हमें घनिष्ट रूप से जुड़ना पसंद है – एक कैनेडियन योग दल का आश्रम आगमन – 13 दिसंबर 2015

कैनेडियन योग दल

पिछले हफ्ते हम आश्रम में कुछ बहुत शानदार लोगों के साथ पूरी तरह व्यस्त रहे: हमारे आश्रम में कैनेडा से एक योग-दल आया था! मुझे कहना चाहिए कि एक बार फिर हमें अपना घर कुछ बहुत सुंदर लोगों के साथ साझा करने का अवसर मिला था!

तीन साल पहले एक योग शिक्षिका हमारे आश्रम में आई थी और उसने हमारे योग-अवकाश शिविर में हिस्सा लिया था। उस समय बहुत से दूसरे लोग भी यहाँ आए थे। उन्होंने यहाँ खूब मौज-मस्ती की थी और विश्रांति लेने के बाद तरोताज़ा होकर वापस गए थे। उनमें से दो लोगों का पुनः स्वागत करने का अवसर हमें इसी साल पहले ही मिल चुका था और यह ऐसा तीसरा सुअवसर था! जब से एलेक्सिस यहाँ से गई थी, उसे हरदम लगता था कि वह पुनः हमारे आश्रम अवश्य आएगी और संभव हुआ तो अपने कुछ साथियों को लेकर भी आएगी।

इस तरह बारह लोगों का एक दल, उसी दिन हमारे आश्रम पहुँचा जिस दिन हम खुद अपनी जर्मनी यात्रा से वापस आए थे। यह दल हमारे योग-विश्रांति शिविर में हिस्सा लेने आया था। हमें ऐसे संबंध बनाना बहुत पसंद है और यह और भी अच्छा लगता है, जब वे कई दूसरे लोगों को लेकर भी आते हैं, ऐसे लोगों को, जो शायद अकेले भारत आने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे!

हमने उनके लिए ताजमहल देखने का इंतज़ाम किया था, जो दिन भर का आगरा प्रवास था। और एक दिन वे हमारे छोटे से शहर के बाज़ारों में घूमते-फिरते रहे, मंदिर देखे और आसपास के दर्शनीय स्थलों का दौरा किया। लेकिन ज़्यादातर समय वे आश्रम की दिनचर्या का जायज़ा लेते हुए गुज़ारते थे। वे आश्रम की दैनिक गतिविधियों से इतने प्रभावित थे कि न सिर्फ उसे बारीकी से देखने-समझने की कोशिश करते बल्कि खुद भी उसके साथ अंतरंग रूप से जुड़ने की और उसके अनुसार ढलने की कोशिश भी करते। स्कूल देखने के बाद वे बच्चों को खाना परोसने में मदद करने लगे, बच्चों की योग कक्षा में शामिल हुए और निश्चित ही, हमने आश्रम में तैयार सुस्वादु भोजन भी साथ-साथ किया। मैं उन्हें अपना निर्माणाधीन रेस्तराँ दिखाने ले गया और उसे लेकर हमारी योजना की जानकारी दी। इसके अलावा, सबने आयुर्वेदिक मालिश और विश्रांति संबंधी उपचार की सेवाओं का लाभ उठाया और शरीर के उन बिंदुओं पर ख़ास वर्जिश की, जहाँ अक्सर दर्द हो जाया करता है।

हमारे मित्र ने और उनके सहयोगी ने मिलकर अपनी योग कक्षाएँ लीं और कुछ और सामूहिक सत्रों का संचालन किया और एक दिन मैंने भी सत्र में शामिल होकर समूह के सदस्यों के साथ बातचीत की। एक आध्यात्मिक गुरु और उपदेशक के रूप में बिताई गई अपनी पिछली ज़िंदगी के अनुभव उनके साथ साझा किए और बताया कि वहाँ से निकलकर आज तक की-जो कुछ भी मैं बन सका हूँ, उसकी- यात्रा कैसी रही।

वास्तव में उन बहुत ख़ास लोगों के साथ हमारा समय बड़ा शानदार बीता। कल दोपहर बाद कैनेडा की फ्लाइट पकड़ने के लिए उन्होंने आश्रम से बिदा ली। गुडबाय कहते हुए बहुत सी आँखों में एक साथ आँसू आ गए-और हम अभी से सोचने लग गए हैं कि वे जल्द से जल्द यहाँ आएँ और हमें उन लोगों का स्वागत करने का मौका मिले।

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि खुले दिल के, खुशमिजाज़ लोगों से और उन लोगों से, जिनमें नई से नई बातें जानने की उत्सुकता होती है और जो भारत को भीतर से जानना चाहते हैं, मुलाक़ात हमेशा एक अद्भुत अनुभव होती है। वे खुश हैं, भारत में आकर और हमसे मिलकर आनंदित हैं, यही हमारा पुरस्कार है-और मैं जानता हूँ, वे भी आश्रम में बिताए समय की कुछ बेहद अविस्मरणीय यादें लेकर घर जा रहे हैं!

yoga

दीपों, मिठाइयों और मित्रों के साथ दीवाली का हर्षोल्लास – 11 नवंबर 2015

आज दिवाली का दिन है, प्रकाश का भारतीय उत्सव! होली के साथ यह त्योहार साल भर के दो सबसे बड़े उत्सवों में से एक है और स्वाभाविक ही सभी इसके आने की राह देखते हैं। और हमारे जर्मन अतिथि भी योजना बनाकर इसी अवसर का आनंद उठाने भारत आए हैं जिससे वे भी इस समारोह का हिस्सा बन सकें।

पिछले कुछ दिनों से ही हमारे मित्र शहर के वातावरण में क्रमशः हो रहे परिवर्तन का अनुभव कर पा रहे हैं। सभी स्कूलों में अभी त्योहार की छुट्टियाँ चल रही हैं और बच्चे स्वच्छंद होकर परिवार सहित ख़रीदारी करने, रिश्तेदारों से मिलने और त्योहार की तैयारियों के सिलसिले में बाहर निकल आए हैं। धीरे-धीरे पूरे शहर में लोग अपने घरों के सामने वाले हिस्से को रंगबिरंगे बल्बों की रोशनी से सजाते जा रहे हैं।

