क्या करें जब असुरक्षा की भावना से पीड़ित लोग आपको नीचा दिखाने की कोशिश करें? 18 नवंबर 2015

आज मैं एक ऐसे रवैए के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिसे एक प्रकार की नकारात्मकता कहा जा सकता है। कुछ लोग होते हैं जो दूसरों को नीचा दिखाकर बहुत खुश होते हैं। वैसे वे नकारात्मक नहीं होते-लेकिन वे आपको नकारात्मक स्थितियों में लाकर बहुत खुश होते हैं, ऐसी स्थिति जिसमें अपने आपको पाकर आप कतई खुश नहीं होते!

मुझे पक्का विश्वास है कि आप भी ऐसे लोगों से अवश्य मिले होंगे! आप कुछ भी कहेंगे या आप कुछ भी कर लें वे आपकी आलोचना करने का कोई न कोई बहाना ढूँढ़ ही लेंगे, आपका व्यवहार कैसा रहा या आपके सोचने का तरीका किस तरह गलत था। जानबूझकर वे आपको उत्तेजित और नाराज़ करने के लिए कोई न कोई ऐसी बात कहेंगे कि आपको लगेगा, आप उस चर्चा के लायक नहीं हैं या चल रहे वार्तालाप में आपका स्वागत नहीं किया जा रहा है या आप पूरी तरह गलत हैं।

मुझे लगता है, यह एक मनोवैज्ञानिक समस्या है और काफी हद तक अहंकार से जुड़ी है। ऐसे व्यक्ति पढ़े-लिखे हो सकते हैं और उनके पास बहुत सी डिग्रियाँ भी हो सकती हैं लेकिन वे खुद अपने बारे में अच्छे विचार नहीं रखते। वे भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करते और दूसरों से अपने आपको बेहतर दिखाकर अपने अहं को संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं।

और इस तरह वे दूसरों को नीचा दिखाकर आनंद प्राप्त करते हैं। वे सोचते हैं कि जिस तरह वे किसी काम को अंजाम देते हैं, वही सबसे अच्छा तरीका है। और कोई भी, जो अलग तरह से व्यवहार करता है, वह वास्तव में मूर्ख है और इसलिए उनसे कमतर है-जिससे वे अपने बारे में बेहतर महसूस कर सकें। इसके लिए वे दूसरों को दुखी करने में भी संकोच नहीं करते। यह समझ या संज्ञान कि वे अपने आप से, आसपास की दुनिया और इस जीवन से ही बेहद नाखुश हैं, इन परिस्थितियों में ही उनके व्यवहार का मूल कारण होता है।

जैसे ही पता चले कि ये लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं, आप उनके संबंध में अपनी सीमाएँ तय कर लीजिए। अगर उनके साथ आप भी परेशान नहीं होना चाहते और नहीं चाहते कि कोई आपको खराब मनःस्थिति में घसीट ले जाए-जिसे वास्तव में वे ही आपके लिए निर्मित करना चाहते हैं तो आपके लिए इस कोशिश को विफल करना आवश्यक है। सबसे अच्छी बात यह होगी कि जितनी जल्दी हो, आप उनसे पीछा छुड़ा लें। उनके साथ आपका सामान्य वार्तालाप संभव नहीं है। आप उन्हें नहीं सुधार सकते क्योंकि वैसे भी वे समझते हैं कि हर चीज़ वे सबसे बेहतर जानते हैं! जब तक आप परेशान और दुखी नहीं हो जाते, वे रुक नहीं सकते।

इसलिए याद रखिए कि वास्तव में वे खुद ही भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और अपने अहं और आत्मसम्मान को लेकर परेशान हैं। उन्हें आपकी भावनाओं को छूने न दें या अपनी भावनाओं को उनसे बचाकर रखें। उनकी बातों को गंभीरता से न लें और सबसे अच्छी बात, उनके साथ अपनी चर्चा को संक्षिप्त और हल्का-फुल्का बनाए रखें। इस तरह आप अपनी प्रसन्नचित्तता और भावनाओं को उन लोगों द्वारा क्षतिग्रस्त किए जाने से बचा सकेंगे जो सिर्फ दूसरों का मूड खराब करके ही खुश रह सकते हैं!

अहं के चलते आपसी संबंधों में आने वाली समस्याओं से कैसे निपटें – 29 अक्टूबर 2015

एक सप्ताह से मैं जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं के बारे में लिखते हुए यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि उनसे कैसे निपटा जाए। आर्थिक समस्याओं से शुरू करते हुए मैंने आपसी संबंधों में पैदा होने वाली समस्याओं पर चर्चा की थी और कल जानलेवा बीमारियों और जीवन में भूचाल पैदा करने वाले अपघातों या उनसे होने वाली अपंगताओं के बारे में लिखा था। जबकि ये समस्याएँ निश्चित ही बड़ी गंभीर समस्याएँ हैं, जिनमें दूसरों की मदद की ज़रूरत पड़ सकती है, एक और समस्या अक्सर मेरी नज़र से गुज़रती है और जिनसे निपटना ज़्यादातर लोगों के लिए ख़ासा मुश्किल होता है: संबंधों में अहं के चलते पैदा होने वाली परेशानियाँ।

ऐसा लगता है कि इस विषय का ज़िक्र आते ही लोग आहें भरने लगे हैं, जो मुझे लगभग सुनाई दे रही हैं। लगभग सभी वे लोग, जो किसी स्थाई संबंध में मुब्तिला हैं, समझ गए हैं कि मैं किस बात का ज़िक्र कर रहा हूँ। यह समस्या सबसे जटिल है और सबसे महत्वपूर्ण भी क्योंकि आपसी संबंध का अर्थ ही है साथ रहना, दोनों का मिलकर एक हो जाना! जबकि अहं बहुत निजी इयत्ता है, खुद को दूसरों के ऊपर रखना- साथ रहने वाले दो व्यक्तियों के बीच एक ऐसी मनःस्थिति, जो समस्याएँ पैदा कर सकती है!

बहुत से उदाहरणों में आप देख सकते हैं कि कहीं आपके साथ भी यह समस्या तो नहीं है। पहला उदाहरण है: आपके साथी ने कोई छोटी सी गलती की और आपने उसे ठीक करके उसे बता दिया कि उससे आपको तकलीफ पहुँची है लेकिन आपका साथी इस बात का बतंगड़ बना देता है या बना देती है। उसका अहं यह मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि उसने कोई गलती की है और आपके बीच लंबा वाद-विवाद शुरू हो जाता है, जबकि बात ज़रा सी है, बल्कि विवाद की कोई बात ही नहीं है-सिर्फ अहं के चलते यह समस्या पैदा हुई है। या, आप स्वयं नोटिस करते हैं कि अपनी गलती मानना आपके लिए भी कितना मुश्किल है जबकि आप जानते हैं कि इस मामले में आप किसी न किसी तरह दोषी तो हैं ही। आपका अहं आपको अपनी गलती स्वीकार करने और पश्चाताप करने या माफ़ी मांगने से रोकता है।

लेकिन यह सिर्फ अफ़सोस ज़ाहिर करने की बात नहीं है! उदाहरण के लिए, अगर आपके मन में अपने कमरे को नए सिरे से सजाने का कोई विचार है या आप साथ मिलकर छुट्टियाँ मनाने का कोई कार्यक्रम बना रहे हैं और इस संबंध में आपका विचार आपके साथी से बिल्कुल मेल नहीं खा पा रहा है तो आप तभी कोई रास्ता निकाल सकते हैं जब आपमें से कोई एक अपने अहं को तिलांजलि देकर सामने वाले की बात मान ले! हालांकि अच्छा हो अगर कोई बीच का रास्ता निकल सके-कोई पर्यटन-स्थल, जो आप दोनों को पसंद हो या घर की कोई सजावट, जो दोनों के मन को भा सके!

