भारत में शिक्षा व्यवसाय को बंद कराने में अम्माजी’ज़ आयुर्वेदिक रेस्तराँ किस तरह सहायक होगा? 21 मई 2015

इस हफ्ते की शुरुआत में मैंने भारत में शिक्षा संबंधी एक महती समस्या और बराबरी को लेकर अपनी परिकल्पना के बारे में आपको बताया था। शिक्षा व्यवसाय में मौजूद बड़े व्यापारी घरानों को कैसे चुनौती दी जा सकती है, इस संबंध में मैंने कल विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए थे। आज मैं इससे भी अधिक ठोस योजना आपके सामने रखने जा रहा हूँ और बताना चाहता हूँ कि मैं कैसे इस बात की कल्पना कर पा रहा हूँ कि हमारे आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी’ज़ की सहायता से मेरा यह स्वप्न यथार्थ में परिणत हो सकता है।

इतने साल तक हम अपने स्कूल और दूसरी चैरिटी परियोजनाओं को अपने व्यवसाय और प्रायोजकों तथा दूसरे मददगारों के सहयोग से चलाते रहे हैं। हमारे सारे व्यावसायिक ग्राहक और अधिकांश आर्थिक मददगार पश्चिमी देशों के लोग रहे हैं। ऐसे गैर भारतीय, जो योग और आयुर्वेद विश्राम सत्रों में शामिल होने यहाँ आते हैं, जो हमारी कार्यशालाओं में सम्मिलित होते हैं या व्यक्तिगत सलाह-सत्रों में अपनी समस्याएँ लेकर आते हैं। इसके अलावा कुछ गैर भारतीय वैसे भी, हर तरह से गरीब बच्चों की आर्थिक मदद करना चाहते हैं इसलिए हमारे इन कामों में आर्थिक सहयोग करते हैं।

अब एक आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी'ज़ शुरू करने के साथ हम एक नए व्यवसाय में कदम रखने जा रहे हैं। वहाँ हम भोजन के शौकीनों के लिए उच्च गुणवत्ता वाला भोजन मुहैया कराएँगे और इस तरह उनके शरीर और स्वास्थ्य के लिए भी कुछ बेहतर कर पाएँगे। गलत खाद्य के ज़रिए हम बहुत सी बीमारियों को न्योता देते हैं-और अम्माजी'ज़ में न सिर्फ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग स्वास्थ्यवर्धक भोजन कर पाएँगे बल्कि अपने चटोरे मित्रों और बच्चों को भी परितुष्ट कर पाएँगे! वहाँ हम आहार और शारीरिक पोषण संबंधी टिप्स और जानकारियाँ उपलब्ध कराएँगे, जो हमारे यहाँ की विशेषता होगी और एक अतिरिक्त लाभ भी क्योंकि जब भी आप यहाँ भोजन करने आएँगे, अपने बच्चों की निःशुल्क शिक्षा में मददगार भी हो रहे होंगे!

जल्द ही हमारे यहाँ बहुत से भारतीय मेहमान भी आने लगेंगे और तब हम ऐसे बिंदु पर पहुँच जाएँगे जब न सिर्फ हम गरीब बच्चों की मदद करते रह सकेंगे बल्कि कुछ बड़ी परियोजनाओं पर भी काम कर सकेंगे! हम एक स्तरीय स्कूल खोलेंगे, जहाँ हर संभव सुविधाएँ होंगी-वह भी पढ़ने वाले हर बच्चे के लिए पूरी तरह मुफ़्त! और हाँ, हमारे रेस्तराँ के ग्राहकों के बच्चों के लिए भी!

जी हाँ, वास्तव में जब भी आप हमारे स्कूल में भोजन करने आएँगे तो उस पर खर्च होने वाला एक एक रुपया आपके बच्चे की बेहतर शिक्षा पर खर्च किया जाएगा! इस तरह हमारा यह नया व्यवसाय भी इस स्कूल की मदद में पूरी तरह सहभागी होगा!

मेरा विश्वास है कि इस मिशन और हमारी परियोजना से सभी संतुष्ट होंगे: गरीब बच्चों के माता पिता, जिनके बच्चे अपढ़ रह जाने के अभिशाप से मुक्त होंगे और मुफ़्त विद्यार्जन कर पाएँगे; मध्यवर्गीय अभिभावक, जिन्हें बच्चों की अच्छी शिक्षा हेतु संघर्ष नहीं करना होगा क्योंकि शिक्षा निःशुल्क होगी और आर्थिक रूप से संपन्न अभिभावक, जिनके बच्चे वही शिक्षा मुफ़्त पा सकेंगे, जिसके लिए उन्हें मोटी रकम खर्च करनी पड़ती! किसी विशाल मॉल में खरीदी जाने वाली वस्तु की तरह विद्या खरीदने के स्थान पर समानता और बंधुत्व की शिक्षा देने वाले स्कूल में निःशुल्क शिक्षा कौन नहीं पसंद करेगा?

सिर्फ ऐसे व्यवसायी, जिनकी ऐसी मॉलनुमा शिक्षा संस्थाएँ होंगी, वही मेरी इस परियोजना पर आपत्ति करेंगे क्योंकि वह उनके लिए नुकसानदेह होगी!

लेकिन कोई भी दूसरा व्यवसाय करने वाले लोग इसे पसंद करेंगे। और यही मुख्य बिन्दु है, जहाँ मैं लोगों से कहूँगा कि वे आगे आएँ और अपने व्यापार के माध्यम से और आर्थिक मदद के ज़रिए इस मिशन का समर्थन करें! व्यापारी अपने व्यापारिक लाभ का एक नियत प्रतिशत इस परियोजना के खर्च में लगा सकते हैं। समर्थ अभिभावक गण इस कार्य हेतु उपहार स्वरूप पैसे दे सकते हैं, भले ही उतनी ही रकम, जितना वे किसी भी दूसरे अच्छे स्कूल में अदा करते। और हाँ, फर्नीचर से लेकर भोजन या किताबों तक वे कई प्रकार से स्कूलोपयोगी वस्तुओं को प्रायोजित कर सकते हैं! हर व्यक्ति अपने तरीके से अपना अंशदान कर सकता है! स्वाभाविक ही, विदेशों से आने वाले डोनेशंस और प्रायोजन का स्वागत तो है ही!

फिर यह दूसरे कई शहरों में फैल सकता है, जहाँ हम आगे चलकर अपना रेस्तराँ खोलने का प्रयास करेंगे और हर रेस्तराँ के साथ एक स्कूल भी। सबके लिए निःशुल्क, इतना स्तरीय कि सभी इस परियोजना में शामिल होना चाहेंगे! एक इलाके में जब हमारे इस तरह के कई स्कूल खुल जाएँगे तो फिर लोग स्कूल जैसे दिखाई देने वाले इन मॉलों में इतना रुपया खर्च करने के लिए राज़ी नहीं होंगे-और बहुत से दूसरे लोग भी हमारे उदाहरण का अनुसरण करेंगे!

मैं नहीं जानता की इस विचार को मूर्त रूप देने में किस हद तक सफलता प्राप्त होगी और कितनी जल्दी सब कुछ आगे बढ़ेगा लेकिन मैं तो कल्पना करने की स्वतन्त्रता में आनंदमग्न रहता हूँ। अपने विचार रखने और सपने देखने की स्वतन्त्रता। समाज के हर आर्थिक और सामाजिक वर्ग से आने वाले हर बच्चे के लिए एक समान शिक्षा के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से इस रास्ते पर हम आगे बढ़ते रहेंगे!

धनवान और गरीब सभी के लिए एक जैसी उच्च स्तरीय मुफ्त शिक्षा का सपना – 20 मई 2015

कल मैंने आपको बताया था कि मेरी दिली इच्छा है कि भारत में सभी के लिए एक जैसी शिक्षा हो। ऐसी शिक्षा, जो सभी बच्चों के लिए एक सी हो, भले ही अभिभावक उसके लिए कितना पैसा भी खर्च कर सकते हों, जिससे सभी लड़कियों और लड़कों को उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के समान अवसर उपलब्ध हो सकें, जिन्हें वे प्राप्त करना चाहते हैं! विश्वास करें या न करें, मेरे पास इस स्वप्न को अंजाम तक पहुँचाने की एक कार्य योजना मौजूद है।

अब आप शायद सोच रहे होंगे कि मैं मूर्ख हूँ, दिवास्वप्नी हूँ या हवाई किले बनाने वाला अयथार्थवादी व्यक्ति हूँ। मैं शिक्षा में पैसे की भूमिका का महत्व समाप्त करना चाहता हूँ- भारत जैसे देश में, एक ऐसे समाज में, जहाँ कुछ लोगों के लिए पैसा ही सब कुछ है- क्योंकि बिना पैसे के यहाँ कुछ नहीं होता।

लेकिन आप जानते हैं कि हम पिछले आठ साल से यह स्कूल चला रहे हैं और पहले से ही गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के अभियान में भरपूर शक्ति के साथ अपना योगदान कर रहे हैं और इस तरह ऐसे कामों का हमारे पास काफी तजुर्बा है। मेरे विचार हवाई नहीं होते, वे अनुभव की ठोस, यथार्थवादी भूमि पर आकार लेते हैं। हर साल हमारे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उदार आर्थिक मददगारों की सहायता से हमने अपने स्कूल की इमारत की पहली मंज़िल का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है, जिसमें पाँच नई कक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं और अब हम कुछ अधिक बच्चों को पढ़ा पा रहे हैं!

