भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते हम अपने स्कूल को विकसित नहीं कर पा रहे हैं – 11 मई 2015

पिछली एक मई हमारे स्कूल के इस स्कूली सत्र का आखिरी दिन था। बच्चे अपने अभिभावकों के साथ स्कूल आए, परीक्षाफल प्राप्त किए और नमस्कार करके चले गए। उनमें से अधिकतर अब जुलाई से पढ़ाई शुरू करेंगे लेकिन इस वर्ष से हमारी सबसे ऊँची तीन कक्षाओं के विद्यार्थी स्कूल में नहीं लौटेंगे। इसी विषय में कुछ बातें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।

आप जानते होंगे कि पिछले स्कूली सत्र में हमारे यहाँ दो पूर्व-प्राथमिक कक्षाएँ हुआ करती थीं और उसके बाद एक से सात तक की कक्षाएँ। उस वक़्त तक हमारे यहाँ इतनी ही कक्षाएँ थीं। कुछ साल पहले अपने बच्चों को 5वीं तक पढ़ाने के बाद, उनकी पढ़ाई आगे भी जारी रह सके, इसलिए हम 8वीं तक का स्कूल खोलना चाहते थे और उसके लिए हमें ‘जूनियर हाई स्कूल’ शुरू करने की अनुमति प्राप्त करनी आवश्यक थी।

हमने कुछ लोगों से संपर्क किया और हमें बताया गया कि हम 6ठी कक्षा शुरू कर दें और इस दौरान आगे की कक्षाएँ शुरू करने हेतु आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया भी शुरू कर दें। इस तरह हमने आवश्यक फॉर्म्स भरकर संबंधित अधिकारी के कार्यालय में आवेदन किया और 6ठी कक्षा की पढ़ाई भी शुरू करवा दी।

कई महीनों तक फोन पर बातचीत, संबंधित कार्यालयों के चक्कर और दौड़-भाग और उचित लोगों से संपर्क, इतना सब हम इस बीच लगातार करते रहे। हम विभिन्न कार्यालयों के चक्कर काटते रहे और धीरे-धीरे हमारी फाइल आगे बढ़ती रही। लेकिन इतने प्रयासों के बावजूद वास्तव में काम कुछ नहीं हुआ! जैसे-जैसे समय बीतता गया हम परेशान हो गए और हमने संबंधित लोगों से इस काम को अंजाम तक पहुँचाने की गुजारिश की। बार-बार हमसे रिश्वत के तकाजे किए जाते थे। हमसे कहा गया कि अगर हम कुछ रकम, जो वास्तव में काफी बड़ी रकम थी, उन्हें रिश्वत के रूप में दे दें तो न सिर्फ काम हो जाएगा बल्कि काफी जल्दी हो जाएगा।

हमने कई लोगों को बताया कि हम इतनी बड़ी रकम रिश्वत के रूप में नहीं देना चाहते। हमारा स्कूल कोई सामान्य स्कूल नहीं है। अपना स्कूल हम किसी व्यवसाय की तरह नहीं चलाते, हम इससे पैसे नहीं कमा रहे हैं और सबसे बड़ी बात शिक्षा का व्यापार नहीं कर रहे हैं, उसे बेच नहीं रहे हैं! हमारा स्कूल एक चैरिटी स्कूल है, हम अपने बच्चों से फीस नहीं लेते और सिर्फ गरीब बच्चों की मदद करने के लिए हमने स्कूल खोला हुआ है। हम सरकार से भी एक पैसा नहीं लेते-न तो बच्चों की पढ़ाई के लिए और न ही उनके भोजन की व्यवस्था हेतु। हम व्यापार भी करते हैं तो सिर्फ अपनी चैरिटी संबंधी योजनाओं में मदद हो सके, इस उद्देश्य से। किसी भी बच्चे को स्कूल आने के लिए एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता। हमारे अपने प्रायोजक हैं, दानदाता हैं, मददगार हैं लेकिन इसके बावजूद स्कूल चलाने के लिए हमें व्यापार करने की भी आवश्यकता होती है।

भ्रष्ट भारत में रिश्वत के बिना आप कुछ नहीं कर सकते! जब तक सही व्यक्ति को अनाधिकारिक पैसे नहीं दे दिए जाते, कुछ नहीं हो सकता। इस क्षेत्र के माहिर, दलाल और एजेंट बताते हैं कि रिश्वत के अलावा सिर्फ एक ही तरीके से हमारा काम हो सकता है: कोई पहुँच, किसी महत्वपूर्ण राजनेता की सिफारिश ही यह काम करवा सकती है। हमारे पास ऐसी कोई पहुँच नहीं थी।

हमने एक बार यह भी सोचा कि स्टिंग ऑपरेशन किया जाए और उनके भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए उनकी रिश्वत की मांग को रिकार्ड कर लिया जाए। लेकिन हमारे शुभचिंतकों ने आगाह किया कि ये लोग काफी दबंग लोग होते हैं और उनकी सरकार में भीतर तक पहुँच होती है, जहाँ वे अपने बचने का रास्ता भी निकाल लेंगे और बाद में आपसे जीवन भर बदला लेते रहेंगे-यहाँ तक कि हम पर ही गलत आरोप लगाकर ऐसी हालत पैदा कर देंगे कि हम इस विचार के लिए हमेशा पछताते रहेंगे।

बिल्कुल नहीं। हम रिश्वत नहीं देना चाहते। इसलिए हमने सोचा कि वैसे भी 8वीं कक्षा के बाद हमें अपने बच्चों को किसी दूसरे स्कूल में 9वीं और 10वीं की पढ़ाई के लिए भेजना ही पड़ता तो उसी तरह 5वीं कक्षा के बाद से ही भेजते रहेंगे। हम उनकी फीस अदा करते रह सकते हैं और दूसरी मदद भी करते रह सकते हैं-और उनकी जगह छोटे बच्चों को अधिक संख्या में अपने स्कूल में पढ़ा सकते हैं और उन्हें बिल्कुल बुनियादी पढ़ाई अधिक बेहतर ढंग से करवा सकते हैं!

