अत्यधिक सेक्स किस तरह एक रूखा अनुष्ठान बनकर रह जाता है – 2 दिसंबर 2015

पिछले दो दिनों में मैंने आपको बताया कि कि क्यों खुले सेक्स संबंध अक्सर सफल नहीं होते। उदाहरण स्वरूप मैंने आपको दो स्थितियों से अवगत कराया था और दोनों ही स्थितियों में संबंधों की असफलता का पहला कारण यह होता है: लोग सेक्स को एक तकनीक के रूप में देखते हैं, एक ऐसी क्रिया, जिससे मनोरंजन होता है, उसमें एक तरह का उत्तेजक आनंद प्राप्त होता है-और वे प्रेम को पूरी तरह भूल जाते हैं!

बहुत से लोग खुले संबंधों के विचार पर मोहित होकर उसे आजमाते हैं। फिर वे बहुत से भिन्न-भिन्न लोगों के साथ हमबिस्तर होने लगते हैं और संभोग में बुरी तरह लिप्त हो जाते हैं। कई बार वे अपने पार्टनर्स इतनी जल्दी-जल्दी बदलते हैं कि उन्हें याद तक नहीं रहता कि कल रात किसके साथ सोए थे। इन संबंधों में भावना नहीं होती, एहसास नहीं होता। तब सेक्स महज शारीरिक क्रिया भर बनकर रह जाती है, एक तरह का यांत्रिक अनुष्ठान, जिसे किसी तरह निपटाया जाना है। उसमें प्रेम नदारद होता है।

कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि हर बार किसी चीज़ की कमी रह गई है। वे समझने लगते हैं कि उन्हें वह प्राप्त नहीं हो रहा है, जिसकी खोज में वे यह सब कर रहे थे: किसी रिश्ते का असली मकसद हासिल नहीं हो पाता। किसी के साथ उस स्तर पर जुड़ाव, जो इतनी गहराई तक चला जाता है, जिसे शारीरिक संसर्ग छू भी नहीं सकता। उन्हें प्रेम नहीं मिल पा रहा है।

ऐसा हो भी नहीं सकता! अगर सेक्स सिर्फ अनुष्ठान है, यांत्रिक कर्मकांड है, जब इससे कोई फर्क न पड़े कि किसके साथ सेक्स संबंध बनाया जा रहा है और भले ही आप खुद अपने पार्टनर का चुनाव कर रहे हों लेकिन आप उन्हें बार-बार बदलते रहें तो आप उस पार्टनर से उस तरह नहीं जुड़ पाएँगे जिस तरह किसी एक के साथ दीर्घजीवी सबंध में जुड़ पाते हैं। और सेक्स को लेकर आपकी भावनाएँ भी समान नहीं होंगी, जैसी कि पहले प्रयोग के समय किसी एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में होती हैं।

आप सेक्स साझा कर सकते हैं, शारीरिक संसर्ग साझा कर सकते हैं और किसी अनुष्ठान में साथ-साथ शामिल हो सकते हैं लेकिन आप वही स्नेह, वही भावनाएँ और वही प्रेम साझा नहीं कर सकते जैसा एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में कर पाते हैं। प्रेम ही वह चुंबक है जो आपको और आपके पार्टनर को जोड़े रखता है। अक्सर लोग समझते हैं कि सेक्स वह गोंद है-लेकिन वास्तव में वह चुंबक सिर्फ और सिर्फ प्रेम है।

मेरे विचार में सेक्स भी महत्वपूर्ण है! जी हाँ, वह संबंधों के आवेग को घनीभूत कर देता है और दो व्यक्तियों को करीब लाने में महत्वपूर्ण स्थान अदा करता है। लेकिन सिर्फ तभी जब शारीरिक के अलावा एक दूसरा रिश्ता भी हो। आप किसी के साथ एक विस्मयकारी रात गुज़ार सकते हैं और नियमित रूप से उसके साथ यौनानुभव प्राप्त कर सकते हैं, जो आपकी शारीरिक जरूरतों को पूरी तरह संतुष्ट और आनंदित भी कर सकता है लेकिन इतना होने के बाद भी आप किसी चीज़ की कमी महसूस करते हैं।

यही 'कोई चीज़' प्रेम है। और मेरे विचार में इस गहरे प्रेम और लगाव को किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा करना असंभव है!

जब कभी भी कुछ भी ठीक होता नज़र नहीं आता क्योंकि संतुष्टि भीतर से आती है – 2 नवंबर 2015

कल मैंने सकारात्मक या नकारात्मक नज़रिए के बारे में संक्षेप में लिखते हुए बताया था कि कैसे वह आपके जीवन को प्रभावित कर सकता है या नहीं कर सकता। क्या कभी किसी ऐसे व्यक्ति से आपका सामना हुआ है जो इतना अधिक नकारात्मक है कि किसी भी स्थिति में संतुष्ट नहीं रह सकता? जहाँ तक मेरा सवाल है, मुझे कई बार ऐसे लोग मिले और मेरा दावा है कि उनके लिए आप कुछ भी कर लें, वे कभी संतुष्ट नहीं हो सकते-क्योंकि सकारात्मकता भीतर से आती है!

इसलिए स्वभाव से ही ऐसे लोग जीवन में किसी ऐसी वस्तु की तलाश में होते हैं जो उन्हें संतोष प्रदान कर सके। अपने व्यक्तिगत सलाह-सत्रों में मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूँ और समय-समय पर हमारे आश्रम के कई अतिथियों से भी। जो व्यक्ति किसी भी सेवा क्षेत्र के उद्यम से जुड़ा है, जानता होगा कि ऐसे लोग सबसे अक्खड़ और तकलीफदेह ग्राहक साबित होते हैं!

अब यह कोई ज़रूरी नहीं है कि ऐसे लोग भले व्यक्ति नहीं हो सकते, कि वे अक्सर बहुत कुत्सित या बुरे इंसान ही होते हों या आपका बुरा चाहने वाले हों या आपको ही बुरा व्यक्ति समझते हों! स्वाभाविक ही, ऐसे लोग भी हो सकते हैं लेकिन मैंने अक्सर देखा है कि यह कोई नियम नहीं है कि ऐसा ही हो! वास्तव में वे अपने स्वभाव से मजबूर होते हैं, वे भीतर से ही ऐसे होते हैं कि हर वक़्त शिकायत करते रहें, हर बात में नकारात्मकता की तलाश में रहें और किसी भी स्थिति में सुखी और संतुष्ट न हों!

