जर्मनी में हमारी मौज-मस्ती – 29 नवंबर 2015

जर्मनी में हमारा एक और हफ्ता गुज़र गया और इस हफ्ते भी हमें इतनी बड़ी संख्या में एक से एक बढ़कर अनुभव प्राप्त हुए कि उन्हें सिर्फ एक ब्लॉग में समेटना बड़ा मुश्किल है! फिर भी मैं कोशिश करता हूँ:

पिछले रविवार को हैम्बर्ग में अपने बर्फ़बारी के अनुभव के विषय में मैं पहले ही लिख चुका हूँ। उस रोमांचक दिन के बाद सोमवार को हम एक और ट्रिप पर निकल पड़े, इस बार हैम्बर्ग नहीं बल्कि लुनेबर्ग में ही, उसके निचले हिस्से में स्थित थर्मल बाथ की ओर! जबकि पहले हम खुले स्वीमिंग पूल में कई बार गए हैं, इनडोर स्वीमिंग पूल में तैरने का यह अपरा और मेरा भी पहला अवसर था। यह अपने आप में गज़ब का अनुभव रहा! वहाँ कई अलग अलग पूल थे, एक में तेज़ लहरें उठ रही थीं और भँवर भी थे, एक बिल्कुल नन्हे बच्चों के लिए था और एक और, कुछ बड़े बच्चों के लिए। एक पूल नमकीन गर्म पानी वाला पूल था और वहीं एक खुला स्वीमिंग पूल भी उपलब्ध था! जब अपरा घुटनों तक गहरे पूल के पानी में कुछ अभ्यस्त हो गई तो हम उसे अपने साथ भँवर में फिसलने के लिए भी ले गए और उसे वहाँ खूब मज़ा आया। वह मेरी पीठ पर लेटकर खूब तैरी और कुल मिलाकर हमने वहाँ के रोमांच का भरपूर आनंद लिया!

इसके अलावा कई और तरीकों से हमने लुनेबर्ग के अपने निवास को ढेर सारी खुशियों और आनंद से परिपूर्ण कर दिया! आंद्रिया हमें खेल के मैदान ले गई, फिर हम खरीदारी करने बाज़ार गए थे, जो अपरा के लिए सदा एक रोमांचित कर देने वाला अनुभव होता है और फिर बहुत से दोस्त भी हमसे मिलने घर आए थे! हमने घर में ही एक से एक बढ़कर स्वादिष्ट खाने-पीने की वस्तुएँ तैयार कीं और शाम के समय साथ बैठकर शांति और सुकून में बहुत खूबसूरत समय गुज़ारा!

और लूनेबर्ग निवास के अंतिम दिन यानी बुधवार को हमने एक और विशेष काम किया: हम लूनेबर्ग के क्रिसमस मार्केट गए। और वहाँ भी अपरा ने जीवन में पहली बार कुछ देखा और जिसे देखना मेरे लिए हमेशा सुखकर अनुभव होता है। वहाँ लोग बहुत अच्छे मूड में थे, वहाँ बहुतेरी मिठाइयाँ थीं, बच्चे झूला झूल सकते थे और हवा में शानदार संगीत झंकृत हो रहा था। मास्क्ड बाल के बारे में अपरा ने किताबों में पढ़ रखा था और अपरा भी अपना मास्क लगाकर हिंडोले पर भी झूली और ट्रेन की सवारी भी की। फिर उसने दिल के आकार की अदरक की ब्रेड खाई और हमारे साथ गरमागरम चॉकलेट का आस्वाद भी लिया!

गुरुवार को हमने आंद्रिया और माइकल से बिदा ली और आउसबर्ग की ट्रेन पकड़ी, जहाँ अपरा के नाना-नानी रहते हैं! यह ट्रेन यात्रा भी बहुत यादगार रही और इसी सफर में मैंने और रमोना ने अपने जर्मन विवाह की पाँचवी सालगिरह मनाई! पाँच साल पहले ही कुछ कागजों पर दस्तखत बनाने हम अपने दोस्तों के साथ वीजबाडेन आए थे-समय कितनी तेज़ी से गुज़र जाता है!

परसों हम म्यूनिख के लिए रवाना हुए। म्यूनिख के म्यूज़ियम में बच्चों के देखने लायक बहुत सी दर्शनीय वस्तुएँ हैं लेकिन हम वहाँ का शानदार म्यूज़ियम देखने ही नहीं बल्कि रमोना के दूसरे कुछ रिश्तेदारों से मिलने भी गए थे, विशेष रूप से उसके चचेरे भाई का बेटा, जो कुछ दिन बाद ही तीन साल का होगा! हमारे लिए भी और अपरा के लिए भी फिर से एकत्र होने का सुअवसर! वह उपहार लेने और देने के मामले में बड़ी उत्साहित रहती है तो यह भी किया गया! रमोना और उसके चचेरे भाई ने एक लट्टू चलाकर देखा और अपरा उसे देख-देखकर बड़ी खुश और रोमांचित होती रही।

कल घर वापस लौटने के बाद जब हम सोकर उठे तो अपने आपको जर्मन सर्दियों के हिमाच्छादित आश्चर्यलोक में पाया! सुबह लगातार बर्फ़बारी होती रही और हमें बर्फ का स्नोमैन तैयार करने का मौका मिल गया। यह हम पिछले सप्ताह की बर्फ़बारी में नहीं कर पाए थे और रमोना, उसके पिता और अपरा ने मिलकर खेल-खेल में एक सुंदर स्नोमैन बना डाला! और उसमें गाजर की नाक भी लगाई!

दोपहर में अपरा ने आइस स्केटिंग करने की कोशिश की! उनके घर के ठीक सामने एक कृत्रिम आइस फील्ड है, जहाँ किराए पर स्केट्स मिल जाते हैं-और मुझे कहना पड़ेगा कि अगर अपरा रोज़ वहाँ अभ्यास के लिए जाए तो वह जल्द ही बढ़िया स्केटिंग करने लगेगी!

अंत में हम अपरा की जर्मन नानी, नाना और मौसी के साथ आउसबर्ग के क्रिसमस मार्केट गए। सारे शहर में मोमबत्तियाँ लगाई गई हैं, जो देखने में बड़ी भली लगती हैं। शाम छह बजे सब टाउन हाल के सामने इकट्ठा हुए, यह देखने के लिए कि किस तरह नन्हे बच्चे, किशोर और युवा, फरिश्तों की तरह वस्त्र पहनकर और अपने-अपने हार्प, बांसुरियाँ और ऑर्गन लेकर खिड़कियों पर, बालकनियों पर आकर खड़े हो जाते हैं। फिर वे अपने अपने वाद्य यंत्रों को बजाने लगे और कुछ लोग अपने स्वर्गिक स्वरों में गाने भी सुनाने लगे-लेकिन अपरा का एक ही प्रश्न था: वे उड़ क्यों नहीं रहे हैं? 🙂

अब देखते हैं कि आज हम क्या करने वाले हैं-कल हमें वापस वीज़बाडेन भी निकलना है इसलिए हम यह सुनिश्चित करेंगे कि दिन का बचा हुआ समय परिवार के साथ हँसते-खेलते गुज़ारें। हम इस समय बेहद सुंदर अवकाश यात्रा पर हैं और अपनी प्यारी नन्ही परी को जर्मनी की स्वच्छंद सैर करवा रहे हैं!

