धार्मिक परम्पराएँ शिष्यों को गुरुओं के अपराधों पर पर्दा डालने पर मजबूर करती हैं-12 सितंबर 2013

आसाराम प्रकरण में सबसे बड़ी समस्या उनके शिष्यों की धार्मिक पृष्ठभूमि है। हिन्दू धर्म मनुष्य-पूजा (व्यक्ति पूजा) को प्रोत्साहित करता है! यह धार्मिक पृष्ठभूमि और संस्कार ही वे कारक हैं जो लोगों को अपने गुरु के विरुद्ध कुछ भी बोलने से रोकते हैं, भले ही उन्होंने गुरु को अपराध करते हुए देख लिया हो। यही कारण है कि गुरु द्वारा प्रताड़ित होने पर भी उनके शिष्य उसका प्रतिवाद नहीं करते और उसके अपराधों को किसी से कहते हुए सकुचाते हैं। ऐसे अपराध हो रहे हैं तो इनके पीछे सबसे मुख्य कारण यही है!

जिन धर्म-ग्रन्थों पर गुरु बनाने की परंपरा आधारित है, वे बताते हैं कि गुरु ईश्वर के समान या उससे भी बड़ा है। अर्थात, यह कि किसी दूसरे के मुंह से गुरु की आलोचना सुनना भी पाप है। जो भी गुरु करता है, ठीक करता है, इसलिए या तो आप उस व्यक्ति का मुंह बंद कर दें या अपने कान बंद कर लें, जिससे गुरु के विरुद्ध उच्चारे गए ऐसे कटु शब्द आपके दिमाग तक न पहुँचें।

हिन्दू धर्म कहता है कि गुरु के माध्यम से ही आपको मुक्ति प्राप्त हो सकती है-इसलिए हर मनुष्य के पास एक ऐसा व्यक्ति होना ही चाहिए जिसके बारे में वे कोई भी बुरी बात न सुनें। जैसे वे भगवान की मूर्ति के पाँव धोते हैं वैसे ही वे उसके भी पाँव पखारेंगे। भगवान के सामने नतमस्तक होते हैं उसी तरह गुरु के सामने भी होंगे। अपने गुरु के लिए उनका सम्पूर्ण समर्पण होगा।

हिन्दू धर्म की कुछ परम्पराओं में शिष्यों से अपने तन, मन और धन को गुरु के चरणों में समर्पित करने का आदेश है। कुछ गुरु जानबूझकर इसका शब्दशः अर्थ ग्रहण करते हैं और अपने शिष्यों से यथार्थ में अपने शरीर का समर्पण करने की अपेक्षा करते हैं। आसाराम के कुछ पूर्व शिष्य अब यह बता रहे हैं कि कैसे वह अश्लील बातें किया करता था और चाहता था कि वे धर्म-ग्रन्थों में लिखे आदेशानुसार अपने शरीर को उसे समर्पित करें!

ऐसी अपेक्षा रखने वाला अकेला आसाराम ही नहीं है। मैंने कई सम्प्रदायों के बारे में सुना है कि उनमें विवाह के तुरंत बाद घर की नई नवेली दुल्हिन को पहले परिवार के गुरु के पास जाना पड़ता है और उसके बाद ही वह अपने पति के साथ हमबिस्तर हो सकती है। उसे गुरु को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है जैसे देवताओं को चढ़ाया जाता है! जब गुरु उसके साथ सो लेगा, उसे आशीर्वाद देगा तभी उसका पति और परिवार वाले उसका स्वागत करेंगे! भारत में आज भी यह सब चल रहा है, मगर क्यों? क्योंकि उनके लिए गुरु ईश्वर जैसा ही है!

काफी समय पहले, मेरा एक दोस्त था जो मेरी तरह ही प्रवचन इत्यादि किया करता था और उसने गुरु का चोला भी पहन लिया था। वह शादीशुदा था और लगभग 40 वर्ष का था लेकिन जब वह एक गाँव में गया तो उसके आयोजक ने अपनी 17 वर्षीय लड़की उसे दान कर दी! उसने क्या किया? उसने अपनी पत्नी को छोड़ दिया और उस लड़की से विवाह कर लिया और अब उनके कई बच्चे हैं!

विश्वास ने ऐसे रीति-रिवाजों को जन्म दिया है। धर्म ही गुरुओं द्वारा किए जा रहे सारे अपराधों की जड़ है। बचपन से ही लोगों को सिखाया जाता है कि गुरु ही ईश्वर है। वह कोई गलत काम कर ही नहीं सकता और तुमसे अपेक्षा की जाती है कि गुरु की हर आज्ञा का पालन करोगे। अगर कोई कहता है कि यह गलत है तो उसका मुंह बंद कर दो या उसकी बात सुनो ही मत। उसके कथन की उपेक्षा करो या आलोचना से बचो, मन में आ रहे अपने विचारों का त्याग करो।

आसाराम का प्रकरण एक युवा लड़की की बहादुरी के चलते सामने आया। भारत भर में ऐसी बहुत सी दुखद कहानियाँ पीड़ितों के दिलोदिमाग में वाबस्ता हैं। डर, अपराध और दमन-धर्म और उसके ग्रंथ हमें सिर्फ और सिर्फ यही दे सकते हैं।

भक्तों की दुविधा: गुरु के अपराधों को जानते हैं मगर मानते नहीं- 11 सितंबर 2013

स्वाभाविक ही आसाराम के सारे शिष्य ऐसे नहीं होते जो उसके एक इशारे पर कोई भी अपराध करने के लिए बेझिझक तैयार हो जाएँ। इन भक्तों की भीड़ में बहुत से ऐसे भी होते हैं जिन्हें कई शंकाएँ होती हैं, लेकिन वे आँख बंद किए रहते हैं और अपने विश्वास को किसी तरह थामे रहते हैं। क्यों? चलिए, देखते हैं ऐसे लोगों के दिमागों में क्या चल रहा होता है और उनके जज़्बात क्या कहते हैं।

आसाराम के खिलाफ अब न सिर्फ यौन दुराचार का आरोप है बल्कि धीरे-धीरे उसकी और भी कई कारस्तानियाँ उजागर हो रहीं हैं जिनमें वह ऐसे ही और कई बिल्कुल दूसरी तरह के अपराधों में लिप्त पाया गया है। मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि देश भर में स्थित उसके आश्रम या तो आंशिक रूप से या पूरी तरह से हड़पी गई ज़मीनों पर निर्मित किए गए हैं। ये जमीनें वास्तव में सरकारी जमीनें हैं और बेचने के लिए नहीं थीं मगर कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने रिश्वत लेकर गैरकानूनी रूप से हो रहे आश्रम-निर्माण को जान बूझकर नज़रअंदाज़ किया और देखते देखते सरकारी जमीनें आसाराम के इन आश्रमों का हिस्सा बनती चली गईं। अब तो हर कोई इस समस्या की तरफ उंगली उठा रहा है, मगर आसाराम के जेल जाने से पहले वे सब कहाँ थे?

मगर क्या आरोप है यह कोई मानी नहीं रखता। आसाराम के ये भक्त बाहर कुछ नहीं कहते और हो सकता है कि पूछने पर कह दें कि उनके गुरु ने कुछ भी गलत नहीं किया है, मगर भीतर ही भीतर उनके मन में अपनी ही कही बात पर शक बना रहता है! वे देख रहे होते हैं, पढ़ते हैं, समाचार सुनते हैं और अगर वे वाकई ईमानदार हैं तो मानते भी हैं कि उनके गुरु ने वाकई ऐसा अपराध किया है।

फिर भी वे उस दिशा में इसके आगे सोचने की ज़रूरत नहीं समझते। कारण समझ में आता है: कई सालों से वे इस गुरु के साथ हैं और उसके बारे में उनके मन में कोमल भावनाएँ विकसित हो गई हैं, उस पर उन्होंने बहुत सा रुपया और समय खर्च किया है। गुरु के प्रति उनके समर्पण पर टीका-टिप्पणी करने वाले मित्रों और रिश्तेदारों के सामने उन्होंने दृढ़ता के साथ गुरु का पक्ष लिया है। अगर वे उसकी गलती स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें यह भी मानना होगा कि पिछले कई वर्षों से वे स्वयं गलत रास्ते पर थे! यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल है!