दो दिन पहले हमारे एलेक्ट्रिशियन ने आकर आश्रम को भी उसी प्रकार सजाना शुरू कर दिया था और कल शाम से हम प्रकाश से रोशन हुए अपने आश्रम के भवन, उद्यान, स्कूल और रेस्तराँ के सौंदर्य पर मंत्र-मुग्ध हो रहे हैं।

इसके साथ ही आश्रम की रसोई भी पूरी तेज़ी के साथ दिवाली की मिठाइयाँ बनाने में लग चुकी हैं। कल सारा दिन हमारे रसोइए बाहर से बुलाए अतिरिक्त कारीगरों के साथ मिलकर स्वादिष्ट से स्वादिष्ट मिठाइयाँ बनाने के उद्देश्य से आटा बेलने, विभिन्न मसालों को काटने-पीसने, उनका मिश्रण तैयार करने, अलग-अलग मिठाइयों को तलने या बेक करने में जुटे हुए थे! पूरा आश्रम कई तरह की बहुत शानदार खुशबुओं से भर गया है और हमारे जर्मन मित्रों का समूह उन्हें अपनी पहली चाय के साथ चख भी चुका है और भोजन के समय भी उनका आस्वाद लेने में मस्त है!

आज सुबह से साफ-सफाई का काम ज़ोर-शोर से चल रहा है और शाम के लिए सभी अपने अच्छे से अच्छे कपड़े तैयार करने में लगे हैं। हम बस अभी तेल के दिये निकालने ही वाले हैं। उनको तैयार करना पड़ता है। पहले रुई से बत्तियाँ बनाई जाती हैं और दियों में तेल भरकर बत्तियों को जलाया जाता है। पूरे आश्रम परिवार और हमारे मेहमानों के लिए इतना काम सारी दोपहर बिताने के लिए पर्याप्त है, और यह सब सचमुच बड़ा दिलचस्प होता है!

अंत में, रोशनी से चमकते आश्रम की सुंदरता में, शायद अच्छे से अच्छे कपड़े पहनकर और इस दिन को कुछ खास महसूस करते हुए हम सब साथ मिलकर अपने काम की सुंदरता का आनंद लेंगे। शानदार डिनर, शायद कुछ नाच-गाना भी और ढेर सारी मस्ती!

और हालांकि उसे सर्दी हो गई है, फिर भी अपरा, जो आश्रम की सबसे छोटी सदस्य है, इस मौज-मस्ती के केंद्र में बनी हुई है!

मैं आप सभी को एक अत्यंत उल्लासपूर्ण दीवाली की शुभकामनाएँ देता हूँ और आशा करता हूँ कि जिस तरह हम यहाँ पूरी मौज-मस्ती के साथ दीवाली मना रहे हैं, आपकी दीवाली भी वैसी ही खूबसूरत हो और यह समय आपके जीवन का अविस्मरणीय समय बन जाए!

सभी को बहुत सारा प्यार!

यहाँ आप हमारे दिवाली समारोह के चित्र देख सकते हैं।

छोटी सी डांसर अपरा ने दिया स्वतः प्रवर्तित नृत्य प्रदर्शन – 9 नवम्बर 2015

साल में एक बार, हमारे शहर में एक मेला लगता है, जिसे शहर के लोग मेरी किशोरावस्था के समय से ही मनाते चले आ रहे हैं। यह मेला ‘बाल मेला’ कहलाता है और पूरे शहर के सभी स्कूल इसमें होने वाली कला प्रतियोगिताओं, नृत्य और नाट्य प्रदर्शन इत्यादि और कई तरह के दूसरे कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर इस कार्यक्रम को आकर्षक बनाते हैं।

जब मैं स्कूल में था, तब हम भी हिस्सा लिया करते थे और मुझे याद है कि मैंने कई बार मंच पर प्रस्तुति दी थी। बच्चों को मैदान के एक कोने में स्टाल्स लगाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। एक वर्ष मैंने चाय और नाश्ते की दुकान लगाई थी-हालांकि नाश्ता मेरी माँ ने घर पर तैयार किया था। बाद में मेरे पास कैमरा भी आ गया था और उस साल मैंने लोगों की बहुत फोटो खींचीं। बाद में मैं उन्हें डिवैलप करवाके उनके घर पहुँचाता था, जिसकी मुझे संतोषजनक कीमत मिल जाती थी।

जैसा कि मैंने बताया, हमारी फ़्रांसीसी मित्र मेलनी भी लंबे समय के लिए आश्रम आई हुई है। शाम को वह स्वयं भी फायर-डांस (अग्नि नृत्य) प्रस्तुत करके हमारा और हमारे अतिथियों का मनोरंजन करती है, जिसमें वह जलते हुए गेंद को अपने चारों तरफ घुमाते हुए नृत्य करती है। वह सचमुच दर्शनीय होता है, और यह पता चलने पर कि ‘बाल-मेला’ शुरू होने वाला है, पूर्णेंदु ने अपने मित्र से बात की, जोकि इस कार्यक्रम का आयोजक भी था। निश्चित ही समारोह की यह शुरुआत बहुत शानदार रही!

फिर, हमारे मेहमानों का काफी बड़ा समूह हमारे साथ था और हम उन्हें अपने शहर की कुछ रौनक भी दिखाना चाहते थे! इसलिए पूर्णेंदु उन सभी को, यानी मेलनी, हमारे अन्य अतिथि और स्वाभाविक ही, अपरा सहित आश्रम के सभी बच्चों को उस समारोह में ले गया।

वहाँ, सभी ने बहुत अच्छा समय बिताया। आम तौर पर जैसा कि भारत में होता है, नृत्य का कार्यक्रम पूर्व-घोषित समय से काफ़ी देर बाद शुरू हुआ, किन्तु दर्शकों को उनके सब्र का बड़ा अच्छा फल मिला-उस विशाल मंच पर मेलनी के शानदार फायर डांस के रूप में। अपरा ने जब नृत्य देखा तो वह भी मंच पर जाकर डांस करने के लिए मचलने लगी।

तब पूर्णेन्दु ने एक बार फिर अपने मित्र से बात की और जल्द ही उद्घोषक ने हमारे बाल-सितारा का नाम घोषित किया! वह मंच पर आई और अपने एक प्रिय गाने पर अपना नृत्य प्रस्तुत किया, जिसे उसने पहले-पहल इन्हीं गर्मियों में सीखा था। उसके नृत्य को बहुत सराहा गया और कार्यक्रम में भागीदारी करने के ईनाम के तौर पर उसे एक मैडल और कप मिला, जिसे लेकर वह खुशी-खुशी और सगर्व घर लौटी!

