गैर हिंदुओं को भारत के धार्मिक समारोहों में शामिल होने के लिए प्रेरित करने संबंधी एक मज़ेदार रिपोर्ट – 26 फ़रवरी 2015

मैं कई बार आपको बता चुका हूँ कि हमें आश्रम में मेहमानों का स्वागत करते हुए अत्यंत ख़ुशी होती है! वास्तव में बड़ा अच्छा लगता है जब हम अलग-अलग देशों के लोगों को एक साथ अपने यहाँ पाते हैं और जब वे सब एक-दूसरे के साथ अपने विचार और अपनी मान्यताएँ साझा करते हैं। निश्चय ही वे भारत में देखी और अनुभव की गई बातें भी हमें बताते हैं-और अभी हाल ही में प्राप्त रिपोर्ट न सिर्फ हमें हँसने के लिए मजबूर करती है बल्कि यह सोचने के लिए भी मजबूर करती है कि धार्मिक कर्मकांड आयोजित करने वाले लोग आखिर क्यों दूसरों को इन समारोहों में आग्रह पूर्वक आमंत्रित करते हैं और उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए हर तरह का दबाव भी बनाने की कोशिश करते हैं।

आश्रम के दो मेहमान कुछ दिन पहले वृन्दावन के केशी घाट गए थे, जहाँ घाट की सीढ़ियाँ सीधे यमुना नदी में उतर जाती हैं। आजकल नदी में पानी बहुत कम रह गया है मगर लोग हर दिन अपने तीर्थयात्रियों के लिए आरती करने से बाज़ नहीं आते। हमारे मेहमान दंपति यही पूजा समारोह देखने गए थे-और वास्तव में उनके मुताबिक पूरा समारोह अत्यंत मज़ेदार रहा।

सामान्यतः लोग एक ओर बैठ जाते हैं और थोड़ी दूरी से सामने हो रहे समारोह को देखते हैं। वे घाट पर आए और सोच ही रहे थे कि किसी ऐसी जगह बैठा जाए जहाँ से समारोह अच्छी तरह देख सकें कि उनके पास कुछ श्रद्धालु आए और उनसे अपने साथ चलने का आग्रह करने लगे। वे उनके पीछे चल पड़े और कुछ देर बाद ही अपने आपको भीड़ के बीचोंबीच खड़ा पाया। लोगों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें और साथ ही उस अप्रतिम अनुभव में वे भी सहभागी हो सकें इसलिए वे वही सब करते भी रहे जैसा उनसे कहा जा रहा था।

और वाकई वह अनुभव अपने आप में एक ही था! उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें आटे के गोले प्राप्त हुए, जिन्हें उन्होंने नदी में फेंक दिया और कैसे आसपास खड़े लोगों को कोई नुकसान न पहुँचे इस बात का ध्यान रखते हुए उन्होंने जलते दियों की बड़ी और भारी आरती उठाकर भीड़ के बीच लहराया और यहाँ तक कि छोटी-छोटी नावों दिए रखकर नदी के उथले पानी में बहाए और एक लम्बी लकड़ी की सहायता से उन्हें स्थिर रखने की कोशिश करते रहे कि वे लुढ़ककर पानी में गिर न जाएँ। उन्हें एक खोखला सींग दिया गया, जिसमें दूध भरा गया और उनसे कहा गया कि उसे एक विशेष तरीके से नदी पर थामे रहें कि दूध पानी में गिरता चला जाए। संतुलन का वह एक चुनौतीपूर्ण काम था, जिसमें अपने आप को बैरियर के उस पार गिरने से बचाते हुए सींग को नदी में इतनी दूर रखना था कि दूध पानी में ही गिरे! सींग खाली होने के बाद ही वे राहत की साँस ले पाए- और ये क्या, वे हैरान रह गए जब एक नहीं बल्कि दो बार कोई आया और सींग को फिर भर गया!