आप समझ चुके होंगे कि बात किस ओर इशारा कर रही है: किसी साझेदारी में आपको कोई न कोई साझा पथ खोजना ही पड़ता है। मेरा विश्वास है कि प्यार में किसी न किसी एक को अपने अहं का परित्याग करना चाहिए! अपने आपको सही बताने का और अपनी बात पर अड़े रहने का कोई अर्थ नहीं है और सामने वाले अपने साथी की खुशी में खुश होने का भी अपना अलग आनंद है-भले ही इसके लिए अपने मन को कुछ अलग तरह से तैयार करना पड़े! सफल संबंधों में आप यही चीज़ पाएँगे: दो लोग, जो आपस में चर्चा करते हैं, एक दूसरे की वरीयताओं को जानते-समझते हैं और तदनुसार अपना रास्ता चुनते हैं, जिसमें स्वतंत्रता और आनंद दोनों प्राप्त होते हैं।

मैं एक बार और कहना चाहता हूँ कि यह आसान नहीं है-लेकिन अगर आप प्रेम में मुब्तिला हैं तो मुझे लगता है कि आप इसका उचित बंदोबस्त कर सकते हैं!

माफ़ कीजिए, पुरस्कार पाने के लिए मैं एक पैसा भी खर्च नहीं करूँगा – 17 मई 2015

कुछ हफ्ते पहले एक पत्रकार ने मुझसे सम्पर्क करके मुझे आमंत्रित किया। आमंत्रण मुम्बई में आयोजित एक पुरस्कार वितरण समारोह का था: मेहमान के रूप में नहीं, 'साल के सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक व्यक्ति' शीर्षक पुरस्कार के लिए नामित और विजेता के रूप में!

खैर, मैंने सोचा, यह बड़ी मज़ेदार बात है क्योंकि उसे एक मीडिया कम्पनी आयोजित कर रही थी, जिसका ख़ासा नाम था और जिसके बारे में मैंने भी सुन रखा था। फिर मैंने एक बार और निमंत्रण पत्र की तारीख पर नज़र डाली: आयोजन अगले तीन दिनों बाद ही होने वाला था और वह भी मुंबई में, मेरे गृह नगर से 1500 किलोमीटर दूर!

उस समय आश्रम में बहुत से विदेशी मेहमान आए हुए थे और इतनी त्वरित सूचना पर वहाँ जाना मेरे लिए बड़ा मुश्किल था लेकिन निमंत्रण का तरीका बड़ा नम्र और शालीन था, लिहाजा मैंने जाने का निर्णय किया। परिवार वालों के साथ चर्चा में भी सबका यही कहना था कि ऐसे निमंत्रण को ठुकराना बदसुलूकी होगी।

मैंने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया और कहा कि वहाँ आकर मुझे प्रसन्नता होगी। मैंने पूछा कि क्या समारोह के आयोजक दिल्ली से मुम्बई के दो हवाई टिकिट जल्द से जल्द भेज देंगे, जिससे हम आयोजन के दिन मुंबई पहुँच सकें और फिर वापसी के टिकिट भी, जिससे दूसरे दिन हम वापस लौट जाएँ। मुंबई में मेरे बहुत से मित्र हैं इसलिए वहाँ रहने और खाने-पीने की व्यवस्था के लिए मैंने उनसे नहीं कहा क्योंकि मैं जानता था कि मुंबई में मेरे आराम की अच्छी व्यवस्था करने वाले बहुत से मित्र मौजूद होंगे। मुझे लगा कि आने-जाने के खर्च की मांग जायज़ थी क्योंकि आखिर मुझे वहाँ उन्होंने बुलाया था, मेरा सम्मान करने वाले थे और आयोजन भी देश के कुछ सबसे बड़े पाँच सितारा होटलों में से एक में होने जा रहा था। मुझे लगा, यह बहुत ही सामान्य पूछताछ है।

मुझे जवाब मिला कि कंपनी की नीतियों के अनुसार वे यात्रा खर्च नहीं देते बल्कि दूसरी सभी व्यवस्थाएँ करते हैं-लेकिन फिर भी उनका संपर्क-प्रतिनिधि उच्चाधिकारियों से पूछकर आपसे बात करेगा। मेरे लिए मामला पूरी तरह स्पष्ट था:आने-जाने का खर्च देंगे तो ही मैं जाऊँगा। इस बीच मैं उनके द्वारा की जाने वाली रहने-खाने की व्यवस्था के बारे में सोचता रहा कि अगर मैं उनके द्वारा नियत स्थान पर रहता हूँ तो मुझे आयोजन स्थल पहुँचने में आसानी होगी अन्यथा मुझे विमानतल से किसी दोस्त के घर तक और फिर वहाँ से आयोजन स्थल तक आने-जाने के समय का हिसाब-किताब रखना होगा।

लेकिन आखिरकार मुझे पता चला कि उन्होंने पी डब्ल्यू डी के सरकारी मेहमानखाने (रेस्ट हाउस) में हमारा इंतज़ाम तो करवाया था मगर अब उन्होंने समय की कमी के कारण आध्यात्मिक वर्ग के पुरस्कार को स्थगित ही कर दिया है। यात्रा खर्च तो वैसे भी देय नहीं था क्योंकि यह कोई प्रायोजित कार्यक्रम नहीं था कि उससे कुछ कमाई की जाए बल्कि योग्य लोगों का सम्मान करने की एक पहल मात्र था।

मैंने जवाब भेजा: "मुझे यह अच्छा विचार लगा। पुरस्कारों के बारे में आपके द्वारा दी गई वैबसाइट मैं देख रहा था और वहाँ भी मुझे यह वर्ग या उसमें मेरा कोई मनोनयन नज़र नहीं आया। इससे ऐसा लगता है कि सारी पुरस्कार योजना को अंतिम समय में कामचलाऊ ढंग से संशोधित कर मेरा नाम उसमें जोड़ा गया था।

आपके कार्यक्रम के लिए मेरी शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिए और जब भी आप उत्तर भारत की यात्रा पर हों तो हमारे यहाँ पधारकर हमें स्वागत का मौका अवश्य दीजिए।"

इस बिन्दु पर मेरे लिए मामले का अंत हो चुका था। वास्तव में मुझे लग रहा था कि इतनी अल्प सूचना पर यह सब संभव हो पाना आसान नहीं था और कुछ भी हो, मेरी तरफ से मैंने इस प्रकरण का शालीन अंत किया है। कोई बात नहीं, उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे और मुझे बुलाने का निर्णय वास्तव में अंतिम समय में लिया गया निर्णय रहा होगा। मैंने शुभकामना व्यक्त करते हुए और उन्हें अपने यहाँ निमंत्रित करते हुए इसका समापन किया था और अपनी तरफ से संतुष्ट था!

यह ब्लॉग मैं कभी नहीं लिखता अगर पिछले हफ्ते मैंने उनके द्वारा लिखा का एक आलेख न पढ़ा होता, जिसने मुझे आमंत्रित किया था। मेरा नाम लिए बगैर उसने आरोप लगाया था कि किस बेशर्मी से नामित व्यक्ति ने आयोजन में शामिल होने के लिए हवाई यात्रा का किराया और पाँच सितारा होटल में रहने और खाने का खर्च मांग लिया था! इससे मुझे तकलीफ पहुँची। इसके कारण मुझे आवश्यकता महसूस हुई कि अपने ब्लॉग में मैं भी अपना पक्ष रखूँ, भले ही उस संगठन का, पुरस्कारों का या उस व्यक्ति का नाम लिए बगैर!