जब वे सब वापस लौटने को थे, आयोजकों ने हमारे सभी अतिथियों को भी मंच पर आमंत्रित किया। हम आज सबेरे नाश्ते के समय भी वहाँ के अनुभवों का ज़िक्र करते हुए आपस में हँसी-मज़ाक करते रहे कि किस तरह आयोजकों ने उन्हें समारोह का विशिष्ट अतिथि बनाया और कैसे वे बड़ी शान से चलते हुए स्टेज पर पहुँचे और स्वागत समारोह में गंभीर भागीदारी की!

ओह, और अब हम दोनो, अपरा के माता-पिता, गर्व से अभिभूत हैं कि हमारी बच्ची सैकड़ों अपरिचित लोगों के बीच बिना किसी पूर्व-तैयारी के, उन्हीं कपड़ों में, जिन्हें उसकी माँ ने जल्दबाज़ी में पहना दिया था, पूरे आत्मविश्वास के साथ स्टेज पर जाकर अपना नृत्य प्रस्तुत कर सकती है! अपरा को भी बहुत मज़ा आया और आज मैं गर्व से कह सकता हूँ कि वह मेरी बेटी है, एक ऐसे बाप की बेटी, जो स्वयं अपनी किशोरावस्था और युवावस्था में विशाल जनसमूह के बीच, सैकड़ों मंचीय कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुका है।

आजकल हम एक साथ बहुत से कार्यक्रमों की तैयारी में व्यस्त हैं! 8 नवंबर 2015

मैं जानता हूँ कि मैं आपको कई बार बता चुका हूँ कि इस समय हम लोग कितने व्यस्त हैं-और यह व्यस्तता कल अचानक और बढ़ गई! जर्मनी से आठ बड़े खूबसूरत लोगों का एक दल हमारे यहाँ दो हफ्ते होने वाले समारोह का आनंद लेने आ पहुँचा है! हम इस समय पूरी तरह व्यस्त हैं-और हमें यह अच्छा लग रहा है!

पिछले कुछ दिनों से हम अपने सामान्य कामों में और इस दल के स्वागत-सत्कार की तैयारियों में गले-गले तक व्यस्त रहे। इस दल में कई महिलाएँ और पुरुष शामिल हैं, जिनमें से दो लोग आश्रम में पहले भी दो बार आ चुके हैं। वे अब हमारे मित्र बन चुके हैं और हमें शुरू से पता था कि उन लोगों के साथ और उनके साथ आए दूसरे मेहमानों के साथ हमारा समय शानदार गुज़रेगा।

उनके आने के बाद शाम को फ़्रांस से आई मित्र मेलनी द्वारा प्रस्तुत फायर शो से उनका स्वागत किया गया। मेलनी हमारे साथ ही है और अभी काफी समय हमारे साथ रहेगी। आज प्रातः उन्होंने योग कक्षा का आनंद लिया और इस समय बाजार में खरीदारी करने और वृंदावन का थोड़ा-बहुत जायज़ा लेने गए हैं!

अगले कुछ दिनों में वे आयुर्वेदिक पाकशाला में हिस्सा लेंगे, वृंदावन, मथुरा और आगरा की सैर करेंगे और उसके पश्चात्, स्वाभाविक ही, दीपावली समारोह में भी शामिल होंगे, जो सिर्फ तीन दिन बाद यहाँ आयोजित किया गया है!

लेकिन सिर्फ जर्मनी से आए दल की अगवानी और दीपावली समारोह की तैयारियों में ही हम व्यस्त नहीं हैं! दीवाली के तुरंत बाद, 13 नवंबर को अपरा, रमोना और मैं जर्मनी जाने के लिए कार द्वारा आश्रम से दिल्ली विमानतल की ओर रवाना हो जाएँगे!

लगभग डेढ़ साल हो चुके हैं और अपरा ने अपनी माँ के देश को नहीं देखा है और हम उस समय का और अधिक इंतज़ार नहीं कर सकते जब वह वहाँ का अनुभव प्राप्त करे, वहाँ के शानदार दोस्तों और परिवार के सदस्यों से मिले-जुले और वहाँ के जीवन का आनंद ले! गर्मियों में हम अपने रेस्तराँ को रंग-रूप देने में व्यस्त थे इसलिए वहाँ नहीं जा पाए लेकिन हम पूरा साल वहाँ जाए बगैर नहीं रह सकते लिहाजा दो माह पहले हमने अपने कार्यक्रमों का कैलेंडर चेक किया तो पता चला कि इन दो समूहों के बीच हमारे पास सिर्फ तीन हफ़्तों का समय है, जिन्हें हम जर्मनी में गुज़ार सकते हैं!

दिल्ली में ख़ास तौर पर एक दिन हमने गर्म कपड़ों की खरीदारी के किए नियत किया, जिससे जर्मनी जाने के बाद वहाँ की ठंड से बच सकें। जर्मनी में अपरा को इस बार हम स्नो फॉल दिखाने वाले हैं, जिसे वह अपने जीवन में पहली बार देखेगी। हम क्रिसमस मार्केट भी जाएँगे और वहाँ हॉट चॉकलेट और स्ट्राबेरी आईस्क्रीम भी खाएँगे।

अपनी इस रोमांचकारी यात्रा का विवरण मैं आपको नियमित रूप से देता रहूँगा!