उदाहरण के लिए, एक बार हमारे आश्रम में एक आस्ट्रेलियाई महिला आई, जो अपने पूरे मुकाम के दौरान कोई न कोई नकारात्मक बात ढूँढ़ती ही रहती थी। उसके यहाँ पहुँचते ही हमने उसकी यह आदत भाँप ली। क्योंकि मैं इत्तफाकन बाहर ही था, जैसे ही उसकी कार आश्रम पहुँची, मैंने ही उसका स्वागत किया। अधिकतर लोग लंबी यात्रा के बाद किसी ठिकाने लगने पर प्रसन्न ही होते हैं और सोचते हैं कि देखें, आगे क्या-क्या नया देखने को मिलता है लेकिन उसके साथ तत्क्षण मुझे प्रतीत हुआ कि यह महिला वैसी प्रसन्नचित्त महिला नहीं है-उसी पल मुझे उसके चेहरे पर यह लिखा दिखाई दे रहा था।

उसे खुश करने के लिए हमने वह सब किया, जो कर सकते थे-लेकिन उसे खुश करने में सफल नहीं हो सके। जब बाज़ार में वह साफ़-सफाई के सामान की दुकान खोज नहीं पाई तो उसे उसकी मर्ज़ी का सारा सामान उपलब्ध कराने से लेकर उसके संपूर्ण विश्रांति कार्यक्रम में परिवर्तन करने तक, हमने सब कुछ आजमाया मगर अफसोस…

मैं घटनाओं के विस्तार में नहीं जाना चाहता किंतु आप कल्पना कर सकते हैं-वे कोई महत्वपूर्ण मामले नहीं थे याकि ज़रूरी चीजें नहीं थीं, पहले किसी अतिथि को उनसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी और कुछ वस्तुएँ उसके देश में उपलब्ध उन्हीं वस्तुओं से सिर्फ देखने में अलग थीं और सिर्फ इसीलिए वे उसके काम नहीं आ सकती थीं।

मज़ेदार बात यह कि सिर्फ भारत में मौजूद परिस्थितियाँ ही उसकी परेशानी का सबब नहीं थीं या सिर्फ भारतीयों से ही उसे परेशानी नहीं थी! वास्तव में प्रकृति से ही उसे किसी भी बात से खुश न होने की आदत थी यानी यह उसकी स्वभावगत विशेषता ही बन गई थी। और इस स्वभाव में बाहर से कोई सुधार संभव नहीं था। आप कितनी ही खूबसूरत जगह चले जाएँ, आपको अगर उसमें नुस्ख ही देखना है तो वही आपको नज़र आएगा! आप अच्छे से अच्छा खाना सामने रख दें, अच्छे से अच्छे कपड़े या ज़रूरी सामान ले आएँ या चर्चा करने के लिए एक से एक जानकार लोगों को बिठा दें-उन्हें संतुष्टि न मिलनी है, न मिलेगी।

अगर उपरोक्त वर्णन में आपको अपनी थोड़ी भी झलक दिखाई देती है तो जान लीजिए कि खुश रहने के लिए खुद आपको ही अपने आप में बदलाव लाना होगा! मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कभी-कभी आप कितना अधिक दुखी महसूस कर सकते हैं कि न जाने क्यों कोई बात ठीक हो ही नहीं रही है। आप अच्छे व्यक्ति हैं, आसपास के लोग अच्छे हैं और कोई घटना भी ऐसी नहीं हुई है जिसे दुखद कहा जा सके। तो इन बातों पर गौर करें और समझें कि आपको भीतर से बदलने की ज़रूरत है! यह लंबा काम हो सकता है और कभी-कभी कठिन भी, लेकिन आप ऐसा कर सकते हैं!

मैं अपने जीवन में सदा खुश रहा हूँ और मुझे चीजों को सकारात्मक रोशनी में देखना पसंद है। कृपया मेरे इस नज़रिये के साझीदार बनें। अगले कुछ दिन मैं आपको बताऊँगा कि यदि आप भी ऐसे लोगों के बीच रहते हैं तो आप क्या कर सकते हैं-और हम ऐसी परिस्थितियों से पल्ला झाड़ने के लिए क्या करते हैं।

अगर आप खुश रहना चाहते हैं तो आप अति-आदर्शवादी नहीं हो सकते – 27 अगस्त 2015

बहुत से लोग सोचते होंगे कि मैं बहुत आदर्शवादी हूँ। मैं ईमानदारी को प्रोत्साहित करता हूँ, अक्सर दूसरों की मदद करने की बात कहता रहता हूँ, धोखाधड़ी और छल-कपट का पर्दाफाश करने की कोशिश करता रहता हूँ और मानव मात्र की भलाई हो सके, ऐसे विचारों का प्रचार-प्रसार करता हूँ। लेकिन मैं बहुत आदर्शवादी नहीं हूँ। बल्कि मैं अपने आपको बहुत हद तक यथार्थवादी के रूप में देखता हूँ- एक सकारात्मक रवैये के साथ। बल्कि मेरा मानना है कि वास्तव में आदर्शवादी लोगों को प्रसन्न होने में कठिनाई महसूस होती है। ऐसा क्यों है और प्रसन्न रहने के लिए आप क्या कर सकते हैं, आगे वर्णन कर रहा हूँ।

आदर्शवाद आपको क्यों प्रसन्न नहीं होने देता? क्योंकि दुनिया एक आदर्श स्थान नहीं है। यह कतई पूर्णतः निर्दोष जगह नहीं है और हो भी नहीं सकती। क्या उत्तम है, इस बारे में हम सब अलग-अलग विचार रखते है और सभी अपने मुताबिक़ उस आदर्श को प्राप्त करने की दिशा में प्रयत्न करते हैं, भले बहुत से दूसरे लोग उसे ठीक न मानते हों। तो कोई एक आदर्श स्थिति कभी प्राप्त नहीं हो सकती- हालांकि आप अपने आसपास भरसक अपने आदर्शों के मुताबिक़ एक घेरा निर्मित कर सकते हैं।

हालातों के कारण अवसादग्रस्त होने की जगह उन्हें बदलने के लिए आप बहुत कुछ कर सकते हैं। अधिक महत्वपूर्ण बातों की चिंता कीजिए, उन आदर्शों की, जो आपके लिए वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्हें स्वीकार करना सीखिए। यह जानना और स्वीकार करना बहुत ज़रूरी है कि बहुत सी छोटी-छोटी बातें उपयुक्त नहीं हैं। आपको चाहिए कि यह विचार छोड़ दें कि हमेशा चीज़ें 100% आपके आदर्शों के मुताबिक हों- क्योंकि यह संभव ही नहीं है और वह आपके अंदर निराशा उत्पन्न करेगा, आपको अप्रसन्न कर देगा।

