अत्यधिक सेक्स किस तरह एक रूखा अनुष्ठान बनकर रह जाता है – 2 दिसंबर 2015

पिछले दो दिनों में मैंने आपको बताया कि कि क्यों खुले सेक्स संबंध अक्सर सफल नहीं होते। उदाहरण स्वरूप मैंने आपको दो स्थितियों से अवगत कराया था और दोनों ही स्थितियों में संबंधों की असफलता का पहला कारण यह होता है: लोग सेक्स को एक तकनीक के रूप में देखते हैं, एक ऐसी क्रिया, जिससे मनोरंजन होता है, उसमें एक तरह का उत्तेजक आनंद प्राप्त होता है-और वे प्रेम को पूरी तरह भूल जाते हैं!

बहुत से लोग खुले संबंधों के विचार पर मोहित होकर उसे आजमाते हैं। फिर वे बहुत से भिन्न-भिन्न लोगों के साथ हमबिस्तर होने लगते हैं और संभोग में बुरी तरह लिप्त हो जाते हैं। कई बार वे अपने पार्टनर्स इतनी जल्दी-जल्दी बदलते हैं कि उन्हें याद तक नहीं रहता कि कल रात किसके साथ सोए थे। इन संबंधों में भावना नहीं होती, एहसास नहीं होता। तब सेक्स महज शारीरिक क्रिया भर बनकर रह जाती है, एक तरह का यांत्रिक अनुष्ठान, जिसे किसी तरह निपटाया जाना है। उसमें प्रेम नदारद होता है।

कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि हर बार किसी चीज़ की कमी रह गई है। वे समझने लगते हैं कि उन्हें वह प्राप्त नहीं हो रहा है, जिसकी खोज में वे यह सब कर रहे थे: किसी रिश्ते का असली मकसद हासिल नहीं हो पाता। किसी के साथ उस स्तर पर जुड़ाव, जो इतनी गहराई तक चला जाता है, जिसे शारीरिक संसर्ग छू भी नहीं सकता। उन्हें प्रेम नहीं मिल पा रहा है।

ऐसा हो भी नहीं सकता! अगर सेक्स सिर्फ अनुष्ठान है, यांत्रिक कर्मकांड है, जब इससे कोई फर्क न पड़े कि किसके साथ सेक्स संबंध बनाया जा रहा है और भले ही आप खुद अपने पार्टनर का चुनाव कर रहे हों लेकिन आप उन्हें बार-बार बदलते रहें तो आप उस पार्टनर से उस तरह नहीं जुड़ पाएँगे जिस तरह किसी एक के साथ दीर्घजीवी सबंध में जुड़ पाते हैं। और सेक्स को लेकर आपकी भावनाएँ भी समान नहीं होंगी, जैसी कि पहले प्रयोग के समय किसी एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में होती हैं।

आप सेक्स साझा कर सकते हैं, शारीरिक संसर्ग साझा कर सकते हैं और किसी अनुष्ठान में साथ-साथ शामिल हो सकते हैं लेकिन आप वही स्नेह, वही भावनाएँ और वही प्रेम साझा नहीं कर सकते जैसा एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में कर पाते हैं। प्रेम ही वह चुंबक है जो आपको और आपके पार्टनर को जोड़े रखता है। अक्सर लोग समझते हैं कि सेक्स वह गोंद है-लेकिन वास्तव में वह चुंबक सिर्फ और सिर्फ प्रेम है।

मेरे विचार में सेक्स भी महत्वपूर्ण है! जी हाँ, वह संबंधों के आवेग को घनीभूत कर देता है और दो व्यक्तियों को करीब लाने में महत्वपूर्ण स्थान अदा करता है। लेकिन सिर्फ तभी जब शारीरिक के अलावा एक दूसरा रिश्ता भी हो। आप किसी के साथ एक विस्मयकारी रात गुज़ार सकते हैं और नियमित रूप से उसके साथ यौनानुभव प्राप्त कर सकते हैं, जो आपकी शारीरिक जरूरतों को पूरी तरह संतुष्ट और आनंदित भी कर सकता है लेकिन इतना होने के बाद भी आप किसी चीज़ की कमी महसूस करते हैं।

यही 'कोई चीज़' प्रेम है। और मेरे विचार में इस गहरे प्रेम और लगाव को किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा करना असंभव है!

