जीवन का आनंद लेते हुए खुद को अपराधी महसूस न करें! 5 अक्टूबर 2015

कई बार मुझे अपने ब्लॉग के विषय उन लोगों से बातचीत के दौरान प्राप्त होते हैं जो किसी न किसी ऐसी समस्या से दो-चार हो रहे होते हैं जो बहुत से दूसरे लोगों की समस्या भी हो सकती है। ऐसी ही एक समस्या के विषय में आज मैं लिखना चाहता हूँ: एक मेहमान आश्रम आई थी जो यह निर्णय नहीं ले पा रही थी कि आगे कहाँ जाए। उसका कार्यक्रम पहले से तय था, उसके पास और भी विकल्प थे और वह अपने पसंदीदा स्थानों की यात्रा भी करना चाहती थी-लेकिन क्या वह इतना स्वार्थी हो सकती थी कि अपनी मनचाही जगह चली जाए?

इस महिला ने बड़ा मददगार स्वभाव पाया था और वह कुछ संगठनों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ी हुई थी। अपने खाली समय में वह स्वैच्छिक रूप से चैरिटी का काम किया करती थी, अपने देश में भी और तीसरी दुनिया, अफ्रीका और भारत में। पैसे कमाने के लिए वह एक बड़ी कंपनी में काम करती थी और बड़ी खुश थी कि इस बार उसे पूरे छह हफ्ते का अवकाश मिला है। इतना लंबा अवकाश उसे पहले कभी नहीं मिला था। वह घूम-फिरकर उन जगहों को देखना चाहती थी जहाँ वह पहले खुद सेवा-कार्य कर चुकी थी।

क्योंकि वह एक सुरक्षित वातावरण में रहकर भारत को जानना-समझना चाहती थी इसलिए सबसे पहले एक सप्ताह उसने हमारे साथ बिताया। अपने अंतिम दो सप्ताहों को छोड़कर बाकी समय का उसने कोई पक्का कार्यक्रम नहीं बनाया था। इन दो सप्ताहों में वह पश्चिम बंगाल के एक चैरिटी संगठन के लिए, जिसकी मदद वह पिछले कई साल से कर रही थी, कुछ स्वैच्छिक सेवा-कार्य करना चाहती थी। वह एक अनाथाश्रम में बच्चों को पढ़ाना चाहती थी। इस बीच वह खाली थी लेकिन जब वह हमारे यहाँ रह रही थी, यह निर्णय करने में कि कहाँ जाए, उसे बड़ी परेशानी हो रही थी।

उसे समुद्र से बड़ा प्रेम था और केरल, गोवा में भारत के बहुत से सुहाने समुद्र किनारों को उसने देख रखा था-वास्तव में उसकी इच्छा वहीं, किसी बीच में जाकर पाम वृक्षों की छाया में लेटकर विश्राम करने की थी। लेकिन उसके सामने पहले अनाथाश्रम जाकर बच्चों को पढ़ाने का विकल्प भी था या किसी दूसरे चैरिटी में शामिल होकर विकलांग बच्चों के किसी स्कूल में पढ़ाने का।

वह इन विकल्पों के बीच पिस रही थी: वास्तव में वह कामों से कुछ दिनों का विराम लेकर समुद्री बीच के खुशनुमा एहसास का आनंद लेना चाहती थी लेकिन इससे उसे अपने स्वार्थी होने का एहसास होता था, बल्कि लगता था, जैसे वह बहुत आत्मकेंद्रित व्यक्ति है जो चैरिटी कार्यों के अपने दोनों विकल्पों को छोड़कर अपना समय और पैसा अपने सुख और आनंद पर खर्च कर रही है!

मैंने उससे कहा कि वही करो, जो तुम्हारा दिल चाहता है। अगर तुम्हारी इच्छा है कि बीच पर जाकर विश्राम किया जाए, तो वही करो। अपराधबोध के इस हास्यास्पद एहसास को खुद पर हावी न होने दो, उसे इस बात की इजाज़त मत दो कि तुम्हें ही निर्देश देने लगे। मुझे गलत मत समझो, मैं खुद चैरिटी का काम करता हूँ और उसमें सबकी मदद का स्वागत है-मगर तुम खुद भी महत्वपूर्ण हो! यह पैसा कमाने के लिए तुमने बहुत श्रम किया है। कंपनी की व्यस्त नौकरी में तुमने बहुत तनाव झेला होगा और इस प्रवास के बाद वापस जाकर फिर तुम्हें अपने आपको उसी में झोंक देना है। इतना करने के बाद तुम्हारा विश्राम करने का पूरा हक़ है।

वैसे भी तुम कुछ समय बाद दो हफ्तों तक बच्चों को पढ़ाने वाली ही हो! इस काम में भी बहुत ऊर्जा खर्च होती है और जब तुम पर्याप्त विश्राम कर लोगी तभी तुम्हें वह ऊर्जा प्राप्त होगी! अगर तुममें ऊर्जा बचेगी ही नहीं तो तुम क्या पढ़ा पाओगी!

इस बात के लिए कभी खुद को अपराधी मत समझो कि आपके पास दूसरों से अधिक है। क्योंकि अधिक है, इसीलिए आप दूसरों को दे पा रहे हो-लेकिन आपको अपनी चिंता भी करनी चाहिए, अपना खयाल रखना चाहिए। दूसरों को खुश करने के लिए खुद को दुखी मत करो! इस तरह काम नहीं चलता!

अपने हाथ की मदद लें – आपको हस्तमैथुन करते हुए अपराधी क्यों महसूस नहीं करना चाहिए! 3 जून 2015

परसों मैंने आपको काम-वासना की अपनी परिभाषा संक्षेप में बताई थी और यह भी बताया था कि क्यों मैं समझता हूँ कि वह एक सुखद और अच्छी चीज है। उसके बाद कल मैंने बताया कि बढ़ती हुई बलात्कार की घटनाओं का कारण अश्लील फ़िल्में क्यों नहीं हैं-शायद आपमें से कुछ लोगों को इससे आश्चर्य हुआ होगा। वह सब सिर्फ काम-वासना और सेक्स के बारे में मैंने लिखा था-लेकिन आज मैं यौन तुष्टि प्राप्त करने के एक और तरीके के बारे में लिखना चाहता हूँ-हस्तमैथुन।

वास्तव में मेरे विचारों पर मुझे एक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। मैंने ज़िक्र किया था कि अपनी काम-वासना के शमन के लिए सबके पास विकल्प मौजूद होते हैं। एक व्यक्ति ने प्रतिक्रिया व्यक्त की: 'मैं नहीं मानता कि काम भावना बुरी चीज़ है। मैं सहमत हूँ कि यह एक नैसर्गिक अनुभूति है-लेकिन हस्तमैथुन नैसर्गिक नहीं है! वह पूरी तरह अप्राकृतिक है!'