आश्रम में आकर वे सारी गतिविधियों की नकल उतार-उतारकर बताते रहे और सब आपस में ठहाके लगा-लगाकर हँसते रहे। स्वाभाविक ही उन्हें बड़ा मज़ा आया था और उन्होंने बताया कि वास्तव में वे पूरी गतिविधियों में संलग्न हो गए थे लेकिन साथ ही कुछ समय में ही उस सबसे आजिज़ आ गए थे। वहाँ बहुत शोर-शराबा हो रहा था, नदी के गंदले, स्थिर और निर्जीव पानी से दुर्गंध उठ रही थी और संतुलन बनाए रखने के लिए उन्हें बहुत सी अजीबोगरीब हरकतें करनी पड़ रही थीं। लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने उन हरकतों का काफी मज़ा लिया। और यह भी स्पष्ट था कि वे कतई नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं, इन गतिविधियों के पीछे की कहानी क्या है, तर्क क्या है, उद्देश्य क्या है!

मैं मानता हूँ कि वे इन अनुभवों की बहुत सी यादें लेकर यहाँ से जाएँगे और अपने मेहमानों को उस वातावरण का अनुभव और मज़ा लेने के लिए हम प्रेरित भी करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें इन सब गतिविधियों में शामिल होने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए थे।

वास्तव में आप अपने, निश्चित ही हिन्दू, रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों का प्रदर्शन और आयोजन कर रहे हैं और आपके कर्मकांडों और रीति-रिवाजों से अनजान एक गैर हिन्दू व्यक्ति जब आपके पास आता है तो उसे अपने संस्कारों में शामिल करने की ज़रूरत क्या है, आप क्यों चाहते हैं कि एक गैर हिन्दू आपकी परम्पराओं का अनुकरण करे? अगर आप अपने धर्म से उसका साक्षात्कार कराना चाहते हैं तो उस मेहमान से वे सब कर्मकांड करवाने की ज़रूरत नहीं है, जिन्हें वह समझता नहीं है। आपके धर्म को वह इन गतिविधियों की सहायता से कतई बेहतर तरीके से नहीं जान सकता! क्या आप अपनी धार्मिकता का प्रदर्शन भर करना चाहते हैं? अगर ऐसा करना ही चाहते हैं तो दूसरों से वही सब करवाने की क्या आवश्यकता है, जो आप कर रहे हैं? या फिर अंत में, क्या आप उनसे कोई चन्दा या चढ़ावा वसूल करना चाहते हैं? पैसे के लिए धार्मिक प्रहसन का पाखंडी आयोजन!

इसके अलावा मैं उन हिंदुओं के बारे में भी सोचता हूँ, जो इन कर्मकांडों में शामिल होते हैं। दरअसल बहुत से हिन्दू भी नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, इन अनुष्ठानों का उद्देश्य क्या है, इनके पीछे की कहानी क्या है! वे भी आँख मूंदकर अपने पुरोहितों की गतिविधियों का और उसके आदेशों का पालन करते चले जाते हैं, जैसा कि उनके माता-पिता और पूर्वज सैकड़ों वर्षों से करते रहे थे और पीढ़ी दर पीढ़ी अपने बाल-बच्चों को भी दिखाते रहे, बार-बार वहाँ आकर उनके साथ उन्हें दोहराते रहे और इस तरह वह आपके सोच और चेतना का हिस्सा बनता चला गया। वे इन रीति-रिवाजों में निहित प्रतीकों को नहीं जानते, उनमें अंतर्निहित अभिप्राय से वे अनभिज्ञ होते हैं। इसलिए एक तरह से उनके लिए भी यह एक खेल-तमाशे के सिवा कुछ भी नहीं होता। खेल, जिसमें दैवी आशीर्वाद के लाभ की संभावना भी मौजूद होती है।

