबंध में उसकी किंकर्तव्यविमूढ़ता पर आज अपने ब्लॉग में लिखना चाहता हूँ: एक ऐसे धंधे में, जो लोगों की सेवा पर आधारित है, ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है? ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की सेवा करना या उस धंधे से अपने लिए ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाना?

जो महिला मेरे पास आई थी वह एक तरह की फ़िजिओथेरपि करके अपनी आजीविका कमाती थी। वह अपने काम में पर्याप्त सफल थी: उसके मरीज़ों को सिर्फ दो या तीन बार उसके पास आना पड़ता था। उसके बाद वे नहीं आते थे क्योंकि आने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी। दो-तीन सत्रों में ही वह उनकी पीठ का दर्द ठीक कर देती थी, उनके घुटने का दर्द जाता रहता था या कम से कम उसमें काफी सुधार हो जाता था और फिर वह अपने सत्रों में उन्हें घर में करने के बहुत से व्यायाम, आसन वगैरह बता देती थी, जिन्हें करने पर उन्हें लाभ होता था। उन बीमारियों के लिए उन्हें आगे और सत्रों की बुकिंग कराने की, यानी अतिरिक्त पैसे खर्च करने की ज़रुरत ही नहीं होती थी।

महिला इस स्थिति से कुल मिलाकर खुश थी। सड़क चलते उसके मरीज़ उससे मिलते और उसका तहे दिल से शुक्रिया अदा करते और कहते कि उसके इलाज-सत्रों से उन्हें बहुत लाभ पहुँचा है। कौन ऐसी प्रशंसा से खुश नहीं होगा?

लेकिन उसका पति? वह उससे कहता कि उसे एक अच्छे व्यापारी की तरह व्यवहार करना चाहिए। इलाज की शुरुआत में ही उसे लोगों से कहना चाहिए कि अगर वे इलाज शुरू करना चाहते हैं तो कम से कम पाँच सत्रों का पॅकेज उन्हें लेना होगा। भले ही वे दो सत्रों में ही क्यों न ठीक हो जाएँ उन्हें पूरे पाँच सत्रों का शुल्क अदा करना होगा। तब उन्हें पहले ही निश्चय करना पड़ता कि वे पूरे सत्रों में शामिल होना चाहते हैं या नहीं।

इस विषय पर वह मेरी राय लेना चाहती थी। क्या उसे लोगों को पाँच बार बुलाकर ज़्यादा पैसे कमाने चाहिए भले ही उन्हें इतने चक्कर लगाने की ज़रुरत न हो?

मैंने उससे कहा कि बिलकुल नहीं। सबसे पहले मैंने उससे पूछा: इस विषय में उसका दिल क्या कहता है? और उसने जवाब दिया कि ऐसा करना उसे उचित नहीं लगता। जिस तरह वह काम कर रही है, उससे वह संतुष्ट है और बाहर के लोगों से मिलने वाली सलाहों के कारण कभी-कभी उसे एहसास होता है कि वह कुछ गलत कर रही है। मैंने कहा: तो फिर, जैसा तुम्हें ठीक लगता है, वही करो।

दूसरी बात यह कि अपने काम के लिए तुम जो कुछ भी अच्छा कर सकती हो, पहले ही कर रही हो: यानी तुम अपने ग्राहकों को खुश और संतुष्ट कर रही हो। क्या तुम नहीं जानती कि व्यापार का अर्थ अपने ग्राहकों को लूटना नहीं है? उनकी जेब से ज़्यादा से ज़्यादा पैसा निकलवाना नहीं है। व्यापार सेवा प्रदान करना है, कोई ऐसी वस्तु बेचना है, जो दूसरों की आवश्यकता की पूर्ति करती हो, दूसरों की सहायता करती हो, उन्हें सुख पहुँचाती हो!