ऐसे भक्त एक ऐसे व्यक्ति के प्रति, जो भगवान जैसा या उससे भी ऊपर है, अपने अंधविश्वास को बनाए रखना चाहते हैं। स्वाभाविक ही, उनके लिए वह कभी गलती न करने वाला और अपतनशील है और वे उसके द्वारा किए गए किसी भी दुर्व्यवहार को या अपराध को झूठा साबित करने के लिए कोई भी कुतर्क प्रस्तुत करने पर आमादा रहते हैं! बाद में वे यही कुतर्क खुद अपने आपको शांत रखने में और अपनी शंकाओं का शमन करने में इस्तेमाल करते हैं। इसके बावजूद इस बारे में उन्हें कभी भी पूरी तरह चैन नहीं मिल पाता और वे कोशिश करते हैं कि सार्वजनिक रूप से इस विषय पर किसी विवाद में न उलझें।

वे अपने कान बंद कर लेते हैं, गलतफहमी में रहे आते हैं और तूफान के थमने का इंतज़ार करते हुए समय गुज़ारते हैं, इस आशा में कि कुछ समय बाद गाड़ी पटरी पर आ जाएगी और जैसा अब तक चल रहा था फिर चल पड़ेगा।

ऐसे भक्तों के लिए मेरी सलाह है कि डरिए नहीं और जो कुछ आप भीतर ही भीतर पहले से जानते हैं उसके लिए अपनी आँखें और कान खुले रखिए। आपका गुरु भगवान नहीं है, वैसे ही जैसे आप भगवान नहीं हैं! यह समझने का साहस दिखाइए कि आपकी ही तरह वह भी एक सामान्य मनुष्य है और यह भी कि उसने, शायद अपनी प्रसिद्धि और धन के बल पर ऐसे काम किए हैं जो न सिर्फ नैतिक रूप से गलत हैं बल्कि गैरकानूनी भी हैं।

इस बात का एहसास करें कि ऐसे व्यक्ति की आपको कोई आवश्यकता नहीं है। अपने आसपास के लोगों से सलाह और मदद लें मगर किसी भी हालत में अपना सर्वस्व किसी पर भी निछावर न करें। अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं वहन करें और तब आप महसूस करेंगे कि जीवन में आए इस परिवर्तन ने आपको कितना मजबूत बना दिया है!

गुरु की वासना-शांति के लिए लड़कियां मुहैया कराना, आँख मूंदकर उसके अपराध के भागीदार बनना-10 सितंबर 2013

गुरुओं से धोखा खाए हुए लोगों की, आसाराम प्रकरण में प्रताड़ित लड़की के पिता की, परिस्थिति का जायजा लेने के बाद मैं चाहता हूँ कि आसाराम के उन शिष्यों पर भी नज़र दौड़ा ली जाए जो आसाराम की अनैतिक और गैरकानूनी कारगुजारियों में पूरी सक्रियता के साथ हिस्सा लेते रहे थे और आज भी यही मान रहे हैं कि उनके गुरु ने कुछ भी गलत नहीं किया है और यह सब उसके खिलाफ षड्यंत्र का हिस्सा भर है।

ये लोग इस प्रकरण के चलते बहुत उत्तेजित हो गए हैं और सारी भावनाओं में गुस्सा सबसे ऊपर है-लेकिन जब कि छला गया शिष्य गुरु पर नाराज़ है, इनका गुस्सा प्रताड़ित, उसके परिवार, मीडिया और हर ऐसे व्यक्ति पर टूट रहा है जो उनके गुरु, आसाराम के विरुद्ध कुछ भी कहने का साहस कर रहा है। वे अपने मालिक को खुश करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं और वे हर ऐसे व्यक्ति से घृणा करते हैं जो उसे अप्रसन्न करने वाला कोई काम करता है।

आसाराम के निकटस्थ सहायकों का उदाहरण लें: मीडिया ने विस्तार से बताया कि आयोजनों के दौरान जिनमें स्कूल के बच्चे उपस्थित रहा करते थे, आसाराम ठीक उन लड़कियों पर फूल बरसाता था या उन पर प्रकाश की किरण फेंकता था जो उसकी आँखों को मोहक लग रही होती हैं। सहायक समझ जाते थे कि आसाराम इन लड़कियों को पाना चाहता है और वे उन्हें किसी न किसी बहाने, जैसे किसी लड़की के लिए आवश्यक ‘विशेष कर्मकांड’ के बहाने, उस तक पहुंचा देते थे। वे अपने कार्य के औचित्य या अनौचित्य के विषय में सोचने की आवश्यकता ही नहीं समझते थे। अपने गुरु को खुश करने की इच्छा को उन्होंने सारे नैतिक मूल्यों और स्वयं की सोच और समझ से ऊपर रखा हुआ था। उनका गुरु यह चाहता है इसलिए यह उचित है और उन्हें यह करना ही है।

दुर्भाग्य से यह हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति का एक हिस्सा है जिसने बहुत से लोगों को मुश्किल में डाल रखा है क्योंकि वे अपनी ज़िम्मेदारी को बिलकुल विस्मृत कर देते हैं और जघन्य से जघन्य अपराध करते समय भी अपने गुरु का अनुसरण करते हैं।

इस तरह जब आसाराम ने राजनीतिज्ञों पर षड्यंत्र करने का आरोप लगाते हुए बयान दिया, जब उसने कहा कि इसाई उन पर आक्रमण करके दरअसल हिन्दू धर्म पर आघात करने का प्रयास कर रहे हैं, जब उसने मीडिया को तोड़-फोड़ की धमकी दी, उसके सभी अंधभक्त भेंड-बकरियों की तरह उसके पीछे चल दिये और एक स्वर में वही राग अलापने लगे। उन्होंने ‘षड्यंत्र’ का प्रतिवाद करना शुरू कर दिया और अभी भी सार्वजनिक स्थलों पर उनके प्रदर्शन जारी हैं। वे पीड़िता के परिवार वालों को धमकी देने लगे और उन्हें रिश्वत देकर खरीदने की कोशिश भी की। उन्होंने अपने गुरु को कहते हुए सुना कि उसके अनुयायी हिंसा नहीं करेंगे इसकी जमानत वह नहीं दे सकता और वे आसाराम के आश्रम के सामने संवाददाताओं के साथ हाथापाई और हिंसा पर उतर आए। कई टीवी चैनलों ने दिखाया कि कैसे उसके ये अंधभक्त कैमरामैन और रेपोर्टरों के साथ उलझ गए और उन्हें शोर मचाकर और मार-पीटकर भगा दिया!