दुर्भाग्य से यह गलत धारणा सर्वत्र व्याप्त है और सिर्फ भारत में ही नहीं कुछ अन्य देशों में भी। जब किशोर-किशोरियों को यौनेच्छा होने लगती है और वे उसे खुद अपने शरीर के ज़रिए जाँचना-परखना चाहते हैं, तभी से उन्हें ये झूठी बातें बता दी जाती हैं।

लड़कों को डराया जाता है कि जब भी उनका वीर्य स्खलित होता है, वे अपने जीवन की ऊर्जा (जीवनी शक्ति) का एक अंश खो बैठते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हर बार जब आप हस्तमैथुन करते हैं, अपने जीवनकाल का कुछ समय कम कर लेते हैं। अर्थात, ज़्यादा हस्तमैथुन करने पर आप लम्बी उम्र तक जी नहीं सकते। कुछ दूसरे अभिभावक अपने लड़कों को बताते हैं कि हस्तमैथुन से अंधत्व आता है। ये बच्चे जब किसी अंधे व्यक्ति को देखते होंगे तो पता नहीं क्या सोचते होंगे! 🙂

हमेशा लड़कियों से कहा जाता है कि अपने शरीर को न छुओ। खुद अपने शरीर के साथ कैसे सम्बन्ध हों, इस बारे में उन्हें अजीबोगरीब बातें सिखाई जाती हैं। जबकि लड़कों के लिए अधिक यौनेच्छा होना पुरुषत्व की निशानी माना जाता है, लड़कियों में उसे शर्मनाक और पाप माना जाता है। अपनी जननेन्द्रियों के बारे में कोई भी बात करना उनके लिए शर्म की बात होती है और ऐसा करना अपराध माना जाता है, यहाँ तक कि अपने मासिक धर्म के बारे में भी-अब आप ही बताइए, ऐसे माहौल में हस्तमैथुन कहाँ से स्वीकार्य होगा? जब माताएँ अपनी बच्चियों को सेक्स के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं बतातीं, सिवा इसके कि 'जो कुछ करना होगा, पति कर लेगा'? जब लड़कियाँ टैंपोन्स का प्रयोग नहीं करतीं या योनि में डालकर ग्रहण की जाने वाली दवाओं का प्रयोग नहीं करतीं क्योंकि वे अपने गुप्तांगों को छूना नहीं चाहतीं कि कहीं उनकी कौमार्य भंग न हो जाए?

तो मैं जानता हूँ कि मेरे लिखने से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला लेकिन हो सकता है, कुछ लोगों को इसमें सोचने-समझने के लिए थोड़ी-बहुत वैचारिक खुराक मिल जाए: हस्तमैथुन संसार का सबसे अधिक नैसर्गिक काम है! आप खुद आसपास के जानवरों को ध्यान से देखिए-वे हर समय यह सब करते रहते हैं! हमारे बगीचे में कुछ बंदर हैं, जो आपस में हर समय सेक्स करते रहते हैं और आसपास कोई न भी मिले तो भी, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता- वे अपने लिए राहत का उपाय ढूँढ़ ही लेते हैं!

मैं मानता हूँ कि हम बंदरों से कुछ अलग हैं-हालाँकि, जितना दिखाई देते हैं, उतना अलग भी नहीं हैं-लेकिन हस्तमैथुन मनुष्यों के लिए भी पूरी तरह प्राकृतिक है! यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि अगर कभी-कभी आप अपने कामोन्माद की तुष्टि स्वयं कर लेते हैं तो उससे कोई शारीरिक या स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ पैदा नहीं होतीं। इससे आप जल्दी नहीं मरने वाले और न ही आप अंधे होंगे। इसके विपरीत, यौनेत्तजना और उसका नैसर्गिक शमन आपके शरीर में बहुत से लाभप्रद हार्मोन्स, एंड्रोर्फ़िन्स आदि, भी पैदा करते हैं और उससे आपको सिर्फ विश्राम ही नहीं मिलता या तनाव ही दूर नहीं होता। उसके बाद आप अपने काम में अधिक एकाग्र हो सकते हैं, आपकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है और आप अधिक प्रसन्न महसूस करते हैं, क्योंकि आपने अपनी एक मूलभूत इच्छा और शारीरिक ज़रूरत पूरी की है!

आपकी जानकारी के लिए एक बात और बता दूँ कि आप मुझसे कितना भी कहें कि आप न तो हस्तमैथुन करते हैं और न ही कभी किया है, हम सब असलियत जानते हैं-यह काम सब करते हैं और सबने कभी न कभी यह किया होता है! हाँ, उसके लिए सबको अपराध-बोध अलग-अलग मात्रा में होता है!

स्वाभाविक ही, अगर आप ऐसे ईश्वर पर विश्वास करते हैं, जो आपको इस बात की सजा देता है कि आप अपने आपको अपने प्रयासों से खुश रख पा रहे हैं, तो यह आपकी मर्ज़ी है। ठीक है, अपने आपको पापी समझिए-लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि अगर आप उस पर विश्वास न करने का निर्णय कर लें तो आपका जीवन अधिक सुखद हो जाएगा!

ऐसा जीवन, जिसकी डोर पूरी तरह आपके हाथों में होगी – अक्षरशः!

अपने बच्चों को व्यस्त और टीवी से दूर रखें लेकिन इसलिए नहीं कि वे आप पर बोझ हैं! 20 अप्रैल 2015

आज मैं एक विज्ञापन के बारे में संक्षेप में लिखना चाहता हूँ, जिसने मुझे एक बार फिर यह बताया कि बच्चों के प्रति लोगों का रवैया कितना विकृत है। कई बार लगता है जैसे उनके बच्चे उन पर बोझ हों!

दरअसल ये विचार मेरे दिमाग में तब आए जब मेरी पत्नी ने मुझे एक विज्ञापन दिखाया। उसने अपने फेसबुक न्यूज़फीड पर यह विज्ञापन कई बार देखा था लेकिन उसका शीर्षक ही उसे पसंद नहीं आया था लिहाजा बहुत दिनों तक उसने उस पर क्लिक नहीं किया था। शीर्षक था: कभी सोचा- “अपने बच्चे द्वारा टीवी के सामने बिताए जा रहे समय को कैसे कम किया जाए?” क्योंकि अपरा टीवी नहीं देखती और यू ट्यूब पर वही वीडियो देखती है जिन्हें हम उसके लिए चुनकर दिखाते हैं, इसलिए हमारे लिए उस विज्ञापन का कोई खास महत्व नहीं था। लेकिन एक दिन यूँ ही उत्सुकतावश उसने उस प्रचार-वीडियो को देखा।

अपने आप में विचार अच्छा था: एक कंपनी है, जो हर माह कुछ शिल्प कला के उपकरण, पेंट और कुछ किताबों से भरा डिब्बा आपके घर भेजती है। एक अनोखा व्यावसायिक विचार, जो बच्चों के साथ उनके अभिभावकों को भी कुछ रचनात्मक करने की प्रेरणा दे सकता है। यह उत्पाद मेरी नज़र में कतई बुरा नहीं था। लेकिन समस्या थी तो उसके विज्ञापन के साथ!

वह एक कार्टून वीडियो था और उसमें एक माँ और पिता टीवी पर टकटकी लगाए अपने बच्चे की ओर परेशान से देख रहे हैं और नीचे लिखा है- ‘आप हमेशा से चाहते थे कि आपका बच्चा टीवी से दूर हो जाए…..’ और जब माँ कहती है- ‘तुम उसे टीवी के सामने से हटाओ और उसके साथ खेलो?’ तो पिता बहाना करके भागने की कोशिश करता है- ‘मैं व्यस्त हूँ, उसके साथ खेलने का मेरे पास समय नहीं है!’ और माँ परेशान सी गंभीर सोच में डूबी हुई कहती है- ‘व्यस्त तो मैं भी हूँ।’ उसके बाद कुछ वैज्ञानिक आंकड़े देते हुए प्रमाणित किया गया है कि टीवी देखना बच्चों के लिए क्यों बुरा है और अंत में इस समस्या का समाधान है: वही डिब्बा- और फिर आप देखते हैं कि पिता खर्राटे लेता हुआ सो रहा है और संतुष्ट माँ आनंद विभोर सी खेल में व्यस्त बच्चे को देख रही है।

तो उनकी समस्या यह नहीं है कि बच्चे टीवी देख रहे हैं बल्कि यह है कि माता-पिता अपने लिए समय कैसे निकालें! वे जानते हैं कि टीवी बच्चे के लिए ठीक नहीं है पर हाय, उनके पास बच्चे के साथ खेलने का समय नहीं है! और यह रहा समस्या के इलाज का अचूक नुस्खा: खिलौनों से भरा यह डिब्बा खरीदिए, जो बच्चे को व्यस्त रखेगा और फिर आपके पास समय ही समय है!