आश्रम आने के विषय में पूछताछ का एक उदाहरण, जिसे हमने अस्वीकार कर दिया – 5 नवंबर 2015

कुछ लोगों ने यह जानने में रुचि दिखाई है कि जब हम लोगों को आश्रम न आने के लिए प्रेरित करने की कोशिश करते हैं तो ठीक-ठीक क्या करते हैं। मैं आपके सम्मुख धार्मिक उद्देश्य से वृंदावन आने की इच्छुक एक महिला के साथ हाल ही में हुए वार्तालाप का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

दरअसल ज़्यादातर हम इसी कारण ‘नहीं’ कहते हैं। वैसे आजकल इस बारे में पूछताछ पहले से बहुत कम हो गई है क्योंकि हमने अपनी वेबसाइट पर ही इन बातों को साफ-साफ लिख रखा है। लेकिन फिर भी कभी-कभार हमें ऐसे ईमेल मिल ही जाते हैं और उन्हीं का एक उदाहरण नीचे दे रहा हूँ।

पूछताछ करते हुए उसने हमें ईमेल भेजा जिसमें ‘यहाँ आने का कारण’ लिखा था:

वृंदावन की यात्रा करना सदा से मेरा सपना था। मुझे आशा है कि ईश्वर की कृपा से मैं यह यात्रा कर सकूँगी। आश्रम आकर और कुछ दिन वहाँ आश्रम का जीवन बिताकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी। मैं वहाँ के मंदिरों में भगवान के दर्शन करना चाहती हूँ, हरिनाम जपना चाहती हूँ और परिक्रमा करना चाहती हूँ।

उसका इतना भर बताना हमारे लिए पर्याप्त था कि हमारी पटरी नहीं बैठ पाएगी। इसलिए हमने उसे यह जवाब भेजा:

आश्रम आने की इच्छा प्रकट करने के लिए हम आपका शुक्रिया अदा करते हैं। हमें आपकी पूरी जानकारी प्राप्त हो गई है।

दुर्भाग्य से हमें नहीं लगता कि हमारा आश्रम आपके निवास के लिए उपयुक्त स्थान होगा। हम अधार्मिक और नास्तिक लोग हैं और ईश्वर पर विश्वास नहीं रखते।

हमारे यहाँ किसी तरह का कोई धार्मिक समारोह नहीं होता और न ही पूजा-पाठ इत्यादि की कोई व्यवस्था है।

हमे पूरा विश्वास है कि वृंदावन में आपको कई दूसरे स्थान मिल जाएँगे जहाँ आप प्रसन्नतापूर्वक रह सकेंगी क्योंकि वे अपने यहाँ आध्यात्मिक वातावरण और दूसरे धार्मिक व्यक्तियों का साथ सुनिश्चित करते हैं।

क्योंकि हम नास्तिक हैं, ईश्वर को नहीं मानते, हमें लगता है कि आप वास्तव में हमारे यहाँ उपलब्ध वातावरण में प्रसन्न नहीं रह सकेंगी। हमारा अनुभव है कि धार्मिक कारणों से वृंदावन आने वाले लोग हमारे यहाँ आकर प्रसन्न नहीं होते और हमारे दूसरे मेहमानों को अपने दृष्टिकोण से प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। उन्हें धार्मिक चर्चा आदि में ज़्यादा रुचि होती है और हमारे यहाँ चर्चा का विषय अक्सर इसके विपरीत होता है। हमारे विचार में यह स्थिति दोनों पक्षों के लिए सुविधाजनक नहीं होगी।

बहुत सादा और स्पष्ट लेकिन इसके बाद भी इतना नम्र और संजीदा कि किसी को बुरा न लगे। तो इस तरह की पूछताछ पर हम उपरोक्त आशय का जवाब लिखने की कोशिश करते हैं।

2016 में रंगों के त्यौहार, होली की मस्ती में हमारे साथ शामिल हों – 22 अक्टूबर 2015

अगर आपको हमारा न्यूज़-लेटर लगातार मिल रहा है तो आपको उसके साथ हमारा एक निमंत्रण-पत्र भी प्राप्त हुआ होगा: 2016 की होली पर हमारे द्वारा आयोजित ‘होली रिट्रीट 2016’ का निमंत्रण! जबकि पिछले वर्षों में उत्सव की विशेष छूट के साथ हम सभी लोगों को सामान्य रूप से आमंत्रित करते थे, इस बार हमने संपूर्ण ब्यौरेवार कार्यक्रम तैयार करके लोगों को भारत के, हमारे आश्रम के और निश्चय ही, होलिकोत्सव की मौज-मस्ती और उससे जुड़े समारोहों के प्रत्यक्ष अनुभव का अवसर प्रदान करने की योजना बनाई है!

जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दूँ कि होली भारत के दो सबसे बड़े वार्षिक त्योहारों में से एक है! वास्तव में यह रंगों का विशाल समारोह है और जबकि, सारा भारत इसे वसंत ऋतु में सिर्फ एक दिन मनाता है, यहाँ, वृंदावन में सारा शहर पूरे एक सप्ताह तक रंगों में सराबोर रहता है!

साल का यह सबसे अनोखा समय होता है जब आप ऐसा अनुभव करते हैं जैसे आपका बचपन पुनः लौट आया हो! आप एक-दूसरे को छका सकते हैं, मूर्ख बना सकते हैं, अपने कपड़ों की चिंता किए बगैर एक-दूसरे पर रंग डाल सकते हैं, उनके चेहरों पर रंग मल सकते हैं!

हमारे होली रिट्रीट कार्यक्रम के ज़रिए आप भारतीय संस्कृति का आंतरिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे-जिसकी शुरुआत होगी आश्रम में आयोजित स्वागत समारोह से और उसके पश्चात एक गाइड के साथ वृंदावन शहर के विस्तृत भ्रमण का इंतज़ाम भी होगा, जिससे आप उस धार्मिक और ऐतिहासिक शहर को आतंरिक रूप से जान-पहचान सकें, जहाँ आप अगले एक या दो सप्ताह रहने वाले हैं। उसके बाद आप देखेंगे कि वृंदावन के मुख्य मंदिर में होली का त्यौहार कैसे मनाया जाता है, कैसे हम खुद प्राकृतिक ताज़े रंग तैयार करते हैं और उसके बाद होली के अंतिम दिन, आश्रम में आप स्वयं होली समारोह में हिस्सा ले सकेंगे। हमारे आश्रम के निजी समारोह में आप पूर्णतः सुरक्षित वातावरण में होली की मौज-मस्ती, हुड़दंग और उसकी दीवानगी में सराबोर हो सकेंगे!