स्वाभाविक ही हर चीज़ की एक सीमा होती है और हमेशा होगी।

मैं नहीं समझता कि सपने में भी मैं इस देश के भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकता हूँ। न ही मैं हर एक को इतना धनवान बना सकता हूँ कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा वाले ख़र्चीले स्कूलों में भेज सकें। जी नहीं, मेरा विचार यथार्थ को मद्देनजर रखते हुए, कुछ छोटे-छोटे कदमों के साथ आगे बढ़ने का है लेकिन संभव हुआ तो, क्रमशः काम को इतने विशाल पैमाने पर फैला देने का भी है कि उसका अच्छा खासा असर दिखाई दे सके!

बराबरी के अपने स्वप्न के अनुसार मैं स्कूल का निर्माण करूँगा। एक ऐसा स्कूल, जहाँ आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से समाज के हर वर्ग से आए बच्चे एक साथ पढ़ सकें और वह भी मुफ्त! हम वहाँ हर विद्यार्थी को एक जैसी उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान करने का इरादा रखते हैं, चाहे किसी रिक्शा-चालक का लड़का हो, चाहे बैंक के उच्च प्रबंधन से जुड़े किसी उच्चाधिकारी की लड़की हो!

जैसा कि अभी भी हो रहा है, हमारा स्कूल आगे भी हर बच्चे को किताब-कापियाँ, वर्दियाँ और भोजन मुहैया कराएगा। हर बच्चे का स्कूल की ओर से स्वास्थ्य बीमा करवाया जाएगा और हर बच्चा हर तरह से अपने साथ बैठे अगले बच्चे के बराबर होगा।

जब हमने अपना मुफ्त स्कूल शुरू किया था तब कई छोटे और सस्ते स्कूलों के व्यापार पर बुरा असर पड़ा था और एक स्कूल तो बंद ही हो गया-क्योंकि बच्चे अब हमारे स्कूल में पढ़ने आने लगे थे।

अब उस स्थिति की कल्पना कीजिए कि हम कई ऐसे स्कूल खोलें, जहाँ भर्ती के समय आने वाले हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है-स्वाभाविक ही, सीट भरने तक! शिक्षा व्यवसाय के इस दीर्घाकार दैत्य पर यह एक करारा प्रहार होगा-क्योंकि तब सामान्यतया उन स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चे भी हमारे यहाँ आएँगे क्योंकि यहाँ भी वैसी ही बढ़िया शिक्षा का इंतज़ाम होगा, वह भी बिल्कुल मुफ्त!

अब एक स्वाभाविक प्रश्न- यह स्वप्न कैसे साकार होगा, इसके लिए इतना पैसा कहाँ से आएगा? अम्माजी’ज़ से! अपने आयुर्वेदिक रेस्तराँ से! क्या? कैसे? इस विषय में आप कल पढ़ सकेंगे!

भारत – जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और पैसे वालों की शिकार हो गई है – 19 मई 2015

कल मैंने हमारे स्कूल में होने वाली बच्चों की भर्तियों की चर्चा करते हुए आपको बताया था कि कभी-कभी हमें कुछ बच्चों को इस बिना पर ‘नहीं’ कहना पड़ता है कि उनके माता-पिता ‘पर्याप्त गरीब नहीं हैं’, हालांकि हम जानते हैं कि उनके परिवार भी किसी भी दृष्टिकोण से धनवान नहीं हैं। मैंने ज़िक्र किया था कि मैं ‘गरीब’ और ‘ज़्यादा गरीब नहीं’ के बीच अंतर करने की आवश्यकता से निजात पाना चाहता हूँ। लेकिन मेरी कामना एक कदम और आगे बढ़ चुकी है: मैं आर्थिक परिस्थिति के अंतर के अनुसार निर्णय करने की आवश्यकता को पूरी तरह समाप्त करना चाहता हूँ! मैं शिक्षा में सबके बीच पूरी समानता चाहता हूँ, चाहे किसी के लिए भी हो!

दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा सबके लिए समान रूप से सुलभ नहीं है। बहुत से पश्चिमी देशों में, खास कर जर्मनी में, मैंने कई स्कूल देखे, जिन्हें सरकार चलाती है और जहाँ हर सामाजिक हैसियत वाले बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। वहाँ भी निजी स्कूल हो सकते हैं, जहाँ काफी महंगे बोर्डिंग स्कूलों में उनकी अच्छी देखभाल होती होगी और जहाँ बहुत धनवान लोग अपने बच्चों को भेजते होंगे-लेकिन अगर आपके पास पर्याप्त पैसे न भी हों, तो भी न सिर्फ आपके बच्चे को विद्यार्जन का अधिकार होगा बल्कि कानूनी नियमों के अनुसार उसे स्कूल जाना अनिवार्य होगा! और माता-पिता चाहे जितना कमाते हों, हर लड़का या लड़की ऐसे स्कूल में पढ़ाई करेंगे, जहाँ पढ़ाई का स्तर अच्छा होगा। वे सब बराबर होंगे और एक ही कतार में, एक साथ बैठकर, एक समान ही शिक्षक से शिक्षा ग्रहण करेंगे!

भारत में यह एक दूर का सपना है। यहाँ सिर्फ वही बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, जिनके माता-पिता काफी पैसा कमाते हैं। अगर किसी बच्चे के अभिभावक अपढ़ हैं तो वे वैसे भी शिक्षा को अधिक महत्व नहीं देते क्योंकि उन्हें स्वयं अपने जीवन में उसकी ज़रूरत नहीं पड़ी थी। दूसरी तरफ, अगर वे वास्तव में बच्चे को स्कूल भेजना ही चाहते हैं, तो वे उन्हें सरकारी स्कूलों में या फिर किसी सस्ते निजी स्कूल में ही भेज पाने की क्षमता रखते हैं। नतीजा: वहाँ उन्हें निचले स्तर की शिक्षा से ही संतोष करना पड़ता है और कहीं-कहीं तो बिल्कुल पढ़ाई नहीं होती!

गावों में सरकारी स्कूलों की हालत इतनी बुरी है कि सिर्फ कागजों पर ही इन स्कूलों का अस्तित्व मौजूद है और शिक्षक साल में सिर्फ दो बार स्कूल आते हैं-अपनी तनख़्वाहें लेने! मैंने एक बार आपको एक ग्रामीण स्कूल के बारे में बताया था, जहाँ स्कूल की इमारत तबेले के रूप में इस्तेमाल हो रही थी! यह सबकी खुली आँखों के सामने होता रहता है और सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार ही इस बुराई की जड़ है। तो ऐसी स्थिति में अभिभावक अपने बच्चों को इन सरकारी स्कूलों में क्यों भेजें?

भारत में उन्हीं अभिभावकों के बच्चे दूर तक आगे बढ़ सकते हैं, जिनके पास काफी पैसा है। हमारे देश में भ्रष्टाचार और फिर बड़े व्यावसायिक घरानों ने शिक्षा से सबसे अधिक लाभ उठाया है। भ्रष्टाचार के चलते सरकारी स्कूल किसी काम के नहीं हैं और बड़े लोगों ने इस क्षेत्र में व्यापार करने और पैसा बनाने की अपर संभावना देख ली: उन्होंने उसे एक उद्योग की तरह शुरू कर दिया, पैसा निवेश किया और शिक्षा की दुकाने खोल लीं। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार आप विभिन्न स्तरों की शिक्षाओं में से किसी एक को चुन सकते हैं। शिक्षा के एक ब्रांड के अंतर्गत भी अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार आप खरीदी जाने वाली सुविधा और शिक्षा का चयन कर सकते हैं!

मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूँ कि भले ही बच्चा बहुत बुद्धिमान और प्रतिभाशाली हो, अगर उसके माता-पिता बेटे की स्तरीय शिक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर सकते तो उसे अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती! और अगर आपके पास औसत मात्रा में ही धन उपलब्ध है तो? तो आपका बच्चा औसत स्तर की शिक्षा ही प्राप्त कर पाएगा!

ऐसे अभिभावकों के दुख का अंदाज़ा मैं लगा सकता हूँ। वे मध्यम वर्ग के माता-पिता होते हैं, जो जानते हैं कि उनका बच्चा बहुत बुद्धिमान है, होनहार है और वे मेहनत करके पर्याप्त रकम का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं और यहाँ तक कि बेटे या बेटी की पढ़ाई के लिए ऋण तक लेते हैं- लेकिन वे अपने बच्चे को अपनी अपेक्षा के अनुसार शिक्षा नहीं दिलवा पाते, शिक्षा के स्तर के साथ कोई न कोई समझौता करना ही पड़ता है। दरअसल अच्छी शिक्षा बहुत महंगी और उनकी कूवत से बाहर होती है!

एक बार मैंने आपको बताया था कि कैसे एक बार एक दंपति कार से हमारे स्कूल आए। वे अपने बच्चों को हमारे स्कूल में भर्ती करवाना चाहते थे। हमने उन्हें नम्रतापूर्वक मना कर दिया क्योंकि स्पष्ट ही वे किसी भी निजी स्कूल की फीस अदा करने में समर्थ थे। लेकिन अभिभावकों के चेहरे पर छाई निराशा देखकर हम उनका दर्द समझ गए: हमारे स्कूल जैसे अच्छे निजी स्कूल की फीस अदा करना उनकी सामर्थ्य के बाहर था। इस तरह उनका यही दोष था कि वे इतना अधिक कमाते थे कि हमारे स्कूल में उनके बच्चों के लिए कोई जगह संभव नहीं थी!

इस देश में, जहाँ शिक्षा भ्रष्टाचार और बड़े उद्योगपतियों की दबंगई का शिकार है, सारे बच्चे एक बराबर नहीं हैं। मैं गैर बराबरी की इस व्यवस्था में बदलाव देखना चाहता हूँ! और मैं इस दिशा में काम करता रहूँगा! कैसे? यह आप कल के ब्लॉग में पढ़ेंगे!

भारत का पैसा कमाने का स्कूली धंधा: शिक्षा की बिक्री – 13 मई 2015

कल के ब्लॉग में मैंने स्थानीय स्कूलों के साथ हुए अपने अनुभवों का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया था कि कैसे इन स्कूलों ने हमारे बच्चों को भर्ती करने की सहमति दी और फिर हमें अत्यंत निराश करते हुए भर्ती की इतनी बड़ी कीमत बताई कि हमारे लिए उतनी रकम अदा करना असंभव था। बाद में हमने दूसरे कई स्कूलों में भी पता किया और तब हमारी इस जानकारी की पुष्टि हो गई कि भारत में शिक्षा का व्यापार एक बड़े व्यवसाय की तरह उभर चुका है!

भारत में शिक्षा, स्कूल खोलना और चलाना वास्तव में एक बड़े उद्योग की तरह विस्तृत हो गया है क्योंकि एक तरफ आबादी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ पढ़ने के प्रति लोगों में जागरूकता लगातार बढ़ती जा रही है और बच्चे और नौजवान पढ़ने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। पैसे वाले निजी लोगों के लिए और छोटे, मध्यम और बड़े व्यापार समूहों के लिए यह एक सम्पूर्ण व्यावसायिक मॉडल बन गया है!

सभी माता-पिता अपने बच्चों के लिए अच्छे से अच्छा चाहते हैं। बच्चों को बढ़िया से बढ़िया शिक्षा उपलब्ध कराना किसी भी माता या पिता का सबसे बड़ा लक्ष्य होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि न सिर्फ उन्हें प्रवेश शुल्क और मासिक शुल्क अदा करना होगा बल्कि हर परीक्षा पर परीक्षा-फीस जमा करानी होगी, बच्चों की वर्दियाँ खरीदनी होंगी, किताब-कापियाँ और दूसरी स्टेशनरी खरीदनी होंगी और कई दूसरी स्कूली गतिविधियों के लिए अतिरिक्त शुल्क भी अदा करना होगा।

अब हमारे शहर के स्कूलों का उदाहरण लेते हैं। इन स्कूलों की प्राथमिक कक्षाओं का प्रवेश शुल्क औसतन 4000 रुपए यानी लगभग 60 यू एस डॉलर है। हर स्कूल की मासिक फीस अलग-अलग है लेकिन अक्सर 600 से 1000 रुपयों के बीच यानी लगभग 10 से 15 डॉलर तक होती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा इससे बेहतर स्कूल में पढ़े तो सिर्फ आप इस फीस को दूना कर लें! इसके अलावा दूसरे सभी खर्चे तो आपको भुगतने ही होंगे! अब यह लोगों की आमदनी पर निर्भर करता है कि वे इतना खर्च बर्दाश्त कर सकते हैं या नहीं। क्या वे बेहतर, अधिक ख़र्चीले स्कूल का खर्च बर्दाश्त कर सकते हैं या उसी मामूली स्कूल में बच्चे को रखना चाहते हैं, जहाँ फीस तो कम हो लेकिन इसी कारण वे अपने शिक्षकों को कम वेतन देते हों, अर्थात, जहाँ शिक्षक कम योग्यता प्राप्त, कम कार्यकुशल और कम अनुभवी हों?

मैंने ऐसे प्रतिष्ठित स्कूलों के बारे में भी सुना है, जो न सिर्फ सामान्य प्रवेश शुल्क वसूल करते हैं बल्कि जहाँ आपको दान के रूप में अतिरिक्त रकम भी अदा करनी पड़ती है, जो 1000 डॉलर से 2000 डॉलर यानी 60000 रुपए से लेकर 120000 रूपए तक हो सकती है! और हाँ, यह रकम सामान्य अधिकृत रकम नहीं होती, यह दान तो होता है लेकिन स्वैच्छिक नहीं होता बल्कि अगर आप यह दान नहीं देंगे तो आपके बच्चे को वहाँ पैर तक रखने नहीं दिया जाएगा! आप कल्पना कर सकते हैं कि स्कूल के मालिकान इस व्यवसाय से कितना पैसा बनाते हैं!

ये आंकड़े हमारे शहर के चार मध्यम दर्जे के स्कूलों के औसत आंकड़े हैं। मैंने बड़े शहरों में रहने वाले अपने मित्रों से सुना है कि वहाँ इससे बहुत अधिक फीस वसूल की जाती है! शिक्षा पर जो रकम खर्च की जाती है और जो रुपया इस व्यवसाय से बनाया जाता है, वह आश्चर्यजनक रूप से बहुत अधिक है!

सिर्फ अविश्वसनीय ही नहीं, मेरे लिए यह अनैतिकता की चरम सीमा है। इन कई वर्षों में काफी समय जर्मनी में गुजारने के बाद मैं वास्तव में चाहता हूँ कि यहाँ भी जर्मनी की तरह व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षा मुफ्त होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों में भी। निश्चय ही वहाँ ऐसे स्कूल अधिकतर सरकारी स्कूल होते हैं और आपके पास बेहतर निजी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जाने का विकल्प खुला होता है, लेकिन सरकारी स्कूलों में भी वहाँ पढ़ाई का इतना ऊँचा स्तर होता है कि सामान्यतया लोग वहीं अपने बच्चों को पढ़ाते हैं!

हमारे यहाँ भी सरकारी स्कूल हैं-लेकिन वहाँ शिक्षा का स्तर इतना खराब होता है कि लोग अपने बच्चों को वहाँ भेजना नहीं चाहते! और गरीब लोग, जो वैसे भी शिक्षा को उतना महत्व नहीं देते, बच्चों को वहाँ भेजने में कोई लाभ नहीं देखते! वे खुद पढ़े-लिखे नहीं होते-तो फिर वे बच्चों को निजी स्कूलों में भेजकर इतना अधिक खर्च क्यों करेंगे? और अक्सर वे अपने बच्चों को वहाँ भेजने में आर्थिक रूप से अक्षम भी होते हैं।

और फिर, बच्चे अनपढ़ रह जाते हैं, जब कि बड़े-बड़े स्कूल के मालिक अधिक से अधिक पैसा कमाते रहते हैं!