आपके लिए संतुष्ट और प्रसन्न ग्राहक से बढ़कर कोई विज्ञापन नहीं हो सकता! अगर आपका कोई ग्राहक सड़क चलते आपसे कहता है कि वह आपकी सेवाओं से खुश है, तो यह बात वह दूसरों से भी कहेगा। वास्तव में वह कहेगा, 'उसने दो सत्रों में ही मुझे पूरी तरह ठीक कर दिया!' बल्कि यह भी जोड़ेगा कि इसी तकलीफ के लिए पहले कराए इलाजों से आपका इलाज कितना बेहतर रहा- 'वहाँ इतना पैसा खर्च किया, इतना समय बरबाद किया मगर ज़रा आराम नहीं हुआ था।' इससे आपको और ज़्यादा ग्राहक मिलेंगे, जिससे लम्बे समय में आपको लगातार अधिक से अधिक काम मिलता रहेगा और आमदनी होती रहेगी जोकि पहली बार आए ग्राहक को एक बार में ही लूटने-खसोटने से कभी नहीं हो सकती!

इस मामले में सबसे मज़ेदार बात यह है कि कोई भी व्यक्ति दिल से हमेशा उचित कदम उठाना चाहता है। यह उसकी असुरक्षा और अपनी भावनाओं पर पूरा विश्वास न करने का नतीजा होता है, जिसके कारण वह भ्रमित होता है और कई बार कोई दूसरा रास्ता अपनाने के लिए उद्यत हो जाता है। इस तरह के भय से मुक्त हों, उन्हें कान न दें- अपने दिल की आवाज़ सुनते हुए उचित रास्ता अपनाएँ!

सिर्फ असंतुष्ट लोग ही जीवन के मकसद के बारे में पूछते हैं – 28 जुलाई 2014

मैंने अभी हाल ही में एक व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत सत्र किया, जिसके मन में कुछ अजीबोगरीब प्रश्न घूम रहे थे। स्वाभाविक ही, जब मेरी किसी के साथ इस तरह की बातचीत होती है तो मुझे अपने ब्लॉग का विचार आता है और आपका भी कि निश्चय ही आप लोग होते तो इस कमरे में हमारी बातचीत में शामिल होकर उसका भरपूर आनंद ले सकते थे। क्योंकि यह संभव नहीं है मैं इस ब्लॉग के माध्यम से अपनी चर्चा आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ।

जो व्यक्ति मेरे पास व्यक्तिगत सत्र हेतु आया था, उसने बताया कि कुल मिलाकर वह अपने जीवन से पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। वह एक अवकाशप्राप्त व्यक्ति था, जिसका एक परिवार था और उसके कुछ शौक थे, जिन्हें पूरा करके वह खुशी से भर उठता था। योग उनमें से एक था। लेकिन उसने यह भी जोड़ा कि उसकी योग कक्षाओं में अधिकतर लोग अपने आपको जिज्ञासु मानते हैं और उससे पूछते हैं कि क्या "जीवन के मूलभूत प्रश्नों" के उत्तर जानने की उसे कोई जिज्ञासा नहीं होती: जैसे, मैं इस धरती पर क्यों आया हूँ? या यह कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?

उसने आगे कहा कि अब उसे भी यह महसूस होने लगा है कि उसे भी इन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहिए या कम से कम इसकी खोज करने का प्रयास तो करना ही चाहिए। इस दिशा में वह विभिन्न संभावनाओं पर विचार भी कर चुका था, जिनमें से एक यह विचार था कि उसका यह जीवन उसका एक अवतार मात्र है और इस जीवन को उसे अच्छे कर्म करते हुए बिताना चाहिए, जिससे एक दिन उसे निर्वाण यानी पूर्ण मुक्ति प्राप्त हो सके। उसने मुझसे पूछा कि मैं उसके इस विचार के बारे में क्या सोचता हूँ।

मैंने जवाब दिया कि मेरा मानना यह है कि ये सारे प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं हैं। आपका अस्तित्व यहाँ और अभी है। जब तक आप यहाँ, इस दुनिया में हैं और आपके पास सभी आवश्यक सुख सुविधाएँ मौजूद हैं तो फिर इस बारे में व्यर्थ परेशान होने की आवश्यकता ही क्या है? आप स्वस्थ हैं, आपके पास पर्याप्त भोजन उपलब्ध है, आपके बहुत से यार-दोस्त और भरा-पूरा परिवार है। इसके अलावा आप कह रहे हैं कि इस वक़्त आप वास्तव में बड़े खुश हैं! तो फिर वास्तव में ऐसे प्रश्नों का क्या मतलब रह जाता है?