होली का त्यौहार संपन्न हो जाने के बाद आपकी छुट्टियाँ कुछ शांतिपूर्वक बीतेंगी किंतु खातिर जमा रखें, ज़रा भी कम रोमांचक नहीं होंगी! अब आप हमारे स्कूल का दौरा करेंगे और स्कूल के बच्चों से मिलेंगे, यशेंदु के साथ प्रश्नोत्तर चर्चा में भाग लेंगे, जहाँ आप अपने मनचाहे सवाल पूछ पाएँगे और निश्चय ही, ताजमहल देखने हेतु आगरा भी जाएँगे! भारतीय मसालों के प्रदर्शन होंगे, जिसमें आप जान सकेंगे कि कौन से मसाले आश्रम के भोजन में ऐसा लाजवाब स्वाद भर देते हैं और आयुर्वेदिक पाक-कार्यशाला में आप इन व्यंजनों को खुद अपने घर में बनाना सीख सकेंगे। समारोह-कार्यक्रम का अंतिम पड़ाव, होगा शाम को यमुना नदी के किनारे आयोजित होने वाले अग्नि अनुष्ठान के साथ और उसके पहले थोड़ी-बहुत खरीदारी होगी और शहर का एक और चक्कर लगाया जाएगा। उसके बाद एक बिदाई पार्टी होगी और फिर आप अपने दिल में यहाँ की सुखद यादों को लेकर अपने-अपने गंतव्य-स्थानों की ओर प्रस्थान करेंगे।

इस बीच हर दिन योग-सत्र आयोजित किए जाएँगे और आपको आश्रम में आराम करने का, आयुर्वेदिक मालिश और इलाज करवाने का, बच्चों के साथ मिलने-जुलने और खेलने का, वृंदावन के बाज़ारों की रंगीनियों में खरीदारी करने का और आसपास के वातावरण का जायज़ा लेने का भरपूर वक़्त भी मिलेगा!

इस होली रिट्रीट में हम चाहते हैं कि होली समारोह की मौज मस्ती के साथ आपको भारत की आश्चर्यजनक संस्कृति में यह एहसास भी हो कि आपका ध्यान रखा जा रहा है-और हम अभी से आपके साथ रंगों में तरबतर होने का इंतज़ार कर रहे हैं!

यहाँ आप होली रिट्रीट-2016 के सभी विवरण प्राप्त कर सकते हैं!

और यहाँ आप पिछले होली समारोह के चित्र देख सकते हैं।

जब आश्रम आना ऐसा लगता है जैसे किसी विशाल चिड़ियाघर देखने आए हों – 20 अक्टूबर 2015

अगर आप भारत में हमारे आश्रम आते हैं तो यहाँ बहुत से जानवरों से आपकी मुलाक़ात होगी। जी नहीं, पालतू नहीं-जंगली, आवारा, देसी जानवरों से। यहाँ आपको लगेगा कि आप किसी चिड़ियाघर में आ गए हैं!

हँसी-मज़ाक में हम अक्सर इसकी चर्चा करते रहते हैं! जब आप हमारे बगीचे में सैर करते हैं या बेंच पर आराम से बैठे हैं तब स्वाभाविक ही तरह-तरह की चिड़ियाँ और तितलियाँ आपका मनोरंजन करेंगी लेकिन आपको कई बंदर और गिलहरियाँ भी नज़र आएँगी। जब आप शहर में घूमने निकलेंगे तो उधम मचाते आवारा कुत्तों, बेसहारा गायों, अनियंत्रित सूअरों और आज़ादी के साथ इधर-उधर मुँह मारती बकरियों के दर्शन होंगे। आपको घोड़े, गदहे और कभी-कभी ऊँट भी मिल जाएँगे-लेकिन ऊँट अक्सर कोई गाड़ी खींचते या अपनी पीठ पर कोई बोझा ढोते हुए ही दिखेंगे। यह संभव ही नहीं है कि आप हमारे शहर में पैदल घूम-फिर रहे हैं और आपको किसी गाय से बचने की या उसे रास्ता देने के लिए अलग हटने की ज़रूरत न पड़ी हो क्योंकि गाएँ आपको हर जगह खुले आम सड़क पर घूमती हुई मिल जाएँगी या बीच सड़क पर जुगाली करते हुए! ऐसा नज़ारा आप अपने यहाँ रोज़-ब-रोज़ नहीं देखते होंगे! ठीक?

आप अपने कमरे में ही क्यों न बैठे हुए हों, आपको कोई न कोई ऐसा जानवर दिखाई दे जाएगा जिसे आप अक्सर घरों में देखने के आदी नहीं होते! एक बार आश्रम की एक मेहमान पहले ही दिन बड़ी उत्तेजित, हमारे पास आई। सीढ़ियों से तेज़ी से उतरते हुए उसकी साँस रुक रही थी और कुछ कहने से पहले उसे एक गहरी साँस भरनी पड़ी और बात करते हुए भी वह गहरी साँसे लेती रही: "मेरे कमरे में एक मगर का बच्चा है!" पल भर के लिए हम भी स्तब्ध रह गए! दौड़ते हुए उसके साथ ऊपर पहुँचे और सावधानी पूर्वक दरवाजा खोलकर उधर देखा जिधर वह इशारा कर रही थी। वह छत की ओर इशारा कर रही थी कि वहाँ! और एक छिपकली वहाँ मज़े में शांतिपूर्वक बैठी हुई थी! खैर, अगर आपने जीवन में कभी छिपकली न देखी हो तो उसे देखकर आप यही सोचेंगे कि रेंगने वाले किसी बड़े जीव का बच्चा होगा!

निश्चय ही गिरगिट से आपको डरने की ज़रूरत नहीं है लेकिन शायद बंदर के साथ आप अधिक सतर्क रहना चाहेंगे! यहाँ के बंदर बड़े शैतान और शातिर चोर हैं और शहर के बीचोंबीच उनके झुंड आदतन लोगों की आँखों पर से चश्में चुरा लेते हैं। चश्मा लेकर वे कूदकर किसी दीवार पर चढ़कर बैठ जाते हैं। फिर आपकी सहायता के लिए कोई आगे आता है और उनकी ओर बिस्किट या फ्रूट जूस का पाउच फेंकता है और उसे लपकने के लिए वे चश्मा फेंक देते हैं और चश्मा वापस दिलाने की एवज में स्वाभाविक ही आप उस व्यक्ति को कुछ न कुछ इनाम देने के लिए मजबूर हो जाते हैं। उस व्यक्ति को कुछ पैसे मिल जाते हैं, बंदर को बिस्किट मिल जाते हैं और आपको आपका कीमती चश्मा: सबका लाभ, सब खुश!