जी नहीं, परवरिश का यह तरीका ठीक नहीं है! अगर आपका कोई बच्चा है तो उसके प्रति आपकी कुछ ज़िम्मेदारी भी है! यह आप अच्छी तरह जानते हैं-अन्यथा यह पढ़कर या वीडियो क्लिप देखकर आप परेशानी महसूस नहीं करते कि 3 से 7 साल तक की उम्र बच्चे के मानसिक विकास के लिए निर्णायक होती है, कि मस्तिष्क का 80% विकास 5 साल की उम्र तक हो जाता है-और वह उसके सक्रिय व्यवहार से ही संभव होता है, कि जो बच्चे बहुत ज़्यादा टीवी देखते हैं, उनमें मोटापे की संभावना अधिक होती है! यह सब आप अच्छी तरह जानते हैं और आपको बुरा लगता है जब आप अपने बच्चे के दैनिक क्रियाकलापों पर गौर करते हैं, उसकी दिनचर्या पर नज़र दौड़ाते हैं। इसलिए अपने आप में बदलाव लाएँ!

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आपको भी अपने काम के लिए या सोचने-विचारने के लिए समय नहीं मिलना चाहिए! यह नहीं कह रहा हूँ कि दिन का हर पल आप अपने बच्चे के साथ ही बिताएँ! लेकिन अगर आप हर माह वह वह शिल्प सिखाने वाला डिब्बा खरीदने का मन बना चुके हैं तो कृपा करके कुछ समय निकालिए, बच्चे के साथ बैठिए और उन उपकरणों का बच्चे के साथ मिलकर इस्तेमाल कीजिए। उसके ज़रिए न सिर्फ उसके समय का सदुपयोग हो सके या उसके मस्तिष्क का बेहतर विकास हो सके बल्कि वह आपके परस्पर सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने का जरिया भी बने! अगर उसके साथ कोई प्यार करने वाला व्यक्ति हो, कोई अपना व्यक्ति सशरीर मौजूद हो तो आपका बच्चा बहुत कुछ अतिरिक्त भी सीख सकता है!

यह दुख की बात है कि ऐसे विज्ञापन तैयार किए जा रहे हैं और यह भी कि वास्तव में वे लोगों के घरों तक भी पहुँच रहे हैं! मैं जानता हूँ कि आप अपने बच्चों से प्रेम करते हैं-तो फिर आलसी मत बनिए-उठिए और उनके साथ खेलिए! यह मत कहिए कि आप बहुत व्यस्त रहते हैं और बच्चे के साथ खेलने का नंबर बाद में कभी आएगा-उसके सबसे सुनहरे वर्ष इतनी तेज़ी के साथ बीत जाएँगे कि आपको पता भी नहीं चलेगा!

अपने अंदर जागने वाली अपरंपरागत यौन फंतासियों के कारण स्वयं को अपराधी महसूस मत कीजिए! 21 दिसंबर 2014

आस्ट्रेलिया की अपनी 2007 की यात्रा में मेरे व्यक्तिगत सत्रों में शामिल होने वाले कुछ लोगों के बारे में मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ। आज एक और किस्सा सुनिए-मेरे ख़याल से बहुत रोचक, जिसे आप पसंद भी करेंगे और शायद उससे सबक भी लेंगे। चलिए, बताता हूँ कि क्यों और कैसे।

इस महिला ने मेरे पास आकर बताया कि वह और उसका बॉय-फ्रेंड पिछले एक साल से साथ-साथ रह रहे हैं। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था-सिर्फ ठीक-ठाक नहीं, बेहद शानदार और मोहक था वह। बस, उनके यौन-व्यवहार को छोड़कर।

जब कोई अपनी बात इस तरह शुरू करता है तो मुझे अक्सर अंदाज़ हो जाता है कि उनके संबंधों में अवश्य ही गंभीर समस्याएँ हैं। जब प्रेम संबंधों में ही, जो आपका सबसे अंतरंग सम्बन्ध होता है, समस्या है तो समझिए कि यह आपके जीवन का सबसे बड़ा मामला है। लेकिन जब मैंने समस्या के स्वरुप की जानकारी ली तो मुझे लगा कि इस प्रकरण के निपटारे में ज़्यादा समस्या नहीं आनी चाहिए।

उसने कहा कि उसके बॉय-फ्रेंड ने कैसे एक दिन अपनी यौन वरीयताओं (पसंदगी) के बारे में बताया। वे आलिंगनबद्ध हुए और कुछ देर की उत्तेजक यौन हरकतों के बाद वे हमेशा की तरह सम्भोगरत हो गए-और उसे वह सम्भोग बहुत शानदार लगा। लेकिन तभी उसके बॉय-फ्रेंड ने कहा, बहुत हिचकिचाते हुए, धीरे-धीरे, कि वह इसे कुछ अलग तरह से करना चाहता है। कुछ अधिक उत्तेजक तरीके से, कुछ और खेल, कुछ अपरंपरागत हरकतों के साथ। आप कल्पना नहीं कर सकते कि कितनी मुश्किल से, शर्म से बार-बार लाल पड़ते हुए और जल्दी-जल्दी उसने अपनी बात मेरे सामने रखी। "वास्तव में वह चाहता था कि मैं उसे चपत मारूँ और वह भी मेरे शरीर पर हल्के प्रहार करे!" अर्थात् वे सेक्स और सेक्स पूर्व की कामुक क्रियाओं के दौरान एक दूसरे के साथ अधिक उत्तेजना के साथ जुड़ना चाहते थे और इसके लिए विभिन्न तरीके आजमाने की कोशिश कर रहे थे।

पहले तो उसे लगा कि उसके बॉय-फ्रेंड का दिमाग खराब हो गया है लेकिन फिर वह कुछ मामूली यौन क्रीड़ाओं के लिए तैयार हो गई और धीरे-धीरे उसे महसूस हुआ कि जो उसका बॉय-फ्रेंड कर रहा है, उसे वह भी पसंद कर रही है! कुछ बातें ज़्यादा और कुछ कम मगर उसके मुताबिक़, कुल मिलाकर यह सेक्स पहले से बहुत अधिक आनंददायक सिद्ध हुआ! अद्भुत और विस्मयकारी!

यह सब सुनने के बाद मैंने उससे पूछा, "ठीक-ठीक बताओ, इसमें तुम्हें किस बात से परेशानी है?"

और तब मुझे समझ में आया कि वह आपसी अंतरंगता के दौरान अपने यौन व्यवहार को लेकर अपराधग्रस्त थी। सेक्स के दौरान उसे अनिवर्चनीय आनंद प्राप्त होता था मगर बाद में यह सोचकर वह दुखी हो जाती थी कि अपने प्रेमी के साथ वह इस बुरी तरह क्यों जकड़ जाती है, क्या उसके आदेशानुसार सब कुछ करते चले जाना, उसके खेलों में निमग्न हो जाना, अपने आपको नीचे गिरा लेना नहीं है! यह स्पष्ट करने में उसने देर नहीं लगाई कि दोनों ही एक-दूसरे को अधिक ज़ोर से नहीं मारते केवल हलके प्रहार और मीठी पीड़ा पहुंचाते हैं और यह भी सुनिश्चित कर लिया कि मुझे पता रहे कि अपने बॉय-फ्रेंड के साथ सोने के लिए उस पर कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं है और वह स्वयं भी सेक्स में पूरी सक्रियता के साथ हिस्सा लेती है। लेकिन यही उसकी समस्या थी-वह इसका आनंद क्यों ले रही है? वह इसका आनंद कैसे ले सकती है? क्या यह घृणास्पद नहीं है?