इन शिष्यों को उनके गुरु द्वारा हिंसा करने के लिए सिर्फ इसलिए भड़काया गया क्योंकि उनका इस बात पर कट्टर विश्वास है कि उनका गुरु ठीक है और हर वह व्यक्ति जो इसके विपरीत सोचता है, पागल है, मूर्ख है और उन्हें और उनके गुरु को हानि पहुंचाना चाहता है।

समस्या यह है कि ऐसे लोगों तक पहुंचना और उन्हें समझा पाना बहुत मुश्किल है! उनके दिमाग पूरी तरह अपने गुरु पर केन्द्रित होते हैं और जब आप एक शब्द भी उनके गुरु के विरुद्ध कहते हैं, वे महसूस करते हैं कि उन पर आक्रमण हुआ है और वे पलटकर वार करते हैं।

क्या उनके विचारों में परिवर्तन लाने का कोई उपाय है? अपने गुरु के प्रति उनका नज़रिया बदलने की तब तक कोई संभावना मुझे नज़र नहीं आती जब तक स्वयं उन पर कोई हादसा नहीं गुज़रता। वे उसके लिए कुछ भी करने के लिए उद्यत हैं-यहाँ तक कि वह उनका अपमान करे या गाली-गलौज करे, मारे-पीटे वे यही समझते हैं कि गुरु ठीक ही कर रहा है। उनकी अंधभक्ति तभी दूर होगी जब कोई बड़ी चोट उन्हें लगे और वे हिल उठें, उनके दिमाग के चारों ओर बनी मजबूत दीवारें ढह जाएँ, कोई दरार उसमें पड़ जाए, जहां से कोई तार्किक और समझदारी की बात उनके दिमाग में प्रवेश कर सके।

जब तक यह घटित नहीं होता तब तक वे अपने गुरु के पीछे, जिज्ञासा और विचार विहीन, गुरु के वचनों या कर्मों पर बिना कोई सवाल किए, अंधी भेंड़ों की तरह चलते चले जाएंगे।

आसाराम द्वारा प्रताड़ित लड़की के पिता को रिश्वत का प्रयास, मारने की धमकी के बावजूद सराहनीय है मजबूती-9 सितंबर 13

पिछले हफ्ते मैंने आसाराम के बारे में और उसके द्वारा किए गए यौन दुराचार के बारे में बहुत सी बातें आपको बताई थीं, जिसके लिए अब वह गिरफ्तार भी हो गया है। जब कि लगातार अधिकाधिक विस्तृत सूचनाएँ प्राप्त हो रही हैं, मैं चाहूँगा कि उन लोगों की मानसिक हालत का भी जायजा ले लिया जाए जो इन घटनाओं से किसी न किसी तरह प्रभावित हुए हैं; क्योंकि, वैसे भी, यह कोई इकलौता, इस प्रकार का प्रकरण नहीं है। यह रोज़-बरोज होता रहता है, गुरु और शिष्य बदल जाते हैं, किस्सा वही रहता है और कभी न कभी भक्त को पता चल ही जाता है कि उसके गुरु वैसे धार्मिक और पवित्र नहीं हैं जैसा कि उन्होंने इतने दिनों से समझ रखा था। सबसे पहले धोखा खाए हुए शिष्यों और भक्तों की भावनाओं और उनकी परिस्थिति पर नज़र दौड़ा लें।

आसाराम के प्रकरण में यह व्यक्ति उस 16 वर्षीय पीड़िता के पिता हैं। सालों से उन्होंने अपना जीवन, अपना प्रेम, अपना बहुमूल्य समय, अपनी भक्ति और बहुत सारा धन अपने इस गुरु को समर्पित किया हुआ था। उन्होंने अपने बच्चों को उसके स्कूल में पढ़ने भेजा, यह सोचकर कि उनके बच्चे अच्छी से अच्छी शिक्षा वहाँ पाएंगे-जबकि यह शिक्षा भी कोई सस्ती शिक्षा नहीं थी! लेकिन उन्होंने सब कुछ खुशी-खुशी किया क्योंकि वह जानते थे कि इससे उनके प्रिय गुरु की उसके पवित्र काम में मदद होगी।

और उसके बाद यह सिला! उनके विश्वास की ऐसी धज्जियां उड़ीं कि कोई बाप इससे अधिक बुरा कुछ सोच ही नहीं सकता! क्या आप पूरी तरह ध्वस्त भावनाओं की कल्पना कर सकते हैं? किसी पर समर्पित सालों की बरबादी की कल्पना या समर्पण के साथ अपने आप आ जाने वाली बेबसी की? और यह सब उस व्यक्ति के लिए जिसने, उनकी लड़की के अनुसार उसके साथ यौन संबंध स्थापित करने का प्रयास किया और हत्या तक करने की धमकी दे डाली? पूरी तरह निर्भ्रांत, भग्न-हृदय और साथ ही इतना क्रोधित, जितना ज़िंदगी में कभी हुआ न हो!

जो वे अधिक से अधिक कर सकते थे, उन्होंने किया: पुलिस में अपराध की रपट लिखवाई। दुर्भाग्य से पुलिस, या कहें, भारतीय राजनीति ने उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना शुरू कर दिया। उसने आसाराम को वीआईपी माना और लगभग दो हफ्ते उसे गिरफ्तार ही नहीं किया!

इस दौरान, उन्हें आसाराम के चेलों की तरफ से धमकियाँ मिलती रहीं। आखिर उन्हें प्रयास करके अपने फोन को पुलिस की निगरानी में रखना पड़ा। कुछ दूसरे चेलों ने उन्हें रिश्वत का लालच दिखलाया, खरीदने की कोशिश की कि वह अपने आरोप वापस ले ले। आसाराम की एक करीबी महिला जो उसकी बेटी कहलाती है और उसके परिवार के दूसरे सदस्य व्यक्तिगत रूप से उनके घर आए और आसाराम के लिए उनके पैरों पर गिरकर माफ़ी की भीख मांगी।

लेकिन वे टस से मस नहीं हुए-और क्यों और कैसे हों? उन्होंने बताया कि "मैंने आसाराम को इतना रुपया दिया लेकिन उसने मेरी ऐसी चीज़ छीन ली है जिसे वापस पाना असंभव है! ऐसे अपराध के लिए मैं क्या मांगूँ जिससे मुझे उसका प्रतिदान मिल सके? और फिर मुझे भयभीत क्यों होना चाहिए, जबकि पहले ही मैं इतना अपमान झेल चुका हूँ?"

नहीं, वे एक बार भी ढीले नहीं पड़े। इसके विपरीत, जब ऐसा लग रहा था कि पुलिस सम्मन की समय सीमा गुज़र जाने के बाद भी आसाराम पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, वे यह कहते हुए भूख हड़ताल पर बैठ गए कि वे तब तक भोजन नहीं करेंगे जब तक पुलिस आसाराम को गिरफ्तार नहीं कर लेती, जैसा कि कानूनन उसे करना ही चाहिए।

मेरा मानना है कि उन्होंने पूरी तरह उचित कदम उठाया: बहुत से दूसरे पिताओं के विपरीत, इस प्रकरण को जनता के सामने लाकर शायद वे बहुत सी लड़कियों को बचा रहे हैं। इसके अलावा बहुत से अंधों की आँखों पर पड़ा पर्दा भी इससे हट सकेगा!

और मैं उन्हें यह सलाह दूँगा कि जब भी आपको छ्ले जाने का गम सताए कि इस कुपात्र पर इतना समय, धन, ऊर्जा और प्रेम अर्पित करने के बाद मुझे क्या मिला, तो आप यही सोचिए कि एक बार आंखे खुलने के बाद कि क्या सही है और क्या गलत, आपने कार्रवाई की और आपके इस कदम से कई दूसरे लोग ऐसी निराशाजनक स्थितियों का सामना करने से बच सकेंगे।

अफसोस मत कीजिए, जो भी हुआ उसे स्वीकार कीजिए और उसे लेकर बेहतर भविष्य के विश्वास के साथ आगे बढ़ें! दूसरों की मदद करें, उन्हें अपने पास आने दें और उनको बार बार अपनी कहानी बयान करें जिससे कई और लोगों की आँखें खुल सकें और वे आपसे सीख लेकर ऐसे संत-महात्माओं के चंगुल से आज़ाद हो सकें और उन्हें ऐसी समस्याओं का सामना न करना पड़े!

क्या आसाराम की यह ‘छोटी सी’ गलती क्षमायोग्य है? क्या उसे भुलाया जा सकता है?-5 सितम्बर 2013

एक लड़की के साथ आसाराम द्वारा कथित रूप से किए गए यौन दुराचार और उसके बाद उसकी गिरफ्तारी के बारे में सिर्फ मीडिया में ही हलचल नहीं है। मैं पिछले तीन दिन से इस बारे में लिखता ही रहा हूँ और उनके नजदीकी व्यक्तियों और कई दूसरे लोगों की प्रतिक्रियाएँ भी प्राप्त हो रही हैं। कुछ प्रतिक्रियाएँ ऐसी भी आई हैं जिन्हें देखकर मुझे शक होता है कि कहीं इनकी दिमागी हालत खराब तो नहीं है!