इसीलिए मुझे लगता है कि ज़्यादातर मैं यथार्थवादी हूँ और आदर्शवादी होना भी नहीं चाहता। उच्चतर निमित्त के लिए कई बार ऐसी बहुत सी परिस्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं जो मुझे उससे अलग तरह का व्यवहार करने के लिए मजबूर कर देती हैं, जिसे सामान्यतया मैं अपने लिए आदर्श मानता हूँ।

मैं एक उदाहरण देता हूँ: मैं पूरी तरह हिंसा के खिलाफ हूँ। मैं अपने स्कूल में अहिंसक शिक्षा को बढ़ावा देता हूँ और अभिभावकों से भी ज़ोर देकर कहता हूँ कि घर में भी वे यही करें। मैं पशुओं की हिंसा के भी खिलाफ हूँ और बातचीत में भी परस्पर हिंसा के खिलाफ हूँ। लेकिन मैं इसे और आगे बढ़ाते हुए यह नहीं कहूँगा कि मैं कभी भी हिंसक नहीं हो सकता। खतरनाक परिस्थिति में अगर मुझे लगे कि मुझ पर हिंसक हमला हो सकता है या कोई मुझे, मेरी पत्नी या बेटी को नुकसान पहुँचाना चाहता है तो निश्चित ही मैं भी अपने हाथ का इस्तेमाल करूँगा। मैं किसी को मुझे मारने की इजाज़त नहीं दूँगा कि मैं सिर्फ अपनी पिटाई का दर्द सहता रहूँ। एक उदाहरण के रूप में स्वरक्षा हेतु की जाने वाली ऐसी हिंसा को मैं पूरी तरह जायज़ मानता हूँ।

ऐसे और भी बहुत से उदाहरण हो सकते हैं! एक आदर्श के रूप में लोग भ्रष्टाचार के विरोधी होते हैं। किसी काम को करवाने के लिए रिश्वत देकर वे पछताते हैं। लेकिन ऐसे भ्रष्टाचार या ऐसे ही किसी गलत व्यवहार का भांडाफोड़ करने के लिए लोग स्टिंग ऑपरेशन करते हैं और बिना इजाज़त उनका वीडियो तैयार कर लेते हैं। आम तौर पर इसे एक अनैतिक काम माना जाएगा और आप अपने आदर्शों के लिहाज से ऐसा नहीं करना चाहेंगे। किंतु गलत कामों को रोकने और गलत काम करने वालों का पर्दाफ़ाश करने के उच्चतर निमित्त के लिए आपको कभी-कभी ऐसा करना पड़ता है!

इसी नज़रिए से मैं यथार्थवादी हूँ और मुझे यह स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं है कि उच्च निमित्त मौजूद होते ही हैं और उनके लिए कभी-कभी अति-आदर्शवादिता को तिलांजलि देनी ही पड़ती है। अपने आदर्शो को बहुत मत खींचिए, उन्हें पकड़कर बैठ मत जाइए, उन्हें लेकर अतिवादी मत बनिए क्योंकि वह आपको दुखी करेगा। उच्चतर प्रयोजनों के लिए किया गया वह कार्य जो अति-आदर्शवाद की दृष्टि से "अनैतिक" दिखाई देता है, उसे करने पर आपको सिर्फ कुछ देर अफ़सोस होगा। लेकिन इस मामले में अतिवादी रवैया अपनाने पर आप लंबे समय तक दुखी रहेंगे और आपको शांति नहीं मिलेगी।

अपने विचारों के प्रति और जो आप महसूस करते हैं, उसके प्रति ईमानदार बने रहिए। अपने आदर्शों के प्रति सत्यनिष्ठा रखिए लेकिन यथार्थ को भी मौका दीजिए- यही आपको प्रसन्नता और अंततः संतोष और मानसिक शांति प्रदान करेगा।

नास्तिक दूसरों की सहायता करने के लिए अच्छे काम करते हैं, पुण्य कमाने के लिए नहीं – 29 जुलाई 2015

कल मैंने बताया था कि बहुत से लोग यह मानते हैं कि नास्तिक न सिर्फ नीरस होते हैं और आनंदरहित जीवन बिताते हैं बल्कि वे संवेदनशील और परोपकारी भी नहीं होते। उनके विचार से नास्तिकों में करुणा का अभाव होता है और वे मतलबी होते हैं। आज मैं अपने ब्लॉग के ज़रिए इस पूर्वाग्रह का खंडन करना चाहता हूँ।

सबसे पहले यह देखते हैं कि ये विचार कहाँ से आते हैं। नास्तिक और आस्तिक में क्या भिन्नता है? एक समूह ईश्वर को मानता है और दूसरा नहीं। तो, जो ईश्वर को मानते हैं, वे सोचते हैं कि वे ही दूसरों की सहायता करते हैं, जबकि नास्तिक नहीं करते। अर्थात, वे मानते हैं कि ईश्वर ही उन्हें लोगों की मदद करने के लिए प्रेरित करता है। यह रोचक है, क्योंकि इसका आशय यह है कि आप इसलिए परोपकार करते हैं क्योंकि ईश्वर ने धर्मग्रथों में ऐसा करने को कहा है- ठीक? अगर आप स्वयं अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते, बीच में ईश्वर नहीं होता तो आपके अनुसार, आप कोई भी भला काम नहीं करते, जो आप अभी कर रहे हैं?

यदि यह सत्य है, तो यह नास्तिक बेहतर इंसान हैं, क्योंकि वे अच्छे कार्य केवल इसलिए करते हैं कि उन्हें वह उचित लगता है। इसलिए नहीं कि पिता जैसी छवि रखने वाला कोई काल्पनिक चरित्र उन्हें ऐसा करने का आदेश देता है। इसलिए नहीं कि वे किसी काल्पनिक बहीखाते में पुण्य जमा कर रहे हैं!