मैंने उससे कहा कि ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। अगर आप सिर्फ यौन क्रीड़ाओं में लगे हुए हैं और एक-दूसरे को शारीरिक सुख पहुँचाते हुए अपनी सेक्स फंतासियों को जी रहे हैं तो मैं नहीं समझता कि आप कोई गलत बात कर रहे हैं। इसके विपरीत, वास्तव में यह स्वस्थ सम्बन्ध की निशानी है: जब आप अपने दिल में गहरे दबी छोटी से छोटी इच्छा, लालसा और फंतासियों के बारे में अपने साथी से कह सकते हैं और वह भी आपके साथ आकर उनका आनंद लेता है! किसी का कोई नुकसान नहीं होता और दोनों उन्हें पसंद करते हैं-फिर अपने आपको अपराधी समझकर उस साझा आनंद पर पानी क्यों फेरा जाए?

मैंने उसे बताया कि यूरोप में ऐसी सेक्स फंतासियों का साकार अनुभव कराने वाले सेक्स संबंधी खिलौने दुकानों पर बिकते हैं और मैं सोचता था, वे खिलौने यहाँ भी मिलते होंगे। और यह भी कि स्वाभाविक ही अपने बेडरूम में वे जो भी करते हैं, वह उनका गुप्त निजी अनुभव है लेकिन उसे यह नहीं समझना चाहिए कि ऐसा करने वाले वे ऐसे अकेले दंपति हैं।

मुझे लगता है कि भारत जैसे देशों में लोग इसकी आलोचना कर सकते हैं, उन्हें बेतुका और त्याज्य समझ सकते हैं क्योंकि ऐसी बातें न तो उन्होंने कभी सुनी न कभी देखी होती हैं और न उनके बारे में कभी पढ़ा होता है।

मैंने उसे सेक्स की प्रबल इच्छा को एक सामान्य प्राकृतिक आवेग की तरह स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित किया और कहा कि उससे लड़ना व्यर्थ है। वे बिस्तर पर भी कभी-कभी आपस में लिपटते, गले लगते और जैसा कि उसने बताया, ‘परम्परागत तरीके से’ सम्भोग करते थे-अतः वास्तव में इसका कोई कारण नहीं था कि जो वे कर रहे थे, उसे गलत कहा जाए या उस व्यवहार को किसी तरह की विकृति कहा जाए।

अगर आप अपने यौन जीवन का आनंद ले रहे हैं और आपका साथी भी उससे खुश और संतुष्ट है तो मैं आपके दुःख और आपकी अप्रसन्नता का कोई कारण नहीं देखता कि आप एक-दूसरे को खुश कर पा रहे हैं तो एक-दूसरे को खुश करने के बाद खुद दुखी हो जाने का मैं कोई कारण नहीं देखता।

वह सिर उठाकर, तनकर चलती हुई मुझसे बिदा हुई। उसके चेहरे पर खेद और अपराधबोध के स्थान पर ख़ुशी और आत्मविश्वास छलके पड़ रहे थे!

और मैं मुस्कुरा उठा- क्या यह शानदार नहीं है कि दुनिया में अनेक प्रकार के लोग और उनकी अलग-अलग तरह की अनेकानेक रुचियाँ हैं? और सभी को प्रेम करने के लिए कोई न कोई मिल ही जाता है!

शाकाहारी होने के कारण मांसाहारी मित्रों के साथ भोजन करते हुए संकोच महसूस न करें – 9 दिसंबर 2014

कल मैंने ‘मांसाहारी खाद्यों के स्थानापन्न’, जैसे टोफू सॉसेजेज़ आदि के प्रति अपनी अरुचि प्रकट की थी। मैंने ज़िक्र किया था कि एक बार सोच-समझकर शाकाहार अपनाने का निर्णय ले लेने के बाद आपमें किसी तरह का अफसोस या मांसाहारी खाद्यों के प्रति लालसा नहीं होनी चाहिए। मैं इस बात पर दृढ़ हूँ और इसमें यह भी जोड़ना चाहता हूँ कि मांसाहारी मित्रों के साथ रेस्तराँ में बैठकर खाना खाते हुए, जब मेनू में आपके खाने लायक कोई विकल्प मौजूद नहीं होता, तब भी यही बात लागू होती है! अपने चयन और अपनी जीवन-पद्धति पर न तो अफसोस करें और न ही किसी तरह का अपराधबोध महसूस करें!

बहुत से शाकाहारियों को इस तरह का अनुभव होता है: आप किसी रेस्तराँ में दोस्तों के साथ खाना खाने जाते हैं। आप मेनू कार्ड खोलते हैं और पाते हैं कि टमाटर के सलाद के अलावा आपके खाने लायक वहाँ कुछ भी उपलब्ध नहीं है। अगर आप मेरी तरह प्याज़ नहीं खाते तो वह विकल्प भी आपके सामने नहीं होता। वहाँ मृत पशु के मांस से रहित एक भी व्यंजन मौजूद नहीं है।

आप क्या करेंगे? या तो आप थोड़ा सा टमाटर सलाद लेकर अपनी थोड़ी-बहुत भूख मिटाने की कोशिश करेंगे कि कुछ देर बाद घर चलकर खाना खा लेंगे या फिर वेटर से शाकाहारी खाना लाने के लिए कहेंगे। लंबी बातचीत के बाद भी आपको अपने लायक खाना मिल पाता है या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि आप किसके साथ बैठे हैं और इस पर कि रेस्तराँ की रसोई में इतनी क्षमता है भी या नहीं! लोग आपकी तरफ अजीबोगरीब नज़रों से देखेंगे और हो सकता है, आपको मूर्खतापूर्ण ताने भी सुनने को मिलें। इस बीच उस वातावरण में आपकी असुविधा लगातार बढ़ती जा रही है और आप सोच रहे हैं कि कहीं आपके दोस्त यह न सोचें कि आप इस छोटी सी बात का बतंगड़ बना रहे हैं। आप बेचैन हैं कि आप अपने लिए खाना मंगाने जैसा छोटा सा काम नहीं कर पा रहे हैं।

नतीजा: आप बुरा महसूस करते हैं, अपराधबोध से ग्रसित हो जाते हैं। अगर आपका खाना आता भी है और आपको लगता है कि उन्होंने बेकन हटाकर वही व्यंजन फिर भेज दिया है तो और भी मुश्किल पेश आती है। अब आप सोचते हैं कि क्या इस धोखाधड़ी की शिकायत की जाए? लेकिन ऐसा न हो कि आपके मित्र और ज़्यादा परेशान न हो जाएँ! कुल मिलाकर अंत में आपकी शाम उतनी सुखद नहीं हो पाती, जितने की आपने आशा या अपेक्षा की थी।

मैं इस समस्या का एक हल बताता हूँ: आपको कुछ निर्णय लेने होंगे। जब आप मित्रों के साथ कहीं खाना खाने जाते हैं तो शुरू में ही स्पष्ट कर दें कि आप उसी रेस्तराँ में जाएँगे, जहाँ शाकाहारी विकल्प उपलब्ध हों अन्यथा आप खाना खाने साथ नहीं जाएँगे। इसमें उन्हें बुरा लगने की कोई बात नहीं है और न ही आपके लिए है। अगर आप मिलकर कोई काम करना चाहते हैं-और आपकी मित्रता को रेस्तराँ के चुनाव से अधिक महत्व मिलना ही चाहिए-तो आपके मित्रों को ऐसे किसी रेस्तराँ में भोजन करने में कोई एतराज़ नही होना चाहिए, जहाँ आपके लिए भी भोजन के विकल्प मौजूद हों! वैसे भी आजकल शाकाहार भी उतनी अजीबोगरीब और असामान्य बात नहीं रह गई है! रेस्तराओं को भी चाहिए कि ऐसे लोगो की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखे। और अगर वे ऐसा नहीं करते तो वे आप जैसे ग्राहकों से वंचित होंगे, आपको अपने निर्णय पर अपराध बोध क्यों हो!