उदाहरण के लिए ट्विटर पर दी गई प्रसिद्ध गुरु श्रीश्री रविशंकर की प्रतिक्रिया पर गौर करें। उन्होंने कहा: "अगर आप एक जाने-माने व्यक्ति हैं और आपसे कोई गलती हो गई है तो सार्वजनिक रूप से उसे स्वीकार करें। लोगों के दिल इतने बड़े हैं कि आप सोच भी नहीं सकते। वे आपको माफ कर देंगे और सब कुछ भूल जाएंगे।" रुकिए, क्या कहा? मुझे थोडा स्पष्ट करने दीजिए: अगर आप आसाराम हैं और आपने किसी 16 साल की लड़की को, जिसे उसके अभिभावकों ने आपकी देख-रेख में रखा है, यौन रूप से प्रताड़ित किया है तो आपको इतना ही करना है कि किसी स्टेज पर खड़े होकर, माइक्रोफोन पर या वीडियो कैमेरे के सामने कहें, "माफ करें, मुझसे गलती हुई!" और बस, जनता आपको माफ कर देगी और आपकी करतूतों को भूल जाएगी। जी हाँ, और कानून भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा!

यही मतलब है न आपका, श्रीश्री? क्या आप वास्तविकता से कोसों दूर निकल गए हैं या आप वाकई समझते हैं कि ऐसे जघन्य अपराधों को माफ कर दिया जाना चाहिए, उन्हें भूल जाना चाहिए, खासकर उनके अपराधों को, जो प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं? क्या यह कोई नया अधिकार है जो सिर्फ धार्मिक, अमीर और यशस्वी गुरुओं को प्रदान किया गया है या यह सड़कछाप, सामान्य अपराधियों को भी उपलब्ध है?

इससे बेहतर रवैया तो आसाराम के पुत्र का रहा जो अपने पिता की तरह ही इस गुरु-उद्यम का एक हिस्सा है। वह दो दिन पहले दिल्ली आया और आसाराम की गिरफ्तारी के विरुद्ध आंदोलन कर रहे अपने समर्थकों और अपने पिता के भक्तों की भीड़ के सामने एक छोटा सा प्रवचन दे डाला। उसने अपने पिता द्वारा किए गए तथाकथित ‘अच्छे’ कामों का बखान करते हुए कहा कि उसके पिता "उतने बुरे नहीं हैं जितना मीडिया उन्हें चित्रित कर रहा है।" उसके कहने का अर्थ यह था कि "यदि कोई व्यक्ति सौ अच्छे काम कर ले तो उसके द्वारा की गई कुछ गलतियों पर गौर करते समय उन अच्छे कार्यों को भी देखा जाना चाहिए!"

स्पष्ट है कि पुत्र स्वीकार कर रहा है कि उसके पिता से कुछ ‘छोटी मोटी’ गलतियाँ हुई हैं। ठीक ही है, बलात्कार तो उसने नहीं किया। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार आसाराम लड़की के साथ यौन संबंध बनाने में असमर्थ रहा लेकिन वह उसके सामने नंगा खड़ा हो गया और लड़की के वस्त्र भी उतारने की कोशिश की। इसके अलावा उसने लड़की के जिस्म को बुरी नीयत से छुआ, उसके अंगों को सहलाया, उसे मुख-मैथुन करने के लिए कहा और उसके मना करने पर धमकाया कि अगर उसने अपने परिवार वालों से इस मुलाक़ात के बारे में कुछ भी बताया तो उसकी और उसके परिवार वालों की हत्या कर दी जाएगी।… छोटी-मोटी गलती, और क्या!

पता नहीं क्यों, मेरा मन आसाराम के पुत्र की इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होता कि उसके द्वारा जीवन में किए गए ‘अच्छे’ काम उसकी इस गलती पर बहुत भारी पड़ते हैं! खासकर जब आप इस बात का भी विचार करते हैं कि इस लड़की के अलावा और भी बहुत सी युवतियाँ और किशोरियाँ हो सकती हैं जिन्हें आसाराम और उसके सहायकों ने आसाराम के साथ ‘व्यक्तिगत मुलाकातों’ के लिए चुना होगा! नारायण साई की तरफ से, जो आरोपी का पुत्र है, ऐसा वक्तव्य आने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि, ऐसा कहा जाता है कि, वह खुद भी अपने आपको कृष्ण और अपनी शिष्याओं को गोपियाँ-कृष्ण की सखियाँ, बताता है! पता नहीं कितनी बच्चियों और औरतों का इन दो आदमियों की असली तस्वीर के साथ साबका पड़ा होगा, जो बेचारी, डर के मारे कुछ नहीं बोल नहीं पाई होंगी और मजबूरी में ऐसी घिनौनी हरकतें करते हुए शर्मसार हुई होंगी?

मैं इस 16 साल की लड़की का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ जिसने बोलने का साहस दिखाया और मजबूती के साथ अपनी बात पर डटी रही। उसके इस कदम से बहुत सी नाबालिग और मासूम लड़कियां और महिलाएं इन बाबाओं के चंगुल में आने से बच गईं!

आसाराम और जवान लड़कियों के लिए उसकी न बुझने वाली पिपासा – 4 सितंबर 2013

दो दिनों से मैं आपको आसाराम के बारे में बता रहा हूँ कि उस पर क्या आरोप लगाया गया है और अब तक वह अपनी गिरफ्तारी से किस तरह बचता रहा। अब जबकि उसने बयान देना शुरू कर दिया है और अपने लिए जमानत की मांग कर रहा है, उसके बारे में और भी कई तरह की जानकारियाँ प्राप्त हो रही हैं जिनसे उसके बारे में एक से एक बढ़कर शर्मनाक, वीभत्स बातें सामने आ रही हैं: आसाराम ने एक ऐसी सुनियोजित और सुसंगठित प्रणाली विकसित कर रखी थी जिसके जरिये वह, इस नाबालिग लड़की की तरह, अक्सर ही अपने उपभोग के लिए महिलाओं की व्यवस्था कर लिया करता था।

इस मामले में आसाराम अकेला व्यक्ति नहीं है जिसे गिरफ्तार किया गया है! उसका एक निकट सहयोगी भी है, जिसका नाम शिवा है। इस व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया गया है और जैसी कि लगातार नई जानकारियाँ सामने आ रही हैं, शिवा ने बताया है कि आसाराम लड़कियों से अकेले में मिलने का आदी था। इसी तरह, शिवा के अनुसार, आसाराम अकेले में उस सोलह साल की लड़की से मिला था जो अब उस पर अपने यौन शोषण का आरोप लगा रही है। इतना ही नहीं, इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि शिवा ने अनगिनत लड़कियों और युवतियों को आसाराम के गुप्त कमरे के दरवाजे तक पहुंचाया था, जिसके बाद के काम का जिम्मा आसाराम खुद उठाता था!

आसाराम और शिवा के अलावा पुलिस ने शिल्पी नामक एक और महिला को, जो उस हॉस्टल की वार्डन थी जहां वह किशोरी रहा करती थी, भी सम्मन भेजा है। वह हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों की सुरक्षा और उनकी देखभाल की जिम्मेदार थी और उसे इस प्रकरण के बारे में कुछ और बातें मालूम होनी चाहिए। बल्कि उम्मीद की जा सकती है कि इस पूरे मामले में उठ रहे बहुत से प्रश्नों के जवाब उसके पास हो सकते हैं। दुर्भाग्य से उसने पुलिस के नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया है। विपरीत इसके, वह फरार हो गई है और पुलिस को उसका कोई पता नहीं है। पुलिस ने उसकी धर-पकड़ के लिए खोजी दस्ते की नियुक्ति की है। मामला बड़ा रोमांचक होता जा रहा है? कुछ कुछ!!