हाँ, मैंने यात्रा खर्च की मांग की थी। अपना सम्मान करवाने के लिए मैं एक पैसा भी खर्च करने के लिए तैयार नहीं हूँ-भले ही वह ऑस्कर जैसा कोई मशहूर पुरस्कार ही क्यों न हो! उन्हें लगता है कि मैं वह पुरस्कार पाने के काबिल हूँ-लेकिन वहाँ जाने में मेरी क्या रुचि हो सकती है? 500 यूरो अर्थात् लगभग 35000 रुपए आखिर मैं किस चीज़ पर खर्च कर रहा हूँ?

और हाँ, यह पूरे 500 यूरो भी सिर्फ एक दिन के लिए! इतनी अल्प सूचना पर वहाँ पहुँचना था, अर्थात रेल यात्रा का विकल्प भी खुला हुआ नहीं है। इसके अलावा पिछले आठ साल से, जब से मेरा अपनी पत्नी से परिचय हुआ है, हमने एक रात भी अलग रहकर नहीं गुज़ारी है। हर जगह हम दोनों साथ जाते हैं और अकेले यात्रा करने का मेरा दौर पीछे छूट चुका है। इसलिए मैंने दो टिकिटों की मांग की थी-वैसे अगर वे मेरे टिकिट का पैसा अदा कर देते तो पत्नी का खर्च मैं स्वयं उठा लेता।

निश्चित ही संगठन के पास इतने संसाधन तो थे ही कि इतना बड़ा कार्यक्रम आयोजित कर रहे थे और वह भी मुंबई के सबसे बड़े पाँच-सितारा होटल में, यानी आपने कार्यक्रम-स्थल के लिए तो काफी बड़ी रकम खर्च की होगी। अगर उन्हें लगता है कि मैं वहाँ उपस्थित होऊँ, तो वे मेरे यात्रा खर्च का इंतज़ाम भी कर सकते थे। या, अगर वे मानते थे कि पुरस्कार के काबिल हूँ लेकिन अपना यात्रा खर्च पाने के काबिल नहीं हूँ तो वे यह पुरस्कार मुझे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए भी दे सकते थे। या खुद आते और यहाँ आकर मुझे दे जाते। या सिर्फ मेरा नाम वहाँ घोषित भर कर देते। मुझे वहाँ उपस्थित होने की ज़रूरत ही क्या थी?

यह पुरस्कार मेरे आध्यात्मिक कार्यों के लिए होता, जिसमें गरीब बच्चों के लिए किए जा रहे हमारे चैरिटी कार्य भी शामिल हैं, क्योंकि मेरी सभी परियोजनाओं का लाभ इसी चैरिटी कार्य में खर्च होता है। अपने लिए पुरस्कार प्राप्त करने मुंबई जाऊँ और वहाँ जाने के लिए इतना पैसा हवाई यात्रा पर खर्च करूँ इससे बेहतर मेरे लिए यह होगा कि मैं एक और बच्चे के भोजन पर या उसकी किताब-कापियों पर यह पैसा खर्च करूँ!

सच बात तो यह है कि अगर आप वास्तव में चाहते थे कि मैं वहाँ उपस्थित होऊँ तो आपको मुझे यह अग्रिम सूचना काफी पहले, पर्याप्त समय रहते देनी चाहिए थी। तब आपके इरादे की गंभीरता नज़र आती, मुझे भी वहाँ पहुँचने का कार्यक्रम बनाने में आसानी होती, मैं अपने कुछ कार्यक्रमों या कार्यशालाओं की योजना बनाकर वहाँ आता। या फिर, मैं मुंबई में ही अपने लिए छुट्टियों का कोई कार्यक्रम बनाकर कुछ अधिक दिन रुक लेता और एक शाम आपके कार्यक्रम में भी पहुँच जाता। तब, दोनों ही स्थितियों में, मैं आपसे यात्रा खर्च मांगता ही नहीं। लेकिन मैं अपने पहले से तयशुदा कार्यक्रम स्थगित करके, यहाँ आश्रम के सारे ज़रूरी काम छोड़कर और इतना पैसा खर्च करके एक ऐसा पुरस्कार प्राप्त करने, जिसके लिए आप मुझे योग्य समझते हैं, इतनी अल्प सूचना पर क्यों दौड़ता-भागता मुंबई जाऊँ?

लेकिन, यह भी सच है कि अगर वह आलेख नहीं पढ़ा होता तो यह ब्लॉग भी मैं नहीं लिख रहा होता!

मैंने पहले भी आपको बताया है कि बहुत से टीवी चैनल मुझसे संपर्क करते रहते हैं कि मेरे भाषण उनके चैनल पर प्रसारित करेंगे-लेकिन जितने समय मैं टीवी पर रहूँगा, उसकी कीमत मुझे अदा करनी होगी! अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोग बड़ी-बड़ी रक़में इस टीवी स्लॉट के लिए अदा करते हैं-लेकिन मैंने इसके लिए हमेशा इंकार किया है! अगर आप चाहते हैं कि मैं आपके चैनल पर भाषण करूँ तो आपको मुझे पारिश्रमिक देना चाहिए न कि उल्टा होना चाहिए कि मैं आपको पैसे दूँ!

लेकिन मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग हैं, जो इन टीवी चैनलों पर दिखाई देने के लिए, सम्मान या पुरस्कार पाने के लिए बड़ी-बड़ी धनराशियाँ खर्च करते हैं। माफ कीजिए, मैं इस तरह का व्यक्ति नहीं हूँ। मुझे पुरस्कार की आवश्यकता नहीं है- विशेष रूप से, अगर मुझे पुरस्कृत करने के लिए आप मुझसे ही पैसे भी खर्च करने को कहें!

अगर आप मुझे अपने घर आमंत्रित करें, परिवार से मिलने या किसी घरेलू कार्यक्रम में शामिल होने के लिए, तो मुझे आपके यहाँ आने में खुशी होगी और निस्संदेह मैं खुद अपना पैसा खर्च करके आपके यहाँ आऊँगा। मैं आपके साथ मित्रता करके प्रसन्न होऊँगा और मुझे पता होगा कि आपने इस प्रेम में सहभागी होने और आनंद प्राप्त करने के लिए मुझे आमंत्रित किया है। लेकिन जब आप किसी बड़े पाँच सितारा होटल में कोई सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं तो मुझे लगता है कि कम से कम वहाँ आने-जाने का खर्च मांगना एक जायज़ बात है। उसके लिए आप मना कर देंगे तो भी मुझे कोई दिक्कत नहीं है! लेकिन इस खर्च की मांग करने के कारण मैं इतना बुरा व्यक्ति बन गया कि आपने मुझे अपने आलेख में नकारात्मक रूप से चित्रित कर दिया, इस तरह जैसे मैंने कोई गुनाह किया हो। निश्चित ही अपने ब्लॉग में इस तरह उस पर प्रतिक्रिया लिखना उसे और बुरा बना देता है।

अंत में मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि अपने लिए ये पंक्तियाँ और उनमें लगाए गए आरोपों को पढ़कर मुझे बहुत दुःख हुआ है, जैसे मैं कोई गैर वाजिब चीज़ मांग रहा हूँ, कोई ऐसी चीज़, जिसे पाने की पात्रता मुझमें नहीं है और जिसे पाने के लिए मुझे खुद अपनी गाँठ से पैसे खर्च करने चाहिए। मैं तो खुद दूसरों को कुछ देकर खुश होता हूँ-और फिर से कहता हूँ कि अगर आपका कभी वृंदावन आना हो तो मुझे आपका स्वागत करके बहुत ख़ुशी होगी। लेकिन अगर आप मुझे कोई पुरस्कार देना चाहें तो कृपया सुनिश्चित करें कि मुझे उसके लिए कोई खर्च न करना पड़े क्योंकि वह धनराशि मैं गरीब बच्चों पर खर्च करना चाहता हूँ!