तो इसलिए हमने स्कूल की बिल्कुल बुनियादी पढ़ाई हेतु इस वर्ष ज़्यादा बड़ी संख्या में छोटे बच्चों को प्रवेश देने की योजना बनाई है और अपने बड़े बच्चों की अगली पढ़ाई हेतु किसी उपयुक्त स्कूल की तलाश भी शुरू कर दी है। ऐसे स्कूलों की खोज में आने वाली दिक्कतों के बारे में कल मैं आपको बताऊँगा!

स्वतंत्र और भ्रष्टाचार-मुक्त मीडिया का स्वप्न – ‘इंडिया संवाद’ – 23 मार्च 2015

आजकल मेरे जीवन में कुछ नया और अनोखा घटित हो रहा है और उसमें मैं व्यक्तिगत रूप से संलग्न हो चुका हूँ: मैंने कुछ लोगों के एक समूह से जुड़ने का, उसका हिस्सा बनने का फैसला किया है, जो एक नया, भ्रष्टाचार-मुक्त समाचार चैनल शुरू करने की परिकल्पना के साथ काम करने में जुटा हुआ है। यह समाचार चैनल सामान्य लोगों के लिए, सामान्य लोगों द्वारा संचालित किया जाएगा।

मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है। मीडिया समाज में, लोगों के जीवनों में, वास्तव में जीवन के हर पहलू में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है! मीडिया लोगों का अभिमत तैयार करता है, उनकी समझ विकसित करता है, उनके दिमागों को प्रभावित करता है और फिर उसी आधार पर वे अपने निर्णय लेते हैं। किसी विषय में ये निर्णय सकारात्मक भी हो सकते हैं और नकारात्मक भी! और स्वाभाविक ही जब वे लोग, वे कंपनियाँ या वे संगठन जो मीडिया केंद्र चलाते हैं, स्वार्थी हो जाएँ और अपने प्रभावों का इस्तेमाल समाज की भलाई के लिए नहीं बल्कि अपने निजी लाभ के लिए करते हैं तो परिणाम बहुत बुरे होते हैं!

यह मैंने अमरीका में होता हुआ सुना है और हम सब यहाँ भारत में साफ-साफ होता हुआ देख ही रहे हैं: सिर्फ गिने-चुने कुछ लोग हैं जो मीडिया को नियंत्रित करते हैं और अपने स्वार्थ के लिए उसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका मकसद लोगों को समाचार देना या उनकी जानकारी में वृद्धि करना नहीं होता बल्कि वे पहले अपना लाभ देखते हैं और फिर उसके अनुसार ही निर्णय लेते हैं कि किसी खास समाचार या जानकारी को जनता तक पहुँचाना है या नहीं।

भारत के पिछले आम चुनाओं में यह बिल्कुल स्पष्ट दिखाई दिया था: देश के सबसे बड़े कार्पोरेट घराने भाजपा के समर्थन में उतर आए थे। वास्तव में इन कार्पोरेट घरानों ने भाजपा के लिए खूब पैसा खर्च उँड़ेला था जिसे वे प्रेस और मीडिया घरानों के ज़रिए बार-बार अपने विज्ञापन प्रसारित करवाने में और भाजपा और मोदी की खबरें प्रसारित करवाने में करते थे। इन कार्पोरेट घरानों ने पैसे के बल पर अर्जित अपने दूसरे प्रभावों का इस्तेमाल भी मीडिया को भाजपा के पक्ष में मोड़ने के उद्देश्य से किया था। और अंततः देश में टीवी विज्ञापनों वाली सरकार बन गई।

चुनावों के बाद मीडिया के इस व्यवहार की कड़ी आलोचना भी हुई-विशेष रूप से सोशल मीडिया में, जहाँ हर कोई अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र और सक्षम होता है। दरअसल ऐसा लग रहा था जैसे देश में कोई नैतिकता बची नहीं रह गई है, सब कुछ सिर्फ पैसे का खेल है। और स्पष्ट हो चुका है कि क्या चल रहा है:’नेटवर्क 18’ खरीदकर मुकेश अंबानी देश के सबसे बड़े मीडिया नेटवर्कों में से एक का मालिक बन चुका है और अब वह एक और चैनल खरीदने जा रहा है, सन टीवी! अब वह कुछ समाचारों को प्रसारित करने हेतु पैसा देगा और कुछ के लिए नहीं। सरकार के पास कार्पोरेट घरानों को लाभ पहुँचाने के कई तरीके होते हैं और मोदी के समर्थन में जो पैसा अंबानी ने निवेश किया था, उसे अब वह कई तरीकों से सरकार से वसूल करेगा।

ऐसा लगता है जैसे पैसा ही दुनिया को चला रहा है। जो पैसा खर्च कर सकते हैं वे मीडिया का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर सकते हैं और जनता क्या देखे तथा क्या न देखे, इस बात का निर्णय कर सकते हैं। गरीबों के लिए यहाँ कुछ भी नहीं है। उनकी तकलीफ़ें, उनकी समस्याएँ, उनकी आहें, उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है।

बड़े-बड़े प्रसिद्ध मीडिया घरानों में उच्च पदों पर आसीन कई पत्रकार देख रहे थे कि क्या चल रहा है। पैसा ही हर बात का फैसला कर रहा था: जो समाचार उनके सामने रखा हुआ है, उसका प्रसारण किया जाना है या नहीं, इसका फैसला भी। यह उनकी पत्रकारीय नैतिकता को ठेस पहुंचाने वाली बात थी, पत्रकार के रूप में यह उनके लिए बेहद अपमानजनक था। उनकी निगाह में यह अनैतिक था, यह सब करने वे पत्रिकारिता के क्षेत्र में नहीं आए थे। वे उद्विग्न थे और उनमें से कुछ ने अच्छे-खासे वेतन वाली अपनी नौकरियाँ छोड़ दीं और एक नया ध्येय, एक नया और अलग स्वप्न लिए वहाँ से बाहर निकल आए:

