संगीत, योग, नृत्य और सेक्स का अद्भुत समन्वय! 24 अगस्त 2014

सन 2006 में ऐंग्सबका, स्वीडन में आयोजित "नो माइंड फेस्टिवल" के बारे में मैंने आपको बताया था, जहाँ मैं दो सप्ताह रहा और कई व्याख्यान दिए थे। मैंने ज़िक्र किया था कि आगंतुकों ने वहाँ बेहतरीन वक़्त गुज़ारा, वहाँ उन्हें बेफिक्र और तनावमुक्त वातावरण उपलब्ध था। और आज मैं अपने उसी विवरण को आगे बढ़ाता हूँ: उन दो हफ्तों में ढेर सारा सेक्स भी देखा गया!

जी हाँ, उत्सव के उन दो हफ्तों में बहुत से लोग एक-दूसरे के साथ बल्कि यों कहें कि अजनबियों के साथ भी सो रहे थे। वे वहाँ मौज-मस्ती करने आए थे और आप जानते ही हैं कि कौन सी बात अधिकतर लोगों को आनंद प्रदान करती है? जी हाँ, वही!

मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। वहाँ रोज़ नए प्रेमी युगल दिखाई देते थे, लोग दिन में आपस में मिलते थे, शाम को आग के चारों ओर बैठते और धीरे-धीरे नजदीक आते हुए उस ओर पहला कदम बढ़ाते। अक्सर, वे एक साथ हाथ में हाथ डाले टेंट का रुख करते। मुझे एहसास हुआ कि उनमें से कुछ लोग वहाँ सिर्फ इसीलिए आए थे।

अब जो बात मैं आपसे कहना चाहता हूँ वह बहुत महत्वपूर्ण है: जब मैं ऐसी पंक्तियाँ लिखता हूँ तो मेरे कुछ पाठक सोच सकते हैं कि मैं जिन बातों का वर्णन कर रहा हूँ, वे बुरी बातें है। कुछ यह भी सोच सकते हैं कि ऐसे आयोजन में मेरी उपस्थिति ही अनुचित थी। और, कुछ दूसरों को यह एहसास होता होगा कि मैं खुद भी इसे गलत मानता हूँ, कि मैं इस उत्सव और उसके आयोजकों की आलोचना कर रहा हूँ।

अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो गलत सोच रहे हैं। जब मैं उन लोगों के बारे में लिखता हूँ, जो सेक्स में मुब्तिला होते हैं तो मैं सिर्फ वह लिखता हूँ जो मैंने अपनी आँखों से देखा। जब आप सुनते हैं तो आप अपने कानों से सुनते हैं। लेकिन मैं वास्तव में ईमानदारी के साथ विश्वास करता हूँ कि यह पूरी तरह नैसर्गिक और सुंदर है!

अपने शहर में आप अपने जैसा सोचने वाले जितने लोगों से मिल सकते हैं उससे कहीं अधिक लोगों आप इस तरह के आयोजनों में मिल पाते हैं! आखिर वे वहाँ आए ही इसलिए हैं कि वे भी आप जैसा ही सोचते हैं, वही चाहते हैं जो आप भी चाह रहे होते हैं! ऊपर से वहाँ कई ऐसी कार्यशालाएँ चल रही होती हैं जो आपको अपनी यौनेच्छाओं को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती हैं। उदाहरण के लिए, मैंने भी वहाँ एक व्याख्यान 'सेक्स और स्वतंत्रता' विषय पर दिया था। फिर वहाँ कुछ सेक्स सम्बन्धी कार्यशालाएँ भी चल रही थीं और कुल मिलाकर हर तरफ यही सन्देश दिया जा रहा था कि आपको अपनी भावनाओं का दमन करने की जगह उन्हें व्यक्त होने के लिए खुला छोड़ देना चाहिए।

तो अगर आपको अच्छा लग रहा है, आप किसी की तरफ आकर्षित हैं और सामने वाला भी आपके प्रति यही महसूस कर रहा है तो फिर एक रात एक-दूसरे के साथ क्यों न गुज़ारी जाए? अगर यह साथ आगे बढ़ता है तो बहुत अच्छा! नहीं, तो भी कोई बात नहीं! उस उत्सव में मेरे अंदर भी अगर किसी के लिए ऐसी भावना पैदा हो जाती तो मैं भी वही करता- और उसे बुरा भी नहीं मानता! मैं उस वक़्त अकेला भी था-लेकिन एक कार्यशाला निदेशक के रूप में मेरे पास दूसरी भी कई जिम्मेदारियाँ थीं और मैं उन लोगों के साथ बहुत करीबी रिश्ते नहीं बनाना चाहता था, जिनके साथ मैं काम कर रहा था।