स्वाभाविक ही मीडिया सब कुछ देख रहा था और उसने अपनी तरफ से खोज की। कहा जाता है कि कभी वह आसाराम के बहुत निकट थी और इसी के चलते उसे वार्डन बनाया गया था। क्या अक्सर लड़कियों को आसाराम के पास वही भिजवाया करती थी? क्या वह हमेशा अपने ‘कर्मकांड’ से उनका इलाज कर दिया करता था?

जैसा कि लड़की का परिवार साफ-साफ कहता आ रहा है, यह एक बहुत सुव्यवस्थित अपराध था: किसी भी कारण से हो, लड़की एक बार बेहोश हो चुकी थी। वह तुरंत ही होश में आ गई लेकिन उसके अभिभावकों को बताया गया कि कोई भूत उसके पीछे लग गया है, कि वह बीमार पड़ गई है और यह भी कि उन्होंने आसाराम के किसी मंत्र द्वारा उसका उपचार करने की कोशिश भी की थी मगर उसे पूरी तरह स्वस्थ करने के लिए गुरु को स्वयं ही उस पर कोई कर्मकांड करना होगा!

शिवा ने स्वीकार किया है कि यह भूत वाली कहानी पीड़िता के अभिभावकों को बताई गई थी। इससे यह स्पष्ट है कि यह कोई अचानक उत्तेजना में किया गया अपराध नहीं था बल्कि सुनियोजित ढंग से अच्छा खासा जाल बिछा कर किया गया अपराध था! वही उस लड़की को कमरे तक लेकर आया था, जैसा कि पहले भी वह कई बार कर चुका था-लेकिन जिसने इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत की थी, हॉस्टल की वह वार्डन, फरार है।

स्वाभाविक ही, मेरे मन में कई प्रश्न उपस्थित हो रहे हैं। क्या उसके विभिन्न केन्द्रों में हॉस्टलों की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई है? बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के पवित्र कार्य की आड़ में कहीं उसने युवा लड़कियों की फौज तो इकट्ठा नहीं कर रखी है जिससे जब मर्ज़ी हो किसी लड़की का चुनाव अपने लिए कर सके; नाबालिग लड़कियों के साथ व्यभिचार की इच्छा रखने वाले अपने बीमार दिमाग की तृप्ति के लिए? ऐसी लड़कियां जिनके अभिभावक पूरी तरह उस पर भरोसा करते हैं, जिससे वे शिकायत लेकर कहीं जा भी ना सकें, अपने ऊपर हुए इन हादसों का कहीं ज़िक्र भी न कर सकें? लड़कियां जो शिकायत करने की बात तो छोड़िए, उसे ईश्वर की तरह पूजती हैं, जिसके चलते वह स्वतन्त्रता पूर्वक उनके साथ कुछ भी कर सके? लड़कियां, जो धमकाने पर डर जाएँ और उसका मुक़ाबला करना भी चाहें तो न कर सकें?

हम इस प्रकरण में हो रहे नित नये आयामों पर नज़र रखे हुए हैं और इंतज़ार कर रहे हैं कि कब सच्चाई सामने आती है-भले ही यह कार्य हमें कितना भी अरुचिकर क्यों न प्रतीत हो!

क्या भारत का क़ानून धार्मिक और अमीर लोगों के लिए अलग तरह से काम करता है?-3 सितम्बर 2013

कल मैंने आपको आसाराम प्रकरण के बारे में बताया था जो पिछले दो हफ्तों से समाचारों की सुर्खियों में बना हुआ है। उस पर एक नाबालिग लड़की के साथ यौन दुराचार करने का आरोप था और 31 अगस्त की रात को ही उसकी गिरफ्तारी संभव हो पाई। मीडिया में न सिर्फ उसके एक नाबालिग लड़की के साथ यौन संबंध बनाने का प्रयास करने की चर्चा थी बल्कि इस बात की भी चर्चा थी कि उसके साथ इतना विशिष्ट व्यवहार क्यों किया गया। एक साधारण यौन अपराधी या बलात्कार के आरोपी को ऐसा वीआईपी ट्रीटमेंट प्राप्त हो यह आश्चर्यजनक ही था और इसलिए प्रकरण के इस पहलू पर चर्चा और ज़्यादा हुई!

अगर आप क्रमवार विचार करें तो पंद्रह अगस्त के दिन सोलह साल की वह लड़की आसाराम के साथ अकेली थी। स्वाभाविक ही उस दिन वह अपने अभिभावकों को कुछ भी बताने में झिझक रही थी। दूसरे दिन जब वे घर पहुंचे तभी उसने उन्हें अपनी आपबीती सुनाई। अभिभावक कोशिश करते रहे कि दिल्ली में आसाराम के साथ मुलाक़ात हो जाए और जब उन्हें यह मौका नहीं दिया गया तब जाकर उन्होंने 20 अगस्त, 2013 के दिन उसके खिलाफ पुलिस में रपट लिखवाई। उसके 11 दिन बाद ही आसाराम की गिरफ्तारी संभव हो पाई- ऐसा क्यों और कैसे?

स्पष्ट है कि प्रकरण को मीडिया ने तुरंत सुर्खी बना दिया और क्योंकि आसाराम प्रतिष्ठित गुरु है उसका अतापता लगाना बहुत आसान था। फिर भी पुलिस ने कार्रवाई करने में, अपने चरित्र के अनुरूप, पर्याप्त वक्त लिया। इस बीच आसाराम दावा करता रहा कि सारा प्रकरण उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र है और मीडिया हमें बताता रहा कि पुलिस उसका बयान लेने के लिए उसके पीछे पड़ी हुई है। आसाराम एक शहर से दूसरे शहर और एक आश्रम से दूसरे आश्रम भागता रहा और पुलिस, रोज़ मीडिया में खबरें आने के बावजूद, उस तक पहुँचने से कतराती रही। क्या वे लोग पैदल चलकर उसे गिरफ्तार करना चाहते थे या और कोई बात थी जिसके कारण वे उससे मिल नहीं पा रहे थे?

स्वाभाविक ही देश में हड़कंप मच गया। मीडिया उसके पीछे पड़ा था, आसाराम के चेले और समर्थक उस पर आरोप लगाने वालों पर पिल पड़े थे और बार-बार सारे आरोपों को निराधार बता रहे थे और देश हताशा में सिर खुजा रहा था कि आखिर ऐसा आदमी मज़े में छुट्टा कैसे धूम रहा है! जब पत्रकार उन्हें ढूंढते हुए आश्रम पहुंचे तो उनके साथ मार-पीट की गई। इस लड़ाई-झगड़े में कुछ लोग गिरफ्तार भी हुए!

27 अगस्त को आखिर मीडिया ने खबर दी कि पुलिस ने आसाराम को नोटिस भेजा है "30 अगस्त तक पुलिस के सामने हाजिर हों जिससे आपका बयान लिया जा सके।" पुलिस के साथ सहयोग करने और अपनी बात उसके सामने रखने के लिए आसाराम के लिए भी समय-सीमा निश्चित की गई थी यह बात भी जैसे कोई बड़ी बात थी! लेकिन नोटिस की तामील करने के स्थान पर वह इस समय-सीमा के पूरा हो जाने का इंतज़ार करता रहा और उसके बाद भी पुलिस के सामने पेश नहीं हुआ; एसएमएस और फ़ैक्स भेजा कि वह पुलिस के सामने उपस्थित होने में असमर्थ है क्योंकि वह किसी ज़रूरी काम में ‘बहुत ज़्यादा व्यस्त’ है! उसने मांग की कि अपने कार्यक्रमों के चलते वह बहुत व्यस्त है और उसे 20 दिन का अतिरिक्त समय दिया जाए!

भला हो पुलिस का जिसे अब तक समझ में आने लगा था कि मामला कुछ ज़्यादा ही बेतुका और हास्यास्पद होता जा रहा है और आखिर 31 अगस्त की रात उन्होंने उसे गिरफ्तार कर ही लिया। अगले चौदह दिन उसका निवास स्थान एक तरह की जेल ही मानी जाएगा, भले ही वह कितना भी अपने निर्दोष होने का दावा करता रहे या पूरे प्रकरण को ही अपने विरुद्ध राजनैतिक या धार्मिक षड्यंत्र बताता रहे!

