जब आपके मेज़बान लगातार लड़ते-झगड़ते रहें! 22 जून 2014

पिछले हफ्ते मैंने आपको सन 2006 के दौरे के बारे में बताया था, जब मैं और यशेंदु एक ऐसे आयोजक के यहाँ रहे थे, जिसने हमसे अपनी क्षमता से बहुत ज़्यादा का वादा कर लिया और फिर उसे पूरा नहीं कर पाई-और फिर सारे हादसे को हमें होनी मानकर स्वीकार करना पड़ा था। उस साल हमें इसी तरह के और भी कई वाकयों से दो-चार होना पड़ा; उनमे से एक तो कुछ ज़्यादा ही असुविधाजनक सिद्ध हुई थी: जब हमारा मेज़बान और उसकी पत्नी लगातार लड़ते-झगड़ते रहते थे!

जी हाँ, वह मेरा एक मित्र था, जिससे मेरा परिचय साल भर पहले अपने एक कार्यक्रम के दौरान हुआ था। वह अपने घर में मेरा एक कार्यक्रम रखना चाहता था और उस यात्रा में समय की कमी वजह से कार्यक्रम हो नहीं पाया और हमने उसे 2006 के अगले दौरे में उसके घर कार्यक्रम रखने का आश्वासन दिया था। तय समय पर मैं और यशेंदु उसके घर पहुँचे और पति-पत्नी ने हमारा हार्दिक स्वागत किया। पहली शाम बहुत अच्छी रही जब हमने एक ध्यान-सत्र आयोजित किया और अगले कुछ दिनों की कार्ययोजना तैयार करते रहे, यहाँ तक कि कुछ लोगों ने उन कार्यक्रमों की बुकिंग भी कर ली। तो इस तरह हमें उनके साथ काम से भरे-पूरे सप्ताह की प्रत्याशा थी-लेकिन सबेरे-सबेरे, जब अभी हम सोकर उठे ही थे, हमें बगल वाले कमरे से किसी के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी। वह मेरे मित्र की पत्नी थी।

खैर, हमने अधिक ध्यान नहीं दिया क्योंकि किसी का असहमति में उत्तेजित होना, शोरगुल के साथ भी, हमारे लिए नई या असामान्य बात नहीं थी क्योंकि हम अक्सर लोगों के घरों में ही रहते रहे हैं। हम लोग उस वक़्त जर्मन बिलकुल नहीं जानते थे और इस बात को समझ रहे थे कि किसी निश्चित परिणाम पर कूद पड़ना उचित नहीं होगा: हो सकता है वह किसी बात से परेशान हो। हम उस बात को बिलकुल भूल गए-लेकिन शाम को फिर वही चीखना-चिल्लाना और इस बार तो दोनों एक-दूसरे पर अपना गुस्सा उतार रहे थे!

अगले कुछ दिन जब-तब दोनों एक-दूसरे पर खीझते-झुँझलाते और चिल्लाते-चीखते रहते थे और निश्चय ही उनकी आपसी लड़ाइयाँ क्रमशः गंभीर होती जा रही थीं। पहले उन तमाशों को वे हमसे छिपाने की कोशिश करते रहे, विवाद होने पर हमें छोड़कर दूसरे कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लेते थे। लेकिन एक बार ऐसा हुआ कि मैं बाथरूम की तरफ जा रहा था तो देखा मेरा मित्र टेढ़ा मुँह बनाए, सीढियाँ चढ़ता ऊपर आ रहा है और नीचे से उसकी पत्नी उस पर चीख रही है। मित्र ने नोटिस किया कि मैंने उसका चिल्लाना सुन लिया होगा और तुरंत उसके चेहरे पर विषाद की रेखाएँ उभर आईं।

वह बड़ी देर मेरे सामने अफ़सोस ज़ाहिर करता रहा कि वह सोच रहा था कि यह सप्ताह इतना बुरा नहीं होगा। सचाई यह थी कि उसके और पत्नी के बीच कई हफ़्तों से यह रोज़मर्रा की सामान्य बात हो चुकी थी। वे रोज़ ही लड़ते-झगड़ते रहते थे। और दिन में कई-कई बार।

स्वाभाविक ही, मैंने अपनी तरफ से उनकी सहायता का प्रस्ताव रखा। मैंने कहा कि दोनों के साथ एक जीवन-साथी सत्र रख लेते हैं और संभव है हम सब मिलकर कोई बेहतर रास्ता निकाल पाएँ, झगड़े का कोई हल, कोई सार्थक तरीका। मेरे प्रस्ताव पर वह खुश हुआ और कहा कि वह अपनी पत्नी से बात करेगा।

दूसरे दिन वह आया और मुझसे कहा कि उसकी पत्नी ने सहायता का मेरा प्रस्ताव ठुकरा दिया है।

खैर, कोई न चाहता हो तो आप उसकी सहायता नहीं कर सकते। लेकिन मैंने इस मामले में अपने मित्र का दृष्टिकोण सुना और सलाह देकर कि मसले पर वह क्या कर सकता है, उसकी थोड़ी-बहुत मदद करने की कोशिश की-लेकिन उनके घर से निकलते हुए हमारे मन में यही बात घुमड़ रही थी कि यह सम्बन्ध ज़्यादा दिन चलने वाला नहीं है। और अगर वे साथ रहते भी हैं तो जीवन भर लड़ते-झगड़ते ही रहेंगे!

मैं आशा ही कर सकता था कि भविष्य में मुझे कभी भी ऐसे घर में नहीं रहना पड़ेगा जहाँ इस तरह की समस्याएँ मौजूद हों-और कामना करता रहा कि मेरे किसी भी मित्र के यहाँ इस तरह की समस्याएँ दरपेश न हों!