इतना पढ़ने के बाद अगर आप यह सोच रहे हैं कि वह उत्सव सिर्फ सेक्स के बारे में था तो मैं आपको रोकना चाहता हूँ। जैसा कि मैंने पिछले सप्ताह बताया था, सौन्दर्य से ओत-प्रोत नैसर्गिक वातावरण में वहाँ कई बढ़िया कार्यशालाएँ, व्याख्यान, योग-सत्र, पेंटिंग, बहुत सा संगीत और सुंदर नृत्य आदि के कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। एक दूसरे के साथ होने की संभावना, अपने समय का सम्पूर्ण आनंद उठाना, सिर्फ दूसरों के साथ ही नहीं खुद अपने आपसे साक्षात्कार करना। लोग वाकई वहाँ बड़े खुश थे।

उन दो हफ्तों के "नो माइंड फेस्टिवल" की मेरी यही सुखद स्मृतियाँ हैं। व्यक्तिगत रूप से मैं खुद भी बहुत से लोगों से मिल सका, उन्हें जान सका। उनमें से कई मेरे बहुत अच्छे मित्र बन गए, जिनके साथ आज भी मेरे प्रगाढ़ संबंध बरकरार हैं।

एक भारतीय संगीतकार को साथ ले जाकर पश्चिमी देशों में कार्यक्रम प्रस्तुत करने का सुनहरा मौक़ा देना- 8 दिसंबर 2013

मैंने पहले आपको बताया था कि सन 2005 की शुरुआत में जिस संगीतकार को मैं यूरोप दौरे पर अपने साथ ले गया था, उसने मुझे अपने रवैये से बहुत निराश किया। बाद में मैंने निर्णय किया कि भविष्य में उसे अपने साथ कभी नहीं ले जाऊंगा। लेकिन मैं जानता था कि अपने कार्यक्रमों में किसी संगीतकार का साथ होना लाभप्रद है-आखिर संगीत से कार्यक्रम की शोभा बढ़ती ही है-इसलिए 2005 के आखिरी महीनों में जब दोबारा यूरोप प्रवास का अवसर आया तो मुझे पुनः किसी संगीतकार की तलाश थी।

शायद आप लोग अनभिज्ञ होंगे कि ऐसा अवसर किसी भी संगीतकार के लिए बड़ा सुनहरा मौका होता है। पश्चिमी देशों में कार्यक्रम प्रस्तुत करने का, दुनिया घूमने का और भारत के बाहर प्रसिद्धि प्राप्त करने का अवसर मिलना किसी भी संगीतकार का एक स्वप्न होता है! उन्हें लगता है कि पश्चिम की धरती पर पाँव रखते ही उन्हें सड़कों पर पड़ा सोना मिल जाएगा, सफलता उनके कदम चूमेगी, आसमान से धन बरसेगा और चारों ओर सुख-सुविधा होगी। इसलिए जब भी ऐसा कोई मौका दिखाई दे, लपक लो, छूटने न पाए!

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि संगीतकार ऐसा सोचते हैं और मुझे लगता है कि यह बहुत हद तक सही भी है। भारत में असंख्य औसत दर्जे के, बहुत से अच्छे और कुछ बेहतरीन संगीतकार हैं। यह बहुत विशाल देश है और हर योग्य संगीतकार को उसकी प्रतिभा और रियाज़ के अनुपात में स्वीकृति और मान्यता प्राप्त नहीं हो पाती। लेकिन अगर पश्चिम में किसी दूसरे संगीतकार, गुरु या वक्ता के साथ आपको स्टेज साझा करने का मौका मिलता है तो तुरंत ही आपको अपनी योग्यता प्रदर्शित करने का अवसर प्राप्त हो जाता है, वह भी एक ऐसे बाज़ार में, जहां आज भी भारतीय संगीत की बड़ी मांग है। इसके अलावा आपका संपर्क भी तेज़ी के साथ विस्तार पाता चला जाता है। किसी भी संगीतकार के लिए पश्चिमी देशों की उनकी पहली यात्रा उनके सफल अंतर्राष्ट्रीय कैरियर की पहली सीढ़ी होती है।

लेकिन बहुत से लोगों के लिए ऐसी यात्रा उनकी पहली और आखिरी विदेश यात्रा सिद्ध होती है क्योंकि वे दूसरी संस्कृतियों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते या क्योंकि रुपया सड़क पर पड़ा नहीं मिलता कि झुके और उठाकर जेब में रख लिया या क्योंकि वे इतने प्रतिभाशाली और योग्य नहीं होते, जितना उन्हें साथ ले जाने वाले ने शुरू में समझा था।

