मैं कई बार आपको बता चुका हूँ कि हमें आश्रम में मेहमानों का स्वागत करते हुए अत्यंत ख़ुशी होती है! वास्तव में बड़ा अच्छा लगता है जब हम अलग-अलग देशों के लोगों को एक साथ अपने यहाँ पाते हैं और जब वे सब एक-दूसरे के साथ अपने विचार और अपनी मान्यताएँ साझा करते हैं। निश्चय ही वे भारत में देखी और अनुभव की गई बातें भी हमें बताते हैं-और अभी हाल ही में प्राप्त रिपोर्ट न सिर्फ हमें हँसने के लिए मजबूर करती है बल्कि यह सोचने के लिए भी मजबूर करती है कि धार्मिक कर्मकांड आयोजित करने वाले लोग आखिर क्यों दूसरों को इन समारोहों में आग्रह पूर्वक आमंत्रित करते हैं और उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए हर तरह का दबाव भी बनाने की कोशिश करते हैं।
आश्रम के दो मेहमान कुछ दिन पहले वृन्दावन के केशी घाट गए थे, जहाँ घाट की सीढ़ियाँ सीधे यमुना नदी में उतर जाती हैं। आजकल नदी में पानी बहुत कम रह गया है मगर लोग हर दिन अपने तीर्थयात्रियों के लिए आरती करने से बाज़ नहीं आते। हमारे मेहमान दंपति यही पूजा समारोह देखने गए थे-और वास्तव में उनके मुताबिक पूरा समारोह अत्यंत मज़ेदार रहा।
सामान्यतः लोग एक ओर बैठ जाते हैं और थोड़ी दूरी से सामने हो रहे समारोह को देखते हैं। वे घाट पर आए और सोच ही रहे थे कि किसी ऐसी जगह बैठा जाए जहाँ से समारोह अच्छी तरह देख सकें कि उनके पास कुछ श्रद्धालु आए और उनसे अपने साथ चलने का आग्रह करने लगे। वे उनके पीछे चल पड़े और कुछ देर बाद ही अपने आपको भीड़ के बीचोंबीच खड़ा पाया। लोगों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें और साथ ही उस अप्रतिम अनुभव में वे भी सहभागी हो सकें इसलिए वे वही सब करते भी रहे जैसा उनसे कहा जा रहा था।
और वाकई वह अनुभव अपने आप में एक ही था! उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें आटे के गोले प्राप्त हुए, जिन्हें उन्होंने नदी में फेंक दिया और कैसे आसपास खड़े लोगों को कोई नुकसान न पहुँचे इस बात का ध्यान रखते हुए उन्होंने जलते दियों की बड़ी और भारी आरती उठाकर भीड़ के बीच लहराया और यहाँ तक कि छोटी-छोटी नावों दिए रखकर नदी के उथले पानी में बहाए और एक लम्बी लकड़ी की सहायता से उन्हें स्थिर रखने की कोशिश करते रहे कि वे लुढ़ककर पानी में गिर न जाएँ। उन्हें एक खोखला सींग दिया गया, जिसमें दूध भरा गया और उनसे कहा गया कि उसे एक विशेष तरीके से नदी पर थामे रहें कि दूध पानी में गिरता चला जाए। संतुलन का वह एक चुनौतीपूर्ण काम था, जिसमें अपने आप को बैरियर के उस पार गिरने से बचाते हुए सींग को नदी में इतनी दूर रखना था कि दूध पानी में ही गिरे! सींग खाली होने के बाद ही वे राहत की साँस ले पाए- और ये क्या, वे हैरान रह गए जब एक नहीं बल्कि दो बार कोई आया और सींग को फिर भर गया!
आश्रम में आकर वे सारी गतिविधियों की नकल उतार-उतारकर बताते रहे और सब आपस में ठहाके लगा-लगाकर हँसते रहे। स्वाभाविक ही उन्हें बड़ा मज़ा आया था और उन्होंने बताया कि वास्तव में वे पूरी गतिविधियों में संलग्न हो गए थे लेकिन साथ ही कुछ समय में ही उस सबसे आजिज़ आ गए थे। वहाँ बहुत शोर-शराबा हो रहा था, नदी के गंदले, स्थिर और निर्जीव पानी से दुर्गंध उठ रही थी और संतुलन बनाए रखने के लिए उन्हें बहुत सी अजीबोगरीब हरकतें करनी पड़ रही थीं। लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने उन हरकतों का काफी मज़ा लिया। और यह भी स्पष्ट था कि वे कतई नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं, इन गतिविधियों के पीछे की कहानी क्या है, तर्क क्या है, उद्देश्य क्या है!