मैं समझ सकता हूँ कि अपने खेल का आनंद आप विदेशियों के साथ साझा करना चाहते हैं लेकिन मैं आपको आगाह करना चाहता हूँ कि आपके लिए वह उपहास का कारण भी बन सकता है, वे आपके रीति-रिवाजों की हँसी उड़ा सकते हैं, उन पर अनुचित टीका-टिप्पणी कर सकते हैं-और मैं जानता हूँ, आप यह पसंद नहीं करेंगे! तो फिर क्यों नहीं हम यह करते कि अगर कोई हमारे पास आकर आग्रह पूर्वक उनमें शामिल होने का निवेदन करता है तभी उन्हें शामिल किया जाए अन्यथा उन्हें सब कुछ दूर से देखने दें! किसी पर कोई दबाव न डालें और उनके प्रति निर्लिप्त होकर अपना काम करते रहें।

और सबसे बड़ी बात, जब आपको थोड़ा समय मिले तो नदी के बारे में सोचिए, इन आयोजनों के चलते उसमें होने वाले प्रदूषण के बारे में, उससे संबन्धित दूसरी समस्याओं के बारे में सोचिए और सोचिए कि इन आयोजनों में वास्तव में आप कितनी मूर्खताएँ कर रहे होते हैं। 🙂

जब बहुत सारा पंचामृत नाली में बह गया……..24 मार्च 13

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो 2005 में भी मेरे भीतर बहुत बदलाव आना बाकी था। निःसंदेह जीवन का नाम ही परिवर्तन है। सन 2000 के दिसम्बर में गुफा छोड़ने के बाद से मेरी जिंदगी में बहुत कुछ बदल रहा था लेकिन उसके बाद भी बहुत कुछ शेष था जो अभी बदलना बाकी था। गुरु का चोला छोड़ने के बाद धर्म और उस ‘गुरुत्व’ के विषय में मेरे भीतर काफी मंथन चलता रहा। उन दिनों जब मैं जर्मनी में था तो वहां एक रोचक वाकया हुआ। उसे याद करके जहां एक तरफ मुझे हंसी आती थी वहीं दूसरी तरफ कुछ धार्मिक अनुष्ठानों की सार्थकता पर संदेह होने लगता था।

जर्मनी में काम करते हुए वहां मेरे बहुत से मित्र बन गए थे। वहां ऐसे बहुत सारे वैकल्पिक चिकित्सक थे जो मेरे लेक्चर, कार्यक्रम, व्यक्तिगत सत्र आदि में शामिल होने के लिए आया करते थे और उनमें से भी कुछेक मेरे दोस्त बन गए थे। उनमें से एक पुरुष ने मेरा एक कार्यक्रम आयोजित करने की इच्छा व्यक्त की और मैंने भी खुशी खुशी हां भर दी। उसने मुझे हाइडलबर्ग में आमंत्रित किया जहां उसके एक मित्र का सेंटर था। वहां काम करते हुए हमारी बातचीत के दौरान मुझे मालूम हुआ कि मेरा यह नया मित्र हाइडलबर्ग के एक नज़दीकी उपनगर में अपना नया मकान बना रहा था। चंद हफ्तों में मकान बनकर तैयार होने वाला था। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसके गृहप्रवेश समारोह में शामिल हो सकूंगा और नए घर में कुछ धार्मिक अनुष्ठान कर सकूंगा। मैंने हामी भर दी। मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं थी और मैं एक दोस्त के लिए यह काम प्रसन्नतापूर्वक करने के लिए तैयार था।