परस्पर विपरीत रुचियों के चलते रिश्तों में आने वाली दिक्कतें – 18 दिसंबर 2013

परसों मैंने बताया था कि यह संभव है कि आपके दोस्तों और परिवार वालों के विचार आपसे बिल्कुल विपरीत हों। कल मैंने लिखा था कि आपको इस तथ्य को हर हाल में स्वीकार करना ही पड़ता है भले ही इस कारण आपकी मित्रता उतनी अंतरंग न हो सके जितनी कि आप चाहते हैं। जब आप बदलते हैं तो आवश्यक नहीं कि आपके आसपास के लोग भी बदल ही जाएँ या बदलें तो किसी और ही रूप में बदलें। सबसे बुरा यह होता है कि आपका जीवन-संगी या आपकी जीवन-संगिनी ऐसे हों। तब क्या हो, जब वह व्यक्ति आपके अनुसार न बदल पाए, जिसके साथ आपको सारा जीवन बिताना है?

दुर्भाग्य से मैं बहुत से ऐसे लोगों को जानता हूँ जो इस परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। उनके विचार समय बीतने के साथ बदलते गए हैं लेकिन उनके जीवन साथी उस दिशा में उतना विकास नहीं कर सके। अब आपके साथ एक ऐसा व्यक्ति रह रहा है, जिसके साथ जीवन भर साथ रहने की आपने कसमें खाई हैं, जिसे आप दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करना चाहते हैं, जिसके लिए आप सब कुछ छोड़ सकते हैं-लेकिन आप दोनों के विचार आपस में नहीं मिलते!

आप दोनों एक दूसरे से प्रेम करने का इरादा रखते हैं लेकिन इतने सारे विषय हैं, जिन पर आप बात ही नहीं कर सकते क्योंकि आप जानते हैं कि आपका साथी आपकी बात पसंद नहीं करेगा, आपके विचारों और आपके निर्णयों का प्रतिवाद करेगा और आपकी भावनाओं का समर्थन नहीं करेगा। आप उसके साथ बहुत सी बातों को साझा करने में हिचकते हैं और चिंतित होते हैं कि कैसे आप दिन-ब-दिन उससे दूर होते जा रहे हैं।

स्वाभाविक ही, इस मामले में आपका वह रवैया नहीं हो सकता जैसा एक मित्र के साथ संभव हो सकता है कि सप्ताह में एक बार फोन कर लिया या माह में एकाध बार मिल लिए। आपका 24 घंटे का साथ है और आप रहना भी चाहते हैं लेकिन फिर सवाल खड़ा हो जाता है कि अब, इसके बाद एक-दूसरे का क्या करें! आपके दिलों के बीच दूरी पैदा होने लगती है, आप लंबी और आत्मीय बातचीत नहीं कर सकते और सिर्फ मौसम और राजनीति पर बात करते हुए संबंध सामान्य नहीं बने रह सकते! उसके लिए कुछ अंतरंग वार्तालाप की ज़रूरत पड़ती है और जो नदारद है!

आप आने वाली समस्याओं की कल्पना कर सकते हैं। असहमतियाँ, झगड़े, निःशब्दता, मौन, यौनेच्छा की कमी या शायद कुछ समय बाद किसी दूसरे के साथ सेक्स संबंध की इच्छा, क्रोध, कुंठा और निराशा और उन लोगों के संदर्भ में, जो आपसी निकटता हासिल करने में असमर्थ होते हैं, दुर्भाग्यपूर्ण अलगाव।

अगर आप इस अवस्था में है तो मैं आपसे इतनी ही गुजारिश करूंगा कि अपने साथी से बात करें, चर्चा करें। लगातार चर्चा करते रहें। अपना दिल खोलकर रख दें कि आप क्या महसूस कर रहे हैं और क्यों वैसा महसूस कर रहे हैं। मैं आशा करता हूँ कि वह, जिसे आप प्यार करते हैं और जो आपसे प्यार करता है, दोनों एक-दूसरे को समझ सकेंगे। भले ही वह आपके जैसा ही महसूस न कर सके मगर इतना ही काफी होगा अगर वह आपके विचारों को स्वीकार कर ले और उन संवेदनाओं और प्रेरणाओं को जान ले, जिन पर आपके निर्णय आधारित होते हैं। दिल को सदा खुला रखें और कुछ भी छिपाएँ नहीं।

आपको भी यह समझने की कोशिश करनी होगी कि क्यों आपका साथी आपकी बात समझने में असमर्थ हो रहा है या क्यों वह उसे समझने का इच्छुक ही नहीं है। आपको भी दूसरे के विचारों का आदर करना होगा और अपने साथी की मदद करनी होगी भले ही इसका नतीजा कहीं बीच में किया गया समझौता ही क्यों न हो। कोई ऐसी बात खोजिये, जिसकी आप दोनों को चिंता है, जिसकी आप परवाह करते हैं और सम्बन्धों के उन आयामों को महत्व दीजिये, जिन पर आप दोनों एकमत हैं, एक जैसे विचार रखते हैं। परस्पर संबंध में आवेग पैदा कीजिए और आप पाएंगे कि आप पुनः एक-दूसरे के साथ वैसा ही उत्कट प्रेम महसूस कर रहे हैं।

हम सब भिन्न मिट्टी के बने हुए हैं और जब हम किसी से दिल की गहराइयों से प्रेम करते हैं तो हमें थोड़ी सी परस्पर समानता की आवश्यकता होती है और यह समानता सिर्फ इतनी-सी भी हो सकती है कि हम सब मनुष्य हैं!

