जब धार्मिक परम्पराओं के सामने 50 साल की दोस्ती को ताक पर रख दिया जाता है – 27 दिसंबर 2012

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

हमने बहुत से लोगों को अपनी माँ के देहांत की खबर नहीं की थी और उसे धीरे-धीरे लोगों को पता चलने के लिए छोड़ दिया था। फिर भी हम सभी ने अपने बहुत करीबी मित्रों को इसकी सूचना दी थी और बब्बाजी ने भी दो-तीन लोगों को, जो उनके या अम्माजी के नजदीकी मित्र थे, इसकी सूचना दे दी थी। उनमें से कुछ लोगों की प्रतिक्रिया ने मुझे धार्मिक परम्पराओं के प्रति क्षोभ से भर दिया, क्योंकि उन लोगों ने मेरे पिताजी को दुख पहुंचाया था!

अम्माजी के देहांत के एक दिन बाद, मंगलवार की सुबह, हमने बब्बाजी के एक मित्र को घर के गेट से भीतर आते देखा। हमारा दर्द अभी ताज़ा-ताज़ा था और हम लोग बार-बार बब्बाजी की ओर देखते रहते थे कि वे ठीक तो हैं। अम्माजी की मृत्यु के बाद उनके एकदम अकेले पड़ जाने की संभावना थी और उनकी तबीयत भी खराब हो सकती थी। इसलिए जब हमने उनके इस मित्र को देखा तो हम बड़े खुश हुए। ये व्यक्ति बब्बाजी के मित्र होने के अलावा आश्रम में भी महीनों रह चुके थे और ऐसे वक़्त उन्हें देखकर उनके प्रति हम कृतज्ञ भी महसूस कर रहे थे। हमें लगा कि अपने पुराने मित्र के साथ पुराने दिनों को याद करते हुए, अम्माजी के बारे में बातचीत करते हुए बब्बाजी दुख कुछ हल्का होगा। किसी करीबी मित्र का सिर्फ पास बैठना ही ऐसे वक़्त बहुत सहारा देता है।

बब्बाजी के मित्र को देखकर बाहर ही खड़े पूर्णेन्दु ने उन्हें नमस्कार किया फिर जाकर बब्बाजी को खबर की। हम लोग उन कार्यों को, जो पहले अम्माजी किया करती थीं, संभालने में लगे थे, इसलिए हम भाइयों का पूरे समय उनके पास बैठना संभव नहीं था। मित्र को आए अभी कुछ मिनट ही हुए थे और हम लोग ऑफिस में किसी आवश्यक कार्य के विषय में चर्चा कर रहे थे कि तभी बब्बाजी ऑफिस में आए और कहा कि ऊपर कोई फ्री कमरा हो तो उनके मित्र के लिए तैयार करवा दें जिससे वे उन्हें वहाँ भिजवा सकें।

मगर इतना कहकर जब वे वापस गए तो देखा कि उनके मित्र जा चुके हैं। जैसे अचानक विलुप्त हो गए हों। उन्होंने चाय या पानी पीने से इंकार कर दिया था, रुकने से मना कर दिया था और अब बिना बताए गायब हो गए थे। सभी आश्चर्यचकित और दुखी थे। साफ दिखाई दे रहा था कि पिताजी को बहुत बुरा लगा है! दस मिनट में जब वापस ही चले जाना था तो इतनी दूर, दिल्ली से वे आए ही क्यों? दिल्ली में भी उन्हें कोई काम नहीं था, तो फिर वे यहाँ रुके क्यों नहीं? और इस तरह बिना किसी से बोले-बताए चले जाना क्या उचित था?

दोपहर को मित्र का फोन आया तो बब्बाजी ने अपनी नाराजी ज़ाहिर करते हुए कहा कि उनका बर्ताव उन्हें बहुत बुरा लगा है। उनके मित्र ने कहा कि "यही हमारे परिवार में होता आया है, यही हमारे यहाँ की परंपरा है और मैंने उसी का पालन किया है। हम लोग मिलने तो जाते हैं मगर वहाँ रुकते नहीं हैं, न ही उनके यहाँ कुछ भी खाते-पीते हैं। बस मिलकर वापस आ जाते हैं।" उन्होंने कहा कि अम्माजी के देहांत के 13 वें दिन, जब ‘तेरहवीं’ के कार्यक्रम के बाद हम लोग ‘शुद्ध’ हो जाएंगे, वे फिर आएंगे। मेरे पिताजी ने उनसे कहा कि वे न आएँ क्योंकि हम शुद्धिकरण हेतु किसी प्रकार का कर्मकांड या मृत्युभोज करने नहीं जा रहे हैं जैसा कि धार्मिक लोग आम तौर पर उस दिन करते हैं।

जब दोनों के पारस्परिक मित्र से बात हुई तो बब्बाजी ने उन्हें अपने उस मित्र के बारे में पूरी कथा सुनाते हुए कहा कि उनके व्यवहार से उन्हें और उनके परिवार को बहुत दुख पहुंचा था और यह भी कि वे भी न आएँ क्योंकि वे भी ऐसा ही करेंगे और उससे हमारा दुख कम होने की जगह और बढ़ेगा ही।

हमने अपने पिताजी से इस घटना के बारे में बात की और हम सभी इस बात पर सहमत थे कि ऐसे दुख के समय ऐसे कूढ़मगज लोगों की हमें कोई आवश्यकता नहीं है। हमारे पिताजी, स्वाभाविक ही, अपनी जीवनसंगिनी के वियोग में अकेलापन महसूस कर रहे थे और हालांकि हम लोग आसपास बने रहते थे और यशेंदु तो उनके साथ ही सोता भी था, फिर भी यह बहुत अच्छा होता कि कोई उनकी उम्र का व्यक्ति, जो युवावस्था में साथ बिताए समय के बारे में उनसे बात कर सकता, उनके साथ होता। इस दिलासे की जगह उन्हें, धार्मिक अंधविश्वासों के चलते, अपमान सहन करना पड़ा। ऐसे लोगों के लिए 50 साल की मित्रता धार्मिक रीति-रिवाजों के सामने कोई माने नहीं रखती।

बब्बाजी दुखी मन से उस समय की भी याद करते रहे जब मेरी बहन के देहांत के बाद लोग आए और अपनी बिन मांगी सलाहें देते रहे कि हमारे लिए क्या करना ज़रूरी है, कि हमें कौन-कौन से कर्मकांड करने होंगे; पूछते रहे कि ऐसा किया या कि किसी दूसरे तरीके से सारे कर्मकांड करवाए गए और कोशिश करते रहे कि हम हर तरह के धार्मिक कर्मकांड और समारोह सम्पन्न करें जिन्हें हम त्याग चुके थे और बिल्कुल नहीं करना चाहते थे।

हमने निर्णय किया कि जो लोग फोन पर ऐसे सवाल पूछें या सलाह दें उन्हें कह दिया जाए कि वे न आएँ। उनकी मुफ्त धार्मिक सलाहों की हमें आवश्यकता नहीं है और उनके हाथों अपना अपमान भी हम बर्दाश्त नहीं करेंगे-भले ही यह अपमान किसी दुर्भावनावश न हो बल्कि बेहूदे धार्मिक रीति-रिवाजों के चलते होता हो। हम सिर्फ उनका प्रेम चाहते हैं, सहानुभूति और साथ चाहते हैं। लेकिन अगर आप यह नहीं दे सकते तो फिर आपको इस अवसर पर हमारे यहाँ आने की कोई आवश्यकता नहीं है।