हालाँकि आश्रम में भी बहुत से बंदर मौजूद हैं, हमें अपने चश्मों की उतनी फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन बगीचे की निगरानी ज़रूर करनी पड़ती है क्योंकि वे उसे अपना खेल का मैदान समझ लेते हैं और पेड़ों की डालियों पर कूदते-फांदते रहते हैं, झूलते-लटकते हैं, फूल-पत्तियों से खेल-खिलवाड़ करते हैं; कुल मिलाकर बड़ा नुक्सान पहुँचाते हैं। कई बार पेड़ों की डगालें तक टूट जाती हैं। लेकिन देखने में वे बड़े प्यारे लगते हैं-और सामान्यतया अगर आप उन्हें अकेला छोड़ दें तो कोई समस्या पेश नहीं आती और वे भी आपकी तरफ ध्यान नहीं देते।

हाल ही में जानवरों से अत्यधिक प्रेम करने वाली एक महिला मित्र आश्रम आई थी और बाहर आवारा कुत्तों को देखकर उसके मन में दया जाग उठी और उसने उनकी मदद करने की ठानी। यह उतना आसान नहीं है लेकिन अंततः उसने एक दूकान खोज ही निकाली, जहाँ कुत्तों का तैयार भोजन मिलता है। बड़े गर्व के साथ वह एक बड़े से थैले में खाना भरकर दूकान से बाहर निकली। कुत्तों का पहला झुंड देखते ही वह रुकी और थैला खोलकर थोड़े से खाने के टुकड़े उनके लिए ज़मीन पर रख दिए। उस दिन हमें पता चला कि वृंदावन के आवारा कुत्ते कुत्तों का तैयार पैकेज्ड फ़ूड पसंद नहीं करते! आखिर उसे बंदरों और सूअरों ने खाया!

मुझे एक और मेहमान की याद आ रही है जो अपने आप में एक अजूबा ही थी-वैसा व्यक्ति आज तक मुझे नहीं मिला: वह गिलहरियों से डरती थी! वास्तव में वे दुनिया के सबसे शर्मीले और डरपोक प्राणी होते हैं और बड़े प्यारे भी! वे बचा हुआ खाना, नीचे पड़े खाने के टुकड़े उठाकर ले जाते हैं। अक्सर आप उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर अपने सामने वाले पैरों में खाना लिए कुतरते हुए देख सकते हैं। ये महिला आश्रम में पेड़ के नीचे खाने की प्लेट लिए बैठी थी और एक चंचल सी गिलहरी खाने के टुकड़े गिरने की अपेक्षा में उसकी तरफ लपकी। महिला उसे हाथ के इशारों से हकालने लगी तो स्वाभाविक ही, डर के मारे गिलहरी उसके चारों ओर चक्कर काटने लगी। महिला ने अपने पीछे उसकी आवाज़ सुनी तो उसे लगा गिलहरी पीछे से हमला करने वाली है और वह पहले तो चीखती-चिल्लाती, वहीं कूद-फांद मचाने लगी और फिर अंदर भागी। हमारे कर्मचारियों ने आवाज़ सुनी तो भागते हुए आए कि कोई बंदर परेशान कर रहा होगा। लेकिन एक पेड़ के पीछे से ताकती, स्वाभाविक ही, बहुत घबराई सी गिलहरी को देखकर वे सब हँसे बिना न रह सके और फिर महिला सहित हम सब भी हँस-हँस कर लोट-पोट हो गए!

तो, अगर आप कोई दर्शनीय चिड़ियाघर देखने का इरादा कर रहे हैं और खुद जानवरों के साथ रहने का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारा आश्रम आपको बढ़िया लगेगा!

सीज़न शुरू होते ही दोस्तों का आना शुरू हो चुका है – आश्रम के जीवन में परिवर्तन हो रहा है – 6 सितंबर 2015

वास्तव में इस साल साल भर मेहमानों का आना जारी रहा, यहाँ तक कि भीषण गर्मियों के महीनों में भी। अब मौसम कुछ ठीक होता जा रहा है, हवा में नमी कुछ कम हो रही है और धीरे-धीरे तापमान भी नीचे गिर रहा है। इसके साथ ही पर्यटन के मौसम की शुरुआत हो चुकी है और अगले कुछ सप्ताह और महीनों में फिर से आश्रम पूरा भर जाएगा। असल में इसकी शुरुआत हो भी चुकी है- आने वाले नए और पुराने मित्रों का स्वागत हो रहा है और वापस जा रहे मित्रों को दोबारा आने के आग्रह के साथ बिदा किया जा रहा है।

कल सबेरे हम सूसन को बिदा करेंगे-वह ब्रिटेन की है और योग कक्षाओं में शामिल होने, आयुर्वेदिक मालिश लेने और वृन्दावन के नज़ारे देखने कुछ दिन के लिए यहाँ आई थी। उसने यहाँ अपना समय भरपूर आनंद और सुकून के साथ व्यतीत किया और बताया कि कैसे आयुर्वेदिक मालिश से उसे पीठ दर्द से मुक्ति मिली है। इसके अलावा, अब उसने पक्का इरादा कर लिया है कि वापस जाकर वह खुद अपनी योग क्रियाओं को जारी रखेगी क्योंकि उसने यहाँ बुनियादी मुद्राएँ और आसन सीख लिए हैं, जिनमें से ज़्यादातर उसकी पीठ और कमर के स्नायुओं को मजबूती प्रदान करने वाले आसन हैं। हमें खुशी है कि उसका यहाँ अनुभव बहुत सुखद और सार्थक रहा और हम अभी से उसके दोबारा वापस आने की उम्मीद कर रहे हैं।

दूसरी बिदाई आज शाम को ही हुई और बिदाई के समय हम पहले से जानते थे कि वापसी भी जल्द ही होगी: असल में यशेंदु की गर्लफ्रेंड, इफ़ा कुछ दिन से यहाँ थी और हमारे साथ बहुत शानदार समय बिताकर अभी-अभी रवाना हुई है। वाकई परिवार का विस्तार होता देखकर कितना अच्छा लगता है-और सिर्फ यशेंदु ही नहीं, हम सब अभी से उसके दोबारा आने का इंतज़ार कर रहे हैं!