घर तैयार होने के बाद हम कई दोस्त वहां इकठ्ठा हुए। हम करीब तीस लोग वहां मौजूद थे और उनमें से बहुतों को मैं जानता था। हमने अनुष्ठान की शुरुआत पंचामृत अभिषेक से की। इसमें भगवान की मूर्ति को दूध, शहद और अन्य सामग्रियों से नहलाया जाता है और प्रभु के अनुग्रह की कामना की जाती है। इस दौरान मैं मंत्रोच्चारण कर रहा था और अन्य सभी लोग अभिषेक में भाग ले रहे थे। इस धार्मिक कृत्य के संपन्न होने के उपरांत अभिषेक का यह सामग्री मिश्रित दूध गिलासों में डालकर सबको पीने के लिए दिया जाता है। यह स्वादिष्ट होता है और माना जाता है कि यह ईशकृपा से पूरित होता है। यह एक प्रकार का पवित्र पेय होता है जो आपको ईश्वर की अनुकंपा, शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है। अभिषेक की समाप्ति पर किसी ने वह दूधभरा कटोरा गृहस्वामी को थमा दिया, वह उठा और उस कटोरे को लेकर बाहर चला गया। कमरे में उपस्थित सब लोग प्रतीक्षा करने लगे। उनमें से कुछ को यह पता था कि वह क्या लाने वाला है। उन्हें इंतजार था सकारात्मक ऊर्जा से पूरित पंचामृत का। जब मेरा वह मित्र कमरे में वापिस लौटा तो उसके हाथ खाली थे। क्या हुआ? वह ईशकॄपायुक्त पंचामृत कहां गया?

उसने उस पंचामृत को नाली में बहा दिया था! उसे यह पता नहीं था कि उसका क्या करना है इसलिए उसे फेंक दिया उसने। कई लोगों को यह जानकर बड़ा झटका लगा। जब मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा तो मुझे हंसी आ गई। वह अपराधबोध से दबा जा रहा था कि उसने पवित्र पेय का अपमान कर दिया है। इस घटना को याद करके आज भी मैं उन मित्रों के साथ बहुत हंसता हूं। सब लोग उस पावन पंचामृत का पान करने के लिए प्रतीक्षारत थे जिसे उसने स्नान का गंदा पानी समझकर नाली में बहा दिया था।

लेकिन इस घटना ने एक नए विचार को मेरे भीतर जन्म दियाः क्या अर्थ है ऐसी पावनता का जिसे कोई व्यक्ति समझता ही न हो? आपकी एक धार्मिक क्रिया के फलस्वरूप एक पेय बना लेकिन एक व्यक्ति, जिसने कभी ऐसे अनुष्ठान में हिस्सा न लिया हो, सोचता है कि यह प्रभु की मूर्ति का मैल ही तो है। क्या ऐसे कर्मकांड की कोई प्रसांगिकता है? क्या पाइपों में बहने के बाद भी यह पंचामृत घर को पवित्र कर रहा है? कुछ लोग कहेंगें कि तुमने पंचामृत को नाली में बहा दिया है तो यह इस घर के लिए अशुभकारी होगा!

वास्तव में मैं ऐसा कभी नहीं मानता था कि यदि कोई कर्मकांड शास्त्रोक्त विधि से संपन्न नहीं किया गया है तो यह अशुभ फलदायी होता है। क्या इन सबका प्रभाव महज मनोवैज्ञानिक नहीं होता?

दावत से दिखावे की रस्म पूरी होती है न कि मौत की – 28 दिसम्बर 12

पिछले कई दिनों से मैं हिंदु परिवारों द्वारा मानी जाने वाली उन सभी धार्मिक रीतियों और प्रथाओं के बारे में लिखता आ रहा हूं जिसे हम नहीं मानते हैं। उस दौरान मैंने बताया था कि हिंदू घर में मौत के तेरहवें दिन एक भोज का आयोजन किया जाता है। इसे ‘तेरहवीं’ कहते हैं।

धार्मिक व्यक्ति मौत के बाद अपना पूरा वक़्त घर में ही बिताते हैं और हर दिन एक पंडित किसी न किसी कर्म-कांड का आयोजन करवाने घर आता है। तेरहवीं इन सब में सबसे महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि उस दिन मृत व्यक्ति के परिजनों की अपवित्रता समाप्त होती है. इसके लिए कई सारी प्रथाएं हैं, पंडित के निर्देशों के अनुसार उस दिन की जाने वाली महत्वपूर्ण चीज़ों में सबसे अहम है भोज का आयोजन।