मैं आपको नास्तिकों में मौजूद दयाभाव और परोपकार का एक उदाहरण देता हूँ, जो हमारे इस आयोजन के तुरंत बाद हाल ही में सामने आया है। युवा नास्तिकों का एक समूह हमारे कार्यक्रम के बाद टेम्पो ट्रेवलर से आगरा के लिए निकला। हमने एक स्थानीय टॅक्सी ऑपरेटर से कह कर टेम्पो ट्रेवलर की व्यवस्था कराई थी। आगरा के रास्ते में उनके सामने एक दुर्घटना घटित हुई और उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। मुझे नहीं पता, वास्तव में वहाँ क्या हुआ परन्तु दुर्घटना में कई लोग घायल हुए थे और उन्हें तत्काल चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता थी। उस छोटे से समूह ने जोकि ताजमहल देखने जा रहे थे, तुरंत निश्चय किया कि वे पहले उन घायलों को अस्पताल पहुँचाएँगे!

दुर्भाग्य से गाड़ी के वाहन चालक ने, जो एक स्थानीय व्यक्ति ही था, मना कर दिया। वह पुलिस से साथ कोई मुसीबत न हो, इस डर से या किसी और कारण से या अकारण घबरा गया। वह जीप से दूर, अलग जाकर खड़ा हो गया, यह दिखाने के लिए कि यदि वे लोग किसी घायल को साथ लेकर जाना चाहते हैं तो वह गाड़ी नहीं चलाएगा।

असमंजस की स्थिति में कि क्या करें, वे सड़क के किनारे खड़े होकर दूसरी गाड़ियों को इशारों से और हाथ हिला-हिलाकर रोकने की कोशिश करने लगे। अंततः एक कार रुकी और चालक उन घायलों को साथ लेकर अस्पताल चलने के लिए तैयार हो गया।

तो, एक ऐसा ईश्वरभक्त व्यक्ति, जिसने अपनी गाड़ी के दोनों तरफ बड़े-बड़े अक्षरों में राधे-राधे लिखवा रखा है, और तो और स्वयं भी एक धार्मिक पहनावे में है और जिसने बाकायदा धार्मिक शृंगार किया हुआ है, एक खून से लथपथ घायल व्यक्ति को अपने साथ ले जाने के लिए मना कर देता है जबकि बाहर से आया एक नास्तिकों का दल, अपने कार्यक्रम की परवाह किए बगैर उस घायल व्यक्ति की जान बचाने के लिए एक अनजान जगह में वह सब कुछ करने के लिए राज़ी है, जो वह कर सकता है।

हालांकि मेरे लिए यह कोई बड़ा आश्चर्य नहीं है–क्योंकि एक अधार्मिक व्यक्ति अपनी सहज प्रवृत्ति पर, अपने तर्कपूर्ण विचारों पर भरोसा करते हुए स्वयं अपनी मर्ज़ी से निर्णय लेता है जबकि धर्म अपने अनुयायियों को भय का अनुसरण करना सिखाता है। इसलिए जबकि यह धार्मिक व्यक्ति सोच ही रहा था कि क्या-क्या बुरा हो सकता है, ये नास्तिक अपना काम कर चुके थे, अपने सामने घायल पड़े हुए व्यक्ति की सहायता करने की एकमात्र इच्छा के वशीभूत!

अपने स्कूल के बच्चों के लिए किए जा रहे हमारे कार्य आपको सहमत नहीं करते तो शायद यह घटना आपके लिए एक प्रमाण है कि नास्तिक लोग वास्तव में अच्छे कार्य करते हैं, दूसरों की सहायता हेतु सदा तत्पर रहते हैं- जबकि धार्मिक लोग भयभीत होकर पीछे हटने के बहाने ढूँढ़ते रहते हैं!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

हमें शिकायत क्यों नहीं करना चाहिए? इसका उत्तर यहाँ है – 28 मई 2015

मैंने कल आपको बताया था कि जब हम मोनिका या उसकी रूममेट की तरह बुरी तरह ज़ख़्मी या परेशान व्यक्ति देखें तो हमारे भीतर कैसे विचार आने चाहिए और हमें क्या महसूस होना चाहिए। हमें खुश होना चाहिए कि हम स्वस्थ और सुखी हैं, अपने शरीर की बनावट को लेकर, उसकी सुंदरता को लेकर हमें संतुष्ट होना चाहिए। लेकिन यहाँ मैं एक और बात कहना चाहता हूँ! अपने आस-पास को, देश-दुनिया के माहौल को देखते हुए न सिर्फ आपको अपने शरीर के लिए खुश होना चाहिए बल्कि उन आर्थिक, सामाजिक, भौतिक और भावनात्मक बातों के लिए भी खुश और संतुष्ट होना चाहिए जो आपको प्राप्त हैं और जो जीवन आपको मिला है, उसके लिए खुश होना चाहिए!

पिछले कुछ हफ्तों में मैंने यह भी आपको बताया था कि पूर्णेन्दु और रमोना हमेशा नए भर्ती हुए बच्चों के घरों का दौरा करते हैं। जो कुछ वहाँ वे देखते हैं, जिन परिस्थितियों में वे बच्चे रहते हैं, उसे देखना भी जीवन को देखने का एक बिल्कुल अलग नजरिया देते हैं। जो भी उनके साथ वहाँ जाएगा, अपने जीवन की परेशानियों के लिए रोना छोड़ देगा!

भीषण गर्मी से बचने के लिए वे सुबह सबेरे उनके घर जाते हैं लेकिन वापस लौटते हैं तो पसीने में सराबोर, गर्मी से हलाकान लौटते हैं। जिस घर में भी वे जाते हैं, कहीं भी ए सी या सामान्य कूलर तक नहीं होते! कुछ घरों में बाहर के दरवाज़े तक नहीं होते या होते हैं तो सिर्फ एक कमरे का दरवाज़ा बंद किया जा सकता है, उस जगह नहीं, जहाँ जीवन का अधिकांश हिस्सा वे गुज़ारते हैं! अधिकतर घरों में बिजली होती है मगर सब घरों में नहीं। बिजली नहीं तो फिर पंखा वगैरह भी नहीं कि थोड़ी-बहुत ठंडी हवा मिल सके! जिनके यहाँ बिजली है भी तो वहाँ हमारे यहाँ जैसा बैटरी वाला पॉवर बैक-अप इन्वर्टर नहीं होता कि बिजली चली जाए तो कम से कम पंखा चालू रह सके। और बिजली हरदम जाती ही रहती है, विशेष रूप से जब तापमान 45 डिग्री या उससे ऊपर पहुँच जाता है, जैसा कि पिछले कुछ दिनों से हो रहा है।