वे अब एक ऐसा मीडिया चैनल शुरू करने का विचार कर रहे हैं जो इन सब समस्याओं से मुक्त हो। क्या हम कोई ऐसा मीडिया केंद्र विकसित कर सकते हैं जो किसी विशेष राजनैतिक पार्टी या कार्पोरेट घराने की मिल्कियत न हो और न ही उनसे प्रभावित हो बल्कि जनता उसकी मालिक और कर्ता-धर्ता हो? वास्तविक पत्रिकारिता के लिए समर्पित, तटस्थ और जिसे खरीदा न जा सके, ऐसा ईमानदार, पत्रकारिता के उच्च आदर्शों के लिए समर्पित, तटस्थ मीडिया केंद्र?

इस विचार के बारे में मुझे ऑनलाइन पता चला और जब मैंने इस योजना का समर्थन करने की इच्छा व्यक्त की तो उन्होंने मुझसे संपर्क किया। मुझे लगता है कि यह आवश्यक है-विशेष रूप से मीडिया के साथ मेरे कई निराशाजनक अनुभवों के बाद। वह एक और कहानी है जिस पर मैं बाद में कभी चर्चा करूँगा। बहरहाल, मैं उनके प्रयासों में शामिल हुआ और हम आपस में कई बार मिले भी।

तो चैनल की स्थापना और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए अब एक सार्वजनिक ट्रस्ट कायम हो चुका है। हमारा मुख्य आदर्श यह है कि वह भ्रष्टाचार विरोधी और भ्रष्टाचार से मुक्त चैनल हो। हमारी दूसरी मीटिंग में मैंने कहा कि सामान्य जनता, जिनका यह चैनल होगा, न सिर्फ समाचारों के उपभोक्ता हों बल्कि स्वयं संवाददाता भी हों! वे सब लोग, जो सामान्य परिस्थितियों में अपना जीवन गुज़ार रहे हों और जिनके पास भले ही पत्रकारिता में कोई डिप्लोमा न हो। अपने आसपास व्याप्त भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने का उनमें हौसला होना चाहिए।

इस ट्रस्ट और इस मिशन का नाम होगा, ‘इंडिया संवाद’ और आज, भगत सिंह के शहीदी दिवस, 23 मार्च, 2015 के दिन हमने ‘www.indiasamvad.co.in’ नाम से अपनी वेबसाइट लांच कर दी है। अभी इसकी यह पहली झलक भर है और समय के साथ इसे और विकसित किया जाएगा तथा हिन्दी में भी शुरू किया जाएगा। शुरू से ही सामान्य लोगों के लिए इसमें यह सुविधा उपलब्ध की गई है कि वे अपने समाचार साइट पर साझा कर सकें और हम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को इससे जोड़ने के लिए कटिबद्ध हैं-इस वेबसाइट पर, फेसबुक पेज पर और फेसबुक ग्रुप बनाकर। स्वाभाविक ही हम लगातार तब तक इस प्रयास में लगे रहेंगे जब तक कि एक नए समाचार चैनल की स्थापना नहीं कर लेते- जनता द्वारा, जनता के लिए!

और क्योंकि समाचारों को प्रसारित करना या न करना पैसे पर निर्भर नहीं होगा इसलिए हमारे पास इतनी क्षमता और इतना हौसला होगा कि हर तरह के सच्चे, ईमानदार और जनता से जुड़े हुए समाचार हम प्रसारित कर सकें और दिखा सकें कि वास्तव में देश में क्या चल रहा है और देश में जो कुछ भी हो रहा है उसकी वास्तविकता उजागर कर सकें!

मैं इस विचार को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहता हूँ और उनका समर्थन और सहयोग प्राप्त करना चाहता हूँ। कृपया इस ग्रुप से जुड़िये, उनकी साइट पर जाकर पढ़िए, अपने समाचार साझा कीजिए और जो भी मदद आप करना चाहें, कर सकें, करें। मेरा विश्वास है कि यह देश के लिए बहुत अच्छा होगा कि जनता को असली समाचार, व्यापक बहुमत के समाचार जानने का मौका मिले, न कि मुट्ठी भर सत्ताधारी, धनाढ्य और संपन्न लोगों के समाचार।

भारत के निजी स्कूल किस तरह शिक्षा को भ्रष्ट व्यापार में तब्दील किए दे रहे हैं! – 26 मार्च 2014

भारत के निजी स्कूलों के बारे में अपने खयालात के इज़हार के साथ मैंने निजी स्कूलों पर जारी इस श्रृंखला की शुरुआत की थी, जिसमें मैं आपको वहाँ अपनाई जाने वाली लम्बी, उबाऊ और श्रमसाध्य प्रवेश-प्रक्रिया के बारे में बता चुका हूँ लेकिन जिस विषय पर मैंने अभी सिर्फ संक्षिप्त टिप्पणी की है वह दरअसल सबसे बड़ी समस्या है और हमेशा की तरह वह है पैसा! दरअसल, शिक्षा बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है! एक विशाल, भ्रष्ट व्यापार!

हमें कई बार उन पश्चिमी मेहमानों की प्रतिक्रिया सुनने को मिलती है, जो भारत में माता-पिता द्वारा बच्चों की शिक्षा पर किये जाने वाले व्यय के बारे में सुनकर हैरान रह जाते हैं. जब हम उनसे कहते हैं कि हमारा स्कूल सिर्फ उन्हीं बच्चों के लिए है, जिनके माता-पिता उन्हें उन स्कूलों में भर्ती कराने में असमर्थ रहते हैं, जहाँ फीस ली जाती है तो वे आश्चर्य से पूछते हैं: ‘क्या? आपके देश में बच्चों की पढाई के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है?’