सबसे पहले आप तेरह ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, उन्हें वस्त्र देते हैं, धन देते हैं, बर्तन व अन्य घरेलू चीज़ें देते हैं। वे सबसे महत्वपूर्ण अतिथि होते हैं और उन्हें भोजन के साथ दुनिया भर के उपहार मिलते हैं। क़िस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता है! इन पंडितों के अलावा आप जितने लोगों को संभव हो सके भोजन कराएंगे. लोग अपनी सामाजिक और आर्थिक हैसियत के हिसाब से 50, 100, 500 या 1000 लोगों को भोजन करवाते हैं।

यहीं से सारी समस्या शुरू होती है, इसी वजह से यह प्रथा सिर्फ़ हम जैसे अधार्मिकों के बीच अप्रिय नहीं है: यह भोज एक तरह की रेस बन गया है कि कौन अपने प्रियजन की मौत पर कितने लोगों को खिला सकता है। आप जितने ज़्यादा लोगों को खिलाते हैं, उतना ही ज़्यादा प्यार आप अपने मृत परिजन से करते हैं, करते थे। लेकिन वे क्या करें, जिनकी ये सब कर पाने की हैसियत ही नहीं है? वे लोग जिन्होंने अपनी बेटियों के ब्याह में दहेज की ऊंची रकम देने के लिए कर्ज़ लिया है? कल्पना कीजिए कि उनके घर में किसी की अचानक मृत्यु हो जाए और अब उन्हें पूरे शहर को दावत पर बुलाना है! ये उनकी माली हालत को तहस-नहस कर देगा!

भले ही कुछ लोग इस प्रथा का विरोध कर रहे हैं, लेकिन हमारे समाज में इसे बेहद सामान्य माना जाता है. जब हमने ऐसा कोई आयोजन न करने की बात कही थी तो लोग चौंक गए थे। ज़ाहिर-सी बात है, कुछ लोगों को यह मौक़ा मिल गया कि वे उनके द्वारा आयोजित दावतों का किस्सा सुनाकर शेखी बघारेंगे. एक आदमी ने कहा कि उसने अपनी पत्नी की मृत्यु पर 900 लोगों को खाना खिलाया! भाई, यह बताकर तुम क्या साबित करना चाहते हो? कि तुम किसी के हमेशा के लिए चले जाने का शोक प्रकट करने में हमसे बेहतर हो? अगर तुम्हें पसंद है तो बेशक ऐसा करो…जहां तक हमारा सवाल है, अम्माजी की मृत्यु के सिर्फ़ तेरह दिन बाद हम कोई भोज या उत्सव बिल्कुल भी आयोजित नहीं करना चाहेंगे। 

ये कैसा आयोजन है? आप इसलिए दावत दे रहे हैं कि आपकी अपवित्रता दूर हो गई? नहीं, हम ऐसा नहीं कर पाते, हमें समझ नहीं आता कि आख़िर हम यह ज़रूरत क्यूं महसूस करेंगे कि ढेर सारे लोगों को बुलाकर यह दिखाया जाए कि इस आयोजन पर हम कितने पैसे खर्च कर सकते हैं! दिखावे में हमारी दिलचस्पी नहीं है, न ही हम ऐसा मानते हैं कि इस दौरान हम कभी भी अपवित्र हुए और हम कोई विधि-विधान भी नहीं करते।

जब लोगों ने हमसे पूछा कि भोज के लिए उन्हें कब आना चाहिए, हमने उनसे कहा कि हम कोई कर्म-कांड नहीं कर रहे. बब्बा जी के दोस्त भी, जिन्हें उनके आने की ख़बर मिली थी, ने पूछा और बब्बा जी ने उन्हें भी मना कर दिया, हम कुछ नहीं कर रहे. आख़िर में नौबत ऐसी आई कि लोगों के इस सर्किल से कोई आया ही नहीं, कोई भी नहीं। और हमें इससे किसी तरह की कोई शिकायत भी नहीं है।

लेकिन अंत में बस एक ख़्याल रह जाता है: अगर ये आयोजन ही आपको फिर से पवित्र बनाते हैं और हमने ये किया नहीं, तो क्या धार्मिक व्यक्तियों की नज़र में हम हमेशा के लिए अपवित्र रह जाएंगे? क्या अब वे तब तक हमारे पास नहीं आएंगे जब तक हम यह कर्म-कांड पूरा नहीं कर लेते?