मैं मानता हूँ कि वे इन अनुभवों की बहुत सी यादें लेकर यहाँ से जाएँगे और अपने मेहमानों को उस वातावरण का अनुभव और मज़ा लेने के लिए हम प्रेरित भी करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें इन सब गतिविधियों में शामिल होने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए थे।
वास्तव में आप अपने, निश्चित ही हिन्दू, रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों का प्रदर्शन और आयोजन कर रहे हैं और आपके कर्मकांडों और रीति-रिवाजों से अनजान एक गैर हिन्दू व्यक्ति जब आपके पास आता है तो उसे अपने संस्कारों में शामिल करने की ज़रूरत क्या है, आप क्यों चाहते हैं कि एक गैर हिन्दू आपकी परम्पराओं का अनुकरण करे? अगर आप अपने धर्म से उसका साक्षात्कार कराना चाहते हैं तो उस मेहमान से वे सब कर्मकांड करवाने की ज़रूरत नहीं है, जिन्हें वह समझता नहीं है। आपके धर्म को वह इन गतिविधियों की सहायता से कतई बेहतर तरीके से नहीं जान सकता! क्या आप अपनी धार्मिकता का प्रदर्शन भर करना चाहते हैं? अगर ऐसा करना ही चाहते हैं तो दूसरों से वही सब करवाने की क्या आवश्यकता है, जो आप कर रहे हैं? या फिर अंत में, क्या आप उनसे कोई चन्दा या चढ़ावा वसूल करना चाहते हैं? पैसे के लिए धार्मिक प्रहसन का पाखंडी आयोजन!
इसके अलावा मैं उन हिंदुओं के बारे में भी सोचता हूँ, जो इन कर्मकांडों में शामिल होते हैं। दरअसल बहुत से हिन्दू भी नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, इन अनुष्ठानों का उद्देश्य क्या है, इनके पीछे की कहानी क्या है! वे भी आँख मूंदकर अपने पुरोहितों की गतिविधियों का और उसके आदेशों का पालन करते चले जाते हैं, जैसा कि उनके माता-पिता और पूर्वज सैकड़ों वर्षों से करते रहे थे और पीढ़ी दर पीढ़ी अपने बाल-बच्चों को भी दिखाते रहे, बार-बार वहाँ आकर उनके साथ उन्हें दोहराते रहे और इस तरह वह आपके सोच और चेतना का हिस्सा बनता चला गया। वे इन रीति-रिवाजों में निहित प्रतीकों को नहीं जानते, उनमें अंतर्निहित अभिप्राय से वे अनभिज्ञ होते हैं। इसलिए एक तरह से उनके लिए भी यह एक खेल-तमाशे के सिवा कुछ भी नहीं होता। खेल, जिसमें दैवी आशीर्वाद के लाभ की संभावना भी मौजूद होती है।
मैं समझ सकता हूँ कि अपने खेल का आनंद आप विदेशियों के साथ साझा करना चाहते हैं लेकिन मैं आपको आगाह करना चाहता हूँ कि आपके लिए वह उपहास का कारण भी बन सकता है, वे आपके रीति-रिवाजों की हँसी उड़ा सकते हैं, उन पर अनुचित टीका-टिप्पणी कर सकते हैं-और मैं जानता हूँ, आप यह पसंद नहीं करेंगे! तो फिर क्यों नहीं हम यह करते कि अगर कोई हमारे पास आकर आग्रह पूर्वक उनमें शामिल होने का निवेदन करता है तभी उन्हें शामिल किया जाए अन्यथा उन्हें सब कुछ दूर से देखने दें! किसी पर कोई दबाव न डालें और उनके प्रति निर्लिप्त होकर अपना काम करते रहें।
और सबसे बड़ी बात, जब आपको थोड़ा समय मिले तो नदी के बारे में सोचिए, इन आयोजनों के चलते उसमें होने वाले प्रदूषण के बारे में, उससे संबन्धित दूसरी समस्याओं के बारे में सोचिए और सोचिए कि इन आयोजनों में वास्तव में आप कितनी मूर्खताएँ कर रहे होते हैं। 🙂
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