फिर भी कोशिश वे करते ही हैं और इस तरह मुझसे परिचित सभी भारतीय संगीतकार मुझसे हजारों बार पूछ चुके हैं कि क्या मैं उन्हें अपनी विदेश यात्राओं में साथ ले जाऊंगा। इसलिए जब मैं 2005 में किसी संगीतकर की तलाश में था तब मेरे पास संगीतकारों के चुनाव के लिए बहुत से विकल्प मौजूद थे। मैं कई बार पहले भी विभिन्न वाद्य-यंत्र बजाने वाले साज़िंदों और संगीतकारों को अपनी विदेश यात्राओं में साथ ले जा चुका था इसलिए इस बार उनके चुनाव में अपने उन अनुभवों का उपयोग करने का प्रयास करना चाहता था।

आखिर मैंने एक संगीतकार का चुनाव किया, जो पहले भी भारत में मेरे साथ यात्राएं कर चुका था, जिसे मैं व्यक्तिगत रूप से जानता था और जिसके विषय में मैं विश्वासपूर्वक कह सकता था कि वह मेरे काम के लिए पर्याप्त प्रतिभाशाली और पारंगत था। जब उसे अपने चुनाव के विषय में पता चला, वह खुशी से उछल पड़ा और तुरंत अपनी योजना बनाकर मेरे साथ आने के लिए तैयार हो गया। और उसके वीसा, टिकिट की व्यवस्था करने में जादा समय नहीं लगा और सूटकेस तो तैयार ही रखा था।

अब मेरे पास एक नया संगीतकार था-और स्वाभाविक ही एक बार फिर मुझे एक नया अनुभव प्राप्त होने वाला था, मगर उसके बारे में अगले हफ्ते आपको बताऊंगा!

जब मेरे संगीतकारों को मेरे कार्यक्रम में भाग लेने के लिए वीजा नहीं मिला-28 अप्रैल 2013

डबलिन में होने वाले जिस भव्य कार्यक्रम की योजना हम पिछले छह माह से बना रहे थे वह आखिर सन 2005 की गर्मियों में हम कर पाए। मेरे आयरिश मेजबान उसमें विशाल संख्या में लोगों के शामिल होने की अपेक्षा कर रहे थे इसलिए बड़े पैमाने पर तैयारियां बहुत पहले से ही शुरू कर दी गई थीं। कार्यक्रम के लिए संगीतज्ञों को लेकर आना मेरे ज़िम्मे था और मैंने संगीतज्ञों के अलावा कुछ योग शिक्षकों को भी अपनी सहायता के लिए शामिल कर लिया था। योग संबंधी एक कार्यक्रम भी पूरे आयोजन का हिस्सा था। लेकिन मुझे इसमें बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

मैं संगीतज्ञों के समूह को पहले से ही जानता था क्योंकि वे मेरे साथ भारत में भी मेरे कार्यक्रमों के दौरान साथ रहते और सफर किया करते थे। यही लोग थे जिन्हें मैं आयरलैंड में भी आमंत्रित करना चाहता था। वे छह या सात संगीतज्ञों का समूह थे और उनमें बाँसुरी-वादक, सितार-वादक, तबला-वादक सारंगी-वादक, जो एक वायलिन जैसा भारतीय वाद्य बजाते थे, के अलावा कुछ सहवाद्य बजाने वाले भी थे। इन सबके अलावा एक गायक भी थे।

कहना न होगा कि इन सब को आयरलैंड आने के लिए वीजा की आवश्यकता थी और मैंने आयोजकों को इसकी जानकारी दे दी थी। मैंने पूछताछ की और उन्हें बताया कि ठीक किन-किन दस्तावेज़ों की ज़रूरत होगी। सारे कागजात तैयार किए गए और उन्हें भारत भेजा गया। फिर मैंने अपने संगीतज्ञों को बताया कि उन्हें क्या कार्यवाही करनी है और उन्होंने आवेदन प्रस्तुत करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

कार्यक्रम का दिन नजदीक आ रहा था और कार्यक्रम वाले दिन को अब सिर्फ एक हफ्ता रह गया था। तब भारत से एक फोन आया जिसे सुनकर हम स्तब्ध रह गए:दूतावास ने उन सबके वीजा आवेदन रद्द कर दिये थे। संगीतज्ञ आयरलैंड की यात्रा नहीं कर सकते थे। अब मैं क्या करूँ, यह प्रश्न उपस्थित हो गया था।