रोचक विचार है, हालांकि मुझे लगता नहीं लोग इस चरम तक जाएंगे!

जब धार्मिक परम्पराओं के सामने 50 साल की दोस्ती को ताक पर रख दिया जाता है – 27 दिसंबर 2012

हमने बहुत से लोगों को अपनी माँ के देहांत की खबर नहीं की थी और उसे धीरे-धीरे लोगों को पता चलने के लिए छोड़ दिया था। फिर भी हम सभी ने अपने बहुत करीबी मित्रों को इसकी सूचना दी थी और बब्बाजी ने भी दो-तीन लोगों को, जो उनके या अम्माजी के नजदीकी मित्र थे, इसकी सूचना दे दी थी। उनमें से कुछ लोगों की प्रतिक्रिया ने मुझे धार्मिक परम्पराओं के प्रति क्षोभ से भर दिया, क्योंकि उन लोगों ने मेरे पिताजी को दुख पहुंचाया था!

अम्माजी के देहांत के एक दिन बाद, मंगलवार की सुबह, हमने बब्बाजी के एक मित्र को घर के गेट से भीतर आते देखा। हमारा दर्द अभी ताज़ा-ताज़ा था और हम लोग बार-बार बब्बाजी की ओर देखते रहते थे कि वे ठीक तो हैं। अम्माजी की मृत्यु के बाद उनके एकदम अकेले पड़ जाने की संभावना थी और उनकी तबीयत भी खराब हो सकती थी। इसलिए जब हमने उनके इस मित्र को देखा तो हम बड़े खुश हुए। ये व्यक्ति बब्बाजी के मित्र होने के अलावा आश्रम में भी महीनों रह चुके थे और ऐसे वक़्त उन्हें देखकर उनके प्रति हम कृतज्ञ भी महसूस कर रहे थे। हमें लगा कि अपने पुराने मित्र के साथ पुराने दिनों को याद करते हुए, अम्माजी के बारे में बातचीत करते हुए बब्बाजी दुख कुछ हल्का होगा। किसी करीबी मित्र का सिर्फ पास बैठना ही ऐसे वक़्त बहुत सहारा देता है।

बब्बाजी के मित्र को देखकर बाहर ही खड़े पूर्णेन्दु ने उन्हें नमस्कार किया फिर जाकर बब्बाजी को खबर की। हम लोग उन कार्यों को, जो पहले अम्माजी किया करती थीं, संभालने में लगे थे, इसलिए हम भाइयों का पूरे समय उनके पास बैठना संभव नहीं था। मित्र को आए अभी कुछ मिनट ही हुए थे और हम लोग ऑफिस में किसी आवश्यक कार्य के विषय में चर्चा कर रहे थे कि तभी बब्बाजी ऑफिस में आए और कहा कि ऊपर कोई फ्री कमरा हो तो उनके मित्र के लिए तैयार करवा दें जिससे वे उन्हें वहाँ भिजवा सकें।

मगर इतना कहकर जब वे वापस गए तो देखा कि उनके मित्र जा चुके हैं। जैसे अचानक विलुप्त हो गए हों। उन्होंने चाय या पानी पीने से इंकार कर दिया था, रुकने से मना कर दिया था और अब बिना बताए गायब हो गए थे। सभी आश्चर्यचकित और दुखी थे। साफ दिखाई दे रहा था कि पिताजी को बहुत बुरा लगा है! दस मिनट में जब वापस ही चले जाना था तो इतनी दूर, दिल्ली से वे आए ही क्यों? दिल्ली में भी उन्हें कोई काम नहीं था, तो फिर वे यहाँ रुके क्यों नहीं? और इस तरह बिना किसी से बोले-बताए चले जाना क्या उचित था?