अजीब बात है, अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं के बीच सम्प्रेषण अधिक स्पष्ट और आसान है- 21 अक्तूबर 2013

एक बार जब हमारी मित्र सिल्विया हमारे आश्रम आई थी तब रमोना के साथ उसकी कुछ बातचीत हुई थी। रमोना ने जब उसके बारे में मुझे बताया तो मुझे वह बड़ा दिलचस्प लगा। बात उन दम्पतियों के विषय में थी जो अलग-अलग देशों और संस्कृतियों से आते हैं, विशेषकर जो अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं। सिल्विया ने एक अध्ययन की रिपोर्ट पढ़ने के बाद पाया कि ऐसे दंपतियों का वैवाहिक जीवन ज़्यादा स्थायी होता है।

ऐसे दम्पति का एक हिस्सा होने के नाते यह मेरे लिए विशेष दिलचस्प था और हम इस विषय पर आगे भी बातें करते रहे कि क्या वाकई ऐसा है, क्या इसमें कोई तथ्य हो सकता है!

इसके पक्ष में सबसे पहला तर्क यही हो सकता है कि जब कोई व्यक्ति उसके सामान्य परिवेश के लिए अजनबी व्यक्ति के साथ संबंध रखना चाहता है तो वह स्वाभाविक ही ‘असामान्य’ लोगों, चीजों और विचारों के प्रति खुला रवैया रखने वाला होता है। ऐसे लोग जोखिम उठाने वाले होते हैं, नई बातें उन्हें आकर्षित करती हैं और वे भिन्न दिखाई देने वाली चीजों को बिना उन पर सोच-विचार किए अस्वीकार नहीं करते। संबंध स्थापित करने के मामले में यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि जैसे-जैसे समय बीतेगा, दोनों को ही कुछ न कुछ बदलना होगा। स्वाभाविक ही दोनों के ही व्यक्तित्व में नई-नई बातें उजागर होंगी और संबंध टिकाऊ हों इसका प्रयास दोनों को ही करना होगा और इसके लिए दोनों को ही अपने विचारों और व्यवहार में लचीलापन लाने की आवश्यकता होगी!

दो संस्कृतियों के व्यक्तियों के बीच सम्बन्ध स्थापित होने पर दोनों पार्टनर्स (साथी) इस बात को भली प्रकार से जानते होते हैं कि दूसरे को बचपन में उससे बिलकुल भिन्न प्रकार के अनुभव हुए हैं और वह ऐसे लोगों के साथ रहा है जो बिलकुल अलग तरह से सोचते होंगे और शायद उसे भी काफी हद तक अलग नज़रिये से ही देखते होंगे। ऐसा एक ही देश में और एक ही संस्कृति में भी होता है क्योंकि बिलकुल पड़ोस के दो घरों का रहन-सहन और संस्कृति भी बहुत भिन्न हो सकते हैं! अंतराष्ट्रीय दम्पतियों में सुविधा यह होती है कि वे इस तथ्य को अच्छी तरह से समझते हैं और स्वीकार करते हैं! उन्हें यह गलतफहमी नहीं होती कि दूसरा क्या कह रहा है, वे जान गए हैं! वे यह सोचकर कि उनका साथी उसके जैसा ही महसूस करेगा या सोचेगा, इस विषय में कोई निश्चित धारणा नहीं बना लेते। वे सावधानी के साथ बार-बार अपनी धारणा को पुष्ट करने की कोशिश करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर अपनी बात को स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं और दूसरे से भी पूछते रहते हैं।

इसके बाद ही दूसरा पहलू सामने आता है: भाषा का। भिन्न संस्कृतियों से आए दंपति अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए साफ-साफ शब्दों में अपनी बात रखने के लिए प्रवृत्त होते हैं। अगर वे एक दूसरे की भाषा नहीं जानते तो और भी ज़्यादा सतर्क रहते हैं और काफी विस्तार से अपनी बात रखने की कोशिश करते हैं, जिससे किसी प्रकार की गलतफहमी न रहे, क्योंकि वे जानते हैं कि या तो वह भाषा उसके पार्टनर की भाषा नहीं है या खुद उसकी भाषा नहीं है या दोनों की ही नहीं है! एक शब्द का हेरफेर भी बड़ा भ्रामक (बड़ी गलतफहमी का कारण) हो सकता है अगर उसे किसी दूसरे अर्थ में समझ लिया जाए। इसलिए ऐसे दम्पतियों को अक्सर बात के असली मतलब का अनुमान अपने पार्टनर की आँखों में झाँककर लगाना पड़ता है, एक दूसरे की भावनाओं को समझते हुए उस शब्द को समझना पड़ता है, बल्कि कई बार उसके शाब्दिक अर्थ से बिलकुल विपरीत अर्थ को भी।

किसी दूसरे देश या दूसरी संस्कृति और दूसरी भाषा बोलने वाले से संबंध बनाने पर इच्छित परिणाम प्राप्त करने के लिए कई लोग ध्यान या दूसरे किसी बौद्धिक या आध्यात्मिक अभ्यास का सहारा लेते हैं: इस बात को समझने के लिए कि वे दरअसल क्या चाहते हैं, सोचते हैं और अनुभव करते हैं और फिर उसके अनुसार व्यवहार करते हैं और या ठीक उसी के अनुसार अपनी भावनाओं का इज़हार करते हैं। इस तरह आप ज़्यादा चैतन्य और सावधान होते हैं कि जो आप कर रहे हैं या कह रहे हैं वह आपके आसपास के लोगों पर क्या असर डाल रहा है।

