जीवन आपका है, निर्णय भी आपके होने चाहिए-आपको क्या करना है, इस पर धर्म के दबाव का प्रतिरोध कीजिए – 17 सितंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि धर्म विचार रखने और कोई धारणा बनाने की आपकी स्वतंत्रता का हनन करता है। वास्तव में धर्म आपको निर्देशित करना चाहता है कि आपको क्या करना चाहिए और दावा करता है कि ये निर्देश देने का उसे हक़ हासिल है। सारे धर्म दावा करते हैं कि वे जानते हैं कि मनुष्य को कैसा आचरण करना चाहिए। यहाँ तक कि वह अपने अनुयायियों को हत्या करने का निर्देश भी दे सकता है। और यही समस्या की जड़ है!

पहले जब मैं गुरु हुआ करता था तो लोग मुझसे वास्तव में अपेक्षा करते थे कि मैं उन्हें बताऊँ कि वे क्या करें। एक धर्मोपदेशक के रूप में, जिसका लोग अनुगमन करते हैं, यह भी मेरी एक भूमिका हुआ करती थी। लोग अपने प्रश्न या अपनी समस्याएँ लेकर मेरे पास आते थे और मैं भी अपने लिए यह उचित मानता था कि उन्हें बताऊँ कि उस विशेष परिस्थिति में वे ठीक-ठीक क्या करें। मैं भी उनके सामने अपने विचार रख देता था और जानता होता था कि वे वैसा ही करेंगे। अपने निर्णयों की पूरी ज़िम्मेदारी वे मुझे सौंप देते थे, जिनमें से कुछ तो जीवन के बड़े अहम निर्णय होते थे।

फिर मुझमें परिवर्तन आया। गुफा में रहने के बाद मुझे लगा कि मुझे यह सब नहीं चाहिए। मैं दूसरों से बड़ा नहीं बल्कि उनके बराबर होना चाहता था। इसका यह अर्थ भी था कि मैं दूसरों के निर्णयों की ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहता था! सिर्फ मैं अपना जीवन जीना चाहता था। अपने अनुभवों और विचारों से अगर मैं किसी की मदद कर सकता था तो ऐसा करके खुश होता था लेकिन चाहता था कि वे अपने निर्णय स्वयं लें, अपनी भावनाओं पर विश्वास करें और सीखें कि उनके अनुसार किस तरह आगे बढ़ा जाए!

तो इस तरह मैं नास्तिक बन गया और आज यहाँ बैठकर सिर्फ अपने विचार लिखता हूँ। कोई भी पाठक उनके बारे में अपने तई सोचने के लिए और उनके आधार पर अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। अपने सलाह-सत्रों में मैं यह बात बिल्कुल स्पष्ट कर देता हूँ: मैं आपको सिर्फ अपना नज़रिया बता सकता हूँ लेकिन अपने निर्णय आपको खुद लेने होंगे और परिणामों ज़िम्मेदारी भी आपकी होगी!

लेकिन धर्म है ही इसलिए कि लोगों को बताए कि क्या सोचना है और क्या करना है। धर्म विभिन्न विचारों को सुनने और उन पर विचार करने में भरोसा नहीं करता। धर्म आपको यह स्वतंत्रता नहीं देता कि आप अपने लिए कोई अलग चुनाव कर सकें। धर्म आपको आदेश देता है कि यह करो।

धर्मगुरु विश्वास करते हैं कि उन्हें यह हक हासिल है और जहाँ तक इस्लामी रूढ़िवादियों का सवाल है, वे तो यह भी सिखाते हैं कि जो उनकी बातों का अनुसरण नहीं करते, उनकी हत्या करना जायज़ है! इस्लाम के धार्मिक नेता अपने अनुयायियों से कहते हैं कि अपनी कमर में बम लगाकर सैकड़ों की संख्या में दूसरे लोगों की जान लो और खुद इस्लाम की राह में शहीद हो जाओ।

कुछ लोग होते हैं जो चाहते हैं कि कोई उन्हें बताए कि उन्हें क्या करना चाहिए। वे ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते और अपने धर्म पर या उपदेशक, गुरु या किसी पर भी, जो उन्हें बता सके कि क्या करना चाहिए, अपने कामों की ज़िम्मेदारी डाल देते हैं।

कोई भी सोचने-समझने वाला व्यक्ति महज धर्म के लिए आतंकवादी, खुदकुश बमबार या हत्यारा नहीं बन सकता। वास्तव में यह धर्म का छल है जो उन्हें इस सीमा तक झाँसा देने में कामयाब होता है। ऐसी मनःस्थिति से, जहाँ वे अपने निर्णय खुद नहीं लेना चाहते से शुरू होकर वे वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ वे हर वह काम करने को तैयार हो जाते हैं, जिन्हें वे कभी नहीं करते अगर अपने निर्णय और उनकी ज़िम्मेदारी खुद ले रहे होते। दूसरों को नुकसान पहुँचाना, उनकी हत्या करना, दुनिया को शोक और संताप में झोंक देना!

मैं आपको सलाह देना चाहता हूँ कि अपने लिए सोचें। अपने जीवन की ज़िम्मेदारी लें और धर्म को इसकी इजाज़त न दें कि वह आपको बहला-फुसला सके, झाँसा दे सके और मजबूर कर सके कि आप वह सब करने के लिए तैयार हो जाएँ जो आप कभी नहीं करते, अगर अपने निर्णय खुद ले रहे होते।

नास्तिकों के लिए निर्णय लेना और ज़िम्मेदारी स्वीकार करना क्यों आसान होता है? 30 जुलाई 2015

स्वाभाविक ही, पिछले सप्ताह इतने सारे नास्तिकों के साथ एक साथ समय गुज़ारने के बाद, उनके साथ हुए कुछ अनुभव विशेष रूप से याद रह जाते हैं। एक बात यह कि सामान्य रूप से वे ज़िम्मेदारियाँ निभाने और निर्णय लेने के मामले में, मेरे मुलाकाती आस्तिकों की तुलना में, अधिक प्रस्तुत नज़र आते हैं। और यह बात मुझे बहुत सहज, स्वाभाविक और तर्कपूर्ण लगती है!