दूसरा विकल्प है, अपने मित्रों को अपने घर आमन्त्रित करना! सब मिलकर कुछ पकाएँ या पहले से कुछ अपने मनपसंद व्यंजन पकाकर उन्हें बुलाइए। उन्हें एहसास दिलाइए कि शाकाहारी व्यंजन बहुत स्वादिष्ट होते हैं-सम्भव है, तब वे इस बात के कायल हो जाएँ कि अगली बार जब साथ खाने बाहर जाएँ तो ऐसा रेस्तराँ खोजें, जहाँ शाकाहारी भोजन भी उपलब्ध हो।

सौभाग्य से मैं ऐसे देश में रहता हूँ, जहाँ सामिष भोजन का सेवन सबसे कम होता है- अर्थात, यहाँ आसपास कोई न कोई रेस्तराँ हमेशा मौजूद होता है, जहाँ शाकाहारी भोजन उपलब्ध हो। लेकिन मुझे अक्सर एक और समस्या का सामना करना पड़ता है: मैं लहसुन और प्याज़ भी नहीं खाता। लेकिन भोजन के मामले में मुझे और भी बहुत से अनुभव प्राप्त हुए हैं-और शायद अपने व्यक्तिगत अनुभवों के विषय में मैं कल इसी ब्लॉग में लिखूँगा।

‘आइए, सेक्स के बारे में बातें करें’ का अर्थ ‘आइए, अश्लील चित्र देखें’ नहीं है! 7 अगस्त 2014

कल मैंने इस विषय पर चर्चा की थी कि सिर्फ यौन सम्बन्ध स्थापित करने पर, सेक्स का आनंद लेने पर, सेक्स के बारे में सोचने पर या सेक्स सम्बन्धी किसी भी बात पर चर्चा करने या सोचने-विचारने पर धर्म कैसे लोगों में अपराधबोध भर देता है। वास्तव में कई लोगों के लिए सेक्स इतना बड़ा मामला बन गया है कि वे इस विषय में किसी भी तार्किक चर्चा के काबिल नहीं रह गए हैं। उनके लिए सेक्स सम्बन्धी हर बात विकाराल रूप ले चुकी है।

मेरे एक ब्लॉग पर एक भारतीय मित्र से चर्चा हो रही थी। उस ब्लॉग में मैंने लिखा था कि सेक्स के बारे में हमें बच्चों से भी, उनकी आयु के लिहाज से उपयुक्त तरीके से, खुलकर बात करनी चाहिए। मैंने उससे कहा कि मैं अपनी बेटी से भी सेक्स सम्बन्धी बात करूँगा। मैं चाहूँगा कि मेरी बेटी को अपना साथी चुनने की पूरी आज़ादी मिले और वह किसके साथ सोना चाहती है, इसका निर्णय भी वह स्वयं ही करे। यह सिर्फ और सिर्फ उसका चुनाव होगा कि कौन उसके बिस्तर पर सोएगा- इसमें मेरा कोई दखल नहीं होगा!

उसके जवाब से मैं स्तब्ध रह गया। उसने कहा, "लेकिन मैं अपनी बेटी के साथ पोर्न (अश्लील) विडिओ नहीं देख सकता!"

दरअसल मैं मानता हूँ कि आप में से ज़्यादातर लोग चकरा गए होंगे और ताज्जुब कर रहे होंगे कि वास्तविक मुद्दे से इस बात का क्या ताल्लुक हो सकता है। लेकिन उसकी इस बात पर आगे सोचते हुए मैं कह सकता हूँ कि इसके परिणामों को लेकर, उसके वक्तव्य के पीछे मौजूद विचारधारा को समझकर मैं भौंचक रह गया। मुझे समझ में आ रहा था कि सेक्स के बारे में चर्चा करते हुए वास्तव में इन लोगों का दिमाग इस ओर मुड़ जाता है।

वास्तव में, ऐसा कौन करेगा? कौन अपनी बेटी के साथ सोफे पर बैठकर अश्लील विडिओ देखेगालेकिन इसके बारे में बात ही कौन कर रहा है? जैसे "सेक्स के बारे में बातचीत करना" और "अश्लील विडिओ देखना" एक ही बात हो! भाई मेरे, दोनों में ज़मीन और आसमान का अंतर है!

मुझे लगता है कि लोग, खासकर धार्मिक लोग, सेक्स को लेकर बुरी तरह बंधनों में जकड़े होते हैं और सेक्स शब्द का भूले-भटके भी इस्तेमाल करते हैं तो खुद ही कामोत्तेजित हो उठते हैं! जैसे ही वे किसी नंगे शरीर को देखते हैं, उनकी सारी दमित कामुकता बाहर फूट निकलती है। नंगापन, सेक्स, सेक्स सम्बन्धी बातचीत, यह सभी बातें उन्हें बेकाबू कर देने के लिए पर्याप्त होते हैं! सेक्स के बारे में वे सामान्य रूप से बात ही नहीं कर पाते- और इसलिए सोचते हैं, कोई दूसरा भी ऐसा नहीं कर सकता!

लेकिन- आश्चर्य! जब मैं कहता हूँ कि मैं बेटी के साथ सेक्स के बारे में बात करूँगा तो कोई मैं उसे काम-मुद्राओं की जानकारी देने नहीं जा रहा हूँ, शरीर के कामोद्दीपक हिस्सों की तरफ उसका ध्यान नहीं खींचने वाला हूँ या कामोत्तेजक साहित्य की ओर संकेत नहीं करने वाला हूँ- उसके साथ बैठकर अश्लील फ़िल्में देखने की बात तो छोड़ ही दें! वह पिता और बेटी के बीच का एक सामान्य वार्तालाप होगा। मन की सामान्य इच्छाओं, कामनाओं के बारे में, शारीरिक प्रतिक्रियाओं के बारे में कि किस तरह ये बातें हमारे नैसर्गिक शारीरिक गुण है और इस संबंध में उसकी जिम्मेदारियों के बारे में भी।

सच तो यह है कि मुझे आशा है कि हम अपनी बेटी का लालन-पालन इस तरह करेंगे कि बाद में उसके साथ सेक्स के बारे में बात करते हुए हमें शर्मिंदा न होना पड़े। लेकिन हम अपनी बेटी के साथ अश्लील बातें करेंगे, यह सोच ही हमारे समाज की बीमारी का मूल कारण है, इसी ने उसे बीमार कर रखा है।

संकीर्ण मानसिकता के चलते नैसर्गिक इच्छाओं का दमन। सेक्स विषयक किसी शब्द के उच्चारण में भी गजब की हिचक! छोटा-मोटा विचार आने पर ही कामोत्तेजित हो जाना और फिर उसका अपराधबोध, इस विषय में भयंकर शर्म-इन्हीं सब बातों पर यह बीमार मानसिकता निर्भर होती है और इसे हम भारत में बहुतायत से देखते हैं। स्वयं का यौनिक दमन ही अंततः महिलाओं के विरुद्ध यौन दुराचार में तब्दील हो जाता है।

क्योंकि आप हर वक़्त यह सुनते हैं कि "अश्लील वीडियो देखें" जबकि मैं कह रहा हूँ कि "सेक्स के बारे में बात करें"।

अब गंदा दिमाग किसका है, आपका या मेरा?