अधिकतर बच्चों के पिता और कुछ बच्चों की माँएँ भी दैनिक मजदूरी करती हैं। वे सब बाहर, अधिकतर खुली धूप में, विभिन्न निर्माण-स्थलों में काम करते हैं और निश्चित ही उनके काम का वातावरण और परिस्थितियाँ मनुष्यों के काम करने के लिए उपयुक्त या सुरक्षित नहीं होतीं! उन्हें नंगे हाथों से फावड़ा पकड़कर सीमेंट और रेत का मिश्रण तैयार करना होता। वे निर्माण स्थलों पर हर जगह नंगे पाँव घूमते-फिरते रहते हैं या ज़्यादा से ज़्यादा रबर की चप्पलों में। कुछ साल इन्ही परिस्थितियों में काम करने के कारण मिस्त्रियों के हाथ फट जाते हैं।

माँएँ एक या दो छोटे-छोटे कमरों में एक साथ छह-छह बच्चों की और घर की देखभाल करती हैं और ऊपर से घर को सुव्यवस्थित रखने की ज़िम्मेदारी भी उसी की होती है। आमदनी कम होने के कारण बहुत कम खर्च में उन्हें पूरे परिवार के भोजन की व्यवस्था करनी होती है, ज़्यादातर रोटी-सब्ज़ी या चावल-दाल जैसे मूलभूत अनाजों और खाद्य पदार्थों से ही काम चलाना पड़ता है।

फटे-पुराने कपड़ों में बच्चे दिन भर गंदी, धूल भरी सड़कों पर खेलते रहते हैं। उनमें से कई वास्तव में बीमार होते हैं लेकिन इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं होते। दस-दस साल के बच्चे अपना नाम तक नहीं लिख पाते और कई किशोर बच्चों को यही पता नहीं होता कि उनकी उम्र ठीक-ठीक क्या है। लगभग सभी खेतों में पाखाना करने जाते हैं या सड़क के किनारे बैठकर पाखाना करते हैं-बहुत कम घरों में संडास उपलब्ध होता है।

और भारत का यह सबसे बुरा चित्र नहीं है और न ही दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई है-भारत में इससे भी बुरी हालतों में लोग रहते हैं! और आपका जीवन कितना भी बुरा क्यों न दिखाई दे, अगर आप ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं तो निश्चित ही समझ जाएँगे कि आपके देश में आपसे भी बुरी हालत में रहने वाले और उसमें सारा-सारा जीवन गुज़ार देने वाले लोग भी मौजूद हैं! जब भी आप अवसादग्रस्त हों, इस विषय में सोचिए और सिर्फ सोचते ही मत रहिए बल्कि यह समझने की कोशिश कीजिए कि वास्तव में आपका जीवन इससे कितना बेहतर है!

अर्थात, शिकायत मत कीजिए! और सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति के संदर्भ में ही नहीं-अपनी सामाजिक हैसियत के संदर्भ में भी, अपने प्रेमसंबंधों को लेकर, किसी से प्रेमसंबंध न हो पाने या प्रेमसम्बन्धों में आ गई खटास को लेकर भी!

दुनिया की बुरी हालत पर अवसादग्रस्त न हों बल्कि कुछ ऐसा करें कि वह आपकी आँखें खोल दे और आपको पता चले कि आपका जीवन कितना सुखद और सम्पन्न है और तब आप उसमें सकारात्मक परिवर्तन ला सकेंगे और साथ ही उनकी मदद भी कर सकेंगे, जो आपसे अधिक बुरी परिस्थितियों में जीवन गुज़ार रहे हैं!

बदलाव को स्वीकार करें और अपनी खुशी को महत्व दें – 24 मार्च 2015

आज मेरे मन में एक ऐसे विषय पर लिखने का विचार है जो बार-बार मेरे सामने उपस्थित होता रहता है। खुद परिवर्तन के और उसे स्वीकार करने की क्षमता और आवश्यकता के बारे में।

कभी-कभी मैं जीवन की तुलना मौसम से करना पसंद करता हूँ। तीन दिन पहले यहाँ वसंत का मौसम था और ठंडी हवाएँ बह रही थीं-गुलाबी ठंड से लेकर कड़ाके की ठंड वाली रातें। अब दिन गरम हो चुके हैं लेकिन गर्मी को उरुज पर आने में घंटों लगते हैं। लेकिन मौसम बड़ी तेज़ी के साथ बदला, जैसा कि यहाँ आम तौर पर होता है और अब गर्मी का मौसम सामने है। हम सबेरे उठते हैं और जैसे ही सूरज ऊपर आता है गर्मी का एहसास होने लगता है। दोपहर तक बाहर काफी गरम हो जाता है। शामें और रातें भी गरम ही बनी रहती हैं। सिर्फ गर्मी नहीं, आप हवा में ग्रीष्म ऋतु की गंध महसूस करते हैं!

जीवन में परिवर्तन बहुत तेज़ी के साथ आ सकते हैं, जैसे मौसमों में परिवर्तन आते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि आप उनके बारे में कुछ नहीं कर सकते! आपको उन्हें स्वीकारना ही पड़ता है। आप कुछ करना चाहते हैं और मौसम बदलकर बहुत गरम, बहुत ठंडा या बहुत नम हो सकता है लिहाजा अब आप वह मनचाहा काम नहीं कर पा रहे हैं-और आप मौसम में हुए इस परिवर्तन को रोक भी नहीं सकते! आप सिर्फ यह निर्णय कर सकते हैं कि इस परिवर्तन को अपनी प्रसन्नता छीन लेने की इजाज़त दे दें या न दें। मैंने अक्सर लोगों को खराब मौसम की शिकायत करते देखा है, उन्हें बहुत दुखी और उदास होते देखा है-और कभी-कभी ऐसा लगता है कि वास्तव में मौसम कभी भी मन मुआफिक नहीं हो सकता!

यही बात जीवन में आने वाली परिस्थितियों के साथ भी होती है! यह आपकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है कि बाहर से आने वाले परिवर्तनों से निपटने के लिए कौन सा विकल्प चुनते हैं। अगर आप उन पर दुखी होना चाहते हैं तो आप दुखी होने के लिए स्वतंत्र हैं। आप रो सकते हैं, उदास हो सकते हैं, मौसम को कोस सकते हैं लेकिन अक्सर होता यही है कि आप अपनी प्रसन्नता और आनंद खो बैठते हैं। और ईमानदारी की बात यह है कि मेरी प्रसन्नता मेरे लिए इतनी अधिक कीमती है कि मैं उसे परिवर्तन की बलिवेदी पर न्योछावर करना नहीं चाहूँगा।

भारत आने वाले पर्यटक बताते हैं कि यह देखकर वे हैरान रह जाते हैं कि यहाँ लोग इतने गरीब हैं फिर भी इतने खुश कैसे रह लेते हैं!