कई पश्चिमी देशों में शिक्षा पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता है। हो सकता है कुछ जगह किताबें-कापियां खुद खरीदनी पड़ती हों मगर स्कूलों में फीस या चंदे के रूप में प्रवेश शुल्क, परीक्षा शुल्क आदि वसूल नहीं किया जाता। भारत में स्थिति कुछ अलग है।

जी हाँ! यहाँ सरकारी स्कूल हैं, जो मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं- कम से कम यह उन्हें ऐसा करना चाहिए! वहाँ स्कूल फीस नहीं लगती और सरकारें लम्बे-चौड़े इश्तहार प्रकाशित करती हैं कि वहाँ बच्चों को शिक्षा के अलावा मुफ्त भोजन भी मुहैया कराया जाता है- लेकिन कटु वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा वहाँ प्रदान की जाती है वह अक्सर बिलकुल निरुपयोगी और घटिया होती है! वहाँ अक्सर शिक्षक पढ़ाने ही नहीं आते और जब आते भी हैं तो आपस में बैठकर गपशप करते रहते हैं। कई जगह स्कूलों का इस्तेमाल कबाड़ख़ाने की तरह किया जाता है और यहाँ तक कि जानवर बाँधने के लिए भी उनका इस्तेमाल होता देखा गया है! कहीं कहीं शिक्षक अपने किसी स्थानापन्न को स्कूल भेज देते हैं, जो कम पढ़ा-लिखा और अयोग्य होता है और जिसे वे अपनी पक्की, सरकारी तनख्वाह में से कुछ रुपया दे देते हैं। इस दौरान शिक्षक अपने किसी निजी व्यापार में लगे होते हैं और इस तरह एक साथ दो स्रोतों से पैसा कमाते हैं। यह है सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का हाल! किसी को कोई परवाह ही नहीं है!

स्वाभाविक ही अपढ़ माता-पिता भी, जो आर्थिक रूप से भी कमज़ोर होते हैं, इस स्थिति से अनभिज्ञ नहीं होते। उन्होंने जीवन में कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा मगर वे भी देखते-समझते हैं कि उनके लड़के-लड़कियां एक के बाद एक परीक्षाएं पास करते हुए अगली कक्षाओं में पहुँचते जा रहे हैं मगर अपने नाम तक लिख नहीं पाते। हिंदी में लिखा छोटा-मोटा वाक्य भी ठीक से पढ़ नहीं पाते!

इन अभिभावकों में से कुछ शिक्षा के महत्व को समझते हैं और चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे अधिक पढ़-लिख सकें- मगर उनके पास अपने बच्चों को किसी अच्छे निजी स्कूल में भेजने के लिए पर्याप्त रुपया नहीं होता। एक ऐसा स्कूल, जहाँ उन्हें वास्तव में पढ़ाया जाए! स्कूलों की वर्दियां और किताबें महँगी होती हैं, मासिक फीस बहुत अधिक होती है- 30 से 50 यू एस डॉलर यानी लगभग 2000 से 3000 रूपए तक! यह वह रकम है जो हमारे स्कूल के कई बच्चों के अभिभावक माह भर में कमा पाते हैं। वे किस तरह अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेज सकते हैं!

और सबसे मुख्य बात तो औपचारिक रूप से वितरित परिचय-पुस्तिकाओं में लिखा ही नहीं होता: अनौपचारिक प्रवेश-शुल्क, स्कूल को अनिवार्य रूप से दिया जाने वाला चन्दा, बच्चे को प्रवेश-प्रक्रिया में उत्तीर्ण कराने और उसका प्रवेश सुनिश्चित कराने के लिए दी जाने वाली रिश्वत! सामान्यतः यह रकम कुल मिलाकर 700 से 850 यू एस डॉलर यानी करीब 40 से 50 हजार रुपयों तक होती है। और अगर आप अपने बच्चे से प्रेम करते हैं और आपके लिए इतनी रकम खर्च करना सम्भव है तो आप यह सौदा मंज़ूर कर लेते हैं।

चंदे की शक्ल में इतनी बड़ी रकम अदा किये बगैर आप अपने बच्चे को किसी भी अच्छे स्कूल में दाखिल नहीं करवा सकते। हर व्यक्ति को इन स्कूलों में अपने बच्चों का प्रवेश सुनिश्चित करने के लिए यह रकम अदा करनी ही होगी। और इन स्कूलों का भ्रष्ट प्रशासन-तंत्र यह सुनिश्चित करेगा कि रकम सही हाथों में पहुँच जाए।

आपको बच्चों की किताबें और कापियां स्कूल से ही खरीदनी पड़ती हैं और हर किताब-कापी पर स्कूल को अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है। इसी तरह स्कूल से ही वर्दियां भी खरीदनी पड़ती हैं, जिनकी कीमत बाज़ार में उपलब्ध उन्हीं वर्दियों की कीमत से बहुत ज़्यादा होती है।

भ्रष्टाचार! पैसा! व्यापार! भारत में बच्चों की शिक्षा के साथ यही खिलवाड़ हो रहा है।

और निश्चय ही यह देश को और आने वाली पीढ़ियों को सुनहरे भविष्य की ओर ले जाने वाला रास्ता कतई नहीं है!