यही राहत थी कि उन सबकी टिकटें मैंने नहीं खरीदी थीं। जीवन यही है, कई बार चीज़ें आपकी योजनाओं के अनुसार नहीं होतीं और आपको वैकल्पिक इंतज़ाम करने पड़ते हैं। यही मैंने किया। कुछ देर यह सोचने के बाद कि क्या करना चाहिए, मैंने तय किया कि संगीतज्ञों की ज़रूरत तो हर हाल में होगी क्योंकि वह बहुत बड़ा आयोजन था जिसमें सारा दिन कार्यशालाएँ चलनी थीं। हर व्याख्यान के बाद सहभागियों को थोड़े अवकाश की आवश्यकता होगी और फिर संगीत वैसे भी पूरे कार्यक्रम को हल्का-फुल्का बनाने में मदद कर सकता था।इसके अलावा ध्यान-योग की कार्यशाला में भी लोगों की विश्रांति के लिए वह आवश्यक था। विकल्प के रूप में एक गायक मुझे इंग्लैंड में ही मिल गईं जिनसे मैं लगभग छह माह पहले ही, लंदन में कदम रखते ही थोड़े समय के लिए मिला था। वैसे भी वे आने वाली थीं मगर अब हमारे पास संगीतज्ञ के नाम पर एक मात्र गायक उपलब्ध था। तो अब मुझे किसी तरह वाद्य बजा सकने वाले, और संभव हो तो भारतीय वाद्य बजाने वाले संगीतज्ञों की खोज करनी थी। फिर उनके पास वक़्त भी होना चाहिए था और अगले हफ्ते आयरलैंड आने की आवश्यक अनुमति भी।

मैंने कुछ मित्रों को फोन करना शुरू किया। एम्स्टर्डम के एक डच तबला-वादक, जो पहले भी मेरे एक कार्यक्रम में बजा चुके थे, आने के लिए तुरंत तैयार हो गए। वे बहुत खुश हुए कि उन्हें बजाने का मौका मिलेगा और उन्होंने कुछ अन्य वाद्य बजाने वाले मित्रों के सहयोग का आश्वासन भी दिया। कुछ देर बाद ही उनका फोन आया कि उसके एक जर्मन मित्र बाँसुरी बजाते हैं और आने के लिए तैयार हैं! इस तरह हमारे पास गाने-बजाने वालों का एक छोटा सा ही मगर पर्याप्त समूह उपलब्ध हो गया। काश, मुझे एक तार-वाद्य बजाने वाला भी मिल सकता, मैं सोच रहा था!

मैं आयरलैंड पहुँच गया और वहाँ भी लोगों के कानों में यह बात डाल दी कि मुझे अभी एक और संगीतज्ञ की आवश्यकता है। आखिर जब तकनीकी लोगों का दल मुझसे मिलने आया और उनमें से एक ने बताया कि उसके एक मित्र सितार बजाते हैं तो मैं समझ गया कि मेरा काम हो गया!

कार्यक्रम बेहद रोमांचक रहा और वहाँ के अखबारों ने उसे पर्याप्त जगह दी। इसके अलावा उन्होंने हमारे संगीतज्ञों को हुई वीजा समस्या को भी अपने अखबार के जरिये उठाया। उन्होंने कुछ मज़ाकिया टिप्पणियाँ भी कीं मगर मैं प्रसन्न था-मेरे पास एक शानदार संगीत समूह था और उन्होंने शानदार कार्यक्रम प्रस्तुत किया था!

जब मेरे भारतीय वादक को पश्चिमी शौचालय इस्तेमाल करने का तरीक़ा सीखना पड़ा – 6 जनवरी 13

जब 2005 की गर्मियों और वसंत में मैं जर्मनी और यूरोप की यात्रा पर था, तब वहां के विभिन्न शहरों में लगने वाली कार्यशालाओं, आख्यानों और आध्यात्म के लिए मैंने योजनाएं पहले ही बना ली थी। जब मैं भारत में था तभी मोटे तौर पर मैंने इसका लेखा-जोखा तैयार कर लिया था और कार्यक्रमों को उसी अनुरूप होता देखकर मैं खुश था। जब यह स्पष्ट हो गया था कि उस दौरान मैं बहुत व्यस्त रहने वाला हूं, तो मैंने अपने कार्यक्रमों को संगीत से जोड़ने का निर्णय भी लिया. यानी अपने साथ मैंने एक वादक (स्थानीय भाषा में – गवैया) को ले जाने की योजना भी बनाई।