जी हाँ, खुशी पैसे की मोहताज नहीं है। पैसे से आप खुशी खरीद नहीं सकते और मैंने कई अमीर लोगों को देखा है, जो बेहद दुखी हैं जब कि कई बेहद गरीब भी देखे हैं, जो उनसे कई गुना खुश रहते हैं! और मेरा मानना है कि परिस्थितियों को स्वीकार करने की उनकी क्षमता ही भारतीयों की खुशी का मुख्य कारण है।

मैं सोचता हूँ कि भारतीय स्वभाव से ही ऐसे होते हैं कि उनके लिए परिवर्तन को स्वीकार करना आसान होता है और स्वीकार करने की इस प्रवृत्ति के चलते ही वे खुश रहते हैं। मेरा यह भी मानना है कि जीवन की राह में हम कोई अच्छी बात देखें तो उससे सीखने की कोशिश करनी चाहिए-और अगर हम गरीब भारतीयों से यह सीख सकें तो हमें अवश्य सीखना चाहिए!

तो मौसमों को आने दीजिए और वे जो भी लेकर आएँ, उसे स्वीकार करते हुए खुश रहिए!

कृपया इसे अवश्य पढ़ें यदि आप रोजमर्रा की जिन्दगी से बचने के लिए छुट्टियाँ मनाने जाते हैं! 2 फरवरी 2015

कल मैंने आपको सारांश में बताया था कि जब मैं छुट्टियाँ बिताने कहीं बाहर जाता हूँ तो मैं क्या महसूस करता हूँ। मैं जानता हूँ कि छुट्टियों के बारे में मैं दूसरों से कुछ अलग विचार रखता हूँ। और मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि कई लोग जब अपनी छुट्टियों के बारे में बताते हैं तो लगता है जैसे वे कुछ गलत काम कर रहे हों। अपनी छुट्टियों को लेकर नहीं बल्कि अपने दिनचर्या को लेकर!

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मुझे छुट्टियाँ पसंद हैं। मुझे पत्नी के साथ किसी दूसरे शहर जाकर छुट्टियाँ मनाना पसंद है, वहाँ जाकर बिना किसी निश्चित कार्यक्रम के अपनी मर्ज़ी से कुछ दिन गुज़ारना पसंद है, यह सोचकर ही मुझे बड़ा अच्छा लगता है कि अगर हम चाहेंगे तो किसी होटल में सारा दिन अकेले रहकर गुज़ार सकते हैं और अपने मनपसंद रेस्तराँ में रात का खाना खा सकते हैं। मैं ये सब बातें पसंद करता हूँ-लेकिन यह मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। मैं अपनी छुट्टियों के अधीन नहीं हूँ। मेरा पूरा साल मेरी छुट्टियों पर केन्द्रित नहीं है। जब हम वापस लौटते हैं तो हम बात करते हैं कि छुट्टियाँ कितनी अच्छी रहीं और अपने काम पर लग जाते हैं।

मैंने कुछ दिन पहले ही आपको बताया था कि मैं अपने काम से प्यार करता हूँ। सिर्फ काम से ही नहीं, अपने जीवन से, अपने आश्रम से, अपने स्कूल से, अपने चैरिटी के काम से, अपने व्यवसाय से, अपने परिवार, दोस्तों, मिलने-जुलने वालों, बच्चों और अपने मेहमानों से। और मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जो ऐसा महसूस नहीं करते। जो अपने सामान्य जीवन में अपने रूटीन से खुश नहीं हैं।

आश्रम से बिदा लेते समय अकसर लोगों की आँखें भर आती हैं। स्वाभाविक ही हम यह जानकर खुश होते हैं कि आश्रम में उनका समय बहुत अच्छा रहा और दुनिया के इस कोने में बने अपने मित्रों को छोड़कर जाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है और इस कारण उनकी आँखों में आँसू आ गए! लेकिन कभी-कभी ये आँसू निश्चित रूप से यह नहीं बताते कि यहाँ उनका समय अच्छा रहा बल्कि यह बताते हैं कि आगे आने वाला समय अच्छा नहीं होगा! घर जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा होता और उन्हें दुख होता है कि अब उन्हें वहीं वापस जाना होगा।

चाहे वह उनका काम हो, व्यवसाय हो, उनकी पारिवारिक स्थिति हों या सामान्य अकेलापन या जीवन से असंतोष हो-उनकी छुट्टियाँ उनके लिए खुशियाँ लेकर आती हैं जब कि सामान्य रूप से अपने जीवन में वे खुश नहीं होते। छुट्टियों को सामान्य जीवन से ‘पलायन’ नहीं होना चाहिए जबकि उन्हें आजकल इसी तरह विज्ञापित किया जा रहा है! जी हाँ, छुट्टियों में आप अपने भीतर ऊर्जा का पुनर्संचार करते हैं और कुछ अलग, नया देखते हैं, कुछ अलग करते हैं और नए लोगों से मिलते-जुलते हैं। लेकिन अपने सामान्य जीवन, अपने रूटीन से भागकर आपको छुट्टियों का कार्यक्रम नहीं बनाना चाहिए!

इस तरह अपने सामान्य जीवन को आपकी ऊर्जा पूरी तरह निचोड़ लेने की इजाज़त मत दीजिए! अगर आपको लगे कि आप सिर्फ इसलिए जीवित हैं कि कुछ महीनों बाद कहीं बाहर जाकर छुट्टियाँ बिता सकें, अगर आप अपनी छुट्टियों का इंतजार कर रहे हैं और उनसे पलायन की कल्पना कर रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप अपना जीवन नहीं जी रहे हैं। तब शायद साल में आप सिर्फ चार सप्ताह की ज़िंदगी जी रहे हैं!

अपने जीवन को बरबाद न होने दें। उसमें परिवर्तन लाने की कोशिश करें और अभी, इसी समय से यह कोशिश शुरू कर दें!

अपने जीवन का समय बरबाद न हो इसलिए अपने काम से प्रेम करें – 21 जनवरी 2015

कल चिकित्सा व्यवसाय पर लिखने के पश्चात आज मैं सामान्य रूप से सभी पेशों में काम करने वाले लोगों से यह कहना चाहता हूँ कि जिस काम को आपने अपने जीवन का ध्येय बनाया है उससे प्यार करें। मेरे विचार में जिस काम को आप करें उससे आपको प्यार भी करना चाहिए!