कल का ही उदाहरण लेना हो तो, किसी दुर्घटना के बाद एक नास्तिक तुरंत सहायता के लिए तत्पर दिखाई देता है, जबकि एक आस्तिक डर के मारे इसमें व्यवधान उपस्थित करता है। ऐसे नास्तिक अक्सर मिलते हैं, जो त्वरित निर्णय लेकर अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी लेने के किए तैयार हो जाते हैं, जिससे किसी ज़रूरतमंद की मदद की जा सके।

मेरा मानना है कि नास्तिक आसानी से ऐसा कर पाते हैं क्योंकि वे पहले ही कंटीली राहों से गुज़रकर यहाँ तक पहुँचे होते हैं। काफी विचार मंथन के बाद वे इस निर्णय पर पहुँचे होते हैं कि उसी बात पर भरोसा करें, जिसका वे शिद्दत के साथ खुद महसूस करते हैं, उस पर नहीं, जो उन्हें उनका परिवार बताता है या परंपरा से उन्होंने सीखा है। आपके करीबी मित्र और रिश्तेदार या दूसरे लोग जो सोच रहे हैं या कर रहे हैं, उससे अलग कुछ करना आसान नहीं है। आपके पास दृढ़निश्चय, इतनी संकल्प शक्ति और प्रवाह के विपरीत चलने पर आने वाली मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए। इसलिए एक भारतीय नास्तिक निश्चित ही ऐसा व्यक्ति ही होगा, जिसमें ये सारे गुण मौजूद हों। ऐसा व्यक्ति ही नास्तिक हो सकता है!

इस तरह, भारत के नास्तिक इन सब दिक्कतों का सामना पहले ही कर चुके होते हैं और जानते हैं कि उनके चारों ओर मौजूद कठिनाइयों के बावजूद वे मज़बूती के साथ पैर जमाए खड़े हैं। वे अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए हर समस्या से निपटने के लिए तैयार होते हैं।

इसके विपरीत धार्मिक लोगों का रवैया अक्सर बिलकुल दूसरा होता है: सब कुछ वे ईश्वर पर छोड़ देते हैं। अपने इस विश्वास के चलते कि सब कुछ ईश्वर की मर्ज़ी से होता है, जब त्वरित निर्णय लेना आवश्यक होता है, वे अक्सर अनिच्छुक, बल्कि निष्क्रिय बने रहते हैं। ज़्यादातर आस्थावान लोग किसी समस्या का हल निकालने की ओर स्वतः प्रवृत्त नहीं होते क्योंकि उनका विश्वास होता है कि आखिर समस्या भी ईश्वर प्रदत्त है। समस्या तो होगी ही, समस्या बहुत मुश्किल भी होगी- क्योंकि वह ईश्वर की देन है! ईश्वर परीक्षा लेता है! वे अपनी सामान्य दिनचर्या से बाहर नहीं निकलते क्योंकि वे एक काल्पनिक शक्ति पर निर्भर होते हैं।

इसके अलावा वे भयभीत भी होते हैं। धर्म का सारा कारोबार ही लोगों के भय पर आधारित है। डर न हो तो वह भरभराकर गिर जाएगा। अगर नर्क का डर न हो तो कोई स्वर्ग पर भी विश्वास नहीं करेगा! आपके पाप, पापों के लिए नियत दंड, पश्चाताप और उसके चारों ओर निर्मित बाकी सब कुछ भी! ये सब डर पैदा करने के औज़ार हैं। और एक बार आप डर के आदी हुए तो फिर हमेशा हमेशा के लिए वह आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है। जब आप कोई दुर्घटना होते हुए देखते हैं तो आप डर जाते हैं। आप घायल व्यक्ति कि मदद करने के बारे में नहीं सोचते बल्कि आपके मन में दुर्घटना के चलते हो सकने वाली दिक्कतों से अपने आपको बचाने का खयाल आता है!

धार्मिक लोग मुश्किल वक़्त में अपने ईश्वर का आह्वान करते हैं कि वह उन्हें सही निर्णय लेने की शक्ति दे, उचित राह दिखाए। उनका विश्वास होता है कि ईश्वर अवश्य ही कोई न कोई राह निकालेगा-लेकिन मैंने देखा है कि ईश्वर के भरोसे बैठे हुए वे लोग अक्सर कोई निर्णय ही नहीं ले पाते, आगे बढ़कर खुद कुछ करने की जगह वे किसी दैवी शक्ति के निर्देश का इंतज़ार करते रहते हैं, जो कभी सामने नहीं आता!

निश्चित ही, हर चीज़ के अपवाद होते हैं लेकिन सामान्य रूप से लोगों के इस रवैये को मैंने अक्सर नोटिस किया है। भविष्य में इस नजरिए से आस्तिकों और नास्तिकों के रवैयों पर नज़र रखें, आपको भी अंतर स्पष्ट नज़र आएगा!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

कठिन निर्णय: कब कोई बच्चा हमारे स्कूल में भर्ती होने के लिहाज से ‘पर्याप्त गरीब नहीं’ होता? 18 मई 2015

पिछले हफ्ते मैंने भ्रष्टाचार के चलते हमारे सामने पेश आने वाली स्कूल संबंधी दिक्कतों के बारे में बताया था। मैंने बताया था कि भारत में शिक्षा पूरी तरह व्यवसाय बन चुकी है। अंत में मैंने संक्षेप में स्कूल खोलने के पीछे मौजूद सोच को स्पष्ट करते हुए बताया था कि हम किसके लिए और क्या कर रहे हैं: अपने आसपास के गरीब बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा और उनके परिवारों की मदद! मैं पहले ही घोषणा कर चुका हूँ कि अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में अपने सोच-विचार को आपके सामने लगातार रखता रहूँगा और मुझे लगता है कि इस काम में पूरा अगला हफ्ता लग जाएगा! आज इसकी शुरुआत करते हुए मैं हमारे सामने आने वाले सबसे पहले प्रश्न पर चर्चा करूँगा: कौन हमारे स्कूल के लिए 'पर्याप्त गरीब' है और कौन आर्थिक रूप से पर्याप्त समर्थ है?

जब भी हमारे यहाँ नई भर्तियाँ शुरू होती हैं, हम व्यक्तिगत रूप से हर बच्चे के घर जाते हैं और देखते हैं कि वे कहाँ रहते हैं। इससे हमारे सामने कई बातें स्पष्ट हो जाती हैं- पहली बात तो यह कि हम हर बच्चे और उसकी परिस्थिति को व्यक्तिगत रूप से जानने लगते हैं और इससे बच्चा स्वतः ही हमसे नज़दीकी महसूस करने लगता है। और स्वाभाविक ही हम यह जानने में समर्थ हो जाते हैं कि वास्तव में उस परिवार के बच्चे को हमारे स्कूल में स्थान की ज़रूरत है या नहीं।

वास्तव में यह काम आसान नहीं होता और अक्सर हमें अपने स्कूल के बच्चों के परिवारों के बीच काफी अंतर नज़र आता है। कुछ लोगों के पास रहने के लिए अपना खुद का मकान होता है-अपने बाप-दादाओं से प्राप्त या कहीं से ऋण लेकर बनवाया हुआ। कुछ झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले परिवार होते हैं, किसी में सिर्फ तीन तरफ ईंट की दीवारें होती हैं, टीन की छत होती है, जिसमें अभी से छेद नज़र आ रहे होते हैं। कुछ लोगों को रोज़ काम की खोज में निकलना पड़ता है या कुछ ऐसे होते हैं, जो बीमारी के चलते कोई काम ही नहीं कर पाते, जब कि कुछ लोगों के पास काफी हद तक काम तो होता है मगर उससे पर्याप्त आमदनी नहीं होती। कुछ लोग चार बच्चों को पालने लायक कमा लेते हैं लेकिन उनके पास पालने-पोसने के लिए सात बच्चे होते हैं! कुछ और होते हैं, जहाँ परिवार में बच्चा तो एक ही होता है मगर कमाने वाला भी एक ही होता है-दूसरा या तो मर चुका होता है या फिर वे अलग हो चुके होते हैं!