दोपहर को मित्र का फोन आया तो बब्बाजी ने अपनी नाराजी ज़ाहिर करते हुए कहा कि उनका बर्ताव उन्हें बहुत बुरा लगा है। उनके मित्र ने कहा कि "यही हमारे परिवार में होता आया है, यही हमारे यहाँ की परंपरा है और मैंने उसी का पालन किया है। हम लोग मिलने तो जाते हैं मगर वहाँ रुकते नहीं हैं, न ही उनके यहाँ कुछ भी खाते-पीते हैं। बस मिलकर वापस आ जाते हैं।" उन्होंने कहा कि अम्माजी के देहांत के 13 वें दिन, जब ‘तेरहवीं’ के कार्यक्रम के बाद हम लोग ‘शुद्ध’ हो जाएंगे, वे फिर आएंगे। मेरे पिताजी ने उनसे कहा कि वे न आएँ क्योंकि हम शुद्धिकरण हेतु किसी प्रकार का कर्मकांड या मृत्युभोज करने नहीं जा रहे हैं जैसा कि धार्मिक लोग आम तौर पर उस दिन करते हैं।

जब दोनों के पारस्परिक मित्र से बात हुई तो बब्बाजी ने उन्हें अपने उस मित्र के बारे में पूरी कथा सुनाते हुए कहा कि उनके व्यवहार से उन्हें और उनके परिवार को बहुत दुख पहुंचा था और यह भी कि वे भी न आएँ क्योंकि वे भी ऐसा ही करेंगे और उससे हमारा दुख कम होने की जगह और बढ़ेगा ही।

हमने अपने पिताजी से इस घटना के बारे में बात की और हम सभी इस बात पर सहमत थे कि ऐसे दुख के समय ऐसे कूढ़मगज लोगों की हमें कोई आवश्यकता नहीं है। हमारे पिताजी, स्वाभाविक ही, अपनी जीवनसंगिनी के वियोग में अकेलापन महसूस कर रहे थे और हालांकि हम लोग आसपास बने रहते थे और यशेंदु तो उनके साथ ही सोता भी था, फिर भी यह बहुत अच्छा होता कि कोई उनकी उम्र का व्यक्ति, जो युवावस्था में साथ बिताए समय के बारे में उनसे बात कर सकता, उनके साथ होता। इस दिलासे की जगह उन्हें, धार्मिक अंधविश्वासों के चलते, अपमान सहन करना पड़ा। ऐसे लोगों के लिए 50 साल की मित्रता धार्मिक रीति-रिवाजों के सामने कोई माने नहीं रखती।

बब्बाजी दुखी मन से उस समय की भी याद करते रहे जब मेरी बहन के देहांत के बाद लोग आए और अपनी बिन मांगी सलाहें देते रहे कि हमारे लिए क्या करना ज़रूरी है, कि हमें कौन-कौन से कर्मकांड करने होंगे; पूछते रहे कि ऐसा किया या कि किसी दूसरे तरीके से सारे कर्मकांड करवाए गए और कोशिश करते रहे कि हम हर तरह के धार्मिक कर्मकांड और समारोह सम्पन्न करें जिन्हें हम त्याग चुके थे और बिल्कुल नहीं करना चाहते थे।

हमने निर्णय किया कि जो लोग फोन पर ऐसे सवाल पूछें या सलाह दें उन्हें कह दिया जाए कि वे न आएँ। उनकी मुफ्त धार्मिक सलाहों की हमें आवश्यकता नहीं है और उनके हाथों अपना अपमान भी हम बर्दाश्त नहीं करेंगे-भले ही यह अपमान किसी दुर्भावनावश न हो बल्कि बेहूदे धार्मिक रीति-रिवाजों के चलते होता हो। हम सिर्फ उनका प्रेम चाहते हैं, सहानुभूति और साथ चाहते हैं। लेकिन अगर आप यह नहीं दे सकते तो फिर आपको इस अवसर पर हमारे यहाँ आने की कोई आवश्यकता नहीं है।