क्या करें जब आपको नकारात्मक लोगों की संगत में रहना पड़े? 4 नवंबर 2015

दो दिन पहले मैंने आपको उन लोगों के बारे में बताया था जो भीतर से ही बेहद नकारात्मक होते हैं, इतने कि उन्हें किसी हालत में संतुष्ट नहीं किया जा सकता। कल मैंने बताया कि हमारे आश्रम आने के इच्छुक लोगों के बारे में हम पहले से पता करने की भरसक कोशिश करते हैं कि वह अपने निवास के दौरान हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं, जिससे ऐसी स्थितियों से बचा जा सके। लेकिन ऐसा हो ही जाता है कि ऐसे लोग हमारे यहाँ प्रवेश पा जाएँ। हम उनसे किस तरह निपटते हैं और जब आप अपने आपको ऐसे अत्यंत नकारात्मक लोगों के बीच पाएँ तो आप क्या कर सकते हैं।

सेवा क्षेत्र के उद्यमी होने के नाते इसे हम अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं कि अपने हर ग्राहक को संतुष्ट करें। यह एक बहुत रूखा वाक्य लगता है लेकिन यही सच है: जब हमारा काम ही है कि हम अपने आश्रम में लोगों के ठहरने की व्यवस्था करें तो चाहते हैं कि आश्रम आने वाला हर ग्राहक हमसे संतुष्ट हो! यह एक खुली दुकान की तरह है, हम उसका विज्ञापन भी करते हैं और सामान्यतया वह सबके लिए खुली है। और इसीलिए हम सभी को पूरी तरह संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं।

उन लोगों के साथ भी, जो हमेशा नकारात्मक रवैया रखते हैं, हम संपूर्ण व्यावसायिक कौशल और सत्यनिष्ठा के साथ पेश आते हैं। हम उन्हें भी संतुष्ट करने की पूरी कोशिश करते हैं, उनसे फीडबैक लेते हैं, उनकी हर तरह की मांग पूरी करने का प्रयास करते हैं। लेकिन जो लोग नकारात्मक होते हैं, हर बात में नुख्स निकालना जिनकी आदत होती है, वे हमेशा नकारात्मक ही बने रहना चाहते हैं। जब हमें महसूस होता है कि उन्हें संतुष्ट करना किसी भी हाल में संभव नहीं है, कि खुश होने के लिए उन्हें स्वयं बदलने की ज़रूरत है तो हम अपनी रणनीति बदल देते हैं।

स्वाभाविक ही, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सामने वाले के साथ आपके संबंध कैसे हैं-कि उसे संतुष्ट और प्रसन्न करने के लिए आपको इतनी ज़हमत उठाने की ज़रूरत है भी या नहीं। अगर ऐसे लोगों के साथ रहने की मजबूरी पेश आ ही गई है तो भरसक उनसे वाद-विवाद से बचने की कोशिश करें। ऐसी स्थिति पैदा न होने दें जहाँ सामने वाला बहुत परेशान हो जाए। वे क्या कह रहे हैं, सुनें और जहाँ सहमत होने की संभवना हो, अपनी सम्मति दें। अगर सहमत न हों तो प्रखर रूप से अपना विरोध प्रकट करने की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ सुनें-जब बहुत ज़रूरी हो तभी अपना मत प्रकट करें। आप पहले से ही जानते हैं कि हर बात में नकारात्मक होने की उनकी आदत है इसलिए शांत और संयत बने रहें और उन्हें जो कहना है, कहने दें।

निश्चित ही, आप कह सकते हैं कि इससे, स्वाभाविक ही, बातचीत में कमी आ जाती है। आप जानते हैं कि कुछ भी पूछने से कुछ निकलकर नहीं आने वाला है इसलिए सामने वाले से आप पूछने में भी घबराते हैं कि उसके क्या हालचाल हैं। आप प्रश्न पूछना कम कर देते हैं लेकिन जो थोड़ी बहुत प्रसन्नता और संतुष्टि या आपसी समझ बची रह गई है, उसे बचाए रखने के लिए आप गुड मॉर्निंग, गुड ईवनिंग जैसा सामान्य औपचारिक वार्तालाप जारी रखते हैं।

इसके बावजूद सामने वाला असंतुष्ट या नाखुश होने के लिए कोई न कोई बात ढूँढ़ ही सकता है। ऐसे लोग सिर्फ इस बात पर दुखी हो सकते हैं कि दूसरे इतने खुश क्यों हैं। वास्तव में यह उनके लिए खुश होने का एक मौका सिद्ध हो सकता है-लेकिन मौके का लाभ उठाने के स्थान पर वे पछताने का मौका ढूँढ़ते हैं कि दूसरे खुश क्यों हैं।