आप अभी से देख सकते हैं कि अंतर बहुत है और ज़्यादातर प्रकरणों में जब हम उनके घर जाते हैं तो तुरंत ही उस परिवार की कठिन परिस्थिति के बारे में जान जाते हैं। ऐसे प्रकरण कम ही होते हैं, जहाँ हम बच्चों के माता-पिता से कहते हैं कि हम उनके बच्चों को भर्ती नहीं कर पाएँगे। लेकिन ऐसे प्रकरण भी होते ही हैं।

हम अक्सर पाते हैं कि बच्चों के माता या पिता की आय औसतन 4000 रुपए प्रतिमाह होती है और जब हम किसी ऐसे घर में पहुँचते हैं, जहाँ परिवार की आय लगभग 10000 रुपए है और खिलाने, लालन-पालन करने और पढ़ाने-लिखाने के लिए सिर्फ एक ही बच्चा है तो हम नम्रतापूर्वक अभिभावकों से कोई दूसरा स्कूल देखने के लिए कह देते हैं। हमारे स्कूल में, जिस जगह यह बच्चा पढ़ता, वह अब किसी अधिक गरीब बच्चे के उपयोग में आ सकती है, जिसके माता-पिता वास्तव में किसी दूसरे स्कूल में उसकी शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते! ऐसा परिवार, जिसे तुलनात्मक रूप से मदद की अधिक आवश्यकता है।

लेकिन साथ ही हम यह भी जानते हैं कि यह पिता भी अधिक धनवान नहीं है! हम जानते हैं कि वह कई स्कूल ढूँढ़ लेगा लेकिन उसके लिए ऐसा स्कूल ढूँढ़ना मुश्किल होगा, जहाँ बच्चे को अच्छी शिक्षा भी मिल सके और जिसका खर्च वहन करने में उसे कठिनाई भी न हो। निश्चित ही, हमारे स्कूल की पढ़ाई का स्तर उसे किसी दूसरे स्कूल में नहीं मिलेगा! आखिर हम क्या कर सकते हैं-हमारी अपनी सीमाएँ भी हैं! अधिक से अधिक संख्या में गरीब बच्चों को पढ़ाने की परिकल्पना तो है लेकिन एक बिन्दु के बाद हमें ‘नहीं’ कहना ही पड़ता है।

मैं नहीं चाहता कि आगे ऐसी परिस्थिति निर्मित हो कि हमें यह तय करने की समस्या से दो-चार होना पड़े कि कौन पर्याप्त गरीब है और किसके पास काफी पैसा है कि बच्चे को हमारे स्कूल में भेजना उनके लिए आवश्यक न हो। फिलहाल तो हम ऐसा कर रहे हैं लेकिन भविष्य में हमारे पास एक कार्य-योजना है, जिससे हम यह काम कुछ अलग तरह से कर सकेंगे। उसके बारे में मैं आपको अगले कुछ दिनों तक बताता रहूँगा।

माता-पिता के प्रेम में अपने जीवन से खिलवाड़ – 23 अप्रैल 2015

कल मैंने अपने ब्लॉग में बच्चों के लालन-पालन संबंधी प्रश्नों पर अपने विचार रखे थे, जिसमें बहुत छोटे बच्चों और किशोरों के संदर्भ में ही चर्चा की थी। आज मैं उन बच्चों के विषय में चर्चा करना चाहता हूँ, जो जल्द ही वयस्क होने वाले हैं या हो गए हैं। यह मैंने कई बार खुद देखा है और मेरे सलाह-सत्रों में कई लोगों ने इस समस्या पर मुझसे चर्चा भी की है: जब अभिभावक, खासकर यदि अभिभावक एक ही हो अपने बेटे या बेटी पर इतना अधिक आश्रित हो जाते हैं कि वे उन्हें हाथ से निकलने ही नहीं देना चाहते-और इस तरह बच्चों को अपनी राह खुद चुनने की स्वतंत्रता में बाधक बनते हैं!

यह कुछ अमूर्त और जटिल सा लग रहा है लेकिन मैं एक उदाहरण की विस्तृत चर्चा से यह बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ कि मेरे कहने का अर्थ क्या है।

एक दिन बीस साल की एक महिला मेरे पास सलाह लेने आई। उसने बताया कि वह मेरी राय इसलिए चाहती है कि उसके आसपास के लोगों के मुक़ाबले मैं उसकी समस्या को पूरी तरह अलग नजरिए से देख सकूँगा। उसका मानसिक द्वंद्व इस प्रकार था:

वह अपनी माँ के साथ रहती थी। जब वह नौ बरस की थी, उसके माता-पिता ने तलाक ले लिया था और उसके बाद कुछ अप्रिय घटनाओं और आपसी विवादों के चलते उसने और उसकी माँ ने उसके पिता से कोई संपर्क नहीं रखा था। उसकी माँ ने अकेले ही उसका लालन-पालन किया था और पूरे दिलोदिमाग से सारा जीवन इसी काम में न्योछावर कर दिया था। अब वे आपस में बहुत नजदीक आ गए थे और सिर्फ और सिर्फ माँ पर ही बेटी का भरोसा था और उसे ही वह दुनिया में सबसे अधिक प्यार करती थी।

दो साल पहले इस युवा लड़की ने अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की और आगे की पढ़ाई हेतु देश भर के कई विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए आवेदन किया। कुछ विश्वविद्यालयों ने उसके आवेदन को स्वीकार करते हुए पत्र लिखे, जिनमें से एक उनके शहर के पास ही था और दूसरा, जिसमें वह दाखिला लेना चाहती थी, अधिक दूर था।