मंदिरों का धंधा – जितना ज़्यादा धन दो उतना ज़्यादा ईश्वर लो! 28 मार्च 2012

पिछले दिनों मैं आंध्र प्रदेश के तिरुपति में स्थित तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर के बारे में एक ऑनलाइन रिपोर्ट पढ़ रहा था, जिसमें मंदिर की गतिविधियों का, वहाँ पहुँचने वाले श्रद्धालुओं का और वहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया गया है। मेरे विचार में वहां चल रही गतिविधियाँ आम जनता को नाराज़ करने के लिए काफी होनी चाहिए मगर विडम्बना यह है कि शायद यह मंदिर देश का सबसे लोकप्रिय और धनी मंदिर है।

रोज़ लगभग 65000 श्रद्धालु इस मंदिर में प्रवेश करना और वहाँ ‘ईश्वर’ का दर्शन करना चाहते हैं। यह एक औसत आंकड़ा है जबकि सप्ताहांत में वहाँ दर्शन करने वालों की संख्या 80000 और धार्मिक त्योहारों के समय 100000 तक पहुँच जाती है। ये आंकड़े अविश्वसनीय लगते हैं और आप सोच सकते हैं कि जिस मंदिर में इतनी बड़ी संख्या में लोग पूजा-पाठ करते हैं वहाँ ईश्वर के दर्शन करना अवश्य ही एक अनोखा आध्यात्मिक अनुभव होता होगा। ईमानदारी से कहूँ तो मैं ऐसा कतई नहीं समझता।

वहाँ की यात्रा में सबसे पहले तो हर तरफ मौजूद विशाल भीड़ से आपको निपटना पड़ता है। जब भी आप वहां जाते हैं वहाँ असंख्य लोग होते हैं और जब आप दरवाजे से मंदिर के भीतर प्रवेश करना चाहते हैं तब समझ लीजिये कि आप एक लगातार आगे बढ़ती विशाल भीड़ से घिरे होंगे। इसलिए आपको भी लगातार आगे बढ़ते रहना है अन्यथा भीड़ आपको रौंदती हुई निकल जाएगी। मंदिर के कर्मचारी लगातार लोगों को आगे बढ़ते रहने की हिदायत देते रहते हैं, यहाँ तक कि फटकारते हैं, ठेलते रहते हैं, जिससे एक ही दिन में ज़्यादा से ज़्यादा दर्शनार्थी देवता का दर्शन कर सकें।

आप कल्पना कर सकते हैं कि इतने लोगों की ठेलती हुई भीड़ के बीच आप भी लगातार आगे बढ़ते हुए किस तरह शांतिपूर्वक बैठकर, अपने देवता की, जिसे आप ईश्वर मानते हैं, पूजा-अर्चना कर पाते होंगे! जी नहीं-अनुमानतः कोई भी श्रद्धालु देवता के सामने डेढ़ सेकंड से ज़्यादा टिका नहीं रह सकता, यानी उसे अपने ईश्वर को देखने का सिर्फ इतना समय ही मिल पाता है! क्या आप अब भी समझते हैं कि यह कोई विशिष्ट अनुभव हो सकता है? देवता का डेढ़ सेकंड का दर्शन क्या इतना बहुमूल्य हो सकता है कि उसके सामने पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को इतना कष्ट उठाना पड़े?

तो दर्शन का यह विशिष्ट सम्मान आपको अत्यंत कष्ट भुगतने के बाद ही प्राप्त हो पाता है! मंदिर के बाहर इतने ज़्यादा लोग लाइन लगाकर खड़े होते हैं कि अक्सर 15 से 20 घंटे धूप में खड़े-खड़े इंतज़ार करने के बाद ही मंदिर में प्रवेश करने का सौभाग्य मिल पाता है! लेकिन मंदिर प्रवेश की त्वरित सेवा भी वहाँ उपलब्ध होती है- बस, थोड़ा अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है! अक्सर मंदिरों में प्रवेश के लिए विभिन्न मूल्यों के टिकिट होते हैं और जितना ज़्यादा कीमती टिकिट आप खरीदेंगे उतना ही जल्दी आप दर्शन लाभ का सौभाग्य प्राप्त कर सकेंगे! जी हाँ, वहाँ मंदिरों में वे ईश्वर बेच रहे हैं! अगर आपके पास पैसा है तो आप ज़्यादा पैसा देकर ईश्वर तक शीघ्रतापूर्वक पहुँचने वाली कतार का टिकिट खरीद सकते हैं।

और अगर आपके पास कुछ ज़्यादा ही धन है तो आप बायपास से निकलकर और जल्दी ईश्वर के दर्शन का लाभ ले सकते हैं! और अगर आपके पास वीआईपी पास है तो फिर बिना लाइन लगाए आप सीधे अंदर प्रवेश कर सकते हैं! जी हाँ, यह मंदिर वीआईपी पास भी जारी करता है। ये पास गवर्नरों, मंत्रियों और दूसरे महत्वपूर्ण सरकारी मुलाजिमों के लिए जारी किए जाते हैं-और स्वाभाविक ही उनके लिए भी, जो एक करोड़ या ज़्यादा की विशाल रकम, जो लगभग 200000 यू एस डॉलर होती है, दान में देते हैं। सुबह और शाम के कुछ खास घंटे होते हैं, जब ईश्वर सिर्फ इन खास लोगों के लिए ही उपलब्ध होता है। साधारण श्रद्धालुओं को इंतज़ार करना पड़ता है, उस समय मंदिर उनके लिए मंदिर बिल्कुल बंद होता है। इस तरह स्पष्ट है कि ईश्वर उन श्रद्धालुओं पर ज़्यादा प्रसन्न रहता है, जिनके पास ज़्यादा धन है- वह उन्हें तुरत-फुरत दर्शन दे देता है और वह भी ज़्यादा समय के लिए भी। मंदिर और धार्मिक भवन धार्मिक व्यापार के केंद्र हैं और वहाँ के पंडे-पुजारी श्रद्धालुओं और आस्थावान लोगों को गाय समझते हैं, जिन्हें आसानी के साथ धन और दान-दक्षिणा हेतु दुहा जा सकता है, यहाँ तक कि टिकिट लगाकर भी।