जबकि दूसरे देश के किसी पुरुष या महिला के प्रति आपका प्रेम आपको यह सब करने के लिए मजबूर करता है, मैं यह समझता हूँ कि अपने देश के व्यक्ति के साथ संबंध होने पर भी आपको यही करना चाहिए। बल्कि, मैं तो यह कहूँगा कि जीवन के हर क्षेत्र में, अपने हर तरह के सम्बन्धों पर इसे लागू किया जाना आपके लिए अच्छा ही होगा। हमेशा बहुत सोच-समझकर व्यवहार कीजिए, कोई बात कहिए, और आपके अंतरंग संबंध, बल्कि आपकी मित्रताएँ भी दीर्घजीवी हो जाएंगी!

अहं के साथ संघर्ष – स्वयं के साथ एक लगातार कशमकश? 2 अक्तूबर 2013

मैंने कल इस बात का वर्णन किया था कि कैसे अधिकतर लोग अहं के कारण जीवन में एक न एक बार परेशानी में पड़ जाते हैं। जब कि कल मैंने अपने ब्लॉग को बिना सोचे-समझे की गई त्वरित टिप्पणियों पर केन्द्रित किया था वहीं आज मैं काफी सोच-समझकर, सही-गलत का विचार करने के बाद की जाने वाली उन बातों की चर्चा करूंगा, जिनके बारे में आप स्वयं भी अच्छी तरह जानते होते हैं कि आप, दरअसल, अपने अहं के दबाव और प्रेरणा के चलते ऐसा कर रहे हैं।

मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि ऐसी स्थितियों के बारे में भी आप जानते हैं-या तो आपने स्वयं ऐसा व्यवहार किया है या किसी परिचित ने आपके साथ किया है। एक निर्णय लिया जाना है, कुछ न कुछ किया जाना ज़रूरी है और ऐसा करने के कम से कम दो विकल्प हैं: या तो आप अड़ जाएँ कि जैसा आप चाहते हैं वैसा ही हो या-वैसा जो आपके अहं की तुष्टि करे-या आप अपने अहं को काबू में रखने में कामयाब हो जाएँ और वही करें, जो उच्चतर लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे ज़्यादा लाभप्रद साबित हो।

इसका यह अर्थ नहीं हैं कि आप अपने अहं से पराजित होकर खुश हैं। नहीं, आप कोई दूसरा निर्णय करने का भरसक प्रयास करते हैं, आप वाकई नहीं चाहते कि आपका अहं आप पर विजय प्राप्त करे लेकिन अंततः आप हार ही जाते हैं। दरअसल, आपके भीतर एक अंदरूनी नाकेबंदी है, एक रुकावट, जिसे पार पाना आपके लिए नामुमकिन हो जाता है! यह स्थिति, कल बताई गई स्थिति से ज़्यादा समस्यामूलक है, जो आपको अहं-युक्त त्वरित प्रतिक्रिया देने पर मजबूर करती है। क्योंकि वर्तमान स्थिति में स्पष्ट ही अहं आप पर सवार हो गया है और समय गुजरने के साथ धीरे-धीरे उतरता नहीं है। अगर वह एक पल में आपको चित कर दे और फिर दूसरे ही पल आपके काबू में आ जाए तो उतनी परेशानी नहीं है। अगर आप कई दिनों तक उसके साथ संघर्ष कर रहे हैं और लगातार हारते ही चले जा रहे हैं तो ऐसी तात्कालिक समस्याओं को सुलझाना भी और भविष्य में ऐसी हालत पैदा न हो इस दिशा में कदम उठाना भी मुश्किल हो जाता है!

आप अपने निर्णय पर पछताते हैं लेकिन हर बार जब भी ऐसी स्थिति निर्मित होती है, आपका अहं आपको तुरंत अंधा कर देता है और आप अपनी पिछली गलती से सीखा हुआ सबक भूल जाते हैं। आप वही बात बार-बार दोहराते हैं और एक के बाद दूसरे मामले को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते चले जाते हैं। आपको समझ में नहीं आता कि इस कड़ी को कैसे तोड़ा जाए।

मैं यह ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि दुर्भाग्य से इस समस्या का समाधान आसान नहीं है। कोई जादू की पुड़िया नहीं है, जो इस बीमारी को ठीक कर सके और न कोई शल्यचिकित्सा है कि काट-पीटकर आपके अहं को बाहर निकाल दिया जाए। आपको खुद प्रयास करना होगा। फिर भी मैं कहूँगा कि संघर्ष करने की जगह आपको पहले सकारात्मक रवैया अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। अपने व्यवहार पर और गहराई के साथ सोचें और अपने उसमें होने वाले छोटे-मोटे सुधार के महत्व को समझें। जब आप शिद्दत से चाहेंगे कि अपने अहं पर काबू पाना ही है तभी आप इसे अंजाम दे सकते हैं! दृढ़ इच्छाशक्ति से कुछ भी संभव है!

इतनी ही सलाह मैं दे सकता हूँ कि जब ऐसी कोई परिस्थिति सामने आए तो आँखें और मस्तिष्क खुले रखें और सोच-समझकर बरताव करें या कोई निर्णय लें। कुछ सवाल अपने आप से पूछे: अपने अहं के विपरीत जाते हुए अगर अपने तरीके से इस काम को नहीं करेंगे तो दूसरों को इससे क्या लाभ हो सकता है? इसके विपरीत, अगर अपने अहं की तुष्टि करते हुए आप वही काम करते हैं तो इससे किसी का क्या भला हो सकता है? समान्यतः इसका उत्तर होगा, कुछ भी नहीं, ऊपर से आप व्यर्थ ही अहंकारी माने जाएंगे। अपने अहं के विपरीत जाने पर आपका कोई नुकसान नहीं होगा-विपरीत इसके, लोग, अक्सर, इस बात को सराहेंगे! तो फिर ऐसा क्यों न किया जाए?