उसकी लालसा बाद वाले विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की थी, घर में माँ की छत्रछाया से दूर, बाहर निकलकर दुनिया को अपनी नज़रों से देखने की। अब वह जीवन के आगत रोमांच की कल्पना करने लगी और थोड़े अपराधबोध के साथ उसे लगता कि आज तक वह उससे पूरी तरह महरूम रही है-क्योंकि जिस तरह माँ उसकी देखभाल करती थी, उसी तरह वह भी तो उसकी देखभाल करती रही है! लेकिन फिर उसने तुरंत स्पष्ट किया कि वह अपनी माँ से बहुत प्यार करती है और उनसे बढ़कर उसके लिए कुछ भी नहीं है। यह भी कि, इसी तरह माँ भी उससे उतना ही प्यार करती है। कुल मिलाकर यह कि वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती थी, जिससे यह लगे कि वह एहसान फरामोश है, कृतघ्न है। माँ ने उसके लिए सब कुछ किया है, प्यार दिया है, श्रम किया है, तकलीफ़ उठाई हैं। अंततः वह घर पर ही रही। उसने उसी विश्वविद्यालय को चुना, जो घर के करीब था।

जब हमारी मुलाक़ात हुई थी, वह इसी परिस्थिति में जी रही थी। और अब माँ के कई व्यवहार उसे नागवार गुजरने लगे थे। जब भी माँ से वह कोई प्रतिवाद करती, तुरंत अपराधबोध से परेशान हो उठती और इस गुस्से को भी मन से निकाल न पाती कि माँ ने उसे वास्तविक जीवन जीने के अधिकार से वंचित कर रखा है। इस उलझन के साथ वह मेरे पास आई थी।

मैंने उससे कहा कि उसका गुस्सा साफ बताता है कि वह अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहती है। मैंने उसे ठीक वही करने के लिए प्रोत्साहित किया और वह भी बिना किसी अपराधबोध के। मैंने कहा, अगर वह ऐसा नहीं करेगी तो क्या हो सकता है, सामने आ चुका है, साफ दिखाई दे रहा है-जीवन भर की कटुता और विद्वेष! ऐसी भावनाएँ, जो आसानी से उसके और माँ के बीच के प्रेम को नष्ट कर देंगी।

उसकी बहुत सी महत्वाकांक्षाएँ थीं, बहुत से लक्ष्य, बहुत से सपने थे, इसलिए विशेष रूप से इस उम्र में उन्हें साकार करने की उसे कोशिश करनी चाहिए थी और जीवन के रोमांच में कूद पड़ना चाहिए था! इसका यह मतलब कतई नहीं था कि वह अपनी माँ को 'त्याग' देती, उनके साथ 'एहसान फरामोशी' करती! वह अब भी उनका ख्याल रख सकती थी-बस, कुछ अधिक दूरी से! और कुछ समय गुज़रने के बाद, जीवन में कुछ और स्थिरता और आज़ादी प्राप्त करने के बाद, आज के मुकाबले जीवन थोड़ा और संवर जाने के बाद हो सकता है कि वे भविष्य में पुनः एक साथ रहने का कोई रास्ता निकाल सकें! ऐसी परिस्थिति भी निर्मित हो सकती है कि वह माँ के और करीब रहकर उसकी सेवा कर सके। और यही सब मैंने उससे कहा।

मेरी नज़र में यही तरीका था जो बेटी को अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से जीने की स्वतन्त्रता प्रदान करते हुए उनके आपसी प्रेम की रक्षा कर सकता था-और मुझे विश्वास है, उसकी माँ ने भी इस बात को समझा होगा!

अपने माता-पिता को दोष देना बंद कीजिए – अपने जीवन की ज़िम्मेदारी खुद वहन कीजिए! 19 नवंबर 2014

मैंने अपने जीवन में अनेकानेक लोगों के साथ अपने व्यक्तिगत सत्र किए हैं। उनमें हम जीवन की समस्याओं, आपसी विवादों और जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण प्रश्नों पर बातचीत करते हैं। एक बात मैंने अक्सर देखी है कि अधिकांश लोगों को अपने अभिभावकों से बहुत शिकायत होती है और वे उनके प्रति विद्वेष से भरे होते हैं। मैंने उन्हें हमेशा समझाया है कि यह एक व्यर्थ का बोझ है, जिसे अपने कन्धों पर से उतार फेंकना चाहिए!

अक्सर मैंने लोगों को कहते सुना है कि जैसा व्यवहार हमारे अभिभावकों ने हमारे साथ किया था वैसा हम अपने बच्चों के साथ कभी नहीं करेंगे। अगर आप उनसे पूछें तो वे आपको अपने अभिभावकों के दुर्व्यवहार के कई उदाहरण दे देंगे और कहेंगे कि वे अपने बच्चों के साथ ऐसा नहीं करेंगे। वे दिल से मानते हैं कि अभिभावकों का ऐसा व्यवहार गलत है और इसका उन पर बुरा असर हुआ है या इससे उन्हें स्थाई क्षति पहुँची है।

कुछ लोग इतना स्पष्ट नहीं कहते और कुछ लोग कह देते हैं मगर अधिकतर लोग बताते हैं कि आज की उनकी कुंठाएँ, डर और असुरक्षा की भावना दरअसल कई साल पहले किए गए उनके अभिभावकों के दुर्व्यवहार का नतीजा हैं। कि वास्तव में यह उनके अभिभावकों का दोष है कि आज वे अपने काम में या जीवन में सफल नहीं हैं बल्कि भावनात्मक रूप से अस्थिर और असंतुष्ट हैं; खुद तो किसी से प्रेम नहीं कर पा रहे हैं और कोई दूसरा उनसे प्रेम करे तो भी उन्हें घबराहट और शंका होती है।

यह सही है कि आपका बचपन जिस तरह बीता और उन्होंने आपको जो सिखाया-समझाया, शिक्षा प्रदान की उसी के चलते आज आप जो भी हैं, वैसे है-मगर उन सालों में आपने क्या किया जब आप अपने अभिभावकों का घर छोड़कर बाहर निकल चुके थे? या उन सालों में, जब आप वयस्क हो चुके थे, अपनी खुद की ज़िम्मेदारी संभाल चुके थे, अपने निर्णय खुद लेने लगे थे?

आप एक वयस्क हैं! अपने जीवन के अच्छे-बुरे के लिए आप खुद ज़िम्मेदार हैं!

बचपन में लगातार कोई बात सीखने पर उसी तरह ढल जाना स्वाभाविक है लेकिन उसमें परिवर्तन लाया जा सकता है! स्पष्ट है कि अब आप समस्या की तह तक पहुँच गए हैं-अब आप यह बदलाव कर सकते हैं! आखिर आज अपने जीवन के निर्णय तो आप खुद ही लेते हैं!