अपरा जर्मनी में अपने जीवन की प्रथम बर्फ़बारी का भरपूर आनंद ले रही है – 23 नवंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हम लोग हैम्बर्ग जाने के लिए तैयार हो चुके थे– और वास्तव में हमने वहाँ बेहद शानदार समय गुज़ारा! कैसे? अपरा ने जीवन में पहली बार बर्फ़बारी देखी और उसके शीतल एहसास का लुत्फ़ उठाया!

जब हम लुनेबर्ग से चलने को हुए तब आकाश से बर्फ के बारीक कतरे गिरना शुरू हो चुके थे हालांकि उन्हें बर्फ कहना भी पर्याप्त नहीं था और क्योंकि मौसम विभाग ने बर्फ़बारी की संभावना की घोषणा नहीं की थी, हमें लग रहा था कि इससे ज़्यादा बर्फ नहीं गिरने वाली है। हमने हॅम्बर्ग के उस इलाके में घूमने का कार्यक्रम तय किया था जहाँ माइकल हमें कुछ बहुत खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य और एल्बी नदी के किनारे-किनारे निकलने वाली सड़क, एबखासी की चहल-पहल के कुछ दृश्य दिखाना चाहता था।

लेकिन हाइवे पर आते ही हमें समझ में आने लगा कि अब उन खूबसूरत दृश्यों को ठीक तरह से देख पाना शायद संभव न हो पाए: जैसे-जैसे हम हाइवे पर बढ़ते गए बर्फ के कतरे बड़े से बड़े और घने होते गए और अंत में जब हम हॅम्बर्ग पहुँचे तो वहाँ हर तरफ सफ़ेद, कपसीली बर्फ की चादर बिछी हुई थी!

लेकिन इस बात पर निराश होकर बैठने की जगह कि हमें अपेक्षित दृश्य देखने को नहीं मिले, हम खुश और उल्लसित ही अधिक हुए और इस बात पर बहुत उत्साहित भी कि अब हमें बाहर की शीतल, सफ़ेद, शफ़्फाक दुनिया देखने को मिलेगी और हम कार से बाहर निकल पड़े! अपरा के लिए तो यह वरदान की तरह था क्योंकि यह उसके जीवन का पहला मौका था जब वह बर्फबारी देख रही थी और जबकि हमने उसे उसके बारे में बताया था और उसके वीडियो भी दिखाए थे, यथार्थ में अपनी आँखों से उसे देखना कुछ दूसरी ही बात थी! उसके लिए यह एक अलग, विस्मयकारी अनुभव था और जब हम कार में थे, वह लगातार खिड़की से देख-देखकर चमत्कृत हो रही थी और जब हम कार से निकलकर बाहर आए तो पहले तो वह काटती हुई ठंडक और नमी के चलते कुछ परेशान हुई-लेकिन जब बर्फ गिरना कुछ कम हुआ तो उसकी खुशी का पारावार नहीं रहा!

हमने एक बवेरियन स्टाइल हट में पहुँचकर विराम लिया। वहाँ रमोना जैसे अपने घर ही पहुँच गई क्योंकि वहाँ बवेरियन संगीत जारी था और बैरे लेदरहोज़न वस्त्रों में नज़र आ रहे थे और खाने को भी खास दक्षिण जर्मनी के खाद्य-पदार्थ उपलब्ध थे। 🙂

जब हम वहाँ से निकले तो हमने एक-दूसरे पर बर्फ के गोलों की बारिश शुरू कर दी-या कम से कम उसकी कोशिश की। अपरा ने बर्फ को हाथ में लेकर महसूस किया, दस्ताने पहनकर और नंगे हाथों पर भी, और उसकी शीतल सनसनी का भरपूर मज़ा लिया लेकिन गोले बनाकर फेंकते हुए वह हिचकिचा रही थी क्योंकि उसे पता था कि वह फेंकेगी तो कोई न कोई उस पर भी फेंकेगा! खैर, अंत में हमें बहुत शानदार दृश्य देखने को मिले और प्राकृतिक सुंदरता भी, क्योंकि सब कुछ सफ़ेद चादर से ढँका हुआ था!

हम बेहद खुश हैं! जब हम इस ट्रिप की बुकिंग कर रहे थे तब भी हमें अंदेशा था कि संभव है बर्फबारी हो, बल्कि हम चाहते थे कि हो, क्योंकि हम अपरा को बर्फबारी का अनुभव भी उपलब्ध कराना चाहते थे। लेकिन जब हम वहाँ पहुँचे, वहाँ का पारा 10 अंश सेन्टीग्रेड, बल्कि उससे कुछ ऊपर ही था और हम सोच रहे थे कि हमें बर्फ देखने के लिए शायद एल्प्स की चढ़ाई करनी होगी! और अब हम उसे यहीं देख चुके हैं, अपरा ने भी उसका भरपूर अनुभव प्राप्त कर लिया है और वह वापस आश्रम पहुँचकर सबको उसके बारे में विस्तार से बता सकेगी!

दोस्तों और अपरा के साथ जर्मन रोमांच! 22 नवंबर 2015

आज रविवार है और उसके साथ ही यह बताने का वक़्त कि इस समय मेरे जीवन में क्या चल रहा है-और निश्चित ही, बताने के लिए बहुत कुछ है! हम अपरा के साथ जर्मनी की यात्रा जारी रखे हुए हैं और अपने इस छोटे से अवकाश को बड़ी मौज मस्ती के साथ गुज़ार रहे हैं!

पिछले सप्ताह हम वीज़बाडेन पहुँचे और एक बहुत उत्तेजक सप्ताहांत के बाद इस सप्ताह की शुरुआत एक साथ कई गतिविधयों के साथ शुरू हुई, जिनकी योजना हम पहले ही, जब भारत में ही थे, बनाकर आए थे! सोमवार को हम पीटर और हाइके से मिलने गए, जो अभी कुछ सप्ताह पहले ही आश्रम आए थे। यह बड़ी शानदार यात्रा रही, हम लोग शहर से हटकर गाँवों की ओर निकल गए थे। हमने साथ मिलकर खाना बनाया-खाया और इस दौरान अपरा उनकी बिल्ली के साथ खेलती रही। यह बिल्ली बिल्कुल शर्मीली नहीं है और अपरा उसे पूरे समय दुलारती रही और थपकियाँ देती रही लेकिन उसने ज़रा भी प्रतिरोध नहीं किया! सिर्फ एक बार वह डरकर भाग गई थी जब अपरा अचानक लड़खड़ाई और जैसे ही उसने बिल्ली की कुर्सी का सहारा लिया, कुर्सी गिर पड़ी और बिल्ली कूदकर कहीं चली गई!

मंगलवार को हम एक किंडरगार्टन में गए जहाँ कभी थॉमस भी काम किया करता था। हमारे लिए उनके काम का जायज़ा लेना अत्यंत रोचक रहा जबकि अपरा वहाँ दौड़-भाग करने और बच्चों के साथ खेलने-कूदने में व्यस्त रही।

फिर बुधवार को हम वीज़बाडेन से निकले और एरकलेंज के लिए ट्रेन पकड़ी। गज़ब! कितना मज़ा आया! हमने साल भर पहले भी जर्मनी में ट्रेन से यात्रा की थी मगर, साल भर बाद, अपरा के लिए जैसे वह पुनः एक नए अनुभव जैसा रहा। टिकिट चेकर ने उसे 'बच्चों का टिकिट' दिया था, जिसके साथ उसे रंगीन पेंसिलें और एक टॉय ट्रेन भी मिली थी। इसके आलावा हमने वहाँ के बहुत से फोटो भी लिए और वीडियो भी बनाए, जिससे आश्रम पहुँचकर अपरा उन्हें अपने भाई-बहनों को दिखा सके।

एरकलेंज में हमने अपने बहुत पुराने मित्रों सोनिया और पीटर के साथ बड़ा शानदार समय गुज़ारा जबकि अपरा उनकी दो शर्मीली बिल्लियों के पीछे लगी सारे घर में दौड़-भाग करती रही! हमें दूसरे दिन ही लुनेबर्ग के लिए निकलना था इसलिए उनके साथ हम बहुत थोड़े समय ही रह पाए।

लुनेबर्ग आना हमेशा की तरह बेहद आनंददायक अनुभव रहा! अपने सबसे पुराने जर्मन मित्र माइकल और निश्चय ही, उसकी पत्नी, आन्द्रिया से मिलना हमेशा बड़ा भावपूर्ण और रोमांचक होता है। हम पुराने दिनों को और उस समय के रोमांच और मौजमस्ती को याद कर-करके आह्लादित होते रहे और नए रोमांच की प्लानिंग करते रहे और नए रोमांच के कार्यक्रम बनाते रहे। इसके अलावा, एक-दूसरे के जीवनों में इस बीच आए बदलाव और विकास की चर्चा करते रहे। यहाँ उत्तरी जर्मनी में हमारे कई और भी मित्र हैं इसलिए शुक्रवार और शनिवार को हम वैसे भी मिलने आने वाले दोस्तों के साथ बहुत व्यस्त रहे! रमोना के स्कूली दिनों की एक मित्र तथा दूसरे कई, जो इसी साल मार्च में ही आश्रम आए थे, हमारे साथ खाना खाने और कुछ समय हमारे साथ गुजारने आए थे!

माइकल और आंद्रिया को अपरा पहले से जानती है और अपनी प्रारम्भिक झिझक से वह बहुत जल्दी पार पा गई! अब वह सारा समय उनके घर के कोने-कोने में जाकर जाँच-पड़ताल में लगी रहती है और अपनी नई-नई खोजों के बारे में उनसे बड़ी गंभीरता के साथ चर्चा करती है! यहाँ उसके लिए कई चीज़ें बिल्कुल नई हैं: जैसे डिशवाशर, विशालकाय आलमारियों में रखे विभिन्न उपभोक्ता सामान, जहाँ खरीदने के लिए हजारों विकल्प मौजूद हैं, डिनर टेबल पर रखी जाने वाली मोमबत्तियाँ, स्पीकर्स, जिनमें से घर के हर कमरे में आवाज़ आती है, आदि, आदि।

साल के इस समय और नवंबर के महीने में जर्मनी के अत्यंत ठंडे मौसम की आशंका के बावजूद इस दौरे की योजना बनाकर हमने अच्छा किया और हम बेहद खुश हैं! हम बहुत शानदार और रोमांचक समय बिता रहे हैं और निश्चय ही, अपरा भी- जिसके कारण हम इस दौरे को किसी भी कीमत पर टालना नहीं चाहते थे!

अब हमारा अगला पड़ाव होगा, हैम्बर्ग, जहाँ के लिए हम आज ही रवाना होने वाले हैं। आज कुछ घंटे हम वहाँ बिताएँगे। निश्चित ही, आपको उस दौरे का आँखों देखा हाल और हमारे अनुभवों का अहवाल जल्द ही प्राप्त होगा!

जर्मनी जाने की तैयारियाँ – 12 नवंबर 2015

कल के शानदार दीवाली समारोह के पश्चात आज हम एक बिल्कुल अलग तरह की तैयारियों में व्यस्त हो गए थे: रमोना, अपरा और मैं कल जर्मनी के लिए रवाना होंगे! हमें आधी रात के बाद दिल्ली से उड़ान भरनी थी लिहाजा हम आज ही यात्रा की सारी तैयारियाँ कर लेना चाहते थे!

खैर, सारी तो नहीं लेकिन जहाँ तक संभव हो सकता था। रमोना काफी ज़ोर-शोर से तैयारियों में लगना चाहती थी लेकिन इस बीच आश्रम में चल रही अनेकानेक गतिविधियों के बीच वह तैयारियों की शुरुआत भी नहीं कर सकी। फिर भी कम से कम हम इतना तो कर ही पाए कि जर्मनी के ठंडे मौसम से बचाव के लिए अपनी सभी सूटकेसें गरम कपड़ों से भर लें!

निश्चित ही, अपरा ने भी अपना सूटकेस अच्छी तरह तैयार कर लिया है! वही सबसे ज़्यादा उत्सुक भी थी! बहुत दिनों से सुबह की शुरुआत ही उसके इस प्रश्न से होती थी: "हम जर्मनी कब जाने वाले हैं?" और सारा दिन वह बार-बार यात्रा के बारे में पूछती रहती थी। दोपहर के भोजन के समय वह आश्रम के दूसरे बच्चों से कहती कि हम जर्मनी में रोटी नहीं खाएँगे, ब्रेड खाएँगे। वह अपने खिलौनों को रोज़ गौर से देखती है और तय करती है कि कौन से खिलौने ले जाने हैं और किन्हें यहीं छोड़ना है। नए कपड़े पहनना उसने बंद कर दिया है क्योंकि उन्हें हमने जर्मनी में पहनने के लिए खरीदा था। और सबसे बड़ी बात, उन गतिविधियों की लंबी फेहरिस्त बनाई जा रही है कि जर्मनी जाकर क्या-क्या मस्ती करनी है, कहाँ कहाँ जाना है, इत्यादि, इत्यादि!

पिछले दो दिनों से अपरा थोड़ी थकी-थकी सी लग रही थी, उसे ठंड लग गई थी और तेज़ सर्दी और ख़ासी से वह बहुत परेशान थी। कल उसे बुखार भी था लेकिन आज वह ठीक लग रही है। रमोना और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि हमें बीमार बच्चे के साथ हवाई यात्रा का पहले से अनुभव है लेकिन निश्चित ही मैं ऐसी यात्रा बार-बार नहीं करना चाहूँगा!

लेकिन क्योंकि वह अब काफी ठीक है, हमें विश्वास है कि कल वह हवाई यात्रा का पूरा आनंद ले पाएगी और क्योंकि यह फ्लाइट दिन में है तो वह आसपास के वातावरण को भी मन भर देख सकेगी और उसे अधिक से अधिक जज़्ब कर सकेगी!

मैं अब आपसे यहीं बिदा लेता हूँ और कल जब मैं सुरक्षित जर्मनी पहुँचूँगा, तभी मैं अपना अगला ब्लॉग लिखूँगा!

उत्सव – पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों का आईना – 23 अक्टूबर 2014

दीवाली की छुट्टियाँ शुरू होने से एक दिन पहले स्कूल की शिक्षिकाओं ने छोटा सा कार्यक्रम आयोजित करके मिठाइयाँ वितरित कीं। इस अवसर पर रमोना ने उनसे पूछा कि उनके घरों में दीवाली किस तरह मनाई जाती है। बदले में उन्होंने रमोना से उसके देश में होने वाले समारोहों के बारे में पूछा। रमोना किंचित असहज हो गई।

स्वाभाविक ही उसने क्रिसमस के बारे में बताया लेकिन वे और अधिक जानना चाहते थे। उन्हीं में से किसी ने गुड-फ्राइडे का ज़िक्र किया क्योंकि भारत में भी उस दिन छुट्टी होती है। खैर, रमोना ने कहा कि हाँ, ईस्टर के सप्ताहांत में भी समारोह आयोजित किए जाते हैं- लेकिन समारोह’ शब्द उसके मुँह से निकलते ही उसके मन में यह बात आई कि वे इस शब्द से वास्तविकता से कुछ ज्यादा बड़े आयोजन की कल्पना कर रहे होंगे।

धार्मिक लोग धार्मिक छुट्टियों के दिन चर्च जाते हैं। इनमें से ज़्यादातर सिर्फ क्रिसमस के अवसर पर चर्च जाते हैं, तो फिर दूसरे धार्मिक अवसरों पर क्या किया जाता है? बच्चों के लिए ईस्टर बड़ा शानदार होता है और वे घरों और बाग़-बगीचों में चॉकलेट और ईस्टर एग ढूँढ़ने का खेल खेलते हैं। इसके अलावा त्योहारों के बारे में कहने के लिए विशेष कुछ नहीं होता।

यह सही है कि त्योहार होते हैं और त्योहारों पर दिन भर की छुट्टी भी होती है मगर किसी भी त्योहार पर, जैसे गुड-फ्राइडे पर भी, कोई विशाल आयोजन नहीं होता! हाँ, कार्नीवल आदि में लोग पार्टियाँ कर लेते हैं। क्रिसमस से पहले चार सप्ताह से उत्सव का माहौल हो जाता है क्योंकि आप क्रिसमस की खरीदारियाँ करते हैं और हर तरफ सजावट की हुई दिखाई देती है। लेकिन बहुत से त्योहारों पर सर्वसाधारण लोग सिर्फ छुट्टियाँ मनाते दीखते हैं! धर्म अब ज़्यादातर लोगों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया है और इस तरह धार्मिक त्योहार भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं।

यहाँ, भारत में हर त्योहारी छुट्टी पर बड़े-बड़े आयोजन होते हैं! और छुट्टियाँ भी बहुत होती हैं तथा त्योहार भी बहुत होते हैं! लोग सभी मुख्य-मुख्य भगवानों और संत-महात्माओं के जन्मदिन मनाते हैं, बहुत सी पूर्णिमाओं, अमावस्याओं, दूज, तीज और एकादशियों पर कोई न कोई समारोह आयोजित किया जाता है। और लगभग सभी अवसरों पर कोई न कोई पूजा होती है, कोई न कोई अनुष्ठान धार्मिक कर्मकांड आयोजित किए जाते हैं। कभी दिए जलाए जाते हैं, देवताओं की मूर्तियों पर चन्दन का लेप लगाया जाता है, कहीं उन्हें अच्छे-अच्छे पकवान अर्पित किए जाते हैं, कहीं औरतें किसी पेड़ की परिक्रमा करती नज़र आती हैं तो कहीं कुँवारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है। उपवास के सैकड़ों कारण होते हैं और जब भारतीय अपने पूर्वजों को याद करते हैं तो सिर्फ दिये प्रज्वलित करके नहीं रह जाते, बहुत कुछ और भी किया जाता है।

कुल मिलाकर उत्सव जर्मन और भारतीय लोगों के चरित्र का आइना हैं! एक तरफ त्योहार मनाने के विशाल और कर्मकांडों, विधि-विधानों और मिथकीय कथा-कहानियों से युक्त भारतीय तरीकों में उनका रंगबिरंगा, जीवंत और कई बार अतिउत्साही और प्रदर्शन-प्रिय चरित्र उजागर होता है तो दूसरी तरफ त्योहारों पर जर्मंस का व्यवस्थित, साफ़-सुथरा और कभी-कभी बहुत धीर-गंभीर और सचेत तरीका उनका चरित्र उजागर करता है, जिसमें वे बहुत साधारण तरीके से छोटी-छोटी पारिवारिक परम्पराओं का निर्वाह करते हुए उन्हें बहुत शालीन और निजी मामला बना देते हैं।

दोनों संस्कृतियों के बीच मौजूद विशाल अंतर को स्पष्ट करना या उन्हें शब्दों में बयान करना बहुत मुश्किल और लंबा काम है- उसे आप सिर्फ महसूस कर सकते हैं वह भी लम्बे समय तक दोनों संस्कृतियों के बीच रहने के बाद। आश्रम में हम लोग इन दोनों संस्कृतियों से समान रूप से जुड़े रहते हैं और फिर हम धार्मिक भी बिल्कुल नहीं हैं। इस तरह हम बिना किसी धार्मिक विधि-विधान के इन त्योहारों को सुन्दर तरीके से मनाते हैं।

आज दीवाली का दिन है और हम सब तेल के दिए जलाने में व्यस्त हैं और उसके बाद बहुत सारी सुस्वादु मिठाइयों से पेटपूजा करने वाले हैं। मानसिक रूप से आप भी हमसे जुड़ जाएँ- दीवाली हमारे साथ मनाएँ!

मैं आप सभी को दीवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ!

किस तरह धारा-प्रवाह जर्मन बोलकर अपरा ने हमें विस्मित कर दिया! 9 जून 2014

हमें जर्मनी आए अब लगभग तीन सप्ताह हो गए हैं और स्वाभाविक ही यहाँ का हमारा अनुभव बहुत ही अलग रहा! मैं सोचता हूँ आप हमारे अब तक के अनुभवों के बारे में जानना चाहेंगे।

सर्वप्रथम वह बात, जिससे अक्सर लोग अपना वार्तालाप शुरू करते हैं, यानी मौसम! जब हम यहाँ पहुंचे थे, फ्रेंकफ़र्ट में तापमान 7 अंश सेन्टीग्रेड था। घर जाने से पहले हमने सूटकेस में से अपने मोज़े और जैकेट्स निकाल लिए थे, जिससे कार में हम सर्दी से बच सकें। कल एक कार्यक्रम से हम लौट रहे थे और तापमान था 37 अंश! इस बीच हमें सूरज से चमकते कुछ उजले दिन मिले तो कुछ दिन बारिश होती रही, आसमान में बादल छाए रहे और ठंडी हवाएँ चलती रहीं। यह जर्मनी है-यहाँ का बावला मौसम अब हमें पहले की तरह विस्मित नहीं करता!

वीज़्बाडेन में कुछ दिन व्यतीत करने के बाद हम दक्षिण की तरफ निकल गए, जहाँ हमने अपना पहला कार्यक्रम डिशन में अमर्ज़ी नामक एक सुंदर बवेरियन झील के किनारे प्रस्तुत किया, जहाँ से आल्प्स का अद्भुत दृश्य नज़र आता है। उसके बाद म्यूनिख और औस्बर्ग में हम कुछ समय रमोना के परिवार के साथ मिलते-जुलते रहे। उनके साथ कुछ दिन बेहद शानदार और सुखद समय बिताने के बाद हम वापस वीज़्बाडेन आ गए और फिर पिछला सप्ताह वहाँ से 150 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित सारलैंड में व्यतीत किया। इस तरह अपने सफर का काफी हिस्सा हमने इस बीच पूरा कर लिया है और आज रात हम अपने अगले सफर पर रवाना होंगे: आज शाम हमें स्पेन के लिए उड़ान भरनी है, ग्रान कनारिया की ओर!

इस रास्ते में हम पहले भी अपने बहुत से मित्रों और पारिवारिक सदस्यों से मिल चुके थे और उनसे फोन और इन्टरनेट द्वारा संपर्क भी बना हुआ था मगर अब उन सभी से पुनः रूबरू मिलना अद्भुत अनुभव था! हम हँसे, मौज-मस्ती की, साथ मिलकर खाना पकाया और कुल मिलाकर उनके साथ बहुत सुखद समय व्यतीत किया। सभी यह देखने को उत्सुक थे कि पिछली बार की तुलना में अपरा में क्या-क्या परिवर्तन आया है: वह कितनी बड़ी हुई है, उसने इस बीच क्या-क्या नया सीखा, आदि, आदि।

सबसे बड़ी बात यह है कि वह अच्छी-खासी जर्मन बोलने लगी है बल्कि कहना चाहिए कि वह बड़ी निपुणता और आत्मविश्वास के साथ जर्मन भाषा में बात करने लगी है! रमोना उसके साथ हमेशा जर्मन में ही बात करती है लिहाजा हम यह तो जानते थे कि यहाँ भी वह सब कुछ समझ रही होगी भले ही जर्मन में बात ना करे। शुरू में बातें तो वह बहुत करती थी मगर ज़्यादातर हिंदी में ही। लेकिन यहाँ पहले हफ्ते में ही न सिर्फ वह हमारे बहुत सारे जर्मन मित्रों से मिली बल्कि उसे कई जर्मन बच्चों के साथ खेलने का मौका भी मिला और अचानक वह सबके साथ जर्मन में बातचीत करती नज़र आई!

अब वह इतनी अच्छी जर्मन बोलने लगी है कि मैं भी बहुत से जर्मन शब्द उससे सीख रहा हूँ और उसके साथ बात करते हुए मुझे कई बार रमोना से कुछ शब्दों के अर्थ पूछने पड़ते हैं। कई बार रमोना भी आश्चर्य में पड़ जाती है- आजकल अक्सर यह प्रश्न उससे सुनने को मिलता है: "अरे, यह शब्द उसने कहाँ से सीख लिया?"!

मेरा विश्वास है कि आश्रम में रहते हुए अपरा को जो माहौल प्राप्त होता है उससे उसे यह लाभ होता है कि सफर में उसे कोई परेशानी नहीं होती: वह पहले ही तरह-तरह के चेहरे देखने की इतनी अभ्यस्त होती है कि किसी भी नई जगह में वह आसपास मौजूद विभिन्न लोगों के साथ आसानी के साथ तालमेल बिठा लेती है। हालांकि शुरू में, स्वाभाविक ही, थोड़ा शरमाती है मगर अक्सर एकाध घंटे में ही वह खुशी-खुशी नए मित्र बना लेती है भले ही वह व्यक्ति उसके लिए कितना भी अनजान क्यों न हो, सिर्फ उसे "माँ या पा" का मित्र भर होना चाहिए। फिर वह उनके साथ मैदान में खेलने चली जाएगी या बाज़ार, ख़रीदारी करने भी। हाँ, अगर उस व्यक्ति के पास कुत्ता भी है तो फिर दोस्ती और जल्दी हो जाती है!

चलें, देखते हैं, ग्रान कनारिया पहुँचने पर क्या-क्या अनुभव प्राप्त होते हैं। वहाँ हमारी मित्र बैटी हमारा स्वागत करेगी और अगले तीन सप्ताह हम लोग कई कार्यक्रमों में व्यस्त रहेंगे। हम वहाँ पहुँचने की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं- निश्चय ही हम वहाँ काम के सिलसिले में जा रहे हैं मगर अपरा को समुद्र की मचलती लहरों के साथ खेलते और रेत पर घरौंदे बनाते देखना भी बड़ा रोचक और आह्लादकारी अनुभव होगा!

अपनी इस यात्रा और वहाँ के प्रथम अनुभवों के बारे में मैं आपको कल बताऊंगा!

जर्मनी की चुनाव-प्रक्रिया भारत की तुलना में अधिक न्यायपूर्ण और जनतान्त्रिक क्यों है! 21 मई 2014

शायद आप जानते ही होंगे कि हाल ही में हमारे देश में लोकसभा के चनाव हुए हैं। जनसंख्या के लिहाज से भारत दुनिया का दूसरा बड़ा देश है और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यही कारण है कि सारे देश में चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने में पाँच सप्ताह का लम्बा समय लगा। यहाँ मैं चुनाव के नतीजों की चर्चा नहीं करने वाला हूँ क्योंकि मैं अपने ब्लॉग को फिलहाल राजनीति से दूर रखना चाहता हूँ। मैं भारत की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बारे में भी लिखना नहीं चाहता और हालाँकि सरकार के निर्णयों पर बाद में कभी लिख सकता हूँ मगर आज चुनाव नतीजों पर आगे कुछ नहीं लिखुंगा। इसकी जगह मैं चुनाव-व्यवस्था के बारे में लिखना चाहता हूँ!

भारत में, जिस पार्टी ने भारत की जनता के सिर्फ 31% वोट पाए हैं उसने अगले पांच साल के लिए देश पर राज करने का हक़ प्राप्त कर लिया है क्योंकि उसे लोकसभा में सीटों का बहुमत प्राप्त हुआ है। इसका अर्थ यह है कि 69% लोगों ने इस पार्टी को नकार दिया है। ऐसा इसलिए होता है कि भारत में हम स्थानीय उम्मीदवारों को वोट देते हैं। स्थानीय स्तर पर जो बहुमत में वोट हासिल करता है वह लोकसभा के लिए चुन लिया जाता है और बाकी के वोट व्यर्थ हो जाते हैं। वह एक वोट से भी जीत सकता है और भारी बहुमत से भी, लेकिन उसकी पार्टी को एक सीट मिल जाती है। इस तरह, भले ही 69% वोटर उस पार्टी का शासन नहीं चाहते, हमारी चुनाव-व्यवस्था की खामी के कारण इस पार्टी ने संसद में बहुमत पा लिया है और उसके लिए देश पर शासन करना आसान हो गया है-और इस कारण हमारा लोकतंत्र वास्तव में लोकतंत्र नज़र ही नहीं आता।


भारत की जनसंख्या


1 270 000 000 (2014)


कुल मतदाता


815 000 000(2014)


पार्टी


प्राप्त मत


प्राप्त सीटें


भाजपा


17,16,57,549


282


कांग्रेस


10,69,38,242


44


बीएसपी


2,29,46,182


0


टीएमसी


2,12,59,681


34


एसपी


1,86,72,916


5


एआईडीएमके


1,81,15,825


37


सीपीएम


1,79,86,773


9


टीडीपी


1,40,94,545


16


एएपी


1,13,25,635


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जब मैंने यह सब अपने जर्मन मित्रों को बताया तो उन्होंने मुझसे कहा कि जर्मन चुनाव-व्यवस्था में यह संभव नहीं होता। जब मैंने पूछा कि क्यों और कैसे तो आयरिस ने बहुत विस्तार से मुझे समझाया। उसने बताया कि यह थोड़ा जटिल अवश्य है लेकिन वह बहुत न्यायसंगत है, बल्कि दुनिया भर की चुनाव-व्यवस्था में सबसे अधिक युक्तियुक्त और न्यायसंगत है-और मुझे उससे सहमत होना पड़ा!

जबकि भारत में हम लोग मत-पत्र पर एक निशान लगाते हैं, जर्मनी में दो लगाए जाते हैं। पहले वे चुनाव में शामिल पार्टियों में से किसी एक पार्टी को, जिसके कार्यक्रमों को वे सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं, वोट देते हैं। उसके बाद वे किसी विशेष स्थानीय उम्मीदवार को वोट देने के लिए एक और निशान लगाते हैं। अगर यह उम्मीदवार चुनाव जीत लेता है तो वह सीधे संसद में पहुँच जाता है। इस तरह वे ऐसे स्थानीय उम्मीदवार को भी चुन सकते हैं, जो उस पार्टी का, जिसे उन्होंने पहले वोट दिया है, नहीं होता।

जब वोट गिने जाते हैं तो पहला वोट यह बताता है कि लगभग 600 सीटों की जर्मन संसद में कितने प्रतिशत सीटें किस पार्टी को मिली हैं।

साथ ही हर इलाके से चुना गया उम्मीदवार भी सीधे संसद में पहुँच जाता है। दूसरे वोट से यह पता चल जाता है।

इस तरह यदि एक पार्टी ने 30% वोट प्राप्त किए हैं तो उस पार्टी को संसद में 30% सीटें प्राप्त होती हैं। ये सीटें उन उम्मीदवारों द्वारा भरी जाती हैं, जो अपने-अपने क्षेत्रों से चुनकर आए हैं। अगर उस पार्टी के पर्याप्त संख्या में स्थानीय उम्मीदवार चुनकर नहीं आए हैं तो बची हुई सीटों को क्रमानुसार उसी पार्टी के चुने हुए उम्मीदवारों से भरा जाता है। इस क्रम की घोषणा चुनावों से पहले ही की जाती है और उसमें ऐसी व्यवस्था होती है कि न्यायसंगत संख्या में हर जर्मन प्रान्त के उम्मीदवार जर्मन संसद में पहुंच सकें।

इसके बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है: क्या हो अगर किसी पार्टी के स्थानीय रूप से जीते हुए उम्मीदवारों की संख्या उस पार्टी द्वारा प्रथम वोट से प्राप्त प्रतिशत के अनुसार निर्धारित सीटों से ज्यादा हो? ऐसी स्थिति में ही 'Uberhangmandate' सीटों यानी अतिरिक्त जनादेश या हाथ उठाकर (overhand) सीटों की व्यवस्था संसद में करना पड़ती है। ये सभी उम्मीदवार भी संसद में जाएंगे और इस कारण दूसरी पार्टियों के उम्मीदवारों को भी उसी अनुपात में संसद में प्रवेश मिल जाता है, जिससे हर पार्टी के सांसदों का कुल प्रतिशत चुनाव में प्राप्त प्रतिशत के बराबर ही बना रहे। इस तरह संसद-सदस्यों की संख्या बढ़ जाती है मगर उनके सदस्यों का प्रतिशत वही बना रहता है।

स्थानीय रूप से जीते हुए सभी उम्मीदवार संसद में जाने के हकदार होंगे। इसके अलावा हर वोट गिने जाने के बाद प्राप्त वोटों की संख्या के अनुपात में उतनी प्रतिशत सीटें हर पार्टी के लिए सुनिश्चित हो जाएंगी।

मुझे लगता है कि यह न्यायसंगत है। मुझे लगता है कि यह भारतीय चुनाव-व्यवस्था से ज़्यादा न्यायसंगत और तार्किक है, यह ज़्यादा जनतांत्रिक है और ज़्यादा लोगों की इच्छाओं और पसंद का प्रतिनिधित्व करती है।

दो भिन्न संस्कृतियों से आए दम्पतियों को किस तरह बीच का रास्ता निकालना होता है- 16 अक्तूबर 2013

कल मैंने स्पष्ट किया था कि संस्कृतियों के बीच कुछ अंतर इतने गहरे होते हैं कि किसी को भी, वह कितना भी बदलने की कोशिश करे, दूसरी संस्कृति में पूरी तरह स्वीकृति प्राप्त नहीं होती-एक संस्कृति से आए व्यक्ति के लिए किसी दूसरी संस्कृति की कुछ बातें पूरी तरह अपनाना असंभव हो सकता है, जब कि उसी संस्कृति से आए व्यक्ति के लिए वे बातें बहुत साधारण होती हैं। मैं स्वयं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि किसी संस्कृति को प्रत्यक्ष रूप से जानने के लिए उस संस्कृति के किसी व्यक्ति से विवाह कर लेना बेहतरीन उपाय है। किसी न किसी बिन्दु पर आप यह बात समझ जाते हैं कि आप कौन सी बात कर सकते हैं और कौन सी नहीं। इन सीमाओं के संदर्भ में आप यह भी समझने लगते हैं कि आपके साथी की कुछ दूसरी सीमाएं होती हैं। सुचारु रूप से इन दो संस्कृतियों का मिलन बीचोंबीच कहीं हो पाता है!

उदाहरण के लिए जीवन की भविष्य की योजनाओं को लें। पश्चिम में सामान्य रूप से प्रचलित सलाह यह होती है कि "प्रवाह के साथ बहते चलो" और ज़्यादा योजनाएँ मत बनाओ। पूर्वी देशों में, कम से कम भारत में लोगों को थोडा-बहुत योजना बनाकर चलना सीखना चाहिए। प्रश्न यह है कि क्या इस सलाह को कार्य रूप में परिणत करना संभव हो पाता है या नहीं?

मेरी पत्नी और मैं इस प्रश्न का सामना अक्सर करते रहते है। जर्मन होने के नाते वह योजनाबद्ध तरीके से काम करने की आदी है। इसका कारण उसका जर्मन पालन-पोषण है, उसकी संस्कृति और उसका परिवेश है। लेकिन मैं अक्सर कोई काम योजना बनाकर नहीं करता। जो कुछ भी सामने आता जाता है उसके अनुसार जीता और व्यवहार करता हूँ। मैं यहाँ त्योहार जैसे बड़े आयोजनों की बात नहीं बल्कि रोज़मर्रा के जीवन की बात कर रहा हूँ।

चलिए, नहाने जैसे एक छोटे से काम का उदाहरण लेते हैं। मेरी पत्नी सबेरे उठकर, बिस्तर से पैर बाहर निकालने से पहले ही सारे दिन की योजना बना लेती है। ये उसके भीतर बैठे जर्मन संस्कार हैं, जो दिन भर के कामों की मोटे तौर पर योजना बना लेते हैं और हर काम का ठीक समय नियत कर लेते हैं। अगले आधा घंटे हम उठेंगे और नित्य कर्म से निपटकर मैं सात से आठ बजे तक योग करने बैठ जाता हूँ। फिर आधा घंटा विश्रान्ति में लग जाता है और फिर मैं कंप्यूटर पर आधा घंटा बिताता हूँ। फिर नौ बजे हम लोग नहाते हैं, कुछ दूसरे काम निपटाते हैं और ग्यारह बजे दोपहर का भोजन करते हैं। यह सारी योजना वही बनाती है।

मैं उठूँगा और उस वक़्त बाथरूम जाने के अलावा कुछ नहीं सोचूंगा। मुझे पता नहीं होता कि अगले तीन घंटों में मैं क्या करना चाहूँगा-क्या-क्या काम सामने आएंगे, क्या मैं नहाऊँगा भी या नहीं? हो सकता है, मैं दोपहर में नहाऊँ…

तो, आप देख रहे होंगे कि हम दोनों अगर अपनी सांस्कृतिक या परिवेशगत आदतें पूरी निष्ठा के साथ बचाकर रखना चाहेंगे तो दोनों ही साथ नहा भी नहीं पाएंगे और फिर नहाने जैसी छोटी सी बात पर भी लड़ बैठेंगे। इसलिए हमें बीच का कोई रास्ता अपनाना होता है, रमोना ध्यान रखती है कि वह बार-बार मुझसे न पूछे कि हम कब नहाएंगे और न ही बार-बार यह बताए कि वह नौ बजे नहाने जाएगी। एक मोटे अंदाज़ में वह बता देती है कि किस वक़्त वह क्या करने वाली है लेकिन अपनी समय-योजना को वह थोड़ा-बहुत इधर-उधर करने के लिए तैयार रहती है।

और अपनी तरफ से मैं भी उसे स्पष्ट बता देता हूँ कि मैं आज सबेरे नहाने वाला नहीं हूँ, जिससे वह सबेरे के लिए किसी दूसरी योजना पर विचार कर सके और पहले से दोपहर के बारे में, क्या किया जाना है, इसका कुछ अंदाज़ा ले सके। अन्यथा मैं कोशिश करता हूँ कि नौ बजे तक सारे कार्य निपटाकर तैयार हो जाऊँ।

हम बीच में कहीं मिलते हैं। यह मेरे लिए संभव नहीं है कि रमोना की तरह सारे दिन की योजना बना लूँ। यह मेरे लिए बहुत तनावपूर्ण होगा और समय-सीमा के अलावा किसी भी दूसरे काम पर ध्यान केन्द्रित करना मेरे लिए असंभव हो जाएगा। इसके विपरीत, अगर उसके पास कोई तैयार योजना, कम से कम उसका स्थूल रूप, न हो तो, बहुत से काम निपटाने के बाद भी, उसे लगता रहेगा कि वह कोई दूसरा ही काम करना चाहती थी और उसका दिन व्यर्थ के कामों में बरबाद हो गया!

दूसरे देशों या संस्कृतियों से आए लोगों के साथ स्थापित किसी निकट संबंध में या दूसरे औपचारिक सम्बन्धों में भी आपको अक्सर समझौते का कोई बिन्दु तलाशना पड़ता है, दोनों पार्टियों को स्वीकार्य कोई समाधान, कोई बीच का रास्ता। हम दोनों ने ही एक-दूसरे की संस्कृतियों का कुछ हिस्सा अपने भीतर जज़्ब कर लिया है-इस तरह का लचीलापन बहुत सी बातों को और भी आसान बना देता है!

जर्मन भाषा सीखने के लिए 30 साल बाद फिर से ‘स्कूल चले हम!’- 5 अगस्त 2013

मैं अपनी ज़िंदगी में आए एक परिवर्तन के बारे में आपको बताना चाहता हूँ जिसका मुझ पर दूरगामी असर पड़ सकता है: मैं जर्मन भाषा सीखने के काम में सक्रियता के साथ जुट गया हूँ। जी हाँ! मैंने 30 साल बाद फिर से स्कूल जाना शुरू कर दिया है।

शायद आप लोग जानते होंगे कि पिछले तेरह सालों में मैंने बहुत सा समय जर्मनी में बिताया है। फिर भी, इतना समय गुज़र जाने के बावजूद, जर्मन भाषा पर मेरी पकड़ कमजोर ही है। वैसे, इसकी मुझे कभी बहुत आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई। मेरे संपर्क में आने वाले अधिकांश लोग अँग्रेजी बोल और समझ लेते थे। अपने काम के दौरान, आवश्यकता पड़ने पर मैं अपने साथ एक दुभाषिया रख लेता था और व्यक्तिगत व्यवहार में मेरे साथ सदा ही कोई न कोई ऐसा व्यक्ति होता था जो अँग्रेजी और जर्मन भाषाओं का जानकार हुआ करता था। 2007 से तो रमोना हर वक्त मेरे साथ ही रहती है और मैं हर उस बात को जो मुझे जर्मन में ठीक से समझ में नहीं आ रही है उससे समझ लेता रहा हूँ।

दरअसल पिछले कई सालों में मेरी जर्मन पत्नी ने कई बार कोशिश की कि मैं ठीक से जर्मन भाषा सीख लूँ। उसने खुद मुझे जर्मन पढ़ाने की कोशिश की। यहाँ बता दूँ कि वह बहुत अच्छी शिक्षक है। मगर हर वक्त इतने महत्वपूर्ण काम लगे रहते हैं कि मैंने उससे कहा कि मेरी व्यस्तता जर्मन सीखने के काम में बहुत बड़ी बाधा है और फिलहाल यह संभव नहीं है।

तो यह तो हुई जर्मन न सीखने की अपनी कहानी। जब कि मैं 13 वर्ष से जर्मन लोगों के संपर्क में रहने की बावजूद उनकी भाषा सीख नहीं पाया, मेरी पत्नी को मेरे परिवार वालों, कस्बे वालों, और आश्रम के बच्चों के साथ हिन्दी में संवाद करने में मुश्किल से दो साल लगे थे। जर्मन भाषा के बहुत से शब्द मैं जानता हूँ, बहुत से ऐसे शब्द जिनसे मैं जर्मन भाषा में हो रही बातचीत का अंदाज़ा लगा लेता हूँ, उसका रुख समझ जाता हूँ, लेकिन बोलते समय मैं व्याकरण की बहुत गलतियाँ करता हूँ। पहले मैं समझता था कि अपनी बेटी के साथ बात करके मैं सीख लूँगा या जैसे-जैसे वह सीखेगी मैं भी सीखता चलूँगा। लेकिन वह इतना जल्दी सीखती है कि उसने बहुत पहले ही मुझे बहुत पीछे छोड़ दिया है।

इस बार जब हम जर्मनी में थे तब मुझे अपने निवास-अनुमतिपत्र (रेज़िडेन्स परमिशन) का नवीनीकरण कराने विदेश विभाग जाना पड़ा। इस बार वहाँ के अफसर ने मुझसे लिखवा लिया है कि मैं जल्द से जल्द कोई जर्मन कोर्स लेकर जर्मन भाषा सीख लूँगा। ऐसी हालत में आप कुछ नहीं कर सकते-वे बिना कोई सवाल पूछे मेरे सामने मेरा निवास-अनुमातिपत्र रखते हैं, क्योंकि मेरी पत्नी और बेटी जर्मन नागरिक है, लेकिन फिर दस्तखत करने के लिए एक कागज भी सामने कर देते हैं जो एक तरह का इकरारनामा होता है कि मैं तुरन्त कोई न कोई जर्मन भाषा का कोर्स पूरा करूंगा। वैसे मुझे उनकी बात उचित ही लगती है क्योंकि जर्मन पत्नी और जर्मन बेटी के साथ जर्मनी में ही रहना है तो जर्मन भाषा तो आनी ही चाहिए। इसलिए उनके छोटे-मोटे तंज़ पर उन्हें माफ कर देना ही उचित समझता हूँ। 🙂

उन्होंने मुझे जर्मन सीखने की फीस में डिस्काउंट भी दिया है। परिस्थितिवश जब हम भारत वापस आए तो मैंने तुरंत दिल्ली जाकर मैक्समुलर भवन स्थित गेटे इंस्टीट्यूट में 14 जुलाई 2013 से जर्मन भाषा सीखने के लिए दाखिला ले लिया।

मैंने उनका "मिश्रित जर्मन कोर्स" लिया है जिसका एक हिस्सा दिल्ली जाकर ही सीखना होगा और कुछ ऑनलाइन उपलब्ध होगा। इससे मुझे घर बैठे सीखने की सुविधा रहेगी। रमोना भी मुझे रोज़ इस काम में मदद कर रही है और मैं समझता हूँ कि मैं धीरे-धीरे प्रगति कर रहा हूँ।

इंस्टीट्यूट में ग्यारह लोगों का एक छोटा सा समूह है और मैं कह सकता हूँ कि इस उम्र में स्कूल जाना, बचपन में स्कूल जाने से बहुत भिन्न अनुभव है। मैं अपनी शिक्षिका से बहुत खुश हूँ और घर में मैंने सबको बताया कि क्यों वह मुझे इतना पसंद है: वह हम पर चिल्लाती-चीखती नहीं है, वह कभी गुस्सा नहीं करती और न डांटती-डपटती है। उसमें बड़ा संयम है और वह हम सबसे बड़े आदर और शिष्टाचार के साथ बात करती है और सबसे बड़ी बात यह कि वह हमारी पिटाई नहीं करती! 😀

‘रौंग नंबर, हनी!’ जब अमरीकी और जर्मन संस्कृतियाँ टकराती हैं तो यही होता है 17 जुलाई 2013

जब हम जर्मनी में थे तब अपने एक मित्र और उसकी एक अमरीकी गर्लफ्रेंड से मिले जो कुछ समय पहले ही अमरीका से जर्मनी आकर बस गई थी। वह पहले भी जर्मनी में रह चुकी थी मगर अब, जब कि वह स्थायी रूप से यहाँ रहने वाली थी, उसे दोनों संस्कृतियों में बहुत बड़ा अंतर दृष्टिगोचर हुआ। और एक बात तो ऐसी हुई कि हम हँस-हँसकर लोट-पोट हो गए। कई बार ऐसा महसूस होता है कि दो संस्कृतियाँ एक दूसरे के अनुरूप हो ही नहीं सकतीं।

हमारी अमरीकी मित्र एक ट्रेन पकड़कर जर्मनी में ही एक शहर से दूसरे शहर जा रही थी। एक कतार में टिकिटों की जांच करता हुआ टिकिट-चेकर उसके पास भी आया। जैसा कि वह अमरीका में करती रही होगी, मित्र ने अपना टिकिट दिखाया और टिकिट-चेकर से पूछा, हाय, आप कैसे हैं? टिकिट-चेकर ने टिकिट लिया, चेक करके उसे वापस किया और भुनभुनाता हुआ आगे बढ़ा: अपने काम से काम रखो, मिस!

यह दो संस्कृतियों के अंतर और उनके बीच संघर्ष का एक बेहतरीन नमूना था। अगर मुझे थोड़ा सामान्यीकरण करने की इजाज़त दी जाए तो मैंने पाया है कि अमरीकन, जो भी मिलता है या जो भी उन्हें आसपास दिखाई देता है, उससे 'आप कैसे हैं' पूछकर उसका अभिवादन करते हैं। जब हम अमरीका में थे तब हमने भी यह बात नोटिस की थी। आप सुपर मार्केट में हों और किसी गलियारे से गुज़र रहे हों तो अचानक एक व्यक्ति, जो दरअसल शेल्फ में सामान जमाने में व्यस्त है, आपसे मुसकुराते हुए अवश्य पूछेगा, 'गुड मॉर्निंग सर, आप कैसे हैं'। आप उसे जानते नहीं हैं, बल्कि पहली बार मिल रहे हैं; फिर आप उसे क्यों बताएँगे कि रात भर आपको मच्छर काटते रहे और आप बिल्कुल सो नहीं पाए हैं और अभी यहीं फर्श पर आपकी सोने की इच्छा हो रही है!

रमोना, जोकि जर्मन है, एक बार अमेरिका में बड़ी विस्मित हुई जब उसने एक नंबर डायल किया और जिसने उठाया उसकी आवाज़ से वह परिचित नहीं थी। उसने उस महिला के बारे में पूछा जिससे वह बात करना चाहती थी कि क्या वह महिला वहाँ है? उधर से जवाब आया, 'रोंग नंबर हनी!' रमोना की नज़र में किसी अपरिचित का यह कहना कुछ ज़्यादा ही अंतरंग बात थी और वह स्तब्ध रह गई। मेरे मित्र का नंबर आपसे मिलता जुलता है तो आप मेरी इतनी आत्मीय नहीं हो गईं कि मुझे 'हनी' कहने लगें!

तो किसी जर्मन के लिए 'आप कैसे हैं' सुनना हमेशा ही एक मज़ेदार अनुभव होगा लेकिन किसी अमरीकन के लिए जवाब में 'अपने काम से काम रखो' जैसी कड़ुवी बात सुनना बहुत ही दुखद और अपमानजनक हो सकता है। आखिर वह तो बिचारा बहुत अपनेपन से यह कह रहा था। जर्मन नज़रिये से यह अनौपचारिकता, अपनी सीमा का बेजा उल्लंघन है।

नतीजा यह हुआ है कि अमरीकी जरमन्स को बहुत अंतर्मुखी, औपचारिक और अ-मित्रवत समझते हैं। आप जर्मनी की किसी सड़क पर झूमते, हँसते-गाते निकलें और दूसरे आने-जाने वालों की आँखों में चाहें कि थोड़ी सी खुशी या हल्की सी मुस्कुराहट भी दिखाई दे जाए तो आप निराश हो जाएंगे। बहुत संकोच के साथ ज़रा सी हरकत होगी। लोग आपके परे देखेंगे या ज़मीन पर। कोई अगर आपकी तरफ गलती से देख ले तो आपको मुसकुराता देखकर आश्चर्य में पड़ जाएगा, सोचेगा, अगर यह पागल नहीं है तो इस तरह हंस क्यों रहा है!

ये दोनों विवरण कुछ ज़्यादा ही सामान्यीकृत हो गए हैं। हर अमरीकी किसी अजनबी के गले नहीं लग जाता और न ही हर जर्मन इतना संकोची या तुनकमिजाज होता है कि अजनबी से बात करने से ही कतराए। फिर भी इसमें थोड़ी सी सच्चाई भी है कि ये चारित्रिक विशेषताएँ अमरीकनों में और जर्मनों में आम तौर पर पाई जाती हैं।

जब तक ऐसी मज़ेदार बातें होती रहेंगी, जैसी मेरी अमरीकी मित्र के साथ हुई थी, तब तक लोग अपने इस व्यवहार पर गौर करते रहेगे और यह बात हमेशा अच्छी ही सिद्ध होगी।