अगर आपको भी सरल सामान्य बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दुःसाध्य प्रदर्शित करने की आदत है तो इसे अवश्य पढ़ें – 14 अप्रैल 2015

आज और आगामी दो दिन मैं अलग तरह के कुछ व्यक्तियों के बारे में लिखना चाहता हूँ। या कहें, किसी नए काम, नई सूचनाओं या समस्याओं के सामने आने पर होने वाली उनकी प्रतिक्रियाओं पर और उनका सामना करते हुए उनकी किंकर्तव्यविमूढ़ता पर अपने विचार रखना चाहता हूँ। मैं ऐसे व्यक्तियों से अपनी बात शुरू करूँगा, जो हमेशा जानबूझकर किसी भी बात को या समस्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, जैसे उससे पार पाना बड़ा मुश्किल, बल्कि लगभग असंभव हो!

मुझे विश्वास है कि ऐसे लोगों को आप अच्छी तरह जानते हैं: आप उनसे अपनी किसी कार्य योजना का ज़िक्र करें तो वे झुँझला उठेंगे, आपकी ओर शक की निगाह से देखेंगे और अंत में बताएँगे कि क्यों यह योजना असफल होगी, कैसे उसे अमली जामा पहनाना न सिर्फ आसान नहीं होगा बल्कि असंभव ही होगा! मज़ेदार बात यह कि वास्तव में जानते होते हैं कि यह काम बिल्कुल कठिन नहीं है!

जी हाँ, मैं ऐसे विचारों की बात कर रहा हूँ जो खयाली पुलाव नहीं हैं, ऐसी योजनाएँ, जिन्हें अमल में लाना संभव है, बल्कि बड़ी आसानी से, लेकिन जिन्हें ये लोग बहुत ही अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। इस रवैये का कारण क्या है? आपको उस योजना के बहुत कठिन होने का विश्वास दिलाना: और जब वे आपकी ‘मदद करने में’ सफल हो जाते हैं और आपकी परेशानी दूर कर देते हैं तो सोचते हैं कि, आप अपने आपको उनके प्रति बहुत शुक्रगुज़ार और एहसानमंद महसूस कर रहे होंगे। आपकी इस तवज्जो का वे मज़ा लेते हैं, कि किस तरह उन्होंने आपका काम कर दिया और यह एहसास करके कि आप उनके कितने आभारी हैं, उन्हें बड़ा सुकून मिलता है।

स्वाभाविक ही उनके अहं की तुष्टि के लिए इससे अच्छी बात नहीं हो सकती!

अक्सर वे इस गलतफहमी में अपने आपको भी बेवकूफ बनाते रहते हैं-वे जानते हैं कि काम सरल है, समस्या मामूली है लेकिन फिर वे लंबे समय तक टालते हुए उसे इतना मुश्किल बना देते हैं कि खुद उसकी दुरूहता पर यकीन करने लगते हैं। अंततः, जब वे सफल हो जाते हैं तो इतने बड़े काम को अंजाम देने या इतनी बड़ी समस्या का समाधान कर पाने की सफलता में गर्व से भर उठते हैं!

इसी आदत के चलते वे हर मामूली बात का बतंगड़ बनाते रहते हैं। उनके जीवन में कोई बात आसान नहीं होती क्योंकि वे महान नायक बनना चाहते हैं, वे प्रशंसा चाहते हैं और चाहते हैं कि लोग उन्हें कठिन लक्ष्यों को प्राप्त करने वाला सफल व्यक्ति समझें!

जब भी आप ऐसे लोगों के पास कोई काम लेकर जाएँगे, वे आपको बताएँगे कि वह काम कितना मुश्किल है। ज़्यादा से ज़्यादा वह कितना कठिन हो सकता है, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता और वे आपसे कभी भी यह नहीं कहेंगे कि काम आसान है या उसे बिना किसी समस्या के निपटाया जा सकता है। व्यावसायिक संसार में आपको इनसे सतर्क रहना चाहिए: वे आपको धोखा देंगे और यह विश्वास करने पर बाध्य कर देंगे कि यह सलाह देकर उन्होंने आपकी बड़ी सेवा की है-वे आपसे इस बहुमूल्य ‘सेवा’ की कीमत भी वसूल कर सकते हैं, जबकि उन्होंने योजना के स्वरुप में मामूली फेर-फार या एकाध परिवर्तन किया होगा और सब कुछ बड़ी आसानी से हो सम्पन्न हो गया होगा!

इसके विपरीत, अगर काम कठिन भी है तो वे उस समस्या के समाधान हेतु अपनी सारी शक्ति लगा देंगे, जिससे वे उसे निपटाने का श्रेय ले सकें!

लेकिन भविष्य में आप उनसे किसी नई योजना पर चर्चा करते हुए असुविधा महसूस करेंगे क्योंकि आप जानते हैं कि आपको उनकी ईमानदार सलाह कभी नहीं मिल पाएगी बल्कि, आप कुछ भी कहें, आपको उनसे हमेशा नकारात्मक फीडबैक ही प्राप्त होगा!

धार्मिकों की एक जैसी मानसिकता: मैं ठीक हूँ, आप गलत हैं – 9 फरवरी 2015

कल मैंने आपको अपने एक भूतपूर्व मित्र के बारे में बताया था, जो सोचता था कि मैं शुरू से ही नास्तिक रहा हूँ और धार्मिक व्यक्ति होने का महज नाटक करता रहा हूँ। अपने बारे में उसका यह विचार मुझे बड़ा दिलचस्प लगा और इसलिए आज मैं बहुत से लोगों में भीतर तक मौजूद इस धार्मिक अहंकार के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिसे वे अकसर खुलकर अभिव्यक्त भी करते रहते हैं।

मैंने यह भी बताया था कि मेरा यह भूतपूर्व दोस्त स्वयं एक धार्मिक व्यक्ति है। लेकिन अपनी जगजाहिर धार्मिकता के बावजूद जब दूसरे वैसा ही व्यवहार कर रहे होते हैं तो उनके बारे में उसे शक होता है कि वे सिर्फ नाटक कर रहे हैं। लेकिन दूसरे धार्मिकों के बारे में ऐसा सोचने वाला वह अकेला नहीं है!

