जब बहुत सारा पंचामृत नाली में बह गया……..24 मार्च 13

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो 2005 में भी मेरे भीतर बहुत बदलाव आना बाकी था। निःसंदेह जीवन का नाम ही परिवर्तन है। सन 2000 के दिसम्बर में गुफा छोड़ने के बाद से मेरी जिंदगी में बहुत कुछ बदल रहा था लेकिन उसके बाद भी बहुत कुछ शेष था जो अभी बदलना बाकी था। गुरु का चोला छोड़ने के बाद धर्म और उस ‘गुरुत्व’ के विषय में मेरे भीतर काफी मंथन चलता रहा। उन दिनों जब मैं जर्मनी में था तो वहां एक रोचक वाकया हुआ। उसे याद करके जहां एक तरफ मुझे हंसी आती थी वहीं दूसरी तरफ कुछ धार्मिक अनुष्ठानों की सार्थकता पर संदेह होने लगता था।

जर्मनी में काम करते हुए वहां मेरे बहुत से मित्र बन गए थे। वहां ऐसे बहुत सारे वैकल्पिक चिकित्सक थे जो मेरे लेक्चर, कार्यक्रम, व्यक्तिगत सत्र आदि में शामिल होने के लिए आया करते थे और उनमें से भी कुछेक मेरे दोस्त बन गए थे। उनमें से एक पुरुष ने मेरा एक कार्यक्रम आयोजित करने की इच्छा व्यक्त की और मैंने भी खुशी खुशी हां भर दी। उसने मुझे हाइडलबर्ग में आमंत्रित किया जहां उसके एक मित्र का सेंटर था। वहां काम करते हुए हमारी बातचीत के दौरान मुझे मालूम हुआ कि मेरा यह नया मित्र हाइडलबर्ग के एक नज़दीकी उपनगर में अपना नया मकान बना रहा था। चंद हफ्तों में मकान बनकर तैयार होने वाला था। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसके गृहप्रवेश समारोह में शामिल हो सकूंगा और नए घर में कुछ धार्मिक अनुष्ठान कर सकूंगा। मैंने हामी भर दी। मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं थी और मैं एक दोस्त के लिए यह काम प्रसन्नतापूर्वक करने के लिए तैयार था।

घर तैयार होने के बाद हम कई दोस्त वहां इकठ्ठा हुए। हम करीब तीस लोग वहां मौजूद थे और उनमें से बहुतों को मैं जानता था। हमने अनुष्ठान की शुरुआत पंचामृत अभिषेक से की। इसमें भगवान की मूर्ति को दूध, शहद और अन्य सामग्रियों से नहलाया जाता है और प्रभु के अनुग्रह की कामना की जाती है। इस दौरान मैं मंत्रोच्चारण कर रहा था और अन्य सभी लोग अभिषेक में भाग ले रहे थे। इस धार्मिक कृत्य के संपन्न होने के उपरांत अभिषेक का यह सामग्री मिश्रित दूध गिलासों में डालकर सबको पीने के लिए दिया जाता है। यह स्वादिष्ट होता है और माना जाता है कि यह ईशकृपा से पूरित होता है। यह एक प्रकार का पवित्र पेय होता है जो आपको ईश्वर की अनुकंपा, शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है। अभिषेक की समाप्ति पर किसी ने वह दूधभरा कटोरा गृहस्वामी को थमा दिया, वह उठा और उस कटोरे को लेकर बाहर चला गया। कमरे में उपस्थित सब लोग प्रतीक्षा करने लगे। उनमें से कुछ को यह पता था कि वह क्या लाने वाला है। उन्हें इंतजार था सकारात्मक ऊर्जा से पूरित पंचामृत का। जब मेरा वह मित्र कमरे में वापिस लौटा तो उसके हाथ खाली थे। क्या हुआ? वह ईशकॄपायुक्त पंचामृत कहां गया?

उसने उस पंचामृत को नाली में बहा दिया था! उसे यह पता नहीं था कि उसका क्या करना है इसलिए उसे फेंक दिया उसने। कई लोगों को यह जानकर बड़ा झटका लगा। जब मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा तो मुझे हंसी आ गई। वह अपराधबोध से दबा जा रहा था कि उसने पवित्र पेय का अपमान कर दिया है। इस घटना को याद करके आज भी मैं उन मित्रों के साथ बहुत हंसता हूं। सब लोग उस पावन पंचामृत का पान करने के लिए प्रतीक्षारत थे जिसे उसने स्नान का गंदा पानी समझकर नाली में बहा दिया था।

लेकिन इस घटना ने एक नए विचार को मेरे भीतर जन्म दियाः क्या अर्थ है ऐसी पावनता का जिसे कोई व्यक्ति समझता ही न हो? आपकी एक धार्मिक क्रिया के फलस्वरूप एक पेय बना लेकिन एक व्यक्ति, जिसने कभी ऐसे अनुष्ठान में हिस्सा न लिया हो, सोचता है कि यह प्रभु की मूर्ति का मैल ही तो है। क्या ऐसे कर्मकांड की कोई प्रसांगिकता है? क्या पाइपों में बहने के बाद भी यह पंचामृत घर को पवित्र कर रहा है? कुछ लोग कहेंगें कि तुमने पंचामृत को नाली में बहा दिया है तो यह इस घर के लिए अशुभकारी होगा!

वास्तव में मैं ऐसा कभी नहीं मानता था कि यदि कोई कर्मकांड शास्त्रोक्त विधि से संपन्न नहीं किया गया है तो यह अशुभ फलदायी होता है। क्या इन सबका प्रभाव महज मनोवैज्ञानिक नहीं होता?