व्यापार में भी सिर्फ पैसा ही सब कुछ नहीं है – 2 सितम्बर 2014

जब मैं जर्मनी में था तो एक महिला मेरे एक व्यक्तिगत-सलाह-सत्र में आई। उसकी कुछ समस्याएँ थीं और वह समझ नहीं पाती थी कि वह इस विषय में क्या करे। इनमें से एक समस्या के संबंध में उसकी किंकर्तव्यविमूढ़ता पर आज अपने ब्लॉग में लिखना चाहता हूँ: एक ऐसे धंधे में, जो लोगों की सेवा पर आधारित है, ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है? ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की सेवा करना या उस धंधे से अपने लिए ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाना?

जो महिला मेरे पास आई थी वह एक तरह की फ़िजिओथेरपि करके अपनी आजीविका कमाती थी। वह अपने काम में पर्याप्त सफल थी: उसके मरीज़ों को सिर्फ दो या तीन बार उसके पास आना पड़ता था। उसके बाद वे नहीं आते थे क्योंकि आने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी। दो-तीन सत्रों में ही वह उनकी पीठ का दर्द ठीक कर देती थी, उनके घुटने का दर्द जाता रहता था या कम से कम उसमें काफी सुधार हो जाता था और फिर वह अपने सत्रों में उन्हें घर में करने के बहुत से व्यायाम, आसन वगैरह बता देती थी, जिन्हें करने पर उन्हें लाभ होता था। उन बीमारियों के लिए उन्हें आगे और सत्रों की बुकिंग कराने की, यानी अतिरिक्त पैसे खर्च करने की ज़रुरत ही नहीं होती थी।

महिला इस स्थिति से कुल मिलाकर खुश थी। सड़क चलते उसके मरीज़ उससे मिलते और उसका तहे दिल से शुक्रिया अदा करते और कहते कि उसके इलाज-सत्रों से उन्हें बहुत लाभ पहुँचा है। कौन ऐसी प्रशंसा से खुश नहीं होगा?

लेकिन उसका पति? वह उससे कहता कि उसे एक अच्छे व्यापारी की तरह व्यवहार करना चाहिए। इलाज की शुरुआत में ही उसे लोगों से कहना चाहिए कि अगर वे इलाज शुरू करना चाहते हैं तो कम से कम पाँच सत्रों का पॅकेज उन्हें लेना होगा। भले ही वे दो सत्रों में ही क्यों न ठीक हो जाएँ उन्हें पूरे पाँच सत्रों का शुल्क अदा करना होगा। तब उन्हें पहले ही निश्चय करना पड़ता कि वे पूरे सत्रों में शामिल होना चाहते हैं या नहीं।

इस विषय पर वह मेरी राय लेना चाहती थी। क्या उसे लोगों को पाँच बार बुलाकर ज़्यादा पैसे कमाने चाहिए भले ही उन्हें इतने चक्कर लगाने की ज़रुरत न हो?

मैंने उससे कहा कि बिलकुल नहीं। सबसे पहले मैंने उससे पूछा: इस विषय में उसका दिल क्या कहता है? और उसने जवाब दिया कि ऐसा करना उसे उचित नहीं लगता। जिस तरह वह काम कर रही है, उससे वह संतुष्ट है और बाहर के लोगों से मिलने वाली सलाहों के कारण कभी-कभी उसे एहसास होता है कि वह कुछ गलत कर रही है। मैंने कहा: तो फिर, जैसा तुम्हें ठीक लगता है, वही करो।

दूसरी बात यह कि अपने काम के लिए तुम जो कुछ भी अच्छा कर सकती हो, पहले ही कर रही हो: यानी तुम अपने ग्राहकों को खुश और संतुष्ट कर रही हो। क्या तुम नहीं जानती कि व्यापार का अर्थ अपने ग्राहकों को लूटना नहीं है? उनकी जेब से ज़्यादा से ज़्यादा पैसा निकलवाना नहीं है। व्यापार सेवा प्रदान करना है, कोई ऐसी वस्तु बेचना है, जो दूसरों की आवश्यकता की पूर्ति करती हो, दूसरों की सहायता करती हो, उन्हें सुख पहुँचाती हो!

आपके लिए संतुष्ट और प्रसन्न ग्राहक से बढ़कर कोई विज्ञापन नहीं हो सकता! अगर आपका कोई ग्राहक सड़क चलते आपसे कहता है कि वह आपकी सेवाओं से खुश है, तो यह बात वह दूसरों से भी कहेगा। वास्तव में वह कहेगा, 'उसने दो सत्रों में ही मुझे पूरी तरह ठीक कर दिया!' बल्कि यह भी जोड़ेगा कि इसी तकलीफ के लिए पहले कराए इलाजों से आपका इलाज कितना बेहतर रहा- 'वहाँ इतना पैसा खर्च किया, इतना समय बरबाद किया मगर ज़रा आराम नहीं हुआ था।' इससे आपको और ज़्यादा ग्राहक मिलेंगे, जिससे लम्बे समय में आपको लगातार अधिक से अधिक काम मिलता रहेगा और आमदनी होती रहेगी जोकि पहली बार आए ग्राहक को एक बार में ही लूटने-खसोटने से कभी नहीं हो सकती!

इस मामले में सबसे मज़ेदार बात यह है कि कोई भी व्यक्ति दिल से हमेशा उचित कदम उठाना चाहता है। यह उसकी असुरक्षा और अपनी भावनाओं पर पूरा विश्वास न करने का नतीजा होता है, जिसके कारण वह भ्रमित होता है और कई बार कोई दूसरा रास्ता अपनाने के लिए उद्यत हो जाता है। इस तरह के भय से मुक्त हों, उन्हें कान न दें- अपने दिल की आवाज़ सुनते हुए उचित रास्ता अपनाएँ!

वैश्वीकरण के खतरे – जब सारी अच्छी चीज़ें निर्यात कर दी जाती हैं! 10 जुलाई 2014

कल मैंने आपको बताया था कि कैनेरी द्वीप पर हमारे लिए अच्छे टमाटर प्राप्त करना मुश्किल हो गया था-बल्कि कहें, असंभव हो गया था क्योंकि वहाँ पैदा होने वाले सबसे बेहतरीन टमाटर अक्सर दूसरे देशों को निर्यात कर दिए जाते हैं। लेकिन यह समस्या सिर्फ इन द्वीप-समूहों या सिर्फ स्पेन की नहीं है! यह एक विश्वव्यापी समस्या है, एक अलाभकारी व्यवस्था, एक बहुत बड़ा खतरा, जिसने वैश्वीकरण के चलते दुनिया भर को अपनी जकड़ में ले लिया है।

ठीक इसी समस्या का सामना हम भारत में भी कर रहे हैं! दुनिया में आम का सबसे अधिक उत्पादन भारत में होता है। फिर भी देशवासियों की हमेशा यह शिकायत रहती है कि उन्हें अपने ही देश में पैदा होने वाले सबसे बेहतरीन आम देखने तक को नहीं मिलते! पेड़ों पर से उतारकर उन्हें सीधे विदेशी बाज़ारों में बिकने के लिए रवाना कर दिया जाता है।

चावल पर भी यही बात लागू होती है! विदेश में रहते हुए हर व्यक्ति भारतीय चावलों की गुणवत्ता जानते हैं और जब आप यहाँ खरीदे गए चावल घर पर पकाते हैं तो सारी रसोई गमक उठती है- लेकिन भारत में यह चावल मुश्किल से मिल पाता है!

भारत में चाय और कॉफ़ी भी बहुत पैदा होती है! आसाम और दार्जिलिंग की चाय दुनिया भर में मशहूर है लेकिन कल ही किसी ने मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करते हुए बताया कि भारत की सबसे उत्कृष्ट चाय तो सीधे निर्यात कर दी जाती है! उसी व्यक्ति ने आश्चर्य व्यक्त किया कि आखिर भारत में हर कोई इंस्टेंट कॉफ़ी क्यों पीता है-सारी असली, शुद्ध कॉफी कहाँ गायब हो जाती है?

यह सब पैसे का खेल है। पश्चिमी देश कुछ सामानों की ज़्यादा कीमत अदा करते हैं लिहाजा उन चीजों को निर्यात कर दिया जाता है भले ही उन्हें पैदा करने वाले ही उन सामानों से महरूम हो जाएँ। यह सामान उन्हें कम मात्रा में ही उपलब्ध हो पाता है और जो होता है, वह भी कम गुणवत्ता वाला, घटिया होता है। इसमें लाभांश तो बहुत अधिक है मगर देशवासियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है और इसके अलावा इस व्यवस्था में उन सभी बातों की उपेक्षा की जाती है जिसे आप संवेदनशीलता, मानवता और सहज-बुद्धि कहते हैं!