हमें पक्का विश्वास है कि वापस यहाँ आने वालों में सिर्फ यही दो नहीं होंगे-और बड़ी खुशी मिलती है जब नए मेहमान यहाँ आते हैं, यहाँ आकर मित्र बन जाते हैं और फिर समय के साथ आते-वापस जाते हुए पुराने मित्र बन जाते हैं-ऐसे ही एक मित्र का कल हमने स्वागत किया! हमारा मित्र, स्कॉट पुनः आश्रम आया है! चार साल पहले, जब रमोना गर्भवती थी, वह पहली बार यहाँ आया था और उसके बाद उसका आना-जाना चलता रहा। अब वह पुनः यहाँ है और हमें चर्चा करने का मौका मिलेगा कि इस बीच क्या-क्या हुआ, दोनों स्थानों पर जीवन कैसा रहा, उसके और हमारे जीवनों में क्या-क्या परिवर्तन हुए!

उसके साथ ही दो और लोग आए-बड़े प्यारे लोग, जो अभी हमें जानने की प्रक्रिया में हैं और हम भी उन्हें जानने की कोशिश कर रहे हैं। वे भी पर्यटक हैं और हमें आश्चर्य नहीं होगा अगर वे दोबारा किसी समय हमसे मिलने यहाँ, वृंदावन आएँ!

नए सीजन की शुरुआत का इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता था और अगले माह हम और भी बहुत से सुखद संयोगों की आशा कर रहे हैं! हमारे काम की यही खुशनुमा विशेषता है- हम बहुत से शानदार लोगों से मिलते हैं, हम उन्हें अपना मित्र बना लेते हैं, एक-दूसरे के अनुभव और भावनाएँ आपस में साथ साझा करते हैं और उन्हें भारत का अंतरंग दर्शन करवाने का प्रयास भी करते हैं।

हो सकता है, आप भी जल्द ही यहाँ आएँ! यकीन मानिए, हमें आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता होगी!

यदि आप रूखे और अशिष्ट ईमेल भेजते हैं तो समझ लीजिए, हम आश्रम में आपका स्वागत नहीं करेंगे! 23 अगस्त 2015

कुछ दिन पहले हमें एक ईमेल प्राप्त हुआ, जिसमें आश्रम में लंबे आवास हेतु पूछताछ की गई थी। लेकिन नीचे दिया गया वार्तालाप अंततः सामान्य से बहुत अलग रहा!

महिला ने निकट भविष्य में कुछ माह तक आश्रम में निवास की संभावना और उसमें आने वाले खर्च के बारे में जानना चाहा था। हमेशा की तरह रमोना ने जवाब दिया और स्वाभाविक ही, खर्च के बारे में विस्तार से बताते हुए यह भी लिखा कि हम आश्रम में उसका स्वागत करके बहुत खुश होंगे। उसी दिन देर रात को उसका जवाब मिला कि हमारे द्वारा उद्धृत कीमत उसके बूते से बाहर है और वह इतना खर्च अदा करने के लिए राज़ी नहीं है। उसी ईमेल में उसने यह भी पूछा कि क्या कुछ कम पैसों में आश्रम में रहना संभव है।

तब तक रमोना बहुत थक चुकी थी और कोई गलती न हो जाए, इसलिए उसने अपने प्रतिउत्तर को दूसरे दिन के लिए मुल्तवी कर दिया कि सबेरे, सोच-समझकर कोई दैनिक स्वयंसेवी कार्य करवाने का प्रस्ताव सामने रखते हुए उसकी मदद की जाए, उसका खर्च कम किया जाए जिससे उसका आना संभव हो सके। कम खर्च में यात्रा करने वाले बहुत से पर्यटक इस विकल्प का चुनाव करते हैं और श्रमदान करके अपना खर्च सीमित कर लेते हैं। लेकिन जब सबेरे हमने कम्प्यूटर खोला तो हमें यह ईमेल प्राप्त हुआ, जिसका उत्तर देना भी रमोना ने उचित नहीं समझा:

'हेलो रमोना,

मैंने आपकी वेबसाइट का अवलोकन किया और उसमें आपके आश्रम का विस्तृत विवरण पढ़ा और फिर आपके प्रस्ताव पर पुनर्विचार किया। मुझे लगता है कि मैं यह सब नहीं चाहती या यह मेरी आत्मा गवारा नहीं करती।

आप हमें क्या पेश कर रहे हैं? शुद्ध विलासिता! यह सब तो मुझे यहाँ भी किसी आश्रम में उपलब्ध हो सकता है!

मुझे ऐसी विलासपूर्ण सुविधाओं की ज़रूरत नहीं है!

इसके लिए मैं भारत की यात्रा नहीं करूँगी।

शुभकामनाओं सहित'

हमने सोचा कि वाह, यह आपने अच्छा किया कि हमारी वेबसाइट देख ली। हालांकि हमारा आश्रम कोई 5 सितारा होटल नहीं है और न ही हम यहाँ रहने का उस स्तर का किराया वसूल करते हैं लेकिन फिर भी अगर आपको लगता है कि हमारा आश्रम कुछ ज़्यादा ही सुख-सुविधा युक्त है तो यह अच्छा ही हुआ कि आपने यहाँ न आने का फैसला किया। और फिर आपकी बातें- और कुछ भी रही हों, शिष्ट नहीं थीं इसलिए हम भी यही चाहते हैं कि आप हमारे आश्रम में न ही आएँ तो अच्छा है!