अगर आप ऐसे किसी क्षेत्र में नौकरी कर रहे हैं जो आपको पसंद नहीं है तो उसमें परिवर्तन कर लें। आपके बचपन में माता-पिता ने आपकी भलाई के लिए ही सोचा था कि यह क्षेत्र भविष्य में आपके लिए आर्थिक रूप से उचित और सुरक्षित होगा लेकिन अगर आपको उस पेशे से घृणा है तो उसे छोड़कर किसी दूसरे मनपसंद विकल्प की तलाश करें। दूसरे क्षेत्रों में उपलब्ध शाम की कक्षाओं में पढ़ाई करें, समय बचाकर कोई दूसरी ट्रेनिंग ले लें, किसी दूसरे क्षेत्र में पार्ट-टाइम काम करें,…ऐसी बहुत सी संभावनाएँ हमेशा मौजूद रहती हैं जो आपको अपने जीवन में परिवर्तन लाने में मदद कर सकती हैं और आप अपना पसंदीदा क्षेत्र चुनकर खुशी-खुशी जीवन गुज़ार सकते हैं!

केवल आप स्वयं ही अपने आपको खुश रख सकते हैं! आप जो भी हैं, उसके लिए अपने माता-पिता को जीवन भर दोष देते नहीं रह सकते! किशोरावस्था में किसी समय आपने अपनी जिम्मेदारियाँ अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया था और यह प्रक्रिया आगे आपके वयस्क होने तक जारी रही होगी। उसके बाद तो आपने अपनी सारी ज़िम्मेदारी संभाल ही ली थी! आप अभी भी यही रोना रो रहे हैं कि माता-पिता के निर्णयों के कारण आप दुखी हैं तो इसका अर्थ यही है कि आप आज भी अपने जीवन की कुछ जिम्मेदारियाँ उन्हीं पर छोड़े हुए हैं! क्या आप समझते हैं कि यह उचित विचार है?

बदलाव लाइए और जब आप अपनी ज़िम्मेदारी अपने हाथों में लेंगे तभी खुशी भी आपके हाथों में होगी!

संदेहवाद अथवा अज्ञेयवाद एक पड़ाव है, अंतिम लक्ष्य नहीं – 16 जनवरी 2014

आज मैं धर्म या धार्मिक लोगों पर नहीं और नास्तिकों पर भी नहीं बल्कि संदेहवादियों या अज्ञेयवादियों (Agnosticism) पर कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहता हूँ।

जो इस शब्द को पहली दफा सुन रहे हैं, उनके लिए बता दूँ कि ये वही लोग हैं, जो अपने आपको आस्तिक तो नहीं मानते मगर नास्तिक भी नहीं मानते। लब्बोलुवाब यह कि वे मानते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व हो सकता है। वे इस बात पर सुनिश्चित नहीं हैं कि कोई परम शक्ति का अस्तित्व है या नहीं है। वे अपने आपको संशयवादी, संदेहवादी, अनिश्चयवादी और कुछ लोग और आगे जाकर, अपने झुकाव या प्रवृत्ति के अनुसार ‘अज्ञेयवादी आस्तिक’ या ‘अज्ञेयवादी नास्तिक’ कहते हैं।

अज्ञेय या संदेह वादी का तर्क यह होता है कि ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं, जिनका स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता और जबकि एक ओर ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है तो दूसरी तरफ यह भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं ही है। यह संदेह हमेशा रहेगा और इसलिए वे भी हमेशा संदेह में रहते हैं।

ईश्वर पर उनका यह संदेह आस्था के संभावित लाभों को त्यागे बिना धर्म पर संदेह जताने की चेष्टा से उपजे हैं। अगर यह अंततः सत्य प्रमाणित हो जाए तो आपको स्वर्ग, मोक्ष या वह सब प्राप्त हो जाएगा, जिसे आपकी आस्था (या धर्म) प्रदान करने का वचन देती है। लेकिन आपको वे लाभ मिल नहीं पाएंगे क्योंकि वास्तव में आप उन पर विश्वास ही नहीं करते! एक आस्तिक की नज़र में अगर आपके मन में संदेह है तो आप ईश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं हैं। अगर आपने ईश्वर के अस्तित्व के प्रति ज़रा सा भी संदेह व्यक्त किया है तो कोई भी धर्म आपको आस्थावान नहीं मानेगा। उनके अनुसार तो आप नास्तिक ही हैं। आप चाहते हैं कि आपके लिए एक खास वर्ग बनाया जाए और उसे कुछ विशिष्ट शर्तों के साथ ‘अज्ञेयवादी’ कहा जाए। आप ईश्वर पर विश्वास नहीं करते लेकिन चाहते हैं कि खुदा न खास्ता वह मौजूद हो ही तो फिर आप उसके लाभों से वंचित न रह जाएँ।

इस भौतिक दुनिया में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां आप यह सुनेंगे कि: संदेह करना अच्छी बात है। जब आप सत्य के रूप में स्वीकृत उन बातों पर प्रश्न खड़े करेंगे तभी आप कुछ आगे बढ़ सकते हैं; जैसे संदेह ही कई क्षेत्रों में हुईं बहुत सी वैज्ञानिक खोजों मे मूल में दिखाई पड़ता है। लेकिन जब मानव मस्तिष्क की बात होती है तब संदेह को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल मैं उसे संदेह मानता ही नहीं बल्कि उसे भ्रम कहता हूँ। और यह भ्रम की स्थिति उन लोगों के लिए और भी बुरी है क्योंकि वे न इधर के हैं न उधर के।

जो लोग अपनी आस्था पर अडिग हैं उनका मन-मस्तिष्क साफ है। वे जानते हैं कि ईश्वर है, वे जानते हैं कि उसका प्रेम और उसकी कृपा प्राप्त करने के लिए उन्हें क्या करना होगा और वे वैसा करते हैं। और जो आस्तिकता से मुक्त हैं वे भी अपनी आस्था को लेकर स्पष्ट हैं। वे जानते हैं कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है और उन्हें अपने नैतिक मूल्यों के अनुसार व्यवहार करने के अतिरिक्त और कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। जो भ्रम में जीते हैं उनके पास आस्तिकों की तरह मार्गदर्शन के लिए कुछ भी नहीं होता और न ही वे नास्तिकों की तरह मुक्त ही होते हैं!