एक तरफ मुझे उस किशोरी के बयान की सत्यता पर कोई संदेह नहीं है तो दूसरी तरफ मैं पूरी तरह मानता हूँ कि इस धार्मिक देश में आसाराम की गिरफ्तारी में हुई देर के पीछे अवश्य ही कोई न कोई राजनैतिक खेल चल रहा है। अगर वह कोई सामान्य व्यक्ति होता तो उसे गिरफ्तार करने में ज़रा भी देर नहीं की जाती, दस दिन का समय नहीं दिया जाता, आने का निमंत्रण नहीं दिया जाता और न ही उसके आने का इस तरह इंतज़ार किया जाता! मगर क्यों? कानून तो सबके लिए एक जैसा होता है, ना?

शायद भारत में नहीं! स्पष्ट है कि राजनीतिक नेताओं को चीजों को एक सीमा तक तोड़ने-मरोड़ने की और उन्हें अपने हित में साधने की छूट तो होती ही है। स्वाभाविक ही लोकप्रिय ‘संत’ के विरुद्ध कार्रवाई करके उसके अनुयायियों यानी बहुसंख्यक हिंदुओं के वोट वे खोना नहीं चाहते थे।

इसके बारे में सोचना भी बहुत घृणित, गुस्सा दिलाने वाला, दुखद और निराशाजनक है, लेकिन अब भी मेरा विश्वास है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। यह भी कि सच अवश्य सामने आएगा और उसे अपने किए की सज़ा अवश्य मिलेगी जिससे यह बात साबित होगी कि उसके जैसे अमीर, धार्मिक और दबंग गुरु भी अपने अनुयायियों के साथ की गई ज्यादती की सज़ा अवश्य ही पाते हैं!

आसाराम बापू पर एक नाबालिग लड़की के साथ दुराचार का आरोप – 2 सितंबर 2013

भारतीय मीडिया में दो सप्ताह से एक बड़ी खबर लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है, जिसने सारे देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा हुआ है। यहाँ तक कि विदेशी मीडिया भी इस ओर आकृष्ट हुआ है और वहाँ भी इस प्रकरण की अच्छी ख़ासी चर्चा है। देश के एक बड़े और प्रसिद्ध धार्मिक गुरु, आसाराम बापू पर सोलह साल की एक लड़की के साथ यौन दुराचार करने का आरोप लगाया गया है। यह प्रकरण उसी से संबन्धित है।

आसाराम 72 साल का है और उसने जीवन में वह सब प्राप्त किया है जिसका सभी आध्यात्मिक गुरु सपने देखा करते हैं: दुनिया भर में उसके विभिन्न प्रकार के 1400 संगठन और 400 आश्रम हैं। कुल मिलाकर वह 15000 करोड़ रुपए की सम्पत्ति का मालिक है, जोकि 2 बिलियन यूएस डॉलर के बराबर होता है! पूजा पाठ में काम आने वाली सामग्रियों जैसे, इत्र-फुलेल, धूप-अगरबत्तियों और ऐसी ही दूसरी वस्तुओं के निर्माण का उसका बहुत बड़ा व्यापार है जिन्हें दुनिया भर में बेचा जाता है। अगर आप जानने की कोशिश करें तो आपको पता चलेगा कि उसके अनुयायियों की संख्या 4 करोड़ से 60 करोड़ तक हो सकती है जो उस पर पूरा विश्वास करते हैं और उस पर सब कुछ निछावर करने के लिए तैयार रहते हैं- बावजूद इसके कि आसाराम बापू हमेशा ही किसी न किसी विवाद का हिस्सा बनता रहा है!

एक प्रकरण में दो बच्चे आसाराम के आश्रम से अचानक गायब हो गए और उन बच्चों के माता-पिता ने आसाराम, उसके आश्रम और संस्था पर आरोप लगाया कि सिद्धि प्राप्त करने के लिए उनके बच्चों का उपयोग तांत्रिक कर्मकांड में किया गया जिसमें उनके बच्चो की बली दी गई। वह परिवार अब भी बच्चों के वियोग में दुख में डूबा हुआ है और उसके सामने न्याय की गुहार लगाने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया है। वे सीधे आसाराम पर यह आरोप लगा रहे हैं कि उसने बच्चों पर काला जादू किया था और अब अपने लिए इंसाफ का इंतज़ार कर रहे हैं। वैसे भी आसाराम यह दावा करता रहा है कि वह पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांडों की सहायता से प्रेतबाधा दूर करता है।

इसके अलावा, गैर कानूनी रूप से दूसरों की जमीनें हथियाने के भी उस पर कई इल्ज़ाम हैं। दुनिया भर में स्थित उसके कई आश्रमों के बारे में कहा जाता है कि जिन ज़मीनों पर वे स्थित हैं उनमें से कुछ हिस्से कानूनी रूप से अधिग्रहीत नहीं किए गए हैं।

जबकि उपरोक्त सभी प्रकरणों में उस पर कोई कठोर कदम नहीं उठाया गया है, ताज़ा प्रकरण में, ऐसा लगता है कि उसे गंभीर संकट का सामना करना होगा।

आश्रम के दो अनुयायियों ने अपने तीन बच्चों को, जिनमें से दो लड़के थे और एक लड़की, जोधपुर, राजस्थान स्थित आश्रम द्वारा संचालित स्कूल में दाखिल किया था और वे तीनों आश्रम के हॉस्टलों में रहते थे। तीन बच्चों की पढ़ाई के लिए उन्होंने 4500 यूएस डॉलर प्रति वर्ष के हिसाब से अदा किए थे और पिछले कई सालों से दान वगैरह देकर भी वे आश्रम की सहायता किया करते थे जिसका मूल्य, बच्चों के पिता के अनुसार, लगभग 30000 यूएस डॉलर होता है। उसने बताया कि उसने आश्रम के लिए जमीने भी खरीदी थीं जिस पर वह उनके लिए एक आश्रम भी बनाया।

एक दिन उन बच्चों के अभिभावकों को सूचना दी गई कि उनकी लड़की की तबीयत खराब है, शायद उसके शरीर पर कोई भूत सवार हो गया है। उन्हें बताया गया कि ऐसे गंभीर मामलों में बापू खुद बीमार का ध्यान रखते हैं और वही इलाज भी करते है, इसलिए बच्ची पर भी कुछ विशेष कर्मकांड करके उसे ठीक कर देंगे।

स्वाभाविक ही, वे चाहते थे कि उनकी बच्ची ठीक हो जाए और उन्हें बापू पर पूरा भरोसा भी था इसलिए वे शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश से यात्रा करके जोधपुर स्थित आश्रम आए, जहां वे अपनी बेटी से मिले। उसके बाद लड़की को एक फ़ार्म हाउस में बने मकान में ले जाया गया जहां किसी दूसरे को प्रवेश करने और बापू की क्रियाओं में व्यवधान उपस्थित करने की इजाज़त नहीं थी। इस दौरान बच्ची के अभिभावक, इस विश्वास में कि गुरु उनकी बच्ची पर अपने उपचारक कर्मकांड करके उसे स्वस्थ कर देंगे, उस मकान के बाहर बैठे रहे और खुद भी मंत्रोच्चार करते रहे।

मीडिया के जरिये जो हम जान पाए उसके अनुसार आश्रम के लोग लड़की को मकान के पीछे स्थित कमरे में ले गए जहाँ, जैसा कि उस लड़की ने बताया, हल्का अंधेरा था और उस बुजुर्ग ने अपने सारे कपड़े उतार दिये। उसके सामने पूरी तरह नंगा खड़ा होकर वह उसके शरीर के साथ खेलने लगा और क्रमशः उसके कपड़े भी उतारने की कोशिश करने लगा।

जब उस किशोरी ने प्रतिवाद किया और शारीरिक प्रतिरोध किया तो उसने उसे धमकाना शुरू कर दिया कि इस बारे में किसी को बताया तो उसके परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी जाएगी! स्वाभाविक ही लड़की डर गई और जब वह चीखने ही वाली थी कि उसने उसके मुंह पर हाथ रखकर उसका मुंह बंद कर दिया। अब उसकी आवाज़ बाहर नहीं निकल सकती थी। फिर उसने उससे मुख-मैथुन करने के लिए कहा, जिसे करने से उस किशोरी ने साफ मना कर दिया।

ये वही बाते हैं जिन्हें हम पुलिस और मीडिया रेपोर्टों से जान सकते हैं। फिर वह लड़की रोती हुई अपने माता-पिता के पास आई और उनसे कहा कि उसे तुरंत घर ले चलें। घर पहुँचने के बाद ही उसने अपने अभिभावकों को उसके साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बताया। पिता इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने कहा कि अगर उसने उसे आश्रम में सारी बातें बताई होतीं तो वह एक पत्थर लेकर अपने पूर्व गुरु को वहीँ खत्म कर देता!