बहुत से लोगों की एक सामान्य धारणा होती है: ‘जो मैं कर रहा हूँ, वह सही है’ मगर जब वही बात दूसरे करें तो वे गलत कर रहे हैं, गलत उद्देश्यों के लिए कर रहे हैं, दिल लगाकर नहीं कर रहे हैं, आदि आदि। दूसरों के साथ अपने व्यवहार में वे बेहद नम्र दिखने की कोशिश करते हैं लेकिन जब आप उस नकाब के पीछे पहुँचते हैं तो आप जान जाते हैं कि वे बहुत घमंडी और उद्दंड हैं और सोचते हैं कि सिर्फ वही सबसे सच्चे धार्मिक हैं। कई अंधविश्वासु अपने गुरुओं, आध्यात्मिक उपदेशकों और अपने जीवन में आए ऐसे ही दूसरे आदर्श व्यक्तियों से इस विश्वास की पुष्टि प्राप्त करते हैं। वे बार-बार सुनते हैं कि वे सबसे बेहतर धार्मिक हैं, वे ही सच्चे आस्थावान हैं, वे ही पूरी तरह समर्पित ईश्वर-भक्त हैं।

लेकिन वे नहीं जान रहे होते कि उनके धर्मगुरु और धार्मिक नेता सीधे उनकी जेब पर डाका डाल रहे होते हैं।

विडम्बना यह कि वे हमेशा यह शिकायत भी करते हैं कि दूसरे धार्मिक लोग सिर्फ पैसे कमाने के लिए धर्म का सहारा ले रहे हैं। वे यह नहीं देख पाते कि पैसे का यह खेल दरअसल वे खुद ही खेलना चाह रहे हैं क्योंकि उनके लिए वह अत्यंत आवश्यक होता है। उन्हें पुरोहितों की आवश्यकता है, उन्हें उन लोगों की ज़रूरत है, जो उनके लिए विशालकाय मंदिर और दूसरे पूजास्थल निर्मित कर सकें। बिना पैसे के यह सब कैसे संभव हो सकता है?

चीजों को देखने का यह बड़ा संकीर्ण नज़रिया है: मैं सब कुछ ठीक कर रहा हूँ, मैं जिन लोगों को पूज रहा हूँ, वे भी ठीक हैं- बाकी सब ढोंगी, झूठे और धोखेबाज़ हैं। चाहे वे अपने ही धर्म के धंधेबाज हों, चाहे किसी दूसरे धर्म के! आप अपने ईश्वर से प्रेम करते हैं उसी तरह दूसरे धर्मों के लोग अपने ईश्वर से प्रेम करते हैं लेकिन आप उन्हें गलत कहते हैं। यहाँ तक कि आप उनके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देते हैं। उसने भी वही किया, जो आप कर रहे हैं, सिर्फ उसका तरीका अलग था।

इस परिदृश्य पर गंभीर नज़र दौड़ाने पर स्पष्ट हो जाता है कि वे सब एक ही भ्रमजाल में फँसे हुए हैं और या तो निकल नहीं पा रहे हैं या निकलना ही नहीं चाहते।

जब मैं पारंपरिक विवाह समारोह में शिरकत करता हूँ तो क्या मैं दहेज प्रथा का समर्थन करता हूँ? 25 दिसंबर 2014

कल मैंने कुछ परिस्थितियों का वर्णन किया था, जिसमें मैंने कहा था कि यदि अस्पृश्यता और दहेज प्रथा जैसी हानिकारक और पूरी तरह अन्यायपूर्ण परम्पराओं का पालन न करने की बात हो तो हमें अपने आधुनिक विचारों पर अडिग रहना चाहिए। एक भारतीय ने कुछ दिन पहले मुझसे कहा कि वह भी पेशोपेश में है कि क्या उसकी परिस्थिति भी उसी श्रेणी में आती है। उसका मित्र विवाह कर रहा था और वह जानता था कि मित्र के विवाह में दहेज लिया जाएगा, जिसका वह दृढ़ता पूर्वक विरोध करता था। अब वह पेशोपेश में था कि क्या उसे अपने मित्र के विवाह में शामिल होना चाहिए या नहीं यानी क्या वह वहाँ जाकर दहेज प्रथा का समर्थन कर रहा होगा!

जब इस तरह के मामले सामने आते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि मैं बहुत सख्त हूँ। और वास्तव में मैं अपने शब्दों का शब्दशः पालन करता हूँ और जो लिखता हूँ या कहता हूँ, उस पर पूरा अमल करता हूँ। लेकिन साथ ही मैं इन दो स्थितियों में अंतर कर सकता हूँ कि कब अपने विश्वास या अविश्वास को सबके सामने रखना चाहिए और कब उनसे मुझे एक मित्र की तरह मिलना चाहिए क्योंकि हम एक दूसरे से प्रेम करते हैं।

मेरे विचार में यहाँ भी वही मामला है। अगर वह आपका घनिष्ठ मित्र है तो शायद आपने अपना मंतव्य ज़ाहिर कर दिया है। अगर वह आपका करीबी रिश्तेदार है और आपको इस मामले में उससे कुछ कहना है तो मैं कहूँगा कि आपको दहेज के इंतज़ाम या उसके ‘लेन-देन’ को रोकने के लिए, जो भी आपसे बन पड़े, करना ही चाहिए।

आप कितना भी करीबी रूप से दूल्हा या दुल्हन से जुड़े हों, दहेज के मुद्दे पर आपके विवाह समारोह में न जाने पर विवाह नहीं रुकने वाला। अगर आप रिश्तेदार नहीं हैं, करीबी मित्र भी नहीं हैं तो फिर आपको समारोह में बुलाने वाले इसका बुरा नहीं मानेंगे बल्कि हो सकता है आपके न आने को नोटिस तक न लें और तब आपका विरोध अलक्षित रह जाएगा। अगर आप करीबी रिश्तेदार या मित्र हैं तो आपके न आने पर वे विचलित होंगे और उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचेगी और आप उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे होंगे।

आपका यह व्यवहार आपके आपसी रिश्तों को तो नुकसान पहुँचाएगा मगर आपके मित्रों या रिश्तेदारों को अपनी दकियानूसी और नुकसानदेह परंपराओं का पालन करने से नहीं रोक पाएगा। जब आप उनके सामने अपने विचार रखकर कुछ नहीं कर पाए तो ऐसा करके भी कुछ हासिल नहीं कर पाएँगे।

और यहाँ मैं आपसे यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि अधिक महत्वपूर्ण क्या है: आपका अहं, जोकि उनके द्वारा आपके विचारों का अनुपालन न करने के कारण आहत हुआ है या उनके प्रति आपका स्नेह? आपका विश्वास या आपकी मित्रता?

मेरे विचार से विवाह में आपका सम्मिलित होना उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण, उनके लिए सबसे सुखद और आत्मीय अवसर पर आपका उनके साथ रहना है! उनके प्रेम में सहभागी होने के लिए आप एक शाम इस बात को भुलाकर कि उनके विचार आपसे नहीं मिलते या वे दक़ियानूसी और नुकसानदेह हैं, उनके साथ मिलकर सिर्फ अवसर का आनंद उठाएँ!

इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आपको पूरे समय वहाँ बैठकर सारे कर्मकांडों में उपस्थित रहना है, अगर आप उस अवसर के धार्मिक अंशों के विरुद्ध हैं तो उनसे दूर रहिए! यह आवश्यक नहीं है और यदि वे आपका नज़रिया जानते हैं तो कोई भी इस बात से परेशान नहीं होगा कि आप विवाह समारोह के उस हिस्से में अनुपस्थित रहे। लेकिन पार्टी में वे आपको अवश्य ही मिस करेंगे-और निश्चय ही आप भी उन्हें मिस करेंगे!

तो ऐसे सवालों से अपने आपको परेशान करने की ज़रूरत नहीं है, जो आपकी दिली इच्छा हो वही कीजिए और अपने परिवार और दोस्तों के साथ खुला व्यवहार कीजिए! जीवन का आनंद लीजिए-उसे बहुत ज़्यादा जटिल मत बनाइए!

और उसी जज़्बे के साथ, भले ही मेरा क्रिसमस से या उसकी परम्पराओं से या उसके महत्व से कोई लेना-देना नहीं है, मैं अपने पाठकों और मित्रों के लिए, जिन्होंने कल या आज क्रिसमस मनाया या कल मनाएँगे, क्रिसमस की शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ कि उनके जीवन में सदा सुख-शांति बनी रहे! अपनी छुट्टियाँ और त्योहार मनाते रहें, परिवार वालों को खूब गले लगाएँ और ज़्यादा खाना न खाएँ भले ही वह कितना भी सुस्वादु क्यों न हो!