श्रद्धालुओं को न सिर्फ घंटों लंबी कतारों में इंतज़ार करना पड़ता है बल्कि उन्हें मंदिरों में मौजूद हर तरह के भ्रष्टाचार का सामना भी करना पड़ता है। अपना प्रवेश-पत्र और रहने की जगह पाने के लिए वहाँ कुछ दफ्तरी कार्यवाहियों से गुज़रना होता है, जिन्हें एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भाग-दौड़ करते हुए आप स्वयं पूरा कर सकते हैं। संभव है आपको घंटों इन कार्यवाहियों में व्यस्त रहना पड़े और सफलता की कोई गारंटी भी नहीं। या फिर आप किसी बिचौलिये (एजेंट) की मदद लें, दुगना खर्च करें और शीघ्र ईश्वर के करीब पहुँच जाएँ! वह भी आपको टिकिट वहीं से लाकर देगा मगर कुछ ज़्यादा कीमत में और अब आपको उसका मेहनताना भी अदा करना होगा। क्या यहाँ मंदिरों में ईश्वर रोजगार पैदा कर रहा है या कि यह सीधी-सीधी श्रद्धालुओं की लूट-खसोट है?

सारांश यह कि: अगर आप औसत आय वाले एक सामान्य व्यक्ति हैं तो पहले तो आपको तपती धूप में भीड़ के साथ कतारबद्ध होकर 20 घंटे इंतजार करना होगा और फिर धक्के खाते हुए ईश्वर की मूर्ति तक पहुँचकर डेढ़ सेकंड उस पर एक नज़र डालकर धक्के खाते हुए ही बाहर निकल जाना होगा। अगर आप कोई वीआईपी, राजनीतिज्ञ या अधिकारी हैं या आपके पास दान देने के लिए बड़ी भारी रकम है तो फिर ईश्वर तुरत-फुरत आपका स्वागत करेगा। है कोई धर्म से बढ़कर आसान और लाभकारी धंधा?

मैं पहले भी इस मंदिर के विषय में लिख चुका हूँ। तब मैंने उसकी विशाल संपत्ति के बारे में बताया था, उसे दान में मिलने वाली विशाल राशियों का ज़िक्र किया था और यह भी बताया था कि इसी तरह के कई और मंदिर देश भर में फैले हुए हैं, जहां इसी तरह का भ्रष्टाचार और पैसे और ताकत का खेल चल रहा है। वे बड़ी-बड़ी राशियाँ दान में प्राप्त करते हैं, उनके पास टनों सोना-चाँदी तिजोरियों में बंद है और वहाँ के पंडे-पुजारी और कर्मचारी अक्सर बहुत धनवान होते है। लाखों की संख्या में लोग रोज़ वहाँ की यात्रा करते हैं और सोचते हैं कि वे अपना जीवन सफल कर रहे हैं, पुण्य-कार्य कर रहे हैं और उनके इस काम से सारे विश्व का भला होगा। लेकिन उनका यह कर्म दरअसल भ्रष्टाचार और अनाचार को बढ़ावा देने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। क्या आप नहीं समझते कि अगर आप यही समय, पैसा और ऊर्जा गरीबों और दीन-दुखियों की सेवा करने में, उनकी पढ़ाई-लिखाई या स्वास्थ्य-सुधार के काम में व्यय करते तो ईश्वर आप पर ज़्यादा प्रसन्न होता?

इन बातों का पर्दाफ़ाश करने वाली कुछ रिपोर्टों की लिंक्स यहाँ दी जा रही हैं:

21-hour wait for fleeting darshan of the Lord at Tirumala

Is Lord Balaji temple at Tirumala only for VIPs?

Corruption is a way of life in Tirupati Tirumala Devasthanams

गांधी को भूले अन्ना – अन्ना हजारे ने किया शराबियों को पीटने का समर्थन – 28 नवम्बर 11

अन्ना को आधुनिक महात्मा गांधी कहा जाता है। उनमें गांधी की छवि देखी जाती है। रामलीला मैदान में हुए अनशन के दौरान मंच पर लगी महात्मा गांधी की भव्य प्रतीमा इस बात की साक्षी है। पर गांधीवादी अन्ना के विचारों में द्वंद देखा गया। उन्होंने नशे के आदी लोगों को पीटने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि उनके गाँव में शराबियों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता था।

अन्ना हजारे ने कहा कि नशे के आदी लोगों को तीन बार चेतावनी देनी चाहिए कि, ये उनकी सेहत के लिए अच्छी नहीं है। अगर वो नहीं छोड़ता, तो उसे मंदिर में ले जाकर भगवान की कसम दिलानी चाहिए कि आज के बाद वो शराब को हाथ भी नहीं लगाएगा। इस पर भी वो न माने, तो सार्वजनिक स्थान पर एक खंभे से बांधकर उसकी पिटाई की जानी चाहिए।

ये वही शख्स है जिनमें लोगों ने अहिंसावादी महात्मा गाँधी की छवि देखी थी। यह शराबियों के लिए हिंसा की बात कर रहे हैं। कांग्रेस और बीजेपी अभी तक कह रहे थे कि हम अन्ना के खिलाफ नहीं हैं। अन्ना के इस बयान के बाद कह रहे हैं कि हम लोगों के साथ हिंसा का समर्थन नहीं करते। जो लोग अभी तक अन्ना हजारे के अभियान से डरे हुए थे, अब उन्हें एक अच्छा मुद्दा मिल गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि ये तालिबानी तरीका है। अगर इस तरीके को लागू किया गया तो आधा केरला, तीन चौथाई आंध्र प्रदेश और लगभग चौथे-पाँचवें पँजाब के भाग को पीटा जाएगा। मेरा मानना है अन्ना को गाँधी के रूप में देखने की छवि अब पूरी तरह धूमिल हो गई है।