जैसा कि मैंने कहा, खुश रहने में आप उनकी मदद कर ही नहीं सकते। जैसी भी परिस्थिति हो, आपको सिर्फ उसे स्वीकार करने की ज़रूरत है और संयत रहने की। पहले भी आप ऐसे लोगों से मिल चुके होंगे और मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि यह आगे भी होता रहेगा। कुछ समय के लिए आपके रास्ते मिलेंगे लेकिन एक दिन आएगा जब आप अपने-अपने अलग रास्तों पर चल पड़ेंगे।

आपके लिए भी यह एक मौका है कि चीज़ें या परिस्थितियाँ जैसी भी हों, उन्हें आप स्वीकार करना सीखें-बिना उन पर अधिक परेशान हुए!

जहाँ तक हो सके, नकारात्मक लोगों से दूर रहें – 3 नवंबर 2015

कल मैंने उन लोगों की चर्चा की थी, जिन्हें संतुष्ट करना वास्तव में असंभव कार्य है क्योंकि वे अंदरूनी तौर पर भयंकर रूप से नकारात्मक होते हैं। इस प्रकार वे न सिर्फ खुद हर वक़्त दुखी रहते हैं बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी दुखी कर देते हैं। जैसा कि मैंने बताया, हालांकि कभी-कभार ही हुआ है, लेकिन आश्रम में हमारा पाला भी ऐसे नकारात्मक लोगों से पड़ता रहा है। कभी-कभार ही क्यों? क्योंकि हमारे यहाँ आने के इच्छुक लोगों के साथ अपनी ईमेल चर्चाओं में ही हम यह जान लेने की कोशिश करते हैं कि हम उन्हें संतुष्ट कर पाएँगे या नहीं।

सामान्यतया हमारे यहाँ आने के इच्छुक लोग ईमेल द्वारा हमसे संपर्क करते हैं। जो लोग हमारे साथ आश्रम में रहना चाहते हैं, हमसे तरह-तरह के प्रश्न पूछते हैं और हम अपने प्रस्तावित विश्रांति कार्यक्रमों की और पर्यटन व्यवस्था संबंधी जानकारियाँ देते हुए उन्हें प्रत्युत्तर भेजते हैं। अपने ईमेल संदेशों में ही ज़्यादातर लोग यह साफ बताते हैं कि वे क्या चाहते हैं और हमसे उन्हें क्या अपेक्षाएँ हैं-अगर वे नहीं बताते तो हम ही उनसे साफ़-साफ़ पूछ लेते हैं। हम उन्हें स्पष्ट कर देते हैं कि हम कौन हैं और कैसे लोग हैं, कि हम ईश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं रखते, कि हमारे आश्रम में कोई गुरु नहीं है और अधिकतर हम लोग समय की पाबंदी को लेकर पूरी तरह स्वतंत्र हैं, जैसे रात को कब सोना है या सुबह कब जागना है।

इतने से ही भगवद्भक्ति हेतु वृंदावन आने वाले, तीर्थयात्री टाइप के और गुरुओं की खोज में निकले लोग हमारी सूची से बाहर हो जाते हैं, जो या तो श्रद्धावश, ईश्वर की आराधना हेतु या फिर गुरुओं से आदेश प्राप्त करने वृंदावन आते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं, जिनकी कोई न कोई अपेक्षा होती है लेकिन उनका क्या किया जाए, जो सिर्फ नकारात्मक होते हैं और किसी ऐसी चीज़ की तलाश में होते हैं जो उन्हें सुखी और संतुष्ट कर सके?

