हमें घनिष्ट रूप से जुड़ना पसंद है – एक कैनेडियन योग दल का आश्रम आगमन – 13 दिसंबर 2015

कैनेडियन योग दल

पिछले हफ्ते हम आश्रम में कुछ बहुत शानदार लोगों के साथ पूरी तरह व्यस्त रहे: हमारे आश्रम में कैनेडा से एक योग-दल आया था! मुझे कहना चाहिए कि एक बार फिर हमें अपना घर कुछ बहुत सुंदर लोगों के साथ साझा करने का अवसर मिला था!

तीन साल पहले एक योग शिक्षिका हमारे आश्रम में आई थी और उसने हमारे योग-अवकाश शिविर में हिस्सा लिया था। उस समय बहुत से दूसरे लोग भी यहाँ आए थे। उन्होंने यहाँ खूब मौज-मस्ती की थी और विश्रांति लेने के बाद तरोताज़ा होकर वापस गए थे। उनमें से दो लोगों का पुनः स्वागत करने का अवसर हमें इसी साल पहले ही मिल चुका था और यह ऐसा तीसरा सुअवसर था! जब से एलेक्सिस यहाँ से गई थी, उसे हरदम लगता था कि वह पुनः हमारे आश्रम अवश्य आएगी और संभव हुआ तो अपने कुछ साथियों को लेकर भी आएगी।

इस तरह बारह लोगों का एक दल, उसी दिन हमारे आश्रम पहुँचा जिस दिन हम खुद अपनी जर्मनी यात्रा से वापस आए थे। यह दल हमारे योग-विश्रांति शिविर में हिस्सा लेने आया था। हमें ऐसे संबंध बनाना बहुत पसंद है और यह और भी अच्छा लगता है, जब वे कई दूसरे लोगों को लेकर भी आते हैं, ऐसे लोगों को, जो शायद अकेले भारत आने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे!

हमने उनके लिए ताजमहल देखने का इंतज़ाम किया था, जो दिन भर का आगरा प्रवास था। और एक दिन वे हमारे छोटे से शहर के बाज़ारों में घूमते-फिरते रहे, मंदिर देखे और आसपास के दर्शनीय स्थलों का दौरा किया। लेकिन ज़्यादातर समय वे आश्रम की दिनचर्या का जायज़ा लेते हुए गुज़ारते थे। वे आश्रम की दैनिक गतिविधियों से इतने प्रभावित थे कि न सिर्फ उसे बारीकी से देखने-समझने की कोशिश करते बल्कि खुद भी उसके साथ अंतरंग रूप से जुड़ने की और उसके अनुसार ढलने की कोशिश भी करते। स्कूल देखने के बाद वे बच्चों को खाना परोसने में मदद करने लगे, बच्चों की योग कक्षा में शामिल हुए और निश्चित ही, हमने आश्रम में तैयार सुस्वादु भोजन भी साथ-साथ किया। मैं उन्हें अपना निर्माणाधीन रेस्तराँ दिखाने ले गया और उसे लेकर हमारी योजना की जानकारी दी। इसके अलावा, सबने आयुर्वेदिक मालिश और विश्रांति संबंधी उपचार की सेवाओं का लाभ उठाया और शरीर के उन बिंदुओं पर ख़ास वर्जिश की, जहाँ अक्सर दर्द हो जाया करता है।

हमारे मित्र ने और उनके सहयोगी ने मिलकर अपनी योग कक्षाएँ लीं और कुछ और सामूहिक सत्रों का संचालन किया और एक दिन मैंने भी सत्र में शामिल होकर समूह के सदस्यों के साथ बातचीत की। एक आध्यात्मिक गुरु और उपदेशक के रूप में बिताई गई अपनी पिछली ज़िंदगी के अनुभव उनके साथ साझा किए और बताया कि वहाँ से निकलकर आज तक की-जो कुछ भी मैं बन सका हूँ, उसकी- यात्रा कैसी रही।

वास्तव में उन बहुत ख़ास लोगों के साथ हमारा समय बड़ा शानदार बीता। कल दोपहर बाद कैनेडा की फ्लाइट पकड़ने के लिए उन्होंने आश्रम से बिदा ली। गुडबाय कहते हुए बहुत सी आँखों में एक साथ आँसू आ गए-और हम अभी से सोचने लग गए हैं कि वे जल्द से जल्द यहाँ आएँ और हमें उन लोगों का स्वागत करने का मौका मिले।

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि खुले दिल के, खुशमिजाज़ लोगों से और उन लोगों से, जिनमें नई से नई बातें जानने की उत्सुकता होती है और जो भारत को भीतर से जानना चाहते हैं, मुलाक़ात हमेशा एक अद्भुत अनुभव होती है। वे खुश हैं, भारत में आकर और हमसे मिलकर आनंदित हैं, यही हमारा पुरस्कार है-और मैं जानता हूँ, वे भी आश्रम में बिताए समय की कुछ बेहद अविस्मरणीय यादें लेकर घर जा रहे हैं!

yoga

प्रिय योग-शिक्षकों, योग को और मुश्किल न बनाएँ – 1 अक्टूबर 2015

पिछले दो दिनों में मैंने संक्षेप में बताया कि हम किस तरह अपने छात्रों और सहभागियों के लिए योग को आसान बनाकर प्रस्तुत करना पसंद करते हैं। परसों के ब्लॉग में मैंने बताया था कि अक्सर हम योग सीखने वाले छात्र-छात्राओं की मुद्राओं को सुधारते नहीं हैं और कल मैंने कुछ विस्तार से बताया कि क्यों हम विभिन्न योग-मुद्राओं के लिए संस्कृत नामों का इस्तेमाल नहीं करते। वास्तव में मेरा विश्वास चीजों को आसान बनाने में होता है और मुझे लगता है कि यह दूसरों के लिए भी मददगार सिद्ध होता होगा।

मैं जानता हूँ कि लोगों का रुझान चीजों को कठिन और जटिल बनाकर प्रस्तुत करने में होता है। मैंने देखा है कि योग-शिक्षक योग को अत्यधिक कठिन विज्ञान की तरह प्रस्तुत करते हैं जिसे तब तक कोई नहीं समझ सकता जब तक कि किसी न किसी रूप में वे किसी योग-गुरु द्वारा दीक्षित नहीं किए जाते। ऐसे योग-शिक्षक भी हैं जो नए से नए छात्रों को योग की कठिन से कठिन मुद्राएँ दिखाते हैं। कुछ दूसरे होते हैं जो ज़्यादा से ज़्यादा संस्कृत शब्दों का इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं।

मैं नहीं समझता कि सिखाने का यह उचित तरीका है और जब कि आपको यह एहसास हो सकता है कि आप कोई असामान्य व्यक्ति हैं, आपका शरीर दूसरों से बेहतर, अधिक लचीला है और आपकी मुद्रा एकदम त्रुटिहीन, लेकिन इसका प्रदर्शन करने की वास्तव में कोई ज़रूरत नहीं होती।

वास्तव में किसी साधारण सी चीज़ को खींच-तानकर बड़ा करने की ज़रूरत नहीं है, उसे लंबे-चौड़े व्याख्यानों में समझाने की भी आवश्यकता नहीं है! आप सीधे, सहज शब्दों में भी उसे समझा सकते हैं! आप निश्चय ही दूसरों को दिखा सकते हैं कि बहुत सी कठिन और जटिल योग-मुद्राओं के लिए भी आपका शरीर कितना लचीला है लेकिन इससे दूसरों के अंदर यह भावना जागनी चाहिए कि इसमें कुछ भी कठिन नहीं है और वे भी नियमित अभ्यास से वहाँ तक पहुँच सकते हैं!

वास्तव में दूसरे कई क्षेत्रों में भी मैंने यह बात देखी है। यह आदत सिर्फ योग-शिक्षकों तक ही महदूद नहीं है! मैंने यह व्यवहार सामान्य रूप से उन लोगों में पाया है, जिनमें आत्मसम्मान या स्वाभिमान की कमी होती है। वे जिन चीजों पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेते हैं उन्हें इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे वे बहुत कठिन काम हों जिससे वे अपने बारे में अच्छा महसूस कर सकें। ये वे लोग हैं जो सरल चीजों को भी जटिल बनाते हुए अंजाम देते हैं और स्वयं खुश हो लेते हैं कि वे कठिन चीजों को अंजाम देने में कामयाब हुए।

जब कि यह पूरी तरह तार्किक है और इसलिए समझ में आने वाली बात भी है-और अगर आप भी ऐसा ही कर रहे हैं तो मैं आपको सलाह दूँगा कि अपने बारे में प्रसन्न होने के दूसरे तरीके ढूँढ़ने की कोशिश कीजिए। यह समझने की कोशिश कीजिए कि आपने भी जीवन में कई उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, आपमें भी अपनी निजी खूबियाँ हैं और आप और भी कई उपलब्धियाँ प्राप्त करके उसी तरह बहुमूल्य हो सकते हैं जैसे कि दूसरे लोग अपनी उपलब्धियों से हो रहे हैं। आपको ऐसी कोई चीज़ करने की ज़रूरत नहीं है जिसे ‘कोई दूसरा न कर सकता हो’ या ‘सिर्फ सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति ही कर सकता हो’।

इन बातों को अपने आत्मसम्मान या स्वाभिमान का आधार न बनाएँ-क्योंकि उसकी नींव बहुत भुरभुरी होगी! आप जैसे भी हैं, उसी रूप में अपने लिए मूल्यवान हैं-अपने आप से प्यार करिए, क्योंकि आप वैसे हैं!

मैं समझता हूँ कि विदेशी लोगों के लिए विभिन्न योग-मुद्राओं के संस्कृत नामों की आवश्यकता नहीं है! क्यों? 30 सितंबर 2015

योग-शिक्षकों को अपने छात्रों की योग-मुद्राओं को सुधारना चाहिए या नहीं, इस विषय पर मैंने अपने कल के ब्लॉग में विस्तार से लिखा था। मैंने बताया था कि मैं, और मेरे साथ यशेंदु और रमोना भी इसी सिद्धान्त पर काम करते हैं कि ‘कम से कम और जितना आवश्यक हो’। सुधार के निर्देशों के अलावा एक और बात है, जो अधिकतर योग-शिक्षक करते हैं लेकिन हम अक्सर वैसा नहीं करते: विभिन्न योग-मुद्राओं के लिए संस्कृत नामों का उपयोग, जो सिखाने की पूरी प्रक्रिया को पहले से अधिक कठिन बना देता है।

प्रिय योग शिक्षकों, मैं जानता हूँ कि आपने अपने योग-प्रशिक्षण के दौरान ही आसनों, क्रियाओं और मुद्राओं के लिए प्रयुक्त इन संस्कृत शब्दावलियों को सीखा होगा। शायद आप देर रात तक इन अजीबोगरीब उच्चारण वाले शब्दों को रटते रहे होंगे। ज़बान के लिए उनका उच्चारण भी दूभर था मगर उनके सही-सही उच्चारण सीखने के लिए आपने कड़ी मेहनत की होगी। अब आप उनका उपयोग करना चाहते हैं, अपने ज्ञान को अपने छात्रों को सौंपना चाहते हैं और इसलिए आप उदारतापूर्वक अपनी कक्षाओं में इन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हैं।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वास्तव में इसकी जरूरत नहीं है? बल्कि इससे आपके बहुत से छात्र असुविधा महसूस करते होंगे और बहुत ज़ोर देने पर उनमें खीज पैदा हो सकती है।

अपने जीवन में मैं बड़ी संख्या में योग-छात्रों से मिल चुका हूँ और उनमें से बहुत से लोगों से मेरी इस विषय में चर्चा भी हुई है। हमारे योग-प्रशिक्षण शिविरों में भी बहुत से प्रशिक्षुओं ने इस बारे में मुझसे सवाल पूछे हैं और विस्तृत चर्चा की है। कठिन उच्चारण वाले शब्दों का प्रयोग करके योग को जटिल और कष्टदायक न बनाएँ!

आप उनके लिए सहज-सरल अंग्रेज़ी के शब्दों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते या फिर उन भाषाओं के शब्दों का, जिनमें आप योग सिखा रहे हैं? अगर आपने संस्कृत नामों को सीख लिया है तो फिर उनके स्थानापन्न शब्दों को भी सीखा ही होगा।

अगर आपने अभी उन्हें नहीं सीखा है तो मैं आज आपको बताता हूँ: संस्कृत नाम ज़्यादातर उन मुद्राओं से बनने वाले शरीर के आकारों या उनकी गतिविधियों को व्यक्त करते हैं! जैसे ‘मत्स्यासन’ कहने में बड़ा अनोखा और सुंदर लगता है और उसका उच्चारण करने से पहले उसे कई बार ध्यान से सुनना पड़ता है लेकिन उसका अर्थ सिर्फ ‘मछली की मुद्रा’ भर है। क्यों? क्योंकि यह आसन करने पाए आप मछली का आकार ग्रहण कर लेते हैं। इन नामों में कोई गुप्त रहस्य या कोई विशेष मर्म नहीं है। ज़्यादातर मुद्राओं के ऐसे ही नाम हैं क्योंकि उनसे उन पशुओं या वस्तुओं का बोध होता है-या वे शब्द शब्दशः शरीर के उन हिस्सों को व्यक्त करते हैं, जैसे, शीर्सासन का अर्थ हुआ, सिर पर खड़े होना। शीर्ष का संस्कृत अर्थ है, सिर। इसमें कोई बड़ा वैज्ञानिक या आध्यात्मिक अर्थ नहीं छिपा है!

इसलिए प्रिय योग-शिक्षकों, कृपा करके इसे सहज-सामान्य बनाएँ रखें, जिससे वह समझने में आसान लगे और आपके छात्र आसानी के साथ उन्हें याद रख सकें।

नोट: यह अंग्रेजी से अनुवादित ब्लॉग मूल रूप से विदेशी योग शिक्षकों के लिए लिखा गया है, भारतीय पाठक कृपया अन्यथा न लें!

क्या योग सीखने वाले छात्रों की मुद्राएँ ठीक करना आवश्यक है? 29 सितंबर 2015

हाल ही में उच्चतर योग-विश्रांति शिविर में भाग लेने आश्रम आए एक मेहमान द्वारा प्रेरित कुछ पंक्तियों को आज मैं अपने ब्लॉग का विषय बनाना चाहता हूँ। यशेंदु के साथ अपने दो घंटे के दैनिक सत्र में एक ऐसा विषय उभरकर सामने आया जो सदा से योग शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए रोचक रहा है: क्या योग-शिक्षकों को अपने छात्रों की योग-मुद्राओं को सुधारना चाहिए?

स्वाभाविक ही, इस विषय में विभिन्न शिक्षकों के विचार भिन्न-भिन्न होंगे। मैं यहाँ अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा हूँ और वह एक पंक्ति में यह है: कम से कम करना चाहिए- उतना ही, जितना अनिवार्य रूप से आवश्यक हो।

जब मैं योग सिखाता था तब मैं हमेशा इस सिद्धान्त का पालन करता था और यशेंदु और रमोना भी इसी नियम का पालन करते हैं। सामान्य कार्यशालाओं में आप शायद ही कभी हमें किसी व्यक्ति को ठीक करता सुनते होंगे-कि हमने किसी से कहा हो कि यह मुद्रा ऐसी नहीं, वैसी होनी चाहिए या जिस मुद्रा में वे बैठे या खड़े हैं, वह गलत है।

क्यों? यह प्रश्न, स्वाभाविक ही हर वह योग-शिक्षक या योग-छात्र पूछेगा, जो मुद्राएँ ठीक करने या कराए जाने का आदी है। आप कैसे जानेंगे कि जो आप कर रहे हैं, वह ठीक कर रहे है या गलत?

पहली बात तो यह कि योग किसी तरह की कोई प्रतियोगिता नहीं है जिसमें हार या जीत का प्रावधान हो या यह कि कोई एक सर्वश्रेष्ठ हो। योग में आप अपनी मुद्राओं को सुधारने की कोशिश करते हैं लेकिन किसी जीत के लिए नहीं बल्कि अपने भले के लिए, इसलिए कि वैसा करने से आपको अच्छा लगता है। इतना समझने के बाद, स्वाभाविक ही, किसी मुद्रा में रहते हुए आपको कुछ गतिविधियों से बचना चाहिए। लेकिन अक्सर ऐसी स्थिति पेश नहीं आएगी अगर आप खुद प्रदर्शन करके दिखा दें कि किसी मुद्रा में आने और उससे बाहर निकलने का ठीक तरीका क्या है। प्रदर्शन करते समय ही बोलकर बताएँ और आपके छात्र आपके इस प्रदर्शनात्मक उदाहरण से पूरी तरह समझ जाएँगे। शुरू में ही आपको बता देना चाहिए कि हर एक अपनी शारीरिक क्षमता के अनुपात में ही आगे जा सकता है और किसी भी स्थिति में हमें अपनी सीमा नहीं लांघना है।

एक बार यह ढाँचा तय हो जाने के बाद मुझे लगता है कि कक्षा में बार-बार सुधार के निर्देशों का योग-छात्रों पर नकारात्मक असर पड़ता है। मुझे कई लोगों ने बताया कि कुछ शिक्षकों ने यह कह-कहकर कि वे जो कर रहे हैं, गलत है, उन्हें योग से विमुख कर दिया। इससे इस बात की भी पूरी संभावना बनती है कि आप योग के सिर्फ बाहरी पहलू पर फोकस करने लगें और सिर्फ नकारात्मक बातों पर ज़ोर देने लगें जब कि वे अपनी मुद्राओं, व्यायामों और मांसपेशियों में खिंचाव पैदा करने वाली दूसरी यौगिक गतिविधियों से भीतर से भी अच्छा महसूस कर रहे होते हैं।

इसके अलावा आप दूसरों के शरीरों की क्षमता नहीं जानते। विशेष रूप से कुछ घंटों की योग कार्यशालाओं या तब, जब आपको किसी छात्र के साथ कुछ दिनों तक के लिए अभ्यास का मौका मिलता है, आप, उसका चिकित्सकीय इतिहास जानते हुए भी यह नहीं समझ सकते कि मसलन, वह पूरा पैर क्यों नहीं उठा पा रहा है या अपनी पीठ को अपने बगल वाले छात्र की तरह मोड़ क्यों नहीं पा रहा है! अब अगर आप उसके पास जाकर उसे अपना घुटना फर्श से चिपकाकर रखने के लिए कहेंगे-जब कि शारीरिक रूप से ऐसा करने में वह अक्षम है तो उसके लिए यह बड़ा असुविधाजनक होगा। बल्कि यह उसके लिए यह बेहद निराशाजनक होगा!

अगर आपको वाकई लगता है कि सामने वाला पूरी तरह नहीं समझ पाया है कि अपने किसी अंग को कहाँ रखना है या किन बातों का उन्हें विशेष ध्यान रखना है, तो यह बताने का कोई भिन्न तरीका भी हो सकता है! यह कहने की जगह कि ‘सांड्रा, तुम्हारी पीठ झुकी हुई है, उसे सीधा करो’ या ‘टिम, अपने कूल्हे ज़रा और झुकाओ’, आप कह सकते हैं, ‘इस मुद्रा में मुख्य फोकस रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने पर होना चाहिए’ या ‘हर बार साँस छोड़ते हुए कूल्हों को थोड़ा और नीचे झुकाना है’। वे खुद की ओर देखेंगे और अगर उनके लिए संभव हुआ तो स्वयं अपनी मुद्रा ठीक कर लेंगे।

निश्चित ही, अगर आप किसी को लंबे समय तक सिखा रहे हैं, अगर सामने वाला खुद चाहता है कि उसकी मुद्राओं को सुधारा जाए या अगर आप किसी योग-शिक्षक को ही सिखा रहे हैं कि वह खुद भी योग की शिक्षा दे सके तब तो सीधे उसकी मुद्राएँ ठीक करना उचित है-लेकिन सामान्य सत्रों में आम तौर पर ऐसा नहीं होता!

इसके अलावा एक बात आप हमारी कक्षा में कभी नहीं देखेंगे: किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से सही मुद्रा में आने के लिए मजबूर करना या आगे क्षमता से ज़्यादा अपनी मांसपेशियों को खींचने के लिए प्रोत्साहित करना! अगर आप ऐसा करते हैं तो इसका अर्थ यही है कि आप उस व्यक्ति के शरीर को खुद उससे बेहतर जानते हैं। समस्या यह है: आप ऐसा करके उस व्यक्ति को शारीरिक नुकसान पहुँचा सकते हैं, बल्कि गंभीर चोट पहुँचा सकते हैं! भले ही आपने मनुष्य की शरीर रचना का अध्ययन किया हो, भले ही आप सामने वाले के चिकित्सकीय इतिहास से वाकिफ हों और तदनुसार उसे सलाह दे रहे हों, फिर भी अगर आप उसे तेज़ी और सख्ती से या बहुत ज़ोर देकर योगासन कराएँगे तो उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं!

अंत में यही कि आप नहीं जानते कि उसके शरीर के साथ आपकी नजदीकी से आपका छात्र किस हद तक सुविधा महसूस करता है! हो सकता है कि आपका उसके बहुत करीब खड़ा होना न भा रहा हो, आपका नीचे झुककर ताकना उसे अच्छा न लग रहा हो और आपका छूना उसे नापसंद हो! आप पूछ भी तो सकते हैं लेकिन दस लोगों के बीच उसे प्रतिवाद करने में भी संकोच होगा-और वह अगली बार कक्षा में न आना ही उचित समझेगा।

मुझे लगता है कि कक्षा में किसी दूसरे को छूने की आपको कोई ज़रूरत नहीं है और सलाह दूँगा कि मौखिक निर्देशों को भी कम से कम रखा जाना चाहिए।

भारत में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस – चीन से चटाइयां और योग के शक्तिशाली व्यापारियों को धनलाभ – 21 जून 2015

आज फिर इतवार है: 21 जून, जिसे इस साल पहली बार ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में भी मनाया जा रहा है। यह मेरी आँखों से कैसे ओझल हो सकता था- क्योंकि भारत में आज के कार्यक्रम और समारोह कई दिनों से टीवी समाचारों के केंद्र में थे और उसे स्वास्थ्य जागरूकता के प्रसार के स्थान पर मीडिया का बहुत बड़ा तमाशा, दिखावे का पाखंडी समारोह और सरकारी प्रचार तंत्र में बदल दिया गया। क्यों और कैसे? अभी बताता हूँ।

भारत सरकार ने आज के दिन को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित करवाने के प्रयास किए थे और बहुत से दूसरे देशों की सहमति प्राप्त हो जाने के बाद आखिर संयुक्त राष्ट्र संघ ने सूचना जारी कर दी कि भविष्य में 21 जून का दिन इसी नाम से जाना जाएगा। विश्व के किसी भी भाग में अगर आप किसी सामान्य व्यक्ति से भी पूछें कि योग की शुरुआत कहाँ हुई तो वह भारत का ही नाम लेगा क्योंकि यह बात सभी जानते हैं। और योग के लाभों को कौन नकारेगा? मैं तो निश्चित ही नहीं, लेकिन भारत सरकार द्वारा मनाए जा रहे समारोह में पर्दे के पीछे कुछ ऐसी बातें चल रही हैं जो दर्शाती हैं कि इस धूमधाम का मकसद सिर्फ योग-भावना का उत्साह नहीं है, कुछ और भी है।

इस आयोजन और उसके प्रचार पर आज के दिन के लिए भारत सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च कर दिए। स्वाभाविक ही, सबसे बड़ा आयोजन दिल्ली में हुआ, जहाँ राजपथ पर-जहाँ अक्सर औपचारिक सरकारी कार्यक्रम होते रहते हैं- प्रधान मंत्री, नरेंद्र मोदी ने आज प्रातः 35000 लोगों के साथ योग किया। इस आँकड़े पर गौर कीजिए-गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में भारत का नाम दर्ज कराने के लिए इतना बड़ा तमाशा किया गया था, जैसे दुनिया को भारत की देन यही है!

सरकार ने भारत भर में 651 केंद्र शुरू किए, जहाँ एक साथ, एक ही समय में योग समारोह आयोजित किए गए। एक घंटे का यह योग समारोह सफलता पूर्वक सम्पन्न हो सके, इसके लिए हर केंद्र को 1 लाख रुपए अर्थात् 1500 यू एस डॉलर प्राप्त हुए। इसे बड़े पैमाने पर किया गया एक अच्छा प्रयास कहा जा सकता है लेकिन तब तक ही जब तक आपको पता नहीं चलता कि इन 651 में से 191 केंद्रों को चलाने का ठेका रामदेव को और 69 का श्री श्री रविशंकर को दिया गया है, जो, दोनों ही, दूर दूर तक योगी नहीं हैं बल्कि योग के बड़े व्यापारी हैं और उनका करोड़ों डॉलर का विस्तृत व्यवसाय है!

पिछले चुनावों में सत्ताधारी पार्टी को जिताने के लिए रामदेव ने बहुत काम किया था। स्पष्ट ही, इसे उसकी सेवाओं का मेहनताना कहा जाना चाहिए। उसके इसी काम की वे कीमत चुका रहे हैं-और यह सौदा बड़े काम का है क्योंकि अपने तरह-तरह के उत्पादों के साथ रामदेव अब मीडिया में छाया हुआ है।

फिर सरकार को अचानक होश आया कि इतने सारे सहभागियों के लिए चटाइयों की ज़रूरत होगी और चीन से आयात करने के सिवा उन्हें कोई बेहतर विकल्प नहीं सूझा! मोदी, जो दुनिया को यह समझाने में लगे हुए हैं कि भारत एक बढ़िया निर्माता है और दुनिया भर में घूम-घूमकर ‘मेक इन इंडिया’ का प्रचार-अभियान चला रहे हैं, अब यह व्यापार एक दूसरे देश की झोली में डालने के लिए तैयार हो गए! क्या चटाइयाँ भारत में तैयार नहीं की जा सकती थीं? या पूरी तरह परंपरागत तरीके से स्थानीय दस्तकारों से घास-फूस की चटाइयाँ ही बनवा लेते! कल्पना कीजिए, कितने गरीब कारीगरों को इस समारोह के चलते रोज़गार मिल जाता!

मेरा इशारा अब आप समझ गए होंगे! स्वाभाविक ही, मैं योग के विरुद्ध नहीं हूँ और न ही इसके विरुद्ध हूँ कि वैश्विक पैमाने पर किसी दिन को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाए। लेकिन प्रश्न दूसरा है। उसी संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में घोषित किया है कि भारत में दुनिया के सबसे ज़्यादा संख्या में भूखे लोग बसते हैं। उन्नीस करोड़ चालीस लाख लोग लोग रोज़ भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। देश के 48% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। और सरकार करोड़ों रुपया गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में प्रवेश की चमक-दमक के ग्लेमर पर खर्च कर रही है!

देश के मजदूरों को साल में एक दिन के योग की ज़रुरत नहीं है। वे खेतों और निर्माण-स्थलों में कड़ी मेहनत करके पर्याप्त व्यायाम कर लेते हैं और मुश्किल से इतना कमा पाते हैं कि बच्चों को खिला सकें! योग उन्हें क्या देगा? और उन्हें रोज़गार मुहैया करवाने की जगह आप अपने यहाँ के रोजगार और अपना पैसा चीन भेज देते हैं।

निश्चित ही, पतंजलि अगर जीवित होते और यह ड्रामेबाज़ी देखते तो अविश्वास से दीवार पर सिर फोड़ लेते!

खैर, मैंने तो रोज की तरह आज भी योग किया- और मैं सलाह दूंगा कि आप भी यही करें। योग एक जीवन पद्धति है। उसे अपने दैनिक जीवन में उतारिए। साल में एक दिन का योग पर्याप्त नहीं है और उसे सिर्फ कुछ व्यायामों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। जीवन के हर एक पल में जीना सीखिए, भविष्य की अनावश्यक चिंता मत कीजिए और न ही पिछली बातों पर पछतावा कीजिए। खुद पर नज़र रखिए और अपने विचारों, शब्दों और कामों के प्रति हर वक़्त जागरूक रहिए। जब भी संभव हो, दूसरों की मदद करने की कोशिश कीजिए- जैसे किसी ज़रूरतमन्द को काम देकर- न कि दूसरों से सम्मान या मान्यता प्राप्त करने के लिए पैसे बरबाद कीजिए- जैसे विश्व रेकॉर्ड बनाने के लिए…

3 तरह के लोग, जो हमारे आश्रम में रहना पसंद करते हैं – 12 फरवरी 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हमारे पास धार्मिक रुचियों वाले कई लोगों के ईमेल आते हैं, जो हमारे आश्रम आना चाहते हैं लेकिन स्वाभाविक ही उनकी धार्मिक अपेक्षाओं को पूरा करना हमारे लिए संभव नहीं होता। मैंने यह भी बताया था कि कैसे उनके ईमेल या चिट्ठियों की पंक्तियों से या उनकी भाषा से ही आप उनके सोच की दिशा और उनके इरादे भाँप सकते हैं। यह सही है कि आश्रम आने की इच्छा व्यक्त करते हुए कभी-कभी हमें ऐसे सन्देश प्राप्त होते हैं लेकिन अधिकतर संदेश ऐसे लोगों के होते हैं, जो इनसे ठीक विपरीत विचार और भावनाएँ रखते हैं।

वास्तव में दूसरी तरह के ईमेल हमारे पास ज़्यादा आते हैं। खुले तौर पर धार्मिक लोगों के अलावा, जिनके बारे में मैंने कल लिखा था, तीन तरह के लोगों से आज आपको मिलवाना चाहता हूँ, जो हमसे आश्रम के बारे में पूछताछ करते हैं।

1) सामान्य स्त्री पुरुष जो तनाव मुक्ति की खोज में यहाँ आते हैं

पहले 'वर्ग' में वही 'मुख्यधारा' के लोग होते हैं, जो कॉर्पोरेट दुनिया की तनाव और भागदौड़ वाली ज़िन्दगी से ऊबकर और अपने काम की, घर की और आम जीवन की गुमनामी से आजिज़ आकर सुकून की खोज में यहाँ आते हैं। ये लोग जीवन में अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं और शान्ति, तनाव मुक्ति, यहाँ तक कि अपनी शारीरिक तकलीफों के इलाज के लिए यहाँ आते हैं। वे ऐसे उपाय चाहते हैं, जिनकी सहायता से उनके विभिन्न व्यसनों, शारीरिक व्याधियों का इलाज हो सके, कुछ ऐसे व्यायाम सीख सकें, जो उन्हें उनके मौजूदा दर्द से राहत प्रदान कर सकें और भविष्य में भी उन्हें होने से रोक सके।

निश्चय ही हर तरह के लोगों के लिए हमारे दरवाज़े खुले हैं क्योंकि हम जानते हैं कि योग और आयुर्वेद विज्ञान के अंग हैं, जो न सिर्फ शारीरिक व्याधियों में बल्कि मानसिक शान्ति के लिए भी बहुत उपयोगी हैं। हमारे आश्रम में कुछ दिन ठहरकर ही उन्हें बहुत लाभ हो सकता है-और हम जीवन के हर पड़ाव पर स्थित, हर स्तर के, हर क्षेत्र में काम करने वाले और हर जगह के लोगों को मित्र बनाकर और उनके बारे में जानकर खुश होते हैं!

2) स्वास्थ्य-सचेत लोग जिन्हें अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की लालसा होती है

हमसे पूछताछ करने वाले दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं, जो अपने शरीर और इस धरती के लिए निरापद वैकल्पिक जीवन-चर्या में रुचि रखते हैं। वे निरामिष, शाकाहारी, कच्चा खाने वाले, चिकित्सक, मालिश इत्यादि और वैकल्पिक चिकित्सा में दिलचस्पी रखने वाले और ऐसे ही कई तरह के लोग होते हैं। कोई भी, जो यह जानता है कि योग और आयुर्वेद उसे एक और दृष्टिकोण, अतिरिक्त ज्ञान और बहुत सी नई टिप्स और जीवन-शैली से परिचित कराएगा, उन्हें जानने-समझने में मदद करेगा, जीवन में नए परिवर्तन लाने में सहायक होगा।

हम इन लोगों का खुले मन से, बाहें फैलाकर स्वागत करते हैं और हमारे पास जो कुछ भी है, उनके साथ साझा करके खुश होते हैं और हम खुद भी उनके ज्ञान और अनुभवों से बहुत कुछ सीखते हैं। ज्ञान का आदान-प्रदान और एक दूसरे की सहायता-शानदार!

3) भारत यात्रा का सपना देखने वाले गूढ़ और रहस्यमय हिप्पी

गूढ़ और रहस्यमय बातों में रुचि रखने वाले लोग अगले वर्ग में आते हैं। ये लोग अपने आपको आध्यात्मिक या रूहानी कहते हैं लेकिन धार्मिक कहलाना पसंद नहीं करते। जो पुरुष और महिलाएँ दर्शन-शास्त्र और एक अलग तरह की जीवन-शैली में रुचि रखते हैं, जो दूसरों से, अपने समाज से अपने आपको ‘कुछ खास और अलग’ पाते हैं और उनके साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। अपने आपकी खोज में वे अक्सर लंबी यात्राएँ करने के लिए तैयार होते है। इस बात को समझने के लिए कि आखिर वे क्या चाहते हैं, वे कौन हैं और उन्हें कौन सी बात खुश कर सकती है। वे अपने जीवन का गहरा अर्थ खोजना चाहते हैं और उसे योग और आयुर्वेद के माध्यम से समझने की कोशिश करने के लिए तत्पर हैं।

मैं हिप्पी शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ लेकिन बहुत से लोग, भले ही इस वर्ग में आते हों, अपने आपको इस नाम से जोड़ना नहीं चाहेंगे और इस ओर ध्यान नहीं देंगे। मैं जानता हूँ कि इन लोगों के लिए भी हमारे दिल खुले हुए हैं और हमें इस बात की खुशी है कि अक्सर हम इन लोगों के लिए स्वर्ग साबित हो सकते हैं, ऐसी शीर्ष जगह, भारत में आने के बाद जिनके यहाँ वे निःसंकोच भ्रमण कर सकते हैं-क्योंकि अक्सर देखा यह गया है कि यह देश उनकी उम्मीदों से बिल्कुल अलग सिद्ध होता है। जैसा कि मैंने कल बताया, निश्चय ही हमारे आश्रम में उन्हें एक ऐसी जगह मिल जाती हैं, जहाँ धार्मिक कट्टरता और कूपमंडूकता का कोई स्थान नहीं है। इस दीवाने मुल्क से हम धीरे-धीरे उनका परिचय करवाते हैं और अपने जीवन में उन्हें शामिल करके, अपने प्यार और जीवंतता से उन्हें अपना बनाकर, हम आशा करते हैं कि उनकी तलाश में, उनकी खोज में उनकी मदद कर सकेंगे।

योग बाज़ार का घपला – योग कक्षा को चुनना जैसे दूध खरीदना! 17 नवम्बर 2014

अपने व्याख्यानों, कार्यशालाओं में और अपने ब्लॉगों में भी मैंने कई बार ज़िक्र किया है कि पश्चिमी दुनिया के साथ मेरे संपर्क की शुरुआत में मुझे एक प्रश्न सदा उलझन में डाल देता था: 'आप कौन सा योग सिखाते हैं?'

यशेन्दु के साथ भी कई बार इसी तरह की बातें होती रही हैं और निश्चय ही, आज भी यही स्थिति बनी हुई है। इसलिए, जब कुछ सप्ताह पहले यशेन्दु ने अपने किसी प्रतिभागी द्वारा पूछे गए इस सवाल का-और उसके बाद नीचे दी गई चर्चा का-ज़िक्र किया, हम हँसे बिना न रह सके!

जब कक्षा के बीच यही प्रश्न पूछा गया तो यशेन्दु ने हमेशा की तरह जवाब दिया था, 'जस्ट योग' ('just yoga')। वह महिला कुछ उलझन में पड़ गई और मन ही मन उसने समझ लिया कि हम लोग 'हठ योग' सिखाते हैं। क्योंकि सभी प्रतिभागी स्वस्थ थे और उत्साह से भरे हुए थे, जब यशेन्दु ने पुनः रवानी में आते हुए तेज़ी के साथ अगले अभ्यास कराने शुरू किए तो स्वाभाविक ही वह महिला भी बड़ी खुश हुई। सत्र के बाद महिला ने उससे पूछा कि क्या उसने भी किसी पॉवर योग ('power yoga') शिक्षक से योग सीखा है?

कुछ देर की उलझन के बाद हम उसके साथ हँसने लगे।

हमारे विचार में कोई विशेष योग नहीं होता है। हमारे योग का कोई ख़ास नाम, कोई ब्रांड या कोई विशिष्ट लक्षण नहीं है। यह योग है, सिर्फ योग, जिसे हमने अपने जीवन की शुरुआत से सीखा है।

इसकी तुलना आप दूध खरीदने से कर सकते हैं। पहले सिर्फ दूध होता था। सबको पता होता था कि दूध गाय से प्राप्त होता है और आज भी गाय ही दूध दे रही है। पहले आप दूध खरीदने बाज़ार जाते थे, दूध मांगते थे और आपको वही मिल जाता था। अब आप बाज़ार जाएँ तो आपको स्किम्ड मिल्क, फुल-फैट मिल्क, हाफ-फैट मिल्क, पाश्चराइज्ड मिल्क, फैट-फ्री मिल्क, ताज़ा, कई दिनों तक खराब न होने वाला आदि कई प्रकार का दूध मिल जाएगा! इसलिए जब आप दूध खरीदने बाज़ार जाते हैं तो आपको बताना पड़ता है कि कौन सा दूध आप खरीदना चाहते हैं!

यही मामला आजकल योग का भी है। पॉवर योग है, अय्यंगार योग है, हॉट योग है, हठ योग, अष्टांग योग, फ्लो योग, मैसूर योग, एक्रो योग, और न जाने कितने प्रकार के योग हैं। वे सिर्फ ‘योग’ नहीं रह गए हैं।

यहाँ हम आज भी दूध खरीदते हैं। और उसी तरह योग खरीदते हैं। यह सिर्फ हठ योग ही नहीं है कि आप उसे सिर्फ शारीरिक व्यायाम समझ लें और उसका अभ्यास करके शरीर को लचीला और मज़बूत बना लें। हमारे जीवन में योग का इससे अधिक महत्वपूर्ण स्थान है। यह आपके दैनिक व्यवहार का प्रश्न है, आपकी मानसिकता पूर्वाग्रहों, आपके विचारों और भावनाओं का प्रश्न!

निश्चय ही, अगर वह आपको स्वस्थ रखता है, आपके संदेहों को दूर करता है तो आपकी जो मर्ज़ी हो, नाम दे लें। लेकिन हम उसे सिर्फ योग कहेंगे और हमेशा आपको समझाने की कोशिश करते रहेंगे कि हम उसे सिर्फ ‘योग’ ही क्यों कहना चाहते हैं!

विशेष छूट: सभी विश्रांति कार्यक्रमों पर 20% की छूट! 31 जुलाई 2014

आज हमने एक आकर्षक पेशकश के बारे में सूचना-पत्र जारी किया है, जिसे आपके साथ यहाँ साझा करते हुए मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है:

हमारे सभी विश्रांति कार्यक्रमों में 20% की छूट!

जैसा कि किसी भी विशेष प्रस्ताव के साथ होता है, इस पेशकश के साथ भी कुछ नियम और शर्तें रखी गई हैं। लेकिन वे बहुत स्पष्ट हैं, उनमें कोई झमेला नहीं है: 20% की इस छूट का लाभ प्राप्त करने के लिए आपको 1 अगस्त से 31 अगस्त 2014 से पहले कुल खर्च की 80% पूरी रकम अग्रिम जमा करते हुए विश्रांति-स्थलों की बुकिंग करनी होगी। उसके बाद अपने पसंदीदा कार्यक्रम में आप 31 दिसंबर 2015 से पहले कभी भी आ सकते हैं।

तो अपने आयुर्वेद और योग विश्रांति-स्थलों की बुकिंग हेतु 50% अग्रिम जमा करके बाद में यात्रा से चार सप्ताह पहले 50% बकाया खर्च जमा करने की जगह अब आपको कुल मिलाकर लागत का सिर्फ 80% एकमुश्त जमा कराना होगा!

मुझे लगता है, यह योजना विशेष रूप से उन लोगों के लिए ज़्यादा उपयोगी होगी, जो अक्टूबर या नवम्बर की छुट्टियों में हमारे लोकप्रिय आयुर्वेदिक या योग सत्रों में शामिल होना चाहते हैं! और उनके लिए भी, जो साल के सबसे बेहतरीन मौके पर हमारे विश्रांति-स्थलों पर आयोजित वज़न कम करने की आयुर्वेदिक और योग कार्यशालाओं में सहभागी होना चाहते हैं। वे सभी लोग, जो इन विश्रांति-स्थलों की बुकिंग करना चाहते हैं उनके लिए पैसे की बचत का यह एक सुनहरा मौका है-अभी और इसी वक़्त!

स्वाभाविक ही हमारे और भी कई विश्रांति कार्यक्रम हैं- जैसे हमारे सभी योग-विश्रांति कार्यक्रम, जो विभिन्न विषयों पर केन्द्रित होते हैं या हमारा आयुर्वेदिक खाद्य-विश्रांति-कार्यक्रम। यहाँ तक कि 2015 में आयोजित होने वाला होली उत्सव भी इसी प्रस्ताव योजना में सम्मिलित है!

आपमें से वे सभी लोग जो भारत आकर हमारे आश्रम का दौरा करना चाहते हैं, योग का आनंद लेना चाहते है या आयुर्वेद के विभिन्न प्रयोगों का लाभ उठाना चाहते हैं-जल्दी करें, तुरंत बुकिंग कराएँ और अपनी इरादे को कामयाब बनाएँ!

हम आशा करते हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग हमारे इस विशेष छूट प्रस्ताव का लाभ उठाएँगे!

अब जबकि मैंने आप सबको हमारे प्यारे शहर वृन्दावन में आने का इच्छुक बना दिया है, मैं उस ज्वलंत प्रश्न का उत्तर देना चाहता हूँ, जो इस वक़्त आपके मन में आ रहा होगा: हमारे इन विश्रांति-स्थलों के खर्च में हम इतनी आकर्षक छूट कैसे दे पा रहे हैं जबकि ये लोकप्रिय विश्रांति-कार्यक्रम वैसे ही अच्छे चल रहे हैं?

सब कुछ न बताते हुए मैं आपको संक्षेप में बताता हूँ-हम एक शानदार परियोजना पर काम कर रहे हैं और अगर इस समय कुछ अतिरिक्त बुकिंग हो जाती हैं तो हमारे इस प्रकल्प का कार्य सुचारू रूप से और अधिक तेज़ी के साथ चल निकलेगा-और फिर आपके सामने होगा एक और खुशनुमा आश्चर्य! तो हमारे विश्रांति-स्थलों की यात्रा के खर्च में एक पंचमांश की छूट की हमारी इस प्रस्ताव-योजना को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ और इंतज़ार करें, आपके सामने आने वाले एक विस्मयकारी तोहफे का! और हाँ, अगर आप इससे पहले हमारे आश्रम आते हैं तो मेरे बताने से पहले ही यह रहस्य खुल जाएगा क्योंकि तोहफा पहले ही आपकी आँखों के सामने होगा!

भारत में जल्द ही आपसे मुलाक़ात की आशा है!

समलैंगिकता का विरोध नहीं, बल्कि स्वीकृति योग का काम होना चाहिए – 1 जून 2014

मैंने आपको पिछले हफ्ते बताया था कि सन 2006 में कैसे मेरा एक पुरुष समलैंगिक मित्र हर वक्त अपने आपसे संघर्ष करता रहा था क्योंकि उसका योग गुरु, हर मामले में जिसकी सलाह वह माना करता था, समझता था कि उसकी समलैंगिकता अनुचित है। स्वाभाविक ही उसकी इस समस्या के बारे में सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ था कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि उसे ऐसा गुरु स्वीकार करना है और यह भी कि क्यों ऐसी धारणा रूढ हो गई है कि योग के अनुसार समलैंगिकता एक समस्या है।

यह बात कि समलैंगिक होना एक ऐसी बीमारी है, जिसे ठीक किया जा सकता है और ठीक किया जाना चाहिए, पूरी तरह धर्म और परम्पराओं पर आधारित है अर्थात इस विश्वास पर कि औरत और मर्द ही साथ रह सकते हैं। पुराने ज़माने में लोग सोचते थे कि वह सब जो प्रचलित मानदंडों के अनुसार नहीं हैं, गलत है और उसका इलाज किया जाना ज़रूरी है। दुर्भाग्य से कुछ कठमुल्ला, पुरातनपंथी योगी, जो समयानुसार नहीं बदलते, आज भी यह विश्वास करते हैं कि अपने समलिंगी की ओर आकर्षण का होना अप्राकृतिक भावना है। और क्योंकि वे हर बीमारी का इलाज योग द्वारा करने चाहते हैं इसलिए सोचते हैं कि किन्हीं काल्पनिक अवरोधों को दूर करके वे समलैंगिकता नामक इस "बीमारी का इलाज" भी कर लेंगे।

समलैंगिकता के बारे में यह मूर्खतापूर्ण खयाल यहीं से आया है। लेकिन अगर आप योग के मूल आशय को समझेंगे तो वह है, स्वानुभव या जो जैसे हैं, वैसे ही बने रहें। योग हमें सिखाता है, अपने भीतरी और बाहरी व्यक्तित्व का स्वीकार, जैसे भीतर हैं वैसे ही बाहर भी दिखाई दें, भीतर बाहर में कोई द्वंद्व न रहे। मैं समझता हूँ कि हर पुरुष और महिला समलैंगिक जानता है कि वह भीतर से समलैंगिक है। किसी व्यक्ति का यौन रुझान उसकी अंदरूनी दुनिया का हिस्सा होता है और इसलिए मैं यह विश्वास करता हूँ कि योग को भी मूल रूप से समलैंगिकता को स्वीकार करना चाहिए न कि उससे संघर्ष करना चाहिए। लेकिन उसे खुले आम, सब के सामने स्वीकार करना अपने आप में बहुत कठिन काम है।

एक पुरुष या महिला समलैंगिक के रूप में संभवतः आपने लोगों के मूर्खतापूर्ण तर्कों को सुना होगा, जिनमें वे आपके समलैंगिक रुझान के विरुद्ध आपको तरह-तरह की बातें समझाने की कोशिश करते हैं। आप योग के पास सिर्फ शारीरिक व्यायाम के लिए ही नहीं बल्कि ध्यान और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने भी आते हैं। तो फिर, अगर आपको किसी गुरु की ज़रुरत है ही, तो भी आप अपने लिए किसी ऐसे गुरु को कैसे चुन सकते हैं, जो आपकी समलैंगिकता को ही स्वीकार नहीं करता?

ऐसा करके क्या आप अपने लिए मुश्किलें नहीं खड़ी कर रहे हैं? न सिर्फ आप अपने लिए पहचान का संकट खड़ा कर रहे हैं बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह भी नहीं कर पा रहे हैं। आपको इस व्यक्ति का पूरी तरह अनुगमन करना होता है और आप उसकी बातों पर कभी कोई प्रतिवाद भी नहीं कर सकते। गुरु से दीक्षा लेने का अर्थ यही है। इसलिए या तो आप अपनी पहचान का परित्याग कर दें या फिर आप गुरु-शिष्य परंपरा को मानना बंद कर दें।

तो फिर गुरु बनाते ही क्यों हैं?

बहुत समय पहले मैंने महसूस किया था कि गुरुवाद एक ऐसी चीज़ है, जो सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए मुफीद है, जो अपनी पहचान खोने के लिए तैयार हैं।

खड़े होकर ऊंचे डेस्क पर कंप्यूटर पर काम करना गरदन, कंधे और कमर के निचले हिस्से में होने वाले दर्द पर कारगर – 7 जनवरी 2014

मैंने अभी भी सन 2013 पर पीछे मुड़कर नज़र दौड़ना नहीं छोड़ा है। बहुत से परिवर्तन साथ लेकर आया यह साल वाकई बड़ा रोमांचक रहा और इस दौरान बहुत से परिवर्तन घटित हुए। उनमें से एक परिवर्तन हमारी पीठ के लिए अच्छा सिद्ध हुआ: हम खड़े होकर काम करने लगे। कई महीनों से हम एक खड़ा ऊंचा डेस्क इस्तेमाल कर रहे हैं और अपने शरीर पर इसका प्रयोग करने के बाद हम कह सकते हैं कि यह काफी सफल प्रयोग रहा!

सामान्यतः रोज़ कई घंटे हम अपने कंप्यूटर के सामने व्यतीत करते हैं। यह ठीक है कि हम घर में होते हैं इसलिए काम रोककर बीच-बीच में अपरा के साथ खेल सकते हैं, थोड़ा चहलकदमी कर सकते हैं या आराम कर सकते हैं, कहीं और जाकर बैठ सकते हैं। लेकिन यह ज़्यादा देर बैठकर काम करना पीठ के लिए ठीक नहीं होता। यह हम जानते थे लेकिन क्या किया जा सकता था? हम इतना ही करते थे कि अपने यौगिक व्यायाम बराबर करते थे और जब भी संभव होता था कंप्यूटर छोड़कर उठ बैठते थे और कोई दूसरा काम करना शुरू कर देते थे। आखिर हमारी पीठ ने ही हमें मजबूर कर दिया कि नहीं, हमें कंप्यूटर पर काम करने के तरीके में कोई न कोई बदलाव लाना ही होगा।

काफी समय से मुझे स्लिप-डिस्क की समस्या रही है। यह दर्द 2006 में बहन की आकस्मिक मृत्यु के बाद पहली बार उभरा था। पता नहीं मुझे स्लिप-डिस्क होने का क्या कारण हो सकता है क्योंकि उस वक़्त मैं कंप्यूटर पर काम बिल्कुल नहीं करता था और न ही कोई भारी और वैसी बड़ी चीज़ें उठाता था। जबकि शुरुआती दर्द कुछ समय बाद खत्म हो गया, कुछ महीनों या सालों बाद वह फिर उभर आया और तब मैंने डॉक्टर के पास जाकर पूरा परीक्षण करवाया। संक्षेप में यह कि यह समस्या मुझे तभी से है और कभी-कभी यह बुरी तरह तकलीफ देती है। विशेषकर लंबे समय तक बैठने के बाद!

जब मेरा यह दर्द रोज़-बरोज की समस्या बन गया और रमोना को भी गर्दन और पीठ के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत रहने लगी तो उसने इस विषय में जानकारी हासिल करने का निर्णय किया और तब उसे खड़े रहकर काम करने के फ़ायदों का पता चला! गूगल और डॉइच बैंक जैसी बड़ी कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को खड़े डेस्क मुहैया कराते हैं और कुछ मित्रों के साथ बात करने पर उन्होंने भी इस बात की पुष्टि की कि उन्हें भी खड़े होकर काम करने की सुविधा मिली हुई है। रमोना ने इस समस्या का और उसके इलाज की विधियों का बारीकी से अध्ययन किया, वीडियोज़ देखे कि कैसे बैठकर काम करने पर रीढ़ की हड्डी धीरे-धीरे घिस जाती है, बैठने और खड़े रहने की उचित मुद्राओं के विषय में पढ़ा और यहाँ तक कि चलती हुई डेस्कों के बारे में भी पढ़ डाला, जिसमें आप एक ट्रेडमिल पर चलते हुए काम कर सकते हैं। स्वाभाविक ही इसमें आपको एक अतिरिक्त लाभ भी प्राप्त होता है क्योंकि इस तरह काम करते हुए आप अपना वज़न भी कम कर रहे होते हैं। लेकिन हमारे लिए यह बहुत दूर की बात थी और हमने फिलहाल इतना ही किया कि अपने लिए खड़े होकर काम करने की सुविधा जुटा ली।

हालांकि शुरू में मुझे शक था कि हम सारा दिन खड़े-खड़े काम कर पाएंगे, फिर भी हमने अपने कार्यालय को पुनर्व्यवस्थित किया और अपने डेस्कों को छोटे-छोटे टेबलों पर रखते हुए अपने कम्प्यूटरों को थोड़ा ऊपर कर लिया, जिससे खड़े रहने पर कंप्यूटर-स्क्रीन्स आँखों के सामने रहें। इसके अतिरिक्त वहीं हमने पैरों के विश्राम हेतु भी थोड़ी सी जगह का प्रबंध किया, जिससे आवश्यकता पड़ने पर एक-एक कर पैर उठाकर वहाँ रखा जा सके।

पहला दिन काफी मुश्किल रहा। पहले हफ्ते भी दिक्कत हुई। मुझे बीच-बीच में कई बार बैठना पड़ता था, लंबे समय तक एकाग्र रह पाना मुश्किल हो गया और बार-बार लगता था, मैं सारा दिन खड़ा नहीं रह पाऊँगा। कई बार हमने टेबलों की ऊंचाई को घटा-बढ़ाकर देखा, जिससे गर्दन में अकड़न पैदा न हो और रमोना तो कुछ दिन स्पोर्ट्स-शूज पहनकर काम करती रही। लेकिन धीरे-धीरे हमारे पैरों के तलवे, टखने और पैरों की मांसपेशियाँ खड़े रहने की अभ्यस्त होती गईं और हमें पता ही नहीं चल पाया कि बैठकर काम करने की तुलना में कब और कैसे खड़े रहकर काम करना हमारे लिए सहज-सामान्य हो गया।

अब यह हमारे लिए काम करने का बहुत अच्छा तरीका बन गया है! जब पैर थोड़े थक जाते हैं, हम एक-एक करके पैरों को थोड़ा उठाकर डेस्क के नीचे रखे स्टूल पर रख लेते हैं। लेकिन हम सारा दिन खड़े नहीं रहते! जब इच्छा होती है हम बैठ जाते हैं। हमारे पास कुछ ऊंचे स्टूल भी हैं, जिनका हम अर्ध-उत्तिष्ठावस्था में (आधा खड़े रहकर) कुछ देर सहारा ले सकते हैं और फिर हमारे पास ऑफिस में पुरानी कुर्सियाँ भी हैं, जिन पर आवश्यकता पड़ने पर हम विश्राम भी कर सकते हैं। अब हम बेहतर ढंग से एकाग्र हो पाते हैं और ज़्यादा सक्रिय और चपल भी महसूस करते हैं क्योंकि अब कहीं बाहर जाना हो तो कुर्सी से उठकर खड़े होने का झंझट नहीं होता। इस तरीके का यह पहलू विशेष रूप से अपरा को बड़ा पसंद आया-जब उसकी मर्ज़ी होती है वह हमें खींचकर सीधे बाहर निकाल लाती है, कंप्यूटर और काम से दूर, उसके साथ खेलने के लिए!

सबसे मुख्य बात यह कि अब दर्द गायब हो चुका है। पीठ के निचले या ऊपरी हिस्से में कोई जकड़न नहीं होती, लंबे समय तक काम करने पर भी हम प्रसन्न महसूस करते हैं और जब भी थोड़ी बहुत अकड़न महसूस होती है, हम वहीं डेस्क पर खड़े-खड़े ही कुछ योग मुद्राएँ करना शुरू कर देते हैं। इस तरह खड़े होकर काम करने का निर्णय हमारे लिए बड़ा लाभकारी सिद्ध हुआ है!

2014 में थोड़े से बदलाव के रूप में यह मेरी आपको सलाह होगी! कई महीने इस तरीके को आजमाने और उसे वाकई बहुत लाभकारी पाने के बाद ही मैं यह लिख रहा हूँ। अगर आप अपनी पीठ की तकलीफ के लिए कुछ अधिक करना चाहते हैं तो हमारी योग-विश्रांति की कक्षाओं में शामिल हो जाइए, जिनमें मुख्य रूप से "पीठ, गर्दन और कंधों के लिए योग" वाली कक्षाएँ आपके लिए सर्वथा मुफीद होंगी। इसमें आप उन व्यायामों के बारे में भी जान पाएंगे जिन्हें आप अपने नए डेस्क पर काम करते हुए भी कर सकते हैं! और अगर आप वज़न कम करने वाले चलते-फिरते डेस्क की बात सोच रहे हैं तो आप "वज़न कम करने के लिए योग" वाली विश्रांति-कक्षाओं का आनंद प्राप्त कर सकते हैं-अपनी छुट्टियों के समय योग करते हुए वज़न कम कीजिये और उन्हें घर में करने की विधियाँ (योग-मुद्राएँ) सीखिए!

अगर आप खड़े होकर ऊंचे डेस्क पर काम करने का विचार कर रहे हैं और इस विषय में आपके मन में कुछ प्रश्न हैं तो मुझे नीचे दिए गए कमेन्ट बॉक्स में लिखिए-इस विषय में आपको सलाह प्रदान करके मुझे खुशी होगी और इस विषय में आपके अनुभवों के बारे में जानकर भी!