अपनी बच्ची की यातनाओं की भयंकर कहानी सुनकर उसके अभिभावकों ने पता किया कि आसाराम अगली बार कहाँ प्रवचन करने वाला है, जिससे वे वहाँ जाकर उससे मिल सकें। वह दिल्ली आने वाला था, जहां लड़की के माता-पिता ने आसाराम से मिलकर अपनी बच्ची के साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में जवाब-तलब करने का प्रयास किया मगर उन्हें आसाराम से मिलने ही नहीं दिया गया। स्वाभाविक ही उनके पास पुलिस में रपट लिखवाने के सिवा कोई चारा नहीं था। उन्होंने पहली फुर्सत में यह काम सम्पन्न किया।

दिल्ली पुलिस ने प्रकरण को जोधपुर स्थानांतरित कर दिया, जहां लड़की और आसाराम के आश्रम के लोगों से लंबी पूछताछ की गई। हर पूछताछ के बाद यही बात सामने आती थी कि लड़की बिलकुल सच बोल रही है, जब कि आश्रम वाले लगातार झूठ बोले जा रहे थे। एक बार तो आसाराम ने घटना के वक़्त आश्रम में उपस्थित न होने तक का दावा किया, जो सफ़ेद झूठ था, क्योंकि उनकी मुलाक़ात के कई गवाह थे। तब उन्हें मजबूरी में स्वीकार करना पड़ा कि वह वहाँ था मगर वे यही रट लगाते रहे कि उसने वैसा कुछ नहीं किया जिसका उस पर इल्ज़ाम लगाया जा रहा है।

आखिर 31 अगस्त, 2013 के दिन आसाराम को गिरफ्तार कर लिया गया और अब उस नाबालिग लड़की के परिवार वाले उम्मीद कर रहे हैं कि उनके साथ न्याय होगा। कल मैं आपको बताऊंगा कि उन्हें न्याय पाने का पूरा भरोसा क्यों नहीं है और आसाराम की गिरफ्तारी में इतनी देर क्यों हुई।

क्यों आप खुद कठपुतली बनकर अपने जीवन को किसी गुरु के हवाले करना चाहते हैं?- 22 जुलाई 2013

आज गुरु-पूर्णिमा है, जिसे आचार्य दिवस भी कहा जा सकता है। इस दिन हर शिष्य अपने गुरु का सम्मान करता है। सारा साल भले ही वह उसे भूला हुआ हो, आज के दिन वह गुरु के पास अवश्य आएगा, गुरु के पाँव पखारेगा, उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेगा और उसे दक्षिणा के रूप में कुछ धन अर्पित करेगा। अगर वह बहुत दूर रह रहा है तो वह उससे फोन पर बात करेगा और उनसे आशीर्वाद लेगा। मैं खुद भी बहुत समय तक गुरु की भूमिका में रहा हूँ और इस स्थिति से वाकिफ हूँ। मैं अब बदल चुका हूँ, इतना बदल चुका हूँ कि जिस बात की मैं सालों पहले खुद अनुशंसा किया करता था उसी का आज मैं कड़ाई के साथ विरोध करता हूँ। इसके साथ ही गुरुवाद के इस चलन का भी।

मैं धर्म-ग्रन्थों में लिखी बातों पर भरोसा किया करता था और उसी का उपदेश देते हुए उसका प्रचार-प्रसार करता था। वह यह कि: "गुरु के बिना आपकी मुक्ति नहीं है। मुक्ति ही मनुष्यमात्र का लक्ष्य होना चाहिए और मुक्ति प्राप्त करने के लिए उसे जीवन भर प्रयास करते रहना चाहिए-इसलिए हर एक को चाहिए कि पहले वह एक ऐसे गुरु की तलाश करे जो उसे मुक्ति दे सकता है।"

आज मैं महसूस करता हूँ कि लोगों की यही हालत इस क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार की जड़ है। भोले भाले, मासूम लोग उनके पास आते हैं और उन्हें तीन बातें सिखाई जाती हैं:

1) आपको मुक्ति तभी मिलेगी जब आप किसी को गुरु बना लें।

2) जैसे आपके एक ही पिता हो सकते हैं उसी तरह आप जीवन में सिर्फ एक ही व्यक्ति को गुरु बना सकते हैं।

3) आपको अपना सर्वस्व गुरु को समर्पित करना होगा। वह आपकी सारी ज़िम्मेदारी वहन करेगा और बदले में आपको वही करना होगा जो उसका आदेश हो।

जिस पल आप अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण करते हैं, आप अपने सारे कर्मकांड उसे अर्पित कर देते हैं। आप उसकी सलाह पर चलते हैं और अपनी प्रार्थनाएँ, मन ही मन, उसके साथ ही करते हैं। उसके इस दावे पर

कि वह आपको इस मृग-माया से निकालकर मुक्ति दिलाएगा, आप अपनी सहमति से और खुशी-खुशी उसकी कठपुतली बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्वाभाविक ही गुरु इसे और इसके साथ आने वाली हर चीज को पसंद करते हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है। अपने शिष्यों को अपने साथ बनाए रखने के लिए वे इस नियम का प्रचार करते हैं कि किसी भी शिष्य का एक ही गुरु हो सकता है।

यह पूरी व्यवस्था ही मेरे विचार में, दुरुपयोग तथा शोषण करने के इरादे से ही बनाई गई है और यही कई दशकों से, बल्कि सदियों से हो रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों के मस्तिष्क पर पूरा अधिकार रखते हैं और वे जान-बूझकर दौलत पाने और न सिर्फ अपने शारीरिक सुख बल्कि अपनी स्वैर, अप्राकृतिक यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी उनका दुरुपयोग करते हैं। वहाँ होने वाले कृत्य बेहद अनैतिक और समाजविरोधी होते है।

मेरे विचार में गुरु महज एक शिक्षक होता है, जो कि उसका शाब्दिक अर्थ भी है। अगर आप कुछ सीखना चाहते हैं तो आपको गुरु की आवश्यकता पड़ती है। जब मैं स्कूल जाता था तो कक्षा के सारे बच्चे शिक्षकों को आदर के साथ ‘गुरुजी’ कहा करते थे। इस बात से कोई मतलब नहीं होता था कि वह व्यक्ति कौन है। कोई भी, जिससे आप कुछ सीखते हैं, आपका गुरु हो सकता है, भले ही वह आपसे उम्र में छोटा ही क्यों न हो। और इस तरह आपके कई गुरु हो सकते हैं, जो भी आपको शिक्षा प्रदान करता है।

किसी की कठपुतली मत बनिए। जिससे भी आप कुछ सीखते हैं उसे आप आदरपूर्वक शिक्षक का दर्जा दे सकते हैं। लेकिन किसी एक व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर न रहिए। अपने संबंध को सिर्फ शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध ही बना रहने दें और उसमें किसी दैवत्व के पहलू को जगह न दें।

लोग यह तर्क कर सकते हैं कि अगर आप धर्मग्रंथों और धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं तो आपको एक आध्यात्मिक और धार्मिक गुरु की आवश्यकता हो सकती है। मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा इसी काम में खर्च किया है। आज मैं आपसे पूछना चाहता हूँ: आखिर आप क्यों इस धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं? मेरे विचार में यह बिलकुल व्यर्थ है। आप एक ईमानदार और सुखपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। इसके लिए वेदों, कुरान या बाइबल की आपको कहाँ आवश्यकता है? उन्हें पढ़कर आप अपने ज्ञान के क्षितिज को सीमित कर लेंगे, अपने रास्ते को संकरा कर लेंगे और संदेहग्रस्त हो जाएंगे। तो अगर आपको ऐसे दर्शन की आवश्यकता ही नहीं है तो फिर धार्मिक गुरु की आवश्यकता क्यों होगी?