मैं अपने लेखन के माध्यम से लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही लड़ाई में शामिल था। मैंने अन्ना को पत्र लिखा। मनमोहन सिंह को पत्र लिखा और लोगों से अपील की कि अन्ना को न रोके। हमें आज भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर चलना है। हालांकि मैंने शुरु से ही कहा है कि किसी इंसान को पूजना ठीक नहीं है, भ्रष्टाचार को समाप्त करने पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। यहां गौर करने वाली बात है कि अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के मुद्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए थे। मैंने उनमें अहम भी देखा। मीडिया भी मुद्दे पर ध्यान देने के बजाय अन्ना हजारे पर ध्यान दे रही थी। मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही लड़ाई के साथ था न कि किसी व्यक्ति के साथ। मैं उनके बयान का समर्थन नहीं करता।

उन्होंने उन सभी लोगों को निराश किया है जो उनको धर्मात्मा मानने लगे थे। अगर आप व्यक्ति से धर्मात्मा के रूप में कार्य की अपेक्षा करेंगे तो आप निराश ही होंगे। उन्होंने वही कहा है जो वो सोचते हैं। बेशक उन्होंने राजघाट पर बैठकर ध्यान किया था, लोग उनकी तुलना महात्मा गाँधी से करने लगे थे। क्या आपको लगता है कि महात्मा गाँधी कभी शराबी को पीटने के पक्ष में होते? शराबी वैसे ही कमजोर होते हैं। उनकी लत की वजह से उनको पीटकर या समाज में डराकर प्रताड़ित करने से समस्या का हल नहीं निकलेगा। आपको ये समझना होगा कि वो कैसे इसका आदी हुआ। आप उसकी समस्या समझ जांएगे तो उसके लिए कुछ कर भी सकते हैं। जबकि हिंसा इस मामले में कोई सहायता नहीं कर सकती। जो लोग नशा छोड़ना चाहते हैं उन्हें अन्ना ने ध्यान करने को कहा होता तो अच्छा होता।

एक ओर अन्ना ने राष्ट्रीय समस्याओं और उनके हल के बारे में बात की तो दूसरी ओर नशे के आदी लोगों के लिए हिंसा का समर्थन किया। गाँव में समस्याओं से निपटने का यही तरीका रहा है। गाँव की अदालत में कुछ गिने-चुने लोग सजा सुना देते हैं। इन सजाओं में ज्यादातर पीटना शामिल होता है। आधुनिक समय में यह तरीका ठीक नहीं बैठता। अन्ना ने इस बयान के बाद अपनी प्रतिष्ठा खो दी है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जाने वाली जंग अब समाप्त हो गई है। क्योंकि ये अन्ना हजारे की बात नहीं थी। लोग और मीडिया उन्हें मुक्तिदाता के रूप में देखे इससे भी फर्क नहीं पड़ता। मुद्दा है भ्रष्टाचार, लोगों में क्षमता है कि वो एकजुट होकर फिर से उठें और इसे जड़ से समाप्त कर दें।

भारत में धर्म एक व्यापार है: यहाँ लाभ के लिए भगवान बना दिए जाते हैं! 5 सितंबर 2011

समाचारों के लिए मैं अखबार पढ़ता हूँ लेकिन कभी-कभी टीवी पर भी समाचार देख लेता हूँ। सन 2011 में चले अन्ना हज़ारे के आंदोलन को मैंने थोड़ा-बहुत टीवी पर देखा है। अन्ना हज़ारे स्टेज पर बैठे हैं और उनके सामने भीड़ जमा है और उनमें से कुछ लोग उनकी आरती उतार रहे हैं। यह तमाशा देखकर मुझे बड़ी हंसी आई। क्या अब अन्ना हज़ारे भी भगवान बन गए हैं? क्या उन्होंने लोगों से कहा है कि उनकी आरती उतारो? मुझे लगा, नहीं, वे नहीं चाहते; बल्कि वे इस तमाशे को देखकर झुँझला रहे होंगे। फिर लोग किसी व्यक्ति के न चाहते हुए भी उसके भक्त कैसे बन जाते हैं?

कुछ दिनों बाद मैंने अखबार में एक आलेख पढ़ा और मेरी आँखें खुल गईं: पूजा कराने के लिए अन्ना हज़ारे को साक्षात उपस्थित रहने की भी ज़रूरत नहीं है।

1 सितंबर के दिन देश भर में गणेश चतुर्थी मनाई गई। इस दिन, माना जाता है कि गणेश भगवान का जन्म हुआ था। हिन्दू बहुमत वाला देश होने के कारण भारत में यह त्योहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है और कई धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, गणेश की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं, जिन्हें विशाल पंडालों में सजाकर रखा जाता है और 10 दिन तक रोज़ उनकी पूजा की जाती है। पंडाल में ही बहुत पैसा खर्च करके विशाल झाँकियाँ सजाई जाती हैं और आसपास बहुत सी दुकानें लगी होती हैं, जिसमें खाने-पीने की वस्तुओं के अलावा कई फ़ैन्सी चीज़ें बिकती हैं। लोग बड़ी संख्या में इन झांकियों को देखने आते हैं और ख़रीदारी करते हैं। आलेख से पता चला कि इस बार गणेश के अलावा पंडालों में अन्ना हज़ारे की मूर्तियाँ और चित्र भी सजाए गए थे। रोज़ गणेश के साथ उनकी भी पूजा हो रही है, उनके नाम का प्रसाद बांटा जा रहा है! और निश्चय ही, वहाँ टीशर्ट बिक रहे हैं, जिन पर अन्ना हज़ारे के चित्र अंकित हैं और गांधी टोपियाँ भी।