लेकिन इमेल्स आपको ध्यान से पढ़ने होंगे। बल्कि, इमेल्स से अधिक आपको ईमेल पढ़ते हुए उनके बारे में होने वाली अनुभूति पर ध्यान देना होगा। कभी-कभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता लेकिन अक्सर आपसे बहुत से शंकालु प्रश्न किए जाते हैं, जिनसे आपको एहसास हो जाता है कि वह व्यक्ति दरअसल अभी से, आपको बिना जाने-पहचाने, बिना रूबरू मुलाक़ात किए, बिना पता किए कि आप क्या करते हैं, आपकी आलोचना कर रहा है।

अगर आपको शुरू में ही यह एहसास हो जाए कि कोई आपके साथ व्यर्थ ही नकारात्मक हो रहा है, जबकि वह व्यक्ति अभी हज़ारों मील दूर है, यदि आपको लगे कि आपको किसी बात पर अपनी सफाई देनी पड़ रही है और लगे कि इस व्यक्ति के साथ किसी वाद-विवाद में पड़ने से अच्छा होगा कि अपनी सामान्य, शांतिपूर्ण, कामकाजी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएँ और यह एहसास हो कि यह व्यक्ति समय गुज़ारने के लिए ठीक नहीं है। अपने घर पर लगातार कुछ हफ्ते रहने के लिए तो बिल्कुल नहीं, जब उसके साथ आपको सशरीर भी साथ रहना होगा!

ऐसे किसी भी मामले में उन्हें मना करने की हम पूरी कोशिश करते हैं। उनके साथ ईमेल पर हुई बातचीत के दौरान होने वाले अपने एहसासात पर गौर करते हुए और इस बात पर विचार करते हुए कि उस व्यक्ति को अपने आश्रम में आमंत्रित किया जाना आसान होगा या कठिन, हम बारीकी से परीक्षा करते हैं। हम जानते हैं कि हम हर व्यक्ति को खुश और संतुष्ट नहीं कर सकते। यह जीवन का एक सामान्य सच है और हम उसे स्वीकार करते हैं। लेकिन हम कोशिश करते हैं कि जिसे कोई भी खुश और संतुष्ट नहीं कर सकता, उसे आमंत्रित करके अपने लिए कठिनाई मोल न लें!

इन सभी भरसक कोशिशों के बाद भी कभी-कभी यह संभव नहीं हो पाता कि सिर्फ ईमेल के ज़रिए आप लोगों के मन की सारी बातें पढ़ सकें। अनुभव के साथ इस बात में महारत हासिल होती जाती है और अब क्वचित ही होता है कि कोई ऐसा व्यक्ति आश्रम का मेहमान बन सके लेकिन यह सामाजिक व्यवहार की सामान्य दैनिक उलझनें हैं और अब भी यह कभी-कभी हो ही जाता है।

तो क्या किया जाए अगर ऐसे किसी व्यक्ति के साथ आपका पाला पड़ ही जाए? कल के ब्लॉग में मैं इसी विषय पर लिखना चाहता हूँ।

जब कभी भी कुछ भी ठीक होता नज़र नहीं आता क्योंकि संतुष्टि भीतर से आती है – 2 नवंबर 2015

कल मैंने सकारात्मक या नकारात्मक नज़रिए के बारे में संक्षेप में लिखते हुए बताया था कि कैसे वह आपके जीवन को प्रभावित कर सकता है या नहीं कर सकता। क्या कभी किसी ऐसे व्यक्ति से आपका सामना हुआ है जो इतना अधिक नकारात्मक है कि किसी भी स्थिति में संतुष्ट नहीं रह सकता? जहाँ तक मेरा सवाल है, मुझे कई बार ऐसे लोग मिले और मेरा दावा है कि उनके लिए आप कुछ भी कर लें, वे कभी संतुष्ट नहीं हो सकते-क्योंकि सकारात्मकता भीतर से आती है!

इसलिए स्वभाव से ही ऐसे लोग जीवन में किसी ऐसी वस्तु की तलाश में होते हैं जो उन्हें संतोष प्रदान कर सके। अपने व्यक्तिगत सलाह-सत्रों में मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूँ और समय-समय पर हमारे आश्रम के कई अतिथियों से भी। जो व्यक्ति किसी भी सेवा क्षेत्र के उद्यम से जुड़ा है, जानता होगा कि ऐसे लोग सबसे अक्खड़ और तकलीफदेह ग्राहक साबित होते हैं!

अब यह कोई ज़रूरी नहीं है कि ऐसे लोग भले व्यक्ति नहीं हो सकते, कि वे अक्सर बहुत कुत्सित या बुरे इंसान ही होते हों या आपका बुरा चाहने वाले हों या आपको ही बुरा व्यक्ति समझते हों! स्वाभाविक ही, ऐसे लोग भी हो सकते हैं लेकिन मैंने अक्सर देखा है कि यह कोई नियम नहीं है कि ऐसा ही हो! वास्तव में वे अपने स्वभाव से मजबूर होते हैं, वे भीतर से ही ऐसे होते हैं कि हर वक़्त शिकायत करते रहें, हर बात में नकारात्मकता की तलाश में रहें और किसी भी स्थिति में सुखी और संतुष्ट न हों!