बहुसंख्यक लोगों के लिए उनका काम उनके दिन का बड़ा हिस्सा ले लेता है। सामान्य रूप से अधिकतर लोग दिन में आठ घंटे काम करते हैं और कुछ लोग इससे भी ज़्यादा। अगर यह माना जाए कि आप आठ घंटे सोते हैं, व्यक्तिगत कामों और बाथरूम में एक घंटा लगता है-कुछ लोगों को इससे भी अधिक समय लगता है-और अपने काम की जगह जाने और वापस लौटने में भी आपका एक घंटा चला जाता है तो आपके पास दिन भर में सिर्फ छह घंटे बचते हैं। इन छह घंटों में आपको घर का सामान आदि लाना होता है या कोई और ख़रीदारी करनी होती है, घर के कुछ काम निपटाने होते हैं और खाना-पीना होता है। अंत में आपके पास बहुत कम समय बचता है कि आप अपने मनबहलाव के लिए भी कुछ कर सकें या दोस्तों या रिश्तेदारों के साथ समय गुज़ार सकें, बच्चों के साथ खेल सकें या आपसी सम्बन्धों के लिए कुछ समय निकाल सकें।

ज़्यादा नहीं बचता, है न?

जबकि कई देशों में अधिकांश लोगों के लिए हफ्ते में काम के पाँच दिन ही होते हैं, कुछ दूसरों के लिए छह दिन और कुछ लोगों के लिए सात दिन काम के होते हैं, जिसमें से एक दिन आधे दिन तक ही काम होता है।

तो अपने काम में आप इतना अधिक समय व्यतीत करते हैं कि जो आप कर रहे हैं उसमें आपकी रुचि होना अत्यंत आवश्यक है! क्या आप यह नहीं देख पा रहे हैं कि अगर ऐसा नहीं है तो आप अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हैं? हर दिन, हर सप्ताह, हर माह और हर साल आप ऐसे काम में अपना समय खर्च कर रहे हैं जिसे आप पसंद नहीं करते, बल्कि उससे घृणा करते हैं!

यह आपको सुखी नहीं रख सकता, यह आपको संतुष्टि प्रदान नहीं कर सकता। उल्टे यह आपको बीमार कर देगा।

हाँ हाँ मैं जानता हूँ कि लोग कहेंगे: ‘लेकिन मुझे गुज़ारा करने के लिए कोई न कोई काम तो करना ही होगा!’ वे तर्क देंगे कि आप इसका चुनाव नहीं कर सकते कि नौकरी के लिए आपको किस जगह स्वीकार किया जाता है। लेकिन अगर आप ठीक तरह से सोचें तो आपको पता चलेगा कि अधिकतर मामलों में आपके पास विकल्प होता है! आप बहुत सा समय अपने समय के साथ सुलह-समझौते में ही लगे रहकर ऐसी नौकरी या ऐसे व्यवसाय में बने रहते हैं जिसे आप पसंद नहीं करते। नौकरी या व्यवसाय में रुचि या अरुचि के अलावा इसके और भी कई कारण होते हैं मगर सबसे मुख्य कारण पैसा होता है।

अगर वे इस बात को मंजूर कर लें कि यदि उनके काम या व्यवसाय से उन्हें कम आमदनी होती है तो भी कोई बात नहीं मतलब कि अगर वे कम पैसे में भी संतुष्ट हो जाएँ तो कई लोगों के लिए यह संभव हो सकता है कि वे ऐसे काम या व्यवसाय का चुनाव कर पाएँ जो उन्हें प्रसन्न भी रखे और उससे उन्हें संतुष्टि भी प्राप्त हो। वे भूखों नहीं मरेंगे और न ही उन्हें कोई ज़्यादा आर्थिक परेशानी होगी-होगी भी उतनी नहीं कि उसे बरदाश्त न किया जा सके।

और इसीलिए मैं सभी को प्रोत्साहित करता हूँ कि प्रसन्न रहने का तरीका खोजें। अपने काम को पसंद करने का, उससे प्रेम करने का तरीका सीखें या फिर उस काम को छोड़कर किसी दूसरे काम का चुनाव करें। यह भी संभव है कि आप अपने वर्तमान काम या व्यवसाय में काम करने के घंटे कम कर दें और बचे हुए समय में कोई दूसरा काम शुरू करें जो आपके लिए अधिक आनंददायक और संतुष्टि प्रदान करने वाला हो। यह भी संभव है कि सिर्फ अपने खर्चे कम करके आप पूरी तरह से कोई नया काम या व्यवसाय शुरू कर सकें। हो सकता है कि आप अपना कोई व्यापार शुरू कर दें, उसमें ज़्यादा समय दें, अधिक मेहनत करें लेकिन उसी काम ले लिए जिसे आप शिद्दत के साथ पसंद करते हैं।

मेहरबानी करके ऐसा काम करते हुए अपनी ज़िंदगी का बहुमूल्य समय बर्बाद न करें जिसे आप पसंद नहीं करते।

अच्छे और बुरे, दोनों वक़्तों में, दोस्त दोस्त होते हैं – 4 दिसंबर 2014

मैं कल ही आपको बता चुका हूँ कि माइकल और आंद्रिया आजकल यहाँ, आश्रम आए हुए हैं और उनके साथ हम किस तरह अपना समय हँसी-खुशी बिता रहे हैं। और आपको बताऊँ कि उनके साथ होना ही मेरे लिए बड़ी खुशी की बात है क्योंकि मैं महसूस कर रहा हूँ कि वे स्वयं हमारी प्रगति देखकर बड़े खुश हो रहे हैं। यह बात एक बार फिर यह दर्शाती है कि वे हमारे सच्चे मित्र हैं-यही समय होता है, जब यह बात स्पष्ट होती है।

हमारे मित्र यहाँ देर रात पहुँचे थे। वे अढ़ाई साल बात यहाँ आए थे लेकिन इस बीच आश्रम में हुए परिवर्तन इतने विशाल थे कि अंधेरे में भी उनकी नज़रों से ओझल नहीं रह सके! आश्रम में प्रवेश करते ही वे खुशी से भावविभोर हो गए, सिर्फ हमसे मिलकर ही नहीं बल्कि हमारी प्रगति को देखकर भी।

मेरी नज़र में यही सच्ची मित्रता की पहचान है। मित्रता के बारे में दो विचार पाए जाते हैं: यानी यह कि आपको सच्चे मित्रों का पता तब चलता है, जब आपका समय खराब होता है-या फिर तब आपको सच्चे मित्रों का पता चलता है जब समय अच्छा होता है और वे भी आपके लिए आपकी खुशी में खुशी महसूस करते हैं!