अपने गुरु आप खुद बनिए। आपका प्रेम, आपकी सहज विनम्रता और नैतिकता आपकी गुरु है। यही चीज़ें आपको सही रास्ता दिखाएंगी। बस, उन्हें वैसा करने आज़ादी दे दीजिए।

श्री श्री रविशंकर पर लिखने के बाद प्रशंसा , अपशब्दों एवं चेतावनियों का लेखा – जोखा – 22 फरवरी 13

Balendu

श्री श्री रविशंकर की मोबाइल फोन चार्ज करने की तथाकथित चमत्कारी शक्तियां हों या मेरे लेखों पर आईं प्रतिक्रियाएं, इस पूरे सप्ताह डायरी के पन्नों पर श्री श्री रविशंकर छाए रहे। मैंने सोचा कि क्यों न अपनी डायरी के इन पन्नों पर विभिन्न लोगों की प्रतिक्रियाओं को आपसे साझा करूं। आपके लिए भी रोचक रहेगा यह जानना।

निःसंदेह श्री श्री रविशंकर के अनुयायियों और आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के सदस्यों की प्रतिक्रिया आक्रोश से भरी हुई थी। कुछ लोगों की प्रतिक्रिया तो इतनी भद्दी थी कि वे गाली – गलौज पर उतर आए थे। मैं ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग अपने ब्लॉग पर नहीं करता हूं और इसीलिए यहां भी उसे नहीं लिखूंगा। इन बीते चार दिनों में उन्होंने जिस अश्लील, अभद्र और अपमानजनक भाषा का प्रयोग मुझे लताड़ने के लिए किया है, उसकी शायद कल्पना भी न कर पाएं आप। मजे की बात तो यह है कि ये सभी लोग वे हैं जो ध्यान करते हैं, जो शांति और संतुलन की खोज में रहते हैं एवं जिन्हें उनके गुरु स्वयं यह शिक्षा देते हैं उन्हें किसी के भी बारे में कुछ भी बुरा न कहना चाहिए और न ही सोचना चाहिए।

जब कभी भी मैं किसी पाखंडी गुरु के बारे लिखता हूं या उसके कपट का भंडाफोड़ करता हूं तो ऐसा ही होता है। यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। उनसे मुझे यही उम्मीद थी कि वे एक डरे हुए जानवर की भांति दुम दबाकर भाग जाएंगें। अपने पूज्य गुरु की धोखाधड़ी से आमना – सामना होने पर ये भक्तगण अपने बचाव के लिए आक्रमण की मुद्रा में आ गए हैं लेकिन अफसोस कि ये अपना बचाव भी समझदारी के साथ नहीं कर पा रहे हैं।

कुछ सामान्य प्रतिक्रियाएं भी आईं हैं। एक व्यक्ति जिसने श्री श्री की सिखाई हुई प्राणायाम की क्रियाओं का अभ्यास किया और उनसे लाभान्वित भी हुआ, उसने अपने गुरु की इन बेतुकी बातों की सफाई देने की कोशिश की। लेकिन वह स्वयं इस प्रश्न पर उलझन में था कि क्यों कोई ऐसी बेहूदा बात लिखेगा या अपने प्रवचन में कहेगा। तो उसने गुरु के वचनों को जायज़ ठहराने के लिए एक रास्ता निकाला कि उस प्रवचन में आए श्रोता ग्रामीण अंचलों के ‘भोले – भाले‘ और ‘कम बुद्धि‘ के लोग थे और अपने गुरु के श्रीमुख से ऐसी ही कहानियां सुनना चाहते थे।

दर असल इस कहानी की इस प्रकार व्याख्या करना बड़ा ही हास्यास्पद है। आप बड़ी चतुराई से यह कहना चाह रहे हैं: कि श्रोता मूर्ख हैं, इसलिए गुरु जी को उनके स्तर की बात करनी पड़ती है। वाह, क्या बात है! क्या एक प्रबुद्ध व्यक्ति से इस प्रकार की उम्मीद की जाती है? सबसे पहली बात तो यह है कि कभी भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति मूर्ख है। इसके अलावा आप यह नहीं कह सकते कि श्रोता जो सुनना चाहते थे, उन्हें वहीं सुना दिया गया। एक ईमानदार व्यक्ति कदापि ऐसा व्यवहार नहीं करेगा। चलिए मान लेते हैं कि लोग श्री श्री रविशंकर से यही सब सुनना चाहते हैं, तो भी क्या लोगों को खुश करने के लिए उन्हें ऐसी बेहूदी बातें बोलनी चाहिए थीं?

नहीं, मैं नहीं मानता कि आप उनके बचाव में यह स्पष्टीकरण या बहाना पेश कर सकते हैं। मेरे विचार से कोई एक ऐसा व्यक्ति नियुक्त है जो सब कुछ लिखता है या प्रत्येक प्रवचन को रिकॉर्ड करता है और फिर उसका एक अलग वेबपेज बनाता है, एक अलग लेख लिखता है जिसका कोई रीव्यू नहीं किया जाता श्री श्री ने यह सब कहा, इसे प्रकाशित किया गया और जब उन्होंने देखा कि हर कोई उनके ‘सर्वज्ञ‘, ‘सर्वव्यापी‘ या ‘आलौकिक‘ होने की बात पर यकीन करने को तैयार नहीं है तो उन्होंने इस कहानी को वेबपेज से हटा लिया।

कई पाठकों और मित्रों ने मेरा समर्थन करते हुए टिप्पणियां की हैं। जो लोग इस संगठन की कार्यप्रणाली से निराश हुए हैं एवं वे जो उन्हें एक सच्चा और संजीदा गुरु मानते थे, उनके भी कॉमेंट्स आए हैं। कुछ मित्र इन लेखों को लेकर मेरे बारे में चिंतित हैं। उनका मानना है कि श्री श्री का संगठन बहुत बड़ा है और उनके पास पैसे की ताक़त है, पहुंच वाले लोग हैं, अतः मुझे किसी भी तरह का नुकसान पहुंचा सकते हैं।

इस समर्थन के लिए मैं आप सभी मित्रों का धन्यवाद करता हूं। मेरे बारे में चिंता करने की कोई बात नहीं है। मैं जानता हूं कि मैं अकेला नहीं हूं जब मैं इन पोंगापंथी गुरुओं के बारे में लिखता हूं, इनकी धोखाधड़ी का भंडाफोड़ करता हूं या जब इन पाखंडियों, लम्पटों और नकली धर्मगुरुओं की खबरें इकठ्ठी करता हूं। मेरी तरह और भी हजारों लाखों लोग हैं जो इन गुरुओं से नाखुश हैं। वे जानते हैं कि जो हो रहा है, वह ग़लत है और वे सभी मेरा समर्थन करते हैं। मैं जानता हूं कि वे मेरी तरह मुखर नहीं हैं। लेकिन इस बात को केवल मैं ही नहीं जानता, वे सारे गुरु भी अच्छी तरह से जानते समझते हैं।