मैंने हमेशा वादकों के साथ कार्यक्रम किए थे क्यूंकि संगीत एक अद्‍भुत माहौल तैयार करता है। संगीत अच्छा महसूस कराता है, तनाव दूर करता है, और इससे आध्यात्म में पहुंचने में सहायता मिलती है। उस दौरान मैं अक्सर स्थानीय वादकों से मिलकर उनकी प्रतिभा के बारे में और इस बारे में कि क्या वे मेरे कार्यक्रम का हिस्सा बनना चाहेंगे, पूछता था। इस बार मैंने निर्णय लिया कि भारत से अपने कार्यक्रम के लिए एक वादक भी ले जाऊंगा, जैसा कि मैंने लंदन में अपने एक कार्यक्रम में या भारत में होने वाले अपने सभी कार्यक्रमों में किया था। मैंने अपने आयोजकों से बातचीत की, उनसे एक औपचारिक आमंत्रण लिखने को कहा ताकि उसके लिए वीज़ा की व्यवस्था हो सके।

उस वादक ने कभी भारत से बाहर एक क़दम भी नहीं रखा था और ज़ाहिर है वह इस बात से खुश था कि मैंने अपने कार्यक्रमों में उसे बाँसुरी बजाने के लिए आमंत्रित किया था। कुछ औपचारिकताएं रह गई थीं, लेकिन उन्हें पूरा करने में कोई समस्या नहीं आई, और उसे आसानी से वीज़ा मिल गया। तब मैं पहले से ही जर्मनी में था। मैं एक दूसरे शहर में काम में व्यस्त था इसलिए मैंने माइन्ज़ के अपने कुछ मित्रों से पूछा कि क्या वे मेरे वादक को फ़्रैंकफ़र्ट हवाईअड्डे से ले आएंगे। मेरे वे सभी मित्र भी संगीत से ही जुड़े थे, ऐसे में एक भारतीय सहकर्मी का अपने घर में स्वागत करना उनके लिए खुशी का विषय था! उन्होंने उसे हवाईअड्डे से लिया और वहां उस देश में पहुंचने तक उसे एक-दो दिन तक अपने साथ ही रखा – ताकि वे आपस में एक-दूसरे से संगीत बांट सकें।

समय बीत गया, उन्होंने उसके साथ थोड़ा समय गुज़ारा और अंत में उसे कोलोन के लिए जाने वाली एक ट्रेन में बैठा दिया जहां उस दौरान मैं रहता था। अगर आप मैंज़ के मेरे मित्रों से मिलेंगे और उस समय के बारे में पूछेंगे जो उन्होंने मेरे भारतीय वादक के साथ बिताया था, तो वे हँसते हुए अपने घर में आए अनुभवहीन भारतीय मेहमान का किस्सा बड़े चाव से सुनाएंगे।

वे बताते हैं कि मेरे बाँसुरी वादक ने अपने आगमन के पहले दिन उनसे एक बाल्टी मांगी थी। मेरी मित्र को लगा कि संभवतः वो उसमें कुछ धोना चाहता है या शायद बाल्टी से नहाने का अभ्यस्त होगा, उन्होंने उसे एक बाल्टी दे दी जिसे उसने बाथरूम में रख दिया। मेरी मित्र ने इस बारे में तब कुछ अधिक सोचा नहीं, लेकिन जब अगली बार उन्हें शौचालय जाना था, वे गईं, उन्होंने अंदर से दरवाज़ा लगाया, अपनी पतलून नीचे की, सीट पर बैठीं – और अचानक आश्चर्य से चीखती हुई उछलकर खड़ी हो गईं: शौचालय की सीट बिल्कुल गीली थी! उसे (मेरे वादक को) समझ ही नहीं आया था कि टॉइलेट का फ़्लश कैसे काम करता है और उसने शौच में कई बाल्टी पानी उड़ेला था ताकि गंदगी चली जाए, इससे न केवल सीट बुरी तरह भीग गई थी बल्कि बाथरूम का पूरा फ़र्श भीग गया था! मेरी मित्र जब भी यह क़िस्सा अपने जीवंत अंदाज़ में सुनाती हैं तो सुन रहे सारे लोगों के मुंह से हँसी फूट पड़ती है!

और हाँ, उन्होंने मेरे भारतीय वादक फ़्लश का इस्तेमाल करना सिखाकर यह भी सुनिश्चित किया कि वह आगे अपने साथ-साथ किसी को भी ऐसी असहज स्थिति में न डाले। दिखने में यह बेहद छोटी चीज़ लगती है लेकिन यह आपके बाद शौचालय का इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए और उनकी सुविधा के लिए बहुत ज़रूरी है!