सिर्फ आप अफ्रीका की हालत पर नज़र दौड़ा लीजिए! विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनी, नेस्ले ने अफ्रीका के तमाम पानी के स्रोत खरीद लिए हैं और वहाँ के गाँवों को और स्थानीय लोगों को उनके खेतों के लिए पानी मिलना मुश्किल हो रहा है! उनके पानी का निजीकरण कर दिया गया है और अब ये कम्पनियाँ उसे बोतलों में भरती हैं और दुनिया भर के बाजारों में बेचकर अनाप-शनाप मुनाफा कमाती हैं। या फिर उन्हीं देशों में महँगे दामों में बेचकर मुनाफा कमाती हैं-उन्हीं लोगों को बेचकर, जिन्हें पहले पानी मुफ्त उपलब्ध था! और इस बात का तो सवाल ही नहीं उठता कि वे उन लोगों को, जो उन्हीं की फैक्ट्रियों में काम करते हैं, पर्याप्त मजदूरी अदा करते होंगे कि वे उनका बोतलबंद पानी पीने के बाद अपने परिवार का भरण-पोषण भी ठीक तरह से कर सकें! इसलिए अब स्थानीय लोगों को हैण्ड-पम्प से पानी भरने बहुत दूर जाना पड़ता है और उसे किफ़ायत के साथ इस्तेमाल करना पड़ता है कि दिन भर के लिए पर्याप्त पानी घर में हर वक़्त उपलब्ध रहे।

पानी। चावल। फल। बहुत साधारण, रोज़मर्रा की चीजें! वैश्वीकरण के चलते हर कोई चाहता है कि अच्छी से अच्छी चीजें उसे हर वक़्त, उसके घर पर उपलब्ध हों। क्या हम पल भर ठहरकर यह विचार नहीं कर सकते कि भले ही यह सब हमारे लिए बड़ा सुविधाजनक हो मगर इसका हमारी धरती पर विनाशकारी असर होता है? कि लोग भूखे मर रहे हैं और उनके पास पीने का पानी नहीं है क्योंकि दूसरे कुछ लोगों को सिर्फ अपनी सुविधा और आराम की चिंता है या सिर्फ इस बात की कि ज़्यादा से ज़्यादा लाभांश कैसे कमाया जाए, अमीर कैसे हुआ जाए!

आप कहेंगे कि यह तो दुनिया भर की विशाल और ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मामला है, हम क्या कर सकते हैं? लेकिन नहीं, आप बहुत कुछ कर सकते हैं!

पीछे मुड़कर देखिए और विचार कीजिए कि आपका भोजन कहाँ से प्राप्त होता है! जब भी संभव हो, स्थानीय सब्जियाँ और फल खरीदें; जैविक (आर्गेनिक) खेती या जैविक पैदावार का लेबल देखकर ही चीजें खरीदें; हमेशा न्यायपूर्ण लेन-देन (व्यापार) सुनिश्चित करें भले ही आपको कुछ महँगा खरीदना पड़े। अपने आप पर और अपने उपभोग पर नज़र रखें।

अगर हम इतना भर कर सकें तो हम सब मिल-जुलकर इस संसार को अच्छी रहने लायक जगह बना सकते हैं!

भारत के निजी स्कूल किस तरह शिक्षा को भ्रष्ट व्यापार में तब्दील किए दे रहे हैं! – 26 मार्च 2014

भारत के निजी स्कूलों के बारे में अपने खयालात के इज़हार के साथ मैंने निजी स्कूलों पर जारी इस श्रृंखला की शुरुआत की थी, जिसमें मैं आपको वहाँ अपनाई जाने वाली लम्बी, उबाऊ और श्रमसाध्य प्रवेश-प्रक्रिया के बारे में बता चुका हूँ लेकिन जिस विषय पर मैंने अभी सिर्फ संक्षिप्त टिप्पणी की है वह दरअसल सबसे बड़ी समस्या है और हमेशा की तरह वह है पैसा! दरअसल, शिक्षा बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है! एक विशाल, भ्रष्ट व्यापार!

हमें कई बार उन पश्चिमी मेहमानों की प्रतिक्रिया सुनने को मिलती है, जो भारत में माता-पिता द्वारा बच्चों की शिक्षा पर किये जाने वाले व्यय के बारे में सुनकर हैरान रह जाते हैं. जब हम उनसे कहते हैं कि हमारा स्कूल सिर्फ उन्हीं बच्चों के लिए है, जिनके माता-पिता उन्हें उन स्कूलों में भर्ती कराने में असमर्थ रहते हैं, जहाँ फीस ली जाती है तो वे आश्चर्य से पूछते हैं: ‘क्या? आपके देश में बच्चों की पढाई के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है?’

कई पश्चिमी देशों में शिक्षा पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता है। हो सकता है कुछ जगह किताबें-कापियां खुद खरीदनी पड़ती हों मगर स्कूलों में फीस या चंदे के रूप में प्रवेश शुल्क, परीक्षा शुल्क आदि वसूल नहीं किया जाता। भारत में स्थिति कुछ अलग है।

जी हाँ! यहाँ सरकारी स्कूल हैं, जो मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं- कम से कम यह उन्हें ऐसा करना चाहिए! वहाँ स्कूल फीस नहीं लगती और सरकारें लम्बे-चौड़े इश्तहार प्रकाशित करती हैं कि वहाँ बच्चों को शिक्षा के अलावा मुफ्त भोजन भी मुहैया कराया जाता है- लेकिन कटु वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा वहाँ प्रदान की जाती है वह अक्सर बिलकुल निरुपयोगी और घटिया होती है! वहाँ अक्सर शिक्षक पढ़ाने ही नहीं आते और जब आते भी हैं तो आपस में बैठकर गपशप करते रहते हैं। कई जगह स्कूलों का इस्तेमाल कबाड़ख़ाने की तरह किया जाता है और यहाँ तक कि जानवर बाँधने के लिए भी उनका इस्तेमाल होता देखा गया है! कहीं कहीं शिक्षक अपने किसी स्थानापन्न को स्कूल भेज देते हैं, जो कम पढ़ा-लिखा और अयोग्य होता है और जिसे वे अपनी पक्की, सरकारी तनख्वाह में से कुछ रुपया दे देते हैं। इस दौरान शिक्षक अपने किसी निजी व्यापार में लगे होते हैं और इस तरह एक साथ दो स्रोतों से पैसा कमाते हैं। यह है सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का हाल! किसी को कोई परवाह ही नहीं है!

स्वाभाविक ही अपढ़ माता-पिता भी, जो आर्थिक रूप से भी कमज़ोर होते हैं, इस स्थिति से अनभिज्ञ नहीं होते। उन्होंने जीवन में कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा मगर वे भी देखते-समझते हैं कि उनके लड़के-लड़कियां एक के बाद एक परीक्षाएं पास करते हुए अगली कक्षाओं में पहुँचते जा रहे हैं मगर अपने नाम तक लिख नहीं पाते। हिंदी में लिखा छोटा-मोटा वाक्य भी ठीक से पढ़ नहीं पाते!

इन अभिभावकों में से कुछ शिक्षा के महत्व को समझते हैं और चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे अधिक पढ़-लिख सकें- मगर उनके पास अपने बच्चों को किसी अच्छे निजी स्कूल में भेजने के लिए पर्याप्त रुपया नहीं होता। एक ऐसा स्कूल, जहाँ उन्हें वास्तव में पढ़ाया जाए! स्कूलों की वर्दियां और किताबें महँगी होती हैं, मासिक फीस बहुत अधिक होती है- 30 से 50 यू एस डॉलर यानी लगभग 2000 से 3000 रूपए तक! यह वह रकम है जो हमारे स्कूल के कई बच्चों के अभिभावक माह भर में कमा पाते हैं। वे किस तरह अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेज सकते हैं!

और सबसे मुख्य बात तो औपचारिक रूप से वितरित परिचय-पुस्तिकाओं में लिखा ही नहीं होता: अनौपचारिक प्रवेश-शुल्क, स्कूल को अनिवार्य रूप से दिया जाने वाला चन्दा, बच्चे को प्रवेश-प्रक्रिया में उत्तीर्ण कराने और उसका प्रवेश सुनिश्चित कराने के लिए दी जाने वाली रिश्वत! सामान्यतः यह रकम कुल मिलाकर 700 से 850 यू एस डॉलर यानी करीब 40 से 50 हजार रुपयों तक होती है। और अगर आप अपने बच्चे से प्रेम करते हैं और आपके लिए इतनी रकम खर्च करना सम्भव है तो आप यह सौदा मंज़ूर कर लेते हैं।

चंदे की शक्ल में इतनी बड़ी रकम अदा किये बगैर आप अपने बच्चे को किसी भी अच्छे स्कूल में दाखिल नहीं करवा सकते। हर व्यक्ति को इन स्कूलों में अपने बच्चों का प्रवेश सुनिश्चित करने के लिए यह रकम अदा करनी ही होगी। और इन स्कूलों का भ्रष्ट प्रशासन-तंत्र यह सुनिश्चित करेगा कि रकम सही हाथों में पहुँच जाए।

आपको बच्चों की किताबें और कापियां स्कूल से ही खरीदनी पड़ती हैं और हर किताब-कापी पर स्कूल को अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है। इसी तरह स्कूल से ही वर्दियां भी खरीदनी पड़ती हैं, जिनकी कीमत बाज़ार में उपलब्ध उन्हीं वर्दियों की कीमत से बहुत ज़्यादा होती है।

भ्रष्टाचार! पैसा! व्यापार! भारत में बच्चों की शिक्षा के साथ यही खिलवाड़ हो रहा है।

और निश्चय ही यह देश को और आने वाली पीढ़ियों को सुनहरे भविष्य की ओर ले जाने वाला रास्ता कतई नहीं है!

ध्यान में विचारशून्यता की बात महज भ्रम है या व्यापार कौशल! 11 नवंबर 2013

मैं समझता हूँ कि आप लोगों ने ध्यान की एक प्रचलित परिभाषा सुनी होगी, जो मेरे विचार में गलत परिभाषा है। लोग अक्सर कहते हैं कि ध्यान मन (मस्तिष्क) को विचारशून्यता की स्थिति में लाने का अभ्यास है। यह ऐसी स्थिति है जब आप कुछ भी सोच नहीं रहे होते, आपका मस्तिष्क जब पूरी तरह रिक्त हो जाता है। मेरा मानना है कि ऐसा संभव ही नहीं है। इससे भी आगे बढ़कर मैं कहना चाहूँगा कि इस विचार का उपयोग आजकल पैसा कमाने में किया जा रहा है!

यह संभव ही नहीं है। क्या आप कभी ऐसी स्थिति में पहुँच सके हैं? मैं नहीं समझता कि ऐसा हो सकता है। क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति से मिले हैं, जो यह दावा करता है? अगर ऐसा कोई व्यक्ति है तो फिर इसका प्रमाण क्या है? कौन इस बात की जांच करेगा कि उसका दावा सही है? यह ऐसा ही दावा है जैसा कि लोग कहते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है या वह हर जगह मौजूद है-आप उसे देख नहीं सकते, आप उसे छू नहीं सकते, फिर कैसे कहा जा सकता है कि वह है? इस बात का प्रमाण कहाँ है कि ईश्वर है या इस बात का कि आप पूर्ण विचारशून्यता की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं?

सोचने के लिए यह खयाल रुचिकर हो सकता है लेकिन कार्यरूप में यह असंभव है। इस ‘रिक्त-मस्तिष्क’ वाली स्थिति प्राप्त करने के अभ्यास की पहली सीढ़ी क्या है? आपको शून्य पर ध्यान केन्द्रित करना होता है! आप अपने मस्तिष्क को उस बिन्दु तक ले जाते हैं जहां आप कुछ नहीं सोचते। लेकिन कुछ न कुछ तो होगा ही, भले ही वह अतिसूक्ष्म विचार हो, यही कि कुछ नहीं सोचना है!

इसे इस प्रकार देखें: आपका पेट है, खाद्य पदार्थों को हजम करने के लिए और उसके लिए भोजन चाहिए। आपकी आँख बनी हैं, देखने के लिए और उन्हें देखने के लिए कुछ चाहिए। आपके कान आवाजों को सुनने के लिए बने हैं और आवाज़ चाहिए, जिन्हें वे सुन सकें। आपका मस्तिष्क बना है सोचने के लिए और यह आवश्यक है कि वह सोचे। उसके बगैर उसका अस्तित्व ही संभव नहीं है। मस्तिष्क में किसी न किसी विचार का होना अवश्यंभावी है। अगर आप भोजन नहीं करेंगे तो आप भूखे मर जाएंगे। अगर आप सोचेंगे नहीं तो क्या होगा? आपका मस्तिष्क बिना विचार के ज़िंदा बच नहीं सकता।

चाहे जितना अच्छे शब्दों में इस बात को प्रस्तुत किया जाए, एक प्रश्न बरकरार रहेगा: आप अपने मस्तिष्क को इतनी पीड़ा क्यों पहुंचाना चाहेंगे? मस्तिष्क का विचार से सीधा संबंध है और मस्तिष्क को विचार से दूर रखना उसे उसकी खुराक से वंचित कर देना है! इसके विपरीत आप उसे कोई बढ़िया पोषक-तत्व क्यों नहीं मुहैया कराते? सोचना, विचार करना बहुत अच्छी बात है। अपने मस्तिष्क को कुपोषण का शिकार न बनाएँ-और अपने विचारों को समाप्त करने का प्रयास करते हुए उसे विचारशून्य बनाने की कोशिश करना एक तरह की मूर्खता और उसके प्रति लापरवाही के सिवा कुछ नहीं है।

फिर क्यों लोग आपसे कहते हैं कि यह आपका लक्ष्य होना चाहिए? क्योंकि वे अपना व्यापार चलाना चाहते हैं। इससे ज़्यादा अच्छा धंधा क्या होगा कि जिस चीज़ की इच्छा आप अपने ग्राहक के मन में पैदा कर देते हैं वह चीज़ आप उसे कभी देते नहीं हैं और न वह कभी उसे प्राप्त कर पाएगा और फिर भी वह उसे थोड़ा बहुत प्राप्त करने की आस में आपके पास बराबर आता रहेगा। आपको बताया जाता है कि एक ऐसी अवस्था, जो किसी भी तरह प्राप्त नहीं की जा सकती, आपको अतीव आनंद से भर देगी। अब आप उसके लिए मरे जा रहे हैं, उसे मुंहमांगी कीमत पर खरीद रहे हैं कि किसी तरह उस लक्ष्य तक पहुँच सकें। ये वही लोग हैं, जो भगवान बेचते हैं, जो हवा में से भभूत या सोना निकालने का चमत्कार बेचते हैं, जो कि कोई भी समझ सकता है कि संभव नहीं है। वही लोग अब कुछ ज़्यादा होशियार हो गए हैं और अब ध्यान-योग बेच रहे हैं। उनके ग्राहक एक ऐसे चक्रव्यूह में प्रवेश कर रहे होते हैं, जहां से बाहर निकल पाना मुश्किल है, ऐसी चीज़ पाने की कोशिश, जो प्राप्त होना असंभव है, एक ऐसा लक्ष्य जिसे हासिल करने का दावा वह गुरु करता है।

लेकिन इसमें इन गुरुओं की गलती नहीं होती क्योंकि अधिकतर योग और ध्यान-योग के गुरु यह विचार इसलिए प्रचारित करते हैं कि उन्हें भी उनके गुरु द्वारा मूर्ख बनाया गया होता है कि यह मस्तिष्क की कोई अद्भुत और दुर्लभ अवस्था है। सच बात तो यह है कि बहुत कम लोग मुझे मिले, जो यह दावा करते हैं कि उन्होंने विचारशून्यता की यह अवस्था वास्तव में प्राप्त की है। कुछ लोग भ्रमित होते हैं और कहते हैं कि शायद एकाध मिनट के लिए यह अवस्था उन्होंने प्राप्त की है। मगर अधिकतर लोग यह ईमानदारी के साथ स्वीकार करते हैं कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने से कोसों दूर हैं। वे पूरा प्रयास कर रहे हैं मगर अभी वहाँ पहुंचे नहीं हैं। अपनी इस हालत पर उन्हें संकोच होता है, बुरा लगता है और वे अपने आपको उन लोगों से कमतर आँकते हैं, जो इस विचारशून्यता की अवस्था को प्राप्त करने का दावा करते हैं।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप दूसरों से यह कहते हैं या किसी दूसरे से यह बात सुनते हैं। थोड़ा समय निकालकर मेरी बात पर गौर करें और फिर ध्यान करते समय विचारशून्यता प्राप्त करने का प्रयास करने के स्थान पर कोई अच्छी बात सोचें, कोई अच्छा विचार मन में रखें!

इस विषय पर इस ब्लॉग द्वारा आपके मन में थोड़ी सी हलचल पैदा करने के बाद मैं कल ध्यान-योग से संबन्धित कुछ दूसरे पहलुओं पर बात करूंगा।

व्यावसायिक हितों के चक्कर में मुमकिन हुआ धर्म-परिवर्तन कर हिन्दु बनना – 31 जनवरी 13

कल मैंने कुंभ मेले में मौजूद पश्चिम के गुरुओं के ऊपर लिखा था और बताया था कि यह कितना अजीब है कि वैसे लोग जिनका कई हिंदु मंदिरों में कोई मोल नहीं होगा, को कई ऊंचे हिंदु पद मिल सकते हैं। मैंने बताया था कि ऐसे पद खरीदे जा सकते हैं और इसलिए धर्म की रग-रग में ख़रीद-फ़रोख़्त भरा हुआ है। हिन्दुओं ने हिन्दुत्व के मूल सिद्धांत को ही बेच दिया है कि इस धर्म में परिवर्तित होकर आना मुमकिन ही नहीं है। आइए परिवर्तन के इस प्रश्न को एक दूसरे नज़रिए से देखते हैं और तब शायद आप यह समझ पाएंगे कि मैं इसे पैसों का कारोबार क्यों बताता हूं।

अगर आप पीछे उस समय में जाएं, जब हिन्दु धर्मग्रंथ लिखे गए थे, आप यह कारण समझ पाएंगे कि क्यूं उन ग्रंथों के रचयिताओं ने हिन्दुत्व में परिवर्तन की किसी भी संभावनाओं को नकार दिया था। उनकी मानसिकता और जीवनशैली को समझिए। उन्होंने जान-बूझकर परिवर्तन को नकार दिया क्योंकि उनके पास “विशुद्ध रक्त” की अवधारणा थी। ये वही लोग हैं जिन्होंने जाति-व्यवस्था को जन्म दिया और इस नाम पर लोगों को एक-दूसरे से अलग किया, दो जातियों के बीच विवाह न हो, ताकि दो कोटि (शुद्ध और अशुद्ध ) के रक्त मिश्रित न हो सके क्यूंकि उनकी नज़र में ऐसा होना सही नहीं था। स्पष्ट रूप से वे अहिंदु रक्त को विशुद्ध हिंदु परिवारों से मिश्रित होता हुआ नहीं देखना चाहते थे- और यही वजह है कि उन्होंने ऐसा कोई विकल्प दिया ही नहीं जिसके माध्यम से आप परिवर्तित होकर हिंदुत्व के मार्ग पर आ सकें। उन्होंने यहां तक लिखा कि हिंदु होने का एक ही मार्ग है कि आपके माता-पिता हिन्दु हों।

जैसे-जैसे समय बीता, ऐसे लोग आए जो बेशक “विशुद्ध रक्त” से पनपे इन रुढ़िवादी नियमों को बदलना चाहते थे। उदाहरण के लिए आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने कई ग़लत प्रथाओं को सुधारा और अधिक उदार हुए। उन्होंने पिछड़ी जाति के लोगों के लिए दरवाज़ा खोला, यहां तक कि उन्हें धर्म-ग्रंथों के अध्ययन तक का अधिकार दिलाया जिसे पढ़ने की अनुमति उन्हें तब तक नहीं मिली हुई थी। आर्य-समाज ने अंतर्जातीय विवाहों को भी मान्य किया – लेकिन इसके जरिए एक और पंथ गढ़ा गया जो हिन्दुत्व पर आधारित था।

उससे पहले, बुद्ध थे, जिन्होंने धर्म के कारण होने वाली कई बुरी चीज़ों का विरोध किया। उन्होंने वेद की बहुत सी सीखों को पूरी तरह नकार दिया और इसके कारण हिन्दुओं ने उन्हें अपनी बिरादरी से बाहर कर दिया। नतीजा: एक और धर्म।

वास्तव में, हिन्दुत्व बहुत लचीला है। मैंने एक बार इस बारे में भी लिखा था कि इसका लचीलापन किस तरह हिन्दुत्व की सबसे बड़ी कमी है। इसमें कई तरह के पंथ हैं क्योंकि लोगों ने धर्म-ग्रंथों में लिखी बातों का मतलब अपने हिसाब से निकाला, शायद वो बातें बिल्कुल स्पष्ट नहीं थीं या लोगों ने अपनी सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए इसका अर्थ निकाला! और यहीं पर व्यावसायिक हितों को साधना धर्म के मूल सिद्धांतों का अनुसरण करने से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

ऐसे भारतीय गुरुओं की भरमार है जो अनुयायियों की खोज में पश्चिम गए थे। वे वहां जाकर हिन्दुत्व के ऊपर प्रवचन सुनाते और सुननेवालों को अपना भक्त बनाते। यहीं से इस धर्म में विदेशियों और अहिंदुओं का पदार्पण हुआ। उन्होंने उन लोगों को हिन्दु बना दिया – यह इस व्यापार के लिए फ़ायदेमंद था! इन भारतीय गुरुओं को संभवतः अच्छी तरह पता था कि भले ही तकनीकी रूप से परिवर्तन के माध्यम से हिंदु बनाना असंभव हो लेकिन विदेशों में, जहां प्रतिस्पर्धा कम थी और जो एक नया बाज़ार था, अपने धार्मिक व्यवसाय को स्थापित करना ज़रूरी था, तो उन्होंने उस बिंदु की अनदेखी कर दी। वे अपनी दुकान समेटकर पश्चिम में ले गए और वहां के मुल्कों में हिन्दु फ़्रेंचाइज़ी आउटलेट खोल लिए।

यह मायने नहीं रखता कि वे इस्कॉन के श्रद्धालु हैं, दूसरे गुरुओं के भक्त हैं या भिन्न हिन्दु पंथों के सदस्य हैं, उन सबने हिन्दु होने का स्वांग रचना शुरू कर दिया, हिन्दु की तरह आचरण करने और वैसे ही वस्त्र पहनने लगे। उनमें से कुछ तो ख़ुद ही गुरू बन गए और हरिद्वार, ऋषिकेश, दक्षिण भारत समेत दुनिया के विभिन्न देशों में भी अपने आश्रम बना लिए।

कई लोगों ने इसका विरोध भी शुरू किया, कि ये भारतीय गुरू ग़लत कर रहे हैं, कि विदेशियों का तो मंदिरों में प्रवेश तक वर्जित है लेकिन अब वे ख़ुद को हिंदु बता रहे हैं। यह कह भर देना कि आप हिंदु हैं और हिन्दुओं जैस वस्त्र धारण कर लेने भर से ये लोग आपको हिंदु नहीं मान लेंगे।

हालांकि भारत में मौजूद आरएसएस जैसे आधुनिक हिन्दु संगठनों ने, जो हिन्दुत्व का प्रचार-प्रसार करते हैं और वो जिन भी चीज़ों में भरोसा करते हैं, स्वतः ही हिन्दुत्व से जुड़ जाती हैं, लोगों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें हिन्दु बनाने की प्रक्रिया शुरू की। वो वहां जाते हैं जहां जाकर ईसाई धर्म-प्रचारकों ने पिछड़े लोगों को भोजन और रोज़गार के वादे पर ईसाई बनाया था, और उन्हें इसाइयों से ज़्यादा लालच देकर दुबारा हिंदु बना लेते हैं। हालांकि हम यह जानते ही हैं कि इसके पीछे उनकी राजनीतिक मंशा निहित होती है और वे सब हिन्दु दक्षिणपंथी कार्यकर्ता हैं। वो दावा करेंगे कि उनका राजनीति से कोई सरोकार नहीं लेकिन धर्म को अपना ध्येय साधने के लिए इस्तेमाल करेंगे।

कुछ लोगों ने मुझसे पूछा: अगर मैं धर्म के रूढ़िवादी नियमों और इसकी संकीर्णता के खिलाफ़ हूं, तो मैं उन लोगों का समर्थन क्यूं करता हूं जो अहिंदुओं द्वारा धर्म-परिवर्तन करवाकर हिंदु बनाए जाने के खिलाफ़ हैं? मैं खुलेपन का समर्थन क्यूं नहीं करता और हिन्दुओं को ये क्यूं नहीं कहता कि उन्हें विदेशियों को भी स्वीकार करना चाहिए? जवाब बेहद सरल है: मैं तो धर्म की अवधारणा में ही यक़ीन नहीं करता। मैं हिन्दुत्व की वकालत नहीं कर रहा, न ही किसी और धर्म का समर्थन कर रहा हूं। अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं आपको किसी भी धर्म का हिस्सा बनने की सलाह नहीं दूंगा। लेकिन इसके बावजूद भी अगर आप ऐसा करने को लेकर दृढ़प्रतिज्ञ हैं, तो कम से कम अपनी सुविधा के अनुसार नहीं बल्कि धर्म के मूल नियमों के साथ उसका अनुसरण कीजिए। अगर आप हिन्दुत्व में भरोसा करते हैं तो आपको यह देखना चाहिए कि किस तरह धर्म-परिवर्तन की अवधारणा हिन्दुत्व के मूल सिद्धांतों के खिलाफ़ है। बेशक आप हिन्दुत्व के सबसे उदार पंथों में से कोई एक पंथ चुन सकते हैं, लेकिन तब आप उस पंथ विशेष के सदस्य होंगे, और ऐसे में आपको हिंदु नहीं बल्कि सीधे तौर पर उस पंथ का अनुगामी माना जाएगा।

अगर आप हिन्दुत्व के मूल रूप में भरोसा करते हैं तो आप इसे अपना धर्म बदल कर हासिल ही नहीं कर सकते। या तो आप जन्म से हिंदु हैं या फिर हिंदु नहीं हैं। अगर आप किसी गुरू अथवा पंथ का अनुसरण करते हैं तो आप बस एक हिन्दु-आधारित धड़े के सदस्य मात्र हैं। हालांकि मैं तो यही कहूंगा कि हम सब बस एक अच्छा इंसान बन जाएं, न कि इन धार्मिक नेताओं को मौक़ा दें, गुणा-गणित बैठाकर, अपना उल्लू सीधा करने का।

ग़ैर-हिन्दुओं के पास ऊंची हिन्दु पदवियां – उस धर्म में जो अपनाने से नहीं जन्म से मिलता है – 30 जनवरी 13

पिछले कुछ समय से मैं कुंभ मेले के ऊपर लिख रहा था, स्पष्ट है कि इस दौरान मैंने हिन्दुओं पर, भारतीयों पर, यहां के तीर्थस्थानों पर और शायद बाहरी देशों में मौजूद तीर्थस्थानों पर भी बहुत लिखा। हालांकि इस दौरान मैंने उन गैर-भारतीय साधुओं और गुरुओं के बारे में नहीं लिखा जो ज़ाहिर है, कुंभ-मेले में तीर्थयात्री या पर्यटक बनकर नहीं आए हैं, बल्कि नुमाइश के इस खेल का हिस्सा हैं।

मैंने पहले भी इसकी व्याख्या की थी कि हिन्दुत्व धर्म-परिवर्तन करके हिन्दु बनने की इजाज़त नहीं देता। आप इस्लाम अपना सकते हैं, ईसाई बन सकते हैं, लेकिन हिन्दुत्व धारण करने का कोई उपाय या विकल्प नहीं है। आप केवल जन्म से ही हिन्दु हो सकते हैं। यही वो कारण है कि बनारस के विश्वनाथ मंदिर, उड़ीसा में पूरी के जगन्नाथ मंदिर और दक्षिण भारत के अधिकतर हिंदु मंदिरों में आज भी गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। और यह संदेश मंदिर के बाहर लगे साइनबोर्ड पर साफ़-साफ़ लिखा होता है जिसके कारण कोई भी विदेशी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता। मैंने एक बार इस तरह के धार्मिक नस्लवाद की व्याख्या की थी, लेकिन यह भी एक प्रकार से धर्म-परिवर्तन करके हिन्दु बनने की अवधारणा को खारिज करता है।

हास्यास्पद बात तो यह है कि हिन्दुत्व के व्यापारी यानी धार्मिक नेताओं और गुरूओं ने नफ़ा-नुक़्सान के चक्कर में अपने धर्म की राह ख़ुद ही छोड़ दी है। अख़बारों में रोज़ इलाहाबाद के कुंभ मेले में अपनी छटा बिखेर रहे अमेरिका, रूस, स्वीडन और अन्य देशों के साधुओं के क़िस्से छप रहे हैं। वो किसी भारतीय गुरू के भक्त नहीं हैं, न कोई सामान्य साधु हैं, वो ख़ुद ही गुरू हैं जिनके बड़े-बड़े पंडाल लगे हैं और वो अपने आस-पास मौजूद भारतीय गुरुओं द्वारा पूरी तरह स्वीकार्य और मान्य हैं, क्योंकि उन्हें उस पद तक लाने में हिन्दुत्व के एक बहुत पुराने धार्मिक संगठन का योगदान है, जिसके पास एक व्यक्ति को महामंडलेश्वर (अनुयायियों के एक समूह का प्रधान) की उपाधि देने का अधिकार है। और उस संगठन ने ऐसी पदवियां विदेशियों को भी दी! हालांकि अब सबको मालूम है कि ऐसी उपाधियां ख़रीदी जा सकती हैं, बस आपके पास पर्याप्त पैसे होने चाहिए।

हिन्दु धर्म तो इस बात तक की अनुमति नहीं देता कि कोई विदेशी मंदिर में प्रवेश करे, तो फिर यह कैसे मुमकिन है कि इसी धर्म का एक प्राचीन संगठन उन्हीं विदेशियों को अपने साथ जोड़ता है और यहां तक कि उन्हें ऊंचे पदों पर बैठाता है? अब वो खुद गुरू हैं और उनके अनेक अनुयायी हैं, कुंभ मेले में उनके तंबू गड़े हैं, बड़े-बड़े पंडाल सजे हैं, उनकी पूजा दुनिया के हर हिस्से में की जाती है- ज़ाहिर है तकनीकी रूप से ग़ैर-हिन्दु गुरुओं के चरणों में आस्थावान भारतीय हिन्दु भी बिछे हैं जो शायद अपने ही धर्म ग्रंथों से अनभिज्ञ हैं।

बात और बदतर तब हो जाती है जब आप इन सबको एकसाथ मिलकर इस त्योहार में अपनी दुकानें चलाते हुए देखते हैं। पश्चिमी गुरुओं और साधुओं की ठाठ भारतीयों से रत्ती भर भी कम नहीं है, वो अपनी रईसी की नुमाइश में और महिला अनुयायियों का आनंद लेने में भारतीयों की तरह ही कोई कसर नहीं छोड़ रहे। हालांकि इन उपाधियों पर विराजमान संन्यासियों के लिए क़ायदे से एक महिला से बात तक करना उचित नहीं है! एक पश्चिमी गुरू एक चुटकी राख 1100 रुपये में बेचने के लिए विख्यात है – लगभग 20 अमेरिकन डॉलर! इस कुंभ के मेले में वो ख़ूब पैसा बना रहे हैं, जबकि इस दौरान क़ायदे की बात करें तो उन्हें भौतिकवाद से खुद को अलग रखना चाहिए था।

यही कारण है कि मैं धर्म को विशुद्ध व्यवसाय मानता हूं। सब धर्म को अपनी सुविधा के हिसाब से संशोधित करते हैं, अपने हिसाब से उसका मतलब निकालते हैं, अपनी ख़ुद की परंपरा का निर्माण कर लेते हैं और फिर धर्म और भगवान को बेचने वाली दुकान खोलकर बैठ जाते हैं।

मुझे मालूम है कि वो विदेशी जो खुद को हिन्दु बताते हैं, मेरी बातों से सहमत नहीं होंगे, बल्कि उनमें से कोई भी गुरू मेरी बातों से सहमत नहीं होगा जिनकी दुकान धर्म से चलती है। आख़िरी बार जब मैंने इस विषय पर लिखा था तो उनलोगों द्वारा बहुत सी रोषपूर्ण प्रतिक्रियाएं मिली जिन्हें लगा कि मैं सच को बाहर ले आया हूं। मैं यह भी जानता हूं कि धार्मिक लोग, अनुयायीगण नियमित तौर पर मुझे मेरी बातों के लिए खरी-खोटी सुनाते रहेंगे, लेकिन वो उन गुरुओं के सामने सिर और पैर एक करके बिछे रहेंगे, भले ही वो उनसे पैसे ऐंठकर रईसी की नुमाइश करे और धर्म के मूल सिद्धांतों की ऐसी-तैसी करता रहे। घूम-फिरकर मैं दुबारा इसी निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि यह या तो दुखद है या हास्यास्पद – मैं तो हंसना पसंद करूंगा।