मैं समझता हूँ कि यह दोनों बातों का मिश्रण है और मैं अपने इन मित्रों को अपने बीच पाकर सिर्फ खुश होता हूँ। यही कारण है कि मैं आजकल उनके साथ बहुत सारा समय बिता रहा हूँ और अपने काम के प्रति थोड़ी कोताही बरत रहा हूँ।  करने के लिए हमारे पास बहुत से काम हैं और हम बहुत व्यस्त हैं-लेकिन इनमें से एक काम सिर्फ अपने दोस्तों के साथ समय बिताना भी है!

मानसिक शांति अधिक महत्व्पूर्ण है या धन-दौलत? 30 नवम्बर 2014

सन 2007 में मैं फिर से कुछ हफ्तों के लिए आस्ट्रेलिया यात्रा पर निकल गया था। जब एक साल पहले मैं वहाँ था तब एक दंपत्ति के साथ रहा था, जो हर वक्त लड़ते रहते थे। मुझे बड़ा आश्चर्य होता था कि जब वे पूरे समय लड़ते रहते हैं तो फिर एक साथ क्यों रहते हैं! जबकि दोनों मेरे आने से बड़े खुश थे, पुरुष के साथ मेरा संपर्क अधिक रहा और उनके आपसी संबंधों के बारे में मेरी उससे काफी बातचीत भी हुई। वह किसी भी हालत में उस महिला से अलग नहीं होना चाहता था और अपने इस दृढ निश्चय के उसने कुछ बहुत ठोस कारण भी बताए। लेकिन जब मैं 2007 में पुनः उससे मिला तो पता चला, उसने अपना इरादा बदल दिया है।

जब मुझे मित्र ने सम्बन्ध टूटने का कारण बताया तो वास्तव में मैं बहुत अचंभित हुआ। इस महिला के साथ वह पाँच साल से रह रहा था। उनके बीच सम्बन्ध की शुरुआत के साल भर बाद ही वह महिला उसके साथ रहने आ गई थी। जिस घर में वह रहता था वह उसी का घर था और घर के आसपास की काफी बड़ी और कीमती ज़मीन का मालिक भी वही था। आस्ट्रेलिया में मैंने खेतों और बाग़-बगीचों वाले ऐसे बहुत से घर देखे थे। अच्छी-खासी बहुत विशाल स्थान और निश्चित ही एक व्यक्ति के लिए आवश्यकता से बहुत बड़े। इसलिए जब उसकी गर्लफ्रेंड उसके साथ रहने आई तो स्वाभाविक ही वह बहुत खुश हुआ।

लेकिन लगभग दो साल बाद ही उनके बीच मुश्किलें पैदा होनी शुरू हो गईँ । छोटी-छोटी बातों पर विवाद होने लगे। फिर वे लड़ाइयाँ बड़ी और महत्वपूर्ण बातों तक भी खिंचती चली गईँ। जब 2005 में मैं उनके यहाँ आया था तब उन्हें साथ रहते हुए चार साल हो चुके थे और वे लगभग रोज़ ही छोटी-मोटी बातों पर लड़ते-झगड़ते रहते थे और उनके झगड़े बड़े वाद-विवादों में परिणत हो जाते, जिनमें पिछले झगड़ों को याद कर-करके एक-दूसरे पर दोषारोपण किया जाता और इस तरह उनके बीच तनाव बढ़ता जा रहा था। दरअसल मुझे एहसास हो चुका था कि दोनों एक-दूसरे के प्रति इतने कटु हो चुके हैं कि उनके बीच प्रेम का कोई स्थान नहीं हो सकता था।

जब मैंने नपे-तुले शब्दों में इस बात को उसके सामने रखा तो मुझे लगा वह भी इस बात को अच्छी तरह जानता-समझता है। उसने कुछ भी छिपाया नहीं और तब मैंने उससे साफ़ शब्दों में कहा, ‘तो फिर तुम अलग क्यों नहीं हो जाते?’

तब मुझे पता चला कि आस्ट्रेलिया में एक क़ानून है, जिसके अनुसार साथ रहने वाले दो व्यक्तियों को एक-दूसरे की संपत्ति में हक़दार होने के लिए शादीशुदा होना आवश्यक नहीं है। मेरे मित्र ने मुझे बताया कि भले ही यह जगह उसकी मिल्कियत है, उसका एक हिस्सा अब उसकी भूतपूर्व साथी का हो चुका है क्योंकि वह उसके साथ दो साल से अधिक समय तक रह चुकी है। तो भले ही वे अलग हो जाएँ, भले ही वह छोड़कर चली जाए, कानूनन वह मित्र की संपत्ति के एक हिस्से की मालिक मानी जाएगी।

मेरे यह पूछने पर कि क्या पूरे समय लड़ते हुए साथ रहना और इस तरह अपनी मानसिक शान्ति खोना उचित है और वह भी सिर्फ संपत्ति के पीछे या पैसे के पीछे, तो वह कुछ देर के लिए खामोश हो गया कुछ कह नहीं पाया लेकिन अंत में, निर्णयात्मक स्वर में उसने कहा: नहीं, यह सिर्फ पैसे या धन-दौलत के लिए नहीं था-संभव है हमारे बीच यह छोटे से अंतराल के लिए हो और कुछ समय बाद हम फिर एक साथ रहने लगें!

जैसा कि मैंने बताया, जब 2007 में मैं दोबारा उनके घर पहुँचा, उसने यह प्रयास छोड़ दिया था। उनका सम्बन्ध-विच्छेद हो चुका था, वह उसे छोड़कर जा चुकी थी और मेरे मित्र ने अपनी ज़मीन का एक हिस्सा बेचकर उस महिला को उसकी कीमत अदा कर दी थी। अपनी मानसिक शान्ति के लिए अदा की गई एक छोटी सी कीमत-और वास्तव में उसके बाद वह बहुत खुश हुआ होगा!

इस बात ने मेरी इस धारणा को और भी दृढ़ कर दिया कि ख़ुशी और मानसिक शान्ति प्राप्त करने की राह में कोई भी चीज़ बाधा नहीं बननी चाहिए, धन-दौलत, ज़मीन-जायदाद, कुछ भी नहीं।