मैंने हिन्दू धर्म के लचीलेपन का ज़िक्र पहले भी किया है और यहाँ आप पुनः देख सकते हैं कि उन्हें थोड़ा-बहुत बदलने में, कुछ नया करने में और अपने आयोजनों में, रस्मों-रिवाजों में और यहाँ तक कि कर्मकांडों में और पूजा-अर्चना में भी परिवर्तन करने में कोई परेशानी नहीं होती। पंडे-पुरोहित और आयोजक दरअसल एजेंट का काम करते हैं, धर्म उनका व्यापार है, ये टेंट और पंडाल उनकी दुकानें हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि आज बेचने के लिए वे एक नया सामान लेकर आए हैं: अन्ना हज़ारे! उन्हें अपनी आजीविका चलाने के लिए कोई न कोई काम करना होगा, कुछ न कुछ बेचना होगा और अगर वे अपने ग्राहकों को अन्ना हज़ारे की मूर्ति और उनके चित्रों से आकर्षित कर सकते हैं तो वे क्यों न करें! लेकिन मैं मानता हूँ कि यह मानव-पूजा है और पूरी तरह गलत और हानिकारक है।

मैं जानता हूँ कि बहुत से गुरु और स्वामी मानव-पूजा को प्रोत्साहित करते हैं, भले ही वे यह बात उतनी स्पष्टता से नहीं कहते, जितनी स्पष्टता से मैं कह रहा हूँ। इसी कारण मैं एक बाबा, बाबा रामदेव के राजनैतिक विचारों का विरोध करता हूँ। वे देश की राजनीतिक व्यवस्था बदलना चाहते थे, जिसमें इस वक़्त संसद के पास राष्ट्रपति की तुलना में ज़्यादा अधिकार हैं। वे चाहते थे कि अमरीकी व्यवस्था की तरह भारत में भी राष्ट्रपति के पास ज़्यादा अधिकार हों। रामदेव राजनीतिक जीवन में आगे बढ़ते हुए एक दिन राष्ट्रपति बनना चाहते थे। आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर वे बन जाते हैं तो क्या होगा। भारत एक धार्मिक राष्ट्र है और बहुत से लोग धर्म और साधू-संतों को लेकर बहुत भावुक और कट्टर हो जाते हैं। अगर वे राष्ट्रपति बन जाते हैं तो उनकी ऐसी पूजा होगी जैसी पहले किसी की नहीं हुई होगी!

दुनिया भर के इतिहास में ऐसे उदाहरण इस बात को बार-बार रेखांकित करते हैं कि मानव-पूजा कभी भी लाभप्रद नहीं रही और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसे सैकड़ों नाम गिनाए जा सकते हैं लेकिन मुझे विश्वास है कि आप समझ रहे होंगे कि मैं क्या कह रहा हूँ और उनके नाम यहाँ लिखने की ज़रूरत नहीं है। अन्ना हज़ारे पहले ही ऐसे लोगों से घिरे दिखाई देते हैं, जो मानव-पूजा को प्रोत्साहित करते हैं और मुझे लगता है कि उन्हें बहुत सतर्क रहना चाहिए। वह उनके मकसद को ही कमजोर कर सकता है क्योंकि मानव-पूजा खुद ही एक भ्रष्टाचार है!

मुझे गलत मत समझिए। मैं इस पूजा के लिए अन्ना हज़ारे को दोष नहीं देता बल्कि उनके आसपास उन्हें घेरे हुए लोगों की बात कर रहा हूँ और उससे अधिक उन धन-पिपासु धार्मिक लोगों की, जो उनकी लोकप्रियता को भुनाकर पैसा कमाना चाहते हैं। ऐसा न करें! यह ठीक नहीं है और निश्चय ही वे ऐसा नहीं चाहते होंगे। अपनी पूजा कराने के लिए उन्होंने यह आंदोलन नहीं शुरू किया था। उन्हें अन्ना ही बने रहने दीजिए, ईश्वर मत बनाइए। वे भले व्यक्ति हैं और उन्हें एक भला इंसान ही बना रहने दें। उनकी पूजा न करें। उन्होंने आपको नींद से जगाया है, आपको एक अच्छे काम के लिए प्रेरित किया है और अब यह आपकी जिम्मेदारी है कि उस काम को अंजाम तक पहुंचाएँ। मैंने उनके समर्थन में एक पत्र भी लिखा था और एक पत्र प्रधानमंत्री को भी लिखा था कि अन्ना भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के महज एक प्रतीक हैं। यहाँ तक कि मैंने उनके विरोधियों से भी कहा था कि कृपा करके इस आंदोलन का समर्थन करें क्योंकि यह किसी व्यक्ति का आंदोलन नहीं है बल्कि देश को भीतर से खाए जा रहे भ्रष्टाचार के विरोध का आंदोलन है। अब यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि इस काम को आगे बढ़ाएँ। अगर आप सब कुछ उन्हीं पर छोड़ देंगे और इसे एक तरह का धर्म बना देंगे और उन्हें इस धर्म का ईश्वर मान लेंगे तो इस आंदोलन की मूल भावना का अंत हो जाएगा!

यह अच्छी बात है कि मीडिया भी इस आंदोलन का समर्थन कर रहा है और उसे अच्छा कवरेज दे रहा है। इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए मैं उनका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ लेकिन साथ ही यह भी कहना चाहता हूँ कि अब उन्हें शांति के साथ रहने दीजिए! आपको उनकी हर बात का बखान करने की ज़रूरत नहीं है, जैसे वे कोई दैवी शक्ति हों। वे कैसे नहाते हैं, कैसे खाते हैं आदि का ब्योरा देते रहेंगे तो आप लोगों के लिए एक साधु-महात्मा का प्रतिरूप गढ़ देंगे! वे धर्मगुरु नहीं हैं! आपने उनका समर्थन करके एक आंदोलन को मजबूत किया है मगर अब आपका कर्तव्य है कि ऐसा कोई काम न करें कि लोग उन्हें देवता या साधु-संत मानने लगें। मैंने उनका और उनके आंदोलन का समर्थन भ्रष्टाचार समाप्त करने के मकसद से किया था, उन्हें भगवान बनाने के लिए नहीं।