मेरा विश्वास है कि यह स्थिति अंततः उनके व्यक्तित्व के लिए समस्या बन जाता है। किसी निर्णय पर पहुँचने में उन्हें समस्याएँ पेश आएंगी क्योंकि वे निश्चित नहीं हैं कि किधर जाना उचित होगा। क्या मैं खुद स्वतंत्रतापूर्वक कोई निर्णय ले लूँ या मुझे धार्मिक नियमों के बारे में समझकर निर्णय लेना चाहिए क्योंकि आखिर वे महत्वपूर्ण हो भी सकते हैं, भले ही आज वे अप्रासंगिक लग रहे हों? मैं वास्तव में कौन हूँ और कहाँ से आया हूँ? उन्हें अपनी पहचान के साथ समस्या हो सकती है, निर्णय न ले पाने की स्थिति आ सकती है जिसका कि परिणाम आखिर में मनोवैज्ञानिक समस्याओं के रूप में हो सकता है।

स्वाभाविक ही, संदेहवादी होना आस्तिक से नास्तिक हो जाने की प्रक्रिया के बीच कोई संक्रमण बिन्दु भी हो सकता है और मैं खुद भी कुछ समय तक इसी बिन्दु पर अटका रह चुका हूँ। यह एक संक्रमण काल होता है, जिसमें आप विभिन्न विचारों को आपस में मिलाते हैं, उन पर एक साथ विचार करते हैं और अंततः सत्य आपको स्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है। लेकिन स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है! किसी को भी अधिक समय तक भ्रम की हालत में नहीं रहना चाहिए अन्यथा मानसिक समस्याएँ पैदा होना अवश्यंभावी है!

अगर आप उनमें से एक हैं, जो अपने आपको ‘अज्ञेयवादी’ या ‘संदेहवादी’ के रूप में वर्गीकृत करते हैं तो आपकी भलाई इसी में है कि आप कृपया इस तरफ या उस तरफ होने का निर्णय अवश्य ले लें!

अपनी स्वाधीनता और ज़िम्मेदारी: परिवार का समर्थन और प्रोत्साहन- 1 दिसंबर 2013

मैं आपको पहले बता चुका हूँ कि सन 2005 में, जब मैंने अपने पिताजी से यह कहा कि मैं अब गुरु का काम नहीं करना चाहता और यह कि जिन धर्मग्रंथों का अनुसरण और अनुपालन मैं अतीत में किया करता था, अब नहीं करना चाहता तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी। उन्होंने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा था कि अगर ऐसा करके मैं खुश हूँ तो सारा परिवार खुशी-खुशी मेरे साथ है। मुझे उनकी इस प्रतिक्रिया से कोई आश्चर्य नहीं हुआ था।

दरअसल मैं पहले से जानता था कि वे यही कहेंगे। मुझे थोड़ी सी भी आशंका नहीं थी कि वे कोई दूसरी बात कह सकते हैं और जब मैंने उनके शब्द सुने तो मैं याद कर रहा था कि कैसे पहले भी अपने निर्णयों में मुझे उनका समर्थन और प्रोत्साहन मिलता रहा था।

जब मैं सिर्फ 13 साल का था, मैंने अपना काम शुरू कर दिया था और क्रमशः अधिकाधिक व्यस्त होता जा रहा था। कभी-कभी मैं अपने पिताजी के साथ उनके कार्यक्रमों में भी चला जाता था मगर अब मैं स्वतंत्र रूप से अकेले ही देश भर में घूम-घूमकर अपने कार्यक्रम भी करने लगा था। स्वाभाविक ही ऐसे कार्यक्रम सिर्फ स्कूल की छुट्टियों में ही नहीं होते थे इसलिए मुझे अक्सर स्कूल में अनुपस्थित रहना पड़ता था।

उस वर्ष अपने किसी कार्यक्रम के बाद जब मैं स्कूल आया तो मेरे एक शिक्षक ने पूछा कि मैं कहाँ था और मैं स्कूल क्यों नहीं आता। मैंने उन्हें बताया कि मैं दूसरे प्रांत, मध्य प्रदेश प्रवचन करने गया हुआ था। उन्हें पहले से पता था कि मैं क्यों स्कूल में अनुपस्थित रहता हूँ इसलिए उन्होंने पूछा: "जब तुम अक्सर स्कूल नहीं आते तो स्कूल आना पूरी तरह क्यों नहीं छोड़ देते?" उनकी बात का अर्थ यह था कि मैंने जब अपने पेशे का चुनाव कर लिया है तो स्कूल की चिंता छोड़कर पूरा ध्यान उस पर लगाना चाहिए।

मुझे कुछ समझ में नहीं आया। दरअसल यात्राओं में मैं हमेशा अपने साथ अपनी कोर्स की किताबें भी साथ रखता था और स्कूल की पढ़ाई भी करने की पूरी कोशिश करता था। नतीजतन, स्कूल से दूर रहने के बावजूद मैं पढ़ाई में कभी खराब विद्यार्थी नहीं रहा! अब मेरे शिक्षक कह रहे थे कि मैं स्कूल ही न आऊँ। समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए।

उस दिन जब मैं घर आया तो मेरे मन में यह बात घूम रही थी और मैंने अपने अभिभावकों से इस विषय में क्या करना चाहिए, पूछा। मेरे पिताजी ने जवाब दिया: वही करो, जो तुम्हें उचित लगता है।

आप कह सकते हैं कि एक 13 साल के बच्चे के लिए इस बात का निर्णय करना बड़ा मुश्किल था। लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा। बल्कि मैं उत्साह से भर गया कि मेरे पिताजी मुझ पर इतना विश्वास करते हैं, उन्हें लगता है कि मैं अपने बारे में सही निर्णय लेने में सक्षम हूँ और अपने दिल का कहा मानकर अपने बारे में कोई भी निर्णय लेने की मुझे स्वतन्त्रता है। और मैंने वही किया। मैंने अपना पेशा चुना, स्कूल नहीं।

इस बात ने मुझे एक साथ स्वतन्त्रता और ज़िम्मेदारी प्रदान की, अपनी प्रसन्नता और अपने हितों की रक्षा करने की मुझमें शक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया। उस समय सीखे हुए इस सबक के लिए मैं अपने अभिभावकों का सदा-सदा के लिए ऋणी रहूँगा। लगभग बीस साल बाद मेरे पिता ने फिर वही किया। जिन्होंने अपना जीवन ही धर्म की नीव पर खड़ा किया था और स्वयं एक धर्मगुरु थे और तब भी थे, जब उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अपने दिल का कहा मानूँ, भले ही उससे मेरी राह उस राह से अलग हो जाती थी, जिस राह पर वे स्वयं चलते रहे थे और मुझे भी चलने के लिए प्रेरित किया था।

इस तरह मैं जो भी हूँ, जो भी करूँ, अपने परिवार के लगातार समर्थन और प्रोत्साहन के लिए उन सभी का सदा के लिए ऋणी रहूँगा। हमने एक साथ अपनी जीवन-यात्रा शुरू की और मैंने कभी भी एक क्षण के लिए भी उन्हें मेरा साथ छोड़ते हुए नहीं पाया। वे हमेशा मेरे साथ खड़े रहे और उसी तरह मैं भी हमेशा उनकी इच्छाओं और निर्णयों के समर्थन में खड़ा रहूँगा। मैं समझता हूँ कि सिर्फ इसी तरह हम सब प्रसन्न रह सकेंगे!