लेकिन दो दिन बाद फिर उसका ईमेल आया। उसका लहजा पूरी तरह बदला हुआ था! उसे हमारी वेबसाइट का वालंटियर्स यानी कि स्वयंसेवकों वाला पेज मिल गया था, जहाँ हमने वही सब कुछ दर्ज कर रखा था जो हम उसे अपने अगले ईमेल में लिखने वाले थे। और उसका यह सन्देश मिला कि वह ठीक यही चाहती थी। तो खर्च कम करने की निश्चित ही एक व्यवस्था है- और ठीक यही वह चाहती थी!

लेकिन हमने उसे विनम्रतापूर्वक लिखा कि हमारे यहाँ 'सेवा' देने वाले वालंटियर्स भी ए सी कमरों की, सर्दियों में हीटर की, सुरक्षित मिनरल वाटर की, स्वास्थ्यकर, शाकाहारी और आयुर्वेदिक भोजन की और स्वच्छ बिस्तर और स्वच्छ बाथरूम की सुविधा पाते हैं। और क्योंकि उसे ऐसी किसी सुख-सुविधा की ज़रूरत नहीं है और इन सब चीजों के लिए वह भारत नहीं आ रही है इसलिए हमारा आश्रम वैसे भी उसके लिए उपयुक्त नहीं होगा। भारत में इससे कम सुविधाओं वाली जगहें कोई भी आसानी से प्राप्त कर सकता है! हमने, अंत में, खुद के लिए मनपसंद जगह तलाश करने में उसकी सफलता की शुभकामना भी व्यक्त की।

इस चर्चा से क्या शिक्षा मिलती है? यही कि अगर आप किसी के सामने भलमनसाहत के साथ अपनी बात रखते हैं तो सामने वाला भी आपके साथ अच्छा बर्ताव करता है!

वृन्दावन के हमारे आश्रम में नास्तिक सम्मेलन – 26 जुलाई 2015

मैंने आपको परसों और कल हुए कार्यक्रमों के बारे में पहले ही बताया है-नास्तिकों का सम्मेलन। कार्यक्रम की तैयारियों के समय तक हम लोगों को नहीं पता था कि शुक्रवार या शनिवार को कितने लोग आएँगे। आज मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हर स्तर पर, हर एतबार से यह एक सफल कार्यक्रम रहा और अंततः उसने बहुत से समान रुचि वाले लोगों का मिलना संभव किया!

कार्यक्रम के लिए शुक्रवार और शनिवार के दो दिन नियत थे लेकिन गुरुवार से ही अतिथियों का आना शुरू हो गया था। निस्संदेह-कुछ लोग बहुत दूर से आए थे! भारत के 13 भिन्न प्रदेशों से कुल मिलाकर 70 से अधिक अतिथियों ने इस कार्यक्रम में शिरकत की! हमारे उत्तर प्रदेश या करीबी दिल्ली से ही नहीं बल्कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तरांचल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, बिहार, उड़ीसा, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर से भी!

वर्ष के इस समय आम तौर पर आश्रम में ज़्यादा मेहमान नहीं होते और इस बार तो सिर्फ एक ही था। इस प्रकार हम अपने आश्रम में ही बहुत से मित्रों को ठहरा सके लेकिन इसके अलावा हमने पास में ही स्थित एक अतिथिगृह किराए पर लिया, यहाँ तक कि स्कूल के कमरों में भी रात में सोने की व्यवस्था करी। इस प्रकार रात में ठहरने की सब की व्यवस्था हो गयी और दिन में हम सभी आश्रम में आनंददायक समय व्यतीत करते रहे!

शुक्रवार को हमने सबको अपना स्कूल दिखाया। उन्होंने हमारे बच्चों और अध्यापिकाओं से भेंट की और वह सब प्रत्यक्ष देखा, जो वे लंबे समय से हमारी वैबसाइट पर चित्रों के माध्यम से देखा करते थे। उसके बाद मैं उन सबको हमारा निर्माणाधीन आयुर्वेदिक रेस्तराँ “अम्माजी’ज़” दिखाने ले गया।

दोपहर के समय वैसे भी हमारे पास एक दूसरे को जानने का पर्याप्त समय था फिर भी हमने शुक्रवार की शाम एक औपचारिक परिचय-सत्र भी आयोजित किया, जिसमें सभी प्रतिभागियों ने सबके सामने नास्तिकता के बारे में अपने विचार रखे और अपनी भावनाएँ व्यक्त कीं और उसके बाद संगीत, गिटार-वादन और गायन का कार्यक्रम हुआ।

कल, यानी शनिवार को हम सबने इस विषय में जानकारी हासिल की कि किस प्रकार मरणोपरान्त हम अपने शरीर चिकित्सा संबंधी प्रयोगों के लिए दान कर सकते हैं। मेरे पिताजी और नानी ने भी अपने देहदान संबंधी फॉर्म भरे और स्वाभाविक ही इस कार्यक्रम के बाद हमारी चर्चा का रुख इस ओर मुड़ गया कि किस प्रकार धर्म इस नेक काम में बाधाएँ पैदा करता है!

अंत में, यानी कल शाम को इस आयोजन का सबसे विशिष्ट हिस्सा एक नृत्य समारोह के रूप में आयोजित किया गया था, जिसका उद्देश्य जीवन का उत्सव मनाना था! हम पागलों की भांति नाचे और खूब मौजमस्ती की–जिसके बारे में कुछ धार्मिक लोग कहते हैं कि यदि आप ईश्वर को नहीं मानते तो आप आनंदित भी नहीं हो सकते! आज भारत भर से आए हमारे अनेकानेक मित्र एक-दूसरे से बिदा ले रहे हैं।

मेरे लिए यह सप्ताहांत बड़ा असाधारण और बहुत विशिष्ट रहा। इतने सारे समान रुचि रखने वाले लोगों से मिलना, उनके साथ विद्वत्तापूर्ण चर्चा में हिस्सा लेना, अपना दृष्टिकोण रखना और उनकी सुनना, आपसी विचार, भावनाएँ, ज्ञान और आदर्श एक-दूसरे के साथ साझा करना–वाकई बहुत ही अद्भुत अनुभव था। भविष्य में भी नास्तिकों, धर्म में विश्वास न रखने वालों और विवेकपूर्ण विचारकों के लिए मंच तैयार कर उन्हें आमंत्रित करने में मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी!

यहाँ आप हमारे नास्तिक सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं