जर्मनी में हमारी मौज-मस्ती – 29 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपनी पत्नी और बेटी के साथ जर्मनी में बिताए दूसरे सप्ताह का विवरण लिख रहे हैं। उनके रोमांचक अनुभवों के बारे में यहाँ पढ़ें!

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अपरा जर्मनी में अपने जीवन की प्रथम बर्फ़बारी का भरपूर आनंद ले रही है – 23 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि जर्मनी में बर्फ़बारी हुई तो अपरा ने किस तरह उसका भरपूर आनंद लिया क्योंकि जीवन में पहली बार उसने गिरती हुई बर्फ देखी और उसका अनुभव लिया था!

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दोस्तों और अपरा के साथ जर्मन रोमांच! 22 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि वे और उनका परिवार अपने जर्मनी दौरे में पिछले हफ्ते क्या करते रहे हैं।

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जर्मनी जाने की तैयारियाँ – 12 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु परिवार सहित जर्मनी प्रस्थान से पहले के आखिरी एक दिन का विवरण लिख रहे हैं।

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उत्सव – पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों का आईना – 23 अक्टूबर 2014

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि जर्मनी में मनाए जाने वाले उत्सव समारोहों की तुलना में भारत के उत्सव किस तरह भिन्न होते हैं।

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किस तरह धारा-प्रवाह जर्मन बोलकर अपरा ने हमें विस्मित कर दिया! 9 जून 2014

स्वामी बालेंदु अपने जर्मनी प्रवास के पहले तीन सप्ताह का विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं। जर्मन भाषा सीखने में अपरा की तेज़ प्रगति के बारे में यहाँ पढिए!

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जर्मनी की चुनाव-प्रक्रिया भारत की तुलना में अधिक न्यायपूर्ण और जनतान्त्रिक क्यों है! 21 मई 2014

स्वामी बालेंदु भारत और जर्मनी की मतदान प्रक्रिया का संक्षिप्त वर्णन करते हुए बता रहे हैं कि क्यों इस साल भारत में हुए चुनावों के परिणाम जर्मनी में होते तो बहुत अलग दिखाई देते।

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दो भिन्न संस्कृतियों से आए दम्पतियों को किस तरह बीच का रास्ता निकालना होता है- 16 अक्तूबर 2013

स्वामी बालेंदु एक उदाहरण देकर समझा रहे हैं कि क्यों दो भिन्न संस्कृतियों से आए दंपतियों को अपनी आदतों और जीवन-शैलियों में संतुलन लाने की आवश्यकता पड़ती है।

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जर्मन भाषा सीखने के लिए 30 साल बाद फिर से ‘स्कूल चले हम!’- 5 अगस्त 2013

स्वामी बालेंदु इस उम्र में स्कूल में दाखिला लेने का कारण स्पष्ट कर रहे हैं। उनके जर्मन भाषा सीखने के प्रयासों और अनुभवों के बारे में यहाँ पढिए।

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‘रौंग नंबर, हनी!’ जब अमरीकी और जर्मन संस्कृतियाँ टकराती हैं तो यही होता है 17 जुलाई 2013

स्वामी बालेंदु उदाहरण देकर बता रहे हैं कि जब अमरीकी और जर्मन्स मिलते हैं और अपनी-अपनी संस्कृतियों की चर्चा करते हैं तो हमेशा मज़ेदार स्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं।

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