जबरदस्ती अपने आपको झूठी ख़ुशी के हवाले न करें- 17 अक्तूबर 2013

हमारी प्रिय मित्र सिल्विया ने पिछले किसी दिन के ब्लॉग पर टिप्पणी करते हुए एक और विचार का ज़िक्र किया है, जो अपने आपको आध्यात्मिक मानने वाले लोगों में व्यापक रूप से प्रचलित है। इस पर पूरी तरह अमल करने पर यह भी, पिछले ब्लॉगों में चर्चित विचारों की तरह ही आपके लिए सरदर्द पैदा करने वाला सिद्ध होगा। काफी सोच-विचार के बाद और कुछ सीमा तक ही इस विचार को जीवन में उतारा जा सकता है: "आप स्वयं अपने आपको प्रसन्न कर सकते हैं!"

सिल्विया ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि इस कथन में कुछ औचित्य तो है मगर वह नहीं समझती कि उसे हर विपरीत परिस्थिति का इलाज मानते हुए हर कहीं लागू किया जा सकता है। इस विश्वास के चलते कि "आपको स्वयं अपनी खुशी प्राप्त करनी है" आप बहुत सी परेशानियों को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। मैं उसकी बात से सहमत हूँ और इस पर कुछ विस्तार से कहना चाहता हूँ।

इस सलाह के पीछे का विचार गलत नहीं है। आपका मूड कैसा हो इस बारे में आप सोच-समझकर स्वयं ही निर्णय लेते हैं। आप स्वयं ही यह निर्णय लेते हैं कि आप चीजों और परिस्थितियों को किस तरह ग्रहण करना चाहते हैं। आप स्वयं यह निर्णय ले सकते हैं कि आप किसी व्यक्ति के साथ, उसके प्रति दिल में पूर्वाग्रह रखते हुए मिलना चाहते हैं या खुले दिल से। आप खुद यह निर्णय लेते हैं कि मौसम आपका मूड खराब कर दे। यह आप पर निर्भर है कि आपकी सास की कोई टिप्पणी आपको परेशान और क्रोधित कर दे या न करे।

फिर भी मुझे यह बात माननी पड़ेगी कि इस नियम की कुछ सीमाएं भी है। उसका अर्थ यह नहीं है कि कितनी भी बुरी परिस्थिति में आप फंसे हों, अपनी मनःस्थिति को बदलकर खुश हो जाएँ! इसके विपरीत, इस तरह का सोच और रवैया आपके लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हो सकता है!

इसका अर्थ तो यह होगा कि मान लीजिए अपने साथी के साथ आपके सम्बन्ध ठीक नहीं है और वह आपको लगातार गालियाँ बकता रहता है और आपको बुरा लगता है कि उसे आपकी भावनाओं की कद्र नहीं है और इसके बावजूद आप इस परिस्थिति को बदलने का प्रयत्न नहीं करते बल्कि सोचकर बैठे रहते हैं कि इस परिस्थिति के लिए आप ही जिम्मेदार हैं। समझ बैठे हैं कि इसमें आपकी ही कुछ गलती रही होगी। आपको आत्मग्लानि हो रही है क्योंकि आपको बुरा लग रहा है और परिस्थिति से आप खुश नहीं हैं। आपको लग रहा है कि आपको अपनी आध्यात्मिकता का स्तर ऊंचा उठाना होगा, कि आपको पर्याप्त आत्मज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता है, जिससे समझ सकें कि ये विपरीत परिस्थितियाँ आपको और ऊंचा उठाती हैं। अगर आप इस हालत में भी खुश रह लेते हैं तो आपको लगेगा कि आप आध्यात्मिकता की एक सीढ़ी ऊपर उठ गए।

नहीं, नहीं, नहीं। इस वाक्य का यह अर्थ कदापि नहीं है! मैं अब भी उसे गलत नहीं कहूँगा बल्कि आप ही उसे ठीक तरह से समझ नहीं पाए कि अपने आपको खुश करने के लिए आपको क्या करना चाहिए! आपको इस परिस्थिति से अपने आपको निकालना होगा! इस बात को स्वीकार कीजिए कि जिसे आप चाहते हैं, जब वह आपका अपमान करता है तो आपको दुख होता है। यह बिल्कुल स्वाभाविक बात है कि आप ऐसा महसूस करते हैं! इसे स्वीकार करें कि आपको गुस्सा आता है, जब किसी काम पर आप हफ्तों मेहनत करते हैं और उसका सारा श्रेय आपका सहकर्मी उड़ा ले जाता है! स्वीकार करें कि आपकी भी कुछ आवश्यकताएँ हैं और जब वे पूरी नहीं होती तो आप दुखी होते हैं।

ये सभी भावनाएँ पूरी तरह उचित हैं। वे होती ही हैं और आवश्यक नहीं कि वे ‘नकारात्मक’ ही होती हों। वे इशारा करती हैं कि आप परिवर्तन चाहते हैं लेकिन उस परिवर्तन का अर्थ यह भी हो सकता है कि आप गाली-गलौज करने वाले लोगों से किनारा कर लें, अपना पक्ष किसी के सामने दृढ़ता के साथ रखें और कुछ समय अपने लिए भी बचाकर रखें, इत्यादि। जब तक आपको भीतर से खुशी न महसूस हो, नकली खुशी को जबर्दस्ती न ओढ़ लें। वह बिन्दु तलाश करें जहां आप खुश होते हैं-और उसके साथ आने वाली दूसरी भावनाओं का भी स्वागत करें!