जब आपके दो मित्र लड़ बैठें तो आपको क्या करना चाहिए?- 24 सितंबर 2013

कल मैंने कुछ मित्रों के बारे में लिखा था और बताया था कि ऐसी मित्रता होना कितनी शानदार बात है जिसमें सबको वैसा ही आपसी साहचर्य प्राप्त होता है जैसा संयुक्त परिवार में सभी सदस्यों को एक दूसरे से प्राप्त होता है। लेकिन, दोस्तों के बीच कई बार बड़ी जटिल परिस्थितियाँ भी पैदा हो जाती हैं। जैसे मान लीजिए, आपके दो मित्र अचानक झगड़ने लगें और आप दोनों के बीच फंस गए हों। आपको क्या करना चाहिए?

मैं समझता हूँ, ऐसी स्थिति, कभी न कभी, हर एक के जीवन में आती है जब आपके दो नजदीकी व्यक्ति विचारों की विभिन्नता के चलते, बहस में उलझ जाते हैं। या उनमें से एक कोई ऐसी बात कर बैठता है जो दूसरे को निराश या दुखी कर देती है। कुछ भी हो, आप सीधे-सीधे इस समस्या से जुड़े नहीं हैं इसलिए दो ऐसे दोस्तों के बीच चुपचाप खड़े हैं जो भविष्य में एक दूसरे के साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहते लेकिन आपके साथ दोस्ती कायम रखना चाहते हैं। आप भीतर से इस दुविधा में हैं कि इनके बीच हस्तक्षेप किया जाए या नहीं जिससे दोनों के बीच कोई समझौता कराया जा सके। आपको किसी एक का पक्ष भी लेना पड़ सकता है और इसके नतीजे में दूसरे को खोना भी पड़ सकता है। क्या तटस्थ रहना ठीक होगा या क्या तटस्थ रहना संभव होगा?

तटस्थ रहना सबसे अच्छा विकल्प हो सकता है क्योंकि आपको उनके वाद-विवाद से कोई मतलब तो था नहीं और आप उसमें उलझना भी नहीं चाहते। आप सिर्फ यह चाहते हैं कि दोनों आपके दोस्त बने रहें। बात तो बहुत अच्छी है लेकिन उसे कार्यरूप में परिणत करना बहुत मुश्किल है!

आप ऐसी हालत में क्या करेंगे जब दोनों मित्रों ने वाद-विवाद में बराबरी के साथ भागीदारी की हो? उदाहरण के लिए, क्या आप किसी एक के साथ फिल्म देखने जाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि दूसरे के साथ भी जल्द ही कोई दूसरी फिल्म ज़रूर देखेंगे? ऐसी जगह जहां दोनों उपस्थित हों, आप किसके साथ खड़े होंगे? क्या आप अपना समय दोनों के बीच बराबर-बराबर बाँट सकेंगे और क्या आपको इधर से उधर पाला बदलते हुए अटपटा नहीं लगेगा? और, जब आपके यहाँ किसी उत्सव का कोई आयोजन होगा, तब? क्या आप दोनों को बुलाएँगे? जी हाँ, और, तब आप उनसे अपेक्षा करेंगे कि जिम्मेदार वयस्कों की तरह व्यवहार करें और एक दूसरे के साथ शालीनता के साथ पेश आएँ या कम से कम एक दूसरे को नज़रअंदाज़ करें-लेकिन क्या इससे आपके आयोजन का माहौल ठंडा और नीरस नहीं पड़ जाएगा? क्या वह सभी मेहमानों के लिए बोझिल नहीं हो जाएगा?

आपको अपनी भावनाओं के अतिरिक्त, दो और लोगों की भावनाओं का खयाल भी रखना है। क्या दोनों में से एक आपसे उसका पक्ष लेने की अपेक्षा करता है और चाहता है कि आप दूसरे का साथ छोड़ दें? अगर आप किसी एक का पक्ष लेते हैं तो क्या दूसरा यह समझेगा कि आपने उसकी दोस्ती के साथ विश्वासघात किया है, अगर आप इस मामले में उसके पक्ष में प्रतिक्रिया नहीं देते?

ऐसी परिस्थिति में आपके मन में सैकड़ों सवाल आएंगे। मुझे लगता है कि इस समस्या के हल का कोई एक सही रास्ता उपलब्ध नहीं है और आप तटस्थ रहें या किसी एक का पक्ष लें, दोनों में से कुछ भी निश्चित रूप से कहना संभव नहीं है। यह विभिन्न स्थितियों पर निर्भर करेगा और कोई भी आपको ऐसी उचित सलाह नहीं दे सकता, जो सभी स्थितियों पर लागू हो सके। फिर भी एक बात मैं ज़रूर कहना चाहूँगा: यह देखिये कि आप इस बारे में क्या महसूस कर रहे हैं। आप उनके बीच हुए विवाद का कारण जानते हैं- क्या दोनों में से एक ने कोई अवांछनीय बात कह दी है या ऐसी बात दोनों ओर से कही गई है? क्या आप किसी एक के तुलनात्मक रूप से ज़्यादा नजदीक हैं और उसके साथ अपने सम्बन्धों को खतरे में डालने से अधिक दूसरे की दोस्ती छोडना ज़्यादा बेहतर समझेंगे? क्या आप समझते हैं कि आप दोनों के बीच मध्यस्थ हो सकते हैं और उससे इस मामले में कोई लाभ हो सकता है या उससे स्थिति और बिगड़ सकती है?