ये प्रश्न उन लोगों के लिए हैं बल्कि उन्हीं लोगों द्वारा पैदा किए गए हैं, जो नाखुश हैं। जो लोग उन चीजों से संतुष्ट नहीं हैं जो जीवन में उनके पास मौजूद हैं। आप इस वक़्त यहाँ हैं! इस बात पर ध्यान केन्द्रित करने की जगह, इस बात को सुनिश्चित करने की जगह कि आपके जीवन में जो कमी है उसे पूरा करने का प्रयास करें, आप उस समय के बारे में सोचते हैं जो आपकी मृत्यु के बाद आने वाला है!

कोई नहीं जानता कि आगे क्या होने वाला है और हमारी आखिरी साँस के बाद क्या होगा। लेकिन मेरे विचार से उसका कोई महत्व भी नहीं है। वास्तव में जीवन के इस पल में यह बात पूरी तरह अप्रासंगिक है।

मुझे लगता है कि सिर्फ धर्म और वे लोग, जो दूसरों के आध्यात्मिक भ्रमों से लाभ उठाते हैं, इन प्रश्नों का समर्थन और प्रचार करते हैं, इन प्रश्नों को बड़े से बड़ा बनाकर पेश करते हैं और इस तरह उसे इतना महत्वपूर्ण बना देते हैं, जितने महत्वपूर्ण वे कतई नहीं होते।

सिर्फ यहाँ और अभी खुश रहने की कोशिश कीजिए। आपका अस्तित्व है या नहीं? अगर हैं तो फिर उन बातों को, उन चीजों को खोजना शुरू मत कीजिए, जिनका अस्तित्व ही नहीं है या उन प्रश्नों से भ्रमित न होइए, जिनका वास्तव में कोई उत्तर है ही नहीं। दूसरों को आपके जीवन में भ्रम पैदा करने मत दीजिए! जो आप हैं और जो आपके पास उपलब्ध है, उसी में खुश रहिए- आपको किसी काल्पनिक या वायवीय चीज़ को खोजने की ज़रूरत नहीं है!

संदेहवाद अथवा अज्ञेयवाद एक पड़ाव है, अंतिम लक्ष्य नहीं – 16 जनवरी 2014

आज मैं धर्म या धार्मिक लोगों पर नहीं और नास्तिकों पर भी नहीं बल्कि संदेहवादियों या अज्ञेयवादियों (Agnosticism) पर कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहता हूँ।

जो इस शब्द को पहली दफा सुन रहे हैं, उनके लिए बता दूँ कि ये वही लोग हैं, जो अपने आपको आस्तिक तो नहीं मानते मगर नास्तिक भी नहीं मानते। लब्बोलुवाब यह कि वे मानते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व हो सकता है। वे इस बात पर सुनिश्चित नहीं हैं कि कोई परम शक्ति का अस्तित्व है या नहीं है। वे अपने आपको संशयवादी, संदेहवादी, अनिश्चयवादी और कुछ लोग और आगे जाकर, अपने झुकाव या प्रवृत्ति के अनुसार ‘अज्ञेयवादी आस्तिक’ या ‘अज्ञेयवादी नास्तिक’ कहते हैं।

अज्ञेय या संदेह वादी का तर्क यह होता है कि ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं, जिनका स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता और जबकि एक ओर ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है तो दूसरी तरफ यह भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं ही है। यह संदेह हमेशा रहेगा और इसलिए वे भी हमेशा संदेह में रहते हैं।

ईश्वर पर उनका यह संदेह आस्था के संभावित लाभों को त्यागे बिना धर्म पर संदेह जताने की चेष्टा से उपजे हैं। अगर यह अंततः सत्य प्रमाणित हो जाए तो आपको स्वर्ग, मोक्ष या वह सब प्राप्त हो जाएगा, जिसे आपकी आस्था (या धर्म) प्रदान करने का वचन देती है। लेकिन आपको वे लाभ मिल नहीं पाएंगे क्योंकि वास्तव में आप उन पर विश्वास ही नहीं करते! एक आस्तिक की नज़र में अगर आपके मन में संदेह है तो आप ईश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं हैं। अगर आपने ईश्वर के अस्तित्व के प्रति ज़रा सा भी संदेह व्यक्त किया है तो कोई भी धर्म आपको आस्थावान नहीं मानेगा। उनके अनुसार तो आप नास्तिक ही हैं। आप चाहते हैं कि आपके लिए एक खास वर्ग बनाया जाए और उसे कुछ विशिष्ट शर्तों के साथ ‘अज्ञेयवादी’ कहा जाए। आप ईश्वर पर विश्वास नहीं करते लेकिन चाहते हैं कि खुदा न खास्ता वह मौजूद हो ही तो फिर आप उसके लाभों से वंचित न रह जाएँ।