उदाहरण के लिए, एक बार हमारे आश्रम में एक आस्ट्रेलियाई महिला आई, जो अपने पूरे मुकाम के दौरान कोई न कोई नकारात्मक बात ढूँढ़ती ही रहती थी। उसके यहाँ पहुँचते ही हमने उसकी यह आदत भाँप ली। क्योंकि मैं इत्तफाकन बाहर ही था, जैसे ही उसकी कार आश्रम पहुँची, मैंने ही उसका स्वागत किया। अधिकतर लोग लंबी यात्रा के बाद किसी ठिकाने लगने पर प्रसन्न ही होते हैं और सोचते हैं कि देखें, आगे क्या-क्या नया देखने को मिलता है लेकिन उसके साथ तत्क्षण मुझे प्रतीत हुआ कि यह महिला वैसी प्रसन्नचित्त महिला नहीं है-उसी पल मुझे उसके चेहरे पर यह लिखा दिखाई दे रहा था।

उसे खुश करने के लिए हमने वह सब किया, जो कर सकते थे-लेकिन उसे खुश करने में सफल नहीं हो सके। जब बाज़ार में वह साफ़-सफाई के सामान की दुकान खोज नहीं पाई तो उसे उसकी मर्ज़ी का सारा सामान उपलब्ध कराने से लेकर उसके संपूर्ण विश्रांति कार्यक्रम में परिवर्तन करने तक, हमने सब कुछ आजमाया मगर अफसोस…

मैं घटनाओं के विस्तार में नहीं जाना चाहता किंतु आप कल्पना कर सकते हैं-वे कोई महत्वपूर्ण मामले नहीं थे याकि ज़रूरी चीजें नहीं थीं, पहले किसी अतिथि को उनसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी और कुछ वस्तुएँ उसके देश में उपलब्ध उन्हीं वस्तुओं से सिर्फ देखने में अलग थीं और सिर्फ इसीलिए वे उसके काम नहीं आ सकती थीं।

मज़ेदार बात यह कि सिर्फ भारत में मौजूद परिस्थितियाँ ही उसकी परेशानी का सबब नहीं थीं या सिर्फ भारतीयों से ही उसे परेशानी नहीं थी! वास्तव में प्रकृति से ही उसे किसी भी बात से खुश न होने की आदत थी यानी यह उसकी स्वभावगत विशेषता ही बन गई थी। और इस स्वभाव में बाहर से कोई सुधार संभव नहीं था। आप कितनी ही खूबसूरत जगह चले जाएँ, आपको अगर उसमें नुस्ख ही देखना है तो वही आपको नज़र आएगा! आप अच्छे से अच्छा खाना सामने रख दें, अच्छे से अच्छे कपड़े या ज़रूरी सामान ले आएँ या चर्चा करने के लिए एक से एक जानकार लोगों को बिठा दें-उन्हें संतुष्टि न मिलनी है, न मिलेगी।

अगर उपरोक्त वर्णन में आपको अपनी थोड़ी भी झलक दिखाई देती है तो जान लीजिए कि खुश रहने के लिए खुद आपको ही अपने आप में बदलाव लाना होगा! मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कभी-कभी आप कितना अधिक दुखी महसूस कर सकते हैं कि न जाने क्यों कोई बात ठीक हो ही नहीं रही है। आप अच्छे व्यक्ति हैं, आसपास के लोग अच्छे हैं और कोई घटना भी ऐसी नहीं हुई है जिसे दुखद कहा जा सके। तो इन बातों पर गौर करें और समझें कि आपको भीतर से बदलने की ज़रूरत है! यह लंबा काम हो सकता है और कभी-कभी कठिन भी, लेकिन आप ऐसा कर सकते हैं!

मैं अपने जीवन में सदा खुश रहा हूँ और मुझे चीजों को सकारात्मक रोशनी में देखना पसंद है। कृपया मेरे इस नज़रिये के साझीदार बनें। अगले कुछ दिन मैं आपको बताऊँगा कि यदि आप भी ऐसे लोगों के बीच रहते हैं तो आप क्या कर सकते हैं-और हम ऐसी परिस्थितियों से पल्ला झाड़ने के लिए क्या करते हैं।