ये सारे सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब किसी दूसरे के पास हो ही नहीं सकता। मैंने अपने कुछ विचार आपके सामने रखे हैं, उन पर आप स्वयं विचार करें: अंततः आपको ही इस स्थिति से निपटना है और निश्चय करना है कि क्या किया जाना उचित होगा। एक बात गांठ बांध लें: जो भी आप करें, अपनी भावनाओं के साथ ईमानदार रहें और उन्हीं के आधार पर कोई कार्रवाई करें। तभी आप अपने निर्णय के प्रति आश्वस्त हो सकेंगे और भविष्य में किसी पछतावे से बच सकेंगे।

अरेंज्ड मैरेज यानी शादी मैंने आपसे करी है या पूरे परिवार से!-29 अप्रैल 2013

पिछले हफ्ते मैंने बताया था कि मेरे विचार में भारतीय दंपतियों में इतनी ज़्यादा वैवाहिक समस्याएं इसलिए हैं क्योंकि अधिकतर विवाह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) होते हैं। युवा लोगों के अपने स्वप्न होते हैं और जब उन्हें अपने जीवन साथी के बारे में पता चलता है कि वह बिल्कुल वैसा नहीं है जैसा उन्होंने अपने सपनों में देखा था तब कई समस्याएं पैदा होने लगती हैं। आम तौर पर वे अपने जीवन साथी के साथ तालमेल बनाए रखने की कोशिश करते हैं और उसमें कामयाब भी होते हैं, लेकिन मुख्य झगड़े तो परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ होते हैं। क्योंकि आम रिवाज यही है कि लड़की अपने पति और उसके परिवार के साथ रहने उनके घर आती है, उसे ही इन सब समस्याओं का सामना करना पड़ता है, खासकर अपनी सास को लेकर।

इस सच्चाई के पीछे कारण है कि पति के साथ होने वाले झगड़ों के मुकाबले परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ होने वाले झगड़े ज़्यादा कटु होते हैं। भारत में तलाक अभी भी आम नहीं हैं। अधिकतर मामलों में पति और पत्नी दोनों जीवन में कभी भी अलग होने के बारे में सोच भी नहीं सकते। वे यही सोचते हैं कि वे शादीशुदा हैं और उन्हें सदा साथ ही रहना है। आयोजित विवाहों के इस बाज़ार में जो मिल गया है उसी के साथ तादात्म्य स्थापित करने के अलावा अधिकांश लोगों के पास कोई विकल्प भी नहीं होता।

इसका अर्थ यह होता है कि पत्नी के आचार-व्यवहार को पति स्वीकार करेगा और पति की राय और विचारों को पत्नी स्वीकार करेगी। इसके अलावा अपने पति के कार्यकलापों में भी उसकी सहमति होगी। अगर वह कोई ऐसी बात करती है जो पति को अच्छी नहीं लगती तो वह उसे ऐसा करने से मना कर सकता है। और अगर वह अपनी बात पर अड़ी रहती है, पति का कहना नहीं मानती तब झगड़े की शुरुआत होती है। कुछ भी हो, अंततः दोनों को यह बात स्वीकार करनी पड़ती है कि इस मामले में दोनों के अलग-अलग विचार हैं। अगर वह घुमा-फिराकर फिर वही बात करती है तो अबकी बार वह कुछ नहीं कहेगा, सोचेगा, ‘छोड़ो, आखिर हमें साथ रहना है’। इसी तरह अगर पति की कोई बात उसे अच्छी नहीं लगती तो वह भी पहले तो प्रतिवाद करेगी, लड़ाई भी होगी मगर अंततः, चाहे पति वही बात बार-बार दोहराता ही क्यों न रहे, उसे स्वीकार करना ही होता है कि ‘क्या किया जाए? आखिर है तो मेरा पति!’

अब परिवार की चर्चा करें। उनके लिए मामला अलग है और फिर ताली दोनों हाथों से बजती है। एक औरत अपने पति की अजीबोगरीब हरकतें और विचार बर्दाश्त कर लेती है मगर हो सकता है कि वह अपने सास-ससुर या देवर की वही बातें बर्दाश्त न करे। अगर उसका पति कोई गलत बात कहता है तो वह कंधे उचकाकर, अपनी नियति को कोसती हुई उसे माफ कर सकती है। मगर यदि देवर या सास वैसी ही कोई बात कहे तो वह इतनी आसानी से उनकी बात नहीं मानेगी। आखिर माने भी क्यों? पति से उसका विवाह हुआ है, सारे परिवार से नहीं! भले ही वह बड़े विवादों से बचने की कोशिश करती रहे, उनसे पैदा हुए छोटे-छोटे कटु अनुभव उसके भीतर दुख और गुस्सा पैदा करते रहते हैं जो धीरे-धीरे इकट्ठा होते रहते हैं और एक न एक दिन फूट पड़ते हैं।

मैंने कहा कि ताली दोनों हाथों से बजती है और यह सच है। कुछ मामलों में पत्नी के मूर्खतापूर्ण रवैये को पति स्वीकार कर सकता है मगर हो सकता है कि परिवार न करे! अगर वह पति को कोई दिल पर लगने वाली बात कहे तो वह तुरंत उसे माफ कर सकता है, भूल सकता है मगर परिवार के दूसरे सदस्यों को वही बात इतनी नागवार गुज़र सकती है कि वे उसे जीवन भर न भूलें। वे ऐसी बातों को याद रखते हैं और गांठ बांध लेते हैं। आगे वे उसकी इन बातों को बर्दाश्त नहीं कर सकेंगे!

इसका परिणाम बड़ी लड़ाइयों के रूप में सामने आता है जो परिवार के टूटने की सीमा तक भी जा सकता है। कटुता और तनाव इतना बढ़ जाता है कि पति निर्णय करता है कि रोज़-रोज़ की चिकचिक और लड़ाई झगड़ों से बेहतर है घर से अलग हो लिया जाए।

दुर्भाग्य से सम्मिलित परिवारों में आजकल ऐसा बहुतायत से हो रहा है। और आयोजित विवाह ही इसके ज़िम्मेदार हैं। अगर कोई लड़की किसी से प्रेम करती हैं और उसी से उसका विवाह हो जाता है तो वह अपने पति की भावनाओं की बेहतर कद्र करती है और जानती है कि वह भी उसके पति के परिवार से जुड़ गई है। आयोजित विवाह के जरिये उस नए घर में ‘स्थापित’ बहू के मुकाबले उसका पति के परिवार के प्रति व्यवहार बहुत भिन्न होता है। परिवार के सदस्यों के लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता-उनका पुत्र या भाई किसी से प्रेम करता है और उसे बहू बनाकर ले आया है तो वे उसके साथ सामंजस्य बनाकर रखने में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। मगर यह तभी संभव हो पाता है जब पति के परिवार वालों की मानसिकता आयोजित विवाह की न हो और सद्भाव और प्रेम का वातावरण निर्मित करने की परिवार के सभी सदस्यों की व्यक्तिगत तत्परता और सम्मति हो।

आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) में लोगों के सुखी न रह पाने का मुख्य कारण-26 अप्रैल 2013

कल मैंने हर आयु समूह के भारतीय दंपतियों के साथ चर्चा के दौरान मिले अपने अनुभव के आधार पर उनके दाम्पत्य जीवन की हालत का वर्णन किया था। उनकी बहुत सारी समस्याएं हैं और मैं साफ-साफ कहना चाहता हूँ कि उनमें से बहुसंख्य दंपति अपने संबंधों से प्रसन्न नहीं हैं। सुखी दंपति दुर्लभ अपवाद ही हैं। और मेरे लिए यह स्पष्ट है कि किस बात को दोष दिया जाना चाहिए:आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के भारतीय विचार को!

विवाहों को तय करना या आयोजित करना कई समस्याओं को जन्म देता है। पुराने जमाने में, हो सकता है कि इनसे काम चल जाता रहा हो। मैंने इस बात को भी रेखांकित किया था कि कैसे मेरी दादी माँ के जमाने में बच्चों के विवाह उनके जन्म लेते ही, बहुत छोटी उम्र में तय कर दिये जाते थे। बच्चे इस एहसास के साथ ही बड़े होते थे कि उन दोनों को जीवन भर साथ रहना है। इसके अलावा अपना गाँव छोडने का न तो कोई विचार करता था न ही आज की तरह उसका कोई अवसर ही उपलब्ध होता था। साथ-साथ बड़े होने के साथ आपसी प्रेम पुष्पित-पल्लवित होता रहता था।

आज के जमाने में ऐसा करना संभव नहीं है और इसीलिए ऐसे प्रयास असफल हो रहे हैं। आजकल अभिभावक तुरत-फुरत अपने 25 साला बच्चों के लिए जीवन-साथी चाहते हैं। आप किसी प्रौढ़ और समझदार व्यक्ति को किसी अजनबी के साथ अचानक नत्थी कर दें और सोचें कि सिर्फ विवाह कर देने से दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगें तो यह अपेक्षा अनुचित ही कही जाएगी। उन्होंने महाविद्यालयों में अध्ययन किया है, देश-विदेश की यात्राएं करते हुए दुनिया देखी है और उसी अनुसार अपने जीवन के स्वप्न देखे हैं। जीवन-साथी के बारे में उनकी अपनी अलग कल्पनाएँ हैं और अचानक आप उन्हें किसी अजनबी के सामने खड़ा कर दें, जिसे आपका परिवार भी ठीक से नहीं जानता, और कहें कि अब आगे का सारा जीवन तुम्हें उसके साथ गुजारना है तो यह कैसे संभव हो सकता है। वह एक बार देखने भर से वह कैसे समझ पाएगा कि जिसके साथ उसे सारा जीवन गुजारना है वह उसके सपनों के राजकुमार या राजकुमारी से मेल खाता है या नहीं!

अगर इन बच्चों को, जो वास्तव में अच्छे खासे वयस्क होते हैं, यह आज़ादी दे दी जाए कि वे अपने लिए जीवन साथी स्वयं तलाश लें तो अपनी कल्पनाओं के अनुरूप वे यह काम बेहतर ढंग से कर सकते हैं। अगर उनकी कुछ अपेक्षाएँ असंभव सी हैं तो उनके पास वक़्त होता है कि वे स्वयं अपनी वास्तविकता को समझें और अपनी अपेक्षाओं को थोड़ा नीचे लाकर उन्हें अपने स्तर के अनुकूल बना लें। लेकिन आयोजित विवाहों में उनके पास अपना स्वप्नलोक होता है, जिसे कुछ हद तक बॉलीवुड के चरित्रों ने निर्मित किया होता है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि जब उन्हें अपने माता-पिता द्वारा तय किए गए जीवन-साथी के साथ रहना पड़ता है तो वह स्वप्नलोक भरभराकर ढह जाता है। उन्हें आपने यह मौका ही नहीं दिया कि वह वास्तविकता को समझें, अपनी अपेक्षाओं के साथ थोड़ा सम्झौता करें और उन्हें यथार्थ के धरातल पर ले आएँ!

इस समाज में ठीक यही हो रहा है। ढ़ोर-बाज़ार की तरह बच्चों के सौदे हो रहे हैं और बहुत से लड़के लड़कियां ऐसी शादियों को उचित भी समझते हैं। वे अपनी नियति को स्वीकार कर लेते हैं भले ही यह उनके लिए अप्रिय होता है। समय गुज़रता रहता है और अंततः उन्हें लगता है जीवन बीत गया और उन्हें पता तक नहीं चला! पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें लगता है कि वे लगातार लड़ते-झगड़ते रहे, अपने मृत स्वप्नों को श्रद्धांजलि अर्पित करते रहे और अपनी अवास्तविक और अतृप्त इच्छाओं नष्ट होता हुआ देखते रहे। वे आपको यह भी बताएंगे कि उन्हें जीवन में एक पल के लिए भी प्रेम का एहसास नहीं हुआ।

अपने गुहा-निवास से पहले जब मैं एक गुरु था, मैंने सारे भारत का भ्रमण किया था, एक साथ हजारों लोगों से मिला करता था, बहुत से परिवारों के यहाँ उनके घरों में रहता था और उस वक़्त मुझे बड़ी संख्या में लोगों को और उनकी वैवाहिक समस्याओं को जानने का मौका मिला। मैं सन 1997 से पहले की बात कर रहा हूँ, 16 साल पहले की। कोई सोच सकता है कि समय के इतने अंतराल के बाद चीज़ें बदली होंगी, उनमें कुछ सुधार आया होगा; मगर नहीं, आयोजित विवाहों को लेकर समस्याएं पहले से भी अधिक उग्र हो गई हैं।

मैं नहीं कहता कि प्रेम-विवाह हमेशा सफल ही होते हैं। मैं जानता हूँ कि ऐसा नहीं है। पश्चिम में भी मैंने आपसी संबंधों में कई समस्याएं देखी हैं, जहां लोग अपने साथी का चुनाव स्वयं करते हैं, विवाह से पहले प्रेम को भी जांच-परख लेते हैं। उनकी भी समस्याएं होती हैं मगर यहाँ, भारत में तो लगता है जैसे विवाहों को बाकायदा आयोजित या प्रायोजित करके वे समस्याओं को न्योता देते हैं। भारत में अकेले या तलाक़शुदा व्यक्ति की खराब सामाजिक हैसियत के चलते लोग जीवन साथी की तलाश में उतावले हो जाते हैं, और इस तलाश को आयोजित विवाहों का विचार आसान बनाता है, और फिर किसी भी हालत में उस जीवन साथी के साथ निबाह करना उनकी मजबूरी हो जाती है।

मैं अपनी इस बात को पुनः रेखांकित करना चाहता हूँ कि आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) समाज के लिए बुरे हैं और आज के आधुनिक समाज में उनकी व्यवहार्यता समाप्त हो चुकी है। ऐसे विवाह समस्याएं पैदा करते हैं और लोगों को प्रेम और सुख देने की जगह उनके भीतर घृणा और दुख भर देते हैं।

लड़ाके लड़ाई जारी रखना पसंद करते हैं – 5 जुलाई 2009

जीवन में आने वाली समस्याओं का सामना लोग अलग अलग तरीकों से करते हैं। निश्चय ही इस बात का संबंध जीवन के प्रति उनके मूल दृष्टिकोण से और आस पास के लोगों के साथ होता है। आप देखते हैं कि अधिक मुश्किल परिस्थितियों में कुछ लोग बेहद आक्रामक हो जाते हैं। वे समस्या को और उससे उपजे संघर्ष को बनाए रखना चाहते हैं और ऐसे लोग अधिकतर क्रोध के वशीभूत परिस्थिति का ठीक तरह से जायज़ा नहीं ले पाते, उसे समझ नहीं पाते। ऐसे लोग आसानी से आक्रांत हो जाते हैं जबकि कोई उन्हें नुकसान नहीं पहुंचना चाहता। वे महसूस करते हैं जैसे उनकी तरह सारी दुनिया ही आक्रामक है और उन पर हमले कर रही है। वार्तालाप का एक साधारण वाक्य उन्हें असुरक्षित बना देने के लिए काफी होता है और वे इतने त्रस्त हो उठते हैं कि प्रतिरक्षा में वे स्वयं आक्रामक हो जाते हैं। और इस तरह एक संघर्ष की, एक युद्ध की स्थिति बन जाती है।

मैं इस तरह का व्यक्ति नहीं हूँ। वास्तव में मैं इसका उलट व्यवहार करता हूँ। यदि कुछ अच्छा और आसानी के साथ हो रहा है तो मैं प्रसन्न होता हूँ। और अगर कुछ बातें कोई परेशानी खड़ी कर रही हैं, और परिस्थिति बिगड़ती ही जा रही है तो मैं सिर्फ उससे दूरी बना लेता हूँ। मैं संघर्ष करना और लड़ाई नहीं चाहता, मैं शांति, आनंद और प्रेम के साथ जीना चाहता हूँ। लड़ाके हमेशा अगले आक्रमण से भयभीत रहते हैं और वे कभी अपने अस्त्र-शस्त्रों को अपने से अलग नहीं कर पाते।