इस भौतिक दुनिया में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां आप यह सुनेंगे कि: संदेह करना अच्छी बात है। जब आप सत्य के रूप में स्वीकृत उन बातों पर प्रश्न खड़े करेंगे तभी आप कुछ आगे बढ़ सकते हैं; जैसे संदेह ही कई क्षेत्रों में हुईं बहुत सी वैज्ञानिक खोजों मे मूल में दिखाई पड़ता है। लेकिन जब मानव मस्तिष्क की बात होती है तब संदेह को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल मैं उसे संदेह मानता ही नहीं बल्कि उसे भ्रम कहता हूँ। और यह भ्रम की स्थिति उन लोगों के लिए और भी बुरी है क्योंकि वे न इधर के हैं न उधर के।

जो लोग अपनी आस्था पर अडिग हैं उनका मन-मस्तिष्क साफ है। वे जानते हैं कि ईश्वर है, वे जानते हैं कि उसका प्रेम और उसकी कृपा प्राप्त करने के लिए उन्हें क्या करना होगा और वे वैसा करते हैं। और जो आस्तिकता से मुक्त हैं वे भी अपनी आस्था को लेकर स्पष्ट हैं। वे जानते हैं कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है और उन्हें अपने नैतिक मूल्यों के अनुसार व्यवहार करने के अतिरिक्त और कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। जो भ्रम में जीते हैं उनके पास आस्तिकों की तरह मार्गदर्शन के लिए कुछ भी नहीं होता और न ही वे नास्तिकों की तरह मुक्त ही होते हैं!

मेरा विश्वास है कि यह स्थिति अंततः उनके व्यक्तित्व के लिए समस्या बन जाता है। किसी निर्णय पर पहुँचने में उन्हें समस्याएँ पेश आएंगी क्योंकि वे निश्चित नहीं हैं कि किधर जाना उचित होगा। क्या मैं खुद स्वतंत्रतापूर्वक कोई निर्णय ले लूँ या मुझे धार्मिक नियमों के बारे में समझकर निर्णय लेना चाहिए क्योंकि आखिर वे महत्वपूर्ण हो भी सकते हैं, भले ही आज वे अप्रासंगिक लग रहे हों? मैं वास्तव में कौन हूँ और कहाँ से आया हूँ? उन्हें अपनी पहचान के साथ समस्या हो सकती है, निर्णय न ले पाने की स्थिति आ सकती है जिसका कि परिणाम आखिर में मनोवैज्ञानिक समस्याओं के रूप में हो सकता है।

स्वाभाविक ही, संदेहवादी होना आस्तिक से नास्तिक हो जाने की प्रक्रिया के बीच कोई संक्रमण बिन्दु भी हो सकता है और मैं खुद भी कुछ समय तक इसी बिन्दु पर अटका रह चुका हूँ। यह एक संक्रमण काल होता है, जिसमें आप विभिन्न विचारों को आपस में मिलाते हैं, उन पर एक साथ विचार करते हैं और अंततः सत्य आपको स्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है। लेकिन स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है! किसी को भी अधिक समय तक भ्रम की हालत में नहीं रहना चाहिए अन्यथा मानसिक समस्याएँ पैदा होना अवश्यंभावी है!

अगर आप उनमें से एक हैं, जो अपने आपको ‘अज्ञेयवादी’ या ‘संदेहवादी’ के रूप में वर्गीकृत करते हैं तो आपकी भलाई इसी में है कि आप कृपया इस तरफ या उस तरफ होने का निर्णय अवश्य ले लें!