मुझे सेक्स पसंद है- और यह पसंदगी भी मुझे पसंद है! 6 अगस्त 2014

कल मैंने बताया था कि कैसे बहुत से भारतीय पुरुष अपने घर की स्त्रियों को तो शालीन व्यवहार की और अपने आपको ढँककर रखने की हिदायत देते हैं लेकिन खुद नेट पर अर्धनग्न महिलाओं की तस्वीरें देखते हैं, उसकी उत्तेजना का मज़ा लेते हैं। वे यह पसंद करते हैं मगर तुरंत ही इस आनंद को लेकर अपराधबोध से ग्रसित हो जाते हैं। खुद अपनी यौनिकता के लिए अपराधबोध-इसे सही तरीका नहीं कहा जा सकता!

मुझे लगता है कि मैं पहले एक बार इस अपराधबोध की अभिव्यक्ति की चरमावस्था के बारे में लिख चुका हूँ: जब लोग सिर्फ और सिर्फ प्रजनन के उद्देश्य से यौन सम्बन्ध स्थापित करते हैं। जी हाँ, ऐसा भी होता है। कुछ हिन्दू समूह और सम्प्रदाय मौजूद हैं, जो इस नियम का सख्ती के साथ पालन करने की कोशिश करते हैं। वे तभी आपसी प्रेम का आनंद लेते हैं, जब वे संतान उत्पन्न करना चाहते हैं। अन्यथा पति-पत्नी अन्तरंग रूप से एक दूसरे को छुए बगैर साथ-साथ रहने के कर्तव्य का पालन भर करते रहते हैं। क्यों? क्योंकि हिन्दू धर्म कहता है कि सिर्फ मज़े के लिए यौन सम्बन्ध स्थापित करना गलत है, यौन आनंद में लिप्त होना पाप है!

जब आप अपने साथी के साथ सेक्स करते हैं तो स्वाभाविक ही, उसका आनंद लेते हैं-उस सुख से बचना मुश्किल है। लेकिन उसका आनंद लेना तो पाप कर्म है इसलिए आप सेक्स करते ही नहीं हैं। और जब सेक्स करना आपकी मजबूरी ही बन जाए, क्योंकि यह बच्चा पैदा करने का एकमात्र तरीका है, तो आप सिर्फ उन दिनों में ही सेक्स करते हैं, जब पत्नी गर्भधारण के योग्य होती है और उसे भी जल्द से जल्द निपटा दिया जाता है, जिससे कम से कम आनंदप्राप्ति सुनिश्चित की जा सके, आप कम से कम पाप के भागी बनें!

आपको बधाई कि आपने धर्म को पाप-पुण्य, अपराध और लज्जा के जंजाल में आपको फाँसने की इजाज़त दे दी!

प्रसंगवश यह कि यह दकियानूसी मान्यताएँ सिर्फ हिन्दू धर्म की बपौती नहीं हैं! इस्लाम में तो सेक्स और शारीरिक सुख के प्रति बहुत विकृत नजरिया है ही मगर ईसाइयत में भी इसी तरह की कहानियाँ मैंने सुनी हैं। बूढ़ी औरतें और दादियाँ घर की युवा लड़कियों को जीवन का बहुमूल्य पाठ इस तरह पढ़ाती हैं: जो स्त्रियाँ अपने अंगों को छूती हैं, पति के बिस्तर पर सोने का आनंद लेती हैं और यहाँ तक कि खुद स्वतःस्फूर्त, अपने प्रयास से चरम सुख का आनंद प्राप्त कर लेती हैं, वेश्याओं के सादृश्य हैं। सेक्स करना हर धर्म में एक गन्दा और शर्मनाक काम है-विशेष रूप से, लड़कियों और महिलाओं के लिए!

मेरे विचार से, महिला और पुरुष दोनों के लिए इसमें किसी शर्म या अपराधबोध की बात ही नहीं है! इसी तरह आप जीवन का सम्पूर्ण सुख उठा सकते हैं! सेक्स कौन पसंद नहीं करता? लेकिन धर्म के प्रभाव में, आप उसे पसंद करने के बाद भी उसके बारे में बुरा ही महसूस करते हैं।

मैं तो सेक्स पसंद करता हूँ-उससे संबन्धित हर बात मुझे प्रिय है!

आशा करता हूँ कि आप भी ऐसा ही महसूस करते होंगे!

मुक्ति की आकांक्षा में मृत्यु कि प्रतीक्षा करने के स्थान पर जीवित रहते हुए अपने आपको धर्म के बंधन से मुक्त कीजिए और खुश रहिए! 16 जुलाई 2014

क्या आप ऐसे लोगों को जानते हैं, जो अपने जीवन को लेकर नकारात्मकता और अफसोस (दीनता) से भरे होते हैं? मुझे हाल ही में इसका एक धार्मिक कारण याद आ गया है, जो कम से कम हिंदुओं के मामले में साफ मौजूद दिखाई देता है। दीनता का औचित्य अथवा जीवन का अफसोस क्यों?: हिन्दू धर्म के मुताबिक आप जीवन की शुरुआत ही पाप से करते हैं।

शायद आप जानते होंगे कि हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता पाई जाती है। हिन्दू धर्मग्रंथों के इस विचार के अनुसार वे यह भी मानते हैं कि मनुष्य का जन्म होता ही उसकी आत्मा के अधःपतन के चलते है।

जब एक भले व्यक्ति की मृत्यु होती है तो हिन्दू समझते हैं कि उसने अच्छे कर्म किए हैं इस कारण वह व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश का और वहाँ अस्थाई रूप से रहने का हकदार हो गया है। जब वह स्वर्ग में रहकर अपने पुण्य कर्मों को खर्च कर देता है तो उसे वापस पृथ्वी पर लौटना पड़ता है क्योंकि स्वर्ग में कर्मों के अनुसार उसका निर्धारित समय पूरा हो चुका है । वह अभी मुक्त नहीं हुआ है अन्यथा उसे स्वर्ग जाना ही नहीं पड़ता-उसकी आत्मा मुक्त हो जाती और सीधे इस संसार के रचयिता परमपिता परमेश्वर में मिल जाती। इस तरह धार्मिक रूप से एक हिन्दू का जीवन में एकमात्र मक़सद मुक्ति पाना होता है, जिससे उसे दोबारा जन्म लेकर धरती पर वापस न आना पड़े!

कुल मिलाकर यह कि आपका पुनर्जन्म लेना एक बुरी बात है। आपकी एकमात्र इच्छा होती है कि काश पुनः जन्म लेकर धरती पर आने की आवश्यकता न पड़ती, काश मैं इस संसार में नहीं होता, कि काश मुझे मुक्ति मिल गई होती! अर्थात आप कह रहे होते हैं कि काश मेरा जन्म नहीं होता! तो आप पूरा ज़ोर इस बात पर लगा देते हैं कि इस पुनर्जन्म के चक्कर से पीछा छुड़ा सकें। आप दिन में कई बार प्रार्थना करते हैं, देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं, गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाने के लिए लम्बी यात्राएँ करते हैं और हर साल तीर्थाटन करते हैं।

आप जन्म से ही पापी हैं। आप खुश रहने की अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं?

मैंने सुना है कि ईसाइयत में भी यह विचार मौजूद है! विस्तार से इस विषय में मैं नहीं जानता मगर इतना जानता हूँ कि वे उस मिथकीय कहानी पर विश्वास करते हैं, जिसके अनुसार मनुष्य स्वर्ग की जगह इस धरती पर सिर्फ इसलिए है कि मनुष्य जाति की आदि-माता ईव ने ईश्वर के आदेश के विरुद्ध जाकर भले-बुरे के ज्ञान-वृक्ष का सेव्-फल खा लिया था। अब सारा जीवन आपको भला व्यक्ति बनने की कोशिश करनी चाहिए, ईश्वर से प्रेम करना चाहिए और सारी मनुष्य जाति के पापों का प्रायश्चित्त करने वाले जीसस से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे आपकी रक्षा करें।

धर्म चाहता है कि आप अपने अपराधबोध से कभी मुक्त न हों। उस अपराध या पाप के लिए जिसे आप जानते तक नहीं, जिसे आपने अंजाम नहीं दिया है! आप पैदा ही इसलिए हुए कि आपके किसी पूर्वज ने यह अपराध किया था और अब उसका प्रायश्चित्त आपको करना है और इस कहानी में परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं है!

तो आपको इस एहसास के साथ सारा जीवन गुज़ारना है, सिर्फ ऐसे काम करने हैं जिनसे आप पर उस काल्पनिक ईश्वर की कृपा बनी रहे। जब आप इन बातों पर विश्वास करते हैं तो फिर कभी भी खुश कैसे रह सकते हैं?

धर्म आपको बताता है कि मृत्यु के बाद आपको किस तरह मुक्ति मिल सकती है-लेकिन अगर आप वास्तव में खुश रहना चाहते हैं तो आपको जीवित रहते हुए ही मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए!

भक्तों की दुविधा: गुरु के अपराधों को जानते हैं मगर मानते नहीं- 11 सितंबर 2013

स्वाभाविक ही आसाराम के सारे शिष्य ऐसे नहीं होते जो उसके एक इशारे पर कोई भी अपराध करने के लिए बेझिझक तैयार हो जाएँ। इन भक्तों की भीड़ में बहुत से ऐसे भी होते हैं जिन्हें कई शंकाएँ होती हैं, लेकिन वे आँख बंद किए रहते हैं और अपने विश्वास को किसी तरह थामे रहते हैं। क्यों? चलिए, देखते हैं ऐसे लोगों के दिमागों में क्या चल रहा होता है और उनके जज़्बात क्या कहते हैं।

आसाराम के खिलाफ अब न सिर्फ यौन दुराचार का आरोप है बल्कि धीरे-धीरे उसकी और भी कई कारस्तानियाँ उजागर हो रहीं हैं जिनमें वह ऐसे ही और कई बिल्कुल दूसरी तरह के अपराधों में लिप्त पाया गया है। मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि देश भर में स्थित उसके आश्रम या तो आंशिक रूप से या पूरी तरह से हड़पी गई ज़मीनों पर निर्मित किए गए हैं। ये जमीनें वास्तव में सरकारी जमीनें हैं और बेचने के लिए नहीं थीं मगर कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने रिश्वत लेकर गैरकानूनी रूप से हो रहे आश्रम-निर्माण को जान बूझकर नज़रअंदाज़ किया और देखते देखते सरकारी जमीनें आसाराम के इन आश्रमों का हिस्सा बनती चली गईं। अब तो हर कोई इस समस्या की तरफ उंगली उठा रहा है, मगर आसाराम के जेल जाने से पहले वे सब कहाँ थे?

मगर क्या आरोप है यह कोई मानी नहीं रखता। आसाराम के ये भक्त बाहर कुछ नहीं कहते और हो सकता है कि पूछने पर कह दें कि उनके गुरु ने कुछ भी गलत नहीं किया है, मगर भीतर ही भीतर उनके मन में अपनी ही कही बात पर शक बना रहता है! वे देख रहे होते हैं, पढ़ते हैं, समाचार सुनते हैं और अगर वे वाकई ईमानदार हैं तो मानते भी हैं कि उनके गुरु ने वाकई ऐसा अपराध किया है।

फिर भी वे उस दिशा में इसके आगे सोचने की ज़रूरत नहीं समझते। कारण समझ में आता है: कई सालों से वे इस गुरु के साथ हैं और उसके बारे में उनके मन में कोमल भावनाएँ विकसित हो गई हैं, उस पर उन्होंने बहुत सा रुपया और समय खर्च किया है। गुरु के प्रति उनके समर्पण पर टीका-टिप्पणी करने वाले मित्रों और रिश्तेदारों के सामने उन्होंने दृढ़ता के साथ गुरु का पक्ष लिया है। अगर वे उसकी गलती स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें यह भी मानना होगा कि पिछले कई वर्षों से वे स्वयं गलत रास्ते पर थे! यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल है!

ऐसे भक्त एक ऐसे व्यक्ति के प्रति, जो भगवान जैसा या उससे भी ऊपर है, अपने अंधविश्वास को बनाए रखना चाहते हैं। स्वाभाविक ही, उनके लिए वह कभी गलती न करने वाला और अपतनशील है और वे उसके द्वारा किए गए किसी भी दुर्व्यवहार को या अपराध को झूठा साबित करने के लिए कोई भी कुतर्क प्रस्तुत करने पर आमादा रहते हैं! बाद में वे यही कुतर्क खुद अपने आपको शांत रखने में और अपनी शंकाओं का शमन करने में इस्तेमाल करते हैं। इसके बावजूद इस बारे में उन्हें कभी भी पूरी तरह चैन नहीं मिल पाता और वे कोशिश करते हैं कि सार्वजनिक रूप से इस विषय पर किसी विवाद में न उलझें।

वे अपने कान बंद कर लेते हैं, गलतफहमी में रहे आते हैं और तूफान के थमने का इंतज़ार करते हुए समय गुज़ारते हैं, इस आशा में कि कुछ समय बाद गाड़ी पटरी पर आ जाएगी और जैसा अब तक चल रहा था फिर चल पड़ेगा।

ऐसे भक्तों के लिए मेरी सलाह है कि डरिए नहीं और जो कुछ आप भीतर ही भीतर पहले से जानते हैं उसके लिए अपनी आँखें और कान खुले रखिए। आपका गुरु भगवान नहीं है, वैसे ही जैसे आप भगवान नहीं हैं! यह समझने का साहस दिखाइए कि आपकी ही तरह वह भी एक सामान्य मनुष्य है और यह भी कि उसने, शायद अपनी प्रसिद्धि और धन के बल पर ऐसे काम किए हैं जो न सिर्फ नैतिक रूप से गलत हैं बल्कि गैरकानूनी भी हैं।

इस बात का एहसास करें कि ऐसे व्यक्ति की आपको कोई आवश्यकता नहीं है। अपने आसपास के लोगों से सलाह और मदद लें मगर किसी भी हालत में अपना सर्वस्व किसी पर भी निछावर न करें। अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं वहन करें और तब आप महसूस करेंगे कि जीवन में आए इस परिवर्तन ने आपको कितना मजबूत बना दिया है!

जब सेक्स में जीवनसाथी की रुचि ख़त्म हो जाये – 7 अप्रैल 2013

मेरे द्वारा दिये जाने वाले व्यक्तिगत सत्र के दौरान अकसर लोग अपनी अंतरंग समस्या की चर्चा करते है जिनका जिक्र उन्होंने कभी किसी अन्य के सामने नहीं किया होता है । यह उनके लिये एक सुअवसर होता है कि एक ऐसे वातावरण में स्वयं को खोलने का, जहां वे विश्वास करते है कि उनका एक भी शब्द उनके किसी अन्य परिचित को नहीं पता चलेगा। हमारी चर्चा गोपनीय होती है। उन मामलों में भी जिनमें मैं यहां आने वाले व्यक्ति के साथ मित्रवत हो जाता हूं, बिना उनकी अनुमति के व्यक्तिगत सत्र के दौरान बातचीत के विषय की चर्चा मैं कभी नहीं करता। यह कारण रहा कि वर्ष 2005 में जब एक मित्र ने अपनी बहुत ही निजी समस्या का खुलासा मेरे समक्ष किया तो मुझे बहुत आश्चर्य नहीं हुआ।

वस्तुतः वह अपनी पत्नी के माध्यम से मेरे संपर्क में आये थे। वह क्षेत्र में होनेवाले विभिन्न अध्यात्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिये आ रही थी, मेरे बारे में सुना था और अपने पति को विश्वास दिलाया कि उनका साथ में चलना, उनके लिये भी अच्छा होगा। ध्यान के एक सत्र के दौरान मुझे समझने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत सत्र के लिये निर्णय लिया वह भी एक दूसरे से अलग – अलग सत्र के लिये। दुबारा मिलने के पहले, हमारे बीच छोटी सी मित्रता स्थापित हो गई थी पति मुझपर पूर्णतः विश्वास करते हुये, पत्नी के साथ अपने संबंध के विषय में मुझसे बातचीत करने लगे थे। संक्षेप में कहा जाये तो वे सेक्सुअली असंतुष्ट थे।

उन्होंने मुझे बताया कि वह अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते है और दोनों ने जीवन का एक लंबा सफ़र एक साथ तय किया है, और जिंदगी के उतार चढ़ाव में साथ रहे हैं, अपनी तरफ़ से वे पत्नी को खोना नहीं चाहते हैं। सिवाय एक बात के कि उनकी पत्नी को सेक्स में एक दम रुची नहीं थी, बाकी सब कुछ सही चल रहा था। पत्नी के नजदीक आने के लिये और सेक्स में रुची पैदा करने के लिये उन्होंने विभिन्न तरीका अपनाया, रोमांटिक या आक्रामक सेक्स और पुराने समय को याद दिलाने या पूर्णतः कुछ नये पद्धति, परन्तु पत्नी ने वैसा कुछ भी महसूस नहीं किया। गुजरते समय के साथ सेक्स के प्रति उनकी क्रियाशीलता कम होती चली गई, वैसे अवसर जब पति की पहल का पत्नी ने जवाब दिया हो, कम होते चले गये और अब वे सन्यासी की तरह जी रहे थे, वे ऐसी मानसिक अवस्था में पहुंच चुके थे जहां पति को यह विश्वास हो गया था कि वे जीवन में अब दुबारा सेक्स नहीं कर सकते हैं|

उनकी व्यथा मुझे गहरे तक छू गई विशेषकर उन्होंने जो प्यार अपनी पत्नी के लिये अभिव्यक्त किया था। उन्होंने बताया, मैं उससे बहुत प्यार करता हूं यही कारण है कि अपनी शारीरिक इच्छा की पूर्ति के लिये किसी अन्य औरत के पास नहीं जाना चाहता। मुझे ऐसी औरत मिल सकती है जो मुझे पाकर प्रसन्न होगी या जिन्हें मैं धन से प्राप्त कर सकता हूँ परन्तु अपनी प्यारी पत्नी के साथ मैं यह नहीं कर सकता। सेक्स की इस समस्या के दौरान ऐसे पल भी आये जब मेरी पत्नी ने इसके लिये अनुमति दी: "मुझे बुरा नहीं लगेगा अगर आप किसी और के पास जाते है" परन्तु उन्होंने पत्नी के आफ़र को नहीं स्वीकार किया।

उन्होंने पत्नी की सेक्स से संबंधित किसी भी क्रिया के प्रति असम्मति के बारे में बताया "मैं हमेशा यह सब कुछ नहीं करना चाहता हूं परन्तु वह छोटी सी पहल से भी इंकार करती है।" मैंने उनके इस दर्द को समझा, बेडरूम (शयनकक्ष), जहां उन्हें एक दूसरे के प्रति सबसे ज्यादा अन्तरंग होना चाहिये वहां जाने के बाद वे एक दूसरे के लिये पुरी तरह अनभिज्ञ हो जाते हैं।

स्पष्टतः यह समस्या दोनों के बीच द्वंद/ विरोध का कारण बन गई थी। पति को सेक्स की आवश्यकता थी, सेक्सुअल ऊर्जा बिना प्रवाहित हुये संचित होने लगी, दबाव से छुटकारा पाने के लिये उन्होंने पोर्न फ़िल्में देखना शुरु कर दिया, पत्नी द्वारा पकड़े जाने के बाद क्रोध एवं घृणा का भाव प्रकट किया गया जिसके कारण वे खुद को दोषी महसूस करने लगें। इस विषय को लेकर दोनों के बीच तकरार भी हुई जिसने बिस्तर पर दोनों के बीच के फ़ासले को बढ़ाने का कार्य किया। पत्नी सेक्स के प्रति कठोर लगती थी, उसके भावों से यह प्रकट होता था जैसे सेक्स स्वयं में कुछ इस तरह की चीज है जिसे सिर्फ गंदे लोग करते है या चर्चा करते है।

हालांकि उन्होंने इस बात का पूरी तरह ख्याल रखा कि उनका यह अंतर्कलह दुनिया के सामने प्रकट न हो। सबकी नजरों में वे एक दूसरे से प्यार करने वाले आदर्श पति-पत्नी थे। इसके अतिरिक्त उन दोनों के बीच और कोई विवाद नहीं था। पूरा दिन वे मधुरता के साथ व्यतीत करते थे, किसी को भी उनके संबंधों में व्याप्त तनाव का आभास नहीं हो सकता था यहां तक की खुद उन्हें भी, जबतक कि शाम न घिर आये। उन्होंने दुनिया के लिये और खुद के लिये आदर्श पति-पत्नी होने का आवरण बना रखा था।

पति से सब कुछ सुनने के बात मैंने उन्हें स्पष्ट बता दिया कि मैं उनकी पत्नी से भी बात करना और अगर संभव हुआ तो दोनों को एक साथ सुनना चाहुंगा क्योंकि यह उन दोनों का बहुत ही अन्तरंग मामला था । उन्होंने बहुत ध्यान देते हुये पत्नी से बात की और वह तैयार हो गई। संक्षेप में कहा जाये तो मैंने सेक्सुअल अन्तरंगता को पाप समझने वाला सामान्य भाव उनकी पत्नी के अंदर महसूस किया जो उसके पारंपरिक एवं कैथोलिक वातावरण में पले बढ़े होने के कारण था। कुछेक निजी सत्र एवं पति-पत्नी दोनों के साथ संयुक्त सत्र के बाद हम इन सभी मुद्दों पर खुलकर बात करने में सफ़ल हुये । मैंने बताया सेक्स कितना नैसर्गिक है और उसमें पाप जैसा कुछ भी गलत नहीं है बल्कि यह अपने साथी के साथ अन्तरंग क्षणों का आनंद है।

लंबे समय के दौरान धर्म द्वारा बहुत गहरे पैठा दी गई इस पाप वाली भावना को त्यागना इतना आसान नहीं था लेकिन जब हम कुछ दिन बाद मिले तो दोनों पति-पत्नी ने मुझे बताया कि उनका बेडरूम (शयनकक्ष) अब जीवंत हो गया है और वे अब शारीरिक अन्तरंगता का फ़िर से आनंद ले रहे है। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि मैं उनकी मदद करने का निमित्त बना।

मुझे पता है बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो इस तरह की समस्या के निदान के लिये कोई सहायता नहीं तलाश कर पाये हैं। यह बहुत ही निजी मामला होता है जिसका समाधान सामान्य सुझाव से नहीं हो सकता और मुझे आशा है कि वैसे लोग योग्य परामर्शदाता तलाश लेंगे जो उन्हें साथ लाने में मदद करेगा क्योंकि शारीरिक अन्तरंगता के बिना एक सफ़ल रिश्ता लंबे समय तक नहीं टिक सकता।