शराब की लत – किसी भी व्यसन को अपने जीवन की कमान मत सौंपिए – 12 दिसंबर 08

एक बार एक योग टीचर चिकित्सा सत्र में आई। उसने बताया कि वो हर रोज शराब पीती है। जब उसने योग टीचर बनने का प्रशिक्षण लिया तब जरूर शराब का सेवन कुछ कम कर दिया था। उसने कहा कि, "कुछ समय पहले मैंने शराब पीना छोड़ दिया था, पर अब दोस्तों के साथ बाहर जाती हूँ तो शराब का सेवन कर लेती हूँ" । उसने बताया कि जब वो पीना शुरू करती है तो ये नहीं सोचती कि कितनी मात्रा में शराब पी लेती है। इस तरह महीने में एक या दो बार वो शराब का सेवन करती थी।

वो मुझसे कहने लगी कि, "मैं नहीं जानती कि योग मुझे शराब पीने की अनुमति देता है या नहीं। मुझे स्वयं महसूस होता है कि शराब मेरे लिए अच्छी नहीं है। लेकिन उस समय मैं सब भूल जाती हूँ और पीने लगती हूँ"। बस मुझे नियमों की बेड़ियों में जकड़े जाना बिल्कुल पसंद नहीं है। मैंने उससे पूछा कि, "फिर आप शराब के नियंत्रण में क्यों रहना चाहती हैं? न मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ न ही योग टीचर, अगर वाकई कोई आपकी सहायता कर सकता है तो वो स्वयं आप हैं"।

मैंने उससे कहा कि नियमों की बेड़िया तो मुझे भी पसंद नहीं है। न मैं किसी पर नियम थोपता हूँ न स्वयं नियमों में जकड़े जाना चाहता हूँ। मुझे समझ नहीं आता कि लोग दूसरों पर नियंत्रण क्यों रखना चाहते हैं। वहीं दूसरे लोग नियंत्रण में रहकर कैसे अच्छा महसूस करते हैं? यकीनन वह महिला शराब के नियंत्रण में थी। उसने कहा कि वो इसकी आदी नहीं है। अकेले में वो शराब को हाथ तक नहीं लगाती। लेकिन अपने दोस्तों के साथ बाहर जाने पर ही वो अपना नियंत्रण खो देती है। इसका अर्थ ये हुआ कि ये इच्छा उसके अंदर से नहीं बल्कि बाहर से आती थी। जो काम आप करना नहीं चाहती हैं उसे बाहरी दबाव में कर रही हैं। आखिर बाहरी चीजें आपको क्यों नियंत्रित कर रही हैं?

शराब पीने का फैसला आपका नहीं है। आप शराब पीकर अच्छा महसूस नहीं करती फिर भी आप पीती हैं। इससे उबरने के लिए आपको इच्छा शक्ति और दृढ़ निश्चय की आवश्यकता है। जब आप इसे अपनाना शुरू करेगी शराब का सेवन नहीं करेगी। मुझे पूरा भरोसा है। अगर आपके मन में शराब और धुम्रपान को छोड़ने की इच्छा शक्ति है तो आप उसे छोड़ सकते हैं।

नशे के आदी बच्चों के माता-पिता क्या करें – 11 दिसम्बर 08

एक माँ अपने 15 साल के बेटे की समस्या लेकर मेरे सामने आई। उसने बताया कि उसका बेटा इंटरनेट गेम्स का आदी हो गया है। गेम्स में बेहतर कर दिखाने के लिए वो पैसे के साथ समय भी व्यर्थ करता है। उसने कहा कि अपनी इसी गेम खेलने की लत की वजह से उसने मेरे क्रेडिट कार्ड से 3000 यूरो खर्च कर दिए|

एक अन्य मां ने बताया कि उसका बेटा तो घर पर ड्रग्स लेने लगा है। वहीं एक महिला ने शिकायत की कि उसकी 13 साल की बेटी घर पर नशे में धुत्त आती है। इसी तरह एक की शिकायत थी कि उसकी 16 साल की बेटी सुबह चार बजे पार्टी से घर आती है। वहीं एक ने बताया कि उसका किशोर बेटा तब तक शराब पीता है जब तक बेहोश न हो जाए और अस्पताल ले जाने की नौबत न आ जाए।

ये सब परेशानियां मैं माता-पिता से अक्सर सुनता हूँ। इनको सुनने के बाद मैं सोचता हूँ कि हमारे समाज के युवाओं को क्या हो गया है? इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? क्यों वो अपने माता-पिता की नजरों से सम्मान खो रहे हैं? क्यों वो अपने शरीर, मन और आत्मा के साथ गलत कर रहे हैं? ये स्थिति रात-बिरात पैदा नहीं हुई है बल्कि वर्षों की प्रक्रिया का दुष्परिणाम है। शायद स्थिति इतनी बदतर न होती अगर माता-पिता बच्चों की पहली सिगरेट या शराब से ही उन पर ध्यान देना शुरू कर देते।

मैंने इस विषय पर पहले भी बात की है और मुझे लगता है कि ये समाज का महत्वपूर्ण विषय है। इन समस्याओं से हम जूझ रहे हैं और अपने बच्चों व युवाओं के भविष्य के लिए हमें इस पर सोचना होगा। मुझे लगता है कि इन स्थितियों के पैदा होने में कहीं न कहीं माता-पिता भी जिम्मेदार होते हैं। व्यस्तता के चलते ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को वो समय और प्यार नहीं दे पाते जिनकी अपेक्षा बच्चे करते हैं। उन्हें बच्चे के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। उन्हें अपने काम और मौज-मस्ती में इतना खो नहीं जाना चाहिए। कम से कम बच्चे की खास उम्र में उस पर ध्यान देना अति-आवश्यक है।

मैं बच्चों की स्वतंत्रता का समर्थन करता हूँ। लेकिन एक खास उम्र में जब वे पूरी तरह से विकसित नहीं होते उन्हें मार्गदर्शन की जरूरत होती है। उनको कोई ये बताने वाला होना चाहिए कि ये सही है, ये गलत, ये अच्छा है और ये बुरा है। बड़ों को ये सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे उनकी आज्ञा का पालन करें। इसके लिए उन्हें कड़ा रुख अपनाना होगा। प्यार और स्वतंत्रता होनी चाहिए पर नियंत्रण की भी आवश्यकता है। नियंत्रण से बाहर होने की स्थिति में किशोर गलत रास्ता अपना लेते हैं। आपको उन्हें इसलिए नियंत्रित करना होगा क्योंकि आप उन्हें बहुत प्यार करते हैं और उन्हें किसी कीमत पर भी गलत मार्ग पर जाने नहीं दे सकते। कई बार अच्छा न लगने पर भी आपको कड़ा होकर निर्णय लेना पड़ता है। आपका बच्चा भी इससे खुश न हो शायद पर जब आप दूर की सोचेंगे तो बच्चे के लिए अच्छा होगा।

माता-पिता बच्चे के आदर्श होते हैं। आप स्वयं भी ऐसा कुछ मत कीजिए जो आप अपने बच्चे में देखना नहीं चाहते। अन्यथा वो आपसे जो सुनेंगे वही सीखेंगे और जो आपको करते देखेंगे वही करेंगे। अपने बच्चों को प्रेम कीजिए, अच्छा है। उन्हें स्वतंत्र भी रखिए पर साथ ही उन्हें ये भी बताईए कि क्या गलत है।