ध्यान-योग कोई रहस्य नहीं है लेकिन परेशानी यह है कि आप ऎसी चीज़ नहीं बेच सकते, जो सबको उपलब्ध हो-13 नवंबर 2013

मुझे अंदेशा है कि मेरे कल और परसों के ब्लोगों को पढ़कर मेरे कुछ पाठक संशय में पड़ गए होंगे। वे सोच रहे होंगे कि पहले मैंने अपना गुरु का जीवन त्यागा, फिर धर्म त्यागा और नास्तिक हो गया और अब ध्यान और योग के विरुद्ध भी लिखना शुरू कर दिया है! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि ऐसी बात बिल्कुल नहीं है! जिस तरह ध्यान का प्रचार किया जाता है, उससे मेरी असहमति है। ऐसा ज़ाहिर किया जाता है कि ध्यान कुछ विशेष, चुने हुए आध्यात्मिक लोगों के लिए ही है, जबकि मैं यह सलाह देता रहता हूँ कि सभी इसे करें। मैं स्वयं इसे पसंद करता हूँ लेकिन मेरे लिए इसकी परिभाषा बिल्कुल भिन्न है! मैंने कुछ ब्लॉग भी ध्यान-योग के संबंध में लिखे हैं, जिसमें मैंने स्पष्ट किया है कि मेरे लिए ध्यान का अर्थ क्या है। आज भी उसी संबंध में यह ब्लॉग लिख रहा हूँ।

सबसे पहले मैं एक वाक्य में यह परिभाषा दे रहा हूँ: अंग्रेज़ी में मेडिटेशन, हिन्दी और संस्कृत में ध्यान वह अभ्यास है, जिसमें आप पूरी तरह वर्तमान में होते हैं, 100% जाग्रत होते हैं, हर तरह से वाकिफ कि आप क्या कर रहे हैं।

कभी भी मैं यह नहीं कहता कि ध्यान का लक्ष्य विचारशून्यता है। मैं यहाँ तक मानता हूँ कि ध्यान का अभ्यास करने के लिए आपको किसी खास आसन में बैठने की आवश्यकता नहीं है और न ही किसी विशेष श्वसन तकनीक या किसी और चीज़ की। आप अपना काम करते हुए भी ध्यानस्थ हो सकते हैं या बातचीत, चित्रकारी करते हुए या खेलते हुए और यहाँ तक कि संभोग करते हुए भी! आपको उस वक़्त पूरी तरह वहाँ होना चाहिए, वर्तमान में; भविष्य में नहीं और न अतीत में। उस क्रिया में पूरी तरह उपस्थित, बस यही मेरे लिए ध्यान है।

मुख्य बात यह है कि हर कोई ध्यान कर सकता है! आपको विशिष्ट होने की ज़रूरत नहीं है! यह सभी के लिए सहज सुलभ है और किसी भी वक़्त। ध्यान के लिए वर्षों के अभ्यास की आवश्यकता नहीं है और न ही आपमें किसी कलात्मक प्रतिभा का होना आवश्यक है। यह कोई जटिल क्रिया नहीं है और इसे करने के लिए आपको किसी लॉरी को दांतों से खींचने या लोहे की राड को हाथों से मोड़ने का करिश्मा दिखाने की ज़रूरत नहीं है! आप, जी हाँ आप भी इसे कर सकते हैं!

अब यह बताएं कि क्या यह अच्छा नहीं होगा कि आप जानें और आपका पड़ोसी न जाने? उसमें कुछ रहस्य या पेचीदगी हो तो क्या वह ज़्यादा रोचक नहीं हो जाएगा? यही वह विचार है जिसे गुरु और ध्यान का व्यापार करने वाले पसंद करते हैं और रुपया कमाते हैं! वे चाहते हैं कि आप न सिर्फ कुछ खास बल्कि अपने आसपास के लोगों से बेहतर महसूस करें और इसलिए वे ध्यान को कुछ विशिष्ट और जटिल बनाकर पेश करते हैं!

उनका यह व्यवहार, दरअसल, आपके अहं को बढ़ाने के लिए होता है न कि उसे कम करने के लिए! तो, जब आप पंद्रह मिनट तक ध्यान करते हैं तो आप चेतना की उच्च अवस्था में होते हैं! तो, आपको पहले वहाँ जाना पड़ता है और फिर एक खास मुद्रा में आसन लगाना होता है, आपको एक विशिष्ट वातावरण चाहिए और आप उसे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक घंटे तक कर सकते हैं! फिर दिन के बचे हुए 23 घंटे आपकी चेतना कहाँ मंडराती रही? नीचे ज़मीन पर, अलसाई हुई, जैसे बाकी सभी लोगों की चेतना पड़ी होती है? इसलिए आप इस एक घंटे तक खुद को विशिष्ट समझने लगते हैं और अपने भीतर शांति का अनुभव करते हैं, व्यापक ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार! लेकिन आप सारा दिन आनंद की उसी अवस्था में क्यों नहीं रह सकते?

जी हाँ, आप ध्यानस्थ होकर भी दिन के 24 घंटे अपना काम कर सकते हैं, खेल सकते हैं, किताब पढ़ सकते हैं और जो मर्ज़ी हो, वह कर सकते हें। आपको बिना एक स्थान पर बैठे, बिना विचारशून्यता को प्राप्त किए, लगातार आनंदमग्न रहना चाहिए!

स्वाभाविक ही, कोई गुरु आपको इतना बड़ा रहस्य नहीं बताएगा अन्यथा वे उस आश्चर्य मिश्रित प्रशंसा से वंचित हो जाएंगे, जो आपसे उन्हें प्राप्त होती है। ऐसा करने से उनका धंधा चौपट हो जाएगा! लेकिन सच्चाई यही है कि आप भी ध्यान कर सकते हैं। आपको सिर्फ सजग रहना है, चैतन्य रहना है, विचारशून्य नहीं!

अहं के साथ संघर्ष – स्वयं के साथ एक लगातार कशमकश? 2 अक्तूबर 2013

मैंने कल इस बात का वर्णन किया था कि कैसे अधिकतर लोग अहं के कारण जीवन में एक न एक बार परेशानी में पड़ जाते हैं। जब कि कल मैंने अपने ब्लॉग को बिना सोचे-समझे की गई त्वरित टिप्पणियों पर केन्द्रित किया था वहीं आज मैं काफी सोच-समझकर, सही-गलत का विचार करने के बाद की जाने वाली उन बातों की चर्चा करूंगा, जिनके बारे में आप स्वयं भी अच्छी तरह जानते होते हैं कि आप, दरअसल, अपने अहं के दबाव और प्रेरणा के चलते ऐसा कर रहे हैं।

मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि ऐसी स्थितियों के बारे में भी आप जानते हैं-या तो आपने स्वयं ऐसा व्यवहार किया है या किसी परिचित ने आपके साथ किया है। एक निर्णय लिया जाना है, कुछ न कुछ किया जाना ज़रूरी है और ऐसा करने के कम से कम दो विकल्प हैं: या तो आप अड़ जाएँ कि जैसा आप चाहते हैं वैसा ही हो या-वैसा जो आपके अहं की तुष्टि करे-या आप अपने अहं को काबू में रखने में कामयाब हो जाएँ और वही करें, जो उच्चतर लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे ज़्यादा लाभप्रद साबित हो।

इसका यह अर्थ नहीं हैं कि आप अपने अहं से पराजित होकर खुश हैं। नहीं, आप कोई दूसरा निर्णय करने का भरसक प्रयास करते हैं, आप वाकई नहीं चाहते कि आपका अहं आप पर विजय प्राप्त करे लेकिन अंततः आप हार ही जाते हैं। दरअसल, आपके भीतर एक अंदरूनी नाकेबंदी है, एक रुकावट, जिसे पार पाना आपके लिए नामुमकिन हो जाता है! यह स्थिति, कल बताई गई स्थिति से ज़्यादा समस्यामूलक है, जो आपको अहं-युक्त त्वरित प्रतिक्रिया देने पर मजबूर करती है। क्योंकि वर्तमान स्थिति में स्पष्ट ही अहं आप पर सवार हो गया है और समय गुजरने के साथ धीरे-धीरे उतरता नहीं है। अगर वह एक पल में आपको चित कर दे और फिर दूसरे ही पल आपके काबू में आ जाए तो उतनी परेशानी नहीं है। अगर आप कई दिनों तक उसके साथ संघर्ष कर रहे हैं और लगातार हारते ही चले जा रहे हैं तो ऐसी तात्कालिक समस्याओं को सुलझाना भी और भविष्य में ऐसी हालत पैदा न हो इस दिशा में कदम उठाना भी मुश्किल हो जाता है!

आप अपने निर्णय पर पछताते हैं लेकिन हर बार जब भी ऐसी स्थिति निर्मित होती है, आपका अहं आपको तुरंत अंधा कर देता है और आप अपनी पिछली गलती से सीखा हुआ सबक भूल जाते हैं। आप वही बात बार-बार दोहराते हैं और एक के बाद दूसरे मामले को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते चले जाते हैं। आपको समझ में नहीं आता कि इस कड़ी को कैसे तोड़ा जाए।

मैं यह ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि दुर्भाग्य से इस समस्या का समाधान आसान नहीं है। कोई जादू की पुड़िया नहीं है, जो इस बीमारी को ठीक कर सके और न कोई शल्यचिकित्सा है कि काट-पीटकर आपके अहं को बाहर निकाल दिया जाए। आपको खुद प्रयास करना होगा। फिर भी मैं कहूँगा कि संघर्ष करने की जगह आपको पहले सकारात्मक रवैया अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। अपने व्यवहार पर और गहराई के साथ सोचें और अपने उसमें होने वाले छोटे-मोटे सुधार के महत्व को समझें। जब आप शिद्दत से चाहेंगे कि अपने अहं पर काबू पाना ही है तभी आप इसे अंजाम दे सकते हैं! दृढ़ इच्छाशक्ति से कुछ भी संभव है!

इतनी ही सलाह मैं दे सकता हूँ कि जब ऐसी कोई परिस्थिति सामने आए तो आँखें और मस्तिष्क खुले रखें और सोच-समझकर बरताव करें या कोई निर्णय लें। कुछ सवाल अपने आप से पूछे: अपने अहं के विपरीत जाते हुए अगर अपने तरीके से इस काम को नहीं करेंगे तो दूसरों को इससे क्या लाभ हो सकता है? इसके विपरीत, अगर अपने अहं की तुष्टि करते हुए आप वही काम करते हैं तो इससे किसी का क्या भला हो सकता है? समान्यतः इसका उत्तर होगा, कुछ भी नहीं, ऊपर से आप व्यर्थ ही अहंकारी माने जाएंगे। अपने अहं के विपरीत जाने पर आपका कोई नुकसान नहीं होगा-विपरीत इसके, लोग, अक्सर, इस बात को सराहेंगे! तो फिर ऐसा क्यों न किया जाए?

अभी-अभी आपके अहं पर चोट हुई है और अब आपको प्रतिक्रया देना है- आप क्या करेंगे? 1 अक्तूबर 2013

कल का ब्लॉग मैंने अहं के सकारात्मक पहलुओं पर केन्द्रित किया था। आज मैं चाहता हूँ कि विशाल अहं का होना कैसे नुकसानदेह है, इस बारे में थोड़ा विस्तार से लिखूँ। खासकर किसी बाहरी चोट की त्वरित प्रतिक्रिया के संदर्भ में।

जीवन में हमारा अक्सर ऐसी स्थितियों से साबका पड़ता हैं, जिनमें हमें त्वरित प्रतिक्रिया देनी पड़ती है-चाहे वह किसी मित्र के साथ फोन पर दोस्ताना बातचीत हो रही हो या परिवार के किसी सदस्य ने किसी काम के बारे में या किसी नई जानकारी के संबंध में कुछ कहा हो। और मैं समझता हूँ कि सभी को यह अनुभव हुआ होगा, जब आपके अहं ने आपको मुसीबत में डाल दिया होगा। आपने ऐसा व्यवहार किया होगा कि स्थिति सुलझने के स्थान पर और जटिल हो गई होगी।

अहं से भरी हुई अपनी प्रतिक्रिया देने के बाद, जब आपको सोचने की कुछ फुरसत मिली होगी तो हड़बड़ी में दी गई अपनी प्रतिक्रिया पर आपको पछतावा हुआ होगा, लेकिन तब तक पहले ही काफी देर हो चुकी हुई होगी। आपकी इच्छा हुई होगी कि दीवार पर सर फोड़ लें। आप सोच रहे होंगे कि इसी अहं ने आपको इस हालत में पहुंचाया है। खुद अपने द्वारा निर्मित इस समस्या पर आप बहुत खीझ रहे होंगे!

हुआ यह है कि आपके सामने कोई ऐसी बात हुई होगी जिसने आपके अहं को तुरंत विचलित कर दिया होगा। क्योंकि स्थिति की मांग थी कि आप त्वरित प्रतिक्रिया दें, आपका अहं आगे आया और उसने ऐसा जवाब दिया जो स्वाभाविक ही अहं से सराबोर था।

मैं एक उदाहरण देना चाहता हूँ। आप अपने सहकर्मियों के साथ किसी नई योजना के संबंध में वार्तालाप कर रह हैं। सभी इस बात पर सहमत हैं कि आपने अच्छा काम किया है मगर किसी कारण से परिणाम ठीक उल्टा आया है: योजना पूरी तरह से असफल रही है और सभी अप्रसन्न हैं। आप उस विषय पर सामान्य रूप से बात कर रहे हैं और तभी उनमें से कोई कहता है, "मेरे विचार में डिजाइन में ही गड़बड़ी थी।" बाप रे! डिजाइन तो आपने तैयार किया था! आपकी तर्कशक्ति जवाब दे जाती है, आप होश खो बैठते हैं और आपका अहं आप पर सवार हो जाता है। सिर गरम हो जाता है और शायद चेहरा लाल, लगता है कानों में कर्कश आवाज़ें आ रही हैं और आखिर आप खुद को कर्कश आवाज में कहते हुए सुनते हैं, "दरअसल उसके निर्देश और ब्योरे गड़बड़ा गए थे, जैसे किसी स्कूल के बच्चे ने लिखे हों; समझ में ही नहीं आता था!" यह उस पर चोट थी, जिसने डिजाइन पर निर्देश और ब्योरे लिखे थे और अब अपने कथन से आपके अहं को कुरेदा था। यह समझदार प्रतिक्रिया नहीं थी, वह प्रभावशाली तो थी ही नहीं बल्कि उसने सबका ध्यान आपकी तरफ और आपके अहं की तरफ मोड़ दिया।

इस मामले में, अहं की मात्रा के अनुपात में, तुरंत ही या कुछ देर बाद, आप अपनी बात पर अफसोस करेंगे। लेकिन सामान्यतः आप ऐसा ही करते हैं, यह सोचकर कि उस वक़्त आपके तर्क की विजय हुई है। यह परेशान करने वाली बात है और आपको ऐसा करके अच्छा भी नहीं लगता। क्या किया जाए?

अगर आप देखें कि यह समस्या बार बार पेश आती है-या कभी-कभी आती है और कैसे भी उसे टालना चाहते हैं तो मैं आपको यह सलाह दूंगा कि कोई भी बात कहने से पहले उसके बारे में सोचें अवश्य। चाहे किसी भी बात पर चर्चा हो रही हो, त्वरित प्रतिक्रिया न देने का अभ्यास करें। पल भर रुकें, फिर जवाब दें। संकट के समय में यह एक पल इतना वक़्त दे देगा, जिसमें आप अपनी तर्कशक्ति को पुनर्जाग्रत कर सकेंगे और ऐसी प्रतिक्रिया करने से अपने अहं को रोक सकेंगे, जिस पर आपको बाद में पछतावा हो। अक्सर, यह भी, अंततः, ठीक ही साबित होता है कि उस वक़्त आप कुछ भी न कहें-सिर्फ मुस्कुरा दें या चुप रहें। अगर यह संभव न हो तो चाहें तो एक गिलास पानी पी लें, जिससे मस्तिष्क कुछ शीतल हो जाए और आप अहं को दूर रखते हुए कोई जवाब सोच सकें।

अगर किसी कारण से यह कारगर साबित नहीं होता और क्षणिक आवेश में आपका अहं आप पर सवार हो ही जाता है तो उससे हुई परेशानी, (हानि) को दूर करने का त्वरित उपाय कीजिए। ऊपर वर्णित उदाहरण में आपके मुंह से बात के निकलते ही मुस्कुरा दीजिए, सहकर्मियों से माफी मांग लीजिए कि आपका मतलब वह नहीं था जो आपने कहा, आप तो सिर्फ समस्या की गंभीरता पर ज़ोर देना चाहते थे और सीधे खुद पर की गई चोट को आप बर्दाश्त नहीं कर पाए और गुस्से में ऐसी बात मुंह से निकल गई। लीपापोती न करें, समस्या को स्पष्ट कहें-दूसरे सब समझ जाएंगे!

अगली बार अपने अहं को नियंत्रण में रखने की कोशिश करें- सिर्फ "अहं युक्त त्वरित टिप्पणी" को टालने के लिए।

अहंकार – कोई नहीं चाहता मगर सबके पास होता है- 30 सितंबर 2013

आज मैं आपके एक छोटे से दोस्त के बारे में लिखना चाहता हूँ। जी हाँ, उसके बारे में जिसे आप अच्छे से जानते हैं। जो हमेशा आपके साथ रहता है। यह छोटा सा, ज़रा सा है-और आप चाहते भी हैं कि वह वैसा ही रहे-लेकिन वह समय-समय पर इतना विशाल हो जाता है कि न सिर्फ आपको परेशान कर डालता है बल्कि आपका बड़ा नुकसान करने की क्षमता भी रखता है! वह कौन सा दोस्त हैं जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूँ? बिल्कुल ठीक, वह आपका अहं है!

अहं एक ऐसी चीज़ है, जो सबके पास होती है। अगर आप किसी शब्दकोश में देखें तो आप उसका वह अर्थ भी देखेंगे जो मैंने एक बार पढ़ा था: "व्यक्ति का स्वाभिमान या स्व-महत्व, अपने बारे में आपकी अपनी धारणा।" इस धरती पर हर व्यक्ति अपने बारे में एक धारणा रखता है, नीची या ऊंची, बहुत ऊंची। कुछ लोगों में स्वाभिमान की कमी होती है, जबकि कुछ दूसरों का अहं बहुत विशाल होता है। आपके लिए वह कैसा भी हो: इस बात से इंकार न करें कि आपका कोई अहं है ही नहीं। उसके बगैर आपका कोई अस्तित्व नहीं हो सकता।

जब भी आप किसी के अहं के बारे में सुनते हैं या जब आपके अहं की याद आपको दिलाई जाती है तो उस बात में अक्सर नकारात्मकता मौजूद होती है। स्वाभाविक ही, इसी समय आप उसे सबसे ज़्यादा नोटिस करते हैं। जब आप किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं, जिसका अहं फूलकर गुब्बारा हो चुका है तो उसकी छाती फूली हुई होती है और नाक ऊंची। इससे वह अहंकारी प्रतीत होता है, एक आत्मकेंद्रित, हेकड़ व्यक्ति, जिसके साथ थोड़ी देर बात करना भी मुश्किल होता है। ऐसी हालत में आप अपने आपको भी काफी अलग-सा महसूस करते हैं, यहाँ तक कि आपको यह झूठा एहसास भी हो सकता है कि आपमें कोई आत्मसम्मान बचा ही नहीं है! उस पल, जब आपका अहं, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, आपको किसी परेशानी में डाल देता है, तब सारे विचार ध्वस्त हो जाते हैं और आप सोचते हैं कि आपने क्यों अपने आपको उसके हवाले कर दिया। लेकिन अहं हमेशा नकारात्मक ही नहीं होता!

सच्चाई यह है कि अहं के कारण ही आपका जीवन चल रहा है और इसी के चलते आप अपने सपनों को पूरा करने में जीवन भर जुटे रहते हैं। आपका अहं ही आपके आत्मविश्वास की जड़ है। जीवन में कुछ प्राप्त कर सकने का विचार ही आपके मन में अपने अहं के चलते आता है। आप कुछ पा सकते हैं, इस विचार के बगैर आप कोई भी काम शुरू ही नहीं करेंगे। अगर आपके पास कोई अहं नहीं है तो नौकरी के लिए इंटरव्यू देते हुए, इस डर से कि यह आपके बस का नहीं है, साक्षात्कार में असफल हो जाएंगे या बाद में जो काम सामने आएगा, उसे नहीं कर पाएंगे, आप नौकरी के लिए साक्षात्कार ही क्यों देंगे? अपने अहं को धन्यवाद दीजिए, जिसके कारण आपको एहसास है कि आप कठिन से कठिन काम को अंजाम दे सकते हैं!

लोगों के मन में, खासकर उन लोगों के मन में जिन्हें ‘आध्यात्मिक’ विचारों वाला कहा जाता है, यह धारणा होती है कि अपने अहं को कम करने की कोशिश करते रहना चाहिए और अच्छा तो यह होगा कि उसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। मैं इस धारणा पर यकीन नहीं रखता। यह हो भी नहीं सकता-उसके बगैर आप एक पल नहीं चल सकते, उसके बगैर आपका साहस जाता रहेगा, अपने आप पर भरोसा नहीं रहेगा और आखिर में वह आपकी जान भी ले सकता है क्योंकि आत्मसंदेह की ऐसी दयनीय हालत में आप पहुँच जाएंगे कि उसके बगैर आप अपने लिए खाना भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

एक सीमा तक अपने अहं का स्वागत कीजिए। उस पर काबू रखिए। जी हाँ, उसे अपने आप पर हावी न होने दीजिए लेकिन, अगर आप आत्मविश्वासी और हिम्मती बने रहना चाहते हैं तो उसे पूरी तरह समाप्त करने की कोशिश भी मत कीजिए। अहं, आपका यह छोटा-सा मित्र, आपके लिए परम आवश्यक है। उसे दाना डालते रहिए मगर एक सीमा तक ही